Tuesday, October 26, 2021

पूर्वी-पाकिस्तान में धर्म के नाम पर हिन्दुओं की और भाषा के नाम पर मुसलमानों की हत्या

ई.1947 में जिस समय उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत से लेकर पंजाब एवं सिन्ध तक के भू-भाग में मारकाट मची, उस समय भारत की पूर्वी सीमा अर्थात् बंगाल अपेक्षाकृत शांत रहा था। बहुत से इतिहासकार इस शांति का श्रेय गांधीजी को देते हैं किंतु इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि बंगाल ई.1946 के उत्तरार्ध में सीधी कार्यवाही एवं उसके बाद हुए रक्तपात में खून की होली खेलकर निबटा ही था इसलिए बंगाल के हिन्दू और मुसलमान 1947 के विभाजन के समय एक-दूसरे के विरुद्ध हथियार उठाने की स्थिति में नहीं आ पाए थे और जिन्हें पश्चिमी बंगाल से पूर्वी-पाकिस्तान में जाना था या पूर्वी-पाकिस्तान से पश्चिमी बंगाल में आना था, सामान्यतः बिना रक्तपात करे हुए आ गए किंतु जैसे ही एक-दो वर्ष का समय व्यतीत हुआ, पूर्वी-पाकिस्तान में असंतोष एवं हिंसा की लहर फूट पड़ी।

जहाँ विभाजन के समय पंजाब एवं सिंध में धर्म के आधार पर भगदड़ एवं मारकाट मची थी, वहीं बंगाल में मारकाट का आधार धर्म के साथ-साथ भाषाई भी था। इस कारण पूर्वी-पाकिस्तान में रह रहे बिहारी मुसलमानों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। इतिहास ने उन्हें उस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था जहाँ उन्हें पैर रखने के लिए धरती कम पड़ गई थी।

जब पूर्वी-पाकिस्तान में हिन्दुओं को सताया जाता था अथवा मारा जाता था तो वे भारत की ओर भागने का प्रयास करते थे किंतु जब पूर्वी पाकिस्तान के उर्दू बोलने वाले बिहारी मुसमलमानों को बंग्ला-भाषी मुसलमानों द्वारा सताया जाता था या मारा जाता था, तो उन्हें ऐसे देश की तरफ भागना पड़ता था जहाँ से वे अथवा उनके धर्म के लोग कुछ समय पूर्व ही धर्म के आधार पर भाग कर आए थे। इस प्रकार पूर्वी-पाकिस्तान में भयानक मारकाट मच गई।

बंग्ला-भाषी मुसलमान एक ओर तो बंग्ला-भाषी हिन्दुओं को मारकर भगा रहे थे तो दूसरी ओर उर्दू-भाषी बिहारी मुसलमानों को। पूरा पूर्वी-पाकिस्तान खून से भीग गया और पश्चिमी बंगाल जान बचाकर भाग आने वाले शरणार्थियों से भर गया।

श्यामाप्रसाद मुखर्जी द्वारा बांग्लादेश से भूमि की मांग

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8 अप्रेल 1950 को शरणार्थी समस्या के समाधान के लिए नेहरू-लियाकत समझौता हुआ। इसे दिल्ली समझौता भी कहते हैं। इस समझौते के अनुसार दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने अल्पसंख्यकों की रक्षा करने एवं साम्प्रदायिक उपद्रवों को रोकने की जिम्मेदारी ली। दोनों ने ऐसा वातातरण तैयार करने की जिम्मेदारी भी ली जिससे अल्पसंख्यकों को अपना देश छोड़ने पर मजबूर नहीं होना पड़े।

इसी के साथ उन्होंने विस्थापितों के पुनर्वास की व्यवस्था करने की भी जिम्मेदारी ली। भारत के पुनर्वास मंत्री डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने मांग की कि या तो बंगाल के विभाजन को अस्वीकार कर दिया जाए या पाकिस्तान से विस्थापितों को बसाने हेतु अतिरिक्त भूमि मांगी जाए।

भारतीय प्रधानमंत्री नेहरू ने अपने पुनर्वास एवं आपूर्तिमंत्री डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के प्रस्तावों को अव्यावहारिक बताया। इससे नाराज होकर 8 अप्रेल 1950 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी तथा क्षितीश चन्द्र न्योगी ने नेहरू मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया।

बांग्लादेश से शरणार्थियों के जत्थे

ई.1954 में पूर्वी-पाकिस्तान से पुनः बड़ी संख्या में हिन्दू विस्थापित होकर भारत आने लगे। वे आज तक भी आ रहे हैं। ई.1954 में औसतन प्रति माह 6,600 विस्थापित-हिन्दू भारत आए। ई.1955 में इस औसत में वृद्धि हुई तथा 13,500 विस्थापित प्रतिमाह भारत आने लगे।

अगले वर्ष इनका औसत बढ़कर 20,003 प्रतिमाह से ऊपर हो गया। पूर्वी-पाकिस्तान से जनवरी 1956 में 19,206 हिन्दू तथा फरवरी 1956 में 43,534 हिन्दू भारत आए। ई.1956 के अंत तक कुल मिलाकर 3.2 लाख हिन्दू भारत आए।

इस पर भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वक्तव्य दिया- ‘यह समस्या काश्मीर समस्या भी अधिक भयंकर एवं जटिल है।’  

अप्रेल 1956 में भारत सरकार ने पूर्वी-पाकिस्तान से भारत आने के इच्छुक विस्थापितों के लिए पारगमन नियमों को कठोर बना दिया गया। इससे विस्थापितों के भारत आगमन की प्रक्रिया कुछ मंदी पड़ी किंतु वह लगातार जारी रही। भारत सरकार के पुनर्वास मंत्री एम. सी. खन्ना ने विस्थापितों के लगातार भारत आने के कारण बताते हुए कहा- ‘इन लोगों को घर त्यागने के लिए बाध्य किया जाता है एवं इन्हें दैनिक जीवन में असुरक्षा तथा भेदभाव का सामना करना पड़ता है, इसलिए ये लोग भारत आते हैं। वर्ष 1957 में 10,920 तथा 1958 में 4,898 हिन्दू भारत आए।’ ई.1958 में अयूब खाँ द्वारा पाकिस्तान पर सैनिक शासन लादे जाने के बाद पूर्वी-बंगाल, पश्चिमी पाकिस्तान से आए सैनिकों की संगीनों के साए में जीने लगा।

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