Wednesday, June 19, 2024
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116. सवाई जयसिंह ने अपने हाथों से बदनसिंह जाट का राजतिलक किया!

सैयद बंधुओं का सफाया करने के बाद मुहम्मदशाह ने एक दरबार का आयोजन करके बादशाह के प्रति विश्वस्त लोगों का सम्मान किया तथा उन्हें नए पद एवं अधिकार दिए। इस अवसर पर उसने आम्बेर नरेश जयसिंह का भी खूब सम्मान किया। ऐसा लगता है कि मुहम्मदशाह ने तख्त पर बैठते समय जयसिंह के लिये एक विशेष भूमिका सोच रखी थी।

पाठकों को स्मरण होगा कि ईस्वी 1717 में फर्रूखसियर ने महाराजा सवाई जयसिंह को चूड़ामन जाट के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए थूण दुर्ग पर आक्रमण करने के आदेश दिए थे किंतु अप्रैल 1718 में सैयद बंधुओं के विश्वसनीय खानजहाँ बहादुर सैयद मुजफ्फर खाँ ने जयसिंह को अंधेरे में रखकर चूड़ामन से संधि कर ली थी।

इस संधि के समय जाट नेता चूड़ामन ने जितने वचन दिये थे, उनमें से एक भी पूरा नहीं किया था तथा सम्पूर्ण ब्रज क्षेत्र में जाटों की गतिविधियां अत्यंत बढ़ गई थीं जिनसे मुगल राजस्व को बहुत हानि हो रही थी। इस बीच चूड़ामन की मृत्यु हो गई तथा उसका पुत्र मोहकमसिंह जाटों का नेतृत्व करने लगा।

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चूंकि जाटों की गतिविधियों का केन्द्र मुगलों की राजधानी आगरा से लेकर जयपुर राज्य की सीमा के बीच स्थित था। इसलिये जयपुर नरेश ही जाटों के विरुद्ध सैन्य कार्यवाही में अधिक सफल हो सकता था। अतः ईस्वी 1722 में नए बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला ने सवाई जयसिंह को पुनः जाटों का दमन करने का काम सौंपा।

इस बार सवाई जयसिंह को अकेले ही इस अभियान की पूरी जिम्मेदारी सौंपी गई तथा उसे आगरा का सूबेदार नियुक्त किया गया ताकि वह जाटों के प्रभाव वाले पूरे क्षेत्र पर नियंत्रण कर सके। जयसिंह अपने 14 हजार सैनिकों को साथ लेकर जाटों के विरुद्ध अभियान पर चल पड़ा।

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सवाई जयसिंह ने मोहकमसिंह जाट को थूण दुर्ग के भीतर घुस जाने पर विवश कर दिया तथा फिर तेजी से दुर्ग के चारों ओर का जंगल काटकर अपनी सेनाओं को दुर्ग के इतने निकट पहुंचा दिया कि दुर्ग की दीवारें तोपों की प्रहार सीमा में आ जायें। तीन सप्ताह तक जाटों ने जयसिंह का सामना किया। वे रात्रि में दुर्ग से बाहर निकलकर जयसिंह की सेनाओं पर आक्रमण करते और भाग जाते।

इस समय जाट नेताओं में फूट पड़ी हुई थी तथा चूड़ामन का भतीजा बदनसिंह, अपने चचेरे भाई मोहकमसिंह से नाराज चल रहा था। मोहकमसिंह एक धोखेबाज व्यक्ति था और उसने पारिवारिक सम्पत्ति में से अपने भाई जुलकरण तथा चचेरे भाई बदनसिंह को फूटी कौड़ी भी नहीं दी थी। इसलिये बदनसिंह ने सवाई जयसिंह से सम्पर्क किया तथा उसे मोहकमसिंह की रणनीतिक कमजोरियां बताकर सोहगर और सांसनी की गढ़ियों पर महाराजा जयसिंह का अधिकार करवा दिया।

इस बीच मोहकमसिंह ने जोधपुर से भाड़े की सेना बुलवाई। जोधुपर का सेनापति विजयराज भण्डारी 23 अक्टूबर 1722 को जोबनेर तक पहुंच गया। जब जयसिंह को इस सेना के आने की जानकारी मिली तो उसने थूण दुर्ग पर दबाव बढ़ा दिया। मोहकमसिंह ने निराश होकर 7-8 नवम्बर 1722 की रात्रि में दुर्ग के भीतर बारूद में आग लगा दी और सारा खजाना लेकर भाग गया।

बदनसिंह ने महाराजा जयसिंह को समय रहते ही सूचित कर दिया कि आज रात को मोहकमसिंह दुर्ग के भीतर बारूद में आग लगायेगा। अतः सावधान रहें। इस पर महाराजा जयसिंह, अपनी सेना लेकर थूण गढ़ से दूर चला गया। इस कारण जब थूण दुर्ग में बारूद का बड़ा विस्फोट हुआ तो महाराजा जयसिंह तथा उसके सैनिकों के प्राण बच गये।

इस घटना के बाद जयसिंह, बदनसिंह का मित्र बन गया। जयसिंह ने विद्रोही जाटों के कई गढ़ तथा गढ़ी नष्ट कर दिये और नष्ट हो चुके थूण दुर्ग में गधों से हल चलवाया। मोहकमसिंह प्राण बचाने के लिए जोधपुर की तरफ चला गया क्योंकि महाराजा अजीतसिंह और मोहकमसिंह के पिता चूड़ामन के अच्छे सम्बन्ध रहे थे। मोहकमसिंह के भाग जाने से आगरा सूबे में जाटों की कार्यवाहियों पर नियंत्रण लग गया। बदनसिंह की गंभीरता एवं विश्वसनीयता को देखते हुए उसे जाटों का नेता मान लिया गया।

थूण दुर्ग पर विजय प्राप्त करके सवाई जयसिंह ने 2 दिसम्बर 1722 के दिन बदनसिंह के सिर पर सरदारी की पाग बांधी तथा राजाओं की भांति उसका तिलक किया। जयसिंह ने बदनसिंह को पांच परिधानों के साथ पचरंगी निसान देकर ठाकुर के पद से सम्मानित किया। इस प्रकार बदनसिंह कच्छवाहों का खिदमती जागीरदार बन गया।

मुगल बादशाह की तरफ से उसे ‘राजा’ की पदवी दी गई। बदनसिंह को डीग का राजा घोषित किया गया तथा ‘ब्रजराज’ की उपाधि दी गई। बदनसिंह की तरफ से दिल्ली के बादशाह को दिया जाने वाला वार्षिक कर भी निर्धारित कर दिया गया। इस प्रकार ईस्वी 1722 में महाराजा सवाई जयसिंह के प्रयत्नों से ‘भरतपुर’ नामक नवीन रियासत का गठन हुआ। बदनसिंह विनम्र तथा विश्वसनीय व्यक्ति था इस कारण वह एक बड़े राज्य की स्थापना कर सका तथा राजा का पद पा सका।

राजा बदनसिंह इतना विनम्र था कि उसने कभी स्वयं को राजा नहीं कहा। वह सदैव स्वयं को जयसिंह का सामंत बताता रहा और अपने लिये ठाकुर शब्द का प्रयोग करता रहा। उस युग में जब समस्त शक्तियां एक दूसरे को निगल जाने की होड़ में थीं, सवाई जयसिंह जैसा वीर राजा ही इतनी बड़ी सोच रख सकता था कि जाटों को अखिल भारतीय स्तर पर एक राज्य के रूप में संगठित होने का अवसर दे ताकि वे उत्तर भारत की राजनीति में मुख्य धारा के अंग बन सकें।

बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला ने सवाई राजा जयसिंह की उपलब्धियों से प्रसन्न होकर 2 जून 1723 को उसे ‘राजराजेश्वर श्री राजाधिराज महाराजा सवाई जयसिंह’ की उपाधि से सम्मानित किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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