Sunday, December 4, 2022

अध्याय – 11 : प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध

छत्रपति शिवाजी (1646-1680 ई.) ने मराठा शक्ति को संगठित करने का काम किया। औरंगजेब जैसा शक्तिशाली मुगल बादशाह भी मराठा शक्ति का दमन नहीं कर सका। छत्रपति शाहू के शासन काल में पेशवाओं के नेतृत्व में मराठों ने उत्तर भारत में अपना वर्चस्व स्थापित किया। इससे मराठा संगठन अपनी उन्नति के चरम पर पहुँच गया। इस वर्चस्व को बनाये रखने के लिये ई.1761 में मराठों को अफगानिस्तान के शासक अहमदशाह अब्दाली से टक्कर लेनी पड़ी। पानीपत के मैदान में दोनों शक्तियों में भीषण युद्ध हुआ, जिसमें मराठों की निर्णायक पराजय हुई।

सर जादुनाथ सरकार ने लिखा है- ‘पानीपत का युद्ध एक निर्णायक युद्ध था। मराठा सेना की मुकुट मणि वहीं गिर गई।’

इस युद्ध के बाद अहमदशाह अब्दाली वापस अफगानिस्तान लौट गया। इस कारण वह पानीपत की जीत का राजनीतिक लाभ नहीं उठा सका। मेजर इवान्स बेल ने लिखा है– ‘यद्यपि इस युद्ध में मराठों की पराजय हुई तथापि विजयी अफगान वापस चले गये और उन्होंने फिर कभी भारत के मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया।’

निःसंदेह मराठों ने उल्लेखनीय क्षति उठायी किंतु उन्होंने बहुत कम समय में इस क्षति को पूरा कर लिया। मराठा इतिहासकार जी. एस. सरदेसाई का मत है– ‘इसमें संदेह नहीं कि जहाँ तक जनशक्ति का सम्बन्ध है, उन्हें (मराठों को) इस युद्ध से भारी क्षति पहुँची; पर इसके अतिरिक्त मराठों के भाग्य पर इस विपत्ति का वस्तुतः कोई प्रभाव नहीं पड़ा। नई पीढ़ी के लोग शीघ्र ही पानीपत में होने वाली क्षति की पूर्ति करने के लिए उठ खड़े हुए।’

पेशवा माधवराव (प्रथम) (1761-1772 ई.) ने मराठों में पुनः उत्साह एवं अनुशासन स्थापित किया। उसने शीघ्र ही पानीपत की पराजय का दाग धो दिया। उसके नेतृत्व में मराठा पुनः उतने ही शक्तिशाली बन गये जितने पानीपत के युद्ध से पूर्व थे किन्तु 18 नवम्बर 1772 ई. को उसकी मृत्यु हो गई। मराठों के लिए उसकी मुत्यु पानीपत से भी अधिक घातक सिद्ध हुई। पेशवा माधवराव (प्रथम) की मृत्यु के बाद मराठा शक्ति छिन्न-भिन्न हो गई और मराठा दरबार षड्यन्त्रों का अड्डा बन गया। मराठा सरदार स्वतंत्र आचरण करने लगे और उनमें भारी फूट पड़ गई। अँग्रेजों ने मराठों की फूट से लाभ उठाने का निर्णय लिया। 1772 ई. में भारत के राजनीतिक रंगमंच पर केवल दो शक्तियाँ- मराठा और ईस्ट इण्डिया कम्पनी, सर्वोच्चता प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील थीं। अतः इन दोनों शक्तियों में संघर्ष होना अवश्यम्भावी था।

रेग्यूलेटिंग एक्ट 1773 ई.

1773 ई. में ब्रिटिश संसद ने रेग्यूलेटिंग एक्ट पारित किया जिसके माध्यम से बम्बई और मद्रास प्रेसीडेन्सियों पर बंगाल के गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल का नियन्त्रण स्थापित किया गया। कौंसिल के प्रत्येक सदस्य को मत देने का समान अधिकार था। मतों की संख्या बराबर होने की स्थिति में गवर्नर जनरल को अतिरिक्त मत देने का अधिकार था। कौंसिल के तीन सदस्य गवर्नर जनरल से व्यक्तिगत शत्रुता रखते थे। इस कारण गवर्नर जनरल कौंसिल में कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं करवा पाता था।

अँग्रेजों की मराठा नीति

गवर्नर जनरल के अधिकार एवं शक्तियां स्पष्ट नहीं होने से दोनों प्रेसीडेन्सियों के अधिकारी स्वछन्द होकर कार्य करने लगे। दक्षिण व मध्य भारत की ऐसी कोई शक्ति नहीं थी, जिनसे उन्होंने झगड़ा मोल न ले रखा हो। बम्बई प्रेसीडेन्सी के गवर्नर की स्वच्छन्द प्रवृत्ति के कारण ही अँग्रेजों को मराठों से संघर्ष करना पड़ा। मराठों के सम्बन्ध में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने एक नीति तैयार की जिसके तीन प्रमुख भाग थे-

(1.) उन दिनों दक्षिण में मुख्य रूप से तीन शक्तियाँ कार्यरत थीं- हैदराबाद का निजाम, महाराष्ट्र के मराठा और मैसूर का हैदरअली। यदि ये तीनों शक्तियां अँग्रेजों के विरुद्ध एक हो जातीं तो दक्षिण में अँग्रेजों का अस्तित्त्व समाप्त हो सकता था। अतः अँग्रेज चाहते थे कि ये तीनों शक्तियाँ आपस में लड़ती रहें।

(2.) दक्षिण की इन तीनों शक्तियों में मराठा सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी और साम्राज्यवादी थे। अतः अँग्रेजों ने तय किया कि मराठों को घरेलू झगड़ों में फँसाये रखना चाहिये, ताकि बंगाल व उत्तर भारत में अँग्रेजों के बढ़ते हुए प्रभाव में उन्हें हस्तक्षेप करने का अवसर न मिल सके।

(3.) दक्षिण भारत के पश्चिमी तट पर अपने पैर फैलाने के लिए सालसेट, बसीन व गुजरात का कुछ भाग कम्पनी को अपने अधिकार में कर लेना चाहिए।

आंग्ल-मराठा सम्बन्ध

मुगल शक्ति के पतन के बाद उत्तर भारत में उत्पन्न हुई रिक्तता को मराठे तेजी से भरते जा रहे थे। अँग्रेज उनके प्रभाव को रोकना चाहते थे किंतु 18वीं शताब्दी के मध्य तक अँग्रेजों के पास इतनी शक्ति नहीं थी कि वे मराठों का सामना कर सकें। अतः कम्पनी इस बात का ध्यान रखती थी कि वह ऐसा कोई कार्य न करे, जिससे मराठों से संघर्ष करना पड़े। फिर भी वह निजाम, हैदरअली तथा मराठों को एक दूसरे के विरुद्ध उकसाने का कार्य करती रही। 1758 ई. में अँग्रेजों व मराठों के बीच एक समझौता हुआ, जिसके अनुसार अँग्रेजों ने मराठों से दस गाँव तथा मराठा क्षेत्र में कुछ व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त कीं। 1759 ई. में ब्रिटिश अधिकारी प्राइस व थामस मॉट्सन पूना गये। इन दोनों का उद्देश्य मराठों से सालसेट व बसीन प्राप्त करना था किन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। पानीपत में मराठों की पराजय ने अँग्रेजों को पुनः प्रोत्साहित किया तथा 1767 ई. में थामस मॉट्सन को पुनः पूना भेजा गया। इस बार भी सालसेट एवं बसीन के सम्बन्ध में कोई समझौता नहीं हो सका। पेशवा माधवराव (प्रथम), मैसूर के शासक हैदरअली के विरुद्ध अँग्रेजों की सहायता प्राप्त करना चाहता था किन्तु कम्पनी इस प्रस्ताव को स्वीकार करने को तैयार नहीं थी। फिर भी मॉट्सन ने पेशवा को आश्वासन दिया कि कम्पनी मराठों से कभी युद्ध नहीं करेगी और यदि कोई तीसरी शक्ति मराठों से युद्ध करती है तो कम्पनी मराठों के विरुद्ध उस तीसरी शक्ति को सहायता नहीं देगी।

18 नवम्बर 1772 को पेशवा माधवराव (प्रथम) की मृत्यु हो गयी। उसके कोई सन्तान नहीं थी, अतः उसका भाई नारायणराव (1772-1773 ई.) पेशवा की मनसब पर बैठा। नारायण का चाचा राघोबा (रघुनाथ) स्वयं पेशवा बनना चाहता था। अतः राघोबा ने अपनी पत्नी आनन्दीबाई के सहयोग से 13 अगस्त 1773 को नारायणराव की हत्या करवा दी और अपने आपको पेशवा घोषित कर दिया। बालाजी जनार्दन ने राघोबा की इस कार्यवाही का विरोध किया। बालाजी जनार्दन को नाना फड़नवीस के नाम से जाना जाता है। नाना फड़नवीस के नेतृत्व में मराठों ने बाराभाई संसद का निर्माण किया और शासन-प्रबन्ध अपने हाथ में ले लिया। उनके सामने समस्या यह थी कि पेशवा किसे बनाया जाये? जिस समय नारायणराव की मृत्यु हुई थी, उस समय उसकी पत्नी गंगाबाई गर्भवती थी। 18 अपै्रल 1774 को उसने एक बालक को जन्म दिया, जिसका नाम माधवराव (द्वितीय) रखा गया। बाराभाई संसद ने माधवराव (द्वितीय) को पेशवा घोषित कर दिया तथा नाना फड़नवीस को उसका संरक्षक नियुक्त कर दिया। बाराभाई संसद ने राघोबा को बंदी बनाने के आदेश दिये। इस पर राघोबा ने दिसम्बर 1774 में थाणे पर आक्रमण कर दिया किन्तु परास्त होकर भाग खड़ा हुआ।

सूरत की सन्धि (1775 ई.)

राघोबा भागकर बम्बई गया। उसने बम्बई कौंसिल के अध्यक्ष हॉर्नबाई से बातचीत की। इस बातचीत के बाद कम्पनी की बम्बई शाखा और राघोबा के बीच 6 मार्च 1775 को एक सन्धि हुई जिसे सूरत की सन्धि कहते हैं। इस सन्धि की मुख्य शर्तें इस प्रकार से थीं-

(1.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी राघोबा को पेशवा बनाने में सहायता करेगी।

(2.) राघोबा कम्पनी की बम्बई शाखा को थाणे, बसीन, सालसेट व जम्बूसर (गुजरात) के प्रदेश देगा।

(3.) राघोबा की सुरक्षा के लिए 2500 अँग्रेज सैनिक पूना में रखे जायेंगे जिनका खर्च सवा लाख रुपये वार्षिक के हिसाब से राघोबा, ईस्ट इण्डिया कम्पनी को देगा।

(4.) राघोबा अपनी सुरक्षा के बदले कम्पनी की बम्बई शाखा को छः लाख रुपये वार्षिक देगा।

(5.) यदि राघोबा पूना से कोई संधि या समझौता करेगा तो उसमें अँग्रेजों को भी सम्मिलित करेगा।

रेगुलेटिंग एक्ट के अनुसार ईस्ट इण्डिया कम्पनी की बम्बई शाखा राघोबा से किसी तरह की संधि करने के लिये अधिकृत नहीं थी। बम्बई शाखा ने यह सन्धि गवर्नर जनरल से पूछे बिना की थी। सन्धि के पश्चात् हॉर्नबाई ने पत्र लिखकर इसकी सूचना गवर्नर जनरल को भेज दी। इस सन्धि के कारण अँग्रेज व मराठों के संघर्षों का सूत्रपात हुआ तथा मॉट्सन ने मराठों को जो आश्वासन दिया था, उसे इस सन्धि द्वारा तोड़ दिया गया। राघोबा ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण सम्पूर्ण मराठा जाति की प्रतिष्ठा का बलिदान कर दिया।

प्रथम आंग्ल-मराठा संघर्ष (1775-1782 ई.)

सूरत की सन्धि के बाद बम्बई सरकार ने राघोबा की सहायता हेतु एक सेना भेजी। अँग्रेजी सेनाएँ पूना की ओर बढ़ीं। 18 मई 1775 को अँग्रेजों एवं मराठों के बीच अरास नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें मराठे परास्त हुए। अँग्रेजों ने सालसेट पर अधिकार कर लिया किन्तु इसी समय बंगाल कौंसिल ने हस्तक्षेप किया। क्योंकि बम्बई सरकार ने यह समझौता बिना बंगाल कौंसिल की स्वीकृति से किया था। बंगाल कौंसिल ने सूरत की सन्धि को अस्वीकार करके मराठों के विरुद्ध चल रहे युद्ध को बंद करने का आदेश दिया। ऐसा करने के कई कारण थे-

(1.) यह सन्धि राघोबा द्वारा हस्ताक्षरित थी और वह उस समय पेशवा नहीं था।

(2.) सूरत की सन्धि से कम्पनी को अनावश्यक युद्ध में भाग लेना पड़ा था।

(3.) मराठा शक्ति से अँग्रेजों को कोई क्षति नहीं हुई थी, अतः उनके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं था।

(4.) यह सन्धि रेग्यूलेटिंग एक्ट के विरुद्ध थी।

पुरन्दर की संधि (1776 ई.)

यद्यपि बंगाल कौंसिल ने युद्ध बन्द करने का आदेश दिया था, फिर भी युद्ध बन्द नहीं हुआ। तब बंगाल कौंसिल ने कर्नल अप्टन को मराठों से बातचीत करने पूना भेजा। अप्टन के पूना पहुँचने पर युद्ध बन्द हो गया। पूना में अप्टन और मराठों के बीच मतभेद उत्पन्न हो गये, क्योंकि अप्टन ने राघोबा को सौंपने से इन्कार कर दिया। साथ ही अप्टन, सालसेट व बसीन पर अधिकार बनाये रखना चाहता था। अतः यह वार्त्ता असफल हो गई और युद्ध पुनः चालू हो गया। मराठों ने युद्ध में बड़ी वीरता दिखाई किन्तु दुर्भाग्य से पेशवा का विद्रोही मराठा सरदार सदाशिव एक दूसरे मोर्चे पर मराठों के विरुद्ध आ धमका। मराठे दो मोर्चों पर युद्ध नहीं कर सके और उन्होंने अँग्रेजों से सन्धि करने हेतु प्रार्थना की। अँग्रेजों ने इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। 1 मार्च 1776 को दोनों पक्षों में एक संधि हुई जिसे पुरन्दर की सन्धि कहते हैं। इस सन्धि की मुख्य शर्तें इस प्रकार थीं-

(1.) कम्पनी ने शिशु माधवराव (द्वितीय) को पेशवा तथा नाना फड़नवीस को उसका संरक्षक मान लिया।

(2.) अँग्रेजों ने राघोबा से युद्ध करने पर जो राशि खर्च की है, उसके लिए मराठा, अँग्रेजों को 12 लाख रुपये देंगे।

(3.) सूरत की सन्धि को रद्द कर दिया गया।

(4.) मराठों ने राघोबा को 3 लाख 15 हजार रुपये वार्षिक पेंशन देना स्वीकार कर लिया।

(5.) राघोबा कोई सेना नहीं रखेगा तथा गुजरात के कोपर गाँव में जाकर रहेगा।

(6.) कम्पनी ने मराठों से सालसेट तथा बम्बई के निकट जो टापू प्राप्त किये हैं वे कम्पनी के पास ही रहेंगें।

इस सन्धि पर मराठों की ओर से सुखराम बापू ने तथा अँग्रेजों की ओर से कर्नल अप्टन ने हस्ताक्षर किये किन्तु बम्बई सरकार तथा वारेन हेस्टिंग्ज इस सन्धि को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। वारेन हेस्टिंग्स ने इस संधि को कागज का एक टुकड़ा कहा। इसी बीच मराठों ने विद्रोही सदाशिव राव भाऊ को पकड़कर उसकी हत्या कर दी। अब मराठे अँग्रेजों से निपटने के लिए तैयार थे। स्थिति उस समय और अधिक जटिल बन गई, जब 1778 ई. में एक फ्रांसीसी राजदूत सैण्ट लूबिन, फ्रांस के बादशाह का पत्र लेकर मराठा दरबार में पहुँचा। मराठों ने उसका शानदार स्वागत किया किन्तु जब अँग्रेज राजदूत मॉट्सन पूना पहुँचा तो उसका विशेष स्वागत नहीं किया गया। अतः यह अफवाह फैल गई कि मराठों एवं फ्रांसीसियों में सन्धि हो गई है। उधर मॉट्सन ने मराठा दरबार के मंत्री मोरोबा को अपनी ओर मिलाकर नाना फड़नवीस और सुखराम बापू में फूट डलवा दी। सुखराम बापू, जिसने पुरन्दर की संधि  पर हस्ताक्षर किये थे, विद्रोही हो गया। उसने गुप्त रूप से बम्बई सरकार को लिखा कि वह राघोबा को पेशवा बनाने में सहायता देने को तैयार है। अतः बम्बई सरकार ने कहा कि चूँकि पुरन्दर की सन्धि पर हस्ताक्षर करने वाला स्वयं हमारे निकट आ रहा है, इसलिए पुनः युद्ध चालू करने पर सन्धि का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। बंगाल कौंसिल ने इसका विरोध किया किन्तु वारेन हेस्टिंग्ज ने बम्बई सरकार का समर्थन किया। यद्यपि मराठों ने स्पष्ट कर दिया कि फ्रांसीसियों के साथ उनकी कोई सन्धि नहीं हुई है तथा सैण्ट लुबिन को भी वापस भेज दिया गया है किन्तु हेस्टिंग्ज ने मार्च 1778 में बम्बई सरकार को युद्ध करने का अधिकार दे दिया।

बड़गांव की संधि (1779 ई.)

बम्बई सरकार ने कर्नल एगटस के नेतृत्व में एक सेना भेजी। कर्नल एगटस मराठों के द्वारा परास्त कर दिया गया। उसके स्थान पर कर्नल काकबर्क को भेजा गया। मराठा सेना का नेतृत्व महादजी सिन्धिया एवं मल्हारराव होलकर कर रहे थे। मराठा सेना धीरे-धीरे पीछे हटती गई और ब्रिटिश सेना आगे बढ़ती गई। ब्रिटिश सेना पूना से 18 मील दूर तेलगाँव के मैदान तक पहुँच गई। 19 जनवरी 1779 को तेलगाँव पहुँचते ही अँग्रेजों को ज्ञात हो गया कि मराठों ने उन्हें तीन ओर से घेर लिया है। अँग्रेजों ने अपने गोला-बारूद में आग लगाकर पीछे हटना आरम्भ किया। इस पर मराठों ने आगे बढ़कर आक्रमण कर दिया। दोनों पक्षों में भीषण युद्ध हुआ जिसमें अँग्रेज परास्त हो गये। इस पराजय के साथ ही बम्बई सरकार को एक अपमानजनक समझौता करना पड़ा। 29 जनवरी 1779 को दोनों पक्षों में बड़गांव की संधि हुई। इस संधि की मुख्य शर्तें निम्नलिखित थीं-

(1.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी, राघोबा को मराठों के हवाले कर देगी।

(2.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अब तक जिन मराठा प्रदेशों पर अधिकार किया है, वे मराठों को सौंप दिये जायेंगे।

(3.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी, जब तक शर्तों को पूरा न करे, तब तक दो अँग्रेज अधिकारी बन्धक के रूप में मराठों की कैद में रहेंगे।

बड़गाँव की संधि अँग्रेजों के लिए घोर अपमानजनक थी। स्वयं हेस्टिंग्ज ने कहा- ‘जब बड़गाँव संधि की धाराओं को पढ़ता हूँ तो मेरा सिर लज्जा से झुक जाता है।’

अतः हेस्टिंग्ज ने इस संधि को स्वीकार नहीं किया और मराठों के विरुद्ध दो सेनाएँ भेजीं। एक सेना का नेतृत्व कर्नल पोफम कर रहा था और दूसरी का नेतृत्व कर्नल गॉडर्ड कर रहा था। जब नाना फड़नवीस को अँग्रेजों के आक्रमण की सूचना मिली तो उसने नागपुर के शासक भोंसले, हैदराबाद के निजाम तथा मैसूर के शासक हैदरअली को अपनी ओर मिलाया तथा अँग्रेजों का सामना करने की योजना तैयार की किन्तु हेस्टिंग्ज ने कूटनीति से निजाम व भौंसले को मराठों से अलग कर दिया। कर्नल गाडर्ड अहमदाबाद एवं बसीन पर अधिकार करके 1780 ई. में बड़ौदा पहुँच गया। उसने बड़ौदा के शासक फतेहसिंह गायकवाड़ से सन्धि की और पूना की ओर बढ़ा किन्तु पूना के निकट मराठों ने उसे काफी क्षति पहुँचाई। उत्तर दिशा में कर्नल पोफम ग्वालियर की ओर बढ़ा। 3 अगस्त 1780 को उसने ग्वालियर दुर्ग पर अधिकार कर लिया। उसके बाद सिप्री नामक स्थान पर महादजी सिन्धिया एवं पोफम के बीच भीषण युद्ध हुआ जिसमें महादजी परास्त हो गया। 13 अक्टूबर 1781 को उसने अँग्रेजों से सन्धि कर ली। इस सन्धि में एक धारा यह भी थी कि महादजी मराठों व अँग्रेजों के बीच सन्धि करवायेगा तथा सन्धि का पालन करवाने हेतु स्वयं अपनी गारण्टी देगा।

सालबाई की सन्धि (1782 ई.)

इधर गुजरात में कर्नल गॉडर्ड व मराठों के बीच युद्ध चल रहा था। ब्रिटिश सेना का दबाव बढ़ता जा रहा था। इस दबाव को कम करने के लिए नाना फड़नवीस ने हैदरअली को कर्नाटक पर आक्रमण करने को कहा। इस पर हैदरअली ने कर्नाटक पर धावा बोल दिया। इसके बाद अँग्रेजों की निरन्तर पराजय होने लगी। ब्रिटिश सेना का मनोबल गिरने लगा। अतः हेस्टिंग्ज ने एण्डरसन को मराठों से वार्त्ता करने भेजा। वार्त्ता के दौरान हेस्टिंग्ज ने एण्डरसन को तथा नाना फड़नवीस को जो पत्र लिखे, उनसे स्पष्ट होता है कि हेस्टिंग्स, मराठों से सन्धि करने के लिए अत्यधिक व्यग्र था। 17 मई 1782 को अँग्रेजों और मराठों के बीच सालबाई की सन्धि हुई। इस संधि की मुख्य शर्तें इस प्रकार से थीं-

(1.) अँग्रेजों ने राघोबा का साथ छोड़ने का आश्वासन दिया तथा मराठों ने उसे 25,000 रुपये मासिक पेन्शन देना स्वीकार कर लिया।

(2.) सालसेट तथा भड़ौच को छोड़कर मराठा राज्य के अन्य समस्त भू-भागों से कम्पनी अपना अधिकार त्यागने पर सहमत हो गई।

(3.) ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने माधवराव (द्वितीय) को पेशवा तथा फतेसिंह गायकवाड़ को बड़ौदा का शासक स्वीकार कर लिया। बड़ौदा के जिन भू-भागोंपर कम्पनी ने अधिकार कर लिया था, उन्हें पुनः बड़ौदा के शासक को लौटा दिया गया।

(4.) इस सन्धि की स्वीकृति के छः माह के अन्दर हैदरअली जीते हुए प्रदेश लौटा देगा।

इस संधि पर महादजी एवं नाना फड़नवीस के बीच मतभेद उत्पन्न हो गये। क्योंकि नाना का मित्र एवं अँग्रेजों का शत्रु हैदरअली, अभी तक अँग्रेजों से लड़ रहा था। अतः जब तक हैदरअली युद्ध के मैदान में था, अँग्रेजों से सन्धि करना हैदरअली के साथ विश्वासघात करने जैसा था। जब 7 दिसम्बर 1782 को हैदरअली की मृत्यु हो गई, तब नाना ने 20 दिसम्बर 1782 को सन्धि पर हस्ताक्षर कर दिये।                    

सन्धि का महत्त्व-

साल्बाई की सन्धि कुछ विशेष दृष्टिकोण से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थी। अँग्रेजों ने मराठों से सन्धि करके मैसूर को मराठों से अलग कर दिया। मैसूर का शासक हैदरअली मराठों की सहायता से वंचित हो गया। हैदरअली की मृत्यु के बाद उसके पुत्र टीपू ने यद्यपि युद्ध जारी रखा, किन्तु उसे मराठों की

स्मिथ के अनुसार सालबाई की सन्धि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई क्योंकि इसने दक्षिण भारत में कम्पनी का प्रभुत्व स्थापित कर दिया तथा इसके बाद 20 वर्षों तक कम्पनी एवं मराठों के बीच शान्ति बनी रही। स्मिथ ने इस सन्धि का महत्त्व आवश्यकता से अधिक बताया है। वस्तुतः यह सन्धि कम्पनी की असफलता को सूचित करती है। अँग्रेजों ने इस सन्धि के पूर्व जो कुछ प्राप्त किया था, उसमें से सालसेट को छोड़कर शेष सब खो दिया। इस सन्धि ने पेशवा की स्थिति को सुदृढ़ बनाया तथा महादजी सिंधिया का महत्त्व इतना अधिक बढ़ गया कि वह मैसूर पर प्रभुत्व स्थापित करने लगा। अँग्रेजों ने शाहआलम के मामले में हस्तक्षेप न करने का वादा किया। इससे शाहआलम पर महादजी सिंधिया का प्रभाव अधिक बढ़ गया और शाहआलम ने महादजी सिंधिया को मुगल सल्तनत का वकील-ए-मुतलक नियुक्त किया। अतः इस सन्धि से अँग्रेजों के प्रभुत्व की बजाय, मराठों के प्रभुत्व में वृद्धि हुई। अँग्रेजों एवं मराठों के बीच 20 वर्षों तक की दीर्घ शान्ति का कारण सालबाई की सन्धि नहीं थी, अपितु अँग्रेज उत्तर भारत में दूसरी समस्याओं में उलझ गये थे, जिससे वे मराठों की ओर ध्यान नहीं दे सके। इधर मराठा संघ में भी फूट पड़ गई थी।

पिट्स इण्डिया एक्ट

 1784 ई. में ब्रिटिश संसद ने पिट्स  इण्डिया एक्ट पारित किया जिसमें यह स्पष्ट कर दिया गया कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी देशी रियासतों के प्रति अहस्तक्षेप की नीति का पालन करेगी। इस एक्ट में यह भी प्रावधान किया गया कि गवर्नर जनरल को आपातकाल में, कौंसिल के बहुमत की स्वीकृति प्राप्त किये बिना भी कार्य करने के विशेष अधिकार होंगे।

हेस्टिंज की विदाई

1785 ई. में वारेन हेस्टिंग्ज अपना कार्यकाल पूरा होने पर इंग्लैण्ड चला गया। वारेन हेस्टिंग्ज के अत्याचारों, आर्थिक शोषण एवं कुकर्मों की गूंज ब्रिटिश पार्लियामेंट में भी हुई। क्लाइव की भांति उस पर भी मुकदमा चला जो सात साल तक (1788-1795 ई. तक) चलता रहा। उस पर बीस से भी अधिक आरोप लगाये गये। प्रधानमंत्री पिट प्रारम्भ में हेस्टिंग्ज के पक्ष में था किंतु बाद में हेस्टिंग्ज का विरोधी हो गया। अंत में हेस्टिंग्ज को क्लाइव की ही भांति दोष-मुक्त घोषित कर दिया गया। इस मुकदमे को लड़ने में हेस्टिंग्ज ने एक लाख पौण्ड खर्च किये। वह इतनी राशि भारत से लूटकर नहीं ले जा पाया था। इसलिये इस मुकदमे ने हेस्टिंग्ज को बर्बाद कर दिया।

अहस्तक्षेप की नीति

 हेस्टिंग के बाद मेकफर्सन ने 1785 से 1786 ई. में 21 माह तक कार्यवाहक गवर्नर जनरल के रूप में कार्य किया। सितम्बर 1786 में कार्नवालिस गवर्नर जनरल बनकर भारत आया। कार्नवालिस ने सामान्यतः अहस्तक्षेप की नीति का पालन किया। 1793 ई. में वह इंग्लैण्ड लौट गया तथा सर जॉन शोर (1793-1798 ई.) को गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया। उसने भी कार्नवालिस की नीति का अनुसरण किया। 1795 ई. में हैदराबाद के निजाम एवं मराठों के बीच खरदा का युद्ध हुआ। निजाम ने कम्पनी से सैनिक सहायता मांगी किंतु कम्पनी ने देशी राज्यों के परस्पर झगड़ों में हस्तक्षेप करने तथा निजाम को सहायता देने से इन्कार कर दिया। निजाम मराठों से परास्त हो गया और उसे मराठों से अपमानजनक शर्तों पर सन्धि करनी पड़ी। 1796 ई. में पेशवा माधवराव (द्वितीय) की मृत्यु हो गई तथा बाजीराव (द्वितीय) पेशवा के मनसब पर बैठा।

1798 ई. में सर जॉन शोर को वापिस इंग्लैण्ड बुला लिया गया। इस प्रकार सालबाई की सन्धि के बाद 20 वर्ष तक अंग्र्रेजों तथा मराठों के बीच शान्ति रही किंतु इस अवधि में मराठे अपने अन्य शत्रुओं से निपटते रहे। नाना फड़नवीस के नेतृत्व में उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत में मराठों का प्रभाव फैलने लगा। इस अवधि में महादजी सिन्धिया की शक्ति में भी अपूर्व वृद्धि हुई तथा पेशवा की शक्ति का ह्रास हुआ।

लार्ड वेलेजली द्वारा अहस्तक्षेप की नीति का त्याग (1798-1805 ई.)

1798 ई. में मार्क्विस वेलेजली को बंगाल का गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया। उसने सहायक संधियों के माध्यम से हैदराबाद के निजाम, अवध के नवाब, मराठों के पेशवा, राजपूताने के अलवर, भरतपुर, जयपुर, जोधपुर तथा बीकानेर और त्रावणकोर के राजा सहित अनेक राजाओं और नवाबों पर कम्पनी की सर्वोच्चता स्थापित की।

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