कांग्रेस का उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व उदारवादी नेताओं की रीति-नीति की प्रतिक्रया के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ था। उग्रराष्ट्रवादी नेता अंग्रेजों के समक्ष अनुनय-विनय करने को उचित नहीं मानते थे।
भारत में उग्र राष्ट्रवादी विचारधारा, कांग्रेस के जन्म से बहुत पहले जन्म ले चुकी थी। 1857 ई. की क्रांति उसी की अभिव्यक्ति थी। पुनर्जागरण के अग्रदूत राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र तथा बंकिमचंद्र चटर्जी ने उग्र राष्ट्रवाद के लिये आधार भूमि तैयार की क्योंकि उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन के चेहरे पर हिन्दू लक्षण बहुत स्पष्ट था।
कांग्रेस के उदारवादी नेता ब्रिटिश सरकार से विधान सभाओं में निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि, भारत सचिव की कौंसिल में भारतीयों की नियुक्ति, सरकारी नौकरियों में भारतीयों को अँग्रेजों के समान अवसर, भू-राजस्व की दर में कमी, भारतीय उद्योगों को सरंक्षण आदि मांगें करते रहे किन्तु ब्रिटिश सरकार ने इन मांगों पर बहुत कम ध्यान दिया।
इससे कुछ युवा कांग्रेसी नेताओं का वह भ्रम टूट गया कि इंग्लैण्ड की सरकार भारत में भारतीयों के लिये भी वैसी ही व्यवस्था करेगी जैसी कि अँग्रेजों के लिये इंग्लैण्ड में थी। उदारवादी नेता गोपालकृष्ण गोखले ने स्वीकार किया कि सरकार अपने वचनों का पालन नहीं कर रही थी और जो वायदे उसने किये थे, उनसे पीछे हट रही थी।
उग्र राष्ट्रवादियों का उदय
ब्रिटिश सरकार द्वारा उदारवादी नेताओं की मांगों पर ध्यान न दिये जाने के कारण कांग्रेस में युवा नेताओं का एक नया गुट उभर कर सामने आया जिसने संघर्ष के माध्यम से सरकार पर दबाव डालने का निश्चय किया। अँग्रेज लेखकों ने इस नवीन नेतृत्व को उग्र राष्ट्रीयता, उग्रवादी तथा गरम दल नेता कहा।
उनके द्वारा चलाये गये आंदोलन को उग्र राष्ट्रवाद, उग्रवाद तथा रेडिकल नेशनलिस्ट मूवमेंट कहा जाता है। इन युवा उग्रवादी नेताओं ने वृद्ध एवं उदारवादी नेताओं का विरोध किया जो अँग्रेजों की न्यायप्रियता में अटूट विश्वास रखते थे और आवेदन-निवेदन, तथा स्मरण-पत्रों के माध्यम से भारतीयों को राजनीतिक अधिकार दिलवाना चाहते थे।
उग्र राष्ट्रवादियों को उदारवादियों की भिक्षावृत्ति की शैली पसन्द नहीं आई। वे उग्र जन-आन्दोलन के माध्यम से भारतीयों के लिये राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने के लिए अधीर थे।
कांग्रेस का उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व
उग्रवादी नेताओं का मानना था कि कमजोर विरोध तथा अस्थिर वैधानिक सुधारों से भारत की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। उस काल में कतिपय प्रमुख उग्र राष्ट्रवादी नेता इस प्रकार से थे-
बालगंगाधर तिलक
कांग्रेस में उग्रराष्ट्रवाद के जनक बाल गंगाधर तिलक थे। वे कांग्रेस के जन्म से पूर्व ही उग्र राष्ट्रवाद का दीप प्रज्वलित कर चुके थे। 1882 ई. में बाल गंगाधर तिलक ने कोल्हापुर के राजा का, वहाँ के ब्रिटिश रेजीडेण्ट के विरुद्ध समर्थन करते हुए, केसरी में तथ्यों का प्रकाशन किया। इस कार्य के लिये तिलक को 4 माह की सजा हुई।
1896 ई. में बालगंगाधर तिलक ने कांग्रेस के मंच से कहा- ‘गत 12 वर्षों से हम चिल्ला रहे है कि शासन हमारी बातों को सुने किन्तु सरकार हमारी आवाज को नहीं सुनती, बन्दूक की आवाज को सुनती है। हमारे शासकों ने हमारे ऊपर अविश्वास किया है। अब हमें अधिक शक्तिशाली संवैधानिक साधनों के आधार पर अपनी बात उन्हें सुनानी चाहिए।’
1897 ई. में तिलक ने कमिश्नर रैण्ड की हत्या को न्याय-संगत ठहराते हुए एक लेख लिखा। इसके लिये उन्हें 18 माह की सजा हुई। 1899 ई. में बम्बई के गवर्नर सैण्डहर्स्ट ने प्लेग ग्रस्त महाराष्ट्र की जनता पर आतंकपूर्ण कार्यवाही की। तिलक ने 1899 ई. के लखनऊ अधिवेशन में सैण्डहर्स्ट के विरुद्ध प्रस्ताव रखा किंतु उदारवादियों के दबाव में उन्हें वह प्रस्ताव वापस लेना पड़ा।
इस प्रकार 19वीं सदी के अंतिम दशक में तिलक की अगुवाई में कांग्रेस में उग्र राष्ट्रवाद का प्रवेश हुआ। तिलक का कहना था कि हर हाल में विदेशी राज का विरोध करो।
तिलक का आदर्श था- ‘दूसरों की सेवा और स्वयं के लिये कष्ट।’ वे गांव की चौपाल पर बैठकर बात करते थे। वे पिटीशिन (याचिका) की बजाये प्रोटेस्ट (विरोध) करने में विश्वास करते थे।
तिलक ने स्पष्ट घोषणा की- ‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर ही रहेंगे……. स्वराज्य क बिना कोई सामाजिक सुधार नहीं हो सकते, न कोई औद्योगिक प्रगति, न कोई उपयोगी शिक्षा और न ही राष्ट्रीय जीवन की परिपूर्णता। यही हम चाहते हैं और इसी के लिये ईश्वर ने मुझे इस संसार में भेजा है।’
यही कारण है कि ब्रिटिश पत्रकार वेलेंटाइन शिरोल ने तिलक को फादर ऑफ इण्डियन अनरेस्ट (भारतीय असन्तोष का जनक) कहा है। कांग्रेस में गरम दल की स्थापना का श्रेय तिलक को ही है।
महर्षि अरविंद घोष
यदि तिलक भारतीय असंतोष के जनक थे तो अरविंद हिन्दू धर्म के राष्ट्रीयकरण के शिल्पी थे। अगस्त 1893 में अरविन्द घोष ने न्यू लैम्प्स फॉर ओल्ड (पुरानों के स्थान पर नये दीप) शीर्षक से एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने विचार प्रकट किया कि विरोध-पत्रों, प्रार्थना-पत्रों और स्मृति-पत्रों से देश कभी स्वतन्त्र नहीं हो सकता।
अपने वन्देमातरम् नामक पत्र में उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध कार्य करने और संघर्ष करने के लिए एक कार्यक्रम बनाया। इस कार्यक्रम में उन्होंने भारतीयों को स्वदेशी, असहयोग, राष्ट्रभाषा और बहिष्कार का मन्त्र दिया।
अरविंद घोष ने भारतीयों को स्पष्ट मार्ग दिखाते हुए कहा- ‘स्वतंत्रता हमारे जीवन का उद्देश्य है। हिन्दू धर्म ही हमारे इस उद्देश्य की पूर्ति करेगा। राष्ट्रीयता एक धर्म है और ईश्वर की देन है….. भारत पुनः एक गुरु और मार्ग दर्शक के रूप में अपनी भूमिका निभाए, लोगों की आत्ममुक्ति हो ताकि राजनीतिक जीवन में वेदान्त के आदर्श प्राप्त किये जा सकें। यही भारत के लिये सच्चा स्वराज्य होगा। 1905 ई. में जब बंगभंग आंदोलन चला तो अरविंद ने घोषित किया कि राष्ट्रवाद कभी मर नहीं सकता क्योंकि यह ईश्वर ही है जो बंगाल में कार्य कर रहा है, ईश्वर को कभी मारा नहीं जा सकता, ईश्वर को जेल नहीं भेजा जा सकता।’
लाला लाजपतराय
उग्रवादी आंदोलन के प्रमुख नेता लाला लाजपतराय को पंजाब केसरी तथा शेरे-पंजाब कहा जाता था। उन्होंने पंजाबी तथा वन्देमातरम् नामक दैनिक समाचार पत्रों का प्रकाशन किया। वे आर्यसमाज के प्रबल समर्थक थे। 1902 ई. के कलकत्ता अधिवेशन में उन्हें अध्यक्ष बनाया गया। उन्हें सरदार अजीतसिंह के साथ मिलकर कोलोनाइजेशन बिल के खिलाफ आंदोलन चलाने के अपराध में बर्मा की माण्डले जेल में बंद किया गया।
उनका कहना था– ‘जैसे दास की आत्मा नहीं होती उसी प्रकार दास जाति की कोई आत्मा नहीं होती। आत्मा के बिना मनुष्य निरा पशु है इसलिये एक देश के लिये स्वराज्य परम आवश्यक है और सुधार अथवा उत्तम राज्य इसके विकल्प नहीं हो सकते।’
विपिनचंद्र पाल
विपिनचंद्र पाल; लाल (लाला लाजपतराय), बाल (बालगंगाधर तिलक) और पाल (विपिनचंद्र पाल) की उग्रवादी तिकड़ी (बिग थ्री) में थे। उनका कहना था- ‘देश को रिफॉर्म (सुधार) की नहीं अपितु री-फार्म (फिर से निर्माण) की आवश्यकता है….. अँग्रेजों को अपनी इच्छा से कर लगाने और उसे खर्च करने का अधिकार छोड़ना होगा।’
अन्य बड़े नेता: उदारवादी नेताओं की नीतियों की आलोचना करने वालों में रवीन्द्रनाथ ठाकुर, विवेकानन्द और लाला मुंशीराम भी थे।
फरवरी 1902 में स्वामी विवेकानन्द ने स्वामी अखण्डानन्द को एक पत्र लिखकर उनसे पूछा- ‘भयंकर अकाल, बाढ़, बीमारी और महामारी के इन दिनों में बताइए कि आपके कांग्रेसी लोग कहाँ हैं? क्या सिर्फ यही कहने से काम चलेगा कि देश की सरकार हमारे हाथ में सौंप दीजिए? और उनकी बात सुनता भी कौन है ? अगर कोई आदमी काम करता है तो क्या उसे किसी चीज के लिए मुँह खोलना पड़ता है?’
इस प्रकार, कांग्रेस में उग्र राष्ट्रीयता की भावना पनपने लगी। कांग्रेस का उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व बाल, पाल, लाल, तथा अरविंद की चतुष्टयी (फोर बिग) और उनके अनुयायी, भारतीयों की शक्ति को संगठित करके ब्रिटिश सरकार पर इतना दबाव डालना चाहते थे कि सरकार उनकी मांगों को ठुकरा न सके और भारतीयों को उनका देश सौंप दे।
मुख्य आलेख – उग्र राष्ट्रवादी आंदोलन – गरमपंथी कांग्रेस
कांग्रेस का उग्रराष्ट्रवादी नेतृत्व



