Thursday, July 29, 2021

5. इटली में पाइथोगोरियन ब्रदरहुड की स्थापना

अहिंसक एवं शाकाहारी दार्शनिक-चिंतन का उदय

यूरोप में ग्रीस नामक एक पुराना देश है जिसे हम यूनान के नाम से भी जानते हैं। इसी ग्रीस में ईसा से लगभग 580 साल पहले पाइथोगोरस नामक एक दार्शनिक का जन्म हुआ जिसे आज का संसार गणितज्ञ के रूप में जानता है। पाइथोगोरस की मृत्यु ईसा से लगभग 500 साल पहले हुई। इस काल में चीन, भारत एवं ईरान में नवीन दार्शनिक विचारों का उदय हो रहा था।

यूनान में इस कार्य का अग्रदूत पाइथोगोरस था। भारतीय दार्शनिक भगवान बुद्ध एवं महावीर स्वामी, चीन के दार्शनिक महात्मा कन्फ्यूशियस और लाओत्से तथा ईरानी दार्शनिक जरथ्रुस्ट पाइथोगोरस के ही काल में हुए । यह नवीन विचारों के विस्फोट का युग था। लगभग पूरा संसार इन नवीन विचारों से प्रभावित हो रहा था।

यह एक आश्चर्य की बात थी कि ये सभी दार्शनिक एक ही समय में एक दूसरे से हजारों किलोमीटर दूर बैठकर जो विचार प्रतिपादित कर रहे थे, उनमें अद्भुत समानता थी। ये सभी दार्शनिक अहिंसा और शाकाहार पर विशेष जोर दे रहे थे। पाइथोगोरस भी नितांत शाकाहारी था और उसके शिष्य भी केवल शाकाहारी मनुष्य ही हो सकते थे।

पाइथोगोरस यूरोपीय इतिहास का प्रथम ऋषि है जिसके बारे में लिखित प्रमाण मिलते हैं। पाइथोगोरस ने पाईथोगोरियनवाद नामक वैचारिक आन्दोलन की स्थापना की जिसे उस काल का धार्मिक मत भी कहा जा सकता है। उसके जीवन काल में उसे रहस्यवादी दार्शनिक माना जाता था।

हीरोडोट्स ने उसे यूनानियों में सबसे अधिक सक्षम दार्शनिक कहा है। पाइथोगोरस का नाम उसे पाइथिआ और अपोलो नामक यूनानी देवताओं से जोड़ता है। एरिस्टिपस ने उसके नाम का अर्थ बताते हुए कहा है कि वह यूनानी देवता पाइथियन (पाइथ) से कम सच (एगोर) नहीं बोलता था।

लम्ब्लिकास ने लिखा है कि पाइथिआ (यूनानी देवता) ने पाइथोगोरस की गर्भवती माँ ‘पायथायस’ के सम्बन्ध में भविष्यवाणी की थी कि वह एक बहुत ही सुन्दर एवं बुद्धिमान बच्चे को जन्म देगी जो मानव जाति के लिए कल्याणकारी सिद्ध होगा।

पाइथोगोरस को मुख्यतः ‘पाइथागोरस प्रमेय’ के लिए जाना जाता है, जिसका नामकरण उसके नाम पर किया गया है। पाइथोगोरस को ‘संख्या के जनक’ के रूप में भी जाना जाता है। छठी शताब्दी ईसा-पूर्व में धार्मिक शिक्षण और दर्शन में पाइथोगोरस का महत्त्वपूर्ण योगदान था। वह सुकरात-पूर्व युग का प्रमुख दार्शनिक है।

पाइथोगोरस और उसके शिष्य मानते थे कि- ‘इस संसार में सब-कुछ गणित से सम्बन्धित है और संख्याओं में ही अंतिम सत्य छिपा है। इस कारण गणित के माध्यम से हर चीज के बारे में भविष्यवाणी की जा सकती है तथा हर चीज को एक ताल-बद्ध प्रतिरूप या चक्र के रूप में मापा जा सकता है।’

यूनानी दार्शनिक चिंतक लम्ब्लिकास के अनुसार, पाइथोगोरस ने कहा कि- ‘संख्या ही विचारों और रूपों की शासक है और देवताओं और राक्षसों की कारण है।’ पाइथोगोरस यूरोप का प्रथम चिंतक था जो स्वयं को एक दार्शनिक या बुद्धि का प्रेमी कहता था। पाइथोगोरस के विचारों ने आगे चलकर ‘प्लेटो’ पर गहरा प्रभाव डाला।

दुर्भाग्य से, पाइथोगोरस के बारे में बहुत कम तथ्य ज्ञात हैं, क्योंकि उसके मूल लेखन में से बहुत कम अंश ही शेष बचा है। पाइथोगोरस के नाम से जो उपलब्धियां गिनाई जाती हैं, उनमें से बहुत सी उपलब्धियां वास्तव में उसके सहयोगियों और उत्तराधिकारियों की हैं।

पाईथोगोरस का जन्म ‘सामोस’ नामक नगर में हुआ, जो एशिया माइनर के किनारे पर, पूर्वी ईजियन में एक यूनानी द्वीप है। उसकी माँ पायथायस ‘सामोस’ की निवासी थी और पिता मनेसार्चस एक ‘फोनिसियन व्यापारी’ था। पाईथोगोरस ने युवावस्था में ही अपने जन्म स्थान ‘सामोस’ को छोड़ दिया और वह पोलिक्रेट्स की अत्याचारी सरकार से बच कर इटली के दक्षिण में स्थित ‘क्रोटोन’ (क्रोतों) नामक द्वीप पर चला गया।

वहाँ से कुछ दिन बाद वह ‘केलेब्रिया’ नामक द्वीप पर गया तथा कुछ समय बाद वह इटली चला आया। इटली में उसने एक गुप्त धार्मिक समाज की स्थापना की जो प्रारंभिक ‘ओर्फिक कल्ट’ से साम्य रखती थी और संभवतः उसी से प्रभावित भी थी।

लम्ब्लिकास के अनुसार ‘थेल्स’ पाइथोगोरस की क्षमताओं से बहुत अधिक प्रभावित था, उसने पाइथोगोरस को इजिप्ट में स्थित ‘मेम्फिस’ नामक नगर में जाकर वहाँ के पुजारियों के साथ रहकर अध्ययन करने की सलाह दी जो अपनी बुद्धि के लिए जाने जाते थे। पाईथोगोरस ने इजिप्ट में कुछ ज्यामितीय सिद्धांतों को सीखा जिनसे प्रेरित होकर उसने ‘पाइथोगोरस प्रमेय’ प्रतिपादित की।

पाइथोगोरस ने लोगों के सांस्कृतिक जीवन में सुधार लाने का प्रयास किया तथा उन्हें सदाचार का पालन करने के लिए प्रेरित किया। बहुत से लोग उसके अनुयाई बन गए जिन्हें पाइथोइगोरियन कहा जाता था। पाइथोगोरस ने अपने शिष्यों के लिए एक सांस्कृतिक केन्द्र अथवा आश्रम स्थापित किया जिसके नियम बहुत कठोर थे।

इस आश्रम में लड़के और लड़कियां समान रूप से पढ़ते थे। उनके शिष्य स्वयं को ‘मेथमेटकोई’ कहते थे। वे आश्रम में ही रहते थे, उनकी अपनी कोई निजी संपत्ति नहीं होती थी तथा उन्हें आश्रम की ओर से शाकाहारी भोजन दिया जाता था। ई.1714 में रिचर्ड ब्लेक्मोर ने ‘दी ले मोनेस्ट्री’ नामक पुस्तक लिखी जिसमें उसने पाइथोगोरियनों के धार्मिक विश्वासों के बारे में लिखा है। यह यूरोपीय इतिहास में अंकित संन्यासी जीवन का पहला उदाहरण था।

लम्ब्लिकास के अनुसार पाइथोगोरस ने धार्मिक शिक्षण, सामान्य भोजन, व्यायाम, पठन और दार्शनिक अध्ययन से युक्त जीवन का अनुसरण किया। संगीत इस जीवन का एक आवश्यक अंग था। पाइथोगोरस के शिष्य ‘अपोलो’ देवता को प्रसन्न करने के लिए नियमित रूप से सामूहिक भजन गाते थे। वे आत्मा तथा शरीर की बीमारियों का उपचार करने के लिए वीणा का उपयोग करते थे। स्मरण-शक्ति को बढ़ाने के लिए सोने से पहले, आश्रम में कविता-पाठ किया जाता था।

लेवियस जोजेफस ने लिखा है कि समयरना के हर्मिपस के अनुसार पाइथोगोरस यहूदी विश्वासों से परिचित था तथा उसने उनमें से कुछ को अपने दर्शन में शामिल किया था। पाइथोगोरस के जीवन के अंतिम चरण में क्रोटोन (क्रोतों) के एक कुलीन सैलों (सामन्त) द्वारा पाइथोगोरस और उसके अनुयायियों के विरुद्ध एक षड़यंत्र रचा गया जिसके कारण पाइथोगोरस इटली के मेटापोंटम नामक स्थान पर चला गया। माना जाता है कि वहीं पर 90 वर्ष की आयु में पाइथोगोरस की मृत्यु हुई। बर्टेंड रसेल ने पश्चिमी दर्शन के इतिहास में लिखा है- ‘पाइथोगोरस का प्लेटो और अन्य दार्शनिकों पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा।’

पाइथोगोरस के अनुयायी पाइथोगोरियन कहलाते थे तथा उन्हें  ‘दार्शनिक-गणितज्ञ’ माना जाता था। इन्हीं अनुयाइयों ने अक्षीय ज्यामिति की शुरुआत की जिसके बारे में दो शताब्दी बाद ‘यूक्लिड’ ने अपनी पुस्तक ‘दी एलिमेंट्स’ में लिखा। पाइथोगोरस ने शांति के एक नियम का प्रतिपादन किया जो एकेमाइथिया कहलाता था। इस नियम को तोड़ने पर मृत्युदण्ड दिया जाता था।

पाइथोगोरस का मानना था कि एक व्यक्ति के शब्द सामान्यतः लापरवाही से युक्त होते हैं, जिससे उसकी गलत अभिव्यक्ति होती है। यदि किसी व्यक्ति को किसी बात पर संदेह हो तो उसे चुप रहना चाहिए। उसका एक और नियम था कि संकट में पड़े हुए किसी भी व्यक्ति की सहायता करनी चाहिए, उसे नीचे नहीं गिरने देना चाहिए, क्योंकि निष्क्रियता को प्रोत्साहित करना एक बहुत बड़ा पाप है। उसका कहना था कि किसी उद्देश्य या संकल्प की पूर्ति के लिए घर से निकल जाने के बाद वापिस मत जाओ, क्योंकि फुरीस (यूनानी देवता) आपके साथ होंगे। पाईथोगोरस का कहना था कि मनुष्य को सृष्टि, ईश्वर एवं गणित के सम्बन्ध में, सच्चाई को सीखना चाहिए।

पाइथोगोरस की मृत्यु के लगभग 700 साल बाद लिखी गयी पाइथोगोरस की जीवनी ‘पोरफायरी’ में कहा गया है कि पाइथोगोरस के उपदेशों से मानव को शांति मिली। यह शांति कोई साधारण किस्म की नहीं थी, बल्कि अद्भुत थी। पाइथोगोरियन्स अर्थात् ‘पाइथोगोरस के शिष्य’ दो प्रकार के थे।

शिष्यों के आंतरिक समूह को मेथमेटीकोई (गणितज्ञ) और बाहरी समूह को अकउसमेटीकोई कहा जाता था। पोरफायरी में लिखा है कि मेथमेटीकोई ज्ञान को अधिक विस्तार पूर्वक सीखते थे और अकउसमेटीकोई पाइथोगोरस की लेखनी के केवल सारांश एवं शीर्षकों को सुनते थे। लम्ब्लिकास के अनुसार अकउसमेटीकोई साधारण शिष्य थे जो पाइथोगोरस के व्याख्यानों को एक पर्दे के बाहर से सुनते थे।

अकउसमेटीकोईयों को अपने गुरु पाइथोगोरस को देखने की अनुमति नहीं थी और उन्हें पाइथोगोरस मत के भीतरी रहस्य नहीं सिखाये जाते थे। इसके बजाय उन्हें गुप्त तरीके से व्यवहार और नैतिकता सिखाई जाती थी एवं गुप्त अर्थों से युक्त संक्षिप्त बातें बताई जाती थी। अकउसमेटीकोई ने मेथमेटीकोई को असली पाइथोगोरियन्स माना। कुछ समय बाद इन दोनों प्रकार के शिष्यों में विवाद उत्पन्न हो गया।

साइक्लोन के ‘कोहोर्ट’ नामक एक क्रोधी अकउसमेटीकोई शिष्य ने कुछ मेथमेटीकोई शिष्यों की हत्या कर दी। इसके बाद, दोनों समूह एक दूसरे से पूरी तरह से अलग हो गए, पाइथोगोरस की पत्नी थेनो और उनकी दो बेटियों ने मेथमेटीकोई का नेतृत्व किया। थेनो एक ओर्फिक अनुयायी की बेटी थी और स्वयं भी गणितज्ञ थी।

उसने भी गणित, भौतिक विज्ञान, चिकित्सा और बाल मनोविज्ञान पर कई पुस्तकें लिखीं, उनमें से अब कुछ भी शेष नहीं बचा है। उसका सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है ‘गोल्डन मीन’ के दार्शनिक सिद्धांत पर एक पुस्तक का लेखन। उस काल में स्त्री को उसके पति की संपत्ति माना जाता था और उसे केवल अपने पति का घर संभालना होता था, पाइथोगोरस ने महिलाओं को काम करने के लिए बराबर का स्तर स्वीकृत किया।

पाइथोगोरस कालीन यूरोपीय समाज में कई प्रकार के अंधविश्वास एवं वर्जनाएं थीं। किसी व्यक्ति के लिए एक क्रॉस-बार पर पैर रखना तथा फलियाँ खाना वर्जित था। किसी सीढ़ी के नीचे से होकर निकलना दुर्भाग्य-पूर्ण माना जाता था। पाइथोगोरस ने इन बातों का विरोध किया। इसलिए पाइथोगोरस को बदनाम करने के लिए लोगों ने उन्हें ‘मिस्टिकोस लोगोस’ (रहस्यमय व्यक्ति) नामक अपमानजनक उपाधि दी।

ऐसे लोगों के उपहास से बचने के लिए पाइथोगोरस के शिष्यों ने पाइथोगोरस की शिक्षाओं को रहस्यमय शब्दावली में ढाल दिया। बाद में यूनानी दार्शनिक अरस्तू (ई.पू.384-ई.पू.322) ने उस शब्दावली की व्याख्या की। उदाहरण के लिए पाइथोगोरस की शिक्षा- ‘संतुलन पर कदम मत रखो’ का अर्थ किया गया- लालची मत बनो। ‘आग पर तलवार से प्रहार मत करो’ का अर्थ था- एक क्रोधित व्यक्ति से तीखे शब्दों में बात मत करो। ‘दिल को मत खाओ’ का अर्थ था- स्वयं को दुःख में मत जकड़ लो।

पाइथोगोरियन को ‘आत्माओं के स्थानांतर गमन’ के सिद्धांत के लिए भी जाना जाता है। उसने यह सिद्धांत भी प्रतिपादित किया कि ‘संख्या में चीजों की वास्तविक प्रकृति निवास करती है।’

पाईथोगोरस ने ‘शुद्धिकरण संस्कारों’ को अपनाया और जीवन जीने के भिन्न नियमों को विकसित किया। उसका मानना था कि ये नियम मनुष्य को देवताओं के बीच उच्च पद प्राप्त करने में सक्षम बनायेंगे। पाइथोगोरस के अधिकतर रहस्यवादी सिद्धांत ‘ओर्फिक परम्परा’ से लिए गए हैं।

आत्मा के सम्बन्ध में पाइथोगोरस के विचार सिरोस के ‘फेरेसीडस’ के विचारों से साम्य रखते हैं। फेरेसीडस को आत्माओं के स्थानांतर-गमन की शिक्षा देने वाला सबसे पहला यूनानी माना जाता है। वह पाइथोगोरस का शिक्षक था। फेरेसीडस ने ‘पेंटा मईकोस’ (पाँच गुप्त गुहाएं) के शब्दों में आत्मा के बारे में शिक्षा दी। उसके द्वारा पेंटाग्राम के पाइथोगोरियन उपयोग की सबसे संभावित उत्पत्ति, आंतरिक स्वास्थ्य के एक प्रतीक के रूप में प्रयुक्त की जाती थी।

पाइथोगोरस अपने समय का बहुत बड़ा संगीतज्ञ भी था। वह उस काल में प्रचलित संगीत में सुधार लाना चाहता था। उसका मानना था कि इस संगीत में पर्याप्त सामंजस्य नहीं है तथा यह बहुत ही व्यस्त रखने वाला है। एक प्राचीन कथा के अनुसार एक दिन पाइथोगोरस एक लोहार के पास से होकर निकला।

उसने लोहार की निहाइयों में से आ रही सुंदर और सामंजस्य-पूर्ण आवाज को सुनकर अनुभव किया कि संगीत के नोट को गणितीय समीकरणों में अनुवाद किया जा सकता है। क्योंकि आवाज से उत्पन्न होने वाली लय का जो भी वैज्ञानिक नियम अथवा कारण है वह अवश्य ही गणितीय है और इसे संगीत पर लागू किया जा सकता है।

वह लोहार के पास गया और उसके औजारों को देख कर पता लगाने की प्रयास किया कि यह कैसे हुआ! उसने पाया कि निहाईयां एक दूसरे के साधारण अनुपात में थीं। एक पहली के आधे आकार की थी, दूसरी दो-तिहाई आकार की थी और सारा क्रम इसी प्रकार से था।

पाइथोगोरस ने संख्या के सिद्धांत को विस्तार-पूर्वक स्पष्ट किया, जिसका सही अर्थ आज भी विद्वानों के बीच बहस का विषय बना हुआ है। पाइथोगोरस का नक्षत्रीय पिण्डों की ‘सततता’ (Regularity) पर विश्वास था। उसका मानना था कि ग्रह और तारे गणितीय समीकरणों के अनुसार गति करते हैं, इसी प्रकार की कुछ समानता संगीत के स्वरों में पाई जाती है और इससे एक मधुर संगीत उत्पन्न होता है।

पाइथोगोरस का एक विश्वास यह था कि जीवन का सार संख्या है। इस प्रकार से, सभी चीजों की स्थिरता ब्रह्माण्ड को बनाती है। स्वास्थ्य जैसी चीजें तत्वों के एक स्थिर अनुपात पर निर्भर करती हैं। किसी भी चीज का बहुत कम या बहुत ज्यादा होना असंतुलन का कारण होता है जो किसी भी जीव को रोगी बना सकता है। वह विचारों की तुलना संख्या की गणनाओं से करता था।

पाइथोगोरस की प्रमेय उस काल की एक चमत्कारिक गणितीय उपलब्धि मानी जाती है। इस प्रमेय के अनुसार समकोण त्रिभुज की दो भुजाओं के वर्ग का योग विकर्ण के वर्ग के बराबर होता है। मान्यता है कि इस प्रमेय को पाइथोगोरस से पहले भी बेबिलोनियाई लोगों और उनसे भी पहले भारतीयों के द्वारा काम में लिया जाता था। पाइथोगोरस ने इस प्रमेय को मिस्रवासियों से सीखा था।

पाइथोगोरस का दृष्टिकोण धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों था। उसके अनुसार विज्ञान एवं धर्म परस्पर सम्बद्ध हैं। धार्मिक रूप से पाइथोगोरस  मेटेम्पसाइकोसिस का अनुयायी था। वह आत्मा के स्थानांतर-आगमन अर्थात् पुनर्जन्म में विश्वास करता था। उसका मानना था कि आत्मा जब तक सदाचारी नहीं हो जाती तब तक वह मानव, पशु, या सब्जियों में बार-बार अवतार लेती रहती है।

पुनर्जन्म के सम्बन्ध में पाइथोगोरस का यह विचार प्राचीन यूनानी धर्म से प्रभावित था। वह पहला दार्शनिक था जिसने यह प्रस्तावित किया कि विचार-प्रक्रिया आत्मा एवं मस्तिष्क में स्थित है न कि हृदय में। पाईथोगोरस का कहना था कि उसे अपने पिछले चार जीवन विस्तार से याद हैं। उसे अपने एक मृत मित्र के रोने की आवाज एक कुत्ते के भौंकने में सुनाई देती थी।

अरस्तू ने पाइथोगोरस को एक अलौकिक व्यक्ति के रूप में वर्णित किया है जो आश्चर्यजनक कार्य करता था। पाइथोगोरस की एक जांघ सोने की थी जिससे वह स्वयं को अपोलो का पुत्र कहता था। उसने इस जांघ का प्रदर्शन एक बार ओलम्पिक खेलों के दौरान किया था। उसके पास सूर्यदेव का दिया हुआ ऐसा तीर था जिसकी सहायता से वह उड़कर दूरस्थ स्थानों पर भी पहुँच जाता था।

एक बार उसे क्रोतों तथा मेटापोंटम नामक दो अलग-अलग स्थानों पर एक ही समय में देखा गया था। अरस्तू ने पाइथोगोरस को गोल्डन थाई के साथ ऐसे स्वरूप में वर्णित किया जो देवत्व की पहचान है। अरस्तू और अन्य लोगों के अनुसार, कुछ प्राचीन लोग मानते थे कि पाईथोगोरस में न केवल अन्तरिक्ष और समय से होकर यात्रा करने की क्षमता है अपितु जानवरों और पौधों के साथ बात करने की भी क्षमता है।

र्ब्युअर्स डिक्शनरी ऑफ फ्रेस एंड फेबल के अनुसार पाइथोगोरस के पास एक गोल्डन थाई था जिसे उसने उत्तर देश के पुजारी एबेरिस को दिखाया था और उसका प्रदर्शन ओलिंपिक खेलों में भी किया था। र्ब्युअर के शब्दकोश में पाइथोगोरस द्वारा चन्द्रमा के सम्बन्ध में किए गए वर्णन का उल्लेख है। पाइथोगोरस का दावा था कि वह चन्द्रमा पर लिख सकता है। उसके अनुसार एक दर्पण पर रक्त से लिखा जाये और उसे चाँद के सामने रख दिया जाये तो चाँद की डिस्क पर लेख प्रतिबिंबित होगा।

पाईथोगोरस यह सोचने वाले पहले व्यक्तियों में से था कि पृथ्वी गोल है और समस्त ग्रहों का एक अक्ष है। समस्त ग्रह एक केन्द्रीय बिंदु के चारों और घूमते हैं। उसने कहा कि यह केन्द्रीय बिंदु पृथ्वी है, किन्तु बाद में कहा कि यह केन्द्रीय बिंदु ‘अग्नि’ है जिसे उसने कभी भी सूर्य के रूप में नहीं पहचाना। चाँद एक अन्य ग्रह है जिसे उसने ‘काउंटर अर्थ’ कहा, बाद में उसने सीमित-असीमित में विश्वास जताया।

प्राचीन रोम और नूमा पोम्पिलिअस की किवदंतियों के अनुसार रोम का दूसरा राजा, पाइथोगोरस के अधीन अध्ययन करता था। पाइथोगोरस ने एक गुप्त समाज की स्थापना की जो ‘पाइथोगोरियन ब्रदरहुड’ कहलाती थी, यह गणित के अध्ययन को समर्पित थी।  इसका भावी ज्ञान की गुप्त परम्पराओं पर गहरा प्रभाव पड़ा, जैसे रोसीक्रुसीएनिज्म और फ्रीमेसनरी। ये दोनों समूह गणित के अध्ययन को समर्पित थे।

दोनों का दावा था कि वे पाइथोगोरियन ब्रदरहुड से विकसित हुए हैं। पाइथोगोरस के गणित के रहस्यमयी और गुप्त गुणों की चर्चा पी हाल के अध्याय ‘दी सेक्रेट टीचिंग्स ऑफ ऑल एजेज’ में की गयी है जिसका शीर्षक है- ‘पाइथोगोरियन मेथमेटिक्स।’

पाइथोगोरस के सिद्धांत ने आने वाले समय में संख्या विज्ञान पर गहरा प्रभाव डाला तथा उसका संख्या सिद्धांत प्राचीन काल में पूरे मध्य-पूर्व में लोकप्रिय हुआ। 8वीं सदी के मुस्लिम कीमियागर जाबिर इब्न हयान ने व्यापक संख्या विज्ञान पर काम किया, वह पाइथोगोरस के सिद्धांत से बहुत अधिक प्रभावित था।

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