Sunday, June 23, 2024
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अध्याय – 60 : भारत में क्रांतिकारी आन्दोलन – 2

बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियाँ

बंगाल में सशस्त्र क्रांति का मंत्र समाचार पत्रों के माध्यम से प्रसारित हुआ। 1906 ई. में वारीन्द्र कुमार घोष  और भूपेन्द्र दत्त  ने मिलकर युगान्तर समाचार पत्र आरम्भ किया। इसका मुख्य उद्देश्य क्रांतिकारी भावना का प्रचार करना था। शीघ्र ही यह पत्र इतना लोकप्रिय हो गया कि इसकी 50,000 प्रतियां प्रतिदिन बिकने लगीं। संध्या और नवशक्ति जैसे दूसरे पत्र भी क्रांतिकारी विचारों का प्रसार करते थे। इन पत्रों में देशभक्ति से ओत-प्रोत गीत और साहित्यिक रचनाएं छपती थीं। वारीन्द्र घोष के लेख पाठकों की धमनियों में उबाल लाने में का काम करते थे। एक लेख में उन्होंने लिखा- ‘मित्रो! सैकड़ों और हजारों व्यक्तियों की दासता अपने रुधिर की धार से बहाने को तैयार हो जाओ।’

अनुशीलन समिति की स्थापना

बंगाल में सबसे पहले स्थापित होने वाला क्रांतिकारियों का प्रमुख संगठन अनुशीलन समिति था। इसकी स्थापना 24 मार्च 1903 को सतीशचन्द्र बसु ने की। बाद में बैरिस्टर प्रमथनाथ मित्र ने इसका नेतृत्व संभाला। बंगाल में इसकी लगभग 500 शाखाएं स्थापित हो गईं। अरविन्द घोष, जतींद्रनाथ वंद्योपाध्याय (जतीन उपाध्याय), चितरंजन दास, सिस्टर निवेदिता, वारीन्द्र घोष, अविनाश भट्टाचार्य आदि अनेक क्रांतिकारी, अनुशीलन समिति से जुड़ गये। अनुशीलन समिति की स्थापना एक व्यायामशाला के रूप में हुई। प्रकट रूप से समिति स्थान-स्थान पर क्लब अथवा केन्द्र खेलकर नौजवानों को ड्रिल और तरह-तरह के व्यायाम, लाठी संचालन, तलवारबाजी, कटार चलाने, घुड़सवारी करने, तैरने तथा मुक्केबाजी का प्रशिक्षण देती थी। इन्हीं नौजवानों में से चुने हुए कुछ लोगों को गुप्त क्रांतिवादी कार्यों में लगाया जाता था। 1905 ई. में बंग-भंग विरोधी आंदोलन तथा स्वदेशी आन्दोलन से गुप्त क्रांतिकारी कार्यों को बल मिला। सैकड़ों नौजवान अनुशीलन समिति के सदस्य बन गये और बंगाल के विभिन्न हिस्सों में उसकी सैकड़ों शाखाएं खुल गईं परन्तु इन्हीं दिनों में विपिनचन्द्र पाल तथा चितरंजनदास आदि कुछ बड़े नेता अनुशीलन समिति से अलग हो गए।

क्रांतिकारी साहित्य का प्रकाशन

समिति ने कुछ पुस्तकों का प्रकाशन करवा कर उन्हें जन सामान्य में वितरित किया। 1905 ई. में भवानी मन्दिर नामक पुस्तक प्रकाशित की गई जिसमें शक्ति की देवी काली की पूजा का महत्त्व प्रतिपादित किया गया। दूसरी पुस्तक वर्तमान रणनीति थी जिसके माध्यम से यह संदेश दिया गया कि भारत की स्वतंत्रता के लिए सैनिक शिक्षा और युद्ध आवश्यक है। मुक्ति कौन पथे? नामक पुस्तक में युगान्तर के कई चुने हुए लेखों का संग्रह प्रकाशित किया गया। बकिंमचन्द्र चट्टोपाध्याय के आनन्दमठ नामक उपन्यास को भी काफी प्रचारित किया गया। वन्देमातरम, न्यू इण्डिया आदि क्रांतिकारी समाचार पत्र भी निकाले गये।

बैमफील्ड फुलर पर बम फैंकने की कार्यवाही

क्रांतिकारियों ने गोपनीय रूप से बड़ी मात्रा में अस्त्र-शस्त्र एकत्र किया। वारीन्द्र घोष और उनके साथियों ने 11 रिवाल्वर, 4 राइफलें और 1 बन्दूक इकट्ठी कीं। इस गुट में सम्मिलित होने वाले उल्लासकर दत्त ने बम बनाने का छोटा कारखाना खोला। उनके साथ हेमचन्द्र दास (कानूनगो) भी इस काम में लग गये। वे पेरिस से बम बनाने का प्रशिक्षण लेकर आये थे। जब सरकार ने क्रांतिकारियों को तंग करना आरम्भ किया तो क्रांतिकारियों ने कुछ अँग्रेज अधिकारियों को मार देने का निश्चय किया। पहला बम पूर्वी बंगाल के गवर्नर सर बैमफील्ड फुलर को मारने के लिए बनाया गया। बम फैंकने का दायित्व प्रफुल्ल चाकी को सौंपा गया। प्रफुल्ल चाकी अपने काम में असफल रहा।

गवर्नर की ट्रेन पर बम फैंकने की कार्यवाही

6 दिसम्बर 1907 को बंगाल के गवर्नर की ट्रेन को मेदिनीपुर के पास उड़ाने का प्रयास किया गया। ट्रेन सिर्फ पटरी से उतर कर रह गई। कोई हताहत नहीं हुआ।

ढाका के मजिस्ट्रेट की हत्या

23 दिसम्बर 1907 को ढाका के मजिस्ट्रेट को गोली मार दी गई।

अलीपुर षड़यन्त्र तथा मानिकतल्ला केस

30 अप्रैल 1908 को मुजफ्फरपुर में खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने जिला जज डी. एच. किंग्सफोर्ड पर बम फेंका। किंग्सफोर्ड पहले कलकत्ता में चीफ प्रेसीडेन्सी मजिस्ट्रेट रह चुका था और उसने क्रांतिकारियों को अमानवीय दण्ड दिये थे। उसने युगान्तर, वंदेमातरम्, संध्या और नवशक्ति समाचार पत्रों के पत्रकारों को सजाएं दी थीं। उसने क्रांतिकारी सुशील कुमार सेन को 15 बेंत मारने की सजा दी जबकि उसने कोई अपराध नहीं किया था। दुर्भाग्यवश जिस घोड़ागाड़ी पर बम फेंका गया था, वह किंग्सफोर्ड की गाड़ी से मिलती-जुलती मिस्टर कैनेडी की गाड़ी थी और गाड़ी में उसकी पत्नी और पुत्री बैठी थीं। वे दोनों मारी गईं। खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी घटनास्थल से भाग निकले। 1 मई 1908 को खुदीराम बोस को वाइनी स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें 11 मई 1908 को फांसी दे दी गई। प्रफुल्ल चाकी को समस्तीपुर स्टेशन पर पहचान लिया गया। जब उन्होंने देखा कि पुलिस से बचना सम्भव नहीं है तो उन्होंने स्वयं को गोली मार ली। क्रांतिकारियों ने नन्दलाल नामक उस पुलिस दरोगा को गोली मार दी जिसने खुदीराम बोस को पकड़ा था। इस पर कलकत्ता पुलिस ने क्रांतिकारियों के अनेक अड्डों पर छापे मारे तथा मानिकतल्ला के कारखाने से हथियार जब्त कर लिये। ब्रिटिश साम्राजय के विरुद्ध षड़यन्त्र करने के अपराध में 30 लोगों पर अभियोग लगाये गये। बाद में 6-7 और लोगों को भी सम्मिलित कर लिया गया। यह मुकदमा अलीपुर षड़यन्त्र तथा मानिकतल्ला केस के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

इस अभियोग की सुनवाई के दौरान नरेन्द्रनाथ गोसाईं, पुलिस का मुखबिर बन गया। वह अपनी गवाही देता उससे पहले ही कन्हाईलाल दत्त और सत्येन्द्रनाथ बोस ने उसे जेल में ही मौत के घाट उतार दिया। उन दोनों को बाद में फांसी की सजा दी गई। मुकदमे की सुनवाई के समय अदालत से बाहर निकलते हुए पुलिस के डिप्टी सुपरिन्टेन्डेट को गोली मार दी गई। मुकदमे की पैरवी करने वाले सरकारी वकील आशुतोष विश्वास को भी क्रांतिकारियों ने गोली से उड़ा दिया। मुकदमे के फैसले के अनुसार वारीन्द्र कुमार घोष, उल्लासकर दत्त, हेमचन्द्र दास और उपेन्द्रनाथ बनर्जी को आजीवन काला पानी, विभूति भूषण सरकार, ऋषिकेश, फौजीलाल और इन्द्रभूषण राय को दस-दस साल तथा अन्य लोगों को सात-सात साल की काला पानी की सजा दी गई। अरविन्द घोष को साक्ष्यों के अभाव में छोड़ दिया गया। अलीपुर षड़यन्त्र केस ने कुछ दिनों के लिए क्रांतिकारियों के कलकत्ता केन्द्र की रीढ़ तोड़ दी। उनके प्रमुख नेता गिरफ्तार हो गये। सरकारी आतंक ने उनके संगठन को छिन्न-भिन्न कर दिया।

ढाका में क्रांतिकारी गतिविधियाँ

अलीपुर षड़यन्त्र केस के बाद क्रांतिकारी कार्यों का केन्द्र ढाका बन गया। पुलिनदास और यतीन्द्रनाथ मुकर्जी क्रांतिकारियों के नेता थे। अगस्त 1910 में पुलिनदास को ढाका षड़यन्त्र केस में गिरफ्तार किया गया। इस केस में उन्हें सात साल की काले पानी की सजा दी गई। अब बारीसाल, क्रांतिकारियों का केन्द्र बन गया। मई 1913 में बारीसाल षड़यन्त्र केस चला और कई क्रांतिकारियों को सख्त सजाएं दी गईं। यद्यपि सरकार क्रांतिकारियों की शक्ति को तोड़ने की पूरी कोशिश करती रही, फिर भी वे अपना काम करते रहे।

महाराष्ट्र में क्रांतिकारी गतिविधियाँ

महाराष्ट्र अँग्रेजों के आगमन के समय से ही राजनीतिक हलचलों का केन्द्र बना हुआ था। महाराष्ट्र की जनता में राजनीतिक जागृति भी दूसरे क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक थी। माना जाता है कि 1857 की क्रांति असफल होने के बाद भारत में सशस्त्र क्रांति का मार्ग सर्वप्रथम महाराष्ट्र में ही अंगीकार किया गया।

व्यायाम-मण्डल

1896-97 ई. में पूना में चापेकर बन्धुओं- दामोदर हरि चापेकर और बालकृष्ण हरि चापेकर ने व्यायाम-मण्डल की स्थापना की। वे कांग्रेस की नीतियों के घोर विरोधी थे। उनका मानना था कि कांग्रेस के अधिवेशनों में की जा रही भाषणबाजी से देश को कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। देश की भलाई के लिए करोड़ों लोगों को युद्ध क्षेत्र में प्राणों की बाजी लगानी होगी। उन्होंने ऐसे नौजवानों को शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण दिया जो सशस्त्र क्रांति के मार्ग पर चलने को तैयार हों। 22 जून 1897 की रात को उन्होंने पूना के प्लेग कमिश्नर रैण्ड और उसके सहायक आयर्स्ट की हत्या कर दी। दामोदर चापेकर पकड़ा गया। 18 अप्रैल 1898 को उसे फांसी दे दी गई। 8 फरवरी 1899 को व्यायाम मण्डल के सदस्यों ने उन द्रविड़ बन्धुओं को मौत के घाट उतार दिया जिन्होंने पुरस्कार के लालच में चापेकर बन्धुओं को पकड़वाया था। इस पर सरकार ने व्यायाम-मण्डल के अनेक सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया। बालकृष्ण चापेकर तथा वासुदेव चापेकर को भी फांसी दे दी गई। पूना के नाटू बन्धुओं को देश-निकाला दिया गया। बाल गंगाधर तिलक को केसरी में भड़काऊ लेख लिखने के आरोप में 18 माह की जेल हुई।

अभिनव भारत

महाराष्ट्र के सर्वाधिक चर्चित क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर हुए। उनका जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र में नासिक के निकट एक गांव में चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ। 1901 ई. में उन्होंने पूना के फर्ग्यूसन कॉलेज में प्रवेश लिया और क्रांतिकारी विचारों का प्रसार करने के लिए अभिनव भारत नामक गुप्त संस्था स्थापित की। उन्होंने दुर्गा की प्रतिमा के समक्ष, देश को अँग्रेजों से मुक्त कराने का संकल्प लिया। यह संस्था सारे पश्चिम तथा मध्य भारत में सक्रिय रही। सावरकर, तिलक के शिष्य थे। बम्बई विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद तिलक की अनुशंसा पर उन्हें सरदारसिंहजी राणा द्वारा संचालित छत्रपति शिवाजी छात्रवृत्ति मिली। 1906 ई. में वे बैरिस्ट्री पढ़ने लन्दन चले गये। लन्दन प्रवास में भी सावरकर ने क्रांतिकारी विचारों का प्रचार किया तथा भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम नामक पुस्तक लिखी जिसमें उन्होंने यह सिद्ध किया कि 1857 की क्रांति, सैनिक विद्रोह न होकर भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था। ब्रिटिश सरकार ने इस पुस्तक पर पाबन्दी लगा दी।

विनायक दामोदर सावरकर के लन्दन चले जाने के बाद भी अभिनव भारत संस्था काम करती रही। पूरे महाराष्ट्र में स्थान-स्थान पर उसकी शाखाएं स्थापित हो गईं। इस संस्था ने सार्वजनिक सभाओं, मुद्रित पुस्तिकाओं, गणपति पूजन और शिवाजी उत्सव, आदि का आयोजन करके लोगों को सशस्त्र क्रांति के लिये प्रेरित किया। यह संस्था अपने सदस्यों को सैनिक प्रशिक्षण देकर ब्रिटिश शासकों से मोर्चा लेने को तैयार करती थी। सदस्यों को ड्रिल करना, लाठी चलाना, तलवार चलाना, घुड़सवारी करना, तैरना, पहाड़ों पर चढ़ना और लम्बी दूर तक दौड़ना आदि का प्रशिक्षण दिया जाता था। पूना और बम्बई के बहुत से कॉलेजों और स्कूलों में भी अभिनव भारत की शाखाएं थीं। उसके अनेक सदस्य महत्त्वपूर्ण सरकारी पदों पर भी थे। वे अत्यधिक गोपनीय रूप से अभिनव भारत से सम्पर्क में थे। अभिनव भारत का वार्षिक सम्मेलन भी गुप्त रूप से आयोजित होता था। इस संस्था का सम्बन्ध बंगाल के क्रांतिकारियों के साथ भी था।

अभिनव भारत ने देश और विदेश से तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र एकत्र करने का प्रयास किया। सावरकर ने लन्दन से, विश्वस्त साथियों के माध्यम से कई पिस्तौलें भेजीं। पांडुरंग महादेव को रूसी क्रांतिकारियों से बम बनाने की कला सीखने के लिए पेरिस भेजा गया। अभिनव भारत के अतिरिक्त और भी बहुत सी गुप्त संस्थाएं बम्बई, पूना, नासिक, कोल्हापुर, सतारा, नागपुर आदि स्थानों में सक्रिय थीं। उनमें से कुछ संस्थाओं का अभिनव भारत से सम्पर्क था।

1908 ई. में तिलक की गिरफ्तारी और 6 साल के माण्डले निर्वासन से क्रांतिकारियों का आक्रोश अत्यधिक बढ़ गया। दामोदर जोशी ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर कोल्हापुर में बहुत बड़ी संख्या में बम बनाने के लिए एक कारखाना खोला। दुर्भाग्यवश एक बम के फट जाने से भेद खुल गया। बहुत से लोगों को गिरफ्तार करके उन्हें लम्बी सजाएं दी गईं। इसे कोल्हापुर बम केस कहा जाता है।

विनायक दामोदर सावरकर के बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर को क्रांतिकारी गीत लिखने के अपराध में 1909 ई. में आजीवन निर्वासन का दण्ड दिया गया। 1909-10 ई. में नासिक षड़यन्त्र केस चला। नासिक के जिस जिला मजिस्ट्रेट ने गणेश सावरकर के मुकदमे का फैसला सुनाया, उसे 21 दिसम्बर 1909 को गोली मार दी गई। इस प्रकार, क्रांतिकारियों ने गणेश सावरकर के निर्वासन का बदला चुकाया। सावरकर को फंसाने में अँग्रेज अधिकारी जैक्सन ने विशेष भूमिका निभाई थी। इसलिये क्रांतिकारियों ने 21 दिसम्बर 1909 को उसे भी मार डाला। इस मुकदमे में 38 लोग बंदी बनाये गये। इनमें से 37 लोग महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मण थे। 38 आरोपियों में से 27 को कठोर कारावास तथा 3 को कालेपानी की सजा हुई। अनन्त लक्ष्मण कन्हारे, कृष्णजी गोपाल कर्वे और विनायक नारायण देशपांडे को फांसी दी गई। भारत सरकार ने विनायक दामोदर सावरकर को समस्त उत्पात की जड़ मानकर उन्हें बंदी बनाने के आदेश जारी किये। 13 मार्च 19010 को सावरकर पेरिस से लंदन आये तथा विक्टोरिया स्टेशन पर उतरे। उसी समय लंदन की पुलिस ने उन्हें बंदी बना लिया तथा सैनिक जहाज में बैठाकर समुद्र के रास्ते, भारत के लिये रवाना कर दिया। जब यह जहाज फ्रांसीसी अधिकार वाले मार्सिली बंदरगाह के निकट पहुंचा तो सावरकर पुलिस को चकमा देकर पोटहोल से समुद्र में कूद गये तथा तैरकर फ्रांसीसी बंदरगाह पर पहुंच गये किंतु फ्रांसीसी तटरक्षकों ने समझा कि सावरकर जहाज पर से चोरी करके भाग रहे हैं, सावरकर को फ्रैंच भाषा नहीं आती थी और तटरक्षकों को अँग्रेजी भाषा नहीं आती थी इसलिये तटरक्षकों ने सावरकर की बात को समझे बिना ही, उन्हें अँग्रेज पुलिस के हवाले कर दिया।

सावरकर को नासिक लाया गया और जैक्सन हत्याकाण्ड के 37 आदमियों के साथ उन पर भी नासिक षड़यन्त्र केस चलाया गया। दिसम्बर 1910 में विनायक सावरकर को आजीवन निर्वासन का दण्ड दिया गया। उनकी सम्पत्ति जब्त कर ली गई। उन्हें बैरिस्टर की मान्यता नहीं मिली और बी.ए. की डिग्री भी रद्द कर दी गई। सावरकर को अण्डमान की जेल में भी भीषण यातनाएं दी गईं। 1921 ई. में उन्हें तथा उनके बड़े भाई को, अण्डमान से निकालकर रत्नागिरी जेल में रखा गया। भारत में उनकी रिहाई के लिए निरन्तर आन्दोलन चलता रहा। अन्ततः 27 वर्ष की जेल भगुतने के बाद 1937 ई. में उन्हें जेल से रिहा किया गया। 

नासिक षड़यंत्र केस में अनेक क्रांतिकारियों को जेल में डाला गया। इससे महाराष्ट्र के क्रांतिकारियों के मनोबल में कमी आई। फिर भी, उन्होंने कई घटनाओं को कार्यरूप दिया। गणेश सावरकर को देश-निर्वासन का दण्ड दिलवाने में भारत सचिव के मुख्य परामर्शदाता सर कर्जन वाइली का बड़ा हाथ था। 1 जुलाई 1909 को मदनलाल धींगरा ने लन्दन में वाइली को गोली से उड़ा दिया।  धींगरा को गिरफ्तार करके 16 अगस्त 1909 को फांसी दी गई। मुकदमे की कार्यवाही के समय धींगरा ने कहा- ‘मैं स्वीकार करता हूँ कि उस दिन मैंने एक अँग्रेज का खून बहाने का प्रयास किया था। देश-भक्त भारतीय नौजवानों को दी जाने वाली अमानुषिक फांसियों और निर्वासनों का थोड़ा-सा बदला लेने के लिए मैंने ऐसा किया था।’

क्रांतिकारियों को बड़ी संख्या में अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करने तथा बम बनाने के लिए धन की आवश्यकता थी। कर्वे गुट ने छोटी-मोटी चोरियां करके धन एकत्रित करने का मार्ग अपनाया किंतु शीघ्र ही उन्होंने इस मार्ग को त्याग दिया क्योंकि अपने ही देशवासियों को लूटना उन्हें पसंद नहीं आया। इस प्रकार धन के अभाव में 1910 ई. तक महाराष्ट्र में क्रांतिकारियों का संगठन बिखरने लगा।

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