Wednesday, May 22, 2024
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163. लॉर्ड डलहौजी ने मुगल बादशाह से किला खाली करने को कहा!

मरहूम बादशाह अकबर (द्वितीय) की 22 संतानें थीं जिनमें से 14 पुत्र तथा 8 पुत्रियां थीं। बादशाह के बड़े पुत्र का नाम मिर्जा जहांगीर था। अकबरशाह चाहता था कि मिर्जा जहांगीर ही अगला बादशाह बने किंतु उसका दूसरे नम्बर का पुत्र मिर्जा अबु जफर सिराजुद्दीन मुहम्मद भी बादशाह बनना चाहता था।

उत्तराधिकार के प्रश्न पर बड़े शहजादे मिर्जा जहांगीर तथा उसके छोटे भाई मिर्जा अबु जफर के बीच दुश्मनी हो गई। बड़े भाई मिर्जा जहांगीर ने अपने छोटे भाई मिर्जा अबु जफर को दो बार जहर देकर मारने का षड़यंत्र किया किंतु शहजादा जफर दोनों ही बार बच गया।

बादशाह अकबरशाह की मृत्यु के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारियों ने बड़े शहजादे मिर्जा जहांगीर की बजाय उसके छोटे भाई मिर्जा अबु जफर को बादशाह बनाया क्योंकि छोटा भाई अपने बड़े भाई की अपेक्षा अधिक शिक्षित, विनम्र तथा सभ्य था। शाहजहाँ और औरंगजेब के जमाने में जिस मुगल तख्त पर अधिकार करने के लिए लाखों लोगों का रक्त बहाया जाता था, उसी मुगल तख्त पर अधिकार करने के लिए अब केवल अंग्रेज अधिकारियों की कृपा ही पर्याप्त थी।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के पॉलिटिकल ऑफिसर चार्ल्स टी. मेटकाफ ने अपनी डायरियों में दोनों शहजादों के बीच चल रही प्रतिस्पर्द्धा की चर्चा करते हुए लिखा है कि मेटकाफ ने शहजादों को सलाह दी थी कि भावी बादशाह को उतावला नहीं होना चाहिए अपितु धीर-गंभीर और शांत रहना चाहिए।

अनुमान लगाया जा सकता है कि अकबरशाह के बड़े शहजादे मिर्जा जहांगीर के स्थान पर मिर्जा अबु जफर को अगला बादशाह बनाने में चार्ल्सट टी. मेटकाफ की भी भूमिका रही होगी। चार्ल्स टी मेटकाफ कुछ समय के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी का भारत में एक्टिंग गवर्नर जनरल भी रहा था। भारत में कम्पनी का साम्राज्य जमाने में मेटकाफ की बड़ी भूमिका थी।

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मिर्जा अबु जफर सिराजुद्दीन मुहम्मद का जन्म 24 अक्तूबर 1775 को बेगम लालबाई की कोख से हुआ था। बादशाह अकबर शाह (द्वितीय) की मृत्यु के बाद 28 सितंबर 1837 को वह बहादुरशाह के नाम से भारत का 19वां मुगल बादशाह हुआ। उसे मुगलों के इतिहास में बहादुरशाह (द्वितीय) कहा जाता है। वह उर्दू भाषा में जफर उपनाम से कविताएं लिखा करता था इसलिए भारत के लोग उसे बहादुरशाह जफर कहना अधिक पसंद करते हैं।

बहादुरशाह जफर समय की सच्चाई को समझता था। वह जानता था कि वह बादशाह नहीं है, वह तो काल के गाल में समा चुकी मुगल बादशाहत की छाया मात्र है जो कौन जाने कब विलुप्त हो जाए! इसलिए बहादुरशाह जफर ने अंग्रेजों के काम में कभी हस्तक्षेप करने का प्रयास नहीं किया और अपना समय उर्दू एवं फारसी कविताएं पढ़ने-लिखने में व्यतीत करता रहा।

इस काल में दिल्ली में उर्दू कविता की धूम मची हुई थी। बादशाह के दरबार में मिर्जा गालिब, दाग, मूमिन तथा जौक जैसे उर्दू शायर भी आ जुटे थे। ये शायर नित्य ही बादशाह के चारों ओर जमावड़ा लगाए रहते, एक दूसरे को अपने शेर, गजलें और नज्में सुनाया करते तथा एक दूसरे को दाद अर्थात् शाबासी दिया करते।

वे बादशाह के समक्ष सिर झुकाकर लम्बी-लम्बी कोर्निश करते तथा उसे शहंशाह, जिल्लेइलाही और साहबेआलम जैसे भारी-भरकम शब्दों से सम्बोधित करते। इन शब्दों के बाहरी अर्थ तो महान थे किंतु इनके भीतर सिवाय खोखलेपन के और कुछ नहीं था। इस पर भी इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि इस काल के उर्दू शाइर अद्भुत प्रतिभा के धनी थे तथा उनकी उर्दू कविताएं आज भी विश्व के साहित्य कोश को समृद्ध कर रही हैं।

बहादुरशाह का जीवन शांत झील की तरह अपने आप में सिमटा हुआ था, उसे किसी से कुछ लेना-देना नहीं था। ऐसा लगता था कि उसकी बादशाहत ऐसे ही चलती रहेगी, ईस्ट इण्डिया कम्पनी उसे पेंशन देती रहेगी और उसके दोस्त उसकी कविताएं सुनने और सुनाने के लिए आते रहेंगे किंतु प्रकृति ने उसके भाग्य में हमेशा के लिए ऐसा होते रहना नहीं लिखा था!

लॉर्ड एलनबरो ई.1842 से 1844 तक भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का गवर्नर जनरल रहा। उसने बादशाह को कम्पनी की तरफ से विभिन्न अवसरों पर दिए जाने वाल समस्त उपहारों एवं भेंट पर रोक लगा दी। उसके बाद लॉर्ड डलहौजी ई.1848 में गवर्नर जनरल बनकर आया। उसने बादशाह बहादुरशाह जफर को लाल किला खाली करके दिल्ली के बाहर महरौली में जाकर रहने के लिये कहा किंतु बादशाह लाल किले में निवास करता रहा।

ई.1856 में डलहौजी के उत्तराधिकारी के रूप में आए गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग ने घोषणा की कि बहादुरशाह के बाद उसका उत्तराधिकारी केवल शहजादे के रूप में जाना जायेगा। उसे बादशाह की उपाधि नहीं दी जायेगी। बहादुरशाह जफर की चार बेगमें थीं जिन्होंने 22 शहजादों एवं शहजादियों को जन्म दिया था।

अँग्रेजों ने बादशाह की इच्छा के विरुद्ध, बादशाह के सबसे निकम्मे पुत्र मिर्जा कोयास को बादशाह का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। कम्पनी के अधिकारियों द्वारा शहजादे मिर्जा कोयास से संधि की गई कि वह अपने पिता की मृत्यु के बाद दिल्ली का लाल किला खाली कर देगा, स्वयं को बादशाह नहीं कहेगा तथा एक लाख रुपये के स्थान पर 15 हजार रुपये मासिक पेंशन स्वीकार करेगा।

कोयास ने इन समस्त शर्तों को स्वीकार कर लिया किंतु लॉर्ड केनिंग द्वारा की जा रही इन कार्यवाहियों से दिल्ली के मुसलमानों में अँग्रेजों के विरुद्ध असन्तोष उत्पन्न हो गया। दिल्ली से बाहर के मुसलमानों ने भी केनिंग की इस कारगुजारी को भारत से मुगल सत्ता समाप्त करने का षड़यंत्र माना तथा वे अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह करने की योजनाएं बनाने लगे।

लॉर्ड डलहौजी एवं लॉर्ड केनिंग द्वारा न केवल मुगल बादशाह के समस्त चिह्न नष्ट करने के प्रयास किए गए थे अपितु भारत के समस्त राजाओं, नवाबों और बेगमों के राज्य छीनकर पूरे भारत को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रत्यक्ष शासन के अधीन लाने के कुचक्र भी रचे गए थे। कम्पनी सरकार की इन कार्यवाहियों ने भारत के देशी शासकों में जबर्दस्त गुस्से को जन्म दिया जिसके कारण बीस वर्ष की बादशाहत के बाद ई.1857 में लाल किले के शांत जीवन में जबर्दस्त भूकम्प आ गया जिससे बहादुरशाह जफर का जीवन दुःखों की दास्तान बनकर रह गया।

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