Monday, May 20, 2024
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अध्याय – 42 : उन्नीसवीं सदी में किसान आन्दोलन प्रारम्भ होने के कारण

भारत में किसानों की दुर्दशा का आरम्भ मुस्लिम आक्रांताओं के भारत आक्रमणों के समय हुआ। राजस्व वसूली के लिये मुस्लिम शासकों एवं उनके कारिंदों द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों के कारण लाखों किसान अपनी खेतियां छोड़कर जंगलों में भाग जाते थे। उनमें से बहुत कम किसान फिर से लौटकर अपनी जमीनों पर खेती करते थे। इस कारण भारत में उपजाऊ धरती बेकार हो जाती थी तथा फसल की उत्पादकता भी बहुत कम थी।

ईस्ट इंडिया कम्पनी के आगमन के बाद किसानों की दुर्दशा का नया दौर आरम्भ हुआ। 1764 ई. में बक्सर की लड़ाई में मिली विजय के बाद कम्पनी को बंगाल सूबे की दीवानी का अधिकार प्राप्त हुआ। इससे भू-राजस्व वसूली का अधिकार, बंगाल के नवाब के हाथों से निकलकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों में चला गया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी एक व्यापारिक कम्पनी थी जिसे अपने असल और सूद के अलावा किसी और बात से मतलब नहीं था। इसलिये वह बंगाल के किसानों से भू-राजस्व प्राप्त करने की तो इच्छुक थी किंतु कृषि-भूमि की स्थिति या किसानों की स्थिति के बारे में चिन्तित नहीं थी। कम्पनी द्वारा तेजी से भू-राजस्व की मांग में वृद्धि की गई। इससे किसानों पर करों का बोझ पहले से भी अधिक हो गया।

वारेन हेस्टिंग्ज ने भू-राजस्व प्रशासन में कई तरह के बदलाव किये। उसका उद्देश्य कम से कम खर्चा करके अधिक से अधिक भू-राजस्व वसूल करना था। लार्ड कार्नवालिस द्वारा किये गये स्थायी बन्दोबस्त के अन्तर्गत जमींदार, किसानों का शोषण करने लगे। भू-राजस्व चुकाने में विलम्ब होने अथवा असफल होने पर किसानों को अत्याचारों एवं शारीरिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था। इस कारण जमींदारी प्रथा सामाजिक एवं आर्थिक शोषण की प्रतीक बन गई। बम्बई और मद्रास में रैय्यतवाड़ी बन्दोबस्त लागू किया गया किन्तु यह जमींदारी बंदोबस्त से भी अधिक बुरा सिद्ध हुआ। यहाँ जमींदार के स्थान पर प्रशासनिक कर्मचारी किसानों का शोषण करने लगे। पंजाब, आगरा, अवध आदि कुछ क्षेत्रों में महलवाड़ी बन्दोबस्त लागू किया गया। यह जमींदारी व्यवस्था का ही संशोधित रूप था। अँग्रेजों ने भू-व्यवस्था के सम्बन्ध में जितने भी प्रयोग किये, उन सब में किसानों के हितों की उपेक्षा की गई। ब्रिटिश सरकार ने किसानों को कोई संरक्षण नहीं दिया। न ही कृषि में सुधार करने का प्रयास किया। इस कारण कई स्थानों पर किसान आन्दोलन उठ खड़े हुए।

भारत में किसान आन्दोलनों के कारण

भारत में किसान आंदोलनों के उठ खड़े होने के कई कारण थे-

(1.) अँग्रेजों की कठोर भू-राजस्व नीतियाँ

ईस्ट इण्डिया कम्पनी की भू-राजस्व नीतियाँ अत्यन्त कठोर थीं। इनके कारण किसानों का सर्वस्व छिन गया। 1793 ई. में बंगाल में स्थायी बन्दोबस्त के माध्यम से किसानों से भूमि का स्वामित्व छीनकर उन्हें अपनी ही जमीन पर किराएदार बना दिया गया। जमींदारों को लगान वसूली के असीमित अधिकार मिल गये। स्थायी बन्दोबस्त के माध्यम से औपनिवेशिक शासन ने राजस्व वसूली की जिम्मेदारी अपने ऊपर न रखकर, अपने लिये कनिष्ठ भागीदारों को सृजन किया। ये कनिष्ठ भागीदार जमींदार के रूप में सामने आये और अंत तक ब्रिटिश सत्ता के प्रति निष्ठावान बने रहे। दक्षिण भारत के कुछ प्रान्तों में रैय्यतवाड़ी बन्दोबस्त तथा अवध, आगरा एवं पंजाब सूबों में महलवाड़ी बन्दोबस्त आरम्भ किये गये। ये बंदोबस्त भी औपनिवेशिक शासन के उतने ही पैने हथियार थे जितना कि स्थायी बंदोबस्त। महलवाड़ी व्यवस्था जमींदारी प्रथा का ही संशोधित रूप थी। इस व्यवस्था में जमींदारी प्रथा के समस्त दोष विद्यमान थे जिससे किसानों की स्थिति खराब होती चली गई।

(2.) लगान दर की अधिकता

प्रत्येक प्रकार के राजस्व बंदोबस्त में लगान की दर बहुत ऊँची थी। किसान जितना उत्पादन करता था, उसका दो-तिहाई हिस्सा उसके हाथ से निकल जाता था। जो कुछ बच पाता था, उसी से या फिर ऋण लेकर गुजारा करना पड़ता था। पूर्व में किसान अपनी भूमि के स्वयं स्वामी थे किन्तु अब वे जमींदार की भूमि पर खेती करने वाले काश्तकार बन गये। कुछ समय बाद जब उन्हें जमींदारों एवं साहूकारों ने भूमि से बेदखल कर दिया, तब वे भूमिहीन खेतिहर श्रमिक बन गये। ऐसे उत्पीड़न से किसानों में असन्तोष उत्पन्न होना स्वाभाविक था।

(3.) अवैध करों की अधिकता

जमींदार, ताल्लुकेदार और साहूकार, किसानों से बल-पूर्वक पथ कर, पर्वी कर , मेला खर्च, डाक खर्च   दाखिल खर्च , टोल खर्च  आदि अनेक प्रकार के अवैध कर लेते थे। अवैध करों को समय पर नहीं चुकाने पर भी किसानों तथा उनके परिवार की महिलाओं का घोर उत्पीड़न किया जाता था।

(4.) नये शोषक वर्गों का उदय

जमींदार के रूप में किसानों के लिये बड़े शोषक वर्ग का उदय हुआ। इनके शोषण चक्र ने अन्य शोषक वर्गों को जन्म दिया। बढ़े हुए लगान एवं अवैध कर चुकाने के लिये किसान नगद रुपया उधार लेने के लिए बाध्य हुआ। इस कारण समाज में साहूकार वर्ग का उदय हुआ। शहरों में रहने वाले जमींदारों ने किसानों से भू-राजस्व वसूली के लिए गांवों में अपने एजेन्ट नियुक्त किये। ये एजेन्ट उप-भूस्वामी बन गये। इस प्रकार बिचौलिये वर्ग का सृजन हुआ जो कानूनी और गैर-कानूनी तरीकों से किसानों का शोषण करने लगा। रैय्यतवाड़ी बन्दोबस्त में लगान वसूल करने का काम कलेक्टर को दिया गया। उसके कर्मचारी किसानों का शोषण करते थे।

(5.) किसानों का भूमिहीन श्रमिक बनना

जब किसान लगान नहीं चुका पाते थे तो उन्हें जमींदार द्वारा भूमि से बेदखल कर दिया जाता था। अधिकांश किसान, जमींदार के लगान तथा साहूकार के सूद को भरने के लिये स्वयं ही अपनी जमीनें बेच देते थे। जबरदस्त अकाल पड़ने पर भी लगान में कोई कमी नहीं की जाती थी। ऐसी स्थिति में किसानों के पास, कृषि छोड़कर मजदूरी करने के अतिरिक्त और कोई उपाय ही नहीं था।

(6.) खेती की दुर्दशा

ब्रिटेन में हुई औद्योगिक क्रांति से भारत के घरेलू उद्योग धन्धे लाभ का धन्धा नहीं रहे। भारत में अँग्रेजी फैक्ट्रियों में बना अच्छा और सस्ता सामान आयात होने लगा। इस कारण ढाका, मुर्शिदाबाद, सूरत आदि प्रख्यात भारतीय औद्योगिक नगर उजड़ गये। शहर के बुनकर, जुलाहे, दस्तकार, ठठेरे, लुहार, सुनार आदि पेट भरने के लिये गांवों की ओर भागे और खेती से जीविकोपार्जन करने का प्रयास किया। गांवों के भी घरेलू उद्योग तथा शिल्प नष्ट हो गये और ग्रामीण व्यवस्था, जो कृषि एवं लघु उद्योगों का मिश्रण थी, कृषि पर आधारित होकर रह गई। इससे खेती पर दबाव बढ़ा। खेतों का बंटवारा होने से खेत छोटे होते गये और पैदावार घटती चली गई। किसानों को आधा पेट खा कर रहने के लिये विवश होना पड़ा। इस विपन्नता का हल विद्रोहों एवं आंदोलनों से ही मिल सकता था। इस कारण किसान आंदोलनों को हवा मिली।

(7.) अनाज के स्थान पर व्यापारिक फसलों को प्रोत्साहन

1813 ई. के बाद ब्रिटेन में बढ़ते हुए औद्योगीकरण के लिए कच्चे माल की आवश्यकता थी। इसलिये किसानों को केवल वही फसलें उगाने के लिये विवश किया गया जिनकी ब्रिटेन की मिलों को आवश्कता थी। पूर्व-ब्रिटिश काल में भारत में ऐसी वस्तुओं का उत्पादन होता था जिनका प्रयोग स्थानीय स्तर पर उपभोग एवं विनिमय के लिए होता था किन्तु अब किसान केवल वे वस्तुएं उगाने लगा जिनका बाजार के दृष्टिकोण से अधिक मूल्य था। अब कई स्थानों पर एक सी फसलें उगाई जाने लगीं, जैसे- बंगाल में जूट, पंजाब में गेहूं और रुई, बिहार में अफीम, बम्बई में रुई तथा आसाम में चाय, बंगाल में नील, बनारस, बंगाल, मध्य-भारत और मालवा में अफीम तथा बर्मा में चावल। नगदी फसलों को उगाने के लिए सरकार किसानों को अग्रिम राशि देती थी। 1853 ई. के बाद नील, चाय, कॉफी, रबर आदि की खेती पर अत्यधिक बल दिया गया। इससे सरकार और व्यापारी वर्ग को तो लाभ हुआ किन्तु किसानों की गरीबी बढ़ गई। क्योंकि व्यापारी पहले तो किसानों को बड़े-बड़े सपने दिखाते थे किंतु फसल पकने पर उसे खेत में ही सस्ते दाम में खरीद लेते थे। किसान तुरंत रुपया मिलने की आशा में अपनी फसल मंडी में न ले जाकर खेत में बेच देता था। छः महीने बाद किसान को अपनी आवश्यकता के लिये, वही फसल बिक्री की कीमत से अधिक मूल्य देकर खरीदनी पड़ती थी। इस प्रकार किसान की कमाई का अधिकतर हिस्सा व्यापारी लूट लेते थे। इस लूट से दुखी किसानों में संगठन की भावना का विकास हुआ ताकि वे शोषणकर्ताओं का एकजुट होकर सामना कर सकें।

(8.) भूमिहीन किसानों की संख्या में वृद्धि

एक तरफ तो भारतीय किसान अपनी जमीनों से बेदखल किये जा रहे थे, वहीं दूसरी तरफ अँग्रेजों को अपने चाय, कॉफी, रबर तथा नील के बागों में बड़ी संख्या में कृषि-श्रमिकों की आवश्यकता थी। अँग्रेज व्यापारी, दो-आब के मैदानों से बेदखल हुए किसानों को इन बागानों में काम करने के लिये ले गये जहाँ वे बंधुआ मजदूरों की तरह रहने लगे। ये लोग परस्पर निकट आ जाने के कारण संगठित होने लगे। इस कारण कई स्थानों पर छुट-पुट विद्रोह हुए।

(9.) किसानों की ऋण-ग्रस्तता

ज्यों-ज्यों ब्रिटिश सत्ता का विस्तार होता गया, सरकार का खर्च भी बढ़ता गया और लगान की दर में भी वृद्धि होती गई। प्रत्येक भूमि-बन्दोबस्त में लगान की दर बहुत ऊँची रखी गई। उदाहरणार्थ, स्थायी बन्दोबस्त में लगान दर 89 प्रतिशत थी। रैय्यतवाड़ी व्यवस्था के प्रारम्भ में लगान दर 66 प्रतिशत थी किन्तु बाद में उत्पादन में कमी के कारण 45 से 55 प्रतिशत कर दी गई। अकाल की स्थिति में लगान चुकाने तथा अपने सामाजिक कार्यों के लिए साहूकारों से ऋण लेना पड़ता था। इस प्रकार किसान निरन्तर ऋण में ही डूबा रहता था। अँग्रेज अधिकारी, किसानों की ऋण-ग्रस्त्ता के लिये लगान, सूद एवं शोषण को जिम्मेदार न मानकर किसान की फिजूल खर्ची तथा सामाजिक उत्सवों में धन फूंकने की आदत को उत्तरदायी ठहराते थे। 1875 ई. में दक्षिण भारत के किसान विद्रोहों की जांच करने वाले कमीशन ने लिखा- ‘ब्याह-शादी और तीज-त्यौहार पर जो खर्चा होता है, इसे अनावश्यक महत्व दिया गया है। ………इस मद में किसान को काफी रुपया खर्च करना पड़ता है किन्तु ऐसा बहुत कम देखने में आता है कि इस मद के खर्चों के कारण किसान कभी कर्ज में फंसा हो।’

(10.) साहूकार की मनोवृत्ति में विकृति

ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन आरम्भ होने से पहले गांव में साहूकार अपने आसामियों की स्थिति का ध्यान रखकर काम करता था। अर्थात् शादी, गमी या अकाल के समय वह अपने आसामियों के प्रति उदारता का प्रदर्शन करता था तथा ऋण वसूलने के लिये किसान की भूमि छीनने का प्रयास नहीं करता था किन्तु ब्रिटिश कानून के अंतर्गत ऋणग्रस्त किसान को जेल में बन्द किया जा सकता था तथा उसकी भूमि जब्त की जा सकती थी। पुलिस और अदालत साहूकार का साथ देते थे। साहूकार ने किसान को कितना कर्ज दिया, कितना सूद लिया और कितना मूलधन चुकाया, इसका हिसाब साहूकार अपने बही-खाते में मनमाने ढंग से लिखकर किसान को अपने चंगुल में फंसाये रखता था। सरकार की तरफ से किसानों को कोई संरक्षण नहीं दिया गया। 1858 ई. के बाद सरकार ने कुछ कानून बनाये किन्तु उन्हें ढंग से लागू नहीं किया गया। ऐसी स्थिति में किसानों में असन्तोष बढ़ना स्वाभाविक था।

(11.) कृषि के उन्नयन से सरकार की विमुखता

ब्रिटिश सरकार ने कृषि के विकास पर कोई ध्यान नहीं दिया। किसान अपने पुराने उपकरणों- तथा हल-बैल की जोड़ी से छोटी-छोटी जोतों पर खेती करता रहा। यही कारण है कि 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जब भयंकर अकाल पडे़ तब हजारों किसानों को अपने प्राण गंवाने पड़े। लाखों किसान पूरी तरह बर्बाद हो गये। कार्ल मार्क्स ने लिखा है- ‘भारत में अँग्रेजों ने अपने पूर्वाधिकारियों से विरासत में मिले अर्थ तथा युद्ध विभागों की जिम्मेदारी तो अपने ऊपर ओढ़ी, मगर सार्वजनिक निर्माण के कार्यों की जिम्मेदारी से उन्होंने लापरवाही बरती। खेती के पतन का यही कारण था…..।’ 1838 ई. में जी. थाम्पसन ने, 1854 ई. में सर आर्थर कॉटन ने और 1858 ई. में मोंटगोमरी तथा जॉन ब्राइट ने सार्वजनिक निर्माण कार्यों के प्रति कम्पनी की उदासीनता का उल्लेख किया है।

(12.) किसानों के पास पूंजी का अभाव

1879 ई. में प्रकाशित सर जेम्स केर्ड की रिपोर्ट में कहा गया है- ‘देश के विभिन्न हिस्सों में बहुत सी अच्छी जमीनें बेकार पड़ी हैं, जिन पर जंगल उगे हुए हैं। उसे साफ करके खेती योग्य बनाया जा सकता है। इसके लिए पूंजी की आवश्यकता है। लोगों के पास बहुत कम पूंजी है, जो ऐसे कामों में लगा सकें।’ इस रिपोर्ट से स्पष्ट है कि पूंजी के अभाव में लोग इतने लाचार थे कि वे चाहकर भी भूमि को साफ करके उसे फिर से खेती योग्य नहीं बना सकते थे। किसानों के पास पूंजी का इतना अधिक अभाव था कि वे भूमि की ऊर्वरता बनाये रखने में असफल हो गये। फसलों का बचा हुआ डंठल व भूसा पशुओं को खिलाया जाता था तथा पशुओं से प्राप्त गोबर घरों में जलाया जाता था। इस कारण खेतों में डालने के लिये खाद भी नहीं बचती थी। भूमि की ऊर्वरता घटने से उपज में भारी कमी आ गई जिसने अकालों की भयावहता को बढ़ा दिया।

(13.) श्रमिक आंदोलनों का प्रभाव

ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत मजदूरों की स्थिति भी किसानों की स्थिति से अच्छी नहीं थी किन्तु औद्योगिक इकाइयों की संख्या बढ़ने के साथ ही श्रमिकों ने संगठित होना प्रारम्भ कर दिया। ट्रेड यूनियनों की स्थापना होने से श्रमिक अपने हितों के लिए संघर्ष करने लगे। विवश होकर सरकार को श्रमिकों की समस्या की ओर ध्यान देना पड़ा। उस काल में चल रहे विभिन्न श्रमिक आंदोलनों ने किसानों में भी नव-चेतना का संचार किया। इससे भारत के विभिन्न भागों में समय-समय पर कई किसान आंदोलन उठ खड़े हुए।

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