Wednesday, June 19, 2024
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132. लाल किले में शाही महिलाओं का शील हरण किया गया!

जब अहमदशाह अब्दाली आगरा का अभियान बीच में रोक कर दिल्ली लौटा और महाराजा सूरजमल ने उसे फूटी कौड़ी भी नहीं दी तो अहमदशाह अब्दाली के गुस्से का पार नहीं रहा। उसका सारा गुस्सा दिल्ली वालों पर कहर बन कर टूटा। उसे हर समय धरती पर बहते हुए लाल इंसानी खून, सुंदर स्त्रियों और पीले चमचमाते हुए सोने की हवस बनी रहती थी। इस काल की निर्धन दिल्ली अब्दाली की हवस पूरी नहीं कर सकती थी किंतु अब्दाली अपनी हवस पूरी करना अच्छी तरह जानता था।

जदुनाथ सरकार ने अपनी पुस्तक ‘फॉल ऑफ मुगल एम्पायर’ में लिखा है कि अब्दाली के दिल्ली आने से कुछ माह पहले जब मराठों ने इमादुलमुल्क से युद्ध-क्षति-पूर्ति के चालीस लाख रुपए मांगे थे तो इमादुलमुल्क ने मरहूम बादशाह अहमदशाह बहादुर की माँ ऊधमबाई के भाई-बहिनों और शाही परिवार के अन्य सदस्यों की विपुल सम्पत्ति जब्त कर ली थी और गड़े हुए धन का पता लगाने के लिए स्त्रियों पर बड़े अत्याचार किए थे जिनके कारण शाही परिवार के सदस्यों का धन लुट चुका था। पूरी तरह कंगाल हो चुका बादशाह आलमगीर (द्वितीय) भी अहमदशाह अब्दाली को एक करोड़ रुपए दे चुका था।

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जब अहमदशाह अब्दाली ने दिल्ली में प्रवेश किया तो इस बार भी पहले की ही तरह बाजारों को पूरी तरह बंद कर दिया गया। बाजारों एवं सड़कों पर दोनों तरफ अब्दाली के सिपाही पंक्ति बनाकर खड़े हो गए। सड़कें और गलियां सूनी हो गईं। लोगों को खिड़कियों से भी झांकने की मनाही थी। बादशाह आलमगीर ने पुनः लाल किले के दरवाजे पर खड़े होकर अब्दाली का स्वागत किया।

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जदुनाथ सरकार ने फॉल ऑफ दी मुगल एम्पायर में लिखा है कि आलमगीर ने अपनी दुर्दशा देखकर शाही तख्त छोड़ दिया और शाही रंगमहल तथा ख्वाबगाह छोड़कर शाहबुर्ज में चला गया। दो दिन बाद बेचारे को यहाँ से भी निकाल कर एक साधारण स्थान में डाल दिया। आलमगीर तथा उसकी बेगमों ने शाही महल खाली कर दिए तथा उनमें अहमदशाह और उसकी बेगमें रहने लगीं।

दूसरे दिन दीवाने आम हुआ जिसमें दोनों बादशाह पास-पास बैठे। अहमदशाह अब्दाली ने इस बार वजीर इंतिजाम खाँ से दो करोड़ रुपयों की मांग की। यह सुनकर वजीर के होश उड़ गए तथा उसने कहा कि मेरे पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं है, दो करोड़ रुपए कहां से लाऊँ! इस पर अब्दाली ने आदेश दिए के वजीर को काठ में रखा जाए। अपमान और मृत्यु के भय से कांपते हुए वजीर ने अपने जान बचाने के लिए कह दिया कि मेरी माता शोलापुरी बेगम को मेरे पिता के गड़े हुए धन का पता है। यह सुनते ही अहमदशाह ने बुढ़िया शोलापुरी बेगम को पकड़वाकर वहीं बुलवा लिया।

जब बुढ़िया घसीटती हुई दरबार में लाई गई तो उसके शोक का पार नहीं था। वह चीख रही थी और सहायता के लिए करुण पुकार कर रही थी। उसका ससुर इसी लाल किले में वजीर रहा था। उसका पति भी इसी लाल किले में वजीर रहा था और अब उसका बेटा भी इसी लाल किले का वजीर था किंतु आज उसे इस तरह घसीटा जा रहा था!

शोलापुरी बेगम से कहा गया कि यदि वह अपने पति के गुप्त धन का पता नहीं बताएगी तो उसके हाथों में लोहे की खूंटियां ठोकी जाएंगी। यह सुनते ही बुढ़िया बेहोश हो गई। उसे फिर से होश में लाया गया और फिर से वही सब दोहराया गया। इस पर बुढ़िया ने धरती में गढ़े हुए धन का पता बता दिया। अहमदशाह अब्दाली ने अपने एक सौ सिपाहियों को धन खोदने के काम पर लगाया। बहुत खुदाई करने के बाद सोलह लाख रुपयों के चांदी के सिक्के तथा बहुत कीमती हीरे-मोती बरामद किए गए।

इसके बाद बुढ़िया को और मारा-पीटा गया किंतु अब बुढ़िया के पास बताने के लिए कुछ नहीं था। इसी प्रकार बहुत सी प्रतिष्ठित एवं शाही हरम की महिलाओं को नंगी करके मारा-पीटा गया। उनके घरों की तलाशी ली गई और उनके महलों की दीवारों एवं छतों को खोद डाला गया तथा जहाँ से भी रुपया मिल सकता था, छीन लिया गया। कितने ही पुरुषों की हत्या हुई और कितनी ही स्त्रियों के साथ बलात्कार हुआ। सैंकड़ों स्त्रियां स्वयं ही छुरे भौंककर या पानी में डूब कर मर गईं।

अहमदशाह के सिपाहियों ने दिल्ली के बाजारों को लूटकर उनमें आग लगानी शुरू कर दी। इससे दिल्ली में हा-हाकार मच गया। जहाँ कहीं सुंदर हिन्दू युवती के होने का पता चलता था, अहमदशाह अब्दाली उसी को अपने यहाँ पकड़वा कर मंगवाता था।

हमने मरहूम बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला की शहजादी हजरत बेगम का विवाह अब्दाली से किए जाने की चर्चा की थी। इस शहजादी के बारे में इस स्थान पर हम थोड़ा सा विस्तार से बताना चाहेंगे। शहजादी हजरत बेगम इस समय केवल सोलह साल की थी और बहुत सुंदर दिखती थी। बादशाह आलमगीर (द्वितीय) स्वयं भी इस शहजादी से विवाह करना चाहता था किंतु शहजादी आलमगीर से विवाह के लिए तैयार नहीं थी। इस कारण आलमगीर ने हजरत बेगम को बहुत यातनाएं दी थीं। जब अहमदशाह अब्दाली को हजरत बेगम के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने हजरत बेगम को पकड़ मंगवाया।

जब इस शहजादी को अब्दाली की काम वासना पर बलिदान होना पड़ा तो शहजादी घृणा और क्रोध से चीखती-चिल्लाती रही किंतु वह कुछ नहीं कर सकती थी। शहजादी बहुत कम आयु की थी जबकि अहमदशाह पैंतालीस साल का प्रौढ़ था। पु़स्तक ‘तारीख-ए-आलमगीर सानी’ में लिखा है कि अहमदशाह अब्दाली के दोनों कान सड़े हुए थे और उसकी नाक से कोढ़ टपकता था। कर्नल टॉड ने भी इस बात को दोहराया है।

अब्दाली ने शाही परिवार की समस्त युवतियों एवं शाही महल की चार सौ दासियों को भी अपने साथ ले लिया जिनमें मरहूम मुहम्मशाह रंगीला की भी कई बेगमें शामिल थीं। अब्दाली ने अब तक नौ करोड़ रुपए नगद तथा अपरिमित सोना-चांदी एवं हीरे-मोती एकत्रित कर लिए थे। यह सारी सामग्री 28 हजार ऊँटों, 20 हजार घोड़ों, हजारों खच्चरों और बैलों तथा सैंकड़ों हाथियों पर लाद दिया गया। 200 ऊँट उस सामान से लदे थे जो दिल्ली के मरहूम बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला की विधवा बेगमों की सम्पत्ति थी।

पैदल सिपाहियों के साथ भी लूट का माल था। अब्दाली के घुड़सवार पैदल चल रहे थे क्योंकि घोड़ों पर लूट का माल लदा हुआ था। जिस-जिस रास्ते से यह कारवां गुजरता था, उस रास्ते पर एक भी घोड़ा, हाथी, गधा, खच्चर तथा बैल आदि पशु नहीं बचता था, समस्त भारवाहक पशु अब्दाली के आदमियों द्वारा छीन लिये जाते थे और उन पर लूट का माल लाद दिया जाता था।

दिल्ली से लाहौर के मार्ग में स्थित बहावलपुर के नवाब बहावल खाँ (द्वितीय) तथा कलात के नवाब नासिर खाँ ने अहमदशाह को वचन दिया कि वे सिक्खों का दमन करने में अब्दाली के पुत्र तिमूरशाह की सहायता करेंगे। अहमदशाह अब्दाली ने जमजमा तोप लाहौर के दुर्ग में स्थापित करवा दी, जहाँ उसका पुत्र तिमूरशाह सूबेदार था। कुछ दिन लाहौर में रुककर अब्दाली फिर से अफगानिस्तान लौट गया।

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