फीरोजशाह का मूल्यांकन उसके कार्यों से नहीं अपितु उसकी मजहबी कट्टरता से किया जा सकता है। वह इस्लाम के सिद्धांतों में अटूट विश्वास रखता था और भारत से हिन्दुओं का सफाया करना चाहता था।
फीरोजशाह के कार्यों का मूल्यांकन
(1.) शासक के रूप में
सुन्नी प्रजा के लिये फीरोजशाह का शासन बड़ा उदार था। धार्मिक संकीर्णता के कारण वह अच्छे तथा बुरे दोनों प्रकार के अधिकारियों के साथ दया तथा सहानुभूति दिखलाता था और अनुचित साधनों का प्रयोग करने वालों की भी सहायता करता था। उसमें राजनीतिज्ञता का अभाव था। इस कारण वह राजनीति को धर्म से अलग नहीं कर सका।
वह उलेमाओं तथा मौलवियों के परामर्श के बिना कोई काम नहीं करता था। वह कुरान के नियमों के अनुसार शासन करता था। इससे हिन्दू प्रजा का अन्याय होता था। समस्त इतिहासकार स्वीकार करते हैं कि फीरोज में उच्च कोटि की धर्मिक असहिष्णुता थी और हिन्दुओं के साथ बड़ा दुर्व्यवहार होता था।
(2.) सुधारक के रूप में
यद्यपि फीरोजशाह अपने सुधारों के लिए प्रसिद्ध है, परन्तु उसके सुधारों में दूरदर्शिता का अभाव था। जागीर प्रथा, गुलामों संख्या में वृद्धि, सैनिकों के पदों को आनुवांशिक बनाना आदि ऐसे सुधार थे जिनका राज्य के स्थायित्व पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा।
(3.) सेनानायक के रूप में
फीरोजशाह बड़ी ही साधारण योग्यता का व्यक्ति था। न उसमें महात्वाकांक्षा थी और न दृढ़ संकल्प। सामरिक दृष्टिकोण से उसका व्यक्तित्वि बड़ा ही छोटा था। उसमें संगठन तथा संचालन शक्ति का सर्वथा अभाव था। न वह साम्राज्य की वृद्धि कर सका और न उसे छिन्न-भिन्न होने से रोक सका। उसकी सेना का संगठन दोषपूर्ण था। जागीरदारी प्रथा तथा सैनिकों के पद को वंशानुगत बनाकर उसने शासन में एसे दोष उत्पन्न कर दिये जिनसे तुगलक-वंश का पतन आरम्भ हो गया।
(4.) फीरोज की सफलताएँ
फीरोजशाह के कार्यों की चाहे जितनी आलोचना की जाय किंतु मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल की अशान्ति, अराजकता तथा विद्रोह को शान्त करने में फीरोज को अपार सफलता प्राप्त हुई। इसमें सन्देह नहीं कि फीरोज अपनी प्रजा को सुख तथा शन्ति प्रदान कर सका। दीन दुखियों, बेरोजगारों तथा किसानों के हितों के लिए उसने कई उल्लेखनीय कार्य किये।
(5.) फीरोज की विफलताएँ
इतनी सफलता होते हुए भी फीरोजशाह के कार्यों में न कोई मौलिकता थी और न दूरदृष्टि। सुल्तान का स्वभाव उसका सबसे बड़ा शत्रु था। उसकी उदारता तथा दयालुता उसके अच्छे कार्यों को चौपट कर देती थी। चौदहवीं शताब्दी में सफलता पूर्वक शासन करने के लिए सुल्तान में जिस कठोरता का समावेश होना चाहिए था, उसका फीरोज में अभाव था। सारांश यह है कि यद्यपि फीरोज के कृत्यों से उसकी मुस्लिमम प्रजा को सुख पहुँचा, परन्तु उसकी नीति के अन्तिम परिणाम बुरे हुए और सल्तनत कमजोर हो गई।
फीरोजशाह के सम्बन्ध में इतिहासकारों की धारणा
(1.) बरनी तथा अफीफ का मत
फीरोजशाह तुगलक के समकालीन इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी तथा शम्से सिराज अफीफ ने फीरोज के शासन की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है। उसे उदार, न्याय प्रिय तथा दयालु शासक बताया है। बरनी तथा अफीफ द्वारा की गई यह प्रशंसा स्वाभाविक है। वे दोनों ही उलेमा थे। सुल्तान उलेमाओं का बड़ा आदर करता था और उन्हीं के परामर्श से सब कार्य करता था। यही कारण है कि फीरोज के समकालीन इतिहासकारों ने उसे एक आदर्श सुल्तान बताया है। उन्होंने लिखा है कि नासिरूद्दीन महमूद के उपरांत इतना उदार, दयालु, न्यायप्रिय, शिष्ट तथा ईश्वर से डरने वाला कोई सुल्तान नहीं हुआ।
(2.) मोरलैण्ड की धारणा
डब्ल्यू. एच. मोरलैण्ड ने फीरोजशाह के सम्बन्ध में लिखा है- ‘उसका शासन काल संक्षिप्त स्वर्ण युग था जिसका धुंधला स्वरूप अब भी उत्तरी भारत के गांवों में परिलक्षित होता है।’
(3.) हैवेल के विचार
हैवेल ने लिखा है कि वह एक बुद्धिमान तथा उदार शासक था। क्रूरता, निर्दयता तथा भ्रष्टाचार की लम्बी श्ंृखला जो तुर्की वंश के अन्धकारपूर्ण इतिहास का निर्माण करती है, उसमें उसका शासन काल एक स्वागतीय विशृंखलता है।
(4.) सर हेग की धारणा
सर हेग के विचार में फीरोजशाह के राज्य काल की समाप्ति के साथ एक अत्यंत उज्जवल युग का अवसान होता है।
(5.) हेनरी इलियट तथा एल्फिन्स्टन का मत
हेनरी इलियट तथा एल्फिन्स्टन ने फीरोजशाह को अकबर का समकक्षी कहने में संकोच नहीं किया है। हेनरी इलियट ने लिखा है कि वह चौदहवीं शताब्दी का अकबर था।
(6.) डॉ. ईश्वरी प्रसाद की धारणा
डॉ. ईश्वरी प्रसाद उपरोक्त इतिहासकारों से सहमत नहीं हैं। उन्होंने लिखा है- ‘फीरोज में उस विशाल हृदय तथा व्यापक दृष्टिकोण वाले बादशाह (अकबर) की प्रतिभा का शतांश भी नहीं था जिसने सार्वजनिक हितों का उच्च मंच से समस्त सम्प्रदायों तथा धर्मों के प्रति शान्ति सद्भावना तथा सहिष्णुता का सन्देश दिया।’
(7.) स्मिथ का मत
विन्सेंट स्मिथ ने हेनरी इलियट के मत का विरोध किया है और इसे मूर्खतापूर्ण बतलाया है। स्मिथ ने लिखा है- ‘फिरोज के लिये अपने युग में इतना ऊँचा उठना सम्भव नहीं था जितना अकबर उठा सका था।’
इतिहासकारों के उपर्युक्त विभिन्न मतों से फीरोज के सम्बन्ध में कोई निश्चित धारणा बनाना कठिन है। वास्तविकता का अन्वेषण फीरोज के कृत्यों का मूल्यांकन, आलोचनात्मक तथा तर्कपूर्ण विवेचन द्वारा किया जा सकता है।
फीरोजशाह के अन्तिम दिवस
फीरोज के अन्तिम दिन सुख तथा शांति से नहीं बीते। उसने शहजादे फतेह खाँ को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया किंतु 1374 ई. में शहजादे की मृत्यु हो गई। इससे सुल्तान को भीषण आघात पहुंचा। शासन में शिथिलता आने लगी और राज्य दलबन्दी का शिकार हो गया।
फीरोज ने अपने दूसरे शहजादे जफर खाँ को अपना उत्तराधिकारी बनाया किंतु उसकी भी मृत्यु हो गई। वृद्ध हो जाने के कारण फीरोज शासन को नहीं सम्भाल सका। शासन की सारी शक्ति खान-ए-जहाँ के हाथों में चली गई। फीरोज ने अपने तीसरे शहजादे मुहम्मद को अपना उत्तराधिकारी चुना किंतु खान-ए-जहाँ तख्त प्राप्त करने के लिये शाहजादे मुहम्मद को अपने मार्ग से हटाने का उपाय खोजने लगा।
उसने सुल्तान को समझाया कि शाहजादा कुछ असंतुष्ट अमीरों से मिलकर सुल्तान को मारने का षड्यन्त्र रच रहा है। सुल्तान ने षड्यंत्र करने वालों को कैद करने की आज्ञा दे दी परन्तु शाहजादा राजवंश की स्त्रियों के साथ चुपके से पालकी में बैठकर सुल्तान के सामने राजप्रासाद में उपस्थित हुआ और सुल्तान के चरणों में गिरकर उसे समझाया कि खान-ए-जहाँ स्वयं तख्त पाना चाहता है इसलिये उसने शहजादे पर षड्यंत्र का आरोप लगाया है।
फीरोज के मन में यह बात बैठ गई। उसने खान-ए-जहाँ को पदच्युत करके बंदी बना लेने की आज्ञा दे दी। जब खान-ए-जहाँ को इसकी सूचना मिली तब वह मेवाड़ की ओर भाग गया।
शाहजादा फिर से सुल्तान का कृपापात्र बन गया और विलासिता का जीवन व्यतीत करने लगा। उसने कई अयोग्य मित्रों को नौकरियां दे दीं। इससे योग्य तथा अनुभवी अफसरों में असंतोष फैलने लगा और धीरे-धीरे शाहजादे का विरोध होने लगा। अंत में गृहयुद्ध की स्थिति आ गई। इस युद्ध से घबराकर शाहजादा सिरमूर की पहाड़ियों की ओर भाग गया।
वृद्ध फीरोज ने फिर से शासन अपने हाथों में ले लिया। अत्यंत वृद्ध हो जाने के कारण वह शासन को नहीं संभाल सका। उसने अपने सारे अधिकार अपने पोते तुगलक शाहबीन फतह खाँ को दे दिये। थोड़े दिन बाद 20 सितम्बर 1388 को 80 वर्ष की आयु में फीरोज तुगलक की मृत्यु हो गई।
यह भी देखें-
मुहम्मद तुगलक का शासन एवं विफलताएँ
फीरोजशाह तुगलक की धार्मिक नीति
फीरोजशाह का मूल्यांकन