Wednesday, May 22, 2024
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6. सभा

शुभ्र हिम से आच्छादित शिखरों की सघन शृंखला ने चारों ओर घूम कर एक दुर्ग की आकृति बना ली है जिसके मध्य उपजाऊ मृदा युक्त भूमि का अच्छा विस्तार है। हिमयुक्त शिखरों पर नृत्यरत प्रातःकालीन सूर्य रश्मियों से पूरा लोक दिव्य आभा से आपूरित है। पर्वतीय शिखरों तथा परुष्णि के विस्तृत तटों पर खड़े देवदारु, अश्वत्थ,[1]  उदुम्बर,[2]  न्यग्रोध,[3]  कर्कंधु, [4] किंशुक, [5] शमी, [6] शाल्मलि, [7] हरिद्र, [8] बदर, [9] प्लक्ष, [10] पीतशाल,[11]  बिल्व, खदिर, [12] शिंशिपा, [13]  कार्श्मर्य, [14] पलाश,[15] विकंकत [16] आदि वृक्षों को स्पर्श करके आने वाला शीतल,सुगंधित और मंद वायु, वैवस्वत् मनु-पुत्रों के जीवन में क्षण-क्षण नवीन उत्साह का संचरण करता हुआ प्रतीत होता है।

सूर्य रश्मियों से तप्त होकर पिघलने वाला ‘हिम’ जल में परिवर्तित होकर विभिन्न धाराओं के रूप में बहता हुआ समतल पर पहुँचते-पहुँचते एक स्थूल प्रवाह में आकर मिल रहा है। यह प्रवाह समतल में कुछ और आगे चलकर जब हिम-शृंखलाओं की पहुँच से पर्याप्त दूर होने लगता है तब तक कई और स्थूल धारायें इसमें आ मिलती हैं और एक विशाल सलिला में परिवर्तित हो जाती हैं। इसी पुण्य सलिला को वैवस्वत मनु-पुत्र परुष्णि कहकर वंदन करते हैं। पुण्य सलिला परुष्णि के तट पर वैवस्वत् मनु-पुत्रों का विशाल जन स्थित है जो ‘तृत्सु,-जन’ के नाम से विख्यात है। इस जन में दस विश हैं। प्रत्येक विश में दस ग्राम हैं तथा प्रत्येक ग्राम में दस कुल हैं। प्रत्येक कुल में कई परिवार हैं तथा परिवारों में प्रपितामह से लेकर पितामह, पिता, पुत्र, पौत्र एवं प्रपौत्रों की पाँच-छः पीढ़ियाँ रहती हैं। सदस्यों की दृष्टि से तो यह एक सम्पन्न जन है ही, धन-धान्य, गौ तथा अश्वादि पालित पशुओं की दृष्टि से भी यह एक शक्तिशाली जन है।

इस जन के आर्य मुख्यतः गौ-चारण और अश्व पालन में ही अपना दिवस व्यतीत करते हैं। कुछ आर्यों ने व्रीही [17] तथा यव के खेतों का निर्माण कर लिया है तो कुछ आर्य विविध शिल्प विद्यायें सीखकर अस्त्र-शस्त्रों तथा लौह-रथों के निर्माण में संलग्न हैं। जन के समस्त कुल एवं परिवार वनस्पति अवशेषों और मृत्तिका से निर्मित शालाओं में रहते हैं। इन पर्ण शालाओं के चारों ओर पंचवटी [18] बनाई गयी हैं। आर्य ललनाओं ने बड़े ही परिश्रम से पर्णशालाओं के बाहर उलप, काश, कुश, तृण, दर्भ, मुंज, दूर्वा, शष्प, शाद, बल्बज, वीरण तथा शुम्बल आदि घासें लगाई हैं। [19] कहीं-कहीं कुमुद, पुष्कर तथा पुंडरीक पुष्पों के कुंज बनाये गये हैं।

यह सही है कि मनु के पूर्वज देव प्रजा के थे। वे अमरावती के भव्य प्रासादों में निवास करते थे किंतु जल प्लावन में विशाल देव लोक के भव्य प्रासादों के नष्ट होने के बाद वैवस्वत मनु और उनकी प्रजा ने भव्य प्रासादों को त्यागकर पर्ण निर्मित कुटियाओं को ही अपने लिये श्रेयस्कर माना। प्रजापति मनु का मानना था कि उन भव्य प्रासादों में सोम पीकर मदमत्त हुए विलासी देवों ने अप्सराओं के संयोग से आसुरि भाव प्राप्त कर लिया था। इसी कारण उन्हें नष्ट हो जाना पड़ा। इसीलिये पक्की ईंटों के विशाल प्रासाद बनाने को आर्य प्रजा आसुरि कर्म समझती है।

तृत्सु जन तथा निकट ही स्थित भरत, जह्नु अनु और भृगु जनों में प्रत्येक प्रकार की संपत्ति ‘व्यक्ति’ अथवा परिवार द्वारा धारण न की जाकर ‘जन’ द्वारा संधारित होती है। इसलिये जन में असुरों और द्रविड़ों की भांति पण्य की प्रथा नहीं है। प्रत्येक आर्य जो कुछ भी उत्पादित अथवा अर्जित करता है उसे बलि के रूप में यज्ञ में प्रदान कर देता है और यज्ञ के पश्चात् प्रत्येक परिवार को यथेष्ट बलिभाग प्राप्त होता है जिससे सब का निर्वहन होता है।

इस समय आर्य-जन ‘सभा’ में संलग्न है। उषा के आगमन के साथ नित्य ही मनुपुत्रों की इस सभा का आयोजन होता है जिसमें मंत्रदृष्टा-ऋषि ‘ऋचाओं’ के दर्शन करते हैं और उन्हें पृथ्वी पर आने का आह्वान करते हैं। सभा में साम-गायन के साथ-साथ विभिन्न यज्ञ भी निर्विघ्न रूप से होते हैं। पुरुषों के साथ-साथ जन की समस्त स्त्रियों को इस सभा में भाग लेना अनिवार्य है। अशक्त और रोगी प्रजा को सभा से अनुपस्थित रहने की अनुमति है। साथ ही वे स्त्री-पुरुष भी सभा से अनुपस्थित रहते हैं जिन्हें उस दिन जन की गौओं और अश्वों को दूर्वा चराने के लिये जाना होता है।

सभा के अंतिम भाग में उपनिषद् का आयोजन होता है जिसमें कोई भी स्त्री-पुरुष अपनी जिज्ञासा प्रकट कर सकता है। मंत्रदृष्टा ऋषिगण प्रत्येक जिज्ञासा का समाधान करते हैं। आज की उपनिषद् में महत्वपूर्ण विमर्श हुआ।

गोप [20] सुरथ ने अपने हृदय में उत्पन्न जिज्ञासा को ऋषियों के समक्ष प्रकट किया- ‘हे ऋषि वृन्द! अग्नि कितने हैं ? सूर्य कितने हैं ? उषा कितने हैं और जल कितने हैं ? हे ज्ञानियों मैं आपसे स्पर्धा का वचन नहीं बोल रहा हूँ, अपने विशेष ज्ञान के लिये पूछ रहा हूँ। जब मैं आपसे पूछ रहा होता हूँ तो सूर्य ईश्वर से पूछ रहा होता है।’ [21]

आर्य सुरथ की जिज्ञासा सुनकर ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने नेत्र बंद किये और फिर उसी स्थिति में बोले- ‘एक ही अग्नि है, वह बहुत प्रकार से प्रज्वलित हुआ है। एक ही सूर्य विश्व भर पर प्रकाशित है। एक ही उषा इस सबको प्रकाशित कर रहा है। यह सब एक ही प्रकार का वैभव है।’[22]

ऋषि उग्रबाहु ने कहा- ‘अग्नि सहस्र सिरों वाला है। वह सकल जगत का निर्माता है और सब ओर से प्रकृति का वरण करता है। वह दसों इंद्रियों के भोग एवं कर्म क्षेत्र से परे है। संसार में सर्वत्र उसी की दर्शन-शक्ति और गति-शक्ति कार्य कर रही है।’ [23]

ऋषि नारायण ने कहा- ‘वही सब कुछ है। वही मोक्ष का स्वामी है। अन्न से बढ़ने वालों का भी स्वामी है।’ [24]

ऋषि पत्नी अदिति ने कहा- ‘अग्नि ही ऋतुओं को प्रकट करने वाले प्रकाश एवं तेज से युक्त है।’ [25]

ऋषि पर्जन्य ने समाधिस्थ अवस्था में उच्चरित किया- ‘विद्वान व्यक्ति जिस यज्ञ को पुरुषार्थ रूपी अग्नि से प्रकट करते हैं उस यज्ञ में वसन्त ऋतु घृत के समान, ग्रीष्म ऋतु जलती लकड़ी के समान और शरद् ऋतु हवि के समान होता है। ऋतुओं के ब्रह्माण्ड में ही सवंत्सर यज्ञ होते हैं। जैसे घृत से अग्नि अधिक दीप्त होता है उसी भांति वसन्त के अनन्तर ग्रीष्म तीव्र हो जाता है। शरत् फलदायी होने के करण हवि के समान है।’ [26]

ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने कहा- ‘अग्नि से ही ऋचाएं तथा साम उपजे हैं। वही छंदों की रचना करता है।’ [27]                

ऋषि उग्रबाहु बोले- ‘अग्नि ने ही विराट रूप धारण करके भूमि को सृजा और उसके बाद ना-ना शरीर उत्पन्न किये।

ऋषि पत्नी अदिति ने इस मंत्र को आगे बढ़ाया- ‘सकल जगत् को अपने में आहुतिवत् लेने वाले यज्ञरूप अग्नि से तृप्तिदायक, सर्व सेचक, वर्धक, प्राणदाता अन्न, घृत, मधु, जल, दुग्ध इत्यादि उपजे हुए हैं। अग्नि ही उन प्राणियों को भी बनाने वाला है जो वायु में उड़ने वाले हैं, वन में रहने वाले सिंह आदि और जो ग्राम के गौ, भैंस आदि पशु हैं।’ [28]

ऋषि पर्जन्य ने भी अन्य ऋषियों के इस मत का समर्थन किया- ‘अग्नि से अश्व पैदा हुए तथा उसी ने वे पशु भी उत्पन्न किये जिनके जबड़ों में दांत हैं। उससे गौ आदि पशु भी उत्पन्न हुए।’ [29]

गोप सुरथ ने पुनः जिज्ञासा प्रकट की- ‘ऋषि वृन्द! मैं ऐसा सोचता हूँ कि वायु अग्नि का सहायक है वह अग्नि के प्रभाव से युक्त होकर वरुण को बांध कर अंतरिक्ष में ले आता है। अग्नि उस वरुण को प्राणियों के हित के लिये पुनः आकाश से नीचे धकेल देता है।’

ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने आर्य सुरथ का समर्थन किया- ‘हे आर्यो! जैसे अग्नि जल को पीकर मेघ के अंक रूप जलबिंदुओं की वर्षा द्वारा औषधि आदि पदार्थों को पुष्ट करके सब की रक्षा करता है, वैसे ही हे असंख्यात् कर्मों के करने वाले शूरवीरो! तुम लोग भी सब रोग और धर्म के विरोधी दुष्ट शत्रुओं को नाश करने वाले होकर इस जगत की रक्षा करने वाले बनो। [30]

ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने अपनी ऋचा पूरी की ही थी कि पूषा तीव्र गति से भागती हुई आई और सभा से क्षमा याचना करती हुई बोली- ‘हे आर्यो! सभा में विघ्न उपस्थित करने के लिये क्षमा चाहती हूँ किंतु आपात् काल में ऐसा करना क्षम्य माना गया है।’

  – ‘क्या हुआ आर्ये ?’ सभा में उपस्थित लगभग सभी वैवस्वत एक साथ बोल उठे।

  – ‘असुर ‘जन’ की समस्त गौओं को हांककर ले जा रहे हैं।’

  – ‘किस दिशा से आये असुर और किस दिशा को गये ?’ गोप सुरथ ऋषियों को प्रणाम करके तत्काल उठ खड़े हुए।

  – ‘आर्य अतिरथ और आर्य सुनील आज जन की समस्त गौओं को परुष्णि के तट पर दक्षिण में स्थित दूर्वा चराने ले गये थे। मैं भी उनके साथ थी। वहीं असुरों का विशाल समूह अचानक झाड़ियों की ओट से प्रकट हुआ और बल पूर्वक गौओं को हाँक कर ले गया। आर्य अतिरथ और आर्य सुनील शस्त्र लेकर असुरों के पीछे गये हैं और मुझे यहाँ सूचना देने के लिये भेजा है। उन्होंने कहा है कि गोप सुरथ समस्त आर्यों को रथों और अश्वों सहित लेकर आयें क्योंकि असुर बड़ी संख्या में एकत्र होकर आये हैं।’

सभा तत्काल विसर्जित कर दी गयी। ऋषिश्रेष्ठ सौम्यश्रवा ने समस्त आर्यों का आह्वान किया कि वे गविष्टि [31] के लिये प्रस्तुत हों। ऋषिश्रेष्ठ के आह्वान पर समस्त आर्य पुरुषों ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र धारण किये। जन के समस्त वृद्धों और बालकों को जन के मध्य में एकत्र किया गया तथा कुछ बलिष्ठ आर्यों एवं जन की समस्त युवतियों को उनकी रक्षा पर तैनात किया गया ताकि असुर पीछे से जन पर आक्रमण करें तो उनका सामना किया जा सके।


[1] पीपल।

[2] गूलर।

[3] बड़

[4] घुमची अथवा गुंजा की बेल

[5] ढाक।

[6] खेजड़ी

[7] सेमर अथवा सेमल, रुईदार वृक्ष

[8] पीतचंदन।

[9] बेर।

[10] पाकर वृक्ष, यह पीपल प्रजाति का वृक्ष है।

[11] विजयसार नामक वृक्ष।

[12] कत्था अथवा खैर।

[13] शीशम।

[14] गंभारी नामक औषधीय वृक्ष।

[15] ढाक।

[16] कण्टकारी नामक वृक्ष।

[17] चावल।

[18] पीपल, वट, बेल, हरड़ और अशोक नामक पाँच वृक्षों के समूह को पंचवटी कहते हैं। कुछ संदर्भ मौलश्री को भी पंचवटी में बताते हैं।

[19] ऋग्वैदिक काल में उलप, काश, कुश, तृण, दर्भ मुंज, दूर्वा शष्प, शाद बल्बज, वीरण, शुम्बल आदि घासें पाई जाती थीं। दर्भ को भूरिमूल, सहस्रपर्ण तथा शतकांड भी कहा गया है। मुंज छाने के काम आती थी। तृण का चढ़ाइ्र पर उगना कहा गया है। शाद हरी मैदानी घास थी। शुम्बल सुगंधित घास थी। दूर्वा के फूलों का भी उल्लेख मिलता है।

[20] गायों की रक्षा के लिये नियुक्त मुख्य योद्धा।

[21] कत्यग्नयः कति सूर्यासः कत्युषासः कत्यु स्विदापः। नोपस्पिजं वः पितरो वदामि प्रच्छामि वः कवयो विद्मने कम्।

[22] एक स्वाग्निर्बहुधा समिद्ध एकः सूर्यो विवमनु प्रभूतः। एक वोषाः सर्वमिदं विभात्येकं वा इदं विबभूव र्सम्।

[23]सहस्रशीर्षा पुरूषः सहस्राक्षः सहस्र पात्। स भूतिं विश्वतो वृत्यात्यतिष्ठद्दशंगुलम्।

[24] पुरूष एवेदं सर्व यद्भूतंयच्च भात्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यद्न्नेनातिरोहति।

[25] प्रजानन्नग्ने तव शेनिमृत्वियमिळयास्पदे घृतवन्तमासदः। आ ते चिकित्र उषसामिवेतयोअ्रेयसः सूर्यस्येव रश्मयः।।

[26] यत्पूयषेण हुविषा देवा यज्ञमतन्वत। वसन्तो अस्यासीदार्ज्ये ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः।

[27] तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचःसामानि जज्ञिरे। छन्दासि जज्ञिरे स्माद्यजुस्तस्मादजायत।।

[28] तस्माद्यज्ञात्वर्सहुतः सम्भृत पृषदाज्यम्। पशुन्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान्ग्राम्याश्रु ये।।

[29] तस्मादश्चा अजायन्त ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः।।

[30] अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वृत्राणामभवः। प्रावो वाजेषु वाजिनम।।

[31] गौओं को शत्रुओं से छुड़वाने के निमित्त जो युद्ध किया जाता था उसे गविष्टि कहते थे।

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