Tuesday, October 26, 2021

अध्याय – 3 – भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के इतिहास को जानने के साधन (ब)

पुरातात्विक स्रोत

भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के प्राचीन इतिहास को जानने के वे साधन जो गुफाओं, नदियों के किनारों, तालाबों के किनारों, टीलों तथा धरती में दबे हुए मिलते हैं उन्हें पुरातात्विक स्रोत कहा जाता है। इन्हें मुख्यतः चार भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1) अभिलेख (2) दानपत्र (3) मुद्राएँ और (4) प्राचीन स्मारक तथा भवनों के अवशेष।

(1.) अभिलेख

प्राचीन भारत का इतिहास जानने के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथा सर्वाधिक विश्वसनीय साधन अभिलेख हैं। ये प्रधानतः स्तम्भों, शिलाओं तथा गुफाओं पर मिलते हैं परन्तु कभी-कभी मूर्तियों, पात्रों तथा ताम्रपत्रों पर भी अंकित मिलते हैं। ये लेख देशी तथा विदेशी दोनों हैं। देशी अभिलेखों में अशोक के अभिलेख, प्रयाग का स्तम्भ लेख तथा हाथीगुम्फा के अभिलेख सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। विदेशी अभिलेखों में एशिया माइनर में स्थित बोगजकोई के अभिलेख अधिक प्रसिद्ध हैं।

अशोक के अभिलेखों से उसके धर्म तथा उसकी शिक्षाओं का परिचय मिलता है। अशोक के अभिलेख ही उसकी शिक्षाओं तथा राजाज्ञाओं को जानने का एकमात्र साधन हैं। इसी प्रकार हाथीगुम्फा के अभिलेख खारवेल-नरेश के शासन काल का इतिहास जानने के एकमात्र साधन हैं। बोगजकोई के अभिलेख से भी भारतीय इतिहास पर यत्किंचित प्रकाश पड़ा है।

अभिलेखों के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए वी. ए. स्मिथ ने लिखा है- ‘प्रारंभिक हिन्दू इतिहास में घटनाओं की तिथि का जो ठीक-ठीक ज्ञान अभी तक प्राप्त हो सका है वह प्रधानतः अभिलेखों के साक्ष्य पर आधारित है।’

पश्चिमी इतिहासकार फ्लीट ने अभिलेखों के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- ‘प्राचीन भारत के राजनीतिक इतिहास का ज्ञान हमें केवल अभिलेखों के धैर्यपूर्ण अध्ययन से प्राप्त होता है।’

पुरालेख: प्राचीन अभिलेखों को पुरालेख कहते हैं तथा प्राचीन अभिलेखों के अध्ययन को पुरालेखशास्त्र कहते हैं। पुरालेखों तथा अन्य प्राचीन लेखों की प्राचीन लिपियों के अध्ययन को पुरालिपिशास्त्र कहते हैं। मुद्राओं, मुहरों, प्रस्तरों, स्तंभों, चट्टानों, ताम्रपत्रों, विजय-स्तम्भों तथा मंदिरों की भित्तियों के साथ-साथ ईंटों और मूर्तियों पर भी पुरालेख उत्कीर्ण किए गए हैं।

ये पूरे देश में प्राप्त होते हैं। ईसा की आरंभिक सदियों में इस कार्य के लिए ताम्रपत्रों का उपयोग होने लगा था किंतु पत्थरों पर भी भारी संख्या में लेख उत्कीर्ण किए जाते रहे। सम्पूर्ण भारत में मंदिरों की दीवारों पर भी स्थायी स्मारकों के रूप में भारी संख्या में अभिलेख खोदे गए हैं।

विभिन्न स्थानों से लाखों की संख्या में प्राप्त अभिलेख देश के विभिन्न संग्रहालयों में सुरक्षित हैं, पर सर्वाधिक संख्या में अभिलेख, मैसूर के प्रमुख पुरालेख शास्त्री के कार्यालय में संगृहीत हैं। मौर्य, मौर्योत्तर, सीथियन, गुप्त तथा कलचुरी काल के अधिकांश अभिलेख कार्पस् इंस्क्रिप्शओनम् इंडिकारम नामक ग्रंथमाला के चार खण्डों में संगृहीत एवं प्रकाशित किए गए हैं।

गुप्तोत्तर काल के अभिलेख सुव्यवस्थित रूप से संगृहीत नहीं हो पाए हैं। दक्षिण भारत के अभिलेखों की लिपि-शैलियों की सूचियां प्रकाशित हो चुकी हैं। फिर भी 50,000 से भी अधिक अभिलेखों का, जिनमें अधिकांश दक्षिण भारत के लेख हैं, प्रकाशन अभी शेष है।

पुरालेखों की भाषा: भारत के सर्वाधिक प्राचीन अभिलेख प्राकृत भाषा में हैं और ईसा पूर्व तीसरी सदी के हैं। ईसा की दूसरी सदी में अभिलेखों के लेखन के लिए संस्कृत भाषा को अपनाया गया। चौथी-पांचवीं सदी में संस्कृत भाषा का सर्वत्र प्रचार-प्रचार हुआ किंतु तब भी प्राकृत भाषा का उपयोग होता रहा। प्रादेशिक भाषाओं में अभिलेखों की रचना नौवीं-दसवीं शताब्दियों से होने लगी।

पुरालेखों की लिपि: हड़प्पा संस्कृति के अभिलेख, जिनको अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है, सम्भवतः एक ऐसी भावचित्रात्मक लिपि में लिखे गए हैं जिसमें विचारों एवं वस्तुओं को चित्रों के रूप में व्यक्त किया जाता था। अशोक के शिलालेख ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण किए गए हैं, यह लिपि दायीं ओर से बायीं ओर लिखी जाती थी। पश्चिमोत्तर भारत से प्राप्त अशोक के कुछ लेख खरोष्ठी लिपि में भी हैं, ये भी दायीं ओर से बायीं ओर लिखी जाती थी।

पश्चिमोत्तर भारत के अतिरिक्त शेष प्रदेशों में ब्राह्मी लिपि का ही प्रचार रहा। अफगानिस्तान में अशोक के शिलालेखों के लिए यूनानी और ब्राह्मी लिपियों का भी उपयोग हुआ है। गुप्तकाल के अंत तक देश की प्रमुख लिपि ब्राह्मी-लिपी ही बनी रही। गुप्तकाल के बाद ब्राह्मी-लिपि की प्रादेशिक शैलियों में बड़ा अंतर आया और उन्हें अलग-अलग नाम दिए गए।

पुरालेखों का कालक्रम: भारत से प्राप्त सर्वाधिक प्राचीन लेख, हड़प्पा संस्कृति की मुहरों पर मिलते हैं। ये लगभग 2500 ई.पू. के हैं। इन पुरालेखों को पढ़ना अब तक सम्भव नहीं हो पाया है। सबसे पुराने जिन अभिलेखों को पढ़ना सम्भव हो पाया है वे ई.पू. तीसरी सदी के अशोक के शिलालेख हैं। फिरोजशाह तुगलक ने मेरठ में अशोक के एक स्तम्भलेख का पता लगाया था।

उसने यह अशोक-स्तंभ दिल्ली मंगवाया और अपने राज्य के पंडितों से इस पर उत्कीर्ण लेख को पढ़ने का आदेश दिया किन्तु किसी को भी इसमें सफलता नहीं मिली। अठारहवीं सदी के अंतिम चरण में अंग्रेजों ने जब अशोक के अभिलेखों को पढ़ने का प्रयास किया तो उन्हें भी इसी कठिनाई का सामना करना पड़ा। ई.1837 में जेम्स प्रिंसेप को इन अभिलेखों को पढ़ने में पहली बार सफलता मिली जो बंगाल में ईस्ट इंडिया कंपनी का सिविल अधिकारी था।

पुरालेखों के प्रकार: पुरालेख कई प्रकार के हैं। कुछ अभिलेखों में अधिकारियों और जन-सामान्य के लिए जारी किए गए सामाजिक, धार्मिक तथा प्रशासनिक राज्यादेशों एवं निर्णयों की सूचनाएं हैं। अशोक के अभिलेख इसी कोटि के हैं। दूसरे वर्ग के अन्तर्गत वे आनुष्ठानिक अभिलेख हैं जिन्हें, बौद्ध, जैन, वैष्णव, शैव आदि सम्प्रदायों के अनुयाइयों ने स्तंभों, प्रस्तर-फलकों, मंदिरों अथवा मूर्तियों पर उत्कीर्ण करवाया है।

तीसरे वर्ग में प्रशस्तियों के रूप में लिखे गए अभिलेख हैं जिनमें राजाओं तथा विजेताओं के गुणों और उनकी सफलताओं का विवरण रहता है, पर उनकी पराजयों तथा कमजोरियों का कोई उल्लेख नहीं रहता। चन्द्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति इसी कोटि की है। चौथे वर्ग में दान अभिलेख मिलते हैं। इनमें राजाओं, राजपरिवार के सदस्यों, कारीगरों तथा व्यापारियों के द्वारा, धार्मिक प्रयोजन से धन, स्वर्ण, रत्न, मवेशी, भूमि आदि के रूप में दिए गए विशिष्ट दान का उल्लेख रहता है।

(2.) दानपत्र

राजाओं और सामंतों द्वारा दिए गए भूमिदानों से सम्बन्धित अभिलेख विशेष महत्त्व के हैं। इनसे प्राचीन भारत के भूमिबन्दोबस्त के बारे में उपयोगी जानकारी मिलती है। अधिकांश दानपत्र, ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण हैं। इन अभिलेखों में भिक्षुओं, पुरोहितों, मंदिरों, विहारों, जागीरदारों तथा अधिकारियों को दिए गए गांवांे, भूमियों तथा राजस्व के दानों का उल्लेख रहता है।

(3.) मुद्राएँ

प्राचीन भारत के इतिहास के निर्माण में मुद्राओं से बड़ी सहायता मिली है। इनके महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए स्मिथ ने लिखा है- ‘सिकन्दर के आक्रमण के समय से मुद्राएँ प्रत्येक युग में इतिहास के अन्वेषण के कार्य में अमूल्य सहायता पहुँचाती रही हैं।’

वास्तव में ई.पू. 206 से ई.300 तक के भारतीय इतिहास को जानने के प्रधान साधन मुद्राएँ ही हैं। इण्डो-पार्थियन तथा बैक्ट्रियन लोगों के इतिहास का पता हमें मुद्राओं से ही लगता है। मुद्राओं से हमें राजाओं के नाम, उनकी वेष-भूषा, उनके शासन-काल तथा उनके राजनीतिक एवं धार्मिक विचारों को जानने में बड़ी सहायता मिली है। राज्य की सीमा निर्धारित करने में भी कभी-कभी मुद्राओं का सहारा लिया जाता है।

मुद्राओं से राज्य की आर्थिक दशा का भी ज्ञान प्राप्त हो जाता है। यदि मुद्राएँ शुद्ध सोने-चांदी की होती हैं तो उनसे देश की सम्पन्नता प्रकट होती है परन्तु यदि वे मिश्रित धातुओं की होती हैं तो उनसे राज्य की विपन्नता का पता लगता है। मुद्राओं के चित्रों तथा अभिलेखों से राज्य की कला तथा साहित्य की अवस्था का भी ज्ञान होता है।

गुप्तकालीन मुद्राएँ बड़ी ही सुन्दर तथा कलात्मक हैं और उन पर शुद्ध तथा गीतमय संस्कृत लेख लिखे हैं जिनसे ज्ञात होता है कि गुप्त-सम्राट् साहित्य तथा कला के प्रेमी थे। प्राचीन भारत में सिक्कों पर धार्मिक चिह्न और संक्षिप्त लेख अंकित होते थे जिनसे उस समय की कला एवं धार्मिक परिस्थितियों पर प्रकाश पड़ता है।

मुद्राशास्त्र: सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र कहते हैं। सबसे प्राचीन सिक्के आग में पकाई हुई मिट्टी के हैं। उसके बाद तांबा, चांदी, सोना और लेड (सीसा) धातुओं से सिक्के बनाये गए। पूरे देश से पकी हुई मिट्टी से बनाए गए सिक्कों के सांचे बड़ी संख्या में मिले हैं। इनमें से अधिकांश सांचे कुषाण काल के अर्थात् ईसा की आरंभिक तीन सदियों के हैं। गुप्तोत्तर काल में ये सांचे लगभग लुप्त हो गए।

प्राचीन काल में लोग अपना पैसा मिट्टी तथा कांसे के बर्तनों में जमा रखते थे। ऐसी अनेक निधियों, जिनमें न केवल भारतीय सिक्के हैं अपितु रोमन साम्राज्य जैसी विदेशी टकसालों में ढाले गए सिक्के भी हैं, देश के अनेक भागों में खोजी गई हैं। ये निधियां अधिकतर कलकत्ता, पटना, लखनऊ, दिल्ली, जयपुर, बम्बई और मद्रास के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। बहुत से भारतीय सिक्के इंगलैण्ड, नेपाल, बांगलादेश, पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान के संग्रहालयों में भी रखे गए हैं।

 ब्रिटेन ने भारत पर लम्बे समय तक शासन किया, इसलिए ब्रिटेन के सार्वजनिक संग्रहालयों के साथ-साथ ब्रिटिश अधिकारियों के निजी संग्रहालयों में भी भारतीय सिक्के संग्रहीत किए गए हैं। विभन्न संग्रहालयों द्वारा भारत के प्रमुख राजवंशों के सिक्कों की सूचियां तैयार करके प्रकाशित करवाई गई हैं। कलकत्ता के इंडियन म्यूजियम तथा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम आदि के सिक्कों की सूचियां उपलब्ध हैं परन्तु अब भी सिक्कों के अनेक संग्रहों की सूचियां नहीं बन पायी हैं और न ही प्रकाशित हुई हैं।

हमारे देश के सबसे पुराने सिक्कों पर कुछ चिह्न देखने को मिलते हैं, पर बाद के सिक्कों पर राजाओं और देवी-देवताओं के नाम तथा तिथियाँ अंकित की गई हैं। जिन-जिन स्थानों पर ये सिक्के मिलते हैं उनके बारे में स्पष्ट हो जाता है कि उस प्रदेश में इनका प्रचलन रहा है। इस प्रकार खोजे गए सिक्कों के आधार पर कई राजवंशों के इतिहास की पुनर्रचना सम्भव हुई है। विशेषतः उन हिन्द-यवन शासकों के इतिहास की जो उत्तरी अफगानिस्तान से भारत पहुँचे थे और जिन्होंने ईसा पूर्व दूसरी एवं पहली सदियों में भारतीय क्षेत्रों पर शासन किया था।

सिक्कों से, क्षेत्र विशेष एवं काल विशेष के आर्थिक हतिहास के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। प्राचीन भारत में राजाओं की अनुमति से, बड़े व्यापारियों एवं स्वर्णकारों की श्रेणियों ने भी अपने सिक्के चलाए। इससे शिल्प और व्यापार की उन्नत व्यवस्था की सूचना मिलती है। सिक्कों के कारण बड़ी मात्रा मे लेन-देन करना सम्भव हुआ और व्यापार को बढ़ावा मिला।

सबसे अधिक सिक्के मौर्योत्तर काल के मिले हैं, विशेषतः तांबे, चादी एवं सोने के सिक्के। गुप्त शासकों ने सोने के सबसे अधिक सिक्के जारी किए। इससे पता चलता है कि गुप्तकाल में व्यापार और वाणिज्य खूब बढ़ा। गुप्तोत्तर काल के बहुत कम सिक्के मिले हैं, इससे उस समय में व्यापार और वाणिज्य की अवनति की सूचना मिलती है।

(4.) प्राचीन स्मारक तथा भवनों के अवशेष

प्राचीन काल के मन्दिरों, मूर्तियों, स्तूपों, खण्डहरों आदि के अध्ययन से भी प्राचीन भारत के इतिहास के निर्माण में बड़ी सहायता मिली है। यद्यपि इनसे राजनीतिक दशा का विशेष ज्ञान प्राप्त नहीं होता है परन्तु धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक दशा का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त होता है। प्राचीन स्मारकों का अध्ययन कर विभिन्न कालों की कलाओं का ज्ञान प्राप्त किया गया है। काल विशेष में किस सामग्री का प्रयोग किया जाता था और किस शैली में इसका निर्माण होता था आदि बातों की जानकारी प्राप्त हुई है।

 कला-कृतियों की प्राचीनता का अध्ययन कर कालक्रम को भी निर्धारित किया गया है। मूर्तियों तथा मन्दिरों के अध्ययन से लागों के धार्मिक विचारों तथा विश्वासों का पता लगता है। गुप्तकाल की मूर्तियों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि उस काल में वैष्णव, शैव, बौद्ध आदि धर्मों का प्रचलन था और उनमें धार्मिक सहिष्णुता थी। मूर्तियों और चित्रों का अध्ययन करने से हमें सामाजिक दशा का भी पता लगता है क्योंकि इनसे लोगों की वेश-भूषा, खान-पान, वनस्पतियों तथा पालतू पशुओं आदि का पता लगता है।

प्राचीन स्मारकों के अध्ययन से हमें स्थानीय शासकों के परस्पर सम्बन्धों तथा विदेशी शासकों के साथ सम्बन्धों का भी ज्ञान होता है। दक्षिण-पूर्व एशिया के स्मारकों से ज्ञात होता है कि भारत का विदेशी शासकों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध था। पुराने खण्डहरों की खुदाइयों से इतिहास निर्माण में उपयोगी मूल्यवान सामग्री मिलती है। हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में जो खुदाइयाँ हुई हैं उनसे भारत की एक अत्यन्त प्राचीन सभ्यता का पता लगा है जिसे सिन्धु घाटी सभ्यता कहा गया है।

टीलों का उत्खनन: पूरे भारत में प्राचीन समारक एवं भवनों के अवशेष देखने को मिलते हैं। इनमें से अधिकांश स्मारकों एवं भवनों के अवशेषों को मिट्टी के टीलों के नीचे से खोद कर निकाला गया है। दक्षिण भारत में पत्थर के मंदिर और पूर्वी भारत में ईटों से बने विहार, टीलों के नीचे मिले हैं। इनमें से जिन थोड़े से टीलों का उत्खनन हुआ है, उन्हीं से हमें प्राचीन काल के जन-जीवन के बारे में कुछ जानकारी मिली है। टीलों का उत्खनन दो प्रकार से हो सकता है- (1.) लम्बरूप खुदाई तथा (2.) क्षैतिज खुदाई।

लम्बरूप खुदाई सस्ती पड़ती है। इसलिए भारत में अधिकांश स्थलों की खुदाई लम्बरूप में की गई है। इस खुदाई का लाभ यह है कि इससे एक क्षेत्र पर विभिन्न कालों में होने वाले क्रमिक सांस्कृतिक विकास का अध्ययन करने में सहायता मिलती है किंतु इस प्रकार के उत्खनन से प्राचीन भारतीय इतिहास के अनेक चरणों के भौतिक जीवन का पूर्ण और समग्र चित्र नहीं मिल पाता। किसी भी काल की समग्र जानकारी प्राप्त करने के लिए क्षैतिज खुदाई करना आवश्यक है किंतु अत्यधिक खर्चीली होने के कारण क्षैतिज खुदाईयां बहुत कम की गई हैं।

विभिन्न टीलों के उत्खनन से प्राप्त पुरावशेष, विभिन्न अनुपातों में सुरक्षित रखे गए हैं। सूखी जलवायु के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिमोत्तर भारत के पुरावशेष अधिक सुरक्षित बने रहे, परन्तु मध्य गंगा घाटी और डेल्टाई क्षेत्रों की नम और आर्द्र जलवायु में लोहे के औजार भी गल गए। कच्ची मिट्टी से बने भवनों के अवशेषों का दिखाई देना कठिन होता है इस कारण नम और जलोढ़ क्षेत्रों में पक्की ईटों और पत्थर के बने हुए भवनों के काल के अवशेष ही प्राप्त होते हैं।

पश्चिमोत्तर भारत में किए गए उत्खननों से ऐसे नगरों का पता चला है जिनकी स्थापना लगभग 2500 ई.पू. में हुई थी। इसी प्रकार के उत्खननों से हमें गंगा की घाटी में विकसित हुई भौतिक संस्कृति के बारे में जानकारी मिली है। इससे पता चलता है कि उस समय के लोग जिस प्रकार की बस्तियों में रहते थे उनका विन्यास क्या था, वे किस प्रकार के मृद्भांडों का उपयोग करते थे, किस प्रकार के घरों में रहते थे, किन अनाजों का उपयोग करते थे, और किस प्रकार के औजारों अथवा हथियारों का उपयोग करते थे। दक्षिण भारत के कुछ लोग मृत व्यक्ति के शव के साथ औजार, हथियार, मिट्टी के बर्तन आदि भी रख देते थे और इसके ऊपर एक घेरे में बड़े-बड़े़ पत्थर खडे़ करते थे। ऐसे स्मारकों को महापाषाण कहते हैं। समस्त महापाषाण इस श्रेणी में नहीं आते।

जिस विज्ञान के आधार पर पुराने टीलों का क्रमिक स्तरों में विधिवत् उत्खनन किया जाता है उसे पुरातत्त्व कहते हैं। उत्खनन और गवशेषणा के फलस्वरूप प्राप्त भौतिक अवशेषों का विभिन्न प्रकार से वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है जिससे यह पता चलता है कि वे स्थान कहाँ हैं, जहाँ से ये धातुएँ प्राप्त की गईं। इनसे धातु विज्ञान के विकास की अवस्थाओं का पता लगाया जाता है। पशुओं की हड्डियों का परीक्षण कर पालतू पशुओं तथा उनसे लिए जाने वाले कामों के बारे में जानकारी एकत्रित की गई है।

भारतीयों में ऐतिहासिक विवेक

प्राचीन भारतीयों पर यह आरोप लगाया जाता है कि उनमें ऐतिहासिक बोध का अभाव था। यह स्पष्ट है कि प्राचीन भारतीय लेखकों ने वैसा इतिहास नहीं लिखा जैसा आजकल लिखा जाता है, न ही उन्होंने यूनानियों की तरह इतिहास ग्रंथ लिखे किंतु हमारे धर्मग्रंथों में, विशेषकर पुराणों में तत्कालीन इतिहास मिलता है जो वस्तु-तत्त्व की दृष्टि से विश्वकोशीय है और गुप्त साम्राज्य के प्रारंभ तक के राजवंशीय इतिहास को उपलब्ध कराता है। काल-बोध, जो इतिहास का एक महत्त्वूपर्ण घटक है, अभिलेखों में देखने को मिलता है।

इनमें महत्त्वपूर्ण घटनाओं से सम्बन्धित किसी शासक विशेष के शासन वर्षों का उल्लेख रहता है। प्राचीन भारत में कई संवत् आरम्भ किए गए जिनके आधार पर घटनाओं को अंकित किया गया। विक्रम संवत्, 58 ई.पू. में आरम्भ हुआ, शक संवत् 78 ई.पू. में और गुप्त संवत 319 ई.पू. में। अभिलेखों में स्थानों और तिथियों का उल्लेख रहता है। पुराणों और जीवन चरित्रों में घटनाओं के कारण तथा परिणाम दिए गए हैं। इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए ये सब चीजें अपरिहार्य हैं, परन्तु इनके बारे में सुव्यवस्थित जानकारी नहीं मिलती।

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