Saturday, May 25, 2024
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शिवाजी का बाल्यकाल (3)

शिवाजी का बाल्यकाल बड़ी कठिनाइयों में बीता। कहा जा सकता है कि इन कठिनाइयों ने ही शिवाजी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण किया।

शाहजी एवं जीजाबाई का विवाह

मालोजी अभी तक जाधवराय द्वारा किए गए अपमान को भूला नहीं था। मालोजी भी अभी तक अहमदनगर की सेवा में था तथा उसकी पुत्री जीजाबाई भी अब तक अविवाहित थी। इसलिए मालोजी ने निजामशाह से प्रार्थना की कि वह जाधवराय से कहकर जीजाबाई का विवाह मेरे पुत्र शाहजी से करवाए। निजामशाह ने जाधवराय को इस विवाह के लिए सहमत किया तथा ई.1605 में जीजाबाई और शाहजी का विवाह हो गया।

जीजाबाई एवं शाहजी का दाम्पत्य जीवन

जीजाबाई एवं शाहजी के दाम्पत्य से पहले सम्भाजी का और बाद में शिवाजी का जन्म हुआ। शिवाजी का जन्म 19 फरवरी 1630 को शिवनेरी के निजामशाही किले में हुआ। यह दुर्ग पूना जिले के धुर उत्तर में जुन्नार नगर के निकट शिवनेर में स्थित था। जीजाबाई ने शिवाई नामक स्थानीय देवी से अपने पुत्र के लिए मनौती मांगी थी। इसलिए बालक का जन्म होने पर उसका नाम शिवाजी रखा गया।

कुछ समय पश्चात् जाधवराय, निजाम से नाराज होकर मुगलों की सेवा में चला गया। इससे मालोजी को कठिनाई हुई क्योंकि वह (मालोजी) अब भी निजाम की सेवा में था। अतः मालोजी ने अपने पुत्र शाहजी की पत्नी जीजाबाई तथा उसके पुत्र शिवाजी को शिवनेर के दुर्ग में रख दिया।

जीजाबाई का बड़ा पुत्र सम्भाजी अपने पिता शाहजी के पास रहा। जाधवराय से सम्बन्ध तोड़ लेने के कारण निजाम के राज्य में मालोजी और बिठोजी का कद बहुत बढ़ गया और वे निजाम के प्रधानमंत्री मलिक अम्बर के अत्यंत विश्वासपात्र बन गए। उन्हें निजामशाही में अच्छी जागीरें प्राप्त हो गईं।

शाहजी के अन्य विवाह

कुछ समय पश्चात् शाहजी ने तुकाबाई मोहिते नामक एक सुंदर युवती से विवाह कर लिया। इस दाम्पत्य से शाहजी को एकोजी अथवा व्यंकोजी नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। कुछ समय पश्चात् शाहजी ने नरसाबाई नामक एक मराठा कन्या से विवाह किया। शाहजी को सांताजी नामक एक और पुत्र की प्राप्ति हुई जो मराठों के इतिहास में सांताजी घोरपड़े के नाम से प्रसिद्ध है। वह शिवाजी के द्वितीय पुत्र राजाराम के समय मराठों का बहुत प्रसिद्ध योद्धा माना जाता था।

जीजाबाई की कठिनाइयाँ

अहमदनगर के निजाम को यह सहन नहीं था कि जाधवराय उसकी सेवा त्यागकर मुगलों की सेवा करे। एक दिन उसने जाधवराय तथा उसके परिवार को अपने दुर्ग में आमंत्रित किया तथा छल से जाधवराय तथा उसके परिवार के तीन प्रमुख सदस्यों की हत्या करवा दी।

पति द्वारा अलग कर दिए जाने के पश्चात् जीजाबाई किसी तरह अपने पिता के सहारे जीवन व्यतीत कर रही थी किंतु अब पिता का आश्रय भी छिन जाने के कारण जीजा और उसके पुत्र शिवाजी का जीवन अत्यंत कष्टमय हो गया। जीजा ने अपना समय धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में लगाना आरम्भ किया।

उसने रामायण, महाभारत तथा भगवद्गीता आदि ग्रंथों का अच्छा अध्ययन किया तथा इन ग्रंथों के नायकों एवं वीर पुरुषों की गाथाएं अपने पुत्र शिवाजी को भी सुनाईं। जीजाबाई ने शिवाजी को भारत राष्ट्र के उत्थान के लिए, मुगलों के चंगुल से स्वतंत्र कराने की आवश्यकता से परिचित करवाया तथा उच्च जीवन आदर्श अपनाने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने शिवाजी को शक्ति का संचय करने की आवश्यकता का भी ज्ञान करवाया। माता जीजाबाई के उपदेशों से बालक शिवा, साधु-संतों, विद्वानों और ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा रखने लगा।

कुछ समय बाद शाहजी भी निजामशाह की सेवा छोड़कर मुगलों की सेवा में चला गया। शाहजी को 7000 का मनसब दिया गया किंतु वहाँ उसका मन नहीं लगा और डेढ़ साल बाद वह पुनः निजाम की सेवा में आ गया। अब मुगलों ने अहमदनगर के विरुद्ध अभियान चलाया। शाहजी अहमदनगर की ढाल बनकर खड़ा हो गया।

जब शाहजी मुगलों की सेवा छोड़कर पुनः निजाम की सेवा में आया, तब मुगलों का कोप शाहजी की पत्नी जीजाबाई और उसके पुत्र शिवाजी पर कहर बनकर टूटा। उन्हें मुगलों द्वारा प्रताड़ित किया जाने लगा। इस पर जीजाबाई, शिवाजी को लेकर एक किले से दूसरे किले में निरंतर यात्रा करती रही। एक बार जब मुगलों ने इन्हें बुरी तरह घेर लिया तो जीजा ने शिवाजी को एक पहाड़ी दुर्ग में अपने समर्थकों के बीच इस तरह छिपा दिया कि मुगल उसे ढूंढ नहीं सकें।

जीजाबाई एवं शिवाजी को पुनः संरक्षण

जब शाहजी की स्थिति सुधर गई तो उसने दादा कोणदेव को अपनी पूना एवं सूपा की जागीरों का संरक्षक नियुक्त किया तथा उसे आदेश दिया कि वह जीजाबाई एवं शिवाजी को शिवनेर के दुर्ग से लाकर पूना में रखे और उनकी देखभाल करे।

दादा कोणदेव बुद्धिमान, स्वामिभक्त, दृढ़प्रतिज्ञ और धर्म एवं राजनीति की गहरी समझ रखने वाला व्यक्ति था। वह जीजाबाई तथा उसके पुत्र शिवाजी को शिवनेर के दुर्गम दुर्ग से पूना ले आया। उसने पूना में लाल-महल नामक भव्य आवास का निर्माण करवाया तथा जीजा एवं उसके पुत्र को इसी महल में रखा।

कोणदेव का मानना था कि प्रजा पर अपना प्रभाव स्थापित करने के लिए शासक को भव्य महल में रहना चाहिए।

शाहजी द्वारा पुत्रों में जागीरों का वितरण

शाहजी ने अपने बड़े पुत्र सम्भाजी को कर्नाटक में बैंगलोर की जागीर दी। दूसरे पुत्र शिवाजी को पूना तथा सूपा की जागीरें दीं तथा तीसरे पुत्र एकोजी अथवा व्यंकोजी को तंजावुर की जागीर दी। कुछ समय पश्चात अफजल खाँ ने शाहजी के बड़े पुत्र सम्भाजी की हत्या कर दी। इस पर बैंगलोर की जागीर का प्रबन्ध शाहजी स्वयं करने लगा।

दादा कोणदेव द्वारा बालक शिवाजी का प्रशिक्षण

बालक शिवाजी एक ओर, अपनी माँ से रामायण एवं महाभारत के उच्च आदर्श सम्पन्न वीर पुरुषों एवं नारियों की गाथाएं सुन रहा था तथा दूसरी ओर, दादा कोणदेव द्वारा प्रजा की समृद्धि के लिए किए जा रहे कार्यों को अपनी आंखों से देख रहा था। उसने शाहजी की जागीरों को सम्पन्न बनाने के लिए अनेक उपाय किए तथा उनकी काया पलट कर रख दी।

उसने जमीनों को उपजाऊ बनाने के लिए कदम उठाए तथा प्रजा को डाकुओं के भय से मुक्त करने के लिए डाकुओं के विरुद्ध सैनिक अभियान किये। मानव बस्तियों में घुसकर मनुष्यों को मार डालने वाले वन्य-पशुओं को रोकने के लिए उसने मावल युवकों की एक सेना तैयार की। दादा कोणदेव ने एक और अद्भुत काम किया।

यह कार्य उस काल में और कोई जागीरदार या शासक नहीं कर रहा था। वह बालक शिवाजी को अपने साथ लेकर शाहजी की जागीर के हर गांव में जाता तथा वहाँ के लोगों की समस्याओं और झगड़ों के बारे में पूछता। समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करता तथा झगड़ों को दोनों पक्षों के साथ बैठकर सुनता। वह दोनों पक्षों को समझाता तथा अंत में अपना निर्णय सुनाता।

इस निर्णय प्रक्रिया में वह बालक शिवाजी को भी सम्मिलित करता। यह क्षेत्र मावल कहलाता था तथा इसके निवासियों को मावली कहते थे जो अशिक्षित होने के कारण खेती के सही तरीकों से अनजान थे। दादा कोणदेव उन्हें खेती करने के सही तरीके बताता था जिससे किसानों की आय में वृद्धि हो। कोणदेव ने शिवाजी को अश्व संचालन, धनुष विद्या, नेजा तथा तलवार चालन, मल्ल युद्ध आदि का प्रशिक्षण दिलवाया।

मित्र-मण्डलियों की स्थापना

मेधा और प्रतिभा सम्पन्न शिवाजी, कोणदेव के कार्य में रुचि लेने लगा। उसकी इस प्रवृत्ति को देखकर बहुत से किसान और आमजन शिवाजी को अपना हितैषी और शासक मानने लगे। इससे पहले कभी किसी शासक ने निर्धन प्रजा से इतना निकट सम्बन्ध नहीं रखा था। धीरे-धीरे शिवाजी पूना और सूपा, दोनों जागीरों में लोकप्रिय हो गया।

शिवाजी ने अपने पिता की जागीर के हर गांव का भ्रमण करके अपनी मित्र मण्डलियां स्थापित कीं। शिवाजी ने इन युवकों को राष्ट्रभक्ति और धर्म का पाठ पढ़ाया। उनके साथ खेलकूद कर उनसे निकटता स्थापित की। धीरे-धीरे हजारों युवक, शिवाजी के मित्र बन गए जो अपने राजा की एक आवाज पर प्राण न्यौछावर करने को तैयार थे।

शिवाजी का प्रथम विवाह एवं बैंगलोर की यात्रा

ई.1640 में माता जीजा ने, दादा कोणदेव से परामर्श करके शिवाजी का विवाह निम्बालकर परिवार की कन्या सईबाई से कर दिया। जब शाहजी को इस विवाह के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने कोणदेव को आदेश भिजवाया कि वह जीजाबाई, शिवाजी और उसकी पत्नी सईबाई को लेकर बैंगलोर आए ताकि वह (शाहजी) अपने परिवार से मिल सके और पुत्रवधू को आशीर्वाद दे सके।

दादा कोणदेव इस परिवार को पूना (महाराष्ट्र) से लेकर बैंगलोर (कर्नाटक) गया जहाँ उन सबका यथोचित सत्कार किया गया। इस यात्रा में शिवाजी ने माता एवं पत्नी के साथ उस क्षेत्र के हिन्दू तीर्थों एवं मंदिरों के दर्शन किये। जीजाबाई तीन वर्ष तक अपने पुत्र एवं पुत्रवधू के साथ बीजापुर में रही।

एक दिन शाहजी, शिवाजी को अपने साथ लेकर आदिलशाह के दरबार में गया। वहाँ शिवाजी ने आदिलशाह को झुककर सलाम करने की बजाय सीधे खड़े रहकर अभिवादन किया। इस पर आदिलशाह ने चकित होकर पूछा कि इसने ऐसा क्यों किया? इस पर शाहजी ने आदिलशाह से क्षमा मांगते हुए कहा कि यह निरा बालक है इसे शाही रीति-रिवाजों की जानकारी नहीं है।

गौ-मांस बेचने वाले कसाई का वध

एक दिन शिवाजी ने एक कसाई को मार्ग में गौ-मांस बेचते हुए देखा तो उसने आदिलशाह से कहा कि हम गाय को माता के समान पूजते हैं और कसाई उसे सड़क पर काटते हैं। इसलिए आप अपने राज्य में गौ-हत्या पर रोक लगाएं।

आदिलशाह ने शिवाजी की बात सुनकर आदेश दिए कि कोई भी व्यक्ति सड़क पर न तो गाय काटेगा और न सड़क पर गौ-मांस बेचेगा क्योंकि वहाँ से हिन्दू भी निकलते हैं। इस आज्ञा के जारी होने के कुछ दिनों बाद एक कसाई गाय को लेकर जा रहा था। शिवाजी ने रस्सी काटकर गाय को मुक्त कर दिया तथा कसाई द्वारा विरोध किए जाने पर कसाई के पेट में कटार भौंक दी जिससे कसाई मर गया।

जब यह बात आदिलशाह तक पहुंची तो उसने शिवाजी की कार्यवाही का समर्थन किया क्योंकि शाही आज्ञा के अनुसार, सड़क पर गौहत्या तथा गौ-मांस की बिक्री नहीं हो सकती थी तो फिर हत्या करने के लिए गाय को सरेआम सड़क पर लेकर कैसे चला जा सकता था!

शिवाजी का दूसरा विवाह

आदिलशाह शिवाजी के साहस एवं स्वातंत्र्य भाव से बहुत प्रसन्न हुआ। उसने शाहजी से कहकर शिवाजी का एक और विवाह करवाया। यह विवाह शिरके घराने की कन्या सोयराबाई से हुआ। आदिलशाह स्वयं भी इस विवाह में अपने अमीरों सहित उपस्थित हुआ और शिवाजी तथा उसकी नई पत्नी को आशीर्वाद दिया।

शिवाजी की बीजापुर से विदाई

जब से शिवाजी, बैंगलोर आया था, शाहजी उसे बीजापुर राज्य के प्रशासन, सेना के प्रबन्धन, दरबारी रीति-रिवाज, अमीरों के षड़यंत्र, अश्वशाला की व्यवस्था, शस्त्रों के संचालन एवं रख-रखाव आदि का प्रशिक्षण दे रहा था। जब शाहजी से मिलने के लिए कोई अमीर-उमराव आता, तो शाहजी, शिवाजी को अपने पास बैठा लेता ताकि वह राज्यकाज सम्बन्धी बातों को सुने और समझे।

सब-कुछ ठीक ही चल रहा था और शाहजी के साथ-साथ आदिलशाह भी शिवाजी पर प्रेम लुटा रहा था किंतु ई.1643 में शिवाजी द्वारा कसाई का वध किए जाने के बाद, शाहजी अपने पुत्र की तरफ से आशंकित रहने लगा कि जाने कब यह कौनसी मुसीबत खड़ी कर दे और आदिलशाह इसे हानि पहुंचा दे। इसलिए शाहजी ने दादा कोणदेव से कहा कि वह जीजाबाई तथा उसके पुत्र एवं पुत्र-वधुओं को लेकर पुनः पूना चला जाए। इस समय शिवाजी की आयु लगभग 13 वर्ष हो गई थी।

शिवाजी के मन में शाहजी के कामों से विरक्ति

शाहजी बीजापुर के सुल्तान की सेवा में था। इस नाते उसने बीजापुर द्वारा हिन्दू राज्यों पर किए गए आक्रमणों में मुख्य भूमिका निभाई थी। बीजापुर राज्य द्वारा हजारों हिन्दू परिवार उजाड़ दिए गए थे और उन्हें बलपूर्वक मुस्लिम बनने पर बाध्य किया था। हिन्दुओं की सम्पत्तियां छीनकर उन्हें भिखारी बनाकर छोड़ दिया गया था।

सैंकड़ों भव्य हिन्दू मंदिरों को नष्ट किया गया था। शाहजी को इन सब कामों में बीजापुर की सेना का नेतृत्व करना पड़ता था। बैंगलोर यात्रा में शिवाजी को ये सब बातें विस्तार से ज्ञात हुईं। शिवाजी को अपने पिता के इस कार्य से विरक्ति हुई और उसके मन में मुस्लिम शासन के प्रति विद्रोह के अंकुर ने जन्म लिया। 

-डॉ मोहनलाल गुप्ता

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