Wednesday, February 28, 2024
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अध्याय – 44 : ब्रिटिश काल में आदिवासियों के विद्रोह

संसार भर में आदिवासी समूह दुर्गम पहाड़ों और जंगलों में निवास करते आये हैं। ये लोग सभ्य कही जाने वाली दुनिया से दूर रहते हैं। इस कारण इनमें अपने-पराये की भावना बहुत अधिक दृढ़ होती है। भारत के आदिवासी भी अपरिचित लोगों से सम्पर्क नहीं रखते थे। जब मैदानी क्षेत्रों के निवासी, आदिवासियों के क्षेत्रों में बसने का प्रयास करते थे या कम्पनी सरकार आदिवासियों को जंगली लकड़ी काटने से रोकने का प्रयास करती थी, या जमींदार लोग आदिवासियों से बलपूर्वक कर वसूलने का प्रयास करते थे, तब आदिवासियों का गुस्सा फूट पड़ता था। आदिवासी लोग अपने और बाहरी लोगों के बीच का अन्तर स्पष्ट करने के लिए बाहरी लोगों को अलग नाम से पुकारते हैं। छोटा नागपुर में बाहरी लोगों को दिकू कहा जाता था, जिसका तात्पर्य था ऐसे लोग जो परेशान करते हैं। दिकू लोगों की जमात में बाहरवाले, पूंजीवादी तथा साहूकार तो आते थे किंतु दस्तकारों और स्थानीय राजाओं को ‘दिकू’ नहीं माना जाता था।

स्थाई बंदोबस्त के बाद स्थानीय जमींदारों एवं राजाओं द्वारा आदिवासी रैयत पर अधिक लगान के लिए दबाव डाला गया। इस कारण कई स्थानों पर आदिवासी विद्रोह पर उतर आये। 1790 ई. के बाद छोटा नागपुर पठार के उत्तर की तरफ पालामाऊ में आदिवासियों ने हिंसक विरोध किये। इस पर सरकार ने उनके विरुद्ध सेना भेजी तथा राजा को हटा कर उसके स्थान पर दूसरे व्यक्ति को गद्दी पर बैठा दिया किन्तु इससे समस्या का समाधान नहीं हुआ।

1817 ई. में चेर आदिवासियों ने तथा 1819 ई. में मुंडा आदिवासियों ने उन जमींदारों के समर्थन में विद्रोह कर दिया, जिन जमींदारों से अँग्रेजों ने सारी शक्तियां छीन ली थीं। आदिवासियों को अन्य शिकायतें भी थीं। आदिवासी चावल से, कम नशीली शराब बनाते थे। 1822 ई. में सरकार ने इस शराब पर उत्पादन शुल्क लगा दिया और इसी आधार पर 1830 ई. में प्रत्येक घर पर चार आना कर लगा दिया गया। 1827 ई. में जबरदस्ती पोस्त की खेती करवानी आरम्भ कर दी। इससे आदिवासियों में, विशेषकर मुंडा, आरा तथा महाली आदविासियों, जिन्हें मैदानी लोग कोल कहते थे, बेचैनी और असन्तोष बढ़ गया। 1831-32 ई. में आदिवासियों में जबरदस्त एकता दिखाई देने लगी। छोटा नागपुर में आदिवासियों का विद्रोह पांच महीने तक चलता रहा। यद्यपि इस विद्रोह में कम लोग मारे गये, किन्तु चार हजार मकानों और अनेक कचहरियों का जला दिया गया। आदिवासी अपने पशुओं और अनाज को लेकर जंगल में जाकर बस गये और वहां से पांच माह तक संघर्ष चलाते रहे। इस समस्या के समाधान के लिए इस क्षेत्र की दक्षिण-पश्चिमी सीमान्त एजेन्सी के नाम से एक अलग इकाई बना दी गई। यह क्षेत्र विनिमय रहित क्षेत्र घोषित कर दिया गया जहाँ ब्रिटिश भारत के कानून पूर्णतः लागू नहीं थे। इससे इस क्षेत्र में अधिक निरंकुशता से शासन चलाया जा सकता था। ब्रिटिश अधिकारियों की ज्यादतियों के विरुद्ध ऐसे ही विद्रोह 1817 ई. में गोंड आदिवासियों ने किये।

भीलों के विद्रोह

1817-25 ई. के दौरान बम्बई प्रेसीडेन्सी में भू-राजस्व बन्दोबस्त के समय पश्चिमी भारत के भीलों ने विद्रोह किया। राजपूताना में उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा और सिरोही के भीलों ने राजकीय आदेशों की अवज्ञा कर सरकार का विरोध किया। इसलिये कम्पनी सरकार ने भीलों पर नियंत्रण रखने के लिए मेवाड़ भील कोर का गठन किया। 1881 ई. में जब सरकार ने मेवाड़ के भील बहुल मगरा क्षेत्र में प्रशासनिक एवं सामाजिक सुधार करने चाहे तब भीलों ने पुनः विद्रोह कर दिया। इस पर मेवाड़ के महाराणा ने उन्हें किसी तरह समझा-बुझाकर शान्त किया। बाद में सुर्जी भगत और गोविन्द गुरु ने भीलों को सामाजिक समुदाय में संगठित करने के लिए सम्प सभा स्थापित की। 1845-52 ई. के दौरान पुणे और ठाणे के भीलों ने ठगने वाले साहूकारों को पकड़ कर उनके अंग-भंग कर दिये।

हो आदिवासियों का विद्रोह

आधुनिक उड़ीसा और पश्चिमी बंगाल की सीमा पर पोराहाट नामक स्थान पर हो आदिवासियों ने विद्रोह किया किन्तु जमींदारों ने ब्रिटिश सेना की सहायता से 1820-21 ई. में इस विद्रोह को दबा दिया। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ। इस समझौते के अनुसार हो आदिवासियों ने- (1.) ईस्ट इंडिया कम्पनी की प्रभुसत्ता स्वीकार कर ली। (2.) जमींदारों को निर्धारित कर देना स्वीकार कर लिया, (3.) अपने गावों में समस्त जातियों के लोगों को बसने देने की स्वीकृति दे दी, (4.) अपने बच्चों को हिन्दी अथवा उड़िया भाषा सिखाना स्वीकार कर लिया। इसके बाद से मैदानी लोगों को आदिवासियों की जमीन के पुश्तैनी अधिकार मिलने लगे। धीरे-धीरे इस प्रवृत्ति में वृद्धि होती गई।

कोल विद्रोह

कोल एक आदिम जनजाति है जो पहाड़ी क्षेत्रों में जंगलों की सफाई करके खेती करती थी। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासनकाल में कोल आदिवासियों का आर्थिक एवं शारीरिक शोषण किया गया। उनकी स्त्रियों पर भी अत्याचार किये गये। इससे आदिवासी जमींदार, महाजन और पुलिस के विरुद्ध संगठित होने लगे। 1831 ई. में कुछ व्यापारियों ने सिंहभूमि के निकट सोनपुर परगने में कोल स्त्रियों का अपहरण कर लिया। इस पर कोलों ने विद्रोह कर दिया। वे बाहरी लोगों को घरों से निकालकर मारने लगे। उन्होंने सिक्खों और मुसलमानों के बागानों एवं दुकानों को नष्ट कर दिया। हिन्दू मंदिरों एवं मूर्तियों को नष्ट करके धन लूट लिया। कोल अपने शत्रु की नृशंसता पूर्वक हत्या करते थे। सरकार ने कोलों को नियंत्रित करने के लिये सेना भेजी।

संथालों का विद्रोह

1853-57 ई. के दौरान छोटा नागपुर के संथालों ने विद्रोह किया। संथाल लोग नहीं चाहते थे कि दिकू लोग आदिवासी क्षेत्र में प्रवेश करें। इन आदिवासियों ने 18वीं सदी के अंत एवं 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में राजमहल पहाड़ियों के जंगलों की सफाई की तथा उन स्थानों पर खेती करने लगे। आदिवासियों के अनुसार वे उन जमीनों के स्वयं मालिक थे किन्तु मैदानों के जमींदार छल से उनकी जमीनें छीनने लगे। जमीन न देने पर उन्हें राजस्व देने के लिए बाध्य किया जाता था। पूर्व के शासकों ने खेती के लिए साफ की गई जमीनों पर कोई कर नहीं लगाया था किन्तु अब राजस्व चुकाने के लिए वे साहूकारों के चंगुल में फंसते जा रहे थे। जब सरकार ने इस क्षेत्र में रेल्वे लाइन का निर्माण आरम्भ किया तब आदिवासी आतंकित हो उठे। जो संथाल आदिवासी इस कार्य में मजदूरी कर रहे थे उनका भी अनुमान था कि वे ठगे जा रहे हैं। उन्हीं दिनों कुछ स्थानीय साहूकारों ने अपने घरों में मामूली चोरी करने के अपराध में कुछ आदिवासियों को गिरफ्तार करवा दिया। पुलिस ने इस कार्यवाही में अपनी शक्ति का दुरुपयोग किया। इससे नाराज होकर आदिवासियों ने उस दारोगा की हत्या कर दी तथा गिरफ्तारी से बचने के लिये बड़ी संख्या में एकत्रित हो गये। इसके बाद उन्होंने व्यापक विद्रोह की योजना बनाई। उन्होंने साहूकारों को पहले तो चेतावनी दी और बाद में उन पर आक्रमण किये। उन्होंने साहूकारों के मकानों, कचहरियों तथा उन दस्तावेजों को भी जला दिया जो आदिवासियों की गुलामी के कारण थे। उन्होंने मैदानी लोगों की खड़ी फसलों का भी जला दिया, रेल निर्माण कार्य को तहस-नहस कर दिया तथा रेल निर्माण क्षेत्र के जंगलों को नष्ट कर दिया। सीदो और कान्हू नामक नेताओं ने आदिवासियों का नेतृत्व किया। इन नेताओं ने भविष्यवाणी की कि ब्रिटिश शासन का अन्त निकट है। अँग्रेज तथा उनके समर्थक गंगा के उस पार लौट जायेंगे और आपस में ही लड़ मरेंगे। शीघ्र ही सेना और पुलिस ने संथाल विद्रोह का निर्ममता पूर्वक दमन किया। 1855 ई. में उनकी भूमि को विनिमय रहित घोषित कर दिया। सेना ने संथालों से हथियार डलवा लिये तथा उनकी वे डुगडुगियां भी रखवा लीं जिन्हें बजा-बजाकर वे लोगों को युद्ध करने के लिए बुलाते थे। 1857 ई. में संथाल आदिवासियों ने पुणे में साहूकारों के विरुद्ध कई विद्रोह किये। आदिवासियों का यह संघर्ष लम्बे समय तक चला जिसे दबाने के लिये ब्रिटिश शासन का दमन चक्र उससे भी तेज गति से चलता रहा।

नाईक दासों का विद्रोह

1857 ई. के सैनिक विद्रोह ने बम्बई प्रदेश के पंचमहल के जंगलों में निवास करने वाली नाईक दास जनजाति को भी विद्रोह करने के लिए प्रेरित किया। अक्टूबर 1858 ई. में नाईक दस्तों ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध विद्रोह किया। इस विद्रोह का नेतृत्व रूपा नाईक अथवा रूपसिंह ने किया। नाईक दासों ने अँग्रेजों का डटकर मुकाबला किया। अंत में 10 मार्च 1859 को रूपा ने आत्मसमर्पण कर दिया। समझौते के अनुसार रूपा नाईक को माफी दे दी गई।

1867 ई. में जम्बूगोड़ा के उत्तर-पश्चिम में स्थित वेडक गांव के जोरिया नाईक ने स्वयं को परमेश्वर का अवतार घोषित कर किया और नाईक जाति के लोगों को विशुद्ध नैतिक जीवन व्यतीत करने की शिक्षा दी। थोड़े ही समय में उसके अनुयायियों की संख्या काफी बढ़ गई और जनवरी 1868 ई. में रूपा नाईक भी उसका शिष्य बन गया। दोनों ने मिलकर एक नये राज्य की स्थापना करने का निश्चय किया। जोरिया नाईक को नये राज्य का आध्यात्मिक अध्यक्ष और रूपा नाईक को राजनीतिक अध्यक्ष बनाये जाने की बात भी तय हो गई। उन्होंने वेडक में अपना प्रशासनिक केन्द्र स्थापित करके लोगों से दान, जुर्माना तथा स्थानीय करों के माध्यम से राजस्व वसूलना आरम्भ कर दिया। इसके बाद रूपा नाईक ने पुराने अधिकार के आधार पर बरिया राज्य में नारूकोट के निकट स्थित राजगढ़ की पुलिस चौकी के क्षेत्र से राजस्व में हिस्से की मांग की, जिसे स्वीकार नहीं किया गया। तब रूपा नाईक ने अपने 500 अनुयायियों के साथ राजगढ़ पर आक्रमण किया। उसका मुख्य लक्ष्य बरिया पुलिस के अँग्रेज सुपरिण्टेडेण्ट की हत्या करना था। अँग्रेज सुपरिण्टेडेण्ट की हत्या तो नहीं हो सकी किन्तु तीन सुरक्षा कर्मचारी मारे गये और तीन घायल हुए। रूपा को पुलिस चौकी से 800 रुपये नकद, कुछ शस्त्र, दो घोड़े और लूटमार में कुछ निजी व्यक्तियों से धन मिला। इस अभियान के बाद रूपा पंचमहल की तरफ लौट गया, जहाँ नाईक दास और बहुत से मकरानी उससे आ मिले। सभी ने मिलकर जम्बूगढ़ पर धावा बोल दिया और हलोल की तरफ बढ़े।

जोरिया भगत ने अन्धविश्वास और भीरू लोगों में आतंक एवं भय का ऐसा वातावरण उत्पन्न किया कि उसने बिना किसी क्षति के अपने प्रारम्भिक अभियानों में सफलता प्राप्त कर ली। इससे उत्साहित होकर जोरिया ने 6 फरवरी 1867 को छोटा उदयपुर में जैतपुर की चौकी पर धावा बोला। उस क्षेत्र के सरदार ने अपने कुछ अनुयायियों के साथ, जोरिया का मुकाबला किया जिसमें तीन नाईक मारे गये। जोरिया ने इसका बदला लेने की धमकी दी। सरदार छोटा उदयपुर लौट गया। यह स्थिति अन्य क्षेत्रों में फैलती उससे पहले ही ब्रिटिश सेना ने जोरिया भगत के मुख्यालय पर धावा बोल दिया। भगत का एक प्रमुख साथी मारा गया और दो घायल हुए। इस प्रकार, भगत के विद्रोह को दबा दिया गया। रूपसिंह, जोरिया और रूपसिंह के लड़के गलालिया ने कुछ समय तक विद्रोह जारी रखा परन्तु अन्त में सभी पकड़े गये। उन पर मुकदमा चलाया गया और न्यायालय के आदेश से फांसी पर चढ़ा दिया गया।

मुण्डा जाति का विद्रोह

छोटा नागपुर क्षेत्र में चौबासा के आस-पास आबाद मुण्डा जनजाति ने 1789 ई. से 1832 ई. के बीच, कई बार विद्रोह किया। 1899-1900 ई. में बिरसा मुण्डा के नेतृत्व में मुण्डाओं का सबसे भयंकर विद्रोह फूट पड़ा। सरकार ने इस विद्रोह को बड़ी कठोरता से दबाया। 3 जनवरी 1900 को बिरसा गिरफ्तार कर लिया गया। मुकदमे के दौरान ही जेल में हैजे से बिरसा की मृत्यु हो गयी। उसके तीन साथियों को मृत्यु दण्ड, 44 को काला पानी और 47 को कड़ी सजा दी गई।

कोली जाति का विद्रोह

1873 ई. में पूना के उत्तर-पश्चिम में रहने वाली कोली जाति के नेता होनया ने अपनी जाति के कुछ युवकों को प्रशिक्षित करके अपना दल बनाया। इस दल ने कर्ज देने वाले साहूकारों पर हमले करके अनेक साहूकारों की सम्पत्ति को लूट लिया। जिस किसी ने भी कोलियों का प्रतिरोध किया, कोलियों ने उनके नाक-कान काट लिये। 1876 ई. में पुलिस कप्तान मेजर डेनियल ने होनया को गिरफ्तार कर लिया। उसे साथियों सहित कठोर कारावास की सजा भुगतनी पड़ी।

कुम्बियों का विद्रोह

1875 ई. में कोलियों ने जिस प्रकार अव्यवस्था उत्पन्न की, उसका प्रभाव मैदानी क्षेत्र में निवास करने वाले शान्ति प्रिय कुम्बियों पर भी पड़ा। मई और जुलाई 1875 में सिमूर और भीमथड़ी के क्षेत्रों में कुम्बी लोगों ने भी कर्ज देने वाले साहूकारों के मकानों पर धावे मारे। इस दौरान लूटमार, आगजनी तथा हिंसक घटनाएं हुईं। स्थानीय पुलिस उनके उपद्रवों को रोकने में असफल रही। इस पर सेना को बुलाया गया। सेना ने इन उपद्रवों को मजबूती से कुचला।

रामोसियों के विद्रोह

1879 ई. में महाराष्ट्र के वासुदेव बलवन्त फड़के की डकैतियों तथा आक्रामक गतिविधियों से पूना और उसके आस-पास के क्षेत्रों में अव्यवस्था उत्पन्न हो गई। उसी क्षेत्र में कोली और रामोसियों की गतिविधियों से पुनः अशान्ति व्याप्त हो गई। उपद्रवियों के दो दल एक साथ सक्रिय हुए। एक दल कोल सरदार कृष्णा साबला और उसके पुत्र के नेतृत्व में काम कर रहा था। दूसरा दल संतारा रामोसिया का था जिसका नेतृत्व हरी और तात्या मकाजी नामक दो भाई और उनका एक सहयोगी रामकृष्ण कर रहा था। इस दल ने पूना के आस-पास के क्षेत्रों में सूदखोरों एवं साहूकारों के घरों में लगभग 60 डकैतियां कीं। 1879 ई. के अन्त में इस दल की गतिविधियों पर अंकुश लगाया जा सका।

रंपा विद्रोह

मद्रास प्रेसीडेन्सी के गोदावरी जिले में रंपा नामक पहाड़ी अंचल के आदिवासियों के विद्रोह को रंपा विद्रोह कहते हैं। 1879-80 ई. में सरकार ने कुछ नये वन कानून लागू किये, जिनसे इस क्षेत्र के आदिवासियों ने विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह सरकार द्वारा लगाये गये नये करों, अपनी जमीनों के छीने जाने और पुलिस के अत्याचारों के विरुद्ध था। भद्राचलम के तहसीलदार और वन विभाग के रेंजरों के गैर-कानूनी तथा दमनकारी व्यवहार ने सम्पूर्ण रंपा पहाड़ी अंचल में असन्तोष और विद्रोह की अग्नि प्रज्जवलित कर दी। पहाड़ी आदिवासियों और ग्रामीणों ने कई दल गठित कर लिये जिनकी सदस्य संख्या हजारों में थी। इन लोगों ने समीपवर्ती गावों को लूटना आरम्भ कर दिया। इक्के-दुक्के पुलिस वालों को भी मार डाला तथा गोदावरी नदी में चलने वाले एक स्टीमर को अपने कब्जे में ले लिया। उनके विद्रोहों को कुचलने के लिए मद्रास से सेना भेजी गई। विद्रोहियों ने छापामार युद्ध का सहारा लिया परन्तु उनके अधिकांश नेता पकड़ लिये गये।

गौंड विद्रोह

आन्ध्र प्रदेश के जंगलों में निवास करने वाली गौंड जनजाति ने भी ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध विद्रोह किये परन्तु सरकार ने उन्हें दबा दिया। गौंड विद्रोह का मुख्य कारण सरकार द्वारा वनों में उनके परम्परागत अधिकारों को समाप्त किया जाना था। इन्हीं कारण को लेकर 1891 ई. में मध्य प्रदेश के गौंडों ने भी विद्रोह किया किन्तु उन्हें भी सफलता नहीं मिली।

निष्कर्ष

आदिवासियों के आन्दोलनों का विश्लेषण करने से स्पष्ट है कि उनके विद्रोह इसलिये हुए क्योंकि ईस्ट इण्डिया कम्पनी, स्थानीय जमींदार तथा साहूकार उनका आर्थिक एवं शारीरिक शोषण करते थे। साहूकार लोग झूठा बहीखाता लिखकर आदिवासियों की सम्पत्ति का हरण करते थे। इस शोषण से बचने के लिये आदिवासियों ने या तो आत्महत्याएँ कीं या उन्हेंं विद्रोह करने पड़े। आदिवासियों के विद्रोह संगठित एवं सुनियोजित नहीं होने से उन्हें अपने लक्ष्य में बहुत कम सफलता मिली। उनका लक्ष्य साहूकारों के बहीखाते व अन्य कागजात थे, जिन्हें वे अपने शोषण का प्रतीक समझते थे। ईसाई मिशनरियों द्वारा दी गई सहायता और सहयोग के कारण अधिकांश आदिवासियों ने ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया।

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohan Lal Gupta is a renowned historian from India. He has written more than 100 books on various subjects.

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