Thursday, February 22, 2024
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196. तिलंगों के प्रति कृतज्ञ रहेगी भारत माता!

जैसे-जैसे इस धारवाहिक की कड़ियां आगे बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे हमें देश भर से बहुत से लोग बहुत सी बातें लिख रहे हैं। 1857 की इतिहास में आगे बढ़ने से पहले हम कुछ प्रश्नों, सुझावों एवं शिकायतों के उत्तर देना चाहते हैं।

सबसे पहले तो मैं उन लाखों देशवासियों एवं भारतीय प्रवासियों का आभार व्यक्त करता हूँ जिन्होंने बार-बार इस इतिहास की प्रशंसा करके मेरा उत्साह वर्द्धन किया है तथा मुझे इस धारावाहिक के लेखन के लिए इतनी ऊर्जा प्रदान की है कि अब इसकी दो सौ कड़ियां होने जा रही हैं। जब इसे आरम्भ किया था, तब केवल 35 कड़ियां लिखने की योजना थी।

बहुत से दर्शक विशेषकर महाराष्ट्र के भाई-बहिन पूरे धारवाहिक के दौरान इस बात को लेकर आपत्ति करते आए हैं कि मैंने शिवाजी को केवल ‘छत्रपति शिवाजी’ क्यों उच्चारित किया है! मुझे उनका नाम आदर से लेना चाहिए तथा उन्हें हर बार ‘छत्रपति शिवाजी महाराज राजे’ कहना चाहिए था। इसी तरह बहुत से लोगों ने इस बात पर भी आपत्ति की है कि मैंने महादजी सिंधिया एवं पेशवा नाना साहब (द्वितीय) के लिए वह आया, वह गया, वह युद्ध के मैदान से भाग गया जैसे शब्द क्यों उच्चारित किए हैं, मुझे उनके लिए वे आए, वे गए जैसे आदर सूचक शब्द लिखने चाहिए थे!

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

चूंकि मैंने इतिहास के इन महानायकों के लिए अपनी वीडियोज में अतितरिक्त सम्मान का प्रदर्शन नहीं किया है, इसलिए कुछ भाई बहिनों ने मुझे मां-बहिन की गालियां लिख कर भेजी हैं, जिन्हें मैं विगत सात महीनों से लगातार अपने चैनल से हटाता रहा हूँ और लम्बे समय तक मैंने अपने वीडियोज पर कमेंट्स की सुविधा भी बंद रखी है। हालांकि बाद में बहुत से पाठकों के बार-बार लिखने पर मुझे इस चैनल पर कमेंट्स की सुविधा फिर से आरम्भ करनी पड़ी।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि छत्रपति शिवाजी महाराज राजे एवं पेशवा नाना साहब (द्वितीय) भारतीय जन मानस के नायक हैं, वे श्रद्धेय हैं, प्रातः स्मरणीय हैं। वे हमारे राष्ट्रीय जीवन के वास्तविक गौरव हैं। उनका नाम आदर के साथ ही लिया जाना चाहिए किंतु मैं अपने इन भावुक पाठकों से कहना चाहता हूँ कि मैंने आपके समक्ष इतिहास प्रस्तुत किया है न कि कोई नाटक, कहानी या प्रशस्ति गायन।

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इतिहास निष्पक्ष होकर लिखा जाता है। इसमें दोनों ओर के विरोधी पक्षों के बीच हुई घटनाओं को बिना किसी लाग-लपेट के बताया जाता है, ऐसा नहीं किया जाना चाहिए कि हम औरंगजेब के लिए अनादरसूचक और छत्रपति शिवाजी के लिए सम्मानसूचक शब्दों का प्रयोग करें। छत्रपति शिवाजी को शिवाजी कहने से उनका तेज घट नहीं जाता।

इसी प्रकार नाना साहब या महादजी सिंधिया के लिए ‘आया-गया’ जैसे शब्दों का प्रयोग करने से उनका महत्व घट थोड़े ही जाता है! ठीक वैसे ही जैसे रघुवंशी भगवान राम को राम, सूर्य भगवान को सूर्य एवं गंगा मैया को गंगा कहने से हमारे मन में उनके प्रति श्रद्धा और विश्वास की कोई कमी नहीं होती।

मैं अपने मराठी पाठकों से एक निवेदन और करना चाहता हूँ कि वे केवल छत्रपति शिवाजी और नानासाहब के सम्मान के लिए ही चिंतित न हों, अन्य प्रदेशों के वे नायक जिन्होंने भारत माता की सेवा के लिए अपना छोटे से छोटा बलिदान दिया, वे सब हमारे राष्ट्रीय गौरव हैं। अवध की बेगम हजरत महल और जगदीशपुर के ठाकुर कुंवरसिंह या फिर महाराणा प्रताप की सेना में लड़ा छोटे से छोटा भील सिपाही भी हमारे लिए उतने ही आदरणीय हैं जितनी की झांसी की रानी लक्ष्मी बाई या फिर अठारहवीं शताब्दी के महाराजा सूरजमल।

इस धारवाहिक के दौरान मुझे कुछ गालियां मुस्लिम भाइयों ने भी दी हैं। उन्होंने बात-बात पर मेरे द्वारा लिखे गए इतिहास को झूठा बताया है तथा अशोभनीय शब्द लिखे हैं। ऐसे हजारों लोगों को मैंने आपने चैनल से प्रतिबंधित किया है तथा उनके बारे में यूट्यूब को सूचित किया है। मैं ऐसे पाठकों से पूछना चाहता हूँ कि केवल आप ही क्यों छत्रपति शिवाजी या दारा शिकोह के इतिहास को झूठा बता रहे हैं, अन्य समुदायों के लोग तो ऐसा नहीं कर रहे!

इसका कारण जो मुझे समझ में आया है, वह यह है कि कुछ लोग आज भी तैमूर लंग, बाबर, शाहजहाँ और औरंगजेब को अपना आदर्श मान रहे हैं। यहाँ तक कि वे दारा शिकोह को भी गालियां देने से बाज नहीं आते।

मुझे इस बात पर आपत्ति नहीं है कि वे किसे अपना आदर्श मानें और किसे नहीं, यह उनकी मर्जी का मामला है, इसे थोपा नहीं जा सकता किंतु कृपया आप भी मुझ पर अपनी पसंद और नापसंद नहीं थोपें। मुझे तथ्यों पर आधारित इतिहास लिखने और देश वासियों तक पहुंचाने की पूरी छूट है, यदि आप मेरे लिखे इतिहास से सहमत नहीं हैं तो मेरा उनसे हाथ जोड़कर अनुरोध है कि वे अपनी पसंद का इतिहास स्वयं लिख लें।

किसी भी सभ्य समाज को मां-बहिन की गाली देना शोभा नहीं देता। मानव सभ्यता तो यह कहती है कि इस संसार में जितनी भी स्त्रियां हैं, वे सब हमारी माताएं, बहिनें और बेटियां हैं। किसी भी स्त्री का सम्मान, हमारी अपनी माँ का सम्मान है। उन्हें गालियां क्यों! उनका नाम लेकर गाली देना हीनता और कुण्ठित मानसिकता का द्योतक है।

कुछ लोगों ने मुझे लिखा है कि मैंने औरंगजेब से लड़ने वाले बंगाली राजा-रानियों का वर्णन नहीं किया, मध्यप्रदेश के राजा मर्दनसिंह जूदेव का वर्णन नहीं किया, हरियाणा की तरफ के क्रांतिवीर जाटों का 1857 की क्रांति में योगदान देने का उल्लेख नहीं किया।

 इन सबके सम्बन्ध में मेरा स्पष्टीकरण यह है कि जितने इतिहास की मुझे प्रामाणिक जानकारी है, मैंने उसे बताने का प्रयास किया है तथा सवाल उठाने वालों से बार-बार अनुरोध किया है कि वे प्रामाणिक सामग्री मुझे भिजवाएं किंतु किसी ने नहीं भिजवाई।

कुछ पाठकों ने इस धारावाहिक की कड़ियों में अपनी जाति, क्षेत्र, भाषा एवं धर्म को ढूंढने की कोशिश की है। हमें स्मरण रखना चाहिए कि इतिहास उस पवित्र बालक की तरह होता है जो किसी भी जाति, क्षेत्र, भाषा एवं धर्मावलम्बी को प्रसन्न करने का प्रयास नहीं करता। वह तो निःस्वार्थी बालक की तरह सच बोलता है। किसी को अच्छा या बुरा लगे तो लगे!

पिछले कुछ दिनों से बहुत से दर्शक हमें लिख रहे हैं कि हम तिलंगों के बारे में विस्तार से बताएं। यद्यपि इस धारावाहिक की 182वीं कड़ी में हम तिलंगों के बारे में बता चुके हैं किंतु पाठकों की सुविधा के लिए फिर से इसे दोहरा रहे हैं।

ईस्वी 1857 की क्रांति होने से पहले अंग्रेजों की राजधानी कलकत्ता थी। इस कारण यह स्वाभाविक ही था कि उनकी सबसे बड़ी सेना कलकत्ता के पास बैरकपुर में रहती थी जिसे बंगाल आर्मी कहा जाता था। यह एशिया की सबसे बड़ी एवं उस काल की सबसे आधुनिक फौज थी, उसके 1 लाख 39 हजार सिपाही थे जो भारत के विभिन्न स्थानों पर नियुक्त थे। स्वाभाविक ही था कि इस सेना में बंगाल, बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के सैनिकों की संख्या अधिक होती।

बंगाल आर्मी के इन सैनिकों को दिल्ली एवं उसके आसपास के प्रदेश में पुरबिया एवं तिलंगे कहा जाता था। 1857 में बैरकपुर की क्रांति का बिगुल बजाने वाले सिपाही यही पुरबिया थे। 1857 की क्रांति के समय मेरठ में हथियार उठाने वाले सिपाही भी यही पुरबिया थे। सबसे पहले दिल्ली पहुंचने वाले क्रांतिकारी सैनिक भी यही पुरबिया थे। बंगाल आर्मी के इन सैनिकों को भारतीय इतिहासकारों ने क्रांतिकारी सैनिक तथा अंग्रेज इतिहासकारों ने विद्रोही सैनिक एवं बागी कहकर पुकारा है किंतु दिल्ली के लोग इन्हें पुरबिया एवं तिलंगा कहते थे।

तिलंगे शब्द का वास्तविक अर्थ तो ज्ञात नहीं किंतु परम्परागत रूप से किसी की परवाह ने करने वाले लड़ाके को तिलंगा कहा जाता है। चूंकि बंगाल आर्मी के ये पुरबिया सैनिक न तो किसी की परवाह करते थे और न किसी से युद्ध या झगड़ा करने से डरते थे, संभवतः इसलिए इन्हें दिल्ली के लोगों ने तिलंगा कहा।

यद्यपि तत्कालीन अंग्रेज इतिहासकारों एवं मुगल इतिहासकारों ने इन तिलंगों को असभ्य एवं मुंहफट कहा है किंतु वास्तविकता यह है कि भारत माता इन तिलंगों की चिरकाल तक ऋणी रहेगी क्योंकि इन तिलंगों ने ई.1857 में राष्ट्रीय गौरव एवं स्वातंत्र्य की जो ज्वाला प्रज्जवलित की, वही ज्वाला अंततः 1947 में अंग्रेजी शासन को भस्म करके भारत राष्ट्र को स्वतंत्रता दिलवा सकी।

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohan Lal Gupta is a renowned historian from India. He has written more than 100 books on various subjects.

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