Wednesday, May 22, 2024
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92. भारत के लोगों का खून चूस रहा था लाल किला!

प्राचीन काल से लेकर मध्य काल तक विश्व भर में शासकों की आय का मुख्य हिस्सा कृषि क्षेत्र से लगान के रूप में प्राप्त किए जाने वाले कर से आता था। मौर्य काल से लेकर गुप्त शासकों के समय में उत्तर भारत के गंगा-यमुना के मैदानों में किसानों के खेतों में इतना अनाज उत्पन्न होता था कि राजा द्वारा किसानों की उपज का केवल छठा हिस्सा अर्थात् 16 प्रतिशत भू-राजस्व के रूप में लिया जाता था।

इससे मिलने वाले अनाज से राजा, सेना तथा राजपरिवार का काम बहुत अच्छी तरह चलता था। इस कारण राजा और प्रजा दोनों ही समृद्ध थे। राजा को नगद की प्राप्ति व्यापारियों द्वारा चुंगी के रूप में चुकाई जाने वाली स्वर्ण मुद्राओं से होती थी। बारहवीं शताब्दी ईस्वी के अंत तक अर्थात् सम्राट पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु तक भारत में भू-राजस्व की यही दर प्रचलित थी। इस काल तक भी राजा और प्रजा सुखी एवं समृद्ध थे। जो किसान भू-राजस्व नहीं दे पाते थे, राजा द्वारा उनकी समस्या को सुना जाता था और उनके साथ न्याय करने एवं उनकी सहायता करने का प्रयास किया जाता था।

जब तेरहवीं शताब्दी ईस्वी में मध्य एशिया से आए तुर्क शासकों ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना की तो उन्होंने किसानों से उपज का पचास से साठ प्रतिशत हिस्सा भू-राजस्व के रूप में तय किया जिसे वे मालगुजारी कहते थे।

किसानों के खेतों पर जाने वाले कर्मचारी एवं सिपाही बेईमान थे इस कारण वे किसानों से बड़ी क्रूरता से पेश आते थे और उनकी उनकी उपज का सत्तर से पिचहत्तर प्रतिशत तक छीन लेते थे। जो किसान कर नहीं दे पाते थे उन पर बड़े जुल्म ढाए जाते थे। उनके झौंपड़ों में आग लगा दी जाती थी और उनकी औरतों पर अत्याचार किए जाते थे। यहाँ तक कि छोटे बच्चों को आग में फैंक दिया जाता था। इन कारणों से तुर्कों के शासन काल में भारत के किसानों की आर्थिक एवं सामाजिक दशा दयनीय होती चली गई थी।

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जब सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में मुगलों का शासन हुआ तब भारतीय किसानों के साथ सरकार की ओर से की जाने वाली क्रूरता में कमी आई। मुगलों के काल में उपज का चालीस प्रतिशत से पचास प्रतिशत हिस्सा मालगुजारी के रूप में लिया जाता था।

अकबर के समय मुगल सल्तनत को भारत से 13 करोड़ 21 लाख रुपए मालगुजारी के रूप में मिलते थे जिसमें अफगानिस्तान से मिलने वाली मालगुजारी शामिल नहीं थी। औरंगजेब के समय में मालगुजारी से मुगल सल्तनत की आय 33 करोड़ 25 लाख रुपए होती थी। इस आय में जकात और जजिया से मिलने वाली राशि शामिल नहीं थी।

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औरंगजेब के समय में हिन्दू किसानों से मालगुजारी के रूप में उनकी फसल का आधा हिस्सा लिया जाता था जबकि मुसलमान किसानों से फसल का चौथाई हिस्सा लिया जाता था। मुसलमानों से जकात के रूप में उनकी वार्षिक आय का ढाई रुपया सैंकड़ा वसूल किया जाता था। जबकि हिन्दुओं से ली जाने वाली जजिया की राशि प्रत्येक घर से दो रुपए से लेकर आठ रुपए प्रतिवर्ष वसूल की जाती थी। प्रत्येक तीर्थस्थान पर हिन्दुओं को अलग-अलग तीर्थकर चुकाना पड़ता था।

प्रयाग में गंगास्नान करने वालों को सवा छः रुपए चुकाने पड़ते थे। गया एवं हरिद्वार जैसे तीर्थों पर भी हिन्दुओं से बेरहमी से कर वसूला जाता था। इस प्रकार जजिया से औरंगजेब को करोड़ों रुपए सालाना की आय होती थी। यह सारी राशि शाही परिवार के सदस्यों को पेंशन के रूप में एवं सेनाओं को वेतन के रूप में दी जाती थी।

इस काल में हुगली एवं मछलीपट्टनम नामक बंदरगाहों से प्राप्त होने वाले महसूल की जानकारी उपलब्ध नहीं है किंतु अकेले सूरत बंदरगाह से 12 लाख रुपए सालाना महसूल वसूला जाता था। जबकि अंग्रेजों, फ्रांसीसियों, डचों एवं पुर्तगालियों आदि के जहाजों से हर साल इतना रुपया वूसला जाता था जिससे मुगलिया सल्तनत मालामाल हो गई थी।

अकबर से लेकर जहांगीर एवं शाहजहाँ के काल में सल्तनत का बहुत सा रुपया शाही परिवारों एवं सेनाओं पर खर्च किया जाता था फिर भी सल्तनत के खजाने से पूरे देश में बड़े-बड़े भवन बनाए गए थे जिनमें से अधिकतर मस्जिद एवं मकबरे थे।

औरंगजेब के समय शाही खजाने से बहुत कम मकबरे एवं मस्जिदें बनी थीं और सारा रुपया सेनाओं को वेतन चुकाने में और बेलदारों को मंदिर तोड़ने के बदले चुकाने में खर्च हो जाता था। इस पर भी औरंगजेब के पास अकूत सम्पदा एकत्रित हो गई थी। उसके शहजादों एवं शहजादियों ने भी जनता का खून चूसकर सोने-चांदी के सिक्के एवं हीरे-मोती के गहने इकट्ठे कर लिए थे किंतु जब ई.1682 में औरंगजेब दक्खिन के मोर्चे पर चला गया तो सरकार का खर्चा बेतहाशा बढ़ गया। इस समय औरंगजेब को अफगानिस्तान, पंजाब, आगरा असम तथा महाराष्ट्र में बड़ी-बड़ी सेनाएं रखनी पड़ रही थीं तथा राजपूत युवकों के न मिलने से मुस्लिम युवकों को अधिक वेतन देकर सेनाओं में भर्ती करना पड़ रहा था।

इस काल में जनता की हालत यह थी कि एक गांव को मुगल लूट कर निकलते थे तो मराठे आ धमकते थे। मराठे निकलते थे तो डाकू आ धमकते थे, लुटी हुई जनता को कई बार लूटा जाता और जब भी फसल पक कर तैयार होती थी, लूट का सिलसिला शुरु हो जाता था।

सिपाही और लुटेरे निरीह लोगों पर तरह-तरह का अत्याचार करते। जबर्दस्ती उनके घरों में घुस जाते और उनका माल-असबाब उठा कर भाग जाते। बिना कोई धन चुकाये जानवरों को पकड़ लेते और उन्हें मार कर खा जाते। शायद ही कोई घर ऐसा रह गया था जिसमें स्त्रियों की इज्जत आबरू सुरक्षित बची थी। जनता इन जुल्मों की चक्की में पिस कर त्राहि-त्राहि कर रही थी लेकिन किसी ओर कोई सुनने वाला नहीं था।

बार-बार के सूखे और अकालों की स्थिति के कारण राजकोष जुटाना और सेना बढ़ाना संभव नहीं था। जब अकाल भयावह हो जाता था तो हजारों आदमी भूख से मर जाते थे। शहर के शहर खाली हो जाते थे। अच्छे-अच्छे घरों के लोग दूरस्थ इलाकों में भाग जाते थे जहाँ वे भीख मांगकर गुजारा करते थे। लाख बार गिड़गिड़ाने पर भी भीख नहीं मिलती थी। रोजगार की आशा करने से अच्छा तो मौत की आशा करना था क्योंकि मौत फिर भी मिल जाती थी लेकिन रोजगार नहीं मिलता था। जब खाली हवेलियों में भूखे-नंगे लोग लूटमार के लिये घुसते तो उन्हें अनाज का दाना देखने को भी नहीं मिलता था।

संभ्रांत लोगों की यह हालत थी तो निर्धनों और नीचे तबके के लोगों की तकलीफों का तो अनुमान ही नहीं लगाया जा सकता। औरतें वेश्यावृत्ति करके पेट पालने लगीं। लाखों बच्चे भूख और बीमारी से तड़प-तड़प कर मर जाते थे। अकाल के साथ ही महामारी प्लेग का भी प्रकोप हुआ। प्लेग ने हिन्दुस्तान के बहुत से शहरों को अपनी चपेट में ले लिया। शहर के शहर खाली हो गये। लोगों ने भाग कर जंगलों और पहाड़ों में शरण ली। फिर भी असंख्य आदमी मर गये। अंत में ऐसी स्थिति आयी कि जब खाने को कहीं कुछ न रहा तो आदमी, आदमी का भक्षण करने लगा। इक्के-दुक्के आदमी को अकेला पाकर पकड़ लेने के लिये नरभक्षियों के दल संगठित हो गये। पूरे देश में हा-हा कार मचा हुआ था।

मुगलों में सबसे अच्छा शासन अकबर का माना जाता है। अकबर के काल में जनता की भयवाह स्थिति का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है-

खेती न किसान को, भिखारी को न भीख बलि

बनिक  को  न  बनिज  न चाकर को चाकरी

जीविका  विहीन  लो  सीद्यमान   सोच  बस

कहै  एक एकन सौं,  कहाँ  जाय  का  करी।

जब अकबर के समय में देश की यह हालत थी तो औरंगजेब के समय में क्या रही होगी, इसका अनुमान लगाया जा सकता है! भारत की जनता को इतना दुःख पहुंचा कर भी भी औरंगजेब संतुष्ट नहीं हुआ। उसके चारों ओर कुफ्र फैला हुआ था जो नष्ट होने में ही नहीं आता था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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