Wednesday, June 26, 2024
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प्राचीन भारत प्रनोत्तरी-4 : बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धान्त

1. प्रश्न: महात्मा बुद्ध ने कितने सत्य बताए हैं?

उत्तर : चार।

2. प्रश्न: महात्मा बुद्ध के चार सत्यों को क्या कहा जाता है?

उत्तर : चार आर्य-सत्य अथवा चत्वारि आर्य सत्यानि।

3. प्रश्न: बौद्ध धर्म की आधारशिला किसे कहा जाता है?

उत्तर : बौद्ध धर्म की आधारशिला है, उसके चार-आर्य सत्य। बौद्ध धर्म के समस्त सिद्धान्तों का विकास इन्हीं चार आर्य-सत्यों के आधार पर हुआ है।

4. प्रश्न: चार आर्य सत्य अथवा चत्वारि आर्य सत्यानि कौनसे हैं?

उत्तर : (1) सर्वं दुःखम् (2) दुःख समुदयः (3.) दुःख निरोध (4.) दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद्।

5. प्रश्न: सर्वं दुःखम् का क्या अर्थ है?

उत्तर : सर्वं दुःखम् का अर्थ है- हर जगह दुःख है। महात्मा बुद्ध के अनुसार जन्म के साथ कष्ट होता है, रोग कष्टमय है, मृत्यु कष्टमय है, अरुचिकर से संयोग कष्टमय है, सुखकर से वियोग कष्टमय है, जो वासना असंतुष्ट रह जाती है, वह भी कष्टप्रद है। हमारा शरीर कष्टमय है। सुख मनाने से दुःख उत्पन्न होता है। इन्द्रिय-सुख में खो जाने से दुःख उत्पन्न होता है। जीवन दुःखों से परिपूर्ण है। सभी उत्पन्न वस्तुएं दुःख और कष्ट हैं।

इस प्रनोत्तरी का वीडियो देखें-

6. प्रश्न: दुःख समुदयः का क्या अर्थ है?

उत्तर : महात्मा बुद्ध के अनुसार दुःख का कोई न कोई कारण अवश्य होता है। जन्म-मरण के चक्र को चलाने वाली तृष्णा दुःखों का मूल कारण है।

7. प्रश्न: बुद्ध की दृष्टि में तृष्णा कितने प्रकार की है?

उत्तर : तृष्णा तीन प्रकार की है- (1.) काम-तृष्णा- इन्द्रिय सुखों के लिए, (2.) भव-तृष्णा- जीवन के लिए, (3.) विभव-तृष्णा- वैभव के लिए।

8. प्रश्न: तृष्णा दुःखमय क्यों है?

उत्तर : बुद्ध के अनुसार तृष्णा पुनर्भव को करने वाली, आसक्ति और राग के साथ चलने वाली और यत्र-तत्र रमण करने वाली है।

9. प्रश्न : बुद्ध के अनुसार तृष्णा का जन्म कैसे होता है?

उत्तर : रूप, शब्द, गन्ध, रस, स्पर्श तथा मानसिक वितर्क और विचारों से जब मनुष्य आसक्ति करने लगता है तो तृष्णा का जन्म होता है।

10. प्रश्न: प्रश्न बुद्ध की दृष्टि में अविद्या क्या है?

उत्तर : बुद्ध की दृष्टि में सभी दुःख उपाधियों से उत्पन्न होते हैं जो कि अविद्या के कारण हैं। अविद्या, दुःखों का मूल है और जीवैष्णा के कारण है।

11. प्रश्न: दुःख निरोध का क्या अर्थ है?

उत्तर : दुःख निरोध का अर्थ है कि दुःखों का नाश संभव है। जिस प्रकार संसार में दुःख हैं और दुःखों के कारण हैं, उसी प्रकार, दुःखों का नाश भी सम्भव है।

12. प्रश्न : दुःख निरोध कैसे किया जा सकता है?

उत्तर : महात्मा बुद्ध के अनुसार तृष्णाओं के मूलोच्छेदन से दुःखों से छुटकारा मिल सकता है। उनका कहना था- संसार में जो कुछ भी प्रिय लगता है, संसार में जिससे रस मिलता है उसे जो दुःखस्वरूप समझेंगे और उससे डरेंगे वे ही तृष्णा को छोड़ सकेंगे। रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान का विरोध ही दुःख निरोध है।

13. प्रश्न : दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद् से बुद्ध का क्या आशय है?

उत्तर : दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद्  का अर्थ है दुःखनिरोध मार्ग। अर्थात् दुःखों के नाश के उपाय भी हैं।

14. प्रश्न: बुद्ध के अनुसार दुःखों पर विजय कैसे प्राप्त की जा सकीती है?

उत्तर : अष्टांगपथ अथवा आर्य अष्टांगिक मार्ग पर चलकर कोई भी व्यक्ति दुःखों पर विजय प्राप्त कर सकता है। इसमें आठ अंगों की व्यवस्था है।

15. अष्टांगपथ का दूसरा नाम कया है?

उत्तर : इस मार्ग को ‘दुःख निरोधगामिनि प्रतिपद्’ तथा ‘दुःख निरोध मार्ग’ भी कहा जाता है।

16. प्रश्न: अष्टांग मार्ग को अपनाने का क्या लाभ है?

उत्तर : महात्मा बुद्ध के अनुसार अष्टांग मार्ग मनुष्य की आंखें खोलता है और उसे बुद्धि प्रदान करता है। अष्टांग मार्ग मनुष्य को शांति, अन्तर्दृष्टि, उच्चप्रज्ञा और निर्वाण की ओर ले जाता है।

17. प्रश्न: आर्य अष्टांगिक मार्ग क्या है?

उत्तर : इसे अष्टांग पथ भी कहते हैं। अष्टांग पथ ‘बौद्ध धर्म का नीति-शास्त्र’ है। यह मध्यम मार्ग है।

18. प्रश्न: मध्यम मार्ग क्या है?

उत्तर : मध्यम मार्ग में विषयों में आसक्ति रखना और स्वयं को कष्ट देना दोनों का ही निषेध किया गया है। महात्मा बुद्ध ने आध्यात्मिक और नैतिक दोनों दृष्टि से मध्यम मार्ग अपनाया।

19. प्रश्न: मध्यम मार्ग की दो ऐसी सीमाएं कौनसी हैं जिनका अनुसरण कभी नहीं करना चाहिए?

उत्तर : (1.) इन्द्रिय विषयों के सुखों और वासनाओं की पूर्ति का निम्नतम मार्ग।

            (2.) आत्मा को कष्ट देने की आदत।

            ये दोनों ही त्याज्य एवं कष्टमय हैं।

20. प्रश्न: अष्टांग मार्ग अथवा अष्टांगिक मार्ग के आठ अंग कौनसे हैं?

उत्तर : अष्टांगिक मार्ग के आठ अंग इस प्रकार से हैं-

(1.) सम्मादिट्ठि  अर्थात् सम्यक् दृष्टि                      (2.) सम्मा संकप्प अर्थात् सम्यक संकल्प

(3.) सम्मा वाचा अर्थात् सम्यक वाणी                    (4.) सम्मा कम्मन्त अर्थात् सम्यक् कर्मान्त

(5.) सम्मा आजीव अर्थात् सम्यक् आजीव              (6.) सम्मा वायाम् अर्थात् सम्यक् व्यायाम

(7.) सम्मासति अर्थात् सम्यक स्मृति                     (8.) सम्मा समाधि अर्थात् सम्यक् समाधि

21. प्रश्न: सम्मादिट्ठि अथवा सम्यक् दृष्टि क्या है?

उत्तर : अविद्या के कारण संसार तथा आत्मा के सम्बन्ध में मिथ्या दृष्टि प्राप्त होती है। सत्य-असत्य, पाप-पुण्य, सदाचार और दुराचार में भेद करना ही सही सम्यक् दृष्टि है। इसी से चार आर्य सत्यों का सही ज्ञान प्राप्त होता है। यह ज्ञान श्रद्धा और भावना से युक्त होना चाहिए। सम्यक् दृष्टि चारों आर्य सत्यों का ‘सत्’ ध्यान है जो निर्वाण की ओर ले जाता है।

22. प्रश्न: सम्मा संकप्प अथवा सम्यक संकल्प क्या है?

उत्तर : सम्यक् संकल्प का अर्थ इन्द्रिय सुखों से लगाव तथा दूसरों के प्रति बुरी भावनाओं और उनको हानि पहुँचाने वाले विचारों का मूलोच्छेदन करने का निश्चय है। कामना और हिंसा से मुक्त आत्म-कल्याण का पक्का निश्चय ही सम्यक संकल्प है। सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प में परिवर्तित होनी चाहिए।

23. प्रश्न: सम्मा वाचा अथवा सम्यक वाणी क्या है?

उत्तर : सम्यक् संकल्प से हमारे वचनों का नियंत्रण होना चाहिए। सत्य, विनम्र और मृदु वचन तथा वाणी पर संयम ही सम्यक वाणी है। प्रत्येक को अधम्म (अशुभ) से बचकर धम्म (शुभ) ही बोलाना चाहिए। शत्रुता को कठोर शब्दों से नहीं अपितु अच्छी भावनाओं से दूर किया जा सकता है। मन को शांत करने वाला एक हितकारी शब्द हजारों निरर्थक शब्दों से अच्छा है।

24. प्रश्न: सम्मा कम्मन्त अथवा सम्यक् कर्मान्त क्या है?

उत्तर : सब कर्मों में पवित्रता रखना। हिंसा, द्रोह तथा दुराचरण से बचते रहना और सत्कर्म करना ही सम्यक् कर्मान्त है। जीवनाश, चोरी, कामुकता, झूठ, अतिभोजन, सामाजिक मनोरंजन, प्रसाधन, आभूषण धारण करना, आरामदेह बिस्तरों पर सोना तथा सोना चांदी उपयोग में लाना आदि दुराचरणों से बचना ही सम्यक् कर्मान्त है।

25. सम्मा आजीव अथवा सम्यक् आजीव क्या है?

उत्तर : न्यायपूर्ण मार्ग से आजीविका चलाना। जीवन-निर्वाह से निषिद्ध मार्गों का त्याग करना ही सम्यक् आजीव है। अस्त्र-शस्त्र, पशु, गोश्त, शराब और जहर आदि का व्यापार नहीं करना चाहिए। दबाव, धोखा, रिश्वत, अत्याचार, जालसाजी, डकैती, लूट, कृतघ्नता आदि से जीविकोपार्जन नहीं करना चाहिए।

26. प्रश्न: सम्मा वायाम् अथवा सम्यक् व्यायाम क्या है?

उत्तर : इसे सम्यक् प्रयत्न भी कहते हैं। इसका अर्थ है सत्कर्मों के लिए निरन्तर उद्योग करते रहना। इसमें आत्म संयम्, इन्द्रिय निग्रह, शुभ विचारों को जाग्रत करने और मन को सर्वभूतहित पर जमाए रखने का ‘सत्’ प्रयत्न करना शामिल है।

(27.) सम्मासति अथवा सम्यक स्मृति क्या है?

उत्तर : सम्यक् समाधि के लिए सम्यक् स्मृति आवश्यक है। इसमें शरीर की अशुद्धियों, संवेदना, सुख, दुःख और तटस्थ वृत्ति का स्वभाव, लोभ, घृणा और भ्रमयुक्त मन का स्वभाव, धर्म, पंचस्कंधों, इन्द्रियों, इन्द्रियों के विषयों, बोधि के साधनों तथा चार आर्यसत्यों का स्मरण सम्मिलित है। सम्यक् स्मृति का अर्थ शरीर, चित्त, वेदना या मानसिक अवस्था को उनके यथार्थ रूप में स्मरण रखना है। उनके यथार्थ स्वरूप को भूल जाने से मिथ्या विचार मन में घर कर लेते हैं और उनके अनुसार क्रियाएं होने लगती हैं, आसक्ति बढ़ती है और दुःख सहन करना पड़ता है। सम्यक् स्मृति से आसक्ति नष्ट होकर दुःखों से छुटकारा मिलता है तथा मनुष्य सम्यक् समाधि में प्रवेश के योग्य हो जाता है।

28. प्रश्न: सम्मा समाधि अथवा सम्यक् समाधि क्या है?

उत्तर : राग-द्वेष से रहित होकर चित्त की एकाग्रता को बनाए रखना ही सम्यक् समाधि है।

29. निर्वाण तक पहुँचने से पूर्व सम्यक् समाधि की कितनी अवस्थाएं आती हैं?

उत्तर : चार अवस्थाएं आती हैं-

(i.) पहली अवस्था में शांत चित्त से चार आर्य सत्यों पर विचार किया जाता है। विरक्ति तथा शुद्ध विचार अपूर्व आनंद प्रदान करते हैं।

(ii.) दूसरी अवस्था में मनन आदि प्रयत्न दब जाते हैं, तर्क-वितर्क अनावश्यक हो जाते हैं, संदेह दूर हो जाते हैं और आर्य-सत्यों के प्रति निष्ठा बढ़ती है। इस अवस्था में आनंद तथा शांति का अनुभव होता है।

(iii.) तीसरी अवस्था में तटस्थता आती है। मन को आनंद तथा शांति से हटाकर उपेक्षाभाव लाने का प्रयत्न किया जाता है। इससे चित्त की साम्यावस्था रहती है परन्तु समाधि में आनंद के प्रति उदासीनता आ जाती है।

(iv.) चौथी अवस्था पूर्ण शांति की है जिसमें सुख-दुःख नष्ट हो जाते हैं। चित्त की साम्यावस्था, दैहिक सुख और ध्यान का आनंद आदि किसी बात का ध्यान नहीं रहता अर्थात् चित्त-वृत्तियों का निरोध हो जाता है। यह पूर्ण शांति, पूर्ण विराग और पूर्ण निरोध की अवस्था है। इसमें दुःखों का सर्वथा निरोध होकर अर्हंत पद अथवा निर्वाण प्राप्त हो जाता है। यह पूर्ण प्रज्ञा की अवस्था है।

30. प्रश्न: मध्यमा प्रतिपदा क्या है?

उत्तर : दुःख से छुटकारा पाने के लिए महात्मा बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग बताया। वह विशुद्ध आचार-तत्त्वों पर आधारित था। उसमें न तो शारीरिक कष्ट एवं क्लेश से युक्त कठोर तपस्या को उचित बताया गया और न ही अत्यधिक सांसारिक भोग विलास को। वस्तुतः वह दोनों अतियों के बीच का मार्ग था। इसलिए उसे मध्यमा-प्रतिपदा भी कहा गया है। इसके पालन से मनुष्य निर्वाण-पथ की ओर अग्रसर हो सकता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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