अपने पूर्वजों की तरह अकबर (Akbar) भी मजहबी विचारों में कट्टरता का पालन करता था किंतु राजा बीरबल (Raja Birbal) के प्रभाव से वह गाय एवं गोबर को पवित्र मानने लगा।
अकबर ने टोडरमल (Raja Todarmal) को चार हजार का, मानसिंह को पांच हजार का तथा राजा बीरबल को दो हजार का मनसब दिया था। मनसब की दृष्टि से राजा बीरबल का दर्जा बहुत नीचा था किंतु उसका सम्मान टोडरमल तथा मानसिंह जैसा ही था, अपितु कई मामलों में उनसे भी बढ़कर था।
आज अकबर के साथ बीरबल का नाम एक मसखरे तथा विदूषक की तरह जुड़ गया है किंतु बीरबल विदूषक अथवा मसखरा नहीं था। वह अपने समय का श्रेष्ठ व्यक्ति था जिसे अकबर अंतःपुर में भी अपने साथ रखना पसंद करता था।
मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Mulla Abdul Qadir Badayuni) ने अपनी पुस्तक मुंतखब उत् तवारीख (Muntakhab ut-Tawarikh) में बीरबल को भट्ट एवं ब्रह्मभट्ट की जगह मंगता एवं भाट लिखा है जो जगह-जगह अपनी कविताएं सुनाता हुआ घूमता था। बदायूंनी लिखता है- ‘अकबर को अपने राज्य के प्रथम वर्ष में ही एक मंगता, बरहमन भाट मिल गया जिसका पेशा हिंदुओं का गुनगान करना था।
उसके कारण बादशाह की हालत मन् तू शुदम् तू मन शुदी, मन तन् शुदम् तू जाँ शुदी। अर्थात् मैं तू हो गया, तू मैं हो गया, मैं तन हो गया और तू जान हो गया, जैसी हो गई।’
राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है- ‘अकबर ने अपने दरबारियों के घर जाकर भोजन करने की परम्परा आरम्भ की। जब अकबर उनके घर जाता तो उसके दरबारी, अकबर के स्वागत में अपने घर को खूब सजाते। मखमल, जरबफत कमखाब के पायंदाज बिछाते। बादशाह की सवारी आने पर सोने-चांदी के फूल बरसाते, थाल के थाल मोती निछावर करते।
सवा लाख रुपया नीचे रखकर चबूतरा बांधते जिसके ऊपर बादशाह के बैठने के लिए गद्दी तैयार की जाती। लाल, जवाहर, शाला-दुशाला मखमल जरबफत, कीमती हथियार, सुंदर लौंडियाएं और गुलाम, हाथी-घोड़े तथा लाखों रुपए बादशाह के हुजूर में हाजिर किए जाते।’
लोगों ने राजा बीरबल (Raja Birbal) से कहा कि सब दरबारी अमीर और बेग, बादशाह की दावत करते हैं, तुम भी करो। बीरबल ने उनकी बात मान ली तथा बादशाह को अपने महल में भोजन करने के लिए आमंत्रित किया।
जब अकबर (Badshah Akbar) बीरबल के महल में भोजन करने पहुंचा तो बीरबल ने उसके स्वागत की कोई तैयारी नहीं की तथा बादशाह के आने पर बहुत साधारण भोजन प्रस्तुत किया किंतु बादशाह के सम्मान में ऐसी-ऐसी कविताएं पढ़ीं कि बादशाह वहाँ से बहुत संतुष्ट होकर गया।
बीरबल के घर में मिली साधारण दावत से बादशाह अकबर (AKBAR), राजा बीरबल की निर्धनता को ताड़ गया। उसने बीरबल को एक जागीर देने का निश्चय किया। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी लिखता है कि ई.1572 में अकबर के सेनापति हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) ने नगरकोट एवं कांगड़ा पर विजय प्राप्त की।
बादशाह के घनिष्ट मित्र राजा बीरबल को इस इलाके में एक जागीर दी गई किंतु कुछ ही समय बाद मिर्जा इब्रहीम (Mirza Ibrahim) नामक एक शहजादे ने इस इलाके पर कब्जा कर लिया। इस पर बादशाह अकबर को यह इलाका छोड़ना पड़ा किंतु उसने बीरबल को इस जागीर के बदले में पांच मन सोना देकर संतुष्ट किया।
राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि एक बार एक हाथी बिगड़कर बीरबल की ओर दौड़ा। इस पर बादशाह अपना घोड़ा लेकर उस हाथी और बीरबल के बीच में आ गया। इस कारण हाथी रुक गया और बीरबल की जान बच गई। कुछ समय में बीरबल ने अकबर का इतना विश्वास जीत लिया कि वह अकबर का धार्मिक मामलों में मार्गदर्शन करने लगा।
अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने अपनी पुस्तक अकबरनामा (AKBARNAMA) में बीरबल की प्रशंसा की है जबकि मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अपनी पुस्तक मुंतखब उत् तवारीख में बीरबल की बड़ी निंदा की है।
मुल्ला लिखता है- ‘इस हिन्दू गायक ने अपनी बुद्धि के जोर पर बादशाह का विश्वास जीत लिया। उसने अकबर को इस बात के लिए सहमत कर लिया था कि मनुष्य को उगते हुए सूर्य की ओर देखना चाहिए न कि डूबते हुए सूर्य को। मनुष्य को अग्नि, जल, पहाड़, वनस्पति, गाय तथा गोबर को पवित्र मानना चाहिए तथा जनेऊ समेत इन सब वस्तुओं की पूजा करनी चाहिए। दुष्ट बीरबल के प्रभाव से अकबर प्रतिदिन उस दिन के ग्रह के अनुसार उसी रंग के कपड़े पहनने लगा। उसने गायों को जिबह करना और उनका गोश्त खाना भी बंद करवा दिया। यहाँ तक कि अकबर अपने महल में होम करने लगा और सार्वजनिक रूप से सूर्य एवं अग्नि को नमन करने लगा।’
अकबर (Akbar) के अन्य मुस्लिम मंत्री भी राजा बीरबल (Raja Birbal) को नापसंद करते थे। कहा जाता है कि अपने काम में असफल रहने वाले किसी भी व्यक्ति से अकबर नाराज हो जाता था किंतु वह फैजी, तानसेन तथा बीरबल से कभी भी नाराज नहीं हुआ।
जब अकबर ने दीन-ए-इलाही चलाया तो अकबर के अनेक मुसलमान एवं हिन्दू मंत्रियों ने दीन-ए-इलाही (Din-i Ilahi) मानने से मना कर दिया। फिर भी बहुत से मुसलमान मंत्रियों ने दीन-ए-इलाही स्वीकार कर लिया किंतु हिन्दू मंत्रियों में Raja Birbal अकेला ही था जिसने दीन-ए-इलाही स्वीकार किया था।
Birbal भी अन्य मुसलमान एवं हिन्दू मंत्रियों की तरह बड़ी आसानी से दीन-ए-इलाही अपनाने से मना कर सकता था किंतु उसने मना नहीं किया क्योंकि उन दोनों के मन इतने एक थे कि जो एक ने किया और कहा, वह दूसरे ने माना और अपनाया। दीन-ए-इलाही तो चीज ही क्या थी!
अकबर तथा बीरबल के मैत्री-सम्बन्धों में और भी कई महत्वपूर्ण घटनाएं हैं। ई.1586 में अकबर ने बीरबल को अफगानिस्तान के मोर्चे पर भेजा जहाँ युद्ध के मैदान में ही बीरबल की मृत्यु हो गयी।
उसका शव प्राप्त नहीं किया जा सका। राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि जब अकबर को इस बात का पता लगा तो वह बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोया। उसने दो-तीन दिन तक भोजन नहीं किया। मरियम मकानी ने बहुत समझाया।
तब जाकर अकबर (Akbar) ने रोना-धोना समाप्त किया। अकबर ने बीरबल का शव ढुंढवाया किंतु वह प्राप्त नहीं किया जा सका।
राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि बीरबल के मरने पर अकबर को अत्यंत अधीरता और शोक हुआ जिसे देखकर लोग आश्चर्य करते थे। कितने ही आलिम एवं फाजिल, अनुभवी एवं बहादुर, सरदार और दरबारी अकबर के सामने ही मरे थे किंतु अकबर को किसी के मरने पर उतना दुःख नहीं हुआ जितना बीरबल के मरने पर हुआ!
✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।



