Tuesday, June 18, 2024
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रक्त की नदी में तैर कर निकला पाकिस्तान (2)

भारत और पाकिस्तान दोनों तरफ ट्रेनों पर एक-जैसे हमले हो रहे थे। दोनों ही तरफ मुनष्य का लिंग उसकी पहचान बना गया। भारत में सिक्खों और हिन्दुओं ने ऐसे प्रत्येक ट्रेन यात्री को कत्ल लिया जो मर्द हो ओर जिसका खतना हो चुका हो। पाकिस्तान में भी आक्रमणकारी प्रत्येक मर्द यात्री के लिंग की जांच करते। खतना नहीं, जिंदगी नहीं। ऐसे दौर कई बार आए, जब लाहौर और अमृतसर के स्टेशनों पर पहुंचने वाली प्रत्येक ट्रेन लाशों और घायलों से ही लदी हुई मिली।

आजादी की कितनी बड़ी कीमत दोनों देशों की जनता चुका रही थी, इसका साक्षात् उदाहरण अश्विनी दुबे नामक एक कर्नल ने लाहौर में देखा, जहाँ वह भारत की ओर से शांति स्थापना अधिकारी के रूप में भेजा गया था। घायलों और लाशों से लदी एक ट्रेन लाहौर के प्लेटफार्म पर आकर रुकी। हर डिब्बे में सन्नाटा छाया हुआ था। हर दरवाजे के नीचे से खून रिस-रिस कर पटरियों पर गिर रहा था, जैसे किसी रेफ्रिजिरेटर की बर्फ अत्यधिक गर्मी के कारण पिघलकर बहती जा रही थी।

ट्रेनों की सुरक्षा के लिए सशस्त्र सैनिक साथ चलते तो थे किंतु जब हिन्दुओं द्वारा आक्रमण होता तो हिन्दू सैनिक उन पर गोली न चला पाते। इसी प्रकार मुसलमान सैनिक मुसलमानों के आक्रमणों को रोक पाने में समर्थ नहीं थे।

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न्यूयार्क टाइम्स के एक संवाददाता रॉबर्ट ट्रम्बुल ने लिखा- ‘वीभत्सतम दृश्यों ने भी मुझे उतना आघात नहीं पहुंचाया है, जितना भारत के इन दृश्यों ने। भारत में इन दिनों जितनी बारिश नहीं होती, उतना खूर गिर रहा है। सैंकड़ों की दर से लाशें तो नजर आती ही हैं, उन हजारों हिन्दुस्तानियों को किसने गिना है जो आंख, या नाक के बिना, हाथ-पैरों या यौन-अंगों के बिना अभिशप्त भूतों की तरह भटक रहे हैं?

गोली से मरने का मौका तो शायद ही किसी भाग्यवान को मिलता है। आम तौर पर मर्दों, औरतों और बच्चों को भी मुदगरों या पत्थरों इत्यादि से इतना पीटा जाता है कि उनकी मौत सुनिश्चित हो जाए लेकिन उन्हें पूरी तरह मारे बिना छोड़ दिया जाता है। भीषण गर्मी और झूमती मक्खियों के कारण वे कितनी बुरी मौत, कितने धीमे-धीमे मरतेे होंगे, इसकी क्या कल्पना भी की जा सकती है?

राक्षसीपने में कोई जाति किसी से कम नहीं थी। पंजाब बाउण्ड्री फोर्स के एक अधिकारी ने जब सिक्खों के आक्रमण के बाद एक गांव में प्रवेश किया तो पाया कि चार मुसलमान शिशु खुली अंगीठियों पर उसी तरह भूने गए थे, जिस तरह से सूअर के बच्चे भूने जाते। एक और अधिकारी ने ऐसी हिन्दू औरतों को देखा जिन्हें जूथ बनाकर कत्ल करने के लिए ले जाया जा रहा था और जिनके स्तनों को मुसलमान उन्मादियों ने काट डाला था।’

अड़तालीस घण्टे भी नहीं बीते होंगे कि पूर्वी-पंजाब से लेकर पश्चिमी-पंजाब से भयंकर सांप्रदायिक दंगों की खबरें आने लगीं और दिल्ली से कराची तक कोई भी इनकी आग से अछूता नहीं बचा। भारत और पाकिस्तान दोनों ही में इन हंगामों की आग धू-धू कर जलने लगी। सेना के विभाजन का परिणाम यह हुआ कि उसके अंदर खुद सांप्रदायिकता घुस गई। सैनिक, हंगामों को शांत करने की जगह स्वयं उसमें सम्मिलित हो गए। सेना और प्रशासन के अधिकारियों ने इन हंगामों को खूब बढ़ाने की कोशिश की।

पंजाब के ब्रिटिश गवर्नर सर फ्रांसिस मूडी ने पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मुहम्मद अली जिन्ना के नाम 5 सितम्बर 1947 को एक पत्र लिखा जिसमें कहा गया- ‘मैं हर एक से कह रहा हूँ कि मुझे इस बात की चिंता नहीं है कि सिक्ख सरहद कैसे पार कर रहे हैं। बड़ी बात यह है कि जितनी जल्दी हो उतनी ही जल्दी इनसे पिंण्ड छुड़ाया जाए।’

इन साम्प्रदायिक दंगों में पाकिस्तान और भारत दोनों में कितने आदमी मारे गए, कितने शरणार्थी बनाए गए, कितनी युवतियों का अपहरण किया गया और उन्हें नीलाम किया गया, इसका सही हिसाब देना किसी के लिए भी संभव नहीं।

केवल पंजाब में ऐसी घटनाओं का हिसाब निम्नलिखित था- ‘छः लाख मारे गए। 1,40,00,000 शरणार्थी बना दिए गए। दोनों पक्षों द्वारा 1,00,000 युवतियों का अपहरण किया गया, बलपूर्वक उनका धर्मांतरण किया गया और उन्हें नीलाम कर दिया गया। पंजाब और बंगाल को और फिर दोनों देशों को मिलाकर विचार करने पर ऐसी घटनाओं की संख्या दूने से कम न होगी।’

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