Wednesday, May 22, 2024
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182. कुंवरसिंह ने मरने से पहले अपना झण्डा महल पर चढ़ा दिया!

जब ई.1857 के आरम्भ में पेशवा नाना साहब (द्वितीय) तीर्थयात्रा पर गया था, तब उसने लखनऊ में बिहार की जगदीशपुर जमींदारी के 80 वर्षीय जागीरदार कुंवरसिंह से भी भेंट की थी। कुंवरसिंह की जमींदारी काफी बड़ी थी किन्तु अँग्रेजों ने उसे दिवालिया होने की स्थिति में पहुंचा दिया था।

वीर कुंवर सिंह का जन्म 23 अप्रेल 1777 को भोजपुर जिले के जगदीशपुर गांव में हुआ था। कुंवरसिंह का पिता बाबू साहबजादा सिंह भोज शासकों का वंशज था। वीर कुंवर सिंह बिहार में 1857 की क्रांति का महानायक था। वह अत्यंत न्यायप्रिय, साहसी और स्वाभिमानी व्यक्ति था किंतु उसकी जागीर को अंग्रेजों ने अन्याय पूर्वक हड़प लिया था। उसे भारतीय इतिहास में 80 वर्ष की आयु में युद्ध के मैदान में आकर लड़ने तथा विजय प्राप्त करने के लिए जाना जाता है।

वीर कुंवर सिंह ने 27 अप्रैल 1857 को दानापुर के सिपाहियों, भोजपुरी जवानों और अन्य साथियों के साथ आरा नगर पर कब्जा कर लिया। कम्पनी सरकार की सेना ने भोजपुर के क्रांतिकारी सैनिकों पर हमला किया किंतु भोजपुर लम्बे समय तक स्वतंत्र रहा।

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जुलाई 1857 में क्रांतिकारी सैनिकों ने दानापुर पर अधिकार करके कुवरंसिंह को नेतृत्व करने के लिये आमंत्रित किया। अगस्त 1857 में कुवंरसिंह लखनऊ की ओर चल पड़ा। रास्ते में आजमगढ़ जिले में अँग्रेजी सेना से उसकी मुठभेड़ हुई। कुवंरसिंह ने अँग्रेजी सेना को खदेड़कर मार्च 1858 में आजमगढ़ पर अधिकार कर लिया। अब कुवंरसिंह बनारस की ओर बढ़ा। 6 अप्रैल 1858 को लार्ड मार्क ने अपने तोपखाने सहित कुंवरसिंह से मुकाबला किया। कुंवरसिंह ने उसे भी परास्त करके भगा दिया।

जब अंग्रेजी सेना ने आरा पर हमला किया तो बीबीगंज और बिहिया के जंगलों में दोनों पक्षों में घमासान युद्ध हुआ। इसमें क्रांतिकारी सेना परास्त हो गई। इस पर क्रांतिकारी सैनिक जगदीशपुर की ओर बढ़ गए। अंग्रेजी सेना ने जगदीशपुर पर भी आक्रमण किया।

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अंग्रेजी सेना के दबाव के कारण बाबू कुंवर सिंह और अमर सिंह को जन्म भूमि छोड़नी पड़ी। अमर सिंह अंग्रेजों से छापामार लड़ाई लड़ते रहे और बाबू कुंवर सिंह रामगढ़ के बहादुर सिपाहियों के साथ बांदा, रीवां, आजमगढ़, बनारस, बलिया, गाजीपुर एवं गोरखपुर में विप्लव के नगाड़े बजाते रहे।

22 अप्रैल 1858 को कुंवरसिंह ने अपनी जागीर जगदीशपुर पर अधिकार कर लिया। जगदीशपुर पहुँचे हुए उसे 24 घण्टे भी नहीं हुए थे कि आरा से ली-ग्रेड एक सेना लेकर जगदीशपुर आ पहुँचा। कुवंरसिंह ने उसे भी पराजित कर दिया।

23 अप्रैल 1858 को कुंवरसिंह ने जगदीशपुर के पास अंतिम लड़ाई लड़ी। कुंवरसिंह के सिपाहियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिकों को खदेड़ कर जगदीशपुर के महल से यूनियन जैक उतारकर अपना झण्डा लगा दिया। इस युद्ध में कुंवरसिंह बुरी तरह घायल हो गया तथा 26 अप्रैल 1858 को जगदीशपुर के महल में उसने वीरगति पाई।

उसकी मृत्यु के समय जगदीशपुर पर आजादी का ध्वज लहरा रहा था। बाद में मेजर आयर ने जगदीशपुर के महलों और मन्दिरों को नष्ट करके अपनी भड़ास निकाली।

ब्रिटिश इतिहासकार होम्स ने लिखा है- ‘उस बूढ़े राजपूत ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध अद्भुत वीरता और आन-बान के साथ लड़ाई लड़ी। यह गनीमत थी कि युद्ध के समय कुंवर सिंह की आयु अस्सी वर्ष थी। यदि वह युवा होते तो संभवतः अंग्रेजों को 1857 में ही भारत छोड़ना पड़ जाता।’

बहुत से इतिहासकारों ने लिखा है कि 1857 की क्रांति के समय नर्मदा का दक्षिणी भाग पूर्णतः शान्त रहा। इन इतिहासकारों के अनुसार क्रांति के प्रमुख केन्द्र बिहार, अवध, रूहेलखण्ड, चम्बल तथा नर्मदा के मध्य की भूमि एवं दिल्ली ही थे किंतु यह मत सही नहीं है।

आधुनिक शोधों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह क्रांति समस्त महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु और करेल तक फैल गई थी। गोवा और पाण्डिचेरी भी इस क्रांति से प्रभावित हुए। महाराष्ट्र में इस क्रांति को सतारा के रहने वाले रंगा बापूजी गुप्ते ने आरम्भ किया था।

दक्षिण भारत के प्रमुख क्रांतिकारी नेताओं में कर्नाटक के सोनाजी पण्डित, कोल्हापुर के अण्णाजी फड़नवीस, मद्रास के गुलाम गौस तथा सुल्तान बख्श, चिंगलपुट के अरणागिरि एवं कृष्णा, कोयम्बटूर के मुलबागल स्वामी, मुल्ला अली, कोनजी सरकार, केरल के विजय कुदारत कुंजी मागा आदि उल्लेखनीय हैं। दक्षिण में हैदराबाद एवं सूदूर दक्कन के बहुत से क्षेत्र इस क्रांति से अलग रहे।

दक्षिण भारत की 1857 की क्रांति की घटनायें इसलिये इतिहास की पुस्तकों में नहीं आ सकीं क्योंकि अँग्रेज उस समय के समस्त अभिलेख उठाकर लंदन ले गये। जबकि इस क्रांति का दमन किये जाने के बाद अँग्रेजों ने दक्षिण भारत में अनेक भारतीयों पर मुकदमे चलाये जिनकी कार्यवाहियां आज भी लंदन के अभिलेखागार में सुरक्षित हैं।

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