Friday, August 12, 2022

4. शुनःशेप ने ऋषियों से पूछा कि मेरा पिता कौन है, मुझे बेचने वाला या खरीदने वाला!

पिछली कड़ी में हमने देखा था कि महर्षि विश्वामित्र द्वारा दिए गए मंत्र से अग्नि आदि देवताओं ने प्रकट होकर ऋषि अजीगर्त के पुत्र शुनःशेप के प्राणों की रक्षा की। ऋषियों एवं देवताओं के प्रयासों से ऋषिकुमार शुनःशेप और राजकुमार रोहित के प्राण तो बच गए, यज्ञ भी पूर्ण हो गया और वरुण भी संतुष्ट होकर चला गया किंतु ऋषि विश्वामित्र और ऋषि अजीगर्त के जीवन में एक नई समस्या उत्पन्न हो गई।

जब यज्ञ सम्पूर्ण हो गया तो ऋषि विश्वामित्र के 100 पुत्र अपने पिता को घृणा और क्रोध से देखने लगे क्योंकि यज्ञ के दौरान विश्वामित्र ने अपने पुत्रों को पितृ-आज्ञा का उल्लंघन करने के अपराध में चाण्डाल बनकर एक सहस्र वर्ष तक पृथ्वी पर कुत्तों का मांस खाने का श्राप दिया था।

इसी प्रकार जब ऋषि अजीगर्त ने बलि यूप से मुक्त हुए अपने पुत्र शुनःशेप को गले लगाना चाहा तो शुनःशेप ने उन्हें अपना पिता मानने से मना कर दिया और कहा कि आपने मेरे बदले में दो सौ गौएं प्राप्त कर ली हैं। इसलिए अब आप मेरे पिता नहीं रहे। ऋषि अजीगर्त ने कहा कि मैंने पृथ्वीपालक राजा अंबरीष के पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिये तेरी बलि देने का निश्चय किया था न कि गौओं की प्राप्ति के लोभ से।

इस पर शुनःशेप ने ऋत्विजों से ही प्रश्न किया कि आप ही बतायें कि क्या ये मेरे पिता हैं जिन्होंने मुझे अपने हाथों से बलियूप से बांध दिया और मेरे वध के लिये कुठार लेकर प्रस्तुत हुए? अथवा राजा अंबरीष मेरे पिता हैं जिन्होंने दो सौ गौओं के बदले में मेरा जीवन क्रय कर लिया है?

शुनःशेप के प्रश्न पर ऋषियों में विवाद छिड़ गया। कुछ ऋषियों का मानना था कि अब भी ऋषि अजीगर्त ही शुनःशेप का पिता है जबकि कुछ ऋषियों के अनुसार राजा अंबरीष द्वारा अजीगर्त को उसके पुत्र का मूल्य चुका दिए जाने के कारण अंबरीष ही शुनःशेप का पिता हो गया है। शुनःशेप ने इन दोनों को ही अपना पिता मानने से मना कर दिया।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

ऋषि कुमार शुनःशेप ने अजीगर्त को यह कहकर पिता मानने से मना कर दिया कि इन्होंने मुझे दो सौ गौओं के बदले विक्रय कर दिया था। इसी प्रकार शुनःशेप ने अंबरीष को भी यह कहकर पिता मानने से अस्वीकार कर दिया कि राजा अंबरीष ने उसे पालने के लिए नहीं अपितु बलि देने के लिये क्रय किया था।

 शुनःशेप ने ऋषियों से कहा- ‘महर्षि विश्वामित्र ने मंत्र देकर, अग्नि ने ओज देकर और इंद्र ने हिरण्यमय रथ देकर मेरे प्राणों की रक्षा की है। इनमें से किसी एक को मैं अपना पिता स्वीकार कर सकता हूँ किंतु इनमें से मेरा पिता होने का वास्तविक अधिकारी कौन है?’

अंततः महर्षि वसिष्ठ ने निर्णय दिया- ‘मंत्र से ही शुनःशेप के प्राण बचे हैं। इसलिये विश्वामित्र शुनःशेप के पिता होने के अधिकारी हैं।’

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इस पर शुनःशेप विश्वामित्र के अंक में जाकर बैठ गया। इस पर विश्वामित्र ने शुनःशेप को ‘देवरात’ अर्थात् देवताओं का पुत्र घोषित किया।

शुनःशेप की यह कथा विभिन्न पुराणों में कुछ अंतर के साथ मिलती है। एक स्थान पर यह उल्लेख आया है कि महर्षि विश्वामित्र के कहने पर शुनःशेप ने बलियूप से मुक्त होने के लिए ऊषा देवता का स्तवन किया। प्रत्येक ऋचा के साथ शुनःशेप का एक-एक बंधन टूटता गया और अंतिम ऋचा के साथ शुनःशेप स्वयं ही बलियूप से मुक्त हो गया।

कुछ और ग्रंथों के अनुसार शुनःशेप कौशिक ऋषियों के कुल मे उत्पन्न ऋषि विश्वामित्र के पुत्र विश्वरथ और विश्वामित्र के शत्रु शम्बर की पुत्री उग्र की खोई हुई सन्तान था जिसे लोपमुद्रा ने भरतों अर्थात् कौशिकों के डर से ऋषि अजीतगर्त के पास छिपा दिया था। भरतों ने उग्र को मार दिया।

कुछ ग्रंथों के अनुसार ऋषि अजीगर्त अत्यंत निर्धन था इसलिए उसने अपने परिवार का पेट पालने के लिए अपना पुत्र राजा अंबरीष के हाथों बेच दिया था।

कुछ ग्रंथों में यह भी लिखा है कि राजकुमार रोहित अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध जंगलों में भाग गया था ताकि वरुण उसे न पकड़ सके तथा उसी ने अन्न की खोज में अपने परिवार सहित भटक रहे ऋषि अजीगर्त को इस बात के लिए तैयार किया था कि यदि वह अपने तीन पुत्रों में से किसी एक की बलि चढ़ाने को तैयार हो जाए तो वह अपने पिता राजा अंबरीष से कहकर ऋषि को इतनी गौएं दिलवा देगा जिससे ऋषि के परिवार को भूखा नहीं मरना पड़ेगा।

कुछ पुराणों के अनुसार जब शुनःशेप बलि से बचने के लिए करुण क्रंदन कर रहा था तब महर्षि विश्वामित्र ने अपने प्रथम पचास पुत्रों को बुलाया और उनसे कहा कि वे शुनःशेप को ज्येष्ठ-बन्धु के रूप में स्वीकार कर लें परन्तु उन पुत्रों ने पितृ-आज्ञा नहीं मानी। अतः विश्वामित्र ने उन पचास पुत्रों का ‘अपुत्र’ कहकर उनका त्याग कर दिया। वे ऋषि-सम्पत्ति के देय भाग से वंचित हो गए।

इस के बाद विश्वामित्र के पुत्र मधुच्छन्दा और उससे छोटे पुत्रों ने शुनःशेप को अपना ज्येष्ठ भ्राता मान लिया किंतु जब ऋषि ने मधुच्छंदा और शेष पुत्रों से कहा कि वे शुनःशेप के स्थान पर बलि-पशु बन जाएं तो उन्होंने भी अपने पिता की आज्ञा मानने से मना कर दिया।

कुछ ग्रंथों में लिखा है कि जब राजकुमार रोहित अपने प्राण बचाने के लिए पिता का महल छोड़कर जंगलों में भाग आया तब एक बार उसे ज्ञात हुआ कि उसका पिता जलोदर नामक रोग से ग्रस्त होकर भयानक वेदना का सामना कर रहा है। इस पर रोहित फिर से पिता के पास लौटने को उद्धत हुआ किंतु जब यह बात देवराज इन्द्र को ज्ञात हुई तो इन्द्र ने रोहित को वापस लौटने से मना कर दिया क्योंकि देवराज इन्द्र नहीं चाहता था कि वरुण को बलिभाग प्राप्त हो।

एक पुराण में आए आख्यान के अनुसार इन्द्र ने रोहित को उपदेश देते हुए कहा- ‘चरैवेति चरैवेति, चराति चरतो भगश्चरैवेति।’ अर्थात् चलते चलो, चलते चलो। चलने वाले का भाग्य भी चलता रहता है।

ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में कुछ मंत्रों का दृष्टा यही शुनःशेप नामक ऋषि है। कुछ पुराणों में बलियूप से बंधे हुए शुनःशेप द्वारा देवताओं के आह्वान के लिए पढ़े जाने वाले मंत्रों में ऋग्वेद के चतुर्थ एवं पंचम मण्डलों के मंत्र दिए गए हैं। कुछ पुराणों में यह निर्देश किया गया है कि जब किसी आर्य राजा का अभिषेक किया जाए तब शुनःशेप का प्रसंग सुनाया जाए। ऐसा संभवतः इसलिए किया गया था ताकि राजा अपने पुत्र के मोह में प्रजा के पुत्रों के प्राण लेने का साहस न करे।

कुछ पुराणों में यह आख्यान राजा अम्बरीष के पुत्र रोहित का न बताकर इसी वंश के राजा हरिश्चंद्र के पुत्र रोहित के सम्बन्ध में दिया गया है। इस आख्यान से यह भी स्पष्ट होता है कि पौराणिक काल में राजा से लेकर ऋषि और देवता तक सभी यज्ञ में नरबलि को उचित नहीं मानते थे। इसीलिए यह आख्यान वरुण को केन्द्र में रखकर रचा गया क्योंकि वरुण पहले असुर था और बाद में देवताओं ने वरुण को देवत्व प्रदान करके देव बना लिया था किंतु चूंकि देवताओं को सोम मिलना बंद हो गया था इसलिए जहाँ अन्य देवता बलहीन होते जा रहे थे, वहीं वरुण में आसुरी भाव पुनः प्रकट होने आरम्भ हो गए थे। आगे चलकर कुछ पुराणों में अंबरीष के वंशज वेन की कथा मिलती है जिसमें पशुबलि का भी विरोध किया गया है।

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