Tuesday, October 26, 2021

अध्याय – 3 – भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के इतिहास को जानने के साधन (अ)

लोकांचल में बहुत पहले से ही संख्या, लिपि, गणना, धातुतन्त्र, आदि शास्त्र प्रचलित रहे हैं और ऐसे ही अप्रमेय शिल्पयोग लोकानुबन्धी हैं और बहुत कोटि कल्पों से इनकी शिक्षा पाई जाती है।  – ललितविस्तर, 10, 297.

सभ्यता एवं संस्कृतियां जब विकास करती हैं तो उनके आरम्भिक चरण में मानव को भाषा, लिपि, लेखनकला, चित्रकला एवं मूर्तिकला आदि का ज्ञान नहीं होता। इसलिए उस काल का इतिहास जुटाने में भौतिक अवशेषों का सहारा लेना पड़ता है। उदाहरण के लिए अण्डमान निकोबार के एक आदिवासी समुदाय की बस्ती के बाहर स्थित टीलों की खुदाई करके पता लगाया जा सकता है कि उस टीले में मछलियों की हड्डियां, नारियल के कड़े छिलके, कछुओं के खोल, बड़े पशुओं की हड्डियां एक के ऊपर एक कितने स्तरों में दबे हुए हैं? वे कितने पुराने हैं?

विभिन्न स्तरों में जमा मछलियों एवं नारियलों को छीलने के लिए किस सामग्री अथवा विधि का प्रयोग किया गया था? इस सामग्री के अध्ययन से न केवल उस टीले में रहने वाले आदिवासियों की प्राचीनता का ज्ञान होता है अपितु विभिन्न कालखण्ड में उस कबीले की अनुमानित संख्या, खान-पान की आदतों एवं रहन-सहन के तौर तरीकों आदि का भी अनुमान हो जाता है। इसी प्रकार उस बस्ती के आसपास स्थित शवाधानों (कब्रों) की खोज करके उनके रीति-रिवाजों, परम्पराओं तथा उनके धार्मिक विचारों आदि का पता लगाया जा सकता है।

उन शवों की हड्डियों की कार्बन डेटिंग से उनकी आयु तथा नृवंशविज्ञान के माध्यम से उन मृत मानवों की मूल नृवंशीय जाति का पता लगाया जा सकता है कि वे नीग्रेटो जाति के हैं या भूमध्यसागरीय द्रविड़ हैं या पश्चिमी ब्रेचीसेफल्स जाति के हैं।

विश्व की अन्य सभ्यताओं की भांति प्राचीन भारतीयों ने भी अपने पीछे अनगिनत भौतिक अवशेष छोड़़े हैं जिन्हें जोड़कर इतिहासकारों ने प्राचीन भारतीय इतिहास का निर्माण किया है। जब कोई सभ्यता मूर्तिकला, स्थापत्य कला तथा लेखन कला का विकास कर लेती है तब उस सभ्यता का इतिहास जानने के दो प्रमुख स्रोत उपलब्ध हो जाते हैं- (1.) साहित्यक स्रोत तथा (2.) पुरातात्विक स्रोत। इस अध्याय में हम भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के इतिहास को जानने के लिए इन दोनों स्रोतों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

साहित्यिक स्रोत

सभ्यता एवं संस्कृति के इतिहास को जानने के लिए उपलब्ध प्राचीन भारतीय साहित्यिक स्रोतों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1) भारतीय साहित्यिक स्रोत तथा (2) विदेशी विवरण।

(1.) भारतीय साहित्यिक स्रोत

भारतीयों को ई.पू. 2500 में लिपि की जानकारी हो चुकी थी परन्तु सबसे प्राचीन उपलब्ध हस्तलिपियाँ ईसा पूर्व चौथी सदी की हैं। ये हस्तलिपियाँ मध्य एशिया से प्राप्त हुई हैं। भारत में ये लिपियाँ भोजपत्रों और ताड़पत्रों पर लिखी गई हैं, परन्तु मध्य एशिया में जहाँ भारत की प्राकृत भाषा का प्रचार हो गया था, ये हस्तलिपियाँ मेष-चर्म तथा काष्ठ-पट्टियों पर भी लिखी गई हैं।

इन्हें भले ही अभिलेख कहा जाता हो, परन्तु ये हस्तलिपियाँ ही हैं। चूँकि उस समय मुद्रण-कला का जन्म नहीं हुआ था इसलिए ये हस्तलिपियाँ अत्यधिक मूल्यवान समझी जाती थीं। समस्त भारत से संस्कृत की पुरानी हस्तलिपियाँ मिली हैं, परन्तु इनमें से अधिकतर हस्तलिपियाँ दक्षिण भारत, कश्मीर एवं नेपाल से प्राप्त हुई हैं। इस प्रकार के अधिकांश हस्तलिपि-लेख, संग्रहालयों और हस्तलिपि ग्रंथालयों में सुरक्षित हैं। ये हस्तलिपियां प्राचीन इतिहास को जानने के प्रमुख स्रोत हैं।

प्राचीन भारत के इतिहास को जानने के भारतीय साहित्यिक स्रोतों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है- (अ.) धार्मिक ग्रन्थ (ब.) अन्य ग्रन्थ।

(अ.) धार्मिक ग्रन्थ: यद्यपि अधिकांश प्राचीन भारतीय ग्रंथ, धार्मिक विषयों से सम्बन्धित हैं तथापि वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, धर्मसूत्र, बौद्ध-साहित्य, जैन साहित्य आदि धार्मिक ग्रंथों में ऐतिहासिक तथ्य भी मिलते हैं। बिम्बसार के पहले के राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक इतिहास को जानने के लिए ये ग्रंथ ही प्रमुख साधन हैं। इनमें धार्मिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक तथ्यों की प्रचुरता के साथ-साथ राजनैतिक तथ्य भी मिलते हैं।

(i) हिन्दू-धर्म ग्रंथ: हिन्दुओं के धार्मिक साहित्य में वेदों, उपनिषदों, महाकाव्यों (रामायण और महाभारत) तथा पुराणों आदि का समावेश होता है। यह साहित्य, प्राचीन भारत की सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों पर काफी प्रकाश डालता है किंतु इनके देश-काल का पता लगाना काफी कठिन है।

वैदिक साहित्य: ऋग्वेद सबसे प्राचीन वैदिक ग्रंथ है। इतिहासकार इसके रचनाकाल के बारे में एकमत नहीं हो सके हैं। जर्मन विद्वान याकोबी के अनुसार ऋग्वेद का रचनाकाल ई.पू.4500 से ई.पू. 3000 है तथा ब्राह्मणों का रचनाकाल ई.पू. 3000 से ई.पू. 2000 है। सुप्रसिद्ध लेखक पी. वी. काणे ने वेदों का रचना काल ई.पू.4000 से ई.पू.1000 माना है। कुछ विद्वान ऋग्वेद का रचनाकाल ई.पू.1500 से ई.पू.1000 के बीच की अवधि का मानते हैं। अथर्ववेद, यजुर्वेद, ब्राह्मण ग्रंथ और उपनिषदों को ई.पू.1000-500 के लगभग का माना जाता है।

प्रायः समस्त वैदिक ग्रंथों में क्षेपक मिलते हैं जिन्हें सामान्यतः प्रारम्भ अथवा अंत में देखा जा सकता है। कहीं-कहीं ग्रंथ के बीच में भी क्षेपक मिलते हैं। ऋग्वेद में मुख्यतः प्रार्थनाएं मिलती हैं और बाद के वैदिक ग्रंथों में प्रार्थनाओं के साथ-साथ कर्मकांडों, जादू टोनों और प्राचीन व्याख्यानों का समावेश मिलता है। उपनिषदों में दार्शनिक चिंतन प्रमुखता से मिलता है।

पुराण: अधिकांश प्रमुख पुराणों की रचना ई.300 से ई.600 के बीच हुई। प्रमुख पुराण 18 हैं। इनमें विष्णु-पुराण, स्कन्द पुराण, हरिवंश पुराण, भागवत पुराण, गरुड़ पुराण आदि प्रमुख हैं। पुराणों से प्राचीन काल के राज-वंशों की वंशावली का पता चलता है। पुराण, चार युगों का उल्लेख करते हैं- कृतयुग (सत्युग), त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग।

बाद में आने वाले प्रत्येक युग को पहले के युग से अधिक निकृष्ट बताया गया है और यह भी बताया गया है कि एक युग के समाप्त होने पर जब नए युग का आरम्भ होता है तो नैतिक मूल्यों तथा सामाजिक मानदण्डों का अधःपतन होता है।

महाकाव्य: वाल्मीकि कृत रामायण एवं वेदव्यास कृत महाभारत को महाकाव्य माना जाता है। डा. याकोबी ने रामायण की भाषा के आधार पर इसे ई.पू. 800 से ई.पू. 600 के बीच की रचना माना है। इसी प्रकार रामायण में मूलरूप से 12,000 श्लोक थे जो आगे चलकर 24,000 हो गए। इस महाकाव्य में भी उपदेश मिलते हैं जिन्हें बाद में जोड़ा गया है। अनुमान है कि रामायण का वर्तमान स्वरूप, महाभारत ग्रंथ की रचना के बहुत बाद में लिखा गया।

महाभारत की रचना ई.पू. चौथी शताब्दी (मौर्यकाल) मानी जाती है। इसका वर्तमान स्वरूप चौथी शताब्दी ईस्वी (गुप्तकाल) में सामने आया। रामायण और महाभारत में ई.पू. दसवीं शताब्दी से ई.पू. चौथी शताब्दी तक की परिस्थितियों को चित्रित किया गया है। महाभारत में मूलरूप से 8,800 श्लोक थे और इसे यव संहिता कहा जाता था अर्थात् विजय सम्बन्धी संचयन।

आगे चलकर इसमें 24,000 श्लोक हो गए और इसका नाम प्राचीन वैदिक कुल- ‘भरत’ के नाम पर भारत हो गया। अंत में श्लोकों की संख्या बढ़ कर एक लाख तक पहुँच गई और इसे महाभारत अथवा शतसह संहिता कहा जाने लगा। इसमें व्याख्यान, विवरण और उपदेश मिलते हैं। मुख्य व्याख्यान कौरव-पांडव संघर्ष का है जो उत्तर-वैदिक-काल का हो सकता है। विवरण वाला अंश उत्तर-वैदिक-काल का और उपदेशात्मक खण्ड उत्तर-मौर्य एवं गुप्तकाल का हो सकता है।

उत्तर-वैदिक धार्मिक साहित्य: उत्तर-वैदिक-काल के धार्मिक साहित्य में कर्मकाण्ड की भरमार मिलती है। राजाओं और तीनों उच्च वर्णों के लिए किए जाने वाले यज्ञों के नियम, स्रोतसूत्र में मिलते हैं। राज्याभिषेक जैसे उत्सवों के विवरण भी इन्हीं में है।

इसी प्रकार जन्म, नामकरण यज्ञोपवीत, विवाह, दाह आदि संस्कारों से सम्बद्ध कर्मकांड गृह्यसूत्र में मिलते हैं। स्रोतसूत्र और गृह्यसूत्र- दोनों ही लगभग ई.पू. 600-300 के हैं। शल्वसूत्र में बलि-वेदियों के निर्माण के लिए विभिन्न आकारों का नियोजन है। यहीं से ज्यामिति और गणित प्रारम्भ होते हैं।

(ii) बौद्ध ग्रंथ: बौद्धों के धार्मिक ग्रंथों में ऐतिहासिक व्यक्तियों तथा घटनाक्रमों की जानकारी मिलती है। प्राचीनतम बौद्ध ग्रंथ पालि भाषा में लिखे गए हैं, यह भाषा मगध यानी दक्षिणी बिहार में बोली जाती थी। इन ग्रंथों को ईसा पूर्व दूसरी सदी में श्रीलंका में संकलित किया गया। यह धार्मिक साहित्य बुद्ध के समय की परिस्थितियों की जानकारी देता है।

इन ग्रंथों में हमें न केवल बुद्ध के जीवन के बारे में जानकारी मिलती है अपितु उनके समय के मगध, उत्तरी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ शासकों के बारे में भी जानकारी मिलती है। बौद्धों के गैर धार्मिक साहित्य में सबसे महत्त्वपूर्ण एवं रोचक हैं– ‘गौतम बुद्ध के पूर्वजन्मों से सम्बन्धित कथाएँ।’

माना जाता है कि गौतम के रूप में जन्म लेने से पहले बुद्ध, 550 से भी अधिक पूर्वजन्मों से गुजरे। इनमें से कई जन्मों में उन्होंने पशु-जीवन धारण किया। पूर्वजन्म की ये कथाएँ, जातक कथाएँ कहलाती हैं। प्रत्येक जातक कथा एक प्रकार की लोककथा है। ये जातक ईसा पूर्व पांचवी से दूसरी सदी तक की सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं। ये कथाएँ बुद्धकालीन राजनीतिक घटनाओं की भी जानकारी देती हैं।

(iii) जैन ग्रंथ: जैन ग्रंथों की रचना प्राकृत भाषा में हुई थी। इन्हें ईसा की छठी सदी में गुजरात के वल्लभी नगर में संकलित किया गया था। इन ग्रंथों में ऐसे अनेक ग्रंथ है जिनके आधार पर हमें महावीर कालीन बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास को समझने में सहायता मिलती है। जैन ग्रंथों में व्यापार एवं व्यापारियों के उल्लेख बहुतायत से मिलते हैं।

(ब.) धर्मशास्त्र: धर्मसूत्र और स्मृतियों को सम्मिलित रूप से धर्मशास्त्र कहा जाता है। धर्मसूत्रों का संकलन ई.पू.600-ई.पू.200 में हुआ। प्रमुख स्मृतियों को ईसा की आरंभिक छः सदियों में विधिबद्ध किया गया। इनमें विभिन्न वर्णों, राजाओं तथा राज्याधिकारियों के अधिकारों का नियोजन है। इनमें संपत्ति के अधिकरण, विकल्प तथा उत्तराधिकार के नियम दिए गए हैं। इनमें चोरी, आक्रमण, हत्या, जारकर्म इत्यादि के लिए दण्ड-विधान की व्यवस्था है।

(स.) अन्य ग्रन्थ: अर्थशास्त्र, हर्षचरित, राजतरंगिणी, दीपवंश, महावंश तथा बड़ी संख्या में उपलब्ध तमिल-ग्रंथों से भी ऐतिहासिक तथ्य प्राप्त होते हैं। कौटिल्य का अर्थशास्त्र एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विधि-ग्रंथ है। इसमें मौर्य-वंश के इतिहास की जानकारी उपलब्ध होती है। यह ग्रंथ पन्द्रह अधिकरणों यानी खण्डों में विभक्त है। इनमें दूसरा और तीसरा अधिकरण अधिक प्राचीन है। अनुमान है कि इन अधिकरणों की रचना विभिन्न लेखकों ने की। इस ग्रंथ को ईस्वी सन् के आरंभकाल में वर्तमान रूप दिया गया।

इसके सबसे पुराने अंश मौर्यकालीन समाज एवं अर्थतंत्र की दशा के परिचायक हैं। इसमें प्राचीन भारतीय राजतंत्र तथा अर्थव्यवस्था के अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण सामग्री मिलती है। प्राचीन साहित्य में भास, कालीदास और बाणभट्ट की कृतियाँ उपलब्ध हैं। इनका साहित्यिक मूल्य तो है ही, इनमें कृतिकारों के समय की परिस्थितियाँ भी प्रतिध्वनित हुई हैं।

कालीदास ने अनेक काव्यों और नाटकों की रचना की, जिनमें अभिज्ञान शाकुंतलम सबसे प्रसिद्ध है। कालीदास के इस महान् सर्जनात्मक कृतित्त्व में ‘गुप्तकालीन मध्य-भारत’ के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की भी झलक मिलती है। बाणभट्ट के हर्ष चरित से हर्ष के शासन-काल का तथा कल्हण की राजतरंगिणी से काशमीर के इतिहास का पता चलता है। दीपवंश तथा महावंश से श्रीलंका के इतिहास का पता चलता है।

संगम साहित्य: संस्कृत ग्रंथों के साथ-साथ, प्राचीनतम तमिल ग्रंथ भी उपलब्ध हैं जिन्हें ‘संगम साहित्य’ कहा जाता है। राजाओं द्वारा संरक्षित विद्या-केन्द्रों में रहने वाले कवियों ने तीन-चार सदियों के काल में इस साहित्य का सृजन किया था। चूँकि ऐसी साहित्य सभाओं को संगम कहते थे, इसलिए यह सम्पूर्ण साहित्य, संगम साहित्य के नाम से जाना जाता है।

यद्यपि इन कृतियों का संकलन ईसा की प्रारंभिक चार सदियों में हुआ, तथापि इनका अंतिम संकलन छठी सदी में होना अनुमानित है। ईसा की प्रारंभिक सदियों में तमिलनाडु के लोगों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन के अध्ययन के लिए संगम साहित्य एकमात्र प्रमुख स्रोत है। व्यापार और वाणिज्य के बारे में इससे जो जानकारी मिलती है, उसकी पुष्टि विदेशी विवरणों तथा पुरातात्त्विक प्रमाणों से भी होती है।

चरित लेखन: चरित लेखन में भारतीयों ने ऐतिहासिक विवेक का परिचय दिया है। चरित लेखन का आरम्भ सातवीं सदी में बाणभट्ट के हर्षचरित के साथ हुआ। हर्षचरित अलंकृत शैली में लिखी गई एक अर्धचरित्रात्मक कृति है। बाद में इस शैली का अनुकरण करने वालों के लिए यह बोझिल बन गई। इस ग्रंथ में हर्षवर्धन के आरंभिक कार्यकलापों का वर्णन है। यद्यपि इसमें अतिशयोक्ति की भरमार है, फिर भी इसमें हर्ष के राजदरबार की और हर्षकालीन सामाजिक एवं धार्मिक जीवन की अच्छी जानकारी मिलती है। इसके बाद कई चरित्र ग्रंथ लिखे गए।

संध्याकर नंदी के रामचरित में पाल-शासक रामपाल और कैवर्त किसानों के बीच हुए संघर्ष का वर्णन है। इस संघर्ष में रामपाल की विजय हुई। बिल्हण ने विक्रमांकदेवचरित में अपने आश्रयदाता कल्याण के चालुक्य नरेश विक्रमादित्य षष्ठ (1076-1127 ई.) की उपलब्ध्यिों का वर्णन किया है। बारहवीं और तेरहवीं सदियों में गुजरात के कुछ व्यापारियों के चरित लिखे गए।

बारहवीं सदी में रचित कल्हण की राजतरंगिणी ऐतिहासिक कृतित्त्व का सर्वोत्तम उदाहरण है। इसमें कश्मीर के राजाओं का क्रमबद्ध चरित प्रस्तुत किया गया है यह प्रथम कृति है जिसमें आधुनिक दृष्टि युक्त इतिहास की कई विशेषताएँ निहित हैं।

(2.) विदेशी विवरण

प्राचीन भारत के इतिहास निर्माण के लिए विदेशी विवरणों का भी उपयोग किया गया है। जिज्ञासु पर्यटक के रूप में अथवा भारतीय धर्म को स्वीकार करके तीर्थयात्री के रूप में, अनेक यूनानी, रोमन तथा चीनी यात्री भारत आए और उन्होंने भारत के सम्बन्ध में आंखों देखे विवरण लिखे। विदेशी विवरणों से, भारतीय संदर्भों का कालक्रम एवं तिथि निर्धारण करना संभव हो पाया है। अध्ययन की सुविधा से विदेशी विवरण को दो भागों में बांट सकते हैं-

(अ.) विदेशी लेखकों के विवरण तथा (ब.) विदेशी यात्रियों के विवरण।

(अ.) विदेशी लेखकों के विवरण: विदेशी लेखकों में यूनानी लेखक एरियन, प्लूटार्क, स्ट्रैबो, प्लिनी, जस्टिन आदि, चीनी लेखक सुमाचीन, तिब्बती लेखक तारानाथ आदि आते हैं। तारानाथ के द्वारा लिखे गए भारतीय वृत्तांत कंग्युर एवं तंग्युर नामक ग्रंथों में मिलते हैं।

(ब.) विदेशी यात्रियों के विवरण: विदेशी यात्रियों में यूनानी राजदूत मेगस्थिनीज, चीनी यात्री फाह्यान, तथा ह्वेनत्सांग और मुसलमान विद्वान अल्बेरूनी प्रमुख हैं। यूनानी लेखकों से हमें सिकन्दर के भारतीय आक्रमण का, यूनानी राजदूत मेगास्थनीज की पुस्तक इण्डिका से चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन-काल का, चीनी लेखकों से शक पार्थियन और कुशाण जातियों के इतिहास का, फाह्यान के विवरण से चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के शासन काल का, युवान-च्वांड् के ग्रंथ- ‘सि-यू-की’ के विवरण से हर्षवर्धन के शासनकाल का और अल्बेरूनी की पुस्तक- ‘तहकीक-ए-हिन्द’ के विवरण से महमूद गजनवी के आक्रमण के समय के भारत के राजनीतिक वातावरण का ज्ञान होता है।

विदेशी विवरणों का मूल्यांकन

भारतीय स्रोतों में ई.पू. 324 में सिकंदर के भारत पर आक्रमण की कोई जानकारी नहीं मिलती। उसके भारत में प्रवास एवं उपलब्धियों के इतिहास की रचना के लिए यूनानी विवरण ही एकमात्र उपलब्ध स्रोत हैं। यूनानी यात्रियों ने, सिकंदर के एक समकालीन भारतीय योद्धा के रूप में सैण्ड्रोकोटस का उल्लेख किया है। यूनानी विवरणों का यह राजकुमार सैण्ड्रोकोटस और भारतीय इतिहास का चन्द्रगुप्त मौर्य, जिसके राज्यारोहण की तिथि 322 ई.पू. निर्धारित की गई है, एक ही व्यक्ति थे।

यह पहचान प्राचीन भारत के तिथिक्रम के लिए सुदृढ़़ आधारशिला बन गई है। इस तिथि क्रम के बिना भारतीय इतिहास की रचना करना सम्भव नहीं है। चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में यूनानी दूत मेगस्थिनीज की इण्डिका उन उद्धरणों के रूप में संरक्षित है जो अनेक प्रसिद्ध लेखकों ने उद्धृत किए हैं। इन उद्धरणों को मिलाकर पढ़ने पर न केवल मौर्य शासन-व्यवस्था के बारे में उपयोगी जानकारी मिलती है अपितु मौर्यकालीन सामाजिक वर्गों तथा आर्थिक क्रियाकलापों के बारे में भी जानकारी मिलती है।

यह कृति आंखें मूँदकर मान ली गई बातों अथवा अतिरंजनाओं से मुक्त नहीं है। अन्य प्राचीन विवरणों पर भी यह बात लागू होती है। ईसा की पहली और दूसरी सदियों के यूनानी तथा रोमन विवरणों में भारतीय बन्दरगाहों के उल्लेख मिलते हैं और भारत तथा रोमन साम्राज्य के बीच हुए व्यापार की वस्तुओं के बारे में भी जानकारी मिलती है।

यूनानी भाषा में लिखी गई टोलेमी की ‘ज्योग्राफी’ और ‘पेरीप्लस ऑफ दि एरीथ्रियन सी’ पुस्तकें, प्राचीन भारतीय भूगोल और वाणिज्य के अध्ययन के लिए प्रचुर सामग्री प्रदान करती हैं। पहली पुस्तक में मिलने वाली आधार सामग्री ईस्वी 150 की और दूसरी पुस्तक ईस्वी 80 से 115 की मानी जाती है। प्लिनी की ‘नेचुरलिस हिस्टोरिका’ पहली शताब्दी ईस्वी की है। यह लैटिन भाषा में है और भारत एवं इटली के बीच होने वाले व्यापार की जानकारी देती है।

चीनी पर्यटकों में फाह्यान और युवान-च्वांड् प्रमुख हैं। दोनों ही बौद्ध थे। वे बौद्ध तीर्थों का दर्शन करने तथा बौद्ध धर्म का अध्ययन करने भारत आए थे। फाह्यान ईसा की पांचवी सदी के प्रारंभ में आया था और युवान-च्वांड् सातवीं सदी के दूसरे चतुर्थांश में। फाह्यान ने गुप्तकालीन भारत की सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक परिस्थितियों की जानकारी दी है, तो युवान-च्वांड् ने हर्षकालीन भारत के बारे में इसी प्रकार की जानकारी दी है।

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