Wednesday, February 28, 2024
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99. सरदार पटेल ने भरतपुर महाराजा के भाग्य की रक्षा की!

रियासती विभाग भरतपुर राज्य की गतिविधियों से बड़ा खिन्न था। इसलिये रियासती विभाग ने भरतपुर महाराजा बृजेन्द्रसिंह के विरुद्ध एक आरोप सूची तैयार की तथा राजा पर ये आरोप लगाये गये- (1.) भरतपुर के महाराजा ने 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाया तथा उसने खुले तौर पर भारतीय नेताओं को भारत विभाजन के लिये उत्तरदायी बताया।

(2.) महाराजा ने 1 लाख मुसलमानों को राज्य से भगा दिया। महाराजा को प्रसन्नता थी कि उनके राज्य में एक भी मुसलमान नहीं बचा था। (3.) भरतपुर राज्य में से जाने वाली बांदीकुई-आगरा रेलवे लाइन को सुरक्षा प्रदान करने के लिये महाराजा ने कारगर कदम नहीं उठाये।

(4.) महाराजा की सेना में अनुशासन जैसी कोई चीज नहीं रह गयी थी। (5.) महाराजा ने राज्य में जाटवाद को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं रखी थी। (6.) भरतपुर राज्य में शस्त्र व गोला-बारूद तैयार करने के लिए अवैध कारखाना खोला गया तथा जाटों एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवकों को शस्त्र बांटे जा रहे थे। (7.) महाराजा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की गतिविधियों में रुचि लेता था। (8.) पं. नेहरू ने भी अपने पत्र दिनांक 28 जनवरी 1948 के द्वारा पटेल को अवगत करवाया था कि भरतपुर राज्य में राष्ट्रीय स्वयं सेवकों को शस्त्र प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

भारत सरकार ने 10 फरवरी 1948 को भरतपुर महाराजा बृजेन्द्रसिंह को दिल्ली बुलाया और उनके विरुद्ध एकत्र किये गये आरोपों से अवगत करवा कर उन्हें निर्देश दिये कि वे राज्य प्रशासन का दायित्व भारत सरकार को सौंप दें। अलवर महाराजा तथा प्रधानमंत्री दिल्ली में नजरबंद किये जा चुके थे। इसलिये भरतपुर महाराजा अत्यंत दबाव में थे। उन्होंने अत्यंत अनिच्छा से सम्मति प्रदान की।

14 फरवरी 1948 को रियासती विभाग द्वारा एस. एन. सप्रू को भरतपुर राज्य का प्रशासक नियुक्त किया गया। कर्नल ढिल्लों को राज्य की सेना का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। महाराजा के भाई गिरिराजशरण सिंह, जिसके विरुद्ध नेहरू ने सरदार पटेल को लिखा था, को इंगलैण्ड भेज दिया गया। स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन, महाराजा भरतपुर को सांप्रदायिक आधार पर हत्याएं करने तथा खराब प्रशासन के आरोप में अपदस्थ करके दक्षिण में भेजना चाहते थे जहाँ उन्हें नजरबंद कर दिया जाना था किंतु सरदार पटेल ने महाराजा के भाग्य की रक्षा की।

अलवर तथा भरतपुर राज्यों से सटे धौलपुर और करौली राज्यों के राजाओं को भी 27 फरवरी 1948 को दिल्ली बुलाया गया और सलाह दी गयी कि अलवर और भरतपुर राज्य के साथ संघ में शामिल हो जायें। चारों राजाओं ने इस प्रस्ताव को मान लिया तथा 28 फरवरी 1948 को एकीकरण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिये।

के. एम. मुंशी की सलाह पर इस संघ का नाम मत्स्य संघ रखा गया। चूंकि महाराजा अलवर तथा महाराजा भरतपुर के विरुद्ध जांच चल रही थी इसलिये धौलपुर महाराजा को संघ का राजप्रमुख तथा करौली महाराजा को उपराजप्रमुख बनाया गया। 18 मार्च 1948 को इसका विधिवत् उद्घाटन किया गया।

मत्स्य संघ बन जाने के बाद लॉर्ड माउंटबेटन ने अलवर तथा भरतपुर राज्यों के शासकों के विरुद्ध जांच करने के लिये बड़ौदा, ग्वालियर, नवानगर तथा बीकानेर के शासकों की एक समिति नियुक्त की किंतु इन शासकों ने अपने भ्रातृ महाराजाओं की जांच करने से मना कर दिया।

इस पर भारत सरकार के प्रतिनिधियों को इस कार्य के लिये नियुक्त किया गया। जांच में न केवल महाराजा अलवर तथा महाराजा भरतपुर निर्दोष पाये गये अपितु अलवर राज्य के दीवान नारायण भास्कर खरे के विरुद्ध भी किसी तरह का आरोप प्रमाणित नहीं हुआ। भारत सरकार ने इन सबको दोषमुक्त घोषित कर दिया तथा इनके विरुद्ध किसी तरह की कानूनी कार्यवाही नहीं की।

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohan Lal Gupta is a renowned historian from India. He has written more than 100 books on various subjects.

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