Tuesday, May 24, 2022

गांधी और नेहरू को सार्वजनिक मंचों से अपमानित करता था जिन्ना!

अंग्रेजी रंग में रंगा था पाकिस्तान का भावी जनक

ई.1934 से ई.1947 तक की संक्षिप्त अवधि में भारतीय राजनीति के आकाश पर जिन्ना और गांधीजी एक दूसरे के राजनीतिक दुश्मन माने जाते थे। गांधीजी पूरी तरह भारतीय रंग में रंगे हुए, राजनीति के ऐसे धूमकेतु थे जिनका मुकाबला दुनिया का कोई दूसरा आदमी नहीं कर सकता था तो जिन्ना पूरी तरह से अंग्रेजियत के रंग में रंगा हुआ था।

गांधी को जिन्ना की तुलना में कुरान की ज्यादा ही आयतें याद रही होंगी। इसके बावजूद जिन्ना की सफलता बेमिसाल थी क्योंकि उसने जिन मुसलमानों का दिल जीत कर दिखा दिया था, जिन्ना उनकी परम्परागत मातृभाषा उर्दू ठीक से बोल भी नहीं सकता था। उसके उच्चारण का हाल यह था कि एक बार उसने अपने भाषण के अंत में ‘पैकिस्टैन जिण्डैबैड’ कहा। कुछ पत्रकारों ने इन शब्दों का अर्थ ‘पाकिस्तान इज इन बैग’ लगाया जबकि वह तो ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ कहना चाहता था।

गांधीजी को तनिक भी सहन नहीं करता था जिन्ना

कौलिन्स एण्ड लैपियरे ने लिखा है- वह गांधीजी को महात्मा मानने से मना करता था तथा उन्हें चालाक लोमड़ी, साँप और हर किसी से होड़ करने वाला हिन्दू कहता था। लियोनार्ड मोसले ने लिखा है- गांधीजी के लिये उसका कहना था- ‘इस आदमी को किसी एक बात तक लाना असम्भव है। वह साँप की तरह चालाक है।’

जिन्ना गांधीजी को बिल्कुल सहन नहीं कर पाता था। लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर ने फ्रीडम एट मिडनाइट में लिखा है- ‘एक बार गांधीजी किसी वार्ता के लिये जिन्ना के निवास स्थान पर गये। मध्यांतर हुआ तो गांधीजी जिन्ना के बहुमूल्य पर्शियन कालीन पर लेट गये और अपने पेट पर मिट्टी रख ली। इस दृश्य को जिन्ना कभी भूल नहीं सका, कभी माफ नहीं कर सका।

कम से कम दो बार जिन्ना को कांग्रेस के सार्वजनिक मंच से इसलिये भगाया गया क्योंकि कांग्रेसी सदस्य चाहते थे कि जिन्ना गांधीजी को महात्मा कहकर सम्बोधित करे जबकि जिन्ना उन्हें ‘मिस्टर घैण्ढी’ कहकर ही सम्बोधित करता था।

पण्डित नेहरू को राजनीति में नहीं देखना चाहता था जिन्ना

लैरी कालिंस एवं दॉमिनिक लैपियर ने अपनी पुस्तक फ्रीडम एट मिडनाइट में लिखा है- जवाहरलाल नेहरू के बारे में जिन्ना के मन में आक्रोश ही आक्रोश था। वह नेहरू के बारे में कहा करता- ‘यहाँ राजनीति में नेहरू का क्या काम? जाएं अंग्रेजी के प्रोफेसर बनें। खिसकें। साहित्यकार हैं। राजनीति में घुसे आ रहे हैं। घमण्डी ब्राह्मण हैं। पश्चिमी पढ़ाई-लिखाई का बाना जरूर पहन लिया लेकिन अंदर से मक्कार हिन्दू….. हैं।’

लियोनार्ड मोसले ने लिखा है कि जवाहरलाल नेहरू के लिये जिन्ना का कहना था- ‘उद्दण्ड ब्राह्मण जो अपनी चालबाजी को पश्चिमी शिक्षा के आवरण से ढंककर रखता है। जब वह वादा करता है, कोई न कोई रास्ता छोड़ देता है और जब कोई रास्ता नहीं मिलता तो सफेद झूठ बोलता है।’

मैक्यावेली का शिष्य

जिन्ना राजनीति में मैक्यावेली का शिष्य था जिसके अनुसार राजनीति में कोई निश्चित सिद्धांत कभी नहीं होता। वह अपने सिद्धांतों एवं मांगों में परिवर्तन करता रहता था। आरम्भ में वह विधान सभाओं में मुसलमानों के लिए अलग प्रतिनिधित्व मांगता था तो बाद में वह सिंध और सीमाप्रांत को अलग करने पर जोर देता था और केन्द्र में एक तिहाई स्थान प्राप्त करना चाहता था। अंत में वह भारत विभाजन का समर्थक बन गया जिसमें उसने सिंध एवं सीमाप्रांत के साथ-साथ पंजाब, बंगाल एवं असम को भी जोड़ लिया था।

पाकिस्तान प्राप्त करने के लिए उसने द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत स्वीकार किया था किंतु पाकिस्तान बनने के बाद उसने धर्मनिरपेक्ष-राष्ट्र के पक्ष में वक्तव्य दिया। इसके कुछ दिन बाद ही वह पाकिस्तान को कट्टर-मुस्लिम राज्य बनाने में जुट गया। कैबीनेट मिशन में प्रस्तावित भारतीय संघ में बनने वाले केन्द्र के नीचे वह प्रांतों के समूहीकरण का विरोध करता था किंतु पाकिस्तान का गवर्नर-जनरल बन जाने के बाद वह अमरीका के राजदूत से शिकायत करता था कि वह भारत के साथ साझा सेना, मुक्त व्यापार एवं खुली हुई सीमाएं चाहता है।

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