माना जाता है कि अकबर और बीरबल के किस्से उन्नीसवीं सदी में किसी लेखक ने अपनी कल्पना के आधार पर लिखे जिन्हें आगे से आगे विस्तार मिलता गया।
बीरबल (Raja Birbal) अकबर (Badshah Akbar) के दरबार में प्रमुख मंत्री एवं सेनापति था। वह न केवल बादशाह का सलाहकार था अपितु अकबर द्वारा घोषित नवरत्नों में से एक था। बीरबल का वास्तविक नाम महेशदास (Mahesh Das) था। उसका जन्म ई.1528 में महर्षि कवि के वंशज जिझौतिया ब्रह्मभट्ट ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
बीरबल के जन्मस्थान के बारे में बहुत से मत प्रचलित हैं। कुछ विद्वान उन्हें आगरा का, कुछ विद्वान कानपुर के घाटमपुर तहसील का, कुछ विद्वान दिल्ली का, कुछ विद्वान मध्यप्रदेश के सीधी जिले का निवासी बताते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार महेशदास का जन्म राजस्थान के नागौर (Nagaur) कस्बे में हुआ था। अधिकतर विद्वान मध्यप्रदेश के सीधी जिले के घोघरा गाँव को बीरबल का जन्मस्थल मानते हैं।
महेशदास बचपन से ही तीव्र बुद्धि का था। वह विभिन्न भाषाओं में गीत लिखता और उन्हें संगीत की धुन के साथ गाता था। अकबर एवं बीरबल की भेंट के सम्बन्ध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। सबसे प्रचलित कथा के अनुसार एक बार बादशाह अकबर ने अपने पान लगाने वाले सेवक से कहा कि वह बाजार जाकर एक पाव चूना ले आए।
अकबर के सेवक ने महेशदास पनवाड़ी की दुकान पर जाकर कहा कि बादशाह के लिए एक पाव चूना दे दो। जब बीरबल ने अकबर के सेवक की यह बात सुनी तो उसने अचम्भा व्यक्त करते हुए कहा कि आज तक बादशाह ने इतना चूना नहीं मंगवाया। अवश्य ही तेरे द्वारा लगाए गए पान के चूने से बादशाह की जीभ कट गई है।
इसलिए बादशाह यह चूना तुझे ही खिलायेगा। इसलिए तू चूने के साथ इतना ही घी भी ले जा। जब बादशाह चूना खाने को कहे तो चूना खाने के बाद घी पी लेना। इससे तेरी जान नहीं जाएगी।
पनवाड़ी की सलाह पर बादशाह के सेवक ने चूने के साथ घी भी खरीद लिया। जब उसने अकबर को चूना ले जाकर दिया तो अकबर ने सेवक को आदेश दिए कि वह इस चूने को खा ले। सेवक ने चूना खा लिया तथा उसके बाद महेशदास की सलाह के अनुसार घी भी पी लिया।
अगले दिन जब बादशाह का सेवक पुनः पान लेकर अकबर के समक्ष उपस्थित हुआ तो अकबर उसे जीवित देख आश्चर्य चकित हुआ। उसने सेवक से पूछा कि वह चूने खाकर मरा क्यों नहीं?
इस पर अकबर (Akbar) के सेवक ने अकबर को अपने जीवित रहने का कारण बताया तो बादशाह ने महेशदास को अपने दरबार में बुलवाया। इस प्रकार बादशाह अकबर और बीरबल की पहली बार भेंट हुई जो आगे चलकर प्रगाढ़ मैत्री-सम्बन्धों में बदल गई।
कहा नहीं जा सकता कि इस प्रसंग में कितनी सच्चाई है किंतु अकबर और बीरबल (Birbal) के सम्बन्ध में इस तरह की सैंकड़ों कहानियां प्रचलित हैं जिनमें बीरबल की बुद्धिमानी का वर्णन किया गया है। इनमें से कोई भी कहानी किसी भी समकालीन अभिलेख में नहीं मिलती है।
जब किसी ऐतिहासिक पात्र के सम्बन्ध में किम्वदन्तियां जुड़ जाती हैं तो उनमें से इतिहास को ढूंढ पाना कठिन हो जाता है। बीरबल के साथ भी यही हुआ है। माना जाता है कि अकबर और बीरबल के किस्से उन्नीसवीं सदी में किसी लेखक ने अपनी कल्पना के आधार पर लिखे जिन्हें आगे से आगे विस्तार मिलता गया।
ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार महेशदास मध्यप्रदेश के घोघरा गांव में रहता था। उसके पूर्वज संस्कृत के विद्वान थे और कवि कर्म करते थे। अतः ऐसी अवस्था में बीरबल आगरा का का कैसे हो सकता था? वह संस्कृत, हिन्दू, फारसी तथा ब्रज भाषाओं का विद्वान था। ऐसा व्यक्ति पनवाड़ी कैसे हो सकता था?
बीरबल विभिन्न भाषाओं में गीत लिखकर उन्हें संगीत के साथ गाता था जिसके कारण वह दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गया था। अकबर की सेवा में आने से पहले महेशदास पन्ना के राजा रामचंद्र के यहाँ नौकरी करता था जहाँ उसका नाम ब्रह्मकवि था। उसका विवाह एक सम्पन्न परिवार की कन्या से हुआ था। इसलिए उसके पनवाड़ी होने की संभावना बिल्कुल समाप्त हो जाती है।
मान्यता है कि महेशदास पहला हिन्दू था जो अकबर के दरबार (Akbar’s Court) में मंत्री बना। यह भी कहा जाता है कि अकबर ने बादशाह बनने के कुछ दिनों बाद ही महेशदास को अपना मंत्री बना लिया था। उस समय अकबर 14 साल का था और महेशदास की आयु 28 वर्ष थी। महेशदास ने अकबर की तीस साल तक सेवा की।
पाठकों को स्मरण होगा कि संगीत सम्राट कहा जाने वाला तानसेन भी पन्ना के राजा रामचंद्र के दरबार में नौकरी करता था जिसे अकबर ने अपनी सेवा में बुला लिया था। अतः पर्याप्त संभव है कि अकबर को तानसेन के सम्बन्ध में जानकारी महेशदास ने ही दी होगी।
महेशदास स्वभाव से दयालु, विनम्र, बुद्धिमान, कवि-हृदय एवं तुरंत जवाब देने वाला व्यक्ति था। उसकी निश्छल हास्य-प्रियता के कारण अकबर उसे पसंद करने लगा। अकबर ने महेशदास को बीरबल की उपाधि दी।
कुछ लोगों के अनुसार यह उपाधि ‘बिर-बर’ अथवा ‘विर-वर’ थी। तुर्की भाषा में इस शब्द का अर्थ ‘हाजिर-जवाब’ होता है। यही ‘बिर-बर’ शब्द आगे चलकर बीरबल में बदल गया।
कुछ विद्वानों के अनुसार बेताल-पच्चीसी नामक लोक-कथा में वीरवर नामक एक बुद्धिमान पात्र है जो अपने राजा के प्रति अत्यंत निष्ठा का प्रदर्शन करता है। उसी वीरवर के अनुकरण में अकबर ने महेशदास को वीरवर की उपाधि दी जो घिसपिट कर बीरबल हो गई।
अकबर द्वारा दी गई यह उपाधि इतनी प्रसिद्ध हुई कि लोग महेशदास का वास्तविक नाम भूल गए और उसे बीरबल नाम से ही जानने लगे। यद्यपि बीरबल कवि एवं गायक था किंतु अकबर के दरबार में बीरबल की प्रमुख भूमिका सैनिक एवं प्रशासनिक थी।
बीरबल (Raja Birbal) भी मानसिंह (Raja Mansingh) की तरह अकबर का अत्यंत निकटतम मित्र था। अकबर (Shahnshah Akbar) ने बीरबल को कांगड़ा की तरफ एक जागीर भी प्रदान की थी जहाँ वह शायद ही कभी जा पाया था।
जिस तरह टोडरमल (Raja Todarmal) भूराजस्व एवं वित्तीय मामलों का जानकार होते हुए भी सैनिक अभियानों का नेतृत्व करने के लिए भेजा जाता था, उसी प्रकार बीरबल को भी कवि होते हुए भी सैनिक अभियानों का नेतृत्व करने के लिए भेजा जाने लगा।
अकबर ने उसे दो हजार का मनसब प्रदान किया। अकबर बीरबल से इतना प्रसन्न रहता था कि उसने बीरबल को अपने हरम में प्रवेश करने की अनुमति दे रखी थी। यह सम्मान अकबर के अतिरिक्त किसी भी अन्य पुरुष को प्राप्त नहीं था। फतहपुर सीकरी के किले में अकबर ने बीरबल का महल अपने महल के निकट ही बनवाया था जिसे आज भी देखा जा सकता है।



