हुमायूँ कालीन स्थापत्य कुछ मस्जिदों तक सीमित था। उसने दिल्ली के पुराने किले में निवास स्थापित करने के लिए उसका परकोटा मरम्मत करवाया तथा वहाँ एक पुस्तकालय भी बनवाया।
बाबर के पुत्र नासिरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ ने ई.1533 में दिल्ली में यमुना के किनारे दीनपनाह नामक नवीन नगर का निर्माण आरम्भ करवाया। यह नगर ठीक उसी स्थान पर निर्मित किया गया जिस स्थान पर पाण्डवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ स्थित थी। इस परिसर से मौर्य एवं गुप्तकालीन मुद्राएं, मूर्तियाँ एवं बर्तन आदि मिले हैं तथा भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर भी मिला है जिसे कुंती का मंदिर कहा जाता है।
दीनपनाह नामक शहर में हुमायूँ ने अपने लिए कुछ महलों का निर्माण करवाया। इन महलों के निर्माण में स्थापत्य-सौंदर्य के स्थान पर भवनों की मजबूती पर अधिक ध्यान दिया गया। जब ई.1540 में शेरशाह सूरी ने हुमायूँ का राज्य भंग कर दिया तब शेरशाह ने दीनपनाह को नष्ट करके उसके स्थान पर एक नवीन दुर्ग का निर्माण करवाया जिसे अब दिल्ली का पुराना किला कहते हैं।
दीनपनाह के भीतर शेरमण्डल नामक एक भवन है। इसका निर्माण हुमायूँ ने अपने लिए पुस्तकालय के रूप में करवाया। शेरशाह सूरी कि समय में यह शेरमण्डल कहलाने लगा। यह अष्टकोणीय एवं दो मंजिला भवन है जो एक कम ऊँचाई के चबूतरे पर टावर की आकृति में खड़ा किया गया है। इसके निर्माण में लाल बलुआ पत्थर काम में लिया गया है।
हुमायूँ ने आगरा में एक मस्जिद बनवाई थी जिसके भग्नावशेष ही शेष हैं। इसकी मीनारें भी ध्वस्त प्रायः हैं जिसके कारण इसकी स्थापत्य सम्बन्धी विशेषताओं को समझा नहीं जा सकता। हिसार के फतेहाबाद कस्बे में भी हुमायूँ ने एक मस्जिद बनवाई जिसे हुमायूँ मस्जिद कहा जाता है। हुमायूँ ने यह मस्जिद दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगक द्वारा निर्मित लाट के निकट बनवाई।
मस्जिद में लम्बा चौक है। इस मस्जिद के पश्चिम में लाखौरी ईंटों से बना हुआ एक पर्दा है जिस पर एक मेहराब बनी हुई है। इस पर एक शिलालेख लगा हुआ है जिसमें बादशाह हूमायूँ की प्रशंसा की गई है। यह मस्जिद ई.1529 में बननी शुरु हुई थी किंतु हुमायूँ के भारत से चले जाने के कारण अधूरी छूट गई। ई.1555 में जब हुमायूँ लौट कर आया तब इसका निर्माण पूरा करवाया गया।
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हुमायूँ कालीन स्थापत्य



