Tuesday, May 24, 2022

देश में उग्र-हिन्दुत्व की लहर

विजयी  विश्व तिरंगा प्यारा

जब भारत साम्प्रदायिक हिंसा की आग में जलने लगा तो भारतवासियों को उनके गौरव का स्मरण कराने के लिए ई.1924 में श्यामलाल पार्षद ने कांग्रेस के लिए एक झण्डा-गीत लिखा जो इतना प्रसिद्ध हुआ कि हारमोनियम एवं ढोलक की मधुर धुनों पर कांग्रेस की प्रभात-फेरियों में गाया जाने लगा-

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा।

सदा शक्ति बरसाने वाला, प्रेम सुधा सरसाने वाला,

वीरों को हरषाने वाला, मातृभूमि का तन-मन सारा।। झंडा…।

स्वतंत्रता के भीषण रण में, लखकर बढ़े जोश क्षण-क्षण में,

कांपे शत्रु देखकर मन में, मिट जाए भय संकट सारा।। झंडा…।

इस झंडे के नीचे निर्भय, लें स्वराज्य यह अविचल निश्चय,

बोलें भारत माता की जय, स्वतंत्रता हो ध्येय हमारा।। झंडा…।

आओ! प्यारे वीरो, आओ। देश-धर्म पर बलि-बलि जाओ,

एक साथ सब मिलकर गाओ, प्यारा भारत देश हमारा।। झंडा…।

इसकी शान न जाने पाए, चाहे जान भले ही जाए,

विश्व-विजय करके दिखलाएं, तब होवे प्रण पूर्ण हमारा।। झंडा…।

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा।

गांधीजी के अनुयाई जवाहरलाल नेहरू को इस गीत में हिंसा के तत्व दिखाई देते थे। इस गीत में बार-बार बोले जाने वाले विश्व-विजयी शब्द से उन्हें सख्त परहेज था। फिर भी यह गीत भारत की आजादी तक कांग्रेस की प्रभात-फेरियों का मुख्य आकर्षण बना रहा।

इसके साथ ही बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा लिखित- ‘वंदे मातरम्’ गीत भी पूरे देश में धूम मचाता रहा तथा कांग्रेसियों से लेकर धुर-दक्षिण-पंथियों एवं क्रांतिकारियों तक की पहली पसंद बना रहा। अंग्रेजों से अधिक मुस्लिम लीग यह अनुभव करती थी कि ये गीत उनके विरोध में लिखे गए थे।

बंगाल में साम्प्रदायिक दंगों की बाढ़

बंगाल में हिन्दुओं की आबादी तेजी से घटती जा रही थी और मुस्लिम आबादी बढ़ती जा रही थी। इस कारण सड़कों, गली-मुहल्लों एवं अन्य सार्वजनिक स्थलों पर मस्जिदों की बाढ़ सी आ गई थी। जब कभी हिन्दू धर्मावलम्बी अपने धार्मिक जुलूसों को लेकर गाजे-बाजे के साथ इन मस्जिदों के सामने से निकलते तो मुसलमान, इन जुलूसों पर हमला बोल देते थे।

ई.1926 के मध्य में देश में साम्प्रदायिक दंगों की बाढ़ आ गई। सबसे पहले कलकत्ता में भयानक साम्प्रदायिक हमले शुरू हुए। छः सप्ताह तक कलकत्ता की सड़कों पर नृशंस हत्याएं हुईं। 110 स्थानों पर आगजनी हुई, मंदिरों और मस्जिदों पर हमले हुए। सरकारी वक्तव्य के अनुसार पहली मुठभेड़ में 44 मनुष्य मरे और 584 घायल हुए। दूसरी मुठभेड़ में 66 मनुष्य मरे और 391 घायल हुए। ये दंगे मुख्यतः मस्जिदों के सामने, हिन्दुओं के जुलूस एवं बाजे के प्रश्न को लेकर होते थे।

मरने वालों एवं घायल होने वालों में हिन्दू अधिक थे। इस समय लॉर्ड इरविन भारत के गवर्नर जनरल थे। हिन्दू महासभा ने 22 मई 1926 को दिल्ली में एक प्रस्ताव पारित करके सरकार से मांग की कि कलकत्ता के हिन्दुओं की रक्षा की जाए।

जब हिन्दू महासभा के डॉ. शिवराम मुंजे तथा पं. मदनमोहन मालवीय कलकत्ता गए तो बंगाल की सुहरावर्दी सरकार ने उन दोनों के विरुद्ध सम्मन जारी कर दिए।

पूर्वी बंगाल में तो स्थिति और भी बुरी थी। वहाँ हिन्दू महिलाओं एवं बच्चों के अपहरण, बलात्कार, आगजनी एवं हत्याओं के मामले प्रतिदिन बढ़ने लगे। उत्तरी बंगाल के मुसलमान भी पीछे नहीं रहे।

गणपति उत्सव पर हमले

महाराष्ट्र में भी गणपति उत्सव में जुलूस निकालने पर मुसलमानों द्वारा उन पर हमले किए जाने लगे। स्थितियां इतनी बिगड़ गईं कि हिन्दू महासभा ने देश की महिलाओं के नाम अपील की कि अपने सम्मान की रक्षा के लिए प्रत्येक हिन्दू महिला अपने साथ शस्त्र रखे।

कानपुर में साम्प्रदायिक हिंसा

ई.1931 में कानपुर में सांप्रदायिक दंगे हुए जिनमें बड़ी संख्या में हिन्दुओं का नरसंहार किया गया और अंग्रेज सरकार कुछ नहीं कर सकी। इन्हीं दंगों के दौरान 25 मार्च 1931 को पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या कर दी गई।

देश में उग्र-हिन्दुत्व की लहर

मालाबार, मुल्तान, कानपुर, महाराष्ट्र, बंगाल और अमृतसर सहित देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे साम्प्रदायिक दंगों के कारण देश में उग्र-हिन्दुत्व की लहर प्रकट हुई। देश भर में हिन्दुओं के विरुद्ध हो रही हिंसक घटनाओं के विरोध में हिन्दू नेताओं ने ‘हिन्दू-एकता’ का नारा दिया। देश भर में हिन्दू महासभा की शाखाएं स्थापित की गईं।

अखिल भारतीय क्षत्रिय सभा की स्थापना हुई। ई.1923 में डॉ. किचलू ने अमृतसर में तन्जीम और तबलीग आन्दोलन प्रारम्भ किया। ई.1925 में विजय दशमी के दिन डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक दल का गठन किया जिसका उद्देश्य हिन्दू धर्म, जाति और संस्कृति की रक्षा करना था। पूरे भारत में इसकी शाखाएं स्थापित की गईं।

ई.1928 में लाहौर में ऑर्डर ऑफ दी हिन्दू यूथ नामक संगठन की स्थापना की गई। स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद तथा महर्षि अरविंद घोष ने परतंत्र भारत की देह में आत्मगौरव के नवीन प्राण फूंकने के लिये उग्र-हिंदुत्व को जन्म दिया। कांग्रेस में लाला लाजपतराय, विपिनचंद्र पाल और बाल गंगाधर तिलक उग्र-हिंदुत्व के ध्वज-वाहक थे। इनके योगदान के सम्बन्ध में हम पूर्व में संक्षेप में चर्चा कर चुके हैं।

महाराष्ट्र में जन्मे विनायक दामोदर सावरकर ने हिन्दू-राष्ट्रवाद की भावना को तिलक युग से आगे बढ़ाया। उन्होंने हिन्दुओं में राजनीतिक एवं सामाजिक एकीकरण की आवश्यकता पर बल दिया तथा हिन्दुओं के समान हितों पर बल देते हुए उन्हें संगठित होने का आह्नान किया। वे मुसलमानों को प्रसन्न करने वाली नीति के समर्थक नहीं थे।

सावरकर का कहना था कि- ‘यदि भारतीय मुसलमान, स्वराज्य-प्राप्ति में सहयोग नहीं देना चाहते तो उनसे अनुनय-विनय करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि मुसलमानों के बिना भी हिन्दू अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने में समर्थ हैं।’ मुसलमानों के लिये साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले नेताओं को, सावरकार का विरोध करने के बहाने, अपनी उग्र साम्प्रदायिक राजनीति को चमकाने का अच्छा अवसर प्राप्त हो गया।

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