Monday, September 20, 2021

अध्याय – 15 : प्रान्तीय राज्यों का उद्भव

केन्द्रीय शक्ति का पराभव

तुगलकों के पराभव तथा मुगलों के उदय के बीच के काल में भारत में अनेक प्रान्तीय राज्यों का उद्भव हुआ। इसका मूल कारण केन्द्रीय शक्ति का कमजोर पड़ जाना था। मुहम्मद बिन तुगलक के समय से ही प्रांतपतियों पर केन्द्रीय शक्ति की पकड़ ढीली पड़ने लगी थी। कई प्रांतपति स्वयं को पूरी तरह स्वतंत्र करने में सफल रहे थे। फीरोज तुगलक के समय यद्यपि सल्तनत के अधीन बचे हुए प्रांतपतियों ने विद्रोह नहीं किये किंतु उन पर केन्द्रीय शक्ति का भय लगभग समाप्त ही हो गया। केन्द्रीय शक्ति के पराभव के कारण, समूचा देश कई छोटे प्रांतीय राज्यों में विभक्त हो गया। इन राज्यों के कभी न खत्म होने वाले युद्धों, लूटमार तथा विध्वंसात्मक कार्यवाहियों से देश में अशान्ति एवं अव्यवस्था व्याप्त हो गई जिससे देश के आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास को गहरा आघात लगा।

बाबर के भारत आगमन के समय प्रांतीय राज्य

बाबर ने अपने आत्मचरित ‘तुजुक-ए-बाबरी’ (बाबरनामा) में लिखा है- ‘उन दिनों जब मैंने हिन्दुस्तान पर विजय प्राप्त की, यहाँ पर पाँच मुसलमान और दो काफिर बादशाह शासन करते थे। वे एक-दूसरे के साथ कोई सम्बन्ध नहीं रखते थे। इस देश में उनके सिवा और भी बहुत से छोटे-छोटे राजा थे। वे राव और राजा के नाम से विख्यात थे। उनकी संख्या बहुत अधिक थी और वे थोड़े-थोड़े स्थानों के अधिकारी थे। इन छोटे राजाओं में से अधिकांश पहाड़ियों पर रहा करते थे। पाँच मुसलमान बादशाहों में पहला था अफगान सुल्तान जिसकी राजधानी दिल्ली थी, दूसरा गुजरात  में सुल्तान मुजफ्फर था, तीसरा मुस्लिम राज्य दक्षिण में बहमनी राज्य था, चौथी मुस्लिम बादशाहत मालवा में थी, पाँचवाँ बादशाह बंगाल में नुसरतशाह था। हिन्दुस्तान के काफिर राज्यों में विस्तार एवं सेना की अधिकता की दृष्टि से सबसे बड़ा विजयनगर का राजा है तथा दूसरा राणा सांगा है।’

बाबर ने प्रान्तीय राज्यों की पूरी सूची नहीं दी है किंतु उस समय भारत में काश्मीर, मुल्तान, पंजाब, सिन्ध, गुजरात, बंगाल, आसाम मालवा, खानदेश, मेवाड़, मारवाड़, उड़ीसा आदि प्रांतीय राज्य प्रमुख थे। दक्षिण में विजयनगर और बहमनी राज्य थे जिनका दिल्ली सल्तनत से अब कोई राजनीतिक सम्पर्क नहीं था। समस्त राज्य अपनी-अपनी सीमाओं को बढ़ाने के लिये प्रायः पड़ौसी राज्यों से लड़ते रहते थे। इस कारण उनकी सीमाएँ निरन्तर घटती-बढ़ती रहती थीं।

बंगाल

बंगाल भारत के अत्यधिक समृद्ध प्रदेशों में से एक था। 1205 ई. में इख्तियारूद्दीन मुहम्मद-बिन-बख्तियार खिलजी ने बंगाल को जीतकर दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित किया था। यद्यपि वह कुतुबुद्दीन ऐबक के अधीन नहीं था किंतु उसने स्वयं को कुतुबुद्दीन के प्रति विश्वसनीय बनाये रखा। उसके बाद बंगाल पर फिर कभी हिन्दुओं का शासन नहीं हो सका।

बंगाल के स्वतंत्र शासक

दिल्ली से अत्यधिक दूर होने के कारण बंगाल के अधिकांश सूबेदारों ने केन्द्रीय सत्ता से सम्बन्ध विच्छेद कर अपनी स्वतन्त्र सत्ता की स्थापना के प्रयास किये। किसी भी सूबेदार के निर्बल होने की स्थिति में अन्य कोई भी ताकतवर व्यक्ति उसे पदच्युत करके सत्ता हथिया लेता था। बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ‘बंगाले की यह बड़ी विचित्र प्रथा है कि राज्य वंशागत अधिकार से बहुत कम प्राप्त होता है। बादशाह का अर्थ उसके राजतख्त से समझा जाता है। बंगाल वाले केवल तख्त तथा पद का सम्मान करते हैं।… जो कोई बादशाह की हत्या करके राजतख्त पर आरूढ़़ हो जाता है, वही बादशाह हो जाता है। बंगाल वालों का कथन है कि हम राजतख्त के भक्त हैं। जो कोई राजतख्त पर आरूढ़ होता है, हम उसके आज्ञाकारी बन जाते हैं।’

अलीमर्दा खाँ: इख्तियारूद्दीन खिलजी की मृत्यु के उपरान्त बंगाल तथा बिहार ने दिल्ली से सम्बन्ध-विच्छेद करने का प्रयत्न किया। अलीमर्दा खाँ ने लखनौती में स्वतंत्रता पूर्वक शासन करना आरम्भ कर दिया परन्तु स्थानीय खिलजी सरदारों ने उसे कैद करके कारागार में डाल दिया और उसके स्थान पर मुहम्मद शेख को शासक बना दिया। अलीमर्दा खाँ कारगार से निकल भागा और दिल्ली पहुँच कर कुतुबुद्दीन ऐबक से, बंगाल में हस्तक्षेप करने के लिए कहा। अलीमर्दा खाँ बंगाल का गवर्नर बना दिया गया। उसने ऐबक की अधीनता स्वीकार कर ली और दिल्ली को वार्षिक कर देने के लिए उद्यत हो गया। अलीमर्दा खाँ ने बंगाल पर बड़ी निर्दयता तथा निरंकुशता से शासन किया और कुतुबुद्दीन ऐबक के मरते ही अलाउद्दीन का विरुद धारण करके अपने आप को स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया।

गयासुद्दीन खिलजी: इल्तुतमिश के समय में हिसामुद्दीन इवाज, सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी की उपाधि धारण करके बंगाल में शासन कर रहा था। 1225 ई. में इल्तुतमिश ने बंगाल पर आक्रमण किया। गयासुद्दीन ने निर्विरोध इल्तुतमिश के आधिपत्य को स्वीकार कर लिया और बिहार पर अपने अधिकार को त्याग दिया। इल्तुतमिश संतुष्ट होकर लौट गया परन्तु उसके दिल्ली पहुँचते ही गयासुद्दीन ने फिर से स्वयं को बंगाल का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और बिहार पर अधिकार कर लिया। इस पर इल्तुतमिश ने 1226 ई. में अपने पुत्र नासिरुद्दीन महमूद को जो उन दिनों अवध का गवर्नर था, बंगाल पर आक्रमण करने के लिए भेजा। नासिरुद्दीन ने लखनौती पर अधिकार स्थापित करके गयासुद्दीन को मरवा डाला।

नासिरुद्दीन महमूद: इल्तुतमिश ने अपने पुत्र नासिरुद्दीन महमूद को बंगाल का गवर्नर नियुक्त किया। नासिरुद्दीन ने बंगाल में शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित करने का काफी प्रयास किया। आगे चलकर जब नासिरुद्दीन दिल्ली के तख्त पर बैठा तो उसके पूरे शासन काल में लखनौती में गड़बड़ी व्याप्त रही। उसके बीस वर्षीय शासन में लखनौती में सात-आठ शासक हुए। नासिरुद्दीन दिल्ली की समस्याओं में उलझे रहने से बंगाल में स्थायी रूप से अपना शासन स्थापित नहीं कर सका।

अलाउद्दीन जैनी: इल्तुतमिश ने 1230 ई. में पुनः बंगाल पर आक्रमण किया और फिर से बंगाल पर अधिकार करके अलाउद्दीन जैनी को वहाँ का गवर्नर नियुक्त किया। 1243 ई. में जाजनगर के राय ने बंगाल पर आक्रमण कर दिया जिससे वहाँ पर बड़ी गड़बड़ी फैल गई।

तुगरिल खाँ: बंगाल के सूबेदार तुगरिल खाँ ने दिल्ली से सम्बन्ध विच्छेद करके अवध पर आक्रमण कर दिया। इस पर जाजनगर के राजा ने तुगरिल खाँ का सामना किया तथा उसे परास्त कर दिया। तुगरिल खाँ ने बलबन से सहायता मांगी। इस पर बलबन को बंगाल में कार्यवाही करने का अवसर मिल गया। बलबन ने तुगरिल खाँ पर आक्रमण करके उससे युद्ध का हरजाना मांगा। इस पर तुगरिल खाँ ने अवध की जागीर बलबन को दे दी तथा स्वयं दिल्ली के अधीन हो गया। 1279 ई. में बलबन बीमार पड़ा। इससे प्रेरित होकर तुगरिल खाँ ने स्वयं को फिर से स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और सुल्तान मुगसुद्दीन की उपाधि धारण की। उसने अपने नाम की मुद्रायें भी चलाई और अपने नाम से खुतबा भी पढ़वाया। तुगरिल खाँ के इस व्यवहार से सुल्तान को बड़ी चिन्ता हुई, उसने तुगरिल के विरुद्ध कई बार सेनाएँ भेजीं परन्तु सफलता प्राप्त नहीं हुई। अन्त में सुल्तान अपने पुत्र बुगरा खाँ को साथ लेकर एक विशाल सेना के साथ बंगाल के लिए चल दिया। तुगरिल खाँ भयभीत होकर अपने कुछ साथियों के साथ जाजनगर के जंगलों में चला गया। लखनौती पर सुल्तान का अधिकार स्थापित हो गया। बड़ी खोज के बाद तुगरिल खाँ पकड़ा गया। उसका सिर काटकर नदी में फेंक दिया गया और स्त्रियों तथा बच्चों को कैद कर लिया गया। सुल्तान ने तुगरिल खाँ के साथियों तथा सम्बन्धियों को भी कठोर दण्ड दिया। लखनौती में तीन दिन तक निरन्तर हत्याकाण्ड चलता रहा।

बुगरा खाँ: विद्रोहियों का दमन करने के उपरान्त बलबन ने बंगाल का शासन प्रबन्ध अपने पुत्र बुगरा खाँ को सौंप दिया। उसने शहजादे को चेतावनी दी कि यदि वह दुष्टों के कहने में आकर विद्रोह करेगा तो उसकी वही दशा होगी जो तुगरिल खाँ की हुई थी। बलबन की मृत्यु के बाद 1282 ई. में बुगरा खाँ ने बंगाल में एक नये वंश की स्थापना की जो दिल्ली से लगभग स्वतंत्र होकर शासन करता रहा। खिलजियों के समय में बंगाल स्वतंत्र राज्य बना रहा। अलाउद्दीन खलजी ने बंगाल पर कोई चढ़ाई नहीं की।

नासिरूद्दीन: गयासुद्दीन तुगलक के समय में बंगाल में शमसुद्दीन के तीन पुत्रों- शिहाबुद्दीन, गयासुद्दीन बहादुर तथा नासिरूद्दीन में उत्तराधिकार का युद्ध हुआ। इस झगड़े में गयासुद्दीन बहादुर को सफलता प्राप्त हुई। उसने अपने भाइयों शिहाबुद्दीन तथा नासिरूद्दीन को लखनौती से मार भगाया और स्वयं को बंगाल का सुल्तान घोषित कर दिया। शिहाबुद्दीन तथा नासिरूद्दीन ने सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। गयासुद्दीन ने उनका अनुरोध स्वीकार कर बंगाल पर आक्रमण किया। बंगाल के सुल्तान गयासुद्दीन बहादुर ने दिल्ली के सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक का सामना किया परन्तु परास्त हो गया और कैद कर लिया गया। गयासुद्दीन तुगलक ने नासिरूद्दीन को लखनौती का शासक बना दिया। इस प्रकार बंगाल पर फिर से दिल्ली सल्तनत का अधिकार स्थापित हो गया।

फखरूद्दीन: मुहम्मद बिन तुगलक के समय पूर्वी बंगाल में बहराम खाँ शासन कर रहा था। उसके अंगरक्षक फखरूद्दीन ने 1337 ई. में उसकी हत्या कर दी और स्वयं पूर्वी बंगाल का शासक बन गया। दिल्ली साम्राज्य की दशा को देखकर उसने स्वयं को बंगाल का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और अपने नाम की मुद्राएँ चलाने लगा। सुल्तान की असमर्थता के कारण बंगाल स्वतंत्र हो गया।

शम्सुद्दीन इलियास : 1345 ई. में हाजी इलियास ‘शम्सुद्दीन इलियास’ के नाम से बंगाल का शासक बना। उसके काल में फीरोज तुगलक ने बंगाल को पुनः अधिकार में लाने का प्रयास किया किन्तु वह बंगाल को जीतने के बाद मुस्लिम स्त्रियों का करुण क्रंदन सुनकर बंगाल पर अपना अधिकार किये बिना ही लौट गया।

सिकन्दर: 1357 ई. में इलियास की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सिकन्दर बंगाल का सुल्तान बना। उसके समय में भी फीरोज तुगलक ने बंगाल पर आक्रमण किया परन्तु इस बार भी फिरोज को निराश होकर वापस दिल्ली लौटना पड़ा। सिकन्दरशाह ने अपनी नई राजधानी पंडुवा में अनेक भव्य भवनों का निर्माण करवाया। उसके बाद गियासुद्दीन आजम सुल्तान बना। वह एक योग्य शासक था। 1410 ई. में उसकी मृत्यु के बाद सैफुद्दीन इम्जाशाह सुल्तान बना। वह एक निर्बल शासक सिद्ध हुआ।

गणेश तथा उसके वंशज: पंद्रहवीं शताब्दी के आरम्भ में एक हिन्दू राजा गणेश ने बंगाल के तख्त पर कब्जा कर लिया। गणेश के पुत्र जादू ने इस्लाम धर्म स्वीकार करके जलालुद्दीन मुहम्मद शाह की उपाधि धारण की। उसने 1431 ई. तक शासन किया। उसके बाद तीन-चार निर्बल शासकों ने बंगाल पर शासन किया।

नासिरूद्दीन: गणेश के निर्बल वंशजों के बाद नसिरूद्दीन बंगाल का सुल्तान बना जिसने 17 वर्ष तक बंगाल पर शासन किया।

विभिन्न शासक: 1460 ई. में उसकी मृत्यु के बाद बारबकशाह सुल्तान बना। बारबकशाह के बाद शम्मसुद्दीन युसुफशाह ने 1481 ई. तक बंगाल पर शासन किया। उसके उत्तराधिकारी सिकन्दर द्वितीय को पदच्युत करके जलाजुद्दीन फतेहशाह नया सुल्तान बना परन्तु 1486 ई. में उसके हब्शी गुलामों के नेता बारबकशाह ने उसे मौत के घाट उतार कर तख्त पर कब्जा कर लिया। इसी प्रकार, 1490 ई. में एक अन्य हब्शी सिद्दी बद्र ने सुल्तान महमूदशाह द्वितीय को मौत के घाट उतार कर तख्त पर अधिकार कर लिया।

अलाउद्दीन हुसैनशाह: 1493 ई. में अलाउद्दीन हुसैनशाह बंगाल का सुल्तान बना। उसके वंशजों ने लगभग 50 वर्ष तक बंगाल पर शासन किया। 1494 ई. में अलाउद्दीन ने जौनपुर के भगोड़े शासक हुसैन को अपने यहाँ आश्रय प्रदान किया। इस कारण उसका सिकन्दर लोदी के साथ संघर्ष हो गया परन्तु अंत में दोनों पक्षों के मध्य सन्धि हो गई जिसके अनुसार बिहार की पूर्वी सीमा दोनों राज्यों के बीच की सीमा निश्चित कर दी गई। अलाउद्दीन हुसैनशाह ने उड़ीसा तक अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। उसने मगध तथा कूच बिहार में स्थित कामतपुर पर आक्रमण कर उसे जीत लिया।

नासिरूद्दीन नुसरतशाह: 1518 ई. में अलाउद्दीन हुसैनशाह की मृत्यु के उपरान्त उसका पुत्र नासिरूद्दीन नुसरतशाह के नाम से तख्त पर बैठा। वह भी अपने पिता की भाँती भला तथा सफल शासक हुआ। उसने तिरहुत राज्य को जीतकर अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया। नुसरतशाह को बंगला साहित्य और भवन-निर्माण में गहरी रुचि थी। उसने बड़ी सोना मस्जिद और जामा मस्जिद का निर्माण करवाया और महाभारत का बंगला भाषा में अनुवाद करवाया। बाबरनामा के अनुसार बंगाल का यह मुसलमानी राज्य तत्कालीन हिन्दुस्तान में बड़ा शक्तिशाली और सम्मानित गिना जाता था। वी.ए. स्मिथ ने लिखा है- ‘नुसरतशाह नाम अब भी समस्त बंगाल में सुपरिचित है। उसके चौबीस वर्ष के शासनकाल में कोई विद्रोह अथवा उपद्रव नहीं हुआ। उसका शासन शान्तिपूर्ण तथा सुखमय रहा, प्रजा उससे प्रेम करती थी तथा पड़ौसी उसका सम्मान करते थे।’ बाबर के आक्रमण के समय यही नुसरतशाह बंगाल का सुल्तान था।

गुजरात

महमूद गजनवी ने सोमनाथ के मन्दिर को लूटकर अथाह सम्पत्ति प्राप्त की थी तब से हर मुसलमान शासक गुजरात को लूटने के लिए लालायित रहता था। दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों द्वारा गुजरात पर कई आक्रमण किये गये। 1297 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने गुजरात को दिल्ली सल्तनत में मिलाने में सफलता प्राप्त की। इसके बाद लगभग एक शताब्दी तक गुजरात दिल्ली सल्तनत के अधीन बना रहा।

जफर खाँ: 1391 ई. में नासिरुद्दीन मुहम्मद तुगलक ने जफर खाँ को गुजरात का सूबेदार नियुक्त किया। तैमूर के आक्रमण के समय जफर खाँ ने स्वयं को दिल्ली के प्रभुत्व से मुक्त कर लिया तथा मुजफ्फरशाह के नाम से गुजरात का स्वतंत्र शासक बन गया। मध्ययुगीन हिन्दू राज्यों की भाँति गुजरात के नये मुस्लिम राजवंश का इतिहास भी पड़ौसी राज्यों के विरुद्ध संघर्ष से भरा पड़ा है।

अहमदशाह: कुछ दिनों बाद मुजफ्फरशाह के नाती अहमदशाह ने उसे विष देकर मार डाला और स्वयं सुल्तान बन गया। उसने 1411 ई. से 1442 ई. तक शासन किया। डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव अहमदशाह की गणना गुजरात के महानतम शासकों में करते हैं। उसने मालवा, असीरगढ़, राजस्थान तथा अन्य पड़ौसी राज्यों के विरुद्ध युद्ध लड़े और राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। अपने सम्पूर्ण राज्यकाल में उसने कभी हार नहीं खाई। उसने अहमदाबाद के वैभवशाली नगर की नींव डाली। वह धर्मान्ध शासक था और अपनी गैर-मुस्लिम प्रजा के साथ उसका व्यवहार असहिष्णुतापूर्ण था। उनके धार्मिक स्थलों एवं मूर्तियों को नष्ट करना उसके लिए सामान्य बात थी। उसकी मृत्यु के बाद तीन-चार निर्बल शासक हुए।

महमूद बेगड़ा: 1458 ई. में अहमदशाह का एक पौत्र अब्दुल फतेह खाँ ‘महमूदशाह’ की उपाधि धारण करके गुजरात के तख्त पर बैठा। इतिहास में वह ‘महमूद बेगड़ा’ के नाम से विख्यात है। वह वीर, योद्धा, महान् विजेता तथा सफल शासक था। उसने 53 वर्ष तक शासन किया। उसने चम्पानेर, बड़ौदा, जूनागढ़, कच्छ आदि कई क्षेत्रों पर अधिकार जमा लिया। भारतीय शासकों में वह पहला शासक था जिसने विदेशी शक्तियों की बढ़ती सामुद्रिक शक्ति के खतरे को गम्भीरता से महसूस किया और तुर्की तथा कालीकट के हिन्दू राजा के साथ मिलकर 1507 ई. में चौल बन्दरगाह के निकट पुर्तगालियों को पराजित किया। 1509 ई. में पुर्तगालियों ने ड्यू के निकट गुजरात और कालीकट की संयुक्त सेना को परास्त कर भारतीय समुद्र पर पुनः अपना दबदबा कायम कर लिया। 1509 ई. में महमूद बेगड़ा की मृत्यु हो गई। एक मुस्लिम इतिहासकार ने उसके बारे में लिखा है- ‘उसने गुजरात राज्य के प्रताप तथा ऐश्वर्य की वृद्धि की, वह अपने से पहले और बाद के समस्त सुल्तानों में श्रेष्ठ है।’

मुजफ्फरशाह (द्वितीय): बेगड़ा की मृत्यु के बाद उसका पुत्र मुजफ्फरशाह (द्वितीय) सुल्तान बना। उसने मेदिनीराय को परास्त करके महमूद खलजी को पुनः मालवा के तख्त पर बैठाया। इसलिये उसे महाराणा सांगा से युद्ध करना पड़ा जिसमें मुजफ्फरशाह परास्त हुआ। अप्रैल 1526 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

निर्बल शासक: मुजफ्फरशाह (द्वितीय) के बाद सिकन्दर और महमूद (द्वितीय) नामक अयोग्य एवं निर्बल शासक हुए जिससे गुजरात में अशान्ति फैल गई और राज्य  शक्ति भी कमजोर हो गई।

बहादुरशाह: जुलाई 1526 में मुजफ्फरशाह (द्वितीय) का एक अन्य पुत्र बहादुरशाह सुल्तान बना। वह योग्य तथा महत्त्वाकांक्षी शासक था। उसने गुजरात को पुनः सबल बनाया तथा देश की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। बाबर के आक्रमण के समय बहादुरशाह ही गुजरात पर शासन कर रहा था।

मालवा

1310 ई. में अलाउद्दीन खलजी ने मालवा को जीतकर दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित किया था। तैमूर के आक्रमण के समय यह प्रदेश दिल्ली सल्तनत से स्वतन्त्र हो गया और मालवा का सूबेदार दिलावर खाँ गोरी स्वतन्त्र शासक बन गया।

गोरी वंश: गोरी खाँ तथा उसके वंशजों ने 1401 ई. से 1436 ई. तक मालवा पर शासन किया। उसका वंश गोरी वंश कहलाता है। 1406 ई. में दिलावर खाँ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अलपखाँ, हुसंगशाह के नाम से मालवा का सुल्तान बना। वह वीर, साहसी पराक्रमी तथा साहसी शासक था। उसने उड़ीसा, दिल्ली, गुजरात, जौनपुर तथा बहमनी राज्यों के विरुद्ध युद्ध किये परन्तु इन युद्धों से मालवा को विशेष लाभ नहीं हुआ। उसने माण्डू को अपनी राजधानी बनाया। माण्डू दुर्ग-रक्षित नगर था तथा एक ऊँची पहाड़ी पर बना हुआ था। अब उसके केवल भग्नावशेष बचे हैं, जो  सुन्दर जामी मस्जिद, हिंडोला महल, जहाज महल, हुसंग का मकबरा, बाजबहादुर तथा रूपमती के महल तथा अन्य सुन्दर भवनों के लिए विख्यात हैं। 1435 ई. में हुसंगशाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र गाजी खाँ ‘महमूदशाह’ के नाम से मालवा का सुल्तान हुआ। वह एक अयोग्य शासक था। उसमें अपने प्रतिद्वंद्वियों का सामना करने की शक्ति नहीं थी।

खलजी वंश: 1436 ई. में सुल्तानद महमूदशाह गोरी को उसके वजीर महमूद खाँ खलजी ने जहर देकर मार डाला और मालवा के तख्त पर अधिकार कर लिया। महमूद खाँ खलजी ने 33 वर्ष शासन किया। उसका वंश खिलजी वंश कहलाता है। उसके वंशजों ने 1531 ई. तक मालवा पर शासन किया। महमूद खाँ खलजी का अधिकांश समय गुजरात, दिल्ली, बहमनी और मेवाड़ के शासकों से लड़ने में व्यतीत हुआ। इतिहासकार श्रीराम शर्मा के शब्दों में- ‘सम्भवतः ही कोई ऐसा वर्ष बीता हो जबकि वह युद्ध क्षेत्र में न उतरा हो। इसलिये उसका शिविर उसका घर तथा युद्ध भूमि उसका विश्रामगृह बन गई।’ परिणामस्वरूप उसके राज्य की सीमाएँ दक्षिण में सतपुड़ा तक, पश्मिच में गुजरात की सीमाओं तक, पूर्व में बुन्देलखण्ड तक और उत्तर में मेवाड़ तथा बून्दी राज्य तक जा पहुँची। सुल्तान महमूद विनम्र, वीर, न्यायप्रिय तथा विद्वान शासक था। उसके शासनकाल में हिन्दू तथा मुसलमान समस्त जनता सुखी थी और एक-दूसरे के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करती थी।

1469 ई. में सुल्तान महमूद की मृत्यु के बाद उसका पुत्र गियासुद्दीन के नाम से मालवा के तख्त पर बैठा। वह अत्यधिक भोग-विलासी था। उसके हरम में लगभग 15,000 स्त्रियां थी। 1500 ई. में उसी के पुत्र नासिरूद्दीन ने उसे जहर देकर मार डाला और तख्त पर अधिकार कर लिया। वह भी अपने पिता की तरह व्याभिचारी तथा प्रजा पीड़क था। 1510 ई. में एक दिन मदिरा के नशे में एक झील में गिर जाने से उसकी मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका पुत्र महमूद (द्वितीय) मालवा का सुल्तान बना। उसके समय में मालवा शीघ्रता से पतन की ओर अग्रसर हुआ। उसके हिन्दू प्रधानमंत्री को मुसलमान अमीरों ने मार डाला। उसका दूसरा मंत्री मुहाफिज खाँ, जो खाण्डू का सूबेदार भी था, अत्याचारी निकला। इस कारण चारों ओर से विद्रोह फूट पड़े। शीघ्र ही मालवा में तीन सुल्तान हो गये जिन्होंने एक-दूसरे को चुनौती दी। अन्त में, चन्देरी के मेदिनीराय की सहायता से महमूद (द्वितीय) को अपने प्रतिद्वन्द्वियों को मार भगाने में सफलता मिली परन्तु उसे इसका भारी मूल्य चुकाना पड़ा। अब शासन पर मेदिनीराय का वास्तविक अधिकार हो गया। उसने राज्य के महत्त्वपूर्ण पदों पर अपने विश्वस्त हिन्दुओं को नियुक्त किया जिसके कारण से मालवा के स्थानीय मुस्लिम सरदारों में जबरदस्त असंतोष उत्पन्न हुआ। उन्होंने गुजरात के मुस्लिम सुलतान से साँठ-गाँठ करके मेदिनीराय को उखाड़ फेंकने का निश्चय किया परन्तु मेदिनीराय ने मेवाड़ के महाराणा सांगा से सहयोग लेकर गुजरात एवं मालवा के विद्रोही मुस्लिम सरदारों की सेनाओं को परास्त करके खदेड़ दिया। मालवा का सुल्तान बन्दी बना लिया गया। महाराणा सांगा ने उदारता दिखाते हुए कुछ दिनों बाद सुल्तान महमूद (द्वितीय) को रिहा कर उसका राज्य भी उसे वापस लौटा दिया। 1531 ई. में गुजरात के बहादुरशाह ने मालवा को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया। महमूद तथा उसके पुत्रों को चम्पानेर में बंदी बनाकर रखने का आदेश दिया गया परन्तु मार्ग में ही उनका वध कर दिया गया। इस प्रकार प्रांतीय राज्य मालवा की स्वतंत्र सत्ता का अंत हो गया।

खानदेश

फीरोजशाह तुगलक के समय में मध्य भारत में ताप्ती नदी की घाटी में स्थित खानदेश दिल्ली का एक सूबा था।

मलिक राजा फारूकी: फिरोजशाह तुगलक ने मलिक राजा फारूकी को खानदेश का सूबेदार नियुक्त किया। फीरोजशाह की मृत्यु के बाद केन्द्रीय सत्ता के कमजोर पड़ते ही फारूकी ने दिल्ली से सम्बन्ध विच्छेद कर लिये तथा स्वयं को खानदेश का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया। कुछ समय बाद ही उसे गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह (प्रथम) से युद्ध करना पड़ा जिसमें वह परास्त हुआ। 1399 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

मलिक नासिर: मलिक राजा फारूकी के बाद उसका लड़का मलिक नासिर सुल्तान बना। उसने असीरगढ़ को जीता किन्तु उसे गुजरात के सुल्तान अहमदशाह से परास्त होकर उसकी प्रभुसत्ता को स्वीकार करना पड़ा। बहमनी सुल्तान के हाथों भी उसे पराजय का स्वाद चखना पड़ा। 1438 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। उसके दो उत्तराधिकारी अयोग्य निकले।

आदिल खाँ (द्वितीय): 1457 ई. में आदिल खाँ (द्वितीय) खानदेश का सुल्तान बना। वह योग्य तथा पराक्रमी शासक था। उसने एक तरफ तो गोंडवाना को जीतकर अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया और दूसरी तरफ प्रशासनिक सुधारों को लागू कर शासन व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया।

दाऊद: 1501 ई. में आदिल खाँ (द्वितीय) की मृत्यु के बाद उसका भाई दाऊद खानदेश का सुल्तान बना परन्तु 1508 ई. में उसका देहान्त हो गया और उसका पुत्र गाजी खाँ खानदेश का सुल्तान बना परन्तु एक सप्ताह बाद ही उसे जहर देकर मार दिया गया।

आदिल खाँ (तृतीय): दाऊद की मृत्यु के बाद खानदेश के तख्त के दो दावेदार उठ खड़े हुए। एक दावेदार का पक्ष अहमदनगर के सुल्तान ने लिया तो दूसरे दावेदार का समर्थन गुजरात के सुल्तान ने किया। अन्त में गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा समर्थित दावेदार आदिल खाँ (तृतीय) के नाम से खानदेश का शासक हुआ। उसे गुजरात के करद शासक की भाँति शासन करना पड़ा।

महमूद (प्रथम): 1520 ई. में आदिल खाँ (तृतीय) की मृत्यु के बाद उसका पुत्र महमूद (प्रथम) सुल्तान बना। वह भी गुजरात की अधीनता में रहा। उसमें न तो शक्ति थी और न योग्यता।

डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘दिल्ली से दूर होने तथा इसकी आन्तरिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण इस युग की राजनीति में खानदेश का कोई महत्त्वपूर्ण स्थान नहीं रहा।’

काश्मीर

कश्मीर में 1399 ई. तक हिन्दू शासक का शासन था। 1399 ई. में काश्मीर के हिन्दू शासक रामचन्द्र की उसके मन्त्री शाह मिर्जा ने हत्या कर दी और स्वयं स्वतंत्र शासक बन गया।

जैनुलओबेदीन: शाह मिर्जा के वंश में 1420 ई. में जैनुलओबेदीन नामक शासक हुआ जो अपने पूर्ववर्ती शासकों की अपेक्षा अधिक उदार और धर्म सहिष्णु शासक था। जैनुलओबेदीन के अन्य राज्यों के मुसलमान बादशाहों और हिन्दू राजाओं के साथ अच्छे सम्बन्ध थे। उसने हिन्दू जनता पर से जजिया कर हटा दिया तथा गौ-वध का निषेध कर दिया। वह काश्मीरी, फारसी, हिन्दी और तिब्बती भाषाओं का विद्वान था। उसने महाभारत तथा राजतरंगिणी नामक संस्कृत ग्रंथों का फारसी भाषा में अनुवाद कराया। अनेक फारसी ग्रन्थों का हिन्दी में अनुवाद कराया। उसने अपने राज्य में शान्ति एवं व्यवस्था कायम की तथा जनता पर करों का बोझ कम किया। उसके शासन काल में काश्मीर की असाधारण भौतिक उन्नति हुई। 1470 ई. में जैनुलओबेदीन की मृत्यु हो गई।

हैदरशाह: जैनुलओबेदीन के बाद उसका पुत्र हैदरशाह काश्मीर का सुल्तान बना। उसने अपने पिता की धर्म सहिष्णु नीतियों को जारी रखा।

हैदरशाह के उत्तराधिकारी: हैदरशाह के उत्तराधिकारी निर्बल तथा अयोग्य निकले। परिणामस्वरूप काश्मीर में अराजकता फैल गई और मुस्लिम सरदार अनेक गुटों में बँट गये। सुल्तान इन सरदारों के हाथ की कठपुतली बन कर रह गया। दिल्ली से बहुत दूर स्थित होने और साथ ही आन्तरिक अवस्था बिगड़ी हुई होने के कारण उत्तरी भारत की राजनीति में काश्मीर कोई विशेष भूमिका अदा नहीं कर पाया।

मिर्जा हैदर: 1540 ई. में मुगल बादशाह हुमायूं के एक सम्बन्धी मिर्जा हैदर ने काश्मीर पर अधिकार जमा लिया परन्तु एक दशक के बाद ही काश्मीरी सरदारों ने उसे पदच्युत कर दिया। अन्त में 1586 ई. में मुगल बादशाह अकबर ने काश्मीर को जीतकर मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया।

जौनपुर

1359-60 ई. में फीरोज तुगलक ने इस नगर की नींव डाली थी। गोमती नदी पर स्थित यह नगर शीघ्र ही उन्नति पर पहुँच गया और कुछ समय के लिये तो दिल्ली के बराबर स्तर पर आ गया।

मलिक सरवर: जौनपुर के स्वतंत्र राज्य का संस्थापक मलिक सरवर, फीरोज तुगलक के पुत्र सुल्तान मुहम्मद का गुलाम था जो अपनी योग्यता से 1389 ई. में सल्तनत का वजीर बना। सुल्तान मुहम्मद ने उसे ‘मलिक-उस-शर्क’ (पूर्व का स्वामी) की उपाधि से विभूषित किया। 1394 ई. में उसे दोआब का विद्रोह दबाने के लिए भेजा गया। उसने उस विद्रोह को ही नहीं दबाया अपितु अलीगढ़ से लेकर बिहार में तिरहुत तक के सम्पूर्ण प्रदेश पर अपना अधिकार कर लिया। उसने इस क्षेत्र में शान्ति एवं व्यवस्था कायम की तथा अपनी शक्ति को सुदृढ़ बनाया। यद्यपि उसने स्वयं को कभी सुल्तान घोषित नहीं किया किंतु वह एक स्वतंत्र शासक की भाँति व्यवहार करने लगा। तैमूर के आक्रमण के समय उसने अपने स्वामी सुल्तान महमूद को कोई सहायता नहीं भेजी। 1399 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। उसके पीछे उसका वंश शर्की-वंश कहलाया।

मुबारकशाह: मलिक सरवर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र मुबारकशाह जौनपुर के तख्त पर बैठा। उसने सुल्तान की उपाधि धारण की और अपने नाम का खुतबा भी पढ़वाया। सुल्तान महमूद के वजीर मल्लू इकबालखाँ ने जौनपुर को जीतने का अथक प्रयास किया परन्तु उसे सफलता नहीं मिली। 1402 ई. में मुबारकशाह की मृत्यु हो गई।

इब्राहीमशाह: मुबारकशाह का उत्तराधिकारी इब्राहीमशाह शर्की वंश का महानतम शासक हुआ। उसने 35 वर्ष राज्य किया। उसके समय में दिल्ली और जौनपुर के सम्बन्धों में कटुता आ गई। सैय्यद सुल्तानों के साथ भी उसके सम्बन्ध खराब रहे। इसका मुख्य कारण दोनों राज्यों की विस्तारवादी नीति थी। इब्राहीमशाह ने बंगाल को जीतने का प्रयास किया परन्तु उसे कोई सफलता नहीं मिली। इब्राहीमशाह  सांस्कृतिक दृष्टि से जौनपुर को उन्नति की ओर ले जाने में सफल रहा। उसके समय में जौनपुर उत्तरभारत का एक महान् सांस्कृतिक केन्द्र बन गया। उसने विद्वानों को उदारतापूर्वक आश्रय प्रदान किया जिन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना की। इब्राहीमशाह ने अनेक भव्य भवनों का निर्माण करवाया। 1440 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

महमूदशाह: इब्राहीमशाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र महमूदशाह सुल्तान बना। उसे चुनार का दुर्ग जीतने में सफलता मिली परन्तु वह कालपी दुर्ग को जीतने में असफल रहा। उसने दिल्ली पर भी आक्रमण किया परन्तु कालपी दुर्ग को जीतने में असफल रहा। बहलोल लोदी ने उसे परास्त करके खदेड़ दिया। महमूदशाह के इस कृत्य से दिल्ली और जौनपुर की प्रतिद्वन्द्विता और भी अधिक तीव्र हो गई।

मुहम्मदशाह: महमूदशाह के बाद उसका पुत्र मुहम्मदशाह सुल्तान बना। उसके समय में भी दिल्ली और जौनपुर का संघर्ष जारी रहा।

हुसैनशाह: कुछ समय बाद मुहम्मदशाह के भाई ने उसकी हत्या करवा दी और वह स्वयं हुसैनशाह के नाम से तख्त पर बैठा। उसके समय में बहलोल लोदी ने जौनपुर पर जोरदार आक्रमण किया। 1479 ई. में हुसैनशाह बुरी तरह परास्त होकर बिहार की ओर भाग गया। बहलोल लोदी ने जौनपुर को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया।

बारबकशाह: इस प्रकार दिल्ली सल्तनत से अलग होने के 75 वर्ष बाद जौनपुर पुनः दिल्ली सल्तनत का सूबा बन गया। बहलोल लोदी ने जौनपुर का भाग अपने बड़े पुत्र बारबकशाह को सौंप दिया। बहलोल की मृत्यु के बाद उसका तीसरा पुत्र निजामखाँ ‘सिकन्दरशाह’ के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा। इस अवसर पर जौनपुर के शासक बारबकशाह ने दिल्ली की अधीनता मानने से मना कर दिया परन्तु सिकन्दर ने उसे पराजित करके दिल्ली के अधीन किया। बारबकशाह अयोग्य निकला और जौनपुर में विद्रोह उठ खड़ा हुआ। अन्त में सिकन्दर लोदी ने विद्रोह का दमन किया और जौनपुर में एक नये सूबेदार को नियुक्त किया। बारबकशाह को कारागार में डाल दिया गया।

जलाल: सिकन्दर लोदी की मृत्यु के बाद उसका बड़ा पुत्र इब्राहीम लोदी दिल्ली के तख्त पर बैठा। इस अवसर पर इब्राहीम के भाई शहजादा जलाल ने अपने आपको जौनपुर-कालपी का सुल्तान घोषित कर दिया। अतः भाई-भाई में युद्ध छिड़ गया। अन्त में, इब्राहीम लोदी विजयी रहा। उसने जौनपुर के स्वतंत्र शासक की हत्या  करवा दी।

सिन्ध और मुल्तान

712 ई. में मुहम्मद-बिन-कासिम ने सिन्ध के हिन्दू राज्य पर विजय प्राप्त की थी। 1110 ई. में महमूद गजनवी ने इस प्रदेश को अपने राज्य में मिला लिया। मुहम्मद गोरी और इल्तुतमिश ने भी इस राज्य पर विजय प्राप्त की किंतु उनका अधिकार स्थायी नहीं रहा तथा सूमड़ा राजपूतों ने इस प्रदेश पर अधिकार कर इस्लाम धर्म को अपना लिया। फीरोज तुगलक ने यद्यपि उन्हें अपने अधीन किया था किन्तु तैमूर के आक्रमण के बाद वे पुनः स्वतंत्र हो गये। इसी समय मुल्तान का प्रान्त भी दिल्ली सल्तनत से अलग हो गया था। बलूचियों ने जो लंगा कहलाते थे, वहाँ एक नये राजवंश की स्थापना कर ली। लोदी शासकों ने उन्हें अपनी अधीनता में लाने का प्रयास किया परन्तु वे असफल रहे। जब बाबर ने कन्धार के शासक शाहबेग अरघुन को परास्त कर कन्धार पर अधिकार कर लिया तो शाहबेग भागकर सिन्ध की तरफ आ गया। इन दिनों सिन्ध और मुल्तान के मध्य संघर्ष चल रहा था। अवसर का लाभ उठाते हुए शाहबेग ने सिन्ध के शासक जाम फीरोज को पराजित कर सिन्ध पर अधिकार जमा लिया। उसके उत्तराधिकारी शाह हुसैन अरघुन ने लंगाओं को परास्त करके मुल्तान को जीत लिया। बाबर के आक्रमण के समय शाह हुसैन का राज्य पूरी तरह संगठित नहीं हो पाया था।

मेवाड़

पन्द्रवीं सदी के अन्त तथा सोलहवीं सदी के आरम्भ में राजस्थान में तीन प्रमुख स्वतंत्र राज्य थे- मेवाड़, मारवाड़ और आम्बेर। इन तीनों राज्यों ने उत्तर भारत की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। छठी शताब्दी में गुहिल नामक योद्धा ने मेवाड़ राज्य की स्थाना की। राजा समरसिंह के समय में मेवाड़ की सीमाओं का काफी विस्तार हुआ। 1303 ई. में अलाउद्दीन खलजी ने मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ को जा घेरा। घमासान युद्ध में मेवाड़ का शासक राणा रतनसिंह पराजित होकर मारा गया तथा उसकी रानी पड्डिनी ने अन्य राजपूत ललनाओं के साथ जौहर किया। अलाउद्दीन खलजी की मृत्यु के बाद गुहिल वंशी राणा हम्मीर ने चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। मेवाड़ के शासकों में महाराणा कुम्भा सर्वाधिक प्रतापी शासक हुआ। उसने न केवल विरासत में प्राप्त राज्य की रक्षा की अपितु उत्तर और पूर्व में उसकी सीमाओं का विस्तार भी किया। कुम्भा का महत्त्व इस बात में है कि अपने समय के शक्तिशाली मालवा और गुजरात के सुल्तानों तथा मारवाड़ के राठौड़ों के निरन्तर आक्रमणों के विरुद्ध लड़ते हुए न केवल अपने राज्य को सुरक्षित रखा अपितु उसका विस्तार भी किया। वह एक प्रजापालक एवं वीर शासक था। वह विद्वानों, साहित्यकारों एवं कलाकारों का आश्रयदाता था और स्वयं भी अच्छा विद्वान तथा श्रेष्ठ संगीतकार था। 1468 ई. में उसके पुत्र ऊदा (उदयकरण अथवा उदयसिंह) ने उसकी हत्या कर दी। मेवाड़ के सरदारों ने पितृघाती ऊदा के स्थान पर कुम्भा के छोटे पुत्र रायमल को तख्त पर बैठाया। रायमल ने 1509 ई. तक शासन किया। उसकी मृत्यु के बाद उसका तीसरा पुत्र संग्रामसिंह जो इतिहास में राणा सांगा के नाम से विख्यात है, मेवाड़ का शासक बना। भारत के इतिहास में महाराणा सांगा का विशिष्ठ स्थान है। उसे अन्तिम हिन्दू सम्राट भी कहा जाता है। डॉ. गौरी शंकर हीराचंद ओझा ने लिखा है- ‘गुजरात, मालवा तथा दिल्ली के सुल्तानों को परास्त करके उसने राणा कुम्भा के आरम्भ किये हुए कार्य को आगे बढ़ाया।’ बाबर ने भी लिखा है, ‘राणा सांगा अपनी शूरवीरता तथा तलवार के बल पर बहुत शक्तिशाली हो चुका था। मालवा, गुजरात और दिल्ली का कोई सुल्तान अपने ही बलबूते पर उसे पराजित करने की स्थिति में नहीं था। उसका मुल्क 10 करोड़ की आमदनी का था। उसकी सेना में एक लाख सवार थे। उसके साथ 7 राजा, 9 राव और 104 छोटे सरदार रहा करते थे।’ राणा सांगा अपने युग का सर्वाधिक शक्तिशाली हिन्दू शासक था। राजपूताने के राजा, राव तथा रावल उसके नेतृत्व को स्वीकार करते थे। उसने उत्तरी भारत की राजनीति में सक्रिय भाग लेकर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। बाबर ने भी दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी के विरुद्ध राणा सांगा से सहयोग माँगा था और अंत में बाबर को भारत पर अधिकार करने के लिये सांगा से ही खानवा के मैदान में निर्णायक युद्ध लड़ना पड़ा था।

मारवाड़

राजस्थान का दूसरा महत्त्वपूर्ण राज्य मारवाड़ का था। यहाँ पर कन्नौज से आये गहड़वाल वंशी राठौड़ राजपूतों का शासन था जो मुहम्मद गौरी द्वारा कन्नौज के राजा जयचंद को मार दिये जाने के बाद कन्नौज छोड़कर मरुस्थल में आ गये थे। उन्होंने बहुत छोटे से राज्य से शुरुआत करके अपने राज्य को काफी विस्तृत कर लिया था। राणा कुम्भा के शासन के आरम्भ में मारवाड़ का राव रणमल अपने कई सरदारों एवं सैनिकों के साथ चित्तौड़ में ही था। मेवाड़ी और मारवाड़ी सामन्तों के द्वेष के चलते मेवाड़ी सरदारों ने एक रात्रि में अचानक रणमल तथा उसके राठौड़ सरदारों को मौत के घाट उतार दिया। रणमल का पुत्र जोधा अपने 700 सैनिकों के साथ किसी प्रकार मेवाड़ से भाग निकला। इस जघन्य नरसंहार के बाद मेवाड़ी सेना ने मारवाड़ राज्य पर भी अधिकार जमा लिया परन्तु 1453 ई. के आस-पास जोधा अपने पैतृक राज्य से मेवाड़ की सेना को खदेड़ने तथा उस पर अपना अधिकार जमाने में सफल रहा। 1459 ई. में उसने मारवाड़ की तत्कालीन राजधानी मण्डौर से 6 मील की दूरी पर स्थित एक पहाड़ी पर जोधपुर के प्रसिद्ध दुर्ग की नींव डाली और जोधपुर नगर बसाया। तब से यही जोधपुर नगर मारवाड़ राज्य की राजधानी बन गया।

राव जोधा एक पराक्रमी एवं महत्त्वाकांक्षी शासक था। उसने आस-पास के क्षेत्रों को जीतकर अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। कुम्भा की मृत्यु के बाद उसने अजमेर और सांभर पर भी अधिकार कर लिया। उसके एक पुत्र बीकाजी ने अपने लिए एक पृथक् राज्य बीकानेर की स्थापना की। उसके उत्तराधिकारी सातल ने जैसलमेर राज्य से कुन्थल का क्षेत्र छीन लिया। सातल के उत्तराधिकारी सूजा ने बाड़मेर, कोटड़ा और जैतारण के क्षेत्रों को जीतकर जोधपुर राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। 1515 ई. में राव सूजा की मृत्यु के बाद उसका पौत्र गांगा मारवाड़ का शासक बना। दिल्ली सल्तनत पर इस समय इब्राहीम लोदी का शासन था और मेवाड़ पर राणा सांगा का शासन था। राव गांगा ने राणा सांगा के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाये रखे और सांगा के कई अभियानों में सहयोग दिया। खानवा के युद्ध के समय भी गांगा ने अपने पुत्र मालदेव को सेना सहित सांगा की सहायता के लिये भेजा था। उस समय राजपूताना के अधिकांश राज्य मेवाड़ के राणा सांगा के नेतृत्व को स्वीकार करते थे और उसी के आदेशानुसार चलते थे। माना जाता है कि सांगा देश से म्लेच्छों को बाहर निकालकर हिन्दू राज्य की स्थापना करना चाहता था तथा राजपूताना के लगभग समस्त हिन्दू नरेश इस कार्य में उसकी सहायता कर रहे थे।

आम्बेर

आम्बेर कछवाहा राजपूतों का राज्य था। बारहवीं सदी में नरवर के राजकुमार दूलहराय ने, ढूंढाड़ क्षेत्र में शासन कर रहे बड़गूजरों को परास्त करके दौसा तथा उसके आस-पास के क्षेत्रों को जीत लिया तथा कछवाहा राज्य की नींव रखी। उसके एक वंशज काकिल देव ने मीणों को परास्त कर आम्बेर पर अपना अधिकार जमाया और आम्बेर को अपनी राजधानी बनाया। कछवाहों को बारहवीं सदी में कुछ समय के लिए चौहानों के सामन्तों के रूप में शासन करना पड़ा। सोलहवीं शताब्दी में आम्बेर नरेश चन्द्रसेन का पुत्र पृथ्वीराज कच्छवाहा, महाराणा सांगा का सामन्त था। उसने खानवा के युद्ध में मुगलों के विरुद्ध संघर्ष में भाग लिया।

उड़ीसा

उड़ीसा का विशाल हिन्दू राज्य गंगा के डेल्टा से गोदावरी के मुहाने तक फैला हुआ था। राज्य का पहला शक्तिशाली शासक अनन्तवर्मन (1076-1148 ई.) हुआ। उसने पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मन्दिर का निर्माण करवाया था। इस वंश का शासक नरसिंह प्रथम (1238-64 ई.) भी पराक्रमी शासक हुआ। उसने तुर्कों के आक्रमणों का सफलतापूर्वक सामना किया और अपने राज्य की रक्षा की परन्तु उसके बाद उसके वंश का पतन आरम्भ हो गया। 1434 ई. के आस-पास कपिलेन्द्र ने बहमनी और विजयनगर के आक्रमणों से अपने राज्य की सफलतापूर्वक रक्षा की। 1407 ई. के आस-पास पुरुषोत्तम उड़ीसा का शासक बना। अपने शासन के प्रारम्भ में उसे पराजयों का सामना करना पड़ा। विजयनगर राज्य ने कृष्णा नदी के दक्षिणी भाग पर अधिकार कर लिया तो बहमनी राज्य ने गोदावरी-कृष्णा दोआब छीन लिया किन्तु पुरुषोत्तम ने अपने शासन के अन्तिम वर्षों में बहमनी राज्य से दोआब का क्षेत्र पुनः छीन लिया। उसने विजयनगर से भी गुंटूर जिले तक का क्षेत्र वापस जीत लिया। 1497 ई. में उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र प्रतापरुद्र शासक बना। उसने 1540 ई. तक शासन किया। वह चैतन्य महाप्रभु का शिष्य बन गया और राज्य की सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाया। विजयनगर ने उड़ीसा राज्य पर कई आक्रमण किये तथा गोदावरी के दक्षिण के समस्त भाग पर अधिकार कर लिया। गोलकुण्डा के सुल्तान ने भी उड़ीसा पर आक्रमण किया और लूटमार में काफी धन-सम्पदा ले गया। इस प्रकार, उड़ीसा राज्य शक्तिहीन होता चला गया और 1568 ई. में बंगाल के सुल्तान ने इसे अपने राज्य में मिला लिया। दिल्ली से दूर स्थित होने के कारण इस राज्य का उत्तर भारत की राजनीति में कोई प्रभाव नहीं था किन्तु इसने लम्बे समय तक बहमनी और बंगाल की शक्ति को विस्तारित होने से अवश्य रोके रखा। दिल्ली का कोई भी सुल्तान उड़ीसा पर स्थायी नियंत्रण नहीं रख पाया।

कामरूप

तेरहवीं सदी के प्रारम्भ में ब्रह्मपुत्र नदी की घाटी में अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्य थे जिनमें कामरूप का राज्य अधिक महत्त्वपूर्ण था। उस युग में इसे कामत राज्य कहा जाता था। इसके पूर्व में अहोमों का आसाम राज्य था तो पश्चिम में बंगाल के सुल्तानों का राज्य था। पन्द्रवी सदी में खैनवंश ने इस राज्य पर अधिकार कर लिया और कामतपुर को अपनी राजधानी बनाया। 1498 ई. में बंगाल के सुल्तान अलाउद्दीन हुसैनशाह ने इस वंश के अन्तिम शासक नीलाम्बर को पदच्युत कर दिया परन्तु 1515 ई. में कूच जाति का विषसिंह कामरूप का राजा बन बैठा। इस वंश में नरनारायण एक योग्य शासक हुआ परन्तु पारिवारिक कलह के कारण् उसे राज्य का विभाजन करना पड़ा और एक भाग अपने भतीजे रघुदेव को देना पड़ा। इससे दोनों ही राज्यों की शक्ति कमजोर हो गई। कामरूप का पश्चिमी भाग मुसलमानों ने हड़प लिया और पूर्वी भाग अहोमों ने छीन लिया।

आसाम

तेरहवीं सदी के आरम्भ में अहोमों ने आसाम पर अधिकार कर लिया था। ये लोग शान जाति के थे। अहोमों ने लगभग 600 वर्षों तक आसाम पर शासन किया। उन्होंने लम्बे समय तक बंगाल के सुल्तानों को पूर्व की ओर बढ़ने से रोका परन्तु जब अहोमों ने कामरूप के एक भाग को जीत लिया तो बंगाल की सीमाएँ आसाम से जा मिलीं और बंगाल के सुल्तानों के आक्रमणों का मार्ग खुल गया। अहोमों ने वीरता के साथ उनके आक्रमणों का सामना किया और अपने राज्य की स्वतंत्रता को बनाये रखा।

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