Saturday, May 25, 2024
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78. लाल किला राठौड़ों के राजकुमार को नहीं ढूंढ सका!

आगरा और दिल्ली के लाल किलों में बैठी मुगलिया सत्ता बड़े घमण्ड से भारत के राजाओं और महाराजाओं को जमींदार और जागीरदार कहा करती थी। जोधपुर, आम्बेर, बूंदी, बीकानेर एवं जैसलमेर आदि बड़े-बड़े राज्यों के महाराजाओं को मुगल दस्तावेजों में जमींदार कहा गया है किंतु यही जमींदार अवसर मिलने पर, लाल किले में बैठी सत्ता की नाक काट लेते थे। छत्रपति शिवाजी जिसे औरंगजेब बड़े घमण्ड से पहाड़ी चूहा कहता था, आगरा के लाल किले के पर कतर कर न केवल स्वयं सुरक्षित निकल आए थे अपितु अपने पुत्र शंभाजी और अपने प्रत्येक सिपाही को लाल किले में से निकालकर रायगढ़ लौट आए थे।

इसी प्रकार महाराजा जसवंतसिंह को दरवाजा ए कुफ्र कहकर महाराजा की जीवन भर की सेवाओं का अपमान करने वाले औरंगजेब के सैंकड़ों सिपाहियों की गर्दन काटकर मारवाड़ के राजपूत न केवल अपने राजकुमार को सुरक्षित निकाल लाए थे अपितु लाल किले की सत्ता की शान भी धूल में मिला आए थे।

पाठकों को स्मरण होगा कि ई.1676 में मारवाड़ नरेश जसवंतसिंह की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने मारवाड़ राज्य को खालसा घोषित करके उसे मुगल सल्तनत में मिला लिया था तथा शिशु राजा अजीतसिंह और उसकी माताओं को दिल्ली बुलवाकर उन्हें बंदी बना लिया था। औरंगजेब ने शिशु अजीतसिंह का मुसलमानी तरीके से पालन-पोषण करने की आज्ञा दी थी। इस पर जोधपुर राज्य के राजपूत सरदार, राजकुमार अजीतसिंह को दिल्ली से निकाल ले गए थे।

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जब दिल्ली के कोतवाल फौलाद खाँ ने राजा रूपसिंह की हवेली में प्रवेश किया था तो हवेली खाली थी। इस पर वह मारवाड़ की ओर जाने वाले रास्ते पर दौड़ा। मार्ग में उसे ज्ञात हुआ कि कुछ देर पहले राठौड़ों का एक दल यहाँ से होकर निकला है किंतु फौलाद खाँ जब तक तुगलकाबाद पहुंचा तब तक रात काफी हो गई और अंधेरा गहरा जाने के कारण सेना का आगे बढ़ना असंभव हो गया। फौलाद खाँ के साथ जो मुगल सिपाही थे उन्होंने भी राजपूतों के भय से अंधेरे में आगे बढ़ने से मना कर दिया। इस पर फौलाद खाँ वहीं पर ठहर गया तथा सुबह होने की प्रतीक्षा करने लगा। जब अगली प्रातः उजाला होने पर मुगल सेना आगे बढ़ी तो उसके हाथ कुछ भी नहीं लगा।

हालांकि यदि फौलाद खाँ और आगे बढ़कर राजपूतों के दल तक पहुंच जाता तो भी उसके हाथ कुछ नहीं लगता क्योंकि राजपूतों के जिस दल का वह पीछा कर रहा था, उस दल में शिशु राजकुमार नहीं था, वह दल तो वीर दुर्गादास राठौड़ का था जो दिल्ली के फौजदार की तोपों को ठण्डा करने के बाद मारवाड़ की तरफ चल दिया था।

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दिल्ली के कोतवाल फौलाद खाँ ने शाही कोप से बचने के लिए एक हिन्दू बालक को, स्वर्गीय महाराजा जसवंतसिंह की दासियों के साथ पकड़कर औरंगजेब के समक्ष यह कहकर प्रस्तुत कर दिया कि यही राजकुमार अजीतसिंह है। औरंगजेब ने फौजदार की बातों का विश्वास करके, उस शिशु को अपनी शहजादी जेबुन्निसा को मुसलमानी ढंग से लालन-पालन करने के लिए सौंप दिया।

इस कारण औरंगजेब शांत होकर बैठ गया और जोधपुर के राजपूत सरदार वीरवर खींची मुकुंदास के नेतृत्व में राजकुमार को लेकर मारवाड़ की तरफ बढ़ते रहे। उधर वीर दुर्गादास राठौड़ भी दिल्ली से निकलकर राजपूतों के इस दल से आ मिला।

मारवाड़ राज्य की राजधानी जोधपुर तथा मेहरानगढ़ दुर्ग पर मुगल फौजदार तहव्वर खाँ का अधिकार था। इसलिए राजपूतों ने अपने राजकुमार को जोधपुर न ले जाकर मारवाड़ राज्य के बलूंदा नामक जागीरी ठिकाने में छिपा दिया। सरदार मोहकमसिंह की पत्नी बाघेली इसी ठिकाणे की ठकरानी थी। राजपूतों ने देखा कि मारवाड़ राज्य के सभी ठिकानों अर्थात् जैतारण, मेड़ता बिलाड़ा एवं सोजत आदि में मुसलमानों का अधिकार हो गया है। इसलिए राजपूत सरदार अपने राजकुमार को मारवाड़ राज्य से निकालकर निकटवर्ती पहाड़ी राज्य में ले गए जिसे सिरोही के नाम से जाना जाता था और जो चौहान राजवंश के अधीन था।

स्वर्गीय महाराजा जसवंतसिंह की एक रानी देवड़ीजी, सिरोही राज्य की राजकुमारी थी इस नाते सरदारों ने सिरोही के राजा से प्रार्थना की कि वह राजकुमार अजीतसिंह को अपने महलों में रख ले किंतु सिरोही के देवड़ा राजा ने बादशाह के कोप के भय से ऐेसा करने से मना कर दिया। इस पर मारवाड़ राज्य के सरदार, राजकुमार अजीतसिंह को सिरोही राज्य की पहाड़ियों में ले गए और वहाँ पर कालन्द्री गांव में जयदेव पुरोहित नामक एक पुष्करणा ब्राह्मण के घर में रख दिया। खींची मुकुंददास भी सन्यासी का वेश बनाकर आसपास ही बस गया और हर समय राजकुमार की सुरक्षा का प्रबंध करने लगा।

कुछ समय बाद राजपूत सरदारों ने उदयपुर जाकर महाराणा राजसिंह से सम्पर्क किया तथा उससे प्रार्थना की कि वह मारवाड़ राज्य के राजकुल की रक्षा करे। इस पर महाराणा राजसिंह ने शिशु राजकुमार को अपने संरक्षण में बुला लिया। राठौड़ सरदारों ने राजकुमार की तरफ से महाराणा को सोने-चांदी से सजा हुआ एक हाथी, 11 घोड़े, एक तलवार, एक रत्न-जटित कटार तथा चांदी के दस हजार रुपए भेंट किए।

इस पर महाराणा राजसिंह ने राजकुमार अजीतसिंह को केलवा ठिकाणे का पट्टा देकर वहाँ रक्खा तथा जोधपुर के राजपूत सरदारों को आश्वस्त किया कि बादशाह कितना ही ताकतवर क्यों न हो, वह वीर दुर्गादास तथा मेवाड़ की सम्मिलित शक्ति का सामना नहीं कर सकता।

इस प्रकार राठौड़ों का राजकुमार औरंगजेब के हाथों से पूरी तरह दूर हो गया। अब लाल किले की शक्ति राठौड़ राजकुमार को छू भी नहीं सकती थी। अपने राजकुमार को सुरक्षित हाथों में सौंपने के बाद मारवाड़ के 25 हजार राठौड़ों ने अपने पैतृक राज्य को औरंगजेब के चंगुल से निकालने के लिए एक दीर्घकालीन युद्ध आरम्भ कर दिया। इसे इतिहास में तीस वर्षीय युद्ध के नाम से जाना जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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