Wednesday, May 22, 2024
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शिवाजी की शासन व्यवस्था (14)

शिवाजी की शासन व्यवस्था प्राचीन क्षत्रिय राज्यों के अनुसार की गई। राज्य कार्य संचालन के लिए अष्ट-प्रधान की नियुक्ति की गई। राज्य का समस्त कार्य इन आठ प्रधानों में बांट दिया गया

(1.) पेशवा: राज्य का प्रधान व्यवस्थापक पेशवा कहलाता था। शिवाजी ने इस पद पर मोरोपंत पिंघले को नियुक्त किया।

(2.) मजीमदार: इस मंत्री पर राज्य की अर्थव्यवस्था तथा आय-व्यय की जांच आदि का दायित्व था। इस पर पर आवाजी सोनदेव को नियुक्त किया गया।

(3.) सुरनीस: इस मंत्री पर राजकीय पत्र व्यवहार एवं संधिपत्रों का प्रबन्ध करने का दायित्व था। इस पर पर अन्नाजी दत्तो को नियुक्त किया गया।

(4.) वाकनिस: इस मंत्री पर राज्य के लेखों, अभिलेखों आदि की सुरक्षा करने का दायित्व था।

(5.) सरनावत: राज्य में पैदल सेना तथा घुड़सवार सेना के लिए एक-एक अलग सरनावत नियुक्त किए गया था। यशजी कंक को पैदल सेना का सरनावत एवं प्रतापराव गूजर को घुड़सवार सेना का सरनावत नियुक्त किया गया।

(6.) दर्बार या विदेश मंत्री: इस मंत्री पर अन्य राज्यों के राजाओं, मंत्रियों एवं अधिकारियों आदि से मित्रता तथा व्यवहार आदि का दायित्व था। सोमनाथ पंत को यह दायित्व दिया गया।

(7.) न्यायाधीश: इस मंत्री पर राज्य की जनता के झगड़ों एवं विवादों को सुलझाने का दायित्व था। इस पर पर नीराजी राव तथा गोमाजी नायक को नियुक्त किया गया।

(8.) न्यायशास्त्री: इस अधिकारी पर राज्य की न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी थी। इस पद पर पहले सिम्भा को और बाद में रघुनाथ पंत को नियुक्त किया गया।

जिलों एवं विभागों का प्रबन्ध

शिवाजी की शासन व्यवस्था में प्रत्येक जिले एवं प्रत्येक विभाग के प्रशासन के लिए आठ पदाधिकारी नियुक्त किए गए-

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(1.) कारवारी दीवान या मुत्तालिक

(2.) मजिमदार (लेखाकार)

(3.) फर्नीस या फरनवीस (सहायक लेखाधिकारी)

(4.) सवनीस (क्लर्क)

(5.) कारकानिस (अन्न भण्डार का निरीक्षक)

(6.) चिटनिस (पत्र लेखक)

(7.) जमादार ( भुगतान करने वाला खजांची)

(8.) पोतनीज (नगदी जमा करने वाला खजांची)

शिवाजी ने चमारगुंडा के पुंडे परिवार के सदस्य को अपना खजांची नियुक्त किया। इसके पितामह मालोजी ने शिवाजी के पिता शाहजी के विवाह के पूर्व, शाहजी की ईश्वर प्रदत्त सम्पत्ति जमा कर रखी थी।

किलों की व्यवस्था

शिवाजी की शासन व्यवस्था में अपराधियों को उनके अपराध के अनुसार दण्डित करने की व्यवस्था की गई। मंदिरों, निर्धनों, विधवाओं एवं बेसहारा लोगों के लिए राज्य की ओर से अनुदान की व्यवस्था की गई। शासन व्यवस्था में अनुशासन पर अत्यधिक बल दिया गया था। प्रत्येक अधीनस्थ कर्मचारी के लिए, अपने उच्चस्थ अधिकारी की आज्ञा का पालन करना अनिवार्य था।

प्रत्येक दुर्ग में एक किलेदार, एक मुंशी, एक भण्डार पालक, निरीक्षक एवं सेवक नियुक्त रहते थे। प्रधान मुंशी के पद पर प्रायः ब्राह्मणों को नियुक्त किया जाता था।

भू-राजस्व अर्थात् लगान

शिवाजी ने अपने राज्य में कृषि की उन्नति के लिए कई कदम उठाए तथा ग्राम पंचायतों के लिए निश्चित नियम बनाए। किसानों तथा राजा के बीच कोई जागीरदार नहीं होता था। वे सीधे ही राजकीय कारिंदों को लगान देते थे। शिवाजी की शासन व्यवस्था में लगान व्यवस्था दादा कोणदेव के समय निर्धारित की गई थी।

सरकारी लगान कुल उपज का 40 प्रतिशत था। कृषकों की सुरक्षा के लिए देशमुख, देशपाण्डे, पटेल, खोट और कुलकर्णी नियुक्त किए गए थे। शिवाजी स्वयं इन अधिकारियों पर कड़ी दृष्टि रखते थे ताकि ये किसानों को तंग न करें।

राज्य की गुप्तचर व्यवस्था

शिवाजी की सैन्य सफलताओं में गुप्तचरों का बहुत बड़ा योगादान था। इसलिए शिवाजी ने राज्य की गुप्तचर व्यवस्था पर पूरा घ्यान दिया। शिवाजी का व्यक्तिगत गुप्तचर बीहरजी, गुप्त सूचनाएं एकत्रित करने में प्रवीण था। सेना के अधिकारियों के पास भी गुप्तचर रहते थे जो सैनिक अभियान को सफल बनाने के लिए गुप्त सूचनाएं एकत्रित करते थे।

शिवाजी की सेना

शिवाजी की सेना में दो तरह के सिपाही थे- पैदल तथा घुड़सवार। अधिकांश पैदल सैनिक घाटमाथा क्षेत्र से तथा कोंकण क्षेत्र से आते थे। घाटमाथा के सैनिकों को मावली तथा कोंकण के सैनिकों को हथकुरी कहा जाता था। ये सैनिक अपने साथ तलवार, ढाल तथा तीर कमान लाते थे। इन्हें गोला, बारूद तथा बंदूक राज्य की ओर से दी जाती थी।

प्रत्येक 10 सैनिकों पर एक नायक होता था। प्रत्येक 5 नायकों के ऊपर एक हवालदार होता था। प्रत्येक 2 हवालदार पर एक जुमलदार होता था। प्रत्येक 10 जुमलदारों को हजारी कहा जाता था। सेनापति को छोड़कर कोई भी अधिकारी पांच-हजारी से ऊपर नहीं होता था।

शिवाजी की सेना में दो सेनापति होते थे- एक घुड़सवार सेना के लिए और दूसर पैदल सेना के लिए। सेनापति के नीचे पांच हजारी से लेकर नीचे तक का सिपाही होता था।

जुमला अर्थात् 100 सिपाहियों की टोली के अधिकारी से लेकर सेनापति और सूबेदार तक के पास एक समाचार लेखक, एक भेदिया और एक गुप्त सूचना देने वाला अनिवार्य रूप से होता था। सैनिक चुस्त पायजामा, कच्छा, पगड़ी और कमर में एक कपड़ा धारण करते थे। ये कपड़े चुस्त हुआ करते थे तथा सूती छींट के बने होते थे।

सेना तथा सैनिकों के लिए नियम

शिवाजी की सेना द्वारा किए जाने वाले युद्ध अभियानों में लूट के दौरान औरतों, गायों, किसानों, बच्चों तथा निर्धन मुसलमानों को लूटने एवं सताने पर पूर्ण पाबंदी थी। लूट की सामग्री राजकीय कोष में जमा करवाने का नियम था। यदि कोई सैनिक, लूट का सामान अपने पास रख लेता था तो उसके विरुद्ध कड़ी कार्यवाही होती थी।

शिवाजी ने सेना को समय पर वेतन देने की व्यवस्था लागू की तथा पदोन्नति एवं पुरस्कार के नियम बनाए। राज्य में दशहरे का त्यौहार उत्साह एवं धूम-धाम से आयोजित किया जाने लगा। इस अवसर पर सेना तथा घोड़ों का निरीक्षण किया जाता था। अच्छे सैनिकों को बिना कर की कृषि भूमि दी जाती थी।

सैनिकों को वेतन

शिवाजी ने सेना के लिए वेतन सम्बन्धी नियम बनाए। मावली सैनिक केवल भोजन प्राप्ति के लिए ही सेना में भर्ती हो जाते थे परंतु साधारणतः पैदल सैनिक को 1 से 3 पगौड़ा, वारगीर सैनिकों को 2 से 5 पगौड़ा तथा सेलेदार सैनिकों को 6 से 12 पगौड़ा वेतन मिलता था। पगौड़ा का मूल्य एक रुपए के बराबर होता था।

पैदल सेना के जुमलदार से 7 पगौड़ा तथा घुड़सवार सेना के जुमलदार को लगभग 20 पगौड़ा, सवार सेना के सूबेदार को 50 पगौड़ा तथा पंच हजारी को 200 पगौड़ा, एक पालकी और खिदमतदार दिया जाता था। 

समुद्री बेड़े की स्थापना

शिवाजी ने कोंकण में अपने बंदरगाहों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत समुद्री जहाजी बेड़ा बनाया तथा शक्तिशाली नौ सेना का गठन किया। उसने पांच सौ समुद्री जहाजों को शस्त्रों तथा सैनिकों से सुसज्जित किया तथा दयासागर एवं मायानाक भण्डारी नामक दो नौ-सेनाध्यक्षों को नियुक्त किया।

शिवाजी ने अपनी जलसेना को कुलबा नामक बंदरगाह में रखा। सुवर्ण दुर्ग तथा विजय दुर्ग में भी कुछ जहाज रखे। इस सेना से शिवाजी को कई मोर्चों पर लाभ हुआ। इसी सेना के बल पर वह फ्रांसीसियों, अंग्रेजों, पुर्तगालियों तथा अबीसीनियाई लोगों की नौ-सेनाओं पर अंकुश रखता था।

इस काल में मुगलों के पास भी इतनी बड़ी नौ-सेना नहीं थी, जितनी शिवाजी के पास थी। शिवाजी के अधिकार वाले बंदरगाहों से मसाले, अनाज, कपास, चंदन आदि बहुमूल्य सामग्री का व्यापार दूरस्थ देशों को होता था जिससे शिवाजी को अच्छी आय होती थी।

पुर्तगालियों ने शिवाजी से संधि कर ली जिसके अनुसार शिवाजी को कभी भी पुर्तगालियों के क्षेत्र में लूट नहीं करना थी। इसके बदले में पुर्तगालियों ने शिवाजी की नौसेना को तोपें एवं बारूद उपलब्ध कराए।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

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