Monday, May 20, 2024
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काश्मीर में कबाइलियों का आक्रमण

काश्मीर देश का एक मात्र राज्य था जिसका राजा हिन्दू था किंतु राज्य की बहुसंख्य जनता मुस्लिम थी। रेडक्लिफ ने भारत का जो भौगोलिक विभाजन किया था, उसमें काश्मीर को यह सुविधा थी कि वह भारत या पाकिस्तान किसी भी देश में मिले, या फिर पूर्णतः अलग रहे। भारत की आजादी के बाद काश्मीर नरेश हरिसिंह ने भारत एवं पाकिस्तान से अलग रहने का निर्णय लिया। जिन्ना काश्मीर पर अपना नैसर्गिक अधिकार समझता था। इसके तीन प्रमुख कारण थे-

(1) पाकिस्तान तथा काश्मीर की सीमाएं एक दूसरे से मिलती थीं।

(2) काश्मीर में हिन्दुओं की बजाय मुस्लिम जनसंख्या अधिक थी।

(3) काश्मीर से कुछ नदियां निकलती थीं जो कुछ दूरी तक भारत में बहने के बाद पाकिस्तान में प्रवेश करती थीं और वे पाकिस्तान के लिए जीवन-रेखा सिद्ध होने वाली थीं।

जब काश्मीर पाकिस्तान में नहीं मिला और काश्मीर के राजा ने भारत एवं पाकिस्तान दोनों से अलग रहने का निर्णय लिया तो 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने पख्तून कबाइलियों से काश्मीर पर आक्रमण करवा दिया। पाकिस्तान की वर्दीधारी सेना भी इन कबायलियों के साथ भेजी गई। यह सेना बारामूला में आकर लूटपाट करने लगी। महाराजा हरिसिंह ने भारत सरकार से सहायता मांगी।

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सरदार पटेल ने काश्मीर को बचाने की इच्छा व्यक्त की किंतु नेहरू और माउण्टबेटन ने उनका यह कहकर विरोध किया कि जब तक काश्मीर का राजा भारत में मिलने की इच्छा व्यक्त न करे तब तक भारतीय सेना काश्मीर में न भेजी जाए। इस पर पटेल ने श्रीनगर तथा बारामूला दर्रे को बचाने के लिए रक्षामंत्री बलदेवसिंह को विश्वास में लेकर भारतीय सुरक्षा दलों को काश्मीर की सीमा पर भारतीय क्षेत्रों में इस प्रकार नियोजित किया जिससे उन्हें तत्काल युद्ध क्षेत्र में भेजा जा सके। उन्होंने श्रीनगर से पठानकोट तक सड़क बनाने का भी कार्य करवाया। जब पाकिस्तान की सेनाएं श्रीनगर से केवल 35 किलोमीटर दूर रह गईं तो हरिसिंह ने भारत में विलय के कागज पर हस्ताक्षर किए।

 अब नेहरू और माउण्टबेटन काश्मीर में भारतीय सेना को भेजने के लिए विवश थे किंतु माउण्टबेटन मानते थे कि थे मुस्लिम-बहुल राज्य होने तथा पाकिस्तान से सीमाएं लगने से काश्मीर को पाकिस्तान में मिलना चाहिए। जबकि सरदार पटेल मानते थे कि सदियों से हिन्दू राजा का राज्य होने के कारण काश्मीर को भारत में मिलना चाहिए। माउण्टबेटन ने नेहरू को सलाह दी कि वे इस मामले को संयुक्त राष्ट्रसंघ में ले जाएं।

सरदार पटेल ने इस प्रस्ताव का विरोध किया परन्तु पण्डित नेहरू, माउण्टबेटन की बातों में आ गए। माउण्टबेटन और नेहरू तो जूनागढ़ के मामले को भी संयुक्त राष्ट्रसंघ में ले जाना चाहते थे किंतु वहाँ भी सरदार वल्लभभाई पटेल और सरदार बलदेवसिंह ने सैनिक कार्यवाही करके जूनागढ़ को बचा लिया था। इसी प्रकार का निर्णय काश्मीर के मामले में भी लिया गया।

उपप्रधान मंत्री की हैसियत से सरदार पटेल ने रक्षामंत्री सरदार बलदेवसिंह से बात करके पंजाब के गुरदासपुर के रास्ते भारतीय थलसेना को काश्मीर में घुसा दिया और भारतीय वायुसेना के विमान श्रीनगर में उतार दिए। दूसरी ओर माउण्टबेटन की सलाह पर पं. नेहरू इस मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गये। 1 जनवरी 1948 को भारत ने सुरक्षा परिषद् में शिकायत की कि भारत के एक अंग काश्मीर पर सशस्त्र कबाइलियों ने आक्रमण कर दिया है और पाकिस्तान प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष, दोनों तरीकों से उन्हें सहायता दे रहा है।

इस आक्रमण से अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं व्यवस्था को खतरा उत्पन्न हो गया है। अतः पाकिस्तान को अपनी सेना वापस बुलाने तथा कबाइलियों को सैनिक सहायता न देने को कहा जाये और पाकिस्तान की इस कार्यवाही को भारत पर आक्रमण माना जाये।

15 जनवरी 1948 को पाकिस्तान ने भारत के आरोपों को अस्वीकार कर दिया और भारत पर बदनीयती का आरोप लगाते हुए कहा कि जम्मू-काश्मीर का भारत में विलय असंवैधानिक है और इसे मान्य नहीं किया जा सकता। सुरक्षा परिषद् ने इस समस्या के समाधान के लिए पांच राष्ट्रों की एक समिति गठित की और इस समिति को मौके पर स्थिति का अवलोकन करके समझौता कराने को कहा।

संयुक्त राष्ट्र समिति ने काश्मीर आकर मौके का निरीक्षण किया और 13 अगस्त 1948 को दोनों पक्षों से युद्ध बन्द करने और समझौता करने हेतु कई सुझाव दिये, जिन पर दोनों पक्षों के बीच लम्बी वार्त्ता हुई। अंत में 1 जनवरी 1949 को दोनों पक्ष युद्ध-विराम के लिए सहमत हो गये। यह भी तय किया गया कि अन्तिम फैसला जनमत-संग्रह के माध्यम से किया जायेगा। इसके लिए एक अमरीकी नागरिक चेस्टर निमित्ज को प्रशासक नियुक्त किया गया परन्तु पाकिस्तान ने समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया और जनमत-संग्रह नहीं हो पाया।

निमित्ज ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। नेहरू एवं माउण्टबेटन ने काश्मीर की समस्या को संयुक्त राष्ट्रसंघ में ले जाकर बुरी तरह उलझा दिया। इसके लिये सरदार पटेल जवाहरलाल नेहरू से नाराज हो गये। नेहरू की ही गलत नीतियों के कारण ई.1962 में चीन ने भी काश्मीर का बड़ा भू-भाग दबा लिया जो अब भी उसके कब्जे में हैं। ई.1965 में पाकिस्तान और भारत के बीच काश्मीर को लेकर एक बार पुनः युद्ध हुआ तथा पाकिस्तान ने काश्मीर का बहुत बड़ा भू-भाग दबा लिया जो आज भी पाकिस्तान के कब्जे में है।

जब काश्मीर में पाकिस्तान द्वारा आरोपित युद्ध चल रहा था तो भारत सरकार ने पाकिस्तान को बंटवारे में तय हुई सम्पत्तियों का हस्तांतरण रोक दिया। ब्रिटिश-भारत की सम्पत्तियों का 17.5 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान को दिया जाना था। नकदी की देखरेख रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया के पास थी और उसने कई महीनों के लिए 75 करोड़ रुपए की रकम का हस्तांतरण रोक दिया। गांधीजी के दबाव पर नेहरू सरकार को 55 करोड़ रुपए पाकिस्तान को देने पड़े।

पाकिस्तान को काश्मीर युद्ध से वे नदियाँ तो नहीं मिलीं जिन्हें वह संगीनों के बल पर हथियाना चाहता था किंतु काश्मीर में छिड़ी जंग के चलते पाकिस्तान के हिस्से आने वाला 1,65,000 टन हथियार, गोला-बारूद और अन्य रक्षा सामग्री भारत में ही फंस गई। 31 मार्च 1948 तक भारत ने इसमें से केवल 4,730 टन ही जारी किया और फिर 18,000 टन 10 सितम्बर 1948 तक दिया। पाकिस्तान का दावा था कि इस तारीख तक भारत के पास पाकिस्तान के हिस्से की 1,42,000 टन युद्ध-सामग्री बकाया थी।

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