Monday, September 20, 2021

93. औरंगजेब की मृत्यु पर रोने वाला कोई नहीं था!

दिन आते थे और जाते थे। बदलते हुए मौसमों के साथ केवल पेड़ों के पत्ते ही नहीं बदलते थे अपितु पशु, पक्षियों, वनस्पतियों एवं मनुष्यों की पीढ़ियां भी बदलती जा रही थीं और इनके बदलने के साथ दुनिया भी अपनी गति से नित नया रूप धारण करती जा रही थी किंतु दुनिया में कुछ चीजें थीं जो न बदलने के लिए अभिशप्त थीं। उन्हीं में से एक था- औरंगजेब।

औरंगजेब का जन्म ई.1618 में हुआ था और अब वह जीवन के उननब्बेवां पतझड़ देख रहा था। यदि कोई और होता तो वह जीवन के उननब्बे बसंत देखता किंतु औरंगजेब तो पतझड़ों की सृष्टि करने के लिए धरती पर भेजा गया था।

अब औरंगजेब की कमर नब्बे डिग्री के कोण पर झुक गई थी फिर भी वह शांति से खाट में नहीं बैठता था। अब वह हाथी-घोड़ों पर सवार नहीं हो सकता था, इसलिए खुली पालकी में बैठकर चलता था। रात के समय जब उसकी सेना सो जाती तब भी वह लाठी पकड़कर सैनिक शिविर के बीच घूमता रहता था। इस उम्र में भी वह युद्ध के मैदान में पालकी में सवार होकर जाता था। एक समय में आठ से बारह आदमी उसकी पालकी को लेकर दौड़ते थे। उन निहत्थे लोगों के प्राण भी हर समय सांसत में पड़े रहते थे।

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इस आयु में भी औरंगजेब के मन में अपने शत्रुओं से लड़ने का हौंसला इतना अधिक था कि उसकी मिसाल पूरे मानव इतिहास में नहीं मिल सकती! ई.1687 में जब गोलकुण्डा के घेरे के दौरान औरंगजेब अपनी पालकी पर बैठकर अपने सैनिकों को प्रोत्साहित एवं निर्देशित कर रहा था तब गोलकुण्डा के किले की तरफ से आने वाले तोपों के गोले औरंगजेब की पालकी के आसपास ही आकर गिरने लगे थे।

तब भी औरंगजेब पूरी मुस्तैदी से अपनी पालकी में बैठा हुआ, युद्ध के मैदान में चक्कर लगाता रहा। वह यह सहन कर सकता था कि उसे मृत्यु आ जाए किंतु यह सहन नहीं कर सकता कि उसके जीते जी भारत में एक भी शिया राज्य नष्ट होने से बच जाए!

आयु बढ़ने के साथ औरंगजेब का क्षीणकाय शरीर और भी क्षीण हो गया था। उसके दांत गिर जाने से गालों में गड्ढे पड़ गए थे तथा आंखें भीतर की ओर धंस गई थीं तथा उनके भीतर घूमती हुई पुतलियां दहकते हुए अंगारों की तरह दिखाई देती थीं। उसके पोपले मुंह पर लम्बी सफेद दाढ़ी लटकती थी। इन कारणों से उसका चेहरा बहुत भयावह दिखने लगा था। यदि कोई व्यक्ति जिसने औरंगजेब को पहले कभी नहीं देखा हो तो उसे अकेले में देखकर प्रेत समझने की गलती कर सकता था।

कृशकाय, जर्जर एवं अतिवृद्ध हो जाने पर भी औरंगजेब के मन से हिन्दू धर्म को नष्ट करके इस्लाम का प्रचार करने का उत्साह कम नहीं हुआ था। इसलिए बहुत से कट्टरपंथी चाटुकारों ने उसके बारे में उड़ा दिया कि वह बादशाह नहीं है, अपितु जिंदा पीर है। उस काल में सुन्नियों के साथ-साथ शिया, खोजा एवं बोहरा मुसलमान भी भारत में रहते थे किंतु वह केवल सुन्नियों को ही मुसलमान मानता था।

औरंगजेब ने अपने भाइयों को तो खुद ही मरवा दिया था किंतु उसके जीवन काल में उसकी समस्त बहिनें, बेटियां और बेगमें भी मर चुकी थीं। ई.1657 में उसकी मुख्य बेगम दिलरास बानू का निधन हुआ। ई.1676 में औरंगजेब के बड़े पुत्र सुल्तान मुहम्मद की दिल्ली की जेल में मृत्यु हो गई। 6 सितम्बर 1681 को औरंगजेब की सबसे बड़ी बहिन जहानआरा की मृत्यु हो गई। ईस्वी 1688 में औरंगजेब की बेगम औरंगाबादी महल की और ईस्वी 1691 में बेगम नवाब बाई की मृत्यु हो गई।

ई.1702 में औरंगजेब की पुत्री जेबुन्निसा की दिल्ली की जेल में मृत्यु हो गई। ईस्वी 1705 में औरंगजेब की पुत्र-वधू जहाँजेब की मृत्यु हो गई। ईस्वी 1706 में औरंगजेब की अकेली जीवित बहन गौहनआरा की मृत्यु हो गई। उसी वर्ष उसकी पुत्री मेहरुन्निसा और उसके पति इजिदबक्स की भी मृत्यु हो गई।

मेहरुन्निसा की मृत्यु के एक माह बाद औरंगजेब के पौत्र बुलन्द बख्तर की मृत्यु हो गई। ई.1706 में ईरान में रह रहे शहजादे अकबर की मृत्यु हो गई। ईस्वी 1707 के आरंभ में औरंगजेब की मृत्यु से कुछ दिन पहले औरंगजेब के दो नातियों की मृत्यु हो गई। इस प्रकार उसकी आंखों के सामने उसका लगभग पूरा परिवार मर गया। केवल तीन शहजादे आजम, मुअज्जम और कामबक्श, एक पत्नी उदयपुरी बेगम तथा एक पुत्री जीनत उन्निसा ही जीवित बचे थे।

फिर भी औरंगजेब के मन में अपने शत्रुओं को नष्ट करने, सम्पूर्ण भारत को अपने अधीन करने तथा भारत से हिन्दुओं के मंदिर तथा तीर्थों, सिक्खों के गुरुद्वारों, सूफियों की दरगाहों और शियाओं के धार्मिक स्थलों को नष्ट करके कुफ्र समाप्त करने का उत्साह कम नहीं हुआ था। ईस्वी 1705 में जब औरंगजेब 87 वर्ष का था, उसने मुहम्मद खलील और बेलदारों के दारोगा खिदमत राय को पंढरपुर भेजकर बिठोबा का प्रसिद्ध मंदिर तुड़वाया तथा कसाइयों को मंदिर में बुलाकर वहाँ गाएं कटवाईं।

इस आयु तक पहुंचते-पहुंचते औरंगजेब भारत वर्ष की संस्कृति का बहुत नुक्सान कर चुका था। इस कारण सिक्ख, जाट, मराठे, सतनामी एवं राजपूत पूरे देश में उसके दुश्मन हुए फिरते थे। अफगानी और शिया मुसलमान भी औरंगजेब का रक्त बहाने को आतुर थे। औरंगजेब भी अपनु शत्रुओं के प्राण लेने के लिए हर समय उत्सुक एवं तत्पर रहता था। एक पल के लिए वह चैन से नहीं बैठ सकता था। भारत भर के बड़े हिन्दू राजाओं को मरवाकर, हजारों मंदिरों को तुड़वाकर तथा तथा शिया सुल्तानों को कैद करके भी उसे शांति नहीं मिली थी। औरंगजेब के बेटे उसकी मृत्यु की प्रतीक्षा करते-करते स्वयं बूढ़े-बूढ़े हो-होकर मरने लगे थे किंतु औरंगजेब पूरी तरह स्वस्थ था और युद्ध के मैदानों में डटा हुआ था।

अंततः जनवरी 1707 में औरंगजेब बीमार पड़ा। इस स्थिति में वह मराठों से लड़ाई जारी नहीं रख सकता था। इसलिए उसने फिर से दिल्ली लौट जाने का निर्णय लिया तथा अहमदनगर के लिये प्रस्थान किया। जब मराठों को ज्ञात हुआ कि औरंगजेब बीमार है तथा दिल्ली जा रहा है तो मराठे उसके पीछे लग गये और उसके डेरांे को लूटने लगे। 31 जनवरी 1707 को औरंगजेब अहमदनगर पहुँच गया। मराठों ने अहमदनगर को चारों ओर से घेर लिया। चार माह की भयानक लड़ाई के बाद मराठों को अहमदनगर से दूर खदेड़ा जा सका।

औरंगजेब जीवित ही दिल्ली पहुंचना चाहता था किंतु मराठों के कारण उसके लिए दिल्ली बहुत दूर हो चुकी थी। 3 मार्च 1707 को अहमदनगर में ही औरंगजेब का निधन हो गया। औरंगजेब की इच्छानुसार उसके शरीर को औरंगाबाद से 24 किलोमीटर दूर खुल्दाबाद नामक गांव में ले जाया गया जहाँ उसे शेख जेनुद्दीन की मजार के निकट दफना दिया गया। इस प्रकार मराठों ने औरंगजेब को जीवित या मृत, महाराष्ट्र से बाहर नहीं जाने दिया।

जिस समय औरंगजेब की मृत्यु हुई, भारत बड़ी विपन्न अवस्था में था। मराठे मालवा, खानदेश तथा गुजरात को लूट रहे थे। शहजादा आजम मालवा में सिन्धिया से संघर्ष कर रहा था। शहजादे कामबख्श को मराठों ने बीजापुर में घेर रखा था। दुर्गादास और अजीतसिंह मारवाड़ में गदर मचाए हुए थे। जैसे ही राठौड़ों को ज्ञात हुआ कि औरंगजेब मर गया तो 12 मार्च 1707 को महाराजा अजीतसिंह ने जोधपुर पर आक्रमण किया तथा अपने पूर्वजों की राजधानी पर अधिकार कर लिया।

जाट, सिक्ख, सतनामी, बुंदेले तथा रुहेले भी मुगलों के राज्य को बर्बाद करने पर तुल गए। ऐसी विकट परिस्थितियों में औरंगजेब के तीनों शहजादे आजम, मुअज्जम तथा कामबख्श, एकजुट होकर शत्रुओं का सामना करने के स्थान पर मुगलिया सल्तनत पर अधिकार करने के लिये एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे थे।

लगभग पचास वर्षों के दीर्घ शासन में औरंगजेब ने देश को शमशान भूमि में नहीं तो बंदीगृह में अवश्य बदल दिया था। ऐसे आदमी के मरने पर किसी को दुःख नहीं हुआ। उसके बेटों-पोतों तक को उससे कोई लगाव नहीं था। उसकी मृत्यु पर कोई रोने वाला नहीं था। हालांकि शहजादे आजमशाह तथा शहजादी जीनतउन्निसा ने अपने जीवन में एक-एक बार उसकी कब्र पर अपनी उपस्थिति दी थी।

मुगलिया तवारीखों के अनुसार औरंगजेब ने अपनी कब्र बनाने के लिए टोपियां सिलकर कुछ रुपए एकत्र किए थे। इन्हीं रुपयों से खुल्दाबाद गांव में तीन गज लम्बी एक बहुत साधारण कब्र बनाई गई जिस पर उस समय 14 रुपए 12 आने खर्च हुए थे। कब्र का ऊपरी हिस्सा मिट्टी से ढका गया था जिसके  ऊपर घास लगाई गई थी। जब भारत पर अंग्रेजों का शासन हुआ तो ई.1900 के आसपास भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड कर्जन ने इस कब्र के चारों ओर संगमरमर का कटहरा बनवाया।

औरंगजेब की कब्र के आसपास ही अहमदनगर के उन शिया शासकों की कब्रें भी स्थित हैं जिन्हें मारकर मुगलों ने उनका राज्य छीन लिया था। जो लोग कभी जीते जी शांतिपूर्वक एक दूसरे के साथ बैठ नहीं सके थे, अब उनके शव पिछले तीन सौ सालों से एक दूसरे की बगल में शांति से सोए पड़े हैं और उनकी रूहें कयामत होने का इंतजार कर रही हैं ताकि आसमान में रहने वाली अदृश्य सत्ता द्वारा उनके करमों का हिसाब किया जा सके!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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1 COMMENT

  1. अंतिम मुग़ल बादशाह औरंगजेब के जीवन के अंतिम वर्षों को एक पुस्तक में यूं बताया गया है जो उस दौर में हो रहे मुग़ल साम्राज्य के विघटन को बताते हैं “, 1703-1707 के बीच अपने थके और बीमार शरीर को घसीटता हुआ वृद्ध शहंशाह दक्खिन में आगे बढ़ा, वह कभी एक किला जीतता तो कभी जाकर दूसरे पे युद्ध की तैयारियों में लग जाता। बाढ़, अकाल और युध्दों से मुग़ल सेना का भारी विनाश हुआ। जब उसे यकीन हो गया कि अब और युद्ध व्यर्थ है तो वह धीरे- धीरे पीछे लौट गया। इस तरह जब 1707 में औरंगजेब ने अंतिम सांस ली तब वह अपने पीछे एक नितांत बिखरता हुआ साम्राज्य छोड़ गया जिसकी सभी आंतरिक समस्यायें नासूर की तरह फूट पड़ी थीं। “

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