Friday, April 3, 2026
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प्रजापति कश्यप की कथा (13)

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प्रजापति कश्यप - bharatkaitihas.com
प्रजापति कश्यप की कथा

हिन्दू धर्मग्रंथों में आए संदर्भों के अनुसार प्रजापति ब्रह्मा के पुत्र मरीचि हुए। मरीचि के पुत्र प्रजापति कश्यप हुए। प्रजापति कश्यप ने प्रजापति दक्ष की 17 पुत्रियों से विवाह किया। इनमें दिति और अदिति भी थीं। इस कड़ी में हम प्रजापति कश्यप तथा उनकी पत्नियों दिति एवं अदिति की चर्चा करेंगे।

प्राचीन धर्म-ग्रंथों में प्रजापति कश्यप का नाम बार-बार आया है। ये एक वैदिक ऋषि थे तथा इनकी गणना सप्तर्षियों में की जाती थी। हिन्दू धर्मग्रंथों की मान्यता है कि प्रजापति कश्यप के वंशजों ने ही मानव सृष्टि का प्रसार किया। कुछ हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार धरती पर निवास करने वाले समस्त जीवधारियों की उत्पत्ति प्रजापति कश्यप से हुई।

विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में प्रजापति कश्यप का उल्लेख केवल एक बार हुआ है। जबकि यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद में इनका उल्लेख कई बार हुआ है। अन्य वैदिक ग्रंथों, पुराणों एवं उपनिषदों में आए विवरणों में कश्यप ऋषि प्रमुख पात्र हैं। इन्हें सृष्टि में अत्यंत प्राचीन काल का बताया गया है तथा इन्हें परम धार्मिक एवं रहस्यात्मक दर्शाया गया है। ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार कश्यप ऋषि ने ‘विश्व-कर्म-भौवन’ नामक राजा का अभिषेक कराया था। ऐतरेय ब्राह्मण ने कश्यपों का सम्बन्ध जनमेजय से बताया है। शतपथ ब्राह्मण में प्रजापति को कश्यप कहा गया है।

महाभारत एवं पुराणों में असुरों की उत्पत्ति तथा वंशावली के वर्णन में कहा गया है कि ब्रह्माजी के सात मानस पुत्रों में से एक मरीचि थे जिन्होंने अपनी इच्छा से कश्यप नामक प्रजापति उत्पन्न किया। भागवत पुराण तथा मार्कण्डेय पुराण के अनुसार प्रजापति कश्यप की की बारह पत्नियां थीं किंतु कुछ ग्रंथों में आए उल्लेख के अनुसार कश्यप ने दक्ष प्रजापति की 17 पुत्रियों से विवाह किया। दक्ष की इन पुत्रियों से जो सन्तानें उत्पन्न हुईं उसका विवरण इस प्रकार है-

प्रजापति कश्यप की पत्नी अदिति से आदित्य अर्थात् देवताओं ने जन्म लिया। दिति से दैत्यों ने जन्म लिया। दनु से दानव उत्पन्न हुए। काष्ठा से अश्व आदि पशु उत्पन्न हुए। अनिष्ठा से गन्धवों की उत्पत्ति हुई। सुरसा से राक्षस जन्मे। इला से वृक्षों ने जन्म लिया। मुनि से अप्सराएं उत्पन्न हुईं। क्रोधवशा से सर्प, सुरभि से गौ और महिष, सरमा से श्वापद अर्थात् हिंसक पशु, ताम्रा से श्येन अर्थात् गिद्ध, तिमि से यादोगण अर्थात् जल-जन्तु उत्पन्न हुए। कश्यप की पत्नी विनता से गरुड़जी और अरुण, कद्रू से नाग, पतंगी से पक्षी और यामिनी से शलभ अर्थात् कीड़े उत्पन्न हुए।

प्रजापति कश्यप की पत्नी अदिति के बारह पुत्र हुए जो आदित्य कहलाए- अदितेः अपत्यं पुमान् आदित्यः। अदिति को देवमाता तथा आदित्यों को देवता कहा जाता है। संस्कृत भाषा में अदिति का अर्थ होता है ‘असीम’ अर्थात् जिसकी कोई सीमा न हो।

अदिति के बारह पुत्र हुए जिनके नाम मित्र, वरुण, धाता, अर्यमा, अंश, विवस्वान्, भग-आदित्य, इन्द्र, विष्णु, पर्जन्य, पूषा तथा त्वष्टा हैं। हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार अन्तरिक्ष में द्वादश आदित्य भ्रमण करते हैं, वे अदिति के पुत्र हैं। अदिति के पुण्यबल से ही उसके पुत्रों को देवत्व प्राप्त हुआ। यह आख्यान इस ओर संकेत करता है कि विश्व की समस्त नियामक एवं निर्माणकारी शक्तियाँ एक ही माता से उत्पन्न हुई हैं जिसे ‘अदिति’ कहा गया है।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

पुराणों में कहा गया है कि अदिति का एक पुत्र गर्भ में ही मृत्यु को प्राप्त हो गया परन्तु अदिति ने अपने तपोबल से उसे पुनर्जीवित कर दिया। उस पुत्र का नाम मार्तण्ड था। वह मार्तण्ड विश्व-कल्याण के लिए अन्तरिक्ष में गतिमान् है। हम उसे विवस्वान तथा सूर्य के नाम से भी जानते हैं।

इस आख्यान से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि यहाँ अदिति से आशय ‘ब्लैक होल’ जैसी उस अंतरिक्षीय रचना से है जिसमें खगोल-पिण्डों का निर्माण होता है तथा जिसे आकाश-गंगाओं की नर्सरी कहा जाता है। यह आख्यान यह सोचने के लिए विवश करता है कि जब सूर्य का निर्माण हो रहा था, तब कोई दुर्घटना हुई जिससे सूर्य का बनना रुक गया किंतु बाद में सूर्य का निर्माण फिर से आरम्भ हो गया और सूर्य सुरक्षित रूप से अस्तित्व में आ गया।

ऋग्वेद में अदिति को माता स्वीकारा गया है। मातृदेवी की स्तुति में ऋग्वेद में बीस मंत्र हैं। उन मन्त्रों में ‘अदितिर्द्याैः’ मन्त्र अदिति को माता के रूप में प्रदर्शित करता है जिसका अर्थ है- ‘यह मित्रावरुण, अर्यमन्, रुद्रों, आदित्यों इन्द्र आदि की माता हैं। इन्द्र और आदित्यों को शक्ति अदिति से ही प्राप्त होती है।’

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अथर्ववेद एवं वाजसनेयी-संहिता में अदिति के मातृत्व की ओर संकेत हुआ है। इस प्रकार उसका स्वाभाविक स्वत्व शिशुओं पर है। ऋग्वैदिक ऋषि अपने देवताओं सहित बार-बार अदिति की शरण में जाते हैं एवं अदिति से संकट निवारण करने एवं अपनी रक्षा करने की प्रार्थना करते हैं। ‘अदिति’ अपने शाब्दिक अर्थ में व्यापकता, बंधनहीनता और स्वतंत्रता की द्योतक है। इसलिए ऋग्वेद में अदिति की शरण में जाने वाले ऋषि अपनी मुक्ति की कामना करते हैं। कुछ अर्थों में अदिति को ‘गौ’ का पर्याय माना गया है। ऋग्वेद का एक प्रसिद्ध मंत्र इस प्रकार है- ‘मा गां अनागां अदिति वधिष्ट’ अर्थात् गाय रूपी अदिति को न मारो। इस मंत्र का सम्बन्ध गाय से है तथा इसी मंत्र का सम्बन्ध देवताओं की माता अदिति से है। इस मंत्र से स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति में अत्यंत प्राचीन काल से ही गाय को मनुष्य जीवन के लिए कितना महत्त्वपूर्ण माना गया! ऋग्वेद के इसी मंत्र के कारण हिन्दू आज तक ‘गौ-हत्या’ को घनघोर पाप मानते हैं। इसी मातृदेवी की उपासना के लिए विभिन्न रूपों में बनाई गई, प्राचीन काल की लाखों मूर्तियां मिलती हैं। इन मूर्तियों को सिंधु नदी घाटी से लेकर मध्य एशिया अर्थात् ईरान एवं ईराक और भू-मध्य सागर के देशों अर्थात् असीरिया, तुर्की एवं अनेक यूरोपीय देशों में प्राप्त किया गया है।

इन्हीं मातृदेवियों की पूजा इस्लाम के उदय से पहले अरब के रेगिस्तान में होती थी। उनकी मूर्तियां आज भी अरब देशों से खुदाई में प्राप्त होती हैं। इन्हें लात अथवा अल्लात, मनात, हुबल और उज्जा अल-उज्जा कहा जाता है।

इनमें से तीन देवियों की प्रतिमाएं एक ही पैनल पर प्राप्त होती हैं तथा एक देवी के समक्ष सिंह बैठा हुआ होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि ये तीन देवियां लक्ष्मी, सरस्वती एवं दुर्गा हैं तथा दुर्गा के चरणों के पास सिंह बैठा हुआ है। जब इस्लाम का उदय हुआ तो देवियों की इन प्रतिमाओं को नष्ट कर दिया गया तथा उनकी पूजा बंद कर दी गई। इन्हें पूजने वालों को असभ्य और अंध-विश्वासी कहा गया।

इस विवेचना के पश्चात् हमएक बार फिर से पुराणों की ओर चलते हैं। जब अदिति के पुत्रों अर्थात् देवताओं को रहने के लिए स्वर्ग मिल गया तो दिति के पुत्रों अर्थात् दैत्यों ने देवताओं से स्वर्ग छीनना चाहा। इस पर देवों एवं दैत्यों में भयानक शत्रुता उत्पन्न हो गई तथा दैत्यों और देवों के बीच हजारों साल तक अनेक युद्ध हुए।

पौराणिक कथाओं के अनुसार स्वर्ग के देवगण ऋषियों द्वारा प्रदत्त यज्ञ-भाग एवं हविष्य पर जीवित रहते थे जबकि दैत्य मानव जाति को मारकर खाते थे। देवता सात्विक वृत्ति के होने के कारण, प्रायः दुष्ट दैत्यों से परास्त हो जाते थे। तब ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश देवताओं की सहायता किया करते थे।

चूंकि विष्णु भी अदिति के पुत्र थे, इसलिए दैत्य विष्णु से भी शत्रुता रखते थे। यही कारण था कि दैत्य, ब्रह्माजी एवं शिवजी को प्रसन्न करने के लिए घनघोर तपस्या करके उनसे वरदान पाते थे। दैत्यगण ब्रह्माजी एवं शिवजी से प्राप्त शक्ति का उपयोग भगवान श्रीहरि विष्णु, उनके भाइयों अर्थात् देवताओं, उनके भक्तों तथा ऋषियों-मुनियों के विरुद्ध किया करते थे। दैत्यकुल में प्रह्लाद, दैत्यराज विरोचन, दैत्यराज बली एवं राक्षसराज विभीषण आदि कुछ ही दैत्य हुए जो भगवान श्रीहरि विष्णु को भजते थे। त्रिजटा नामक राक्षसी भी भगवान की भक्त थी।

एक बार बहुत लम्बे समय तक हुए देव-दानव युद्ध में देव पराजित हो गए और वे स्वर्ग छोड़कर वनों में विचरण करने लगे। उनकी दुर्दशा को देखकर अदिति और कश्यप बड़े दुःखी हुए। तब नारद मुनि ने अदिति को सूर्याेपासना करने की सलाह दी। अदिति ने सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिए अनेक वर्षों तक घनघोर तपस्या की। सूर्यदेव अदिति के तप से प्रसन्न हुए तथा उन्होंने अदिति से वरदान मांगने को कहा।

अदिति ने कहा कि आप मेरे पुत्र के रूप में जन्म लें। कालान्तर में सूर्य का तेज अदिति के गर्भ में प्रतिष्ठित हुआ किन्तु एक बार अदिति और प्रजापति कश्यप में कलह हो गया। प्रजापति कश्यप ने क्रोधवश अदिति के गर्भस्थ शिशु को ‘मृत’ कह दिया। उसी समय अदिति के गर्भ से एक प्रकाश-पुंज बाहर आया। उसे देखकर प्रजापति कश्यप भयभीत हो गए और उन्होंने सूर्य से क्षमा-याचना की।

उसी समय एक आकाशवाणी हुई- ‘आप दोनों इस पुंज का प्रतिदिन पूजन करें। उचित समय होने पर इस पुंज से एक पुत्र-रत्न जन्म लेगा। वह आप दोनों की इच्छा को पूर्ण करके ब्रह्माण्ड में स्थित होगा।’

अदिति का यही पुत्र आदित्य, मार्तण्ड, विवस्वान, अंशुमाली तथा सूर्य कहलाया। जब आदित्य दैत्यों से युद्ध करने गए तो दैत्य आदित्य के तेज को देखकर युद्ध से पलायन करके पाताल-लोक में चले गए। आदित्य सूर्यदेव के रूप में ब्रह्माण्ड के मध्यभाग में स्थित हुए और ब्रह्माण्ड का संचालन करने लगे।

जिस प्रकार अदिति के पुत्र आदित्य कहलाते थे, उसी प्रकार दिति के पुत्र दैत्य कहलाते थे। जब दिति के पुत्रों हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप ने इन्द्र से स्वर्ग छीन लिया तब भगवान विष्णु ने दिति के पुत्रों को मारकर स्वर्ग पुनः दिति के पुत्रों को प्रदान किया। इस पर दिति ने अपने पति प्रजापति कश्यप से ऐसा पुत्र देने की याचना की जो इन्द्र का नाश कर सके!

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिति ने इन्द्रहंता पुत्र की प्राप्ति के लिए पति को प्रसन्न किया (14)

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दिति - bharatkaitihas.com
दिति ने इन्द्रहंता पुत्र की प्राप्ति के लिए पति को प्रसन्न किया

पिछली कड़ी में हमने देवमाता अदिति की कथा पर चर्चा की थी। इस कड़ी में हम दैत्यों की माता दिति की चर्चा करेंगे। अदिति की भांति दिति भी प्रजापति दक्ष की उन 17 पुत्रियों में  से थी जिनका विवाह प्रजापति मरीचि के पुत्र कश्यप से हुआ था।

विभिन्न धर्मग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि एक बार जब ऋषि कश्यप सन्ध्या काल में देवताओं के निमित्त यज्ञ में खीर की आहुतियां दे रहे थे, तब दिति अत्यंत कामासक्त होकर अपने पति कश्यप के पास आई तथा उनसे समागम का आग्रह करने लगी।

इस पर ऋषि कश्यप ने उसे समझाया कि यह भूत-भ्रमण काल है, इस काल में समागम करना उचित नहीं है अन्यथा भूतनाथ शिव क्रुद्ध जो जाएंगे किंतु कामातुर दिति ऋषि से समागम का आग्रह करती रही।

कश्यप समझाते रहे किंतु दिति जिद करती रही। अंत में ऋषि कश्यप ने विवश होकर अपनी पत्नी की बात मान ली। समागम के पश्चात् जब काम का आवेग शांत हो गया तो दिति अपने कृत्य के लिए अत्यंत लज्जित हुई तथा क्षमा याचना के लिए अपने पति के समक्ष उपस्थित हुई।

मुनि ने कहा- ‘हे भार्या! तेरे द्वारा असमय में समागम किए जाने के कारण तेरे गर्भ से दैत्य उत्पन्न होंगे। वे तीनों लोकों को अत्यंत दुःख देंगे, देवताओं से शत्रुता करने वाले होंगे तथा भगवान श्रीहरि विष्णु के हाथों मारे जायेंगे।’

जब दिति को यह ज्ञात हुआ कि उसके पुत्र देवताओं के कष्ट का कारण बनेंगे, तो दिति ने सौ वर्ष तक अपने शिशुओं का उदर में ही रखा। अंत में उसके गर्भ से हिरण्याक्ष एवं हिरण्यकश्यप आदि दैत्य उत्पन्न हुए।

जब दिति के पुत्रों ने अदिति के पुत्रों को स्वर्ग से निकाल दिया तो भगवान विष्णु ने वराह के रूप में प्रकट होकर हिरण्याक्ष का तथा नृसिंह रूप में प्रकट होकर हिरण्यकश्यप का वध किया और इन्द्र को फिर से स्वर्ग का राजा बना दिया। इस कारण अदिति और दिति में वैर रहने लगा।

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एक बार दिति ने सोचा मैं कोई ऐसा उपाय करूं जिससे मुझे ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो इन्द्र को मार डाले। इसलिए दिति उसी दिन से अपने पति कश्यप को प्रसन्न करने में जुट गई और दिन-रात ऋषि की सेवा करने लगी। दिति ने अपने मन को संयमित करके प्रेम, विवेक, मधुर भाषण, मुस्कान एवं चितवन से ऋषि कश्यप के मन को जीत लिया।

दिति की सेवा से प्रसन्न होकर ऋषि कश्यप ने दिति से कहा- ‘तुम जो चाहो हम करने को तैयार हैं।’

दिति ने ऋषि से कहा- ‘अदिति के पुत्रों ने मेरे पुत्रों को मार डाला है। अतः मैं आपसे ऐसे गर्भ की इच्छुक हूँ, जिससे उत्पन्न पुत्र, अदिति के पुत्र इन्द्र को मार डाले।’

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दिति के मन का कपट जानकर कश्यप ऋषि को बहुत दुःख हुआ। उन्होंने सोचा कि माया ने मुझे पकड़ लिया। संसार में लोग स्वार्थ के लिए पति-पुत्रादि का भी नाश कर देते हैं। अब मेरा क्या होगा? मैंने अपनी पत्नी को जो वचन दिया है, वह व्यर्थ नहीं हो सकता किंतु मैं यह भी नहीं चाहता कि मेरे पुत्र इन्द्र का अनिष्ट हो। इस प्रकार सोच-विचार करके कश्यप ऋषि ने दिति को एक वर्ष का ‘पुंसवन व्रत’ धारण करने के लिए कहा। कश्यप ने कहा- ‘यदि तुम एक वर्ष तक व्रत का पालन करोगी तो तुम्हारे गर्भ से जो पुत्र उत्पन्न होगा वह इन्द्र को मारने वाला होगा किंतु यदि व्रत में कोई त्रुटि हो जायेगी तो वह इन्द्र का मित्र हो जाएगा।’ कश्यप मुनि ने व्रत-काल में दिति को कई नियमों का पालन करने के लिए कहा। इन नियमों के अनुसार वह व्रत की अवधि में किसी भी प्राणी को मन, वचन या कर्म के द्वारा नहीं सताएगी। किसी को शाप या गाली नहीं देगी, झूठ नहीं बोलेगी, शरीर के नख एवं बाल नहीं काटेगी, किसी भी अशुभ वस्तु का स्पर्श नहीं करेगी, क्रोध नहीं करेगी, बिना धुले वस्त्र नहीं पहनेगी तथा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा पहनी हुई माला नहीं पहनेगी। किसी का जूठा नहीं खाएगी, मांसयुक्त अन्न का भोजन नहीं करेगी, शूद्र और रजस्वला स्त्री का अन्न नहीं खाएगी। जूठे मुंह, संध्या समय एवं खुले केश लेकर घर से बाहर नहीं जाएगी। केवल रात्रि में शयन करेगी, प्रातःकाल एवं सायंकाल में शयन नहीं करेगी।

ऋषि ने दिति से कहा कि इस व्रत के दौरान वह निषिद्ध-कर्मों का त्याग करके सदैव पवित्र और सौभाग्य के चिह्नों से सुसज्जित रहे। प्रातःकाल में गाय, ब्राह्मण, लक्ष्मीजी और भगवान नारायण की पूजा करके ही कलेवा करे। सुहागिन स्त्रियों एवं पति की सेवा में संलग्न रहे और यही भावना करती रहे कि पति का तेज मेरी कोख में है।

अपने पति की बात मानकर दिति कश्यप ऋषि के ओज से सुंदर गर्भ धारण करके पुंसवन व्रत का पालन करने लगी। पुत्र-जन्म एक सहस्र वर्ष बाद होना था। तब तक दिति कुशप्लव नामक तपोवन में रहकर घनघोर तपस्या करने लगी। वह भूमि पर सोती थी और सदैव पवित्रता का ध्यान रखती थी।

उसके इस प्रकार के सात्विक जीवन व्यतीत करने से उसका गर्भ भी अति उत्तम संस्कारों से विभूषित हो गया। इस प्रकार कई सौ साल बीत गए तथा दिति का गर्भ बड़ा होने लगा। एक दिन अदिति को दिति के गर्भवती होने तथा उसके गर्भ के उद्देश्य के बारे में जानकारी हो गई। अदिति को यह जानकर अत्यंत चिंता हुई कि दिति ने अदिति के पुत्रों को मारने के उद्देश्य से पति कश्यप से महातेजस्वी गर्भ की प्राप्ति की है। अतः अदिति अपनी बहिन के गर्भ को नष्ट करने का उपाय सोचने लगी!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इन्द्र ने दिति के गर्भ के उनन्चास टुकड़े कर दिए (15)

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कपटी इन्द्र - bharatkaitihas.com
कपटी इन्द्र ने दिति के गर्भ के उनन्चास टुकड़े कर दिए

पिछली कथा में हमने चर्चा की थी कि अदिति के पुत्र इन्द्र को मारने के लिए अदिति की बहिन दिति ने एक तेजस्वी पुत्र की कामना की तथा अपने पति को प्रसन्न करके उससे एक तेजस्वी गर्भ प्राप्त कर लिया। महर्षि कश्यप ने दिति को तेजस्वी पुत्र प्राप्त करने के लिए पुंसवन व्रत करने का उपदेश दिया। तदनुसार दिति विगत कई सौ सालों से पुंसवन व्रत का पालन कर रही थी।

जब दिति का तेजस्वी गर्भ बढ़ने लगा तो दिति के अत्यन्त दीप्तिमान अंगों को देखकर अदिति को बड़ा दुःख हुआ। उसने अपने मन में सोचा कि यदि दिति के गर्भ से इन्द्र के समान महाबली पुत्र उत्पन्न होगा तो निश्चय ही मेरा पुत्र निस्तेज हो जाएगा।

चिन्ता-ग्रस्त अदिति ने अपने पुत्र इन्द्र से कहा इस समय दिति के गर्भ में तुम्हारा शत्रु पल रहा है। अतः ऐसा कोई प्रयत्न करो कि गर्भस्थ शिशु नष्ट हो जाए। दिति का वह गर्भ मेरे हृदय में शूल के समान चुभ रहा है। अतः किसी उपाय से तुम उसे नष्ट कर दो। जब शत्रु बढ़ जाता है तब वह राजयक्ष्मा रोग की भांति, नष्ट नहीं हो पाता है। इसलिए बुद्धिमान मनुष्य का कर्तव्य है कि वह ऐसे शत्रु को अंकुरित होते ही नष्ट कर डाले। चतुर राजनीतिज्ञ वही है जिसे शत्रु के घर की एक-एक बात का पता हो।

अपनी माता की बात मानकर इन्द्र अपनी सौतेली माता दिति के पास गया। उसने ऊपर से मधुर किन्तु भीतर से विषभरी वाणी में विनम्रतापूर्वक दिति से कहा- ‘हे माता! व्रत के कारण आप अत्यन्त दुर्बल हो गयी हैं अतः मैं आपकी सेवा करने के लिए आया हूँ।’

जिस प्रकार बहेलिया हिरन को मारने के लिए हिरन की सी भोली सूरत बनाकर उसके पास जाता है, वैसे ही देवराज भी कपट-वेष धारण करके व्रतपरायणा दिति के व्रत-पालन की त्रुटि पकड़ने के लिए उसकी सेवा करने लगा। एक दिन उसने दिति से कहा- ‘माता मैं आपके चरण दबाऊँगा, क्योंकि बड़ों की सेवा करने से मनुष्य अक्षय गति प्राप्त कर लेता है।’

ऐसा कहकर इन्द्र दिति के दोनों चरण पकड़कर दबाने लगा। इस प्रकार प्रेम पूर्वक चरण दबाए जाने से दिति को बहुत सुख मिला और उसे नींद आने लगी। उस दिन वह पैर धोना भूल गयी और खुले बालों से ही सो गई। दिति को नींद के वशीभूत देखकर इन्द्र योगबल से अत्यन्त सूक्ष्म रूप धारण करके दिति के उदर में प्रवेश कर गया और अपने वज्र से दिति के गर्भस्थ बालक के सात टुकड़े कर डाले। तब वे सातों टुकड़े सूर्य के समान तेजस्वी सात कुमारों में परिणत हो गए।

वज्र के आघात से गर्भस्थ शिशु रोने लगे। तब दानव-शत्रु इन्द्र ने उनसे ‘मा रुद’ अर्थात् ‘मत रोओ’ कहा। फिर इन्द्र ने उन सातों टुकड़ों के सात-सात टुकड़े और कर दिये। इस प्रकार वे उनन्चास कुमार बन गए और पुनः जोर-जोर से रोने लगे। उन सब ने हाथ जोड़कर इन्द्र से कहा- ‘देवराज! तुम हमें क्यों मार रहे हो? हम तो तुम्हारे भाई हैं।’

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इन्द्र ने मन-ही-मन सोचा कि निश्चय ही यह सौतेली माँ दिति के व्रत का परिणाम है कि वज्र से मारे जाने पर भी इनका विनाश नहीं हुआ। ये एक से अनेक हो गए, फिर भी उदर की रक्षा हो रही है। इसमें संदेह नहीं कि ये अवध्य हैं, इसलिए इन्द्र ने विचार किया कि ये देवता हो जाएं। इस प्रकार इन्द्र ने सौतेली माता के पुत्रों से शत्रु-भाव त्यागकर उन्हें ‘सोमपायी देवता’ बना लिया। जब दिति के गर्भ के बालक देवराज इन्द्र द्वारा किए गए वज्र-प्रहार से आहत होकर रो रहे थे, उस समय इन्द्र ने इन गर्भस्थ बालकों को ‘मा रुद’ कहकर चुप कराया था, इसलिए ये बालक आगे चलकर ‘मरुद्गण’ नाम से प्रसिद्ध हुए। इन्द्र द्वारा अपने गर्भ को विकृत किया गया जानकर दिति जाग गई। उसने अत्यंत क्रोध में भरकर अपनी बहिन अदिति तथा उसके पुत्र इन्द्र को शाप दिया। दिति ने इन्द्र से कहा- ‘तुमने छलपूर्वक मेरा गर्भ छिन्न-भिन्न किया है। इसलिए तेरा राज्य भी शीघ्र ही नष्ट हो जाएगा। जिस प्रकार अदिति ने गुप्त पाप के द्वारा मेरे गर्भ को नष्ट करवाया है, उसी प्रकार उसके पुत्र भी क्रमशः उत्पन्न होते ही नष्ट हो जायेंगे और वह पुत्र-शोक से चिन्तित होकर कारावास में रहेगी।’

कश्यप ऋषि ने दिति को शांत करते हुए कहा- ‘देवी! तुम क्रोध मत करो। तुम्हारे ये उनचास पुत्र मरुद् नामक देवता होंगे, जो इन्द्र के मित्र बनेंगे। तुम्हारा शाप अट्ठाईसवें द्वापर-युग में सफल होगा। वरुणदेव ने भी अदिति को शाप दिया है। इन दोनों शापों के संयोग से मनुष्य योनि में जन्म लेकर देवकी के रूप में उत्पन्न होगी और कारवास में बंद होकर अपने पुत्रों के लिया रोया करेगी! इस प्रकार यह अपने द्वारा किए गए कठोर कर्म का फल भोगेगी।’

इस पौराणिक कथा से अनुमान लगाया जा सकता है कि दिति के गर्भ से उनन्चास पुत्रों के जन्म लेने की यह कथा वस्तुतः प्रकृति की किसी बड़ी घटना का उल्लेख है जिसमें सृष्टि में वायु का प्राकट्य हुआ। चूंकि इन्द्र बादलों का देवता है तथा वायु बादलों को उड़ाकर नष्ट कर देता है इसलिए वायु को इन्द्रहंता माना जाना था किंतु इन्द्र ने वायु को देवता बना लिया। अर्थात् इन्द्र की चतुराई से वायु बादलों के सहायक बन गए जो बादलों को एक स्थान से उड़ाकर दूसरे स्थान तक ले जाने में सहायता करते हैं।

कुछ ग्रंथों में यह कथा थोड़े से अंतरों के साथ मिलती है। इन ग्रंथों के अनुसार इन्द्र ने दिति को अपनी सेवा से प्रसन्न कर लिया किंतु दिति इन्द्र के मनोभावों को ताड़ गई। इसलिए पुत्र-प्राप्ति से दस वर्ष पूर्व दिति ने इन्द्र से कहा- ‘मैं तेरी सेवा से अत्यंत प्रसन्न हूँ। मेरे गर्भ में तेरा हंता पल रहा है किंतु जब वह उत्पन्न होगा तो मैं उससे कहूंगी कि वह तेरा वध नहीं करे।’

एक दिन दिति पायताने की ओर सिर करके सो गयी। इन्द्र ने उसे ऐसी अपवित्र स्थिति में सोते हुए देखा तो इन्द्र ने दिति के गर्भ में प्रवेश करके गर्भ में पल रहे शिशु के सात टुकड़े कर डाले। बालक के चिल्लाने पर दिति जाग गयी। उसने इन्द्र से पूछा कि तूने मेरे गर्भ के टुकड़े क्यों किए? इस पर इन्द्र ने विनीत भाव से कहा- ‘माता! आप अशुचिता पूर्वक पायताने पर सिर रखकर सो रही थीं। इसलिए आपके गर्भ के टुकड़े किए गए हैं।’

इन्द्र की यह बात सुनकर दिति ने लज्जित होकर इस कर्म का परिमार्जन करने की प्रार्थना की। तब इन्द्र ने उसके दोष का परिमार्जन कर दिया।

दिति ने इन्द्र से प्रार्थना की- ‘मेरे गर्भ से सात दिव्य रूपधारी बेटे जन्म लें जो मारुत कहलाएं क्योंकि गर्भ को काटते हुए इन्द्र ने ‘मा रूद्’ (रो मत) कहा था। इनमें से चार पुत्र इन्द्र के अधीन रहकर चारों दिशाओं में विचरण करें। दो बालक क्रमशः ब्रह्मलोक तथा इन्द्रलोक में विचरण करें और सातवां पुत्र महायशस्वी ‘दिव्य वायु’ के नाम से विख्यात हो।’ इन्द्र ने दिति की यह प्रार्थना स्वीकार कर ली।

इस प्रकार इन ग्रंथों में सात मरुद्गण का उल्लेख मिलता है जबकि बहुत से हिन्दू धर्म-ग्रंथों में उनन्चास मरुद्ों का उल्लेख मिलता है। रामचरित मानस में भी गोस्वामीजी ने लंका दहन के प्रसंग में लिखा है- ‘हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास!’ अर्थात् ईश्वर की प्रेरणा से लंका को जलाने के लिए उनन्चास प्रकार के मरुत चलने लगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कद्रू के पुत्र (16)

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कद्रू के पुत्र - bharatkaitihas.com
कद्रू के पुत्र

अण्डों के उत्पन्न होने के पांच सौ वर्ष बीत जाने के बाद कद्रु के अंडों से एक सहस्र नाग प्रकट हुए जो कद्रू के पुत्र कहलाए!

हम पिछली कुछ कड़ियों में दक्ष की 17 पुत्रियों का उल्लेख करते आए हैं जिनका विवाह प्रजापति ब्रह्माजी के पौत्र कश्यप ऋषि से हुआ था। प्रजापति दक्षराज की इन 17 कुमारियों में कद्रू तथा विनता भी थीं जिनका विवाह कश्यप ऋषि से हुआ था। एक बार कश्यप ऋषि ने कद्रू तथा विनता से प्रसन्न होकर उन्हें मनचाहा वर मांगने को कहा।

कद्रु ने महापराक्रमी एक सहस्त्र नाग पुत्रों के रूप में मांगे तथा विनता ने केवल तेजस्वी दो पुत्र मांगे जो कद्रू के एक सहस्र पुत्रों की अपेक्षा अधिक पराक्रमी एवं यशस्वी हों। दक्षपुत्रियों की ऐसी इच्छा जानकर प्रजपति कश्यप ने कद्रू तथा विनता को गर्भवती कर दिया।

समय आने पर कद्रू की कोख से एक सहस्स्र अण्डे उत्पन्न हुए तथा विनता की कोख से दो अंडे उत्पन्न हुए। अण्डों के उत्पन्न होने के पांच सौ वर्ष बीत जाने के बाद कद्रु के अंडों से एक सहस्र नाग प्रकट हुए जो कद्रू के पुत्र कहलाए किंतु विनता के अण्डे ज्यों के त्यों पड़े रहे। इस पर विनता ने अपना एक अंडा स्वयं ही तोड़ डाला। उसमें से एक अविकसित बालक निकला जिसका ऊर्ध्वभाग तो बन चुका था किंतु अधोभाग अभी विकसित नहीं हुआ था।

उस अविकसित बालक ने क्रुद्ध होकर अपनी माँ को श्राप दिया कि वह 500 वर्ष तक कद्रु की दासी बनकर रहे। उस बालक ने यह भी कहा कि यदि दूसरा अंडा समय से पूर्व नहीं फोड़ा गया तो उस अण्डे से उत्पन्न पुत्र विनता को दासत्व से मुक्ति दिलवाएगा। इसके बाद वह अविकसित बालक अरुण बनकर आकाश में चला गया तथा सूर्यदेव का सारथि बन गया।

जब समय आने पर दूसरा अण्डा परिपक्व हुआ तो उसमें से गरुड़जी ने जन्म लिया। वे भगवान विष्णु के वाहन बन गए। विनता का पुत्र होने के कारण गरुड़जी को वैनतेय भी कहते हैं। उन्हें पक्षियों का राजा तथा खगपति भी कहा जाता है। जब राम-रावण युद्ध में भगवान श्रीराम एवं लक्ष्मण को मेघनाद ने नागपाश से बांध दिया था, तब यही गरुड़जी नागपाश को काटने के लिए धरती पर उपस्थित हुए थे।

विभिन्न पुराणों तथा महाभारत में आई एक कथा के अनुसार विनता तथा कद्रू एक बार कहीं बाहर घूमने गयीं। वहाँ उनमें उच्चैश्रवा नामक घोड़े के रंग को लेकर विवाद हो गया। विनता ने कहा कि उच्चैश्रवा का रंग पूरी तरह श्वेत है जबकि कद्रू ने कहा कि घोड़े का रंग श्वेत है किंतु पूंछ का रंग काला है। इस पर दोनों में शर्त लग गई कि जिसकी बात गलत होगी, वह पांच सौ सालों के लिए दूसरी बहिन की दासी बनकर रहेगी। अगले दिन घोड़े का रंग देखने का निश्चय हुआ।

कद्रू के मन में कपट आ गया। उसने अपने पुत्रों से कहा कि वे उच्चैश्रवा की पूंछ पर लटक जाएं जिससे उसकी पूंछ काली दिखाई दे। कद्रू के अधिकांश पुत्र इस कपट में अपनी माता का साथ देने को तैयार हो गए किंतु कुछ पुत्रों ने अपनी माता के कपट में साथ देने से मना कर दिया। इस पर कद्रू ने उन नागों को शाप दिया कि वे जनमेजय के यज्ञ में भस्म हो जायें।

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कद्रू के मुख से इतनी कड़वी बात सुनकर कश्यप ऋषि अत्यंत दुःखी हुए। तब ब्रह्माजी ने अपने पौत्र कश्यप को बुलाकर कहा- ‘तुमसे उत्पन्न सर्पों की संख्या बहुत बढ़ गयी है। तुम्हारी पत्नी ने उन्हें शाप देकर अच्छा ही किया, अतः तुम उससे रुष्ट मत होना।’ ब्रह्माजी ने कश्यप को सर्पों का विष उतारने की विद्या भी प्रदान की।

अगले दिन विनता तथा कद्रू उच्चैश्रवा को देखने के लिए गयीं। उच्चैश्रवा की पूंछ सफेद रंग की ही थी किंतु कद्रू के पुत्र उसकी पूंछ से लटक गए। इस कारण उच्चैश्रवा की पूंछ काले रंग की दिखाई पड़ी। विनता अत्यंत दुःखी हुई किंतु उसने कद्रू की दासी बनना स्वीकार कर लिया।

जब गरुड़जी उत्पन्न हुए और उन्होंने अपनी माता विनता को कद्रू की दासी बने हुए देखा तो गरुड़जी ने कद्रू तथा उसके पुत्रों से पूछा- ‘ऐसा कौन-सा कार्य है जिसको करने से मेरी माता को दासत्व से मुक्ति मिले सकती है?’

इस पर नागों ने गरुड़जी से कहा- ‘यदि तुम स्वर्ग से अमृत लाकर नागों को प्रदान करो तो हम तुम्हारी माता को दासत्व से मुक्त कर देंगे।’

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 गरुड़जी उसी समय अमृत लाने के लिए स्वर्ग चले गए। जब देवताओं ने देखा कि गरुड़जी अमृत लेने आ रहे हैं तो उन्होंने गरुड़जी पर आक्रमण कर दिया। शक्तिशाली गरुड़जी ने समस्त देवताओं को परास्त कर दिया तथा स्वर्ग में प्रवेश करके अमृत-कलश उठा लिया। भगवान श्रीहरि विष्णु ने भी गरुड़जी को अमृतघट ले जाते हुए देखा किंतु जब भगवान ने यह विचार किया कि गरुड़जी ने अमृत का पान स्वयं नहीं किया अपितु उसे नागों के पास लेकर जा रहे हैं ताकि गरुड़जी की माता को दासतव से मुक्ति मिल सके तो श्रीहरि भगवान विष्णु, गरुड़जी की निस्पृहता देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए तथा उन्होंने गरुड़जी को वरदान दिया कि वे अमृत का पान किए बिना ही अजर-अमर होंगे तथा उनका स्थान विष्णु-ध्वज पर रहेगा। इस प्रकार गरुड़जी अदिति के पुत्र न होते हुए भी देवताओं में सम्मिलित हो गए। जब गरुड़जी अमृत-कलश लेकर चले तो मार्ग में उन्हें देवराज इन्द्र मिले। इन्द्र ने गरुड़जी से कहा- ‘यह अमृत-कलश मुझे दे दो। यदि नागों ने इसका पान कर लिया तो यह सम्पूर्ण सृष्टि के लिए अत्यधिक बुरा होगा।’ इस पर गरुड़जी ने इन्द्र को बताया- ‘मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है किंतु इसे ले जाए बिना मेरी माता, नागों की माता के दासत्व से मुक्त नहीं होगी। मैं यह अमृत-कलश नागों के पास ले जाकर रख दूंगा। आप इसे वहाँ से उठा लेना।’

जब इन्द्र ने गरुड़जी की यह बात सुनी तो उसने गरुड़जी को वरदान दिया- ‘आज के बाद सर्प गरुड़जी की भोजन सामग्री होंगे।’

गरुड़जी अपनी माँ के पास पहुंचे और उसे बताया कि मैं अमृत ले आया हूँ। माता विनता अपने पुत्र का यह पराक्रम देखकर बहुत प्रसन्न हुई।

गरुड़जी ने नागों को भी सूचना दी- ‘मैं अमृत ले आया हूँ। अतः आप लोग मेरी माता विनता को दासत्व से मुक्त कर दें।’

जब नागों ने पूछा कि अमृत-कलश कहाँ है तो  गरुड़जी ने अमृत-कलश एक कुशासन पर रख दिया तथा नागों से कहा कि वे स्नान आदि से पवित्र होकर अमृत-कलश ले जाएं। नागों ने गरुड़जी की बात स्वीकार कर ली। उन्होंने अपनी मौसी विनता को दासत्व से मुक्त कर दिया तथा स्वयं स्नान करने के लिए चले गए।

जब तक नाग स्नान करके लौटते, तब तक देवराज इन्द्र अमृत-कलश लेकर चले गए। इस पर नागों ने उस कुशा को चाटना आरम्भ कर दिया जिस पर गरुड़जी ने अमृत-कलश रखा था। उन्होंने सोचा कि संभवतः अमृत की कुछ बूंदें इस कुशा पर गिर गई हों। नागों को अमृत तो नहीं मिला किंतु कुशा के कारण उनकी जीभ बीच में से चिर गई। कहा जाता है कि उसी दिन से सांपों की जीभ बीच में से चिरी हुई होती है।

कश्यप की पत्नी कद्रू के सम्बन्ध में पुराणों में एक अन्य कथा भी मिलती है जिसके अनुसार कश्यप की पत्नी सुपर्णा तथा कद्रू, अन्य ऋषियों के मना करने पर भी ऋषियों के आश्रमों में चल रहे यज्ञों के हविष्य को दूषित कर देती थीं। अतः ऋषियों ने उन्हें शाप देकर नदियां बना दिया।

कश्यप ऋषि ने अपनी पत्नियों की शाप-मुक्ति के लिए भगवान शिव की आराधाना की। भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि जब ये दोनों नदियां गंगाजी में मिलेंगी तब वे पुनः नारी-रूप धारण कर लेंगी।

जब कुछ समय बाद कश्यप ऋषि को अपनी दोनों पत्नियां पुनः नारी रूप में प्राप्त हो गईं तब कश्यप ने अपनी दोनों पत्नियों का सीमांतोन्नयन संस्कार किया किंतु यज्ञ के समय कद्रू ने एक आंख से संकेत करके ऋषियों का उपहास किया। अतः ऋषियों ने कद्रू को शाप देकर उसे कानी बना दिया। कश्यप ने बड़ी कठिनाई से ऋषियों को प्रसन्न करके कद्रू को श्राप मुक्त करवाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कश्यप ऋषि को वसुदेव के रूप में पैदा होने का श्राप मिला था (17)

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कश्यप ऋषि

हमने इस धारावाहिक की पिछली कुछ कड़ियों में कश्यप ऋषि का उल्लेख किया है। कश्यप, ब्रह्माजी के पुत्र प्रजापति मरीचि के पुत्र थे। वे अत्यंत ज्ञानी थे। उनकी बहुत सारी पत्नियां थीं जिनमें से 17 पत्नियां तो प्रजापति दक्ष की पुत्रियां थीं। माना जाता है कि इस धरती पर जितने भी प्राणी हैं, वे कश्यप ऋषि तथा उनकी पत्नियों की संतान हैं।

ऐसे महापराक्रमी, महाज्ञानी तथा महातपस्वी कश्यप को भी एक बार शाप झेलना पड़ा ओर उस शाप के कारण धरती पर जन्म लेकर ना-ना प्रकार के कष्ट उठाने पड़े। इस कड़ी में हम कश्यप ऋषि के शापग्रस्त होने की कथा की चर्चा करेंगे।

एक बार ऋषि कश्यप ने अपने आश्रम में एक विशाल यज्ञ का आयोजन करवाया तथा अनेक महाज्ञानी ऋषियों को यज्ञ सम्पन्न करने के लिए अपने आश्रम में बुलाया। यज्ञ में आहुति देने के लिए ऋषि को विपुल यज्ञ सामग्री, दूध एवं घी आदि की आवश्यकता थी। इस व्यवस्था के लिए कश्यप ऋषि ने वरुण देव का आह्वान किया।

वरुण देव के प्रकट होने पर कश्यप ने उनसे प्रार्थना की- ‘मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मेरे द्वारा आयोजित होने वाले वाले इस यज्ञ में यज्ञ-सामग्री का कभी अभाव न हो तथा यह यज्ञ भली-भांति सम्पन्न हो जाए।’

वरुण देव ने ऋषि को एक दिव्य गाय भेंट की और कहा- ‘यह गाय आपके यज्ञ हेतु आवश्यक समस्त सामग्री की पूर्ति करेगी। यज्ञ समाप्ति के बाद आप इसे पुनः मुझे लौटा दीजिएगा। अन्यथा मैं इस गाय को वापस लेने के लिए आऊंगा।’ कश्यप ऋषि वरुण देव से वरदान एवं दिव्य गौ प्राप्त करके बहुत प्रसन्न हुए।

कश्यप ऋषि का यज्ञ बहुत लम्बे समय तक चलता रहा। वरुण देव द्वारा दी गई गाय के प्रभाव से उनके यज्ञ में कभी भी बाधा नहीं आई। यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली सामग्री का स्वतः प्रबन्ध होता रहा। जब यज्ञ सम्पन्न हुआ तो ऋषि कश्यप के मन में उस दिव्य गौ को लेकर लालच उत्पन्न हो गया। उन्होंने गौ को अपने पास रख लिया।

यज्ञ सम्पूर्ण होने के कई दिनों बाद तक जब ऋषि कश्यप गाय को वापस लौटाने वरुण देव के पास नहीं आए तो एक दिन वरुण देव उनके समक्ष प्रकट हुए तथा बोले- ‘हे मुनिवर, मैंने आपको यह दिव्य गौ यज्ञ सम्पन्न करने के लिए दी थी। अब आपका उद्देश्य पूर्ण हो चुका है। यह दिव्य गौ स्वर्ग की सम्पत्ति है, अतः इसे वापस लौटा दें।’

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तब ऋषि कश्यप ने वरुण देव से कहा- ‘हे वरुण देव! ब्राह्मण को दान में दी गई वस्तु को कभी उससे नहीं मांगना चाहिए अन्यथा वह व्यक्ति पाप का भागी बनता है। अब यह गाय मेरे संरक्षण में है। अतः मैं इसकी देख-भाल भलीभांति करूंगा।’

वरुण देव ने ऋषि को अनेक प्रकार से समझाने का प्रयास किया कि वे इस दिव्य गौ को पृथ्वी पर नहीं छोड़ सकते परन्तु ऋषि कश्यप ने वरुण देव की एक न सुनी। अंत में वरुण देव प्रजापति ब्रह्माजी के पास ब्रह्मलोक गए। वरुण देव ने उन्हें सारी बात बताई। इस पर ब्रह्मदेव पृथ्वीलोक में ऋषि कश्यप के समक्ष प्रकट हुए।

ब्रह्मदेव ने ऋषि कश्यप को समझाया- ‘आप क्यों लोभ में पड़कर अपने समस्त पुण्य नष्ट कर रहे हैं? आप जैसे महान ऋषि को यह शोभा नही देता!’

ब्रह्माजी के बहुत समझाने पर भी ऋषि कश्यप पर कोई प्रभाव नही पड़ा और वे अपने निर्णय पर अडिग रहे। ऋषि कश्यप के इस तरह के व्यवहार से ब्रह्माजी क्रोधित हो गए तथा उन्होंने कश्यप ऋषि को श्राप देते हुए कहा- ‘तुम इस गाय के लोभ में पड़कर अपनी विचार-क्षमता क्षमता खो चुके हो। अतः तुम अपने अंश से पृथ्वी लोक में गौ-पालक के रूप में जन्म लो और गाय की सेवा करो!’

प्रजापति ब्रह्मा के मुख से श्राप सुनकर ऋषि कश्यप को अत्यंत पश्चाताप हुआ और वे अपनी त्रुटि के लिए पितामह ब्रह्माजी तथा वरुण देव से क्षमा मांगने लगे। जब ब्रह्माजी का क्रोध शांत हुआ तो उन्हें भी इस बात पर पश्चाताप हुआ कि क्रोध में आकर उन्होंने महातपस्वी कश्यप ऋषि को श्राप दे दिया।

पितामह ब्रह्मा ने अपने पौत्र कश्यप से कहा- ‘तुम अपने अंश से यदुकुल में उत्पन्न होओगे तथा वहाँ गायों की सेवा करोगे। गौ-सेवा के पुण्य से स्वयं भगवान विष्णु तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लेंगे।’

इस श्राप के प्रभाव से ऋषि कश्यप ने वसुदेव के रूप में पृथ्वी पर जन्म लिया और उन्हें भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृण का पिता बनने का सौभाग्य मिला। कश्यप की पत्नी अदिति को भी, अपनी बहिन दिति के गर्भ को इंद्र के हाथों नष्ट करवाने का प्रयास करने के कारण दिति द्वारा श्राप दिया गया था। इसलिए ऋषि कश्यप जब धरती पर वसुदेव के रूप में जन्मे, तब उनकी पत्नी अदिति देवकी के रूप में और दिति रोहिणी के रूप में उत्पन्न र्हुईं। देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ जबकि रोहिणी का विवाह गोपराज नंद से हुआ।

जब देवकी और वसुदेव का विवाह हुआ तो आकाशवाणी हुई कि देवकी का पुत्र कंस का वध करेगा। इसलिए भाई कंस ने देवकी तथा उसके पति वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया तथा एक-एक करके देवकी के सात पुत्रों की कारागार में ही हत्या कर दी। वसुदेव एवं देवकी के उद्धार के लिए भगवान श्रीहरि विष्णु ने देवकी के आठवें पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण के नाम से अवतार लिया और उन्होंने अत्याचारी कंस का वध किया।

ऋशि कश्यप के सम्बन्ध में विविध धर्म-ग्रंथों में थोड़े-बहुत अंतरों के साथ और भी कथाएं मिलती हैं। एक ग्रंथ में आई कथा के अनुसार जब भगवान परशुराम ने धरती को क्षत्रिय-विहीन किया तब उन्होंने समस्त पृथ्वी अपने गुरु कश्यप मुनि को दान कर दी थी। तब कश्यप मुनि ने परशुराम से कहा- ‘अब तुम मेरे देश में मत रहो।’ परशुराम गुरु की आज्ञा का पालन करने के लिए महेंद्र पर्वत पर जाकर रहने लगे।

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार एक बार महर्षि कश्यप के पुत्र सूर्य ने माली एवं सुमाली नामक राक्षसों को मार दिया। इस पर भगवान शिव ने सूर्य को मार दिया। इससे रुष्ट होकर ऋषि कश्यप ने भगवान शिव को श्राप दिया कि जिस प्रकार आपने मेरे पुत्र को मारा है, उसी प्रकार आपके पुत्र का भी सिर कटेगा। देवताओं के आग्रह पर भगवान शिव ने सूर्य को वापस जीवित कर दिया। महर्षि कश्यप द्वारा दिए गए श्राप के कारण आगे चलकर भगवान शिव ने अपने पुत्र गणेश का सिर काट कर उन्हें फिर से जीवित कर दिया।

वृत्रासुर वध की कथा धरती पर वर्षा आरम्भ होने की घटना से जुड़ी है (18)

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वृत्रासुर वध की कथा धरती पर वर्षा आरम्भ होने की घटना से जुड़ी है

वृत्रासुर वध की कथा सबसे पहले ऋग्वेद के चतुर्थ ब्राह्मण में मिलती है। बाद में यह कविता बहुत से पुराणों में भी कही गई है। यद्यपि वैदिक ब्राह्मण एवं पौराणिक ग्रंथों में मिलने वाली इस कथा के मुख्य पात्र इन्द्र, त्वष्टा, विश्वरूप एवं वृत्रासुर ही हैं तथापि बाद की कथाओं में गुरु बृहस्पति एवं महर्षि दधीचि के कथानक भी जुड़ गए हैं जिनके कारण कथाओं के स्वरूप में पर्याप्त अंतर आ गया है।

इस कड़ी में हम वैदिक ग्रंथों अर्थात् ब्राह्मणों में आए संदर्भों के अनुसार इन्द्र द्वारा वृत्रासुर के वध की कथा की चर्चा करेंगे। यह कथा वस्तुतः संसार में अनावृष्टि एवं अकाल के उत्पन्न होने एवं इन्द्र द्वारा फिर से बादलों को धरती पर बरसा कर वनस्पतियों को प्रकट करने की घटना की ओर संकेत करती हुई प्रतीत होती है।

वृत्रासुर वध की कथा अत्यंत प्राचीन समय से सम्बन्ध रखती है। इस समय तक देव जाति अपने पराक्रम के चरम पर नहीं पहुँची थी। देवों में तब अनेक नयी व्यवस्थायें बन रही थीं। फिर भी प्रकृति की अधिकतर शक्तियाँ इन्द्र के पास ही थीं। इस कारण कई देवता इन्द्र से वैमनस्य रखते थे। उनमें से त्वष्टा भी एक था। त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप के तीन सिर और तीन मुख थे। विश्वरूप एक मुख से सोमपान करता था तो दूसरे मुख से सुरा पीता था। तीसरे मुख से वह अन्न का भक्षण करता था।

प्रजापति ने सोम देवों के लिये, सुरा असुरों के लिये तथा अन्न मनुष्यों के लिये बनाया था किंतु विश्वरूप तीनों ही पदार्थों का भक्षण करके असीमित शक्तिशाली और स्वेच्छाचारी हो गया। इस कारण प्रजापति की बनाई व्यवस्था नष्ट होने लगी। इसलिये इन्द्र ने उस गर्वित विश्वरूप के तीनों सिर काट डाले।

विश्वरूप का सोमपायी मुख कटते ही बटेर बन गया। इसलिए बटेर का मुख सोम के समान ही भूरा होता हैै। सुरा पीने वाला मुख गौरैया बन गया। वह मद्यमत्त की ही तरह कहता रहता है- ‘कः इव?’ अर्थात् कौन है वह? विश्वरूप का तीसरा अन्नभक्षी मुख तीतर बन गया। उसमें घृत और मधु की बूंदें अंकित रहती हैं।

विश्वरूप के तीनों मुख कट जाने से विश्वरूप का पिता त्वष्टा कुपित हुआ। कुपित त्वष्टा ने इन्द्र का आह्वान किए बिना ही सोम का आहरण किया। सोम जैसे चुवाया हुआ था वैसे ही बिना इन्द्र के भी रहा। अर्थात् बिना इन्द्र की सहायता के भी सोम अपने सात्त्विक रूप में बना रहा। यह देखकर इन्द्र ने सोचा कि इससे तो मुझे सोम से वंचित कर दिया जायेगा। अतः इन्द्र ने द्रोण-कलश में रखे सोम का बलपूर्वक भक्षण कर लिया।

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त्वष्टा द्वारा इन्द्र का आह्वान किए बिना ही इन्द्र द्वारा बलपूर्वक पिये जाने से सोम कुपित हो गया और उसने इन्द्र को आहत किया। मुख को छोड़कर इन्द्र के जितने भी प्राण-छिद्र थे, उन सबमें से सोम बाहर आने लगा। इन्द्र की नाक से बाहर निकला हुआ सोम सिंह बन गया। जो सोम कानों से बहा, वह भेड़िया बन गया। जो सोम वाक् और प्राण से बहा, वह शार्दूल प्रधान श्वापद बन गया। इन्द्र ने तीन बार थूका उससे गूलर, घुंघची तथा बेर बने। शरीर से सोम के बह जाने के कारण इन्द्र अत्यंत कमजोर हो गया तथा लड़खड़ाता हुआ अपने घर गया। तब अश्विनी कुमारों ने इन्द्र की चिकित्सा की।

जब त्वष्टा को ज्ञात हुआ कि इन्द्र ने सोमपान कर लिया तो वह और भी कुपित हो गया। त्वष्टा ने द्रोण-कलश में बचे हुए सोम को यह कह कर यज्ञ में प्रवाहित किया कि ‘इन्द्र-शत्रु तुम बढ़ो।’

बहता हुआ सोम अग्नि में पहुँच कर ‘वृत्र’ के रूप में प्रकट हुआ। उसे सब विद्याएं, यश, अन्न एवं वैभव प्राप्त हुए। वह लुढ़कता हुआ उत्पन्न हुआ इससे वृत्र कहलाया। वह बिना पैरों के हुआ इसलिए ‘अहि’ कहलाया। दनु और दनायु उसके माता-पिता हुए इसलिए वह ‘दनुज’ कहलाया।

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क्रोध से भरे हुए त्वष्टा के कोप से इन्द्र को बचाने के लिए ऋषियों ने मंत्रजाप में त्रुटि कर दी जिससे मंत्र का अर्थ ‘इंद्र के शत्रु तुम बढ़ो’ के स्थान पर ‘शत्रु इन्द्र तुम बढ़ो’ हो गया। इससे इन्द्र का बल बढ़ गया। त्वष्टा के आदेश पर ‘वृत्र’ द्युलोक और पृथ्वी के बीच में जो कुछ भी है, उस सब को आच्छादित करके सो गया। वृत्र ने पूर्व और पश्चिम में समुद्रों को समेट लिया और उतना ही अन्न खाने लगा। उसे पूर्वाह्न में देवता अन्न देते थे, मध्याह्न में मनुष्य और अपराह्ण में पितर। वृत्र द्वारा वरुण को बंदी बना लिए जाने से चारों ओर हा-हा कार मच गया। वनस्पतियाँ सूख गयीं। नदियों ने प्रवाहित होना बंद कर दिया। पशु-पक्षी, देव, मानव सब कष्ट पाने लगे। इस पर इन्द्र ने अग्नि और सोम का आह्वान करके कहा कि तुम तो मेरे हो और मैं तुम्हारा हूँ। तुम क्यों इस दस्यु को बढ़ावा देते हो। इन्द्र ने अग्नि और सोम को प्रसन्न करने के लिए ‘एका-दशक-पाल पुरोडाश’ का निर्वपन किया। इस यज्ञ से इन्द्र ने पुनः इन्द्रत्व प्राप्त किया और अग्नि एवं सोम पुनः इन्द्र की ओर हो गए। उनके साथ अन्य देवता भी इन्द्र की ओर आ गए। इन्द्र ने भगवान श्रीहरि विष्णु से प्रार्थना की- ‘मैं वृत्र पर वज्र का प्रहार करूंगा, आप मेरे निकट खड़े रहना।’

विष्णु ने कहा- ‘अच्छी बात है। मैं तुम्हारे पास रहूँगा, तुम प्रहार करो।’

इससे पहले कि इन्द्र वृत्र पर प्रहार कर पाता, वृत्र ने विशाल आकार धारण करके इन्द्र को निगल लिया। इस पर बृहस्पति की प्रेरणा से देवताओं ने इन्द्र को वृत्र के पेट से बाहर निकाला। इन्द्र की प्रार्थना पर विष्णु ने वज्र में प्रवेश किया। इस बार जब इन्द्र ने वज्र उठाया तो वृत्र डर गया। वृत्र ने कहा- ‘मुझे मारो मत, मैं तुम्हें अपना पराक्रम देता हूँ।’ इन्द्र रुक गया और वृत्र ने इन्द्र को ‘यजुष्’ अर्थात् यज्ञ प्रदान कर दिया।

इन्द्र ने दुबारा वज्र उठाया तो वृत्र ने कहा- ‘मुझे मारो मत, मैं अपना ‘ऋक्’ अर्थात् ‘पूजा-स्तुति’ तुमको देता हूँ।’ इन्द्र रुक गया और वृत्र ने इन्द्र को पूजा-स्तुति प्रदान कर दिए। जब इन्द्र ने तीसरी बार वज्र उठाया तो वृत्र ने अपना ‘साम’ अर्थात् ‘वाणी चातुर्य’ भी इन्द्र को दे दिया।

इस प्रकार इन्द्र को समस्त विद्या, यश, अन्न और समस्त वैभव की प्राप्ति हो गयी और वृत्र खाली घड़े के समान रह गया। पुत्र को निर्बल हुआ देखकर वृत्र की माता तिरछी होकर उसके ऊपर छा गयी तथा ‘कालेय’ नामक दैत्य, वृत्र की सहायता करने को आ गए।

इस पर देवों ने वृत्रासुर वध के लिए ‘साकमेध’ का आयोजन किया। अग्नि तीक्ष्ण बाणों के रूप में प्रकट हुआ। सोम और सविता ने वृत्र को मारने के लिए इंद्र को तीक्ष्ण प्रेरणा प्रदान की। सरस्वती ने कहा- ‘मारो-मारो।’

पुष्टि के देवता पूषा ने वृत्र को कसकर पकड़ लिया। विष्णु ने बताया कि वृत्र को लौह, काष्ठ तथा बांस से निर्मित तथा किसी भी ऐसे पदार्थ से निर्मित अस्त्र-शस्त्र से नहीं मारा जा सकता जो सूखी अथवा गीली हो। इसे न दिन में मारा जा सकता है न रात्रि में।

इस पर जब दिवस और रात्रि के मध्य संध्या काल उपस्थित हुआ तो इन्द्र ने अग्नि की ब्रह्मशक्ति और अपनी क्षमशक्ति से वज्र को समुद्र के फेन में लपेट कर वृत्र पर प्रहार किया जिससे वृत्र तथा उसकी माता के दो टुकडे़ हो गए। कालेय भाग कर समुद्र में छिप गए। वृत्रासुर वध सम्पन्न हुआ।

इन्द्र के प्रहार से आहत वृत्र सड़ांध के साथ सब दिशाओं से समुद्र की ओर बहने लगा। इससे समुद्रों में जल का स्तर फिर से बढ़ गया। ऋग्वेद में लिखा है कि वृत्र रंभाती हुई गायों के समान समुद्र की ओर बढ़ चला। वृत्र के ‘सौम्य’ भाग से चन्द्रमा बन गया और ‘आसुरि’ भाग से समस्त प्राणियों का उदर। इसी कारण प्रत्येक प्राणी उदर रूपी वृत्र के लिए बलिहरण करता है और अन्न भक्षण करना चाहता है। 

वृत्र के मरने पर मरुतों ने संगीत का आयोजन किया किंतु वज्र के फेन में लिपटे हुए होने से इन्द्र को वृत्र की मृत्यु का पता नहीं चला और इन्द्र डर कर ‘अनुष्टप’ में छिप गया। अग्नि, हिरण्यस्तूप तथा बहती उसे ढंूढने निकले। अग्नि ने इन्द्र को ढूंढ लिया। देवताओं ने बारह पात्रों में आहरण किया हुआ पुरोडाश इन्द्र को समर्पित किया।

इन्द्र ने कहा- ‘वृत्र पर वज्र का प्रहार करने से मेरे समस्त अंग शिथिल हो गए हैं, इसलिए इस पुरोडाश से मेरी तृप्ति नहीं होती। जिस वस्तु से मेरी तृप्ति हो वही वस्तु मुझे दो।’

इस पर देवताओं ने विचार किया कि सोम के बिना इन्द्र तृप्त नहीं होगा। देवताओं के आह्वान पर सोम रात्रि में चन्द्रमा के साथ आया और जल तथा वनस्पतियों में समा गया। गायों ने उन वनस्पतियों का भक्षण करके तथा सोमयुक्त जलपान करके सोम का सम्भरण किया। देवताओं ने गौओं से सोम प्राप्त करके उसे इन्द्र को प्रदान किया। इन्द्र ने कहा- ‘मुझे इससे भी तृप्ति नहीं होती, मुझे उबाला हुआ सोम दो।’

अंत में अमावस्या को दही और उबले हुए दूध को मिलाकर ‘सान्नय्य याग’ किया गया जिससे इन्द्र तृप्त हुआ और नवीन बल धारण करके प्रकट हो गया।

यदि प्राकृतिक घटनाओं के आधार पर इस कथा का विश्लेषण करें तो हमें स्पष्ट हो जाता है कि विभिन्न देवताओं द्वारा इन्द्र से शत्रुता मानने के कारण इन्द्र कमजोर पड़ गया अर्थात् विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों में असंतुलन हो जाने से धरती पर वर्षा कम होने लगी तथा धरती का सारा जल बर्फ में बंद हो गया। इस कारण समुद्रों का जल-स्तर घट गया तथा वर्षा बंद होने लगी।

इस पर इन्द्र अर्थात् ‘बादलों के स्वामी’ ने विष्णु, वरुण एवं सरस्वती आदि देवी-देवताओं की सहायता से चारों दिशाओं में छाई हुई बर्फ पर प्रहार किया जिससे बर्फ टूट गई तथा उसमें बंद पानी फिर से समुद्रों को प्राप्त हो गया तथा धरती पर वर्षा आरम्भ हो गई। जब वृत्रासुर मरा तो सड़ा हुआ पानी समुद्र की ओर बहा, इस कथन से तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि बर्फ में पानी को बंद हुए काफी समय हो चुका था।

इस आख्यान में ‘वृत्रासुर’ प्रकृति का वह असंतुलन है जो जल को बर्फ में सीमित कर देता है तथा वर्षा को बंद करके धरती के अन्न, सोम एवं अन्य वैभव को सोख लेता है। वृत्रासुर वध आख्यान में ‘वरुण’ को जल के रूप में तथा सरस्वती को ‘नदी’ के रूप में देखा जाना चाहिए। ऋग्वेद के चतुर्थ ब्राह्मण की वृत्रासुर वध कथा विभिन्न पुराणों में अलग-अलग रूप धारण कर लेती है जिनके बारे में हम आगामी कथाओं में जानेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वृत्रासुर ने इन्द्र को स्वर्ग से निकाल दिया (19)

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वृत्रासुर ने उसी समय स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया तथा देवताओं को मारने लगा। इन्द्र ने ऐरावत पर चढ़कर वृत्रासुर पर आग्नेय-अस्त्रों से प्रहार किया

पिछली कड़ी में हमने वैदिक ब्राह्मण के आधार पर देवराज इन्द्र द्वारा वृत्रासुर के वध की कथा की चर्चा की थी। इस कड़ी में तथा इसके बाद की एक और कड़ी में हम पुराणों में आए हुए संदर्भों के आधार पर इन्द्र द्वारा वृत्रासुर का वध किए जाने की चर्चा करेंगे।

पुराणों में आए संदर्भों के अनुसार एक बार देवराज इंद्र के मन में अभिमान पैदा हो गया जिसके फलस्वरूप उसने देवगुरु बृहस्पति का अपमान कर दिया। उसके आचरण से क्षुब्ध होकर देवगुरु बृहस्पति इंद्रपुरी छोड़कर अपने आश्रम में चले गए। जब इंद्र को अपनी भूल का आभास हुआ तो उसे अत्यंत पश्चताप हुआ।

देवराज इंद्र देवगुरु को मनाने के लिए उनके आश्रम में पहुंचा। उसने हाथ जोड़कर देवगुरु से कहा- ‘आचार्य। मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया। उस समय क्रोध में भरकर मैंने आपके लिए जो अनुचित शब्द कह दिए थे, मैं उनके लिए आपसे क्षमा मांगता हूं। आप देवों के कल्याण के लिए पुनः इंद्रपुरी लौट चलिए।

इंद्र का शेष वाक्य अधूरा ही रह गया क्योंकि देवगुरु अदृश्य हो गए। इंद्र निराश होकर इंद्रपुरी लौट गया।

जब दैत्य-गुरु शुक्राचार्य को बृहस्पति के स्वर्ग छोड़कर चले जाने की बात ज्ञात हुई तो उन्होंने दैत्यों से कहा कि यही सही अवसर है जब तुम देवलोक पर अधिकार कर सकते हो। आचार्य बृहस्पति के चले जाने से देवों की शक्ति आधी रह गई है।’

 दैत्यगुरु की बात मानकर दैत्यों ने अमरावती पर आक्रमण कर दिया। देवताओं को स्वर्ग छोड़कर भागना पड़ा। देवराज इन्द्र पितामह ब्रह्मा की शरण में पहुंचा। पुराणों में देवताओं के लोक को देवलोक, अमरावती, स्वर्गपुरी, इन्द्रपुरी, बासवपुर आदि कहा गया है।

ब्रह्माजी ने इन्द्र से कहा- ‘यह तुम्हारे अहंकार के कारण हुआ है। तुम गुरु बृहस्पति के पास जाओ, वे ही तुम्हें दैत्यों पर विजय प्राप्त करने का कोई उपाय बताएंगे।’

इंद्र ने ब्रह्माजी को बताया- ‘देवगुरु बृहस्पति अदृश्य हो गए हैं।’

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इस पर ब्रह्माजी ने इन्द्र से कहा- ‘तुम भू-लोक में स्थित महर्षि त्वष्टा के महाज्ञानी पुत्र विश्वरूप के पास जाओ और उसे अपना पुरोहित नियुक्त करके शत्रुओं के नाश के लिए यज्ञ करो।’

ब्रह्माजी के आदेश से देवराज इन्द्र महर्षि विश्वरूप के पास पहुंचा। विश्वरूप के तीन मुख थे। पहले मुख से वह सोमरस पीता था। दूसरे मुख से मदिरा पान करता था और तीसरे मुख से अन्न खाता था। इन्द्र ने विश्वरूप से प्रार्थना की कि वह इन्द्र के शत्रु के नाश के लिए पुरोहित बनकर यज्ञ करवाए। विश्वरूप ने देवों के यज्ञ का पुरोहित बनना स्वीकार कर लिया तथा देवराज को नारायण कवच प्रदान करते हुए कहा- ‘यह कवच दैत्यों से युद्ध के समय तुम्हारी रक्षा करेगा और तुम्हें विजयश्री भी दिलवाएगा।’

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देवराज इन्द्र ने नारायण कवच धारण करके स्वर्ग में रह रहे दैत्यों पर आक्रमण किया। दैत्य पराजित हो गए तथा स्वर्ग छोड़कर भाग गए। एक बार पुनः दैत्यों एवं देवों में भयंकर युद्ध हुआ किंतु इन्द्र के पास नारायण कवच होने के कारण दैत्य इन्द्र को परास्त नहीं कर सके। स्वर्ग पर अधिकार कर लेने के पश्चात् देवराज इन्द्र ने विश्वरूप को पुरोहित बनाकर एक यज्ञ आरम्भ किया ताकि भविष्य में फिर कभी भी दैत्य, देवताओं को परास्त नहीं कर सकें। जब विश्वरूप यज्ञ में आहुतियां देने लगा तो एक दैत्य ब्राह्मण का वेश बनाकर विश्वरूप के पास पहुंचा और उसके कान में कहा- ‘देवताओं की विजय तथा दैत्यों के पराभव के लिए किए जा रहे यज्ञ में पुरोहिती करके तुमने अच्छा काम नहीं किया है क्योंकि तुम्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि तुम स्वयं भी एक दैत्य-माता के पुत्र हो! यदि तुमने यह यज्ञ सम्पन्न करवा दिया तो तुम्हारा मातृकुल सदैव के लिए नष्ट हो जाएगा।’ इस पर विश्वरूप ने आहुतियों में बोले जाने वाले मंत्रों में देवताओं के साथ-साथ दैत्यों की विजय के मंत्र भी पढ़ दिए। इस कारण जब यज्ञ समाप्त हुआ तो देवताओं को उसका कोई भी लाभ नहीं मिला। न दैत्यों की शक्ति में कोई कमी आई। इन्द्र को विश्वरूप द्वारा किए गए कपट की जानकारी हो गई और इन्द्र ने विश्वरूप के तीनों सिर काट दिए।

इन्द्र द्वारा यज्ञस्थल पर ही पुरोहित की हत्या कर दिए जाने की सर्वत्र निंदा होने लगी तथा उसे ब्रह्म-हत्या का दोषी ठहराया गया। जब इंद्र के द्वारा विश्वरूप की हत्या की सूचना विश्वरूप के पिता महर्षि त्वष्टा को मिली तो वह अत्यंत क्रोधित हुआ और उसने इंद्र के नाश के लिए एक यज्ञ किया।

यज्ञ पूर्ण होने पर वृत्रासुर नामक विशालाकाय असुर प्रकट हुआ। उसके एक हाथ में गदा और दूसरे में शंख था। त्वष्टा ने वृत्रासुर से कहा- ‘इन्द्र एवं समस्त देवताओं को नष्ट कर दो।’

वृत्रासुर ने उसी समय स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया तथा देवताओं को मारने लगा। इन्द्र ने ऐरावत पर चढ़कर वृत्रासुर पर आग्नेय-अस्त्रों से प्रहार किया किन्तु वृत्रासुर ने इन्द्र के अस्त्र-शस्त्र छीनकर दूर फेंक दिए और अपना भयंकर मुख खोलकर इन्द्र को खाने के लिए दौड़ा। यह देखकर इन्द्र भयभीत हो गया और स्वर्ग से भाग गया। देवराज इन्द्र पुनः पितामह ब्रह्माजी की शरण में पहुंचा और उन्हें वृत्रासुर के बारे में बताया।

इस पर ब्रह्माजी ने इन्द्र को बताया- ‘वृत्रासुर को मारने के लिए वज्र नामक शस्त्र की आवश्यकता है। यह शस्त्र उस ब्रह्मज्ञानी व्यक्ति की अस्थियों से बनाया जा सकता है जिसने दीर्घ काल तक बिना किसी प्राप्ति की अभिलाषा के भगवान की तपस्या की हो।

अतः तुम्हें धरती पर जाकर महर्षि दधीचि से उनकी अस्थियां प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि इस सम्पूर्ण सृष्टि में केवल वही ऐसे ब्रह्मज्ञानी हैं जो बिना किसी अभिलाषा के ईश्वर का तप कर रहे हैं तथा वे सहर्ष अपनी अस्थियां जगत के कल्याण के लिए प्रदान कर देंगे।’

ब्रह्माजी की बात सुनकर देवराज इन्द्र की चिंता और भी बढ़ गई क्योंकि अपने अहंकार के कारण इन्द्र ने एक बार महर्षि दधीचि का घनघोर अपमान किया था। इसलिए इन्द्र ने पितामह ब्रह्मा से पूछा- ‘क्या वृत्रासुर को मारने का और कोई उपाय नहीं है?

ब्रह्माजी ने बताया- ‘वृत्रासुर को मारने के लिए केवल महर्षि दधीचि की अस्थियों से ही वज्र बनाया जाना संभव है।’

यह सुनकर देवराज इन्द्र फिर से चिंता में डूब गया!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दधीचि ऋषि ने वृत्रासुर के नाश के लिए अपनी हड्डियां दे दीं (20)

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दधीचि ऋषि - bharatkaitihas.com
दधीचि ऋषि ने वृत्रासुर के नाश के लिए अपनी हड्डियां दे दीं

इस धारावाहिक की पिछली कड़ी में हमने त्वष्टा के यज्ञ से उत्पन्न वृत्रासुर की चर्चा की थी जिसने त्वष्टा के कहने पर इन्द्र पर आक्रमण कर दिया। ब्रह्माजी ने इन्द्र को सलाह दी कि वृत्रासुर को मारने हेतु वज्र बनाने के लिए वह दधीचि ऋषि की अस्थियों को प्राप्त करे।

वैदिक ग्रंथों में जिन ऋषियों का उल्लेख हुआ है, उनमें दधीचि ऋषि का नाम भी बहुत आदर से लिया जाता है। दधीचि वैदिक युग के ऋषि थे। विभिन्न ग्रंथों में इनके जन्म के सम्बन्ध में अनेक कथाएँ मिलती हैं।

यास्क द्वारा लिखित निरुक्त के अनुसार दधीचि की माता का नाम चित्ति और पिता का नाम अथर्वा था। माता चित्ति से ही इन्हें दधीचि नाम मिला। कुछ पुराणों के अनुसार ऋषि दधीचि कर्दम ऋषि की कन्या शांति एवं अथर्वा के पुत्र थे जबकि कुछ पुराणों में दधीचि को शुक्राचार्य का पुत्र तथा भगवानन शिव का भक्त बताया गया है।

महर्षि दधीचि की तपस्या के सम्बन्ध में भी अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। पुराणों में आए प्रसंगों के अनुसार दधीचि का आश्रम नैमिशायरण्य में स्थित था। कुछ लोग आधुनिक बिहार के सिवान जिले में स्थित मिश्रिख तीर्थ को महर्षि दधीचि की तपोभूमि मानते हैं। कुछ प्राचीन ग्रंथों में इस स्थान को दध्यंच कहा गया है।

दधीचि की पत्नी का नाम गभस्तिनी था। महर्षि दधीचि वेदों के ज्ञाता और अत्यंत दयालु स्वभाव के ऋषि थे। उनके व्यवहार से उस वन के पशु-पक्षी तक संतुष्ट रहते थे, जहाँ उनका आश्रम था। कुछ ग्रंथों के अनुसार दधीचि का आश्रम गंगा के तट पर स्थित था। महर्षि दधीचि के आश्रम में जो भी अतिथि आता, महर्षि तथा उनकी पत्नी उसकी श्रद्धापूर्वक सेवा करते थे।

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महर्षि दधीचि इस ब्रह्माण्ड में अकेले ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें ब्रह्मविद्या का ज्ञान था। इसलिए देवराज इन्द्र एक बार महर्षि दधीचि से ब्रह्मविद्या प्राप्त करने आया। महर्षि ने देखा कि इन्द्र अहंकार से भरा हुआ है तथा ब्रह्मविद्या प्राप्त करने के उपयुक्त नहीं है। इसलिए महर्षि ने इन्द्र को ब्रह्मविद्या देने से मना कर दिया।

अहंकारी इन्द्र ने महर्षि की बात समझने के स्थान पर इसे अपना घोर अपमान माना तथा ऋषि से कहा- ‘आप मुझे यह विद्या नहीं दे रहे हैं तो न सही, किंतु किसी और व्यक्ति को भी मत देना। यदि आपने किसी और व्यक्ति को यह विद्या सिखाई तो मैं आपका सिर आपके धड़ से अलग कर दूंगा।’

इस पर महर्षि ने कहा- ‘यदि कोई योग्य व्यक्ति ब्रह्मविद्या लेने के लिए मेरे पास आएगा तो मैं यह विद्या उसे अवश्य ही प्रदान करूंगा।’

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कुछ समय पश्चात् इन्द्रलोक में निवास करने वाले अश्विनी कुमारों ने महर्षि दधीचि के पास पहुंचकर ब्रह्मविद्या देने की याचना की। ऋषि दधीचि ने विनम्रता से युक्त अश्विनी कुमारों को ब्रह्मविद्या के उपयुक्त पात्र पाया। इसलिए महर्षि दधीचि ने अश्विनी कुमारों को ब्रह्मविद्या देने का निर्णय लिया तथा अश्विनी कुमारों को इन्द्र द्वारा दी गई धमकी के बारे में भी बता दिया। इस पर अश्विनी कुमारों ने एक योजना बनाई तथा महर्षि दधीचि का सिर उनके धड़ से अलग करके उसके स्थान पर अश्व का सिर लगा दिया। महर्षि ने अश्विनी कुमारों को ब्रह्मविद्या प्रदान कर दी। जब इन्द्र को इस बात की जानकारी हुई तो वह धरती पर आया तथा उसने महर्षि दधीचि का सिर धड़ से अलग कर दिया। इस पर अश्विनी कुमारों ने महर्षि का वास्तविक सिर दधीचि के धड़ पर लगा दिया। इससे कुपित होकर इन्द्र ने अश्विनी कुमारों को इन्द्रलोक से निकाल दिया किंतु ब्रह्मज्ञानी हो जाने के कारण अश्विनी कुमारों को इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ा। इसलिए जब ब्रह्माजी ने इन्द्र से कहा कि वृत्रासुर को मारने हेतु वज्र का निर्माण करने के लिए वह दधीचि ऋषि की अस्थियां प्राप्त करे तो इन्द्र दधीचि के पास नहीं जा सका।

उधर देवलोक पर वृत्रासुर के अत्याचार दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे थे। इसलिए देवराज इन्द्र को इन्द्रलोक की रक्षा करने एवं देवताओं की भलाई के लिए देवताओं सहित महर्षि दधीचि की शरण में जाना पड़ा। ब्रह्मज्ञानी महर्षि दधीचि को इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता था कि एक दिन इसी इन्द्र ने उनका घनघोर अपमान किया था। इसलिए महर्षि ने इन्द्र को पूरा सम्मान दिया तथा उससे पूछा- ‘मैं देवलोक की रक्षा के लिए क्या कर सकता हूँ?’

इन्द्र आदि देवताओं ने ऋषि को ब्रह्माजी द्वारा कही गई बात बताई तथा महर्षि की अस्थियों का दान माँगा। महर्षि दधीचि ने जगत् के कल्याण के लिए तुरंत अपनी अस्थियों का दान देना स्वीकार कर लिया। उन्होंने समाधि लगाई और अपनी देह त्याग दी।

उस समय उनकी पत्नी आश्रम में नहीं थी। अब देवताओं के समक्ष यह समस्या आई कि महर्षि दधीचि के शरीर से माँस हटाकर अस्थियां कौन निकाले? कोई भी देवता इस कार्य को करने में सक्षम नहीं था। तब इन्द्र ने कामधेनु गाय को बुलाया और उसे महर्षि के शरीर से मांस उतारने को कहा। कामधेनु ने अपने योगबल से महर्षि के शरीर का माँस उतार दिया। अब वहाँ केवल अस्थियों का पिंजर रह गया।

जब महर्षि दधीचि की पत्नी गभस्तिनी आश्रम में आई तो अपने पति की मृत-देह को देखकर विलाप करने लगी तथा सती होने का हठ करने लगी। देवताओं ने ऋषि-पत्नी को बहुत समझाया कि वह सती नहीं हो। ऋषि-पत्नी उस समय गर्भवती थी। देवताओं ने उन्हें अपने वंश के लिए सती न होने की सलाह दी किंतु गभस्तिनी ने जीवित रहना स्वीकार नहीं किया तथा अपना गर्भ देवताओं को सौंपकर सती हो गई।

देवताओं ने गभस्तिनी के गर्भ को बचाने के लिए एक पीपल वृक्ष को उसका लालन-पालन करने का दायित्व सौंपा। कुछ समय बाद वह गर्भ शिशु बन गया। पीपल द्वारा पालन-पोषण किए जाने के कारण उस बालक का नाम पिप्पलाद रखा गया। पिप्पलाद भी अपने पिता की तरह महाज्ञानी हुए।

दधीचि के वंशज आज भी धरती पर मौजूद हैं तथा दाधीच कहलाते हैं। मानव कल्याण के लिए अपनी जीवित देह का दान करने वाले एकमात्र महर्षि दधीचि ही हुए हैं, उनके जैसा लोक-कल्याणकारी व्यक्ति इस धरती पर और कोई दूसरा नहीं हुआ।

चौदह मनुओं की कथा (21)

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चौदह मनुओं की कथा - bharatkaitihas.com
चौदह मनुओं की कथा

चौदह मनुओं की कथा भारतीय पुराण साहित्य की विलक्षण संकल्पना है। यह कथा सृष्टि के नवीन रूप धारण करके बार-बार संभव होने के प्रति आश्वस्त करती है। अर्थात् सृष्टि कभी पूर्ण रूप से नष्ट नहीं होती। पहली सृष्टि में अर्जित ज्ञान अलगी सृष्टि में बीज रूप में स्थानांतरित होता है।

हिन्दू मानते हैं कि हिन्दू धर्म ग्रंथों में मानव जाति का प्राचीनतम इतिहास दिया गया है तथा इन ग्रंथों में दी गई अधिकांश कथाएं सत्य हैं। इस मत को इस तथ्य से भी बल मिलता है कि भारतीय धर्मग्रंथों में दिए आख्यानों में वर्णित भौगोलिक घटनाओं की पुष्टि यहूदी एवं ईसाई धर्मग्रंथों में वर्णित भौगोलिक घटनाओं से होती है।

यह सही है कि प्राचीन हिन्दू धर्म ग्रंथों में दी गई कथाओं में मानव जाति का प्राचीन इतिहास ढूंढा जा सकता है किंतु इस इतिहास के साथ एक कठिनाई यह है कि यह इतिहास कम से कम तीन सृष्टियों का इतिहास है।

पहली सृष्टि देवताओं की है, दूसरी सृष्टि स्वायंभू अथवा स्वायंभुव मनु की है तथा तीसरी सृष्टि वैवस्वत मनु की है। देवताओं की सृष्टि की कुछ स्मतियां स्वायंभू मनु की सृष्टि में प्रचलित थीं वहीं स्मृतियां वर्तमान वैवस्वत मनु की सृष्टि में भी चली आईं। इनके साथ ही बहुत सी स्मृतियां और कथाएं जो स्वायंभू मनु की सृष्टि से सम्बन्धित थीं, वे भी भी वैवस्वत मनु की सृष्टि में चली आईं।

ये तीनों सृष्टियां एक के बाद एक करके अस्तित्व में आई थीं किंतु इनकी स्मृतियां एवं कथाएं आपस में इतनी घुल-मिल गई हैं कि इन्हें अलग किया जाना असम्भव प्रायः हो गया है।

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कुछ विद्वानों का विचार है कि देव-सृष्टि तथा मानव सृष्टियों से अलग भी कुछ अलौकिक सृष्टियां हैं, उनकी कथाएं भी धरती के मानवों की कहानियों के साथ मिल गई हैं। इन्द्र, अग्नि, बृहस्पति, वरुण, मित्रावरुण सहित अन्य देवतागण एवं अप्सराएं देवलोक वाली सृष्टि का हिस्सा हैं जबकि सृष्टि-कर्त्ता ब्रह्मा, पालनकर्त्ता भगवान विष्णु, सृष्टि हर्त्ता भगवान शिव, अन्नपूर्णा भगवती दुर्गा, बुद्धि के देवता गणेश देवलोक से भी अलग हैं और अलौकिक हैं। ये अमरावती में निवास नहीं करते हैं अर्थात् ये पांचों (विष्णु, शिव, दुर्गा, गणेश एवं ब्रह्मा) स्वर्ग के देवी-देवता नहीं हैं। इस कारण इनकी कथाओं का सम्बन्ध देवलोक अथवा स्वर्गलोक वाली सृष्टि से नहीं है।

मधु-कैटभ, भस्मासुर, त्वष्टा, विश्वरूप तथा वृत्रासुर, हिरण्यकश्यप, हिरण्याक्ष आदि असुरों के विनाश की कथाएं पाठक के मन में भ्रम उत्पन्न करती हैं कि ये कौनसे लोक की घटनाएं हैं। वस्तुतः ये पात्र विनाशकारी प्राकृतिक शक्तियों के प्रतीक हैं तथा प्राकृतिक घटनाओं के मानवीकरण की उपज हैं। जबकि दैत्य गुरु-शुक्राचार्य, राजा बली, प्रहलाद आदि दैत्यगण देव संस्कृति के समानांतर चल रही दैत्य संस्कृति के पात्र हैं।

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देवलोक एवं दैत्यलोक इसी धरती पर ही स्थित रहे होंगे। देवलोक पहाड़ों पर स्थित होना अनुमानित है, मनुष्य लोक धरती पर था एवं दैत्यलोक समुद्र में स्थित छोटे-छोटे द्वीपों को कहते थे। हिन्दू धर्म-ग्रंथों की कथाओं के सम्बन्ध में असमंजस का एक बड़ा कारण यह भी है कि हमारे लाखों प्राचीन ग्रंथ कई हजार वर्षों की अवधि में शकों, कुषाणों, हूणों, तुर्कों, मंगोलों एवं मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा नष्ट कर दिए गए। ग्रंथों के विनष्टीकरण की प्रक्रिया में जो थोड़ी-बहुत कमी शेष रह गई थी, वह अंग्रेजों ने पूरी कर दी। बहुत से अंग्रेज शासक एवं लेखक प्राचीन भारतीय ग्रंथों, शिलालेखों, मूर्तियों एवं सिक्कों को पानी के जहाजों में भर-भर कर लंदन ले गए। इनमें से बहुत सी सामग्री आज भी ब्रिटिश म्यूजियम में रखी गई है किंतु इन तक पहुंच पाना अत्यंत ही कठिन है। विपुल प्राचीन ग्रंथों के नष्ट हो जाने अथवा हम से दूर चले जाने के कारण हमारे प्राचीनतम इतिहास की कड़ियां बीच-बीच में से टूट गई हैं। इस कारण जब हम वेदों, उपनिषदों एवं पुराणों आदि में आई कथाओं एवं संदर्भों के आधार पर इतिहास लिखने का प्रयास करते हैं तो वह इतना असंगत एवं असम्बद्ध हो जाता है कि दूसरे धर्मों के लोग हमें ढोंगी एवं मिथ्या कहकर हमारा उपहास उड़ाने लगते हैं।

उदाहरण के लिए हम ‘मनु’ पर विचार करते हैं जिसे मानव सृष्टि का प्रथम पुरुष माना जाता है। विभिन्न भाषाओं एवं धर्मों में आए मनुष्य-वाची शब्द मैन, मान, मन, मनुज तथा मानव; ‘मनु’ शब्द से बने हैं किंतु हिन्दू धर्म-ग्रंथों में वर्णित मनु कोई एक पुरुष नहीं है। मनु कई हैं तथा समय के साथ उनकी संख्या में वृद्धि होती रही है। महाभारत में 8 मनुओं का उल्लेख है। श्वेतवराह-कल्प में 14 मनुओं का उल्लेख है। जैन ग्रन्थों में 14 कुलकरों का वर्णन है। 

हिन्दू धर्म-ग्रंथों में ब्रह्मा के एक दिन को कल्प कहा गया है। प्रत्येक कल्प के बाद ब्रह्मा की रात्रि आती है। अर्थात् इस समय सृष्टि प्रलय चक्र में चली जाती है। एक कल्प में 14 मनु होते हैं तथा प्रत्युक मनु के काल को मन्वन्तर कहते हैं। प्रत्येक मन्वन्तर का एक मनु होता है। जब सृष्टि एक मन्वन्तर से दूसरे मन्वन्तर में जाती है तब सृष्टि का नाश तो नहीं होता किंतु उसका नवीनीकरण होता है। सृष्टि के नवीनीकरण की यह भूमिका एक मनु को निभानी पड़ती है।

हिन्दू धर्म के अनुसार वर्तमान में हम वराह-कल्प में रहते हैं। इस कल्प के छः मनु बीत चुके हैं जिनके नाम इस प्रकार से हैं- स्वायंभू मनु, स्वरोचिष मनु, उत्तम मनु, तापस मनु, रैवत मनु और चाक्षुषी मनु। वर्तमान समय सातवें मनु अर्थात् वैवस्वत मनु का है जिसे श्राद्धदेव मनु भी कहते हैं।

जब वैवस्वत मनु का मन्वन्तर समाप्त हो जाएगा तब सात मनु और होंगे जिनके नाम सावर्णि-मनु, दक्ष-सावर्णि-मनु, ब्रह्म-सावर्णि-मनु, धर्म-सावर्णि-मनु, रुद्र-सावर्णि-मनु, देव-सावर्णि-मनु या रौच्य-मनु और इन्द्र-सावर्णि-मनु या भौत-मनु होंगे।

वराह-कल्प के प्रथम मनु का नाम स्वायंभू-मनु था, जिनके साथ मिलकर शतरूपा नामक स्त्री ने प्रथम मानव सृष्टि उत्पन्न की। स्वायंभू-मनु एवं शतरूपा स्वयं धरती पर उत्पन्न हुए अर्थात् उनका कोई माता या पिता नहीं था। इसी मनु की सन्तानें मानव अथवा मनुष्य कहलाती हैं। स्वायंभू-मनु को आदि-मनु भी कहा जाता है। चौदह मनुओं की कथा हमें बताती है कि स्वायंभू-मनु के कुल में स्वायंभू सहित क्रमशः चौदह मनु होने हैं जिनमें से अब तक सात हो चुके हैं।

कुछ ग्रंथों के अनुसार इस समय वैवस्वत-मनु तथा सावर्णि-मनु की अन्तर्दशा चल रही है। सावर्णि-मनु का आविर्भाव विक्रम सम्वत प्रारम्भ होने से 5630 वर्ष पूर्व हुआ था।

जब हम पौराणिक ग्रंथों से हिन्दुओं का प्राचीन इतिहास लिखने का प्रयास करते हैं तो प्रायः स्वायंभू-मनु से लेकर वैवस्वत मनु तक के मन्वन्तरों में घटी घटनाओं को आपस में मिला देते हैं। जिस प्रकार हर मन्वन्तर का मनु अलग होता है, उसी प्रकार हर मन्वन्तर के सप्तऋषि भी अलग होते हैं।

कुछ विद्वानों का मानना है कि हर मनवन्तर में लगभग एक जैसी घटनाएं घटित होती हैं, इस कारण घटनाओं को अलग करके पहचान पाना कठिन हो जाता है कि कौनसी घटना कौनसे मन्वंतर से चली आई है! इस प्रकार चौदह मनुओं की कथा में अलग-अलग सृष्टियों की स्मृतियां संचित हैं। उन्हें अलग करके पहचानना संभव नहीं है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

स्वायंभू मनु तथा उनके वंशजों की कथा (22)

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स्वायंभू मनु - bharatkaitihas.com
स्वायंभू मनु तथा उनके वंशजों की कथा

पिछली कड़ी में हमने चर्चा की थी कि वराह कल्प के प्रथम मनु का नाम स्वायंभू मनु था, जिनके साथ मिलकर शतरूपा नामक स्त्री ने प्रथम मानव सृष्टि उत्पन्न की। स्वायंभू मनु एवं शतरूपा स्वयं धरती पर उत्पन्न हुए अर्थात् उनका कोई माता या पिता नहीं था। इन्हीं मनु की सन्तानें मानव अथवा मनुष्य कहलाती हैं। स्वायंभू मनु को आदि मनु भी कहा जाता है। स्वायंभुव मनु के कुल में स्वायंभुव सहित क्रमशः 14 मनु हुए।

इस कड़ी में हम स्वायंभुव मनु पर चर्चा करेंगे। बहुत से विद्वानों को मानना है कि मनु शब्द की उत्पत्ति मन से हुई है, वे प्राणी जिनके पास मन है, वे मनु, मनुज, मनुष्य, मान एवं मैन आदि कहलाते हैं। ऋग्वेद में मनु का उल्लेख एक बार हुआ है, वहाँ उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा न मानकर गुणवाचक संज्ञा माना गया है।

पुराणों ने ‘मन’ की शक्ति से संचालित होने वाले प्राणियों के आदि पुरुष की मनु के रूप में कल्पना की तथा मनु की संतानों को मनुष्य कहा। पुराणों ने ही ऋग्वेद में गुणवाचक संज्ञा के रूप में प्रयुक्त ‘मनु’ को मानव घोषित किया।

हरिवंश पुराण के अनुसार प्रजापति ब्रह्मा ने अपनी देह क दो भाग करके एक भाग से मनु नामक पुरुष तथा दूसरे भाग से शतरूपा नामक स्त्री का निर्माण किया। इस प्रकार ब्रह्मा ने ही अपने शरीर के कुछ अंश से निर्मित अयोनिजा शतरूपा को उत्पन्न किया। शतरूपा ने दस हजार वर्ष तक तप करके स्वायंभू मनु को पति के रूप में प्राप्त किया।

विभिन्न पुराणों में आई कथाओं के अनुसार स्वायंभू-मनु सहित प्रत्येक मनु के काल खण्ड को एक मन्वन्तर कहा जाता है। प्रत्येक मन्वन्तर में 71 चतुर्युग होते हैं तथा प्रत्येक चर्तुयुग में चार युग होते हैं जिन्हें सत्युग, द्वापर, त्रेता और कलियुग कहा जाता है।

शतरूपा संसार की प्रथम स्त्री थी, ऐसी हिंदू मान्यता है। ब्रह्मांड पुराण के अनुसार शतरूपा का जन्म ब्रह्मा के वामांग से हुआ था तथा वह स्वायंभू-मनु की पत्नी थी। सुखसागर के अनुसार सृष्टि की वृद्धि के लिए ब्रह्माजी ने अपने शरीर को दो भागों में बाँट लिया जिनके नाम ‘का’ और ‘या’ अर्थात् ‘काया’ हुए। उन्हीं दो भागों में से एक से पुरुष तथा दूसरे से स्त्री की उत्पत्ति हुई। पुरुष का नाम स्वायंभू-मनु और स्त्री का नाम शतरूपा था।

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स्वायंभू-मनु एवं शतरूपा के सात पुत्र तथा तीन पुत्रियां हुईं जिनमें से दो पुत्रों के नाम प्रियव्रत एवं उत्तानपाद और तीन कन्याओं के नाम आकूति, देवहूति और प्रसूति थे। हिंदू पुराणों के अनुसार इन्हीं तीन कन्याओं से संसार के समस्त मानवों की उत्पत्ति हुई।

मत्स्य पुराण में ब्रह्मा के शरीर के बाएं भाग से उत्पन्न स्त्री का नाम अंगजा, शतरूपा तथा सरस्वती बताया गया है। मत्स्य पुराण में लिखा है कि ब्रह्मा से शतरूपा के स्वायंभू-मनु तथा मरीचि आदि सात पुत्र हुए। हरिहर पुराण के अनुसार शतरूपा ने घोर तपस्या करके स्वायँभुव-मनु को पति रूप में प्राप्त किया और इनसे ‘वीर’ नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ।

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मार्कण्डेय पुराण में शतरूपा के दो पुत्रों प्रियव्रत एवं उत्तानपाद और ऋद्धि तथा प्रसूति नामक दो कन्याओं का उल्लेख हुआ है। कहीं-कहीं तीसरी कन्या देवहूति का नाम भी मिलता है। शिव पुराण तथा वायु पुराण में दो कन्याओं प्रसूति एवं आकूति का नाम है। वायु पुराण के अनुसार ब्रह्मा के शरीर से दो अंश प्रकट हुए जिनमें से एक से मनु तथा दूसरे से शतरूपा उत्पन्न हुई। देवी भागवत पुराण में शतरूपा की कथा कुछ अलग दी गई है। कुछ पुराणों के अनुसार स्वायंभू मनु एवं शतरूपा की पुत्री आकूति का विवाह रुचि प्रजापति के साथ और प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति के साथ हुआ। देवहूति का विवाह कर्दम प्रजापति के साथ हुआ। सांख्य दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि इसी देवहूति की संतान बताए गए हैं। स्वायंभू-मनु के दो पुत्रों प्रियव्रत और उत्तानपाद में से बड़े पुत्र उत्तानपाद की दो पत्नियां थीं- सुनीति और सुरुचि। स्वायंभू-मनु के दूसरे पुत्र प्रियव्रत ने विश्वकर्मा की पुत्री बहिर्ष्मती से विवाह किया था जिससे दस पुत्र हुए। स्वायम्भू-मनु के काल में मरीचि, अंगिरस, अत्रि, पुलह, कृतु, पुलस्त्य और वशिष्ठ नामक सप्तऋषि हुए। राजा मनु एवं इन ऋषियों ने प्रजा को सभ्य, सुखी और सुसंस्कृत बनाने का कार्य किया।

जब महाराज मनु को प्रजा का पालन करते हुए मोक्ष की अभिलाषा हुई तो वे संपूर्ण राजपाट अपने बड़े पुत्र उत्तानपाद को सौंपकर रानी शतरूपा के साथ नैमिषारण्य तीर्थ चले गए। गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी मनु एवं शतरूपा तथा उनके पुत्र उत्तानपाद का उल्लेख इस प्रकार किया है-

स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा।।

नृप उत्तानपाद सुत तासू। ध्रुव हरिभगत भयउ सुत जासू।।

राजा उत्तानपाद की बड़ी रानी सुनीति के पुत्र का नाम ध्रुव था और छोटी रानी सुरुचि के पुत्र का नाम उत्तम था। राजा उत्तानपाद अपनी छोटी रानी सुरुचि पर अधिक आसक्त थे। इस कारण वे सुरुचि के पुत्र को अधिक प्रेम करते थे। जब बालक ध्रुव पाँच वर्ष के हुए तब एक बार महाराज उत्तनापाद सुरुचि के साथ सिंहासन पर बैठे हुए थे और सुरुचि का पुत्र उत्तम उनकी गोद में खेल रहा था।

इसी समय सुनीति का पुत्र ध्रुव भी वहाँ आया और अपने पिता की गोद में बैठने का हठ करने लगा। राजा ने ध्रुव को भी गोद में बैठा लिया किंतु विमाता सुरुचि ने धु्रव को राजा उत्तानपाद की गोद से यह कहकर उतार दिया कि- ‘यदि तुम्हें अपने पिता की गोद में बैठना था तो तुम्हें मेरी कोख से जन्म लेना चाहिए था!’

इस पर बालक ध्रुव रोता हुआ अपनी माता के पास गया। जब माता ने ध्रुव से रोने का कारण पूछा तो बालक ध्रुव ने सारी बात अपनी माता को बताई तथा अपने माता से पूछा- ‘मैं अपने पिता की गोद में क्यों नहीं बैठ सकता?’

इस पर रानी सुनीति ने कहा- ‘तुम्हारे भाई उत्तम ने अवश्य ही पिछले जन्म में उत्तम कर्म किए हैं, इसलिए वह अपने पिता की गोद में बैठा है। तुम भी भगवान की तपस्या करके उन्हें प्रसन्न करो। वे सबके पिता हैं, वे अवश्य ही तुम्हें अपनी गोद में बैठाएंगे।’

माता सुनीति की बात सुनकर बालक ध्रुव के पूर्व-संस्कार जागृत हो गए और वे भगवान की तपस्या करने वन जाने को उद्धत हुए। इस पर माता सुनीति ने कहा- ‘अभी तुम्हारी आयु वन जाने की नहीं है। तुम यहीं रहकर भगवान की पूजा और दान-पुण्य करो।’

बालक ध्रुव ने भगवान को प्रसन्न करने के लिए वन में जाकर तपस्या करने का निश्चय कर लिया था। इसलिए ध्रुव ने कहा- ‘माता! आपका कहना सत्य है किंतु आज से मेरे माता-पिता भगवान् विष्णु हुए।’

जब ध्रुव वन में जाकर घनघोर तपस्या करने लगे तो देवर्षि नारद ने उनके समक्ष प्रस्ताव रखा कि वे राजा उत्तानपाद से कहकर ध्रुव को आधा राज्य दिलवा सकते हैं। इस पर ध्रुव ने नारदजी का प्रस्ताव मानने से मना कर दिया। इस पर देवर्षि नारद ने ध्रुव को ‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करने का उपदेश दिया।

जब राजा उत्तानपाद को अपने पुत्र के वन में जाकर तप करने की सूचना मिली तो राजा बहुत लज्जित हुआ और राजा ने ध्रुव से पुनः राजमहल में लौटने का आग्रह किया किंतु ध्रुव अपने संकल्प पर अडिग रहे। इस पर देवराज इन्द्र ने धु्रव की तपस्या भंग करने के उपाय किए परन्तु बालक ध्रुव अडिग होकर तपस्या करते रहे।

अंत में भगवान श्रीहरि विष्णु, भक्तराज ध्रुव के समक्ष प्रकट हुए। श्रीहरि ने ध्रुव से कहा- ‘मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ। जब तक यह सृष्टि रहेगी, तब तक तुम्हें मेरे भक्त के रूप में आदर दिया जाएगा। अब तुम घर जाओ।’

श्रीहरि विष्णु के आदेश से भक्त ध्रुव फिर से अपने पिता के राज्य में आ गए। राजा उत्तानपाद ने ध्रुव को अपना सम्पूर्ण राज्य सौंप दिया और स्वयं वन में तपस्या करने चले गए।

श्रीहरि की कृपा से वर्तमान कल्प में स्वायंभू-मनु के मन्वन्तर सहित कुल छः मन्वन्तर बीत चुके हैं तथा सातवें मन्वनतर का भी पर्याप्त समय बीत चुका है किंतु भक्तराज ध्रुव को आज भी उसी तरह स्मरण किया जाता है, जिस तरह वैवस्वत मनु के मन्वन्तर की सृष्टि के अन्य बड़े भक्तों को स्मरण किया जाता है। स्वायंभू-मनु के वंशजों में स्वायंभू-मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत को भी बहुत आदर से याद किया जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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