Monday, January 26, 2026
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अपराजितपृच्छा में बावड़ी वर्णन

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अपराजितपृच्छा में बावड़ी वर्णन - www.bharatkaitihas.com
अपराजितपृच्छा में बावड़ी वर्णन

मूलतः शक्ति-पूजा एवं शिल्पशास्त्र पर केन्द्रित ग्रंथ अपराजितपृच्छा विविध विषयों की जानकारी देता है। अन्य विषयों के साथ-साथ, अपराजितपृच्छा में बावड़ी वर्णन बड़े विस्तार से हुआ है।

बावड़ी – शक देश का कुंआ

बावड़ी को संस्कृत में वापी भी कहा जाता है। यह वस्तुतः सीढ़ीदार कुआं (Stepwells) होताहै। डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल का अनुमान है कि शक अपने साथ रहट और बावड़ी नामक दो विशेष प्रकार के कुएं भारत में लाए थे। बावड़ी (संस्कृत में वापी, गुजराती में बाव) के लिये प्राचीन नाम शकन्धु (शक देश का कुंआ) और रहट के लिये कर्कन्धु (कर्क देश का कुंआ) थे। कर्कदेश ईरान के दक्षिण पश्चिम में था। सातवीं शताब्दी ईस्वी के लेखक बाणभट्ट ने भी ‘हर्षचरित’ में रहट शब्द का प्रयोग किया है। राजस्थान के प्राचीन शिलालेखों में अरहट्ट भी इसी का द्योतक है।

जयपुर क्षेत्र में नगर नामक प्राचीन स्थल के वि.सं.741 (ई.684) के शिलालेख में एक वापी निर्माण का श्रेय मारवाड़ भीनमाल के कुशल शिल्पियों को दिया गया है और उन वास्तुविद्या विशारद सूत्रधारों की पर्याप्त प्रशंसा भी की गई है कि वे तो वास्तुविद्या के प्रगाढ़ पण्डित थे।  सातवीं शती की यह वापी आजतक ज्ञात प्राचीनतम वापी है। मारवाड़ में वापी और रहट दोनों ही विदेशी सम्पर्क के कारण प्रचलित हुए।

बीसवीं सदी के अंत तक भी राजस्थान के कुछ भागों में मृदभाण्डों वाले रहटों का प्रयोग किया जाता था। यही स्थिति बावड़ी की भी है। बहुत सी प्राचीन बावड़ियां आज भी जल प्राप्ति हेतु काम में ली जा रही हैं। भीनमाल के चण्डीनाथ मंदिर परिसर में एक पूर्वमध्य युगीन आयताकार वापी आज भी स्थित है।

यद्यपि बावड़ी निर्माण की कला विदेशी भूमि से आई थी तथापि यह भारत में इतनी लोकप्रिय हुई कि मध्यकाल आते-आते यह हिन्दू संस्कृति की प्रतीक बन गई।

अपराजितपृच्छा में बावड़ी वर्णन

अपराजितपृच्छा में बावड़ियों का वर्णन अत्यंत वैज्ञानिक और विस्तृत है। पश्चिम भारत, विशेषकर गुजरात और राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में जल प्रबंधन के लिए इन संरचनाओं का निर्माण एक आध्यात्मिक और सामाजिक कार्य माना जाता था।

भुवनदेवाचार्य ने इस ग्रंथ में बावड़ियों के वर्गीकरण, उनके माप और निर्माण की सूक्ष्म विधियों का उल्लेख किया है।

अपराजितपृच्छा में बावड़ी वर्णन चार मुख्य प्रकार

ग्रंथ में प्रवेश द्वारों की संख्या के आधार पर बावड़ियों को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया है:

  1. नंदा (Nanda): इसमें केवल एक प्रवेश द्वार और एक कूट (Pavilion) होता है। यह सबसे सरल संरचना है।
  2. भद्रा (Bhadra): इसमें दो प्रवेश द्वार होते हैं। यह मध्य आकार की बावड़ी होती है जिसमें विश्राम के लिए अधिक स्थान होता है।
  3. जया (Jaya): इसमें तीन प्रवेश द्वार होते हैं। यह काफी विशाल और भव्य होती है।
  4. विजया (Vijaya): इसमें चार प्रवेश द्वार होते हैं। यह सबसे दुर्लभ और राजसी प्रकार की बावड़ी है, जो स्थापत्य कला का शिखर मानी जाती है।

अपराजितपृच्छा में बावड़ी वर्णन – प्रमुख सिद्धांत और विशेषताएं

1. कूट और सोपान (Pavilions and Steps):

ग्रंथ के अनुसार, बावड़ी केवल जमीन में खोदा गया गड्ढा नहीं है, अपितु एक बहुमंजिला भूमिगत भवन है। इसमें सीढ़ियों के बीच-बीच में कूट (मंडप) बनाए जाते हैं, जो मिट्टी के दबाव को रोकने के साथ-साथ राहगीरों के बैठने के काम आते थे।

2. मान और प्रमाण (Measurement):

ग्रंथ में बावड़ी की लंबाई, चौड़ाई और गहराई का एक निश्चित अनुपात दिया गया है। यदि यह अनुपात सही न हो, तो संरचना के ढहने का भय रहता था। इसमें हस्त (हाथ की लंबाई) को मानक इकाई माना गया है।

3. जल का आध्यात्मिक महत्व:

अपराजितपृच्छा के अनुसार, जल के भीतर देवताओं का वास होता है। इसलिए, बावड़ी की दीवारों पर वराह, विष्णु, लक्ष्मी और गंगा-यमुना की मूर्तियां उकेरी जाती थीं। रानी की वाव (पाटन) इसका सबसे जीवंत उदाहरण है, जहाँ दीवारों पर लगभग 800 से अधिक मूर्तियां हैं।

4. इंजीनियरिंग और भूविज्ञान:

इसमें बताया गया है कि बावड़ी का निर्माण करते समय जल-शिरा (Aquifers) की पहचान कैसे की जाए और मिट्टी की प्रकृति के अनुसार नींव कैसे रखी जाए। यह आज के हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग का प्राचीन रूप है।

सामाजिक और सांस्कृतिक भूमिका

इन बावड़ियों का निर्माण केवल पानी पीने के लिए नहीं, अपितु सामुदायिक केंद्रों के रूप में किया जाता था। गर्मियों के दिनों में ये भूमिगत स्थल ठंडे रहते थे, जहाँ यात्री और स्थानीय लोग समय बिताते थे। यह महिलाओं के सामाजिक मेलजोल का भी एक प्रमुख स्थान था।

👉डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक पुस्तकें-

डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तकें

ग्रंथ परिचय

अपराजितपृच्छा में महिषासुरमर्दिनी और सप्तमातृकाओं  का स्वरूप

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सप्तमातृकाओं के एक छोर पर वीरभद्र है तथा दूसरे छोर पर गणेश

अपराजितपृच्छा में महिषासुरमर्दिनी और सप्तमातृकाओं  का स्वरूप भारतीय संस्कृति में शक्ति पूजा की दार्शनिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करता है।

भारतीय संस्कृति में शक्ति पूजा की अवधारणा पुराणों के उन आख्यानों से आई हैै जिनमें देवताओं की माता अदिति के विविध स्वरूपों का वर्णन किया गया है। हालांकि अदिति का सर्वप्रथम उल्लेख वेदों में हुआ है किंतु अदिति का मानवीकरण पुराणों में आकर संभव हो सका। अपराजितपृच्छा में अदिति का यह रूप महिषासुरमर्दिनी और सप्तमातृकाओं के रूप में स्पष्ट हुआ है तथा उन्हें दार्शनिक आधार भी प्रदान करता है।

अपराजितपृच्छा के अनुसार देवी-प्रतिमा बनाना केवल कला नहीं, अपितु एक आध्यात्मिक साधना है। इस ग्रंथ में महिषासुरमर्दिनी और सप्तमातृकाओं के स्वरूप का जो वर्णन मिलता है, वह अद्भुत है।

अपराजितपृच्छा में महिषासुरमर्दिनी और सप्तमातृकाओं  का स्वरूप

1. महिषासुरमर्दिनी: शक्ति का पराक्रमी स्वरूप

अपराजितपृच्छा में महिषासुरमर्दिनी के अष्टादशभुजा (18 हाथ) और विंशतिभुजा (20 हाथ) रूपों को विशेष महत्व दिया गया है। ग्रंथ के अनुसार इनके मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं:

  • मुद्रा: देवी का दाहिना पैर सिंह पर और बायां पैर महिषासुर (भैंसे) की पीठ पर स्थित होना चाहिए। इसे प्रत्यालीढ़ मुद्रा कहा जाता है, जो युद्ध में विजय का प्रतीक है।
  • शस्त्र विधान: उनके हाथों में त्रिशूल, खड्ग (तलवार), चक्र, बाण, शक्ति, वज्र, और परशु जैसे मारक अस्त्र होते हैं। वहीं दूसरे हाथों में शंख, पाश, अंकुश और ढाल जैसे रक्षात्मक और प्रतीकात्मक आयुध होते हैं।
  • महिष का स्वरूप: महिष के कटे हुए गले से मनुष्य रूपी असुर बाहर निकलता हुआ दिखाया जाता है, जिसे देवी का त्रिशूल भेद रहा होता है।
  • भाव: उनके चेहरे पर उग्रता के स्थान पर एक दिव्य शांति और मंद मुस्कान होनी चाहिए, जो यह दर्शाती है कि बुराई का विनाश उनके लिए एक सहज खेल है।

2. सप्तमातृका: सात दिव्य माताएं

सप्तमातृकाओं का वर्णन करते समय अपराजितपृच्छा उनके वाहन, आयुध और ध्वज पर विशेष ध्यान देता है। ये सात शक्तियां अपने संबंधित देवताओं की स्त्री ऊर्जा (Consorts) मानी जाती हैं:

माता का नामवाहन/आसनमुख्य आयुध एवं विशेषता
ब्रह्माणीहंसअक्षमाला (माला) और कमंडलु धारण करती हैं। इनके चार मुख होते हैं।
माहेश्वरीवृषभ (बैल)त्रिशूल और कपाल धारण करती हैं। जटाजूट में चंद्रमा सुशोभित होता है।
कौमारीमयूर (मोर)हाथ में शक्ति (भाला) धारण करती हैं। यह कार्तिकेय की शक्ति हैं।
वैष्णवीगरुड़शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करती हैं। वनमाला से अलंकृत होती हैं।
वाराहीवराह (सूअर)इनका मुख वराह का होता है। ये दंड या हल धारण करती हैं।
इंद्राणीऐरावत हाथीहाथ में वज्र और अंकुश होता है। इनके शरीर पर सहस्त्र नेत्र (हजार आँखें) होते हैं।
चामुंडाप्रेत या शवये कृशकाय (दुबली) और विकराल रूप वाली होती हैं। मुंडमाला धारण करती हैं।

अपराजितपृच्छा में शिल्प विधान की मुख्य बातें

अपराजितपृच्छा स्पष्ट निर्देश देता है कि:

  1. स्थान: सप्तमातृकाओं की प्रतिमाएं हमेशा एक क्रम में होनी चाहिए, जिनके एक छोर पर वीरभद्र और दूसरे छोर पर गणेश का होना अनिवार्य है।
  2. अलंकरण: सभी देवियां दिव्य आभूषणों और करंड मुकुट से सुसज्जित होनी चाहिए (चामुंडा को छोड़कर)।
  3. वात्सल्य: चामुंडा के अतिरिक्त अन्य सभी माताओं की गोद में अक्सर एक बालक दिखाया जाता है, जो उनके सृजन और पोषण के पक्ष को दर्शाता है।

ये लक्षण आज भी भारत के मध्यकालीन मंदिरों (जैसे एलोरा की गुफाएं या ओसियां के मंदिर) में प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं।

अपराजितपृच्छा में दार्शनिक रहस्य

अपराजितपृच्छा में प्रतिमाओं के बाह्य स्वरूप के साथ-साथ उनके भीतर छिपे दार्शनिक रहस्यों और यंत्र-विज्ञान पर गहरा प्रकाश डाला गया है। यहाँ शिल्प और दर्शन के उस सूक्ष्म मिलन को समझा जा सकता है:

1. प्रतिमाओं के पीछे का दार्शनिक रहस्य

देवी के आयुध और मुद्राएं केवल सजावट नहीं, अपितु मनुष्य की चेतना के विभिन्न स्तरों के प्रतीक हैं:

  • अंकुश और पाश: देवी के हाथों में पाश (रस्सी) हमारी इंद्रियों की आसक्तियों और वासनाओं का प्रतीक है, जबकि अंकुश उन पर नियंत्रण पाने के विवेक का।
  • महिषासुर वध का दर्शन: यहाँ महिष (भैंसा) तामसिक प्रवृत्तियों, अज्ञान और आलस्य का प्रतीक है। देवी द्वारा उसका वध करना इस बात का संकेत है कि ज्ञान और शक्ति के उदय से ही हमारे भीतर के अंधकार का नाश संभव है।
  • सप्तमातृकाओं का मनोविज्ञान: ये सात माताएं मनुष्य की सात मानसिक वृत्तियों का भी प्रतिनिधित्व करती हैं। उदाहरण के लिए, चामुंडा क्रोध और संहार का रूप हैं, जो हमें सिखाती हैं कि नकारात्मकता को कैसे जड़ से मिटाया जाए।

2. यंत्र-विज्ञान: मंदिर की ऊर्जा देह

अपराजितपृच्छा के अनुसार, मंदिर का निर्माण यंत्र के आधार पर होता है। यंत्र को देवी की सूक्ष्म देह माना जाता है:

  • बिंदु और त्रिकोण: इस ग्रंथ में बताया गया है कि देवी मंदिर के गर्भगृह के नीचे श्रीचक्र या विशिष्ट यंत्रों की स्थापना की जानी चाहिए। यंत्र का केंद्रीय बिंदु शिव और शक्ति के मिलन का स्थान है।
  • वास्तु-पुरुष मंडल: मंदिर की भूमि को एक जीवित इकाई माना जाता है। शक्ति मंदिरों में त्रिकोण (Triangle) का विशेष महत्व है, जो शक्ति की क्रियाशील ऊर्जा को ऊपर की ओर प्रवाहित करता है।
  • बीज मंत्रों का अंकन: शिल्पशास्त्र के अनुसार, प्रतिमा के हृदय या पीठ के पीछे विशिष्ट बीज मंत्रों (जैसे ह्रीं, क्लीं) को उत्कीर्ण करने का विधान है, जिससे पत्थर की मूर्ति जीवंत होकर ऊर्जा विकीर्ण करने लगती है।

3. तांत्रिक पक्ष: परा और अपरा शक्ति

ग्रंथ में शक्ति के दो रूपों की चर्चा है:

  1. अपरा शक्ति: जो मूर्तियों और प्रतीकों में दिखाई देती है (सगुण रूप)।
  2. परा शक्ति: जो निराकार है और केवल यंत्र या गहरे ध्यान के माध्यम से अनुभव की जा सकती है।

अपराजितपृच्छा यह सुनिश्चित करता है कि एक साधारण भक्त अपरा (प्रतिमा) की पूजा करके धीरे-धीरे परा (ब्रह्मांडीय ऊर्जा) के रहस्य को समझ सके।

इस ग्रंथ की सबसे बड़ी देन यह है कि इसने कला (Art) को अध्यात्म (Spirituality) एवं दर्शन (Philosophy) से पूरी तरह जोड़ दिया। इस ग्रंथ के अनुसार बिना यंत्र के मूर्ति अधूरी है और बिना दर्शन के शिल्प केवल पत्थर।

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ग्रंथ परिचय

मानसार: भारतीय शिल्पशास्त्र का अद्वितीय ग्रंथ

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एरण का पुरास्थल

मानसार भारतीय शिल्पशास्त्र का एक अद्वितीय ग्रंथ है जिसमें वास्तुकला, मूर्तिकला और नगर नियोजन के विस्तृत सिद्धांत दिए गए हैं। इसे हिंदू वास्तुकला की परंपरा का एक मानक सूत्र‑ग्रंथ माना जाता है, जो आज भी वास्तु, पुरातत्त्व और इंडियन आर्किटेक्चर के शोध में व्यापक रूप से उद्धृत होता है।

परिचय

भारतीय संस्कृति में वास्तुशास्त्र और शिल्पकला का विशेष स्थान रहा है। मंदिर निर्माण, नगर नियोजन भवन और मूर्तिकला की परंपरा को समझने के लिए प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन आवश्यक है। मानसार ग्रंथ इन्हीं में से एक प्रमुख शिल्पशास्त्रीय ग्रंथ है, जिसे मानसार ऋषि  द्वारा रचित माना जाता है। यह ग्रंथ वास्तुशास्त्र, मूर्तिकला और नगर नियोजन के सिद्धांतों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है।

मानसार ग्रंथ क्या है?

मानसार (या मानसार शिल्पशास्त्र) संस्कृत में रचित एक प्राचीन वास्तु व शिल्पशास्त्र ग्रंथ है, जिसमें लगभग 70 अध्याय और करीब 10,000 श्लोक बताए जाते हैं। विद्वानों के अनुसार यह संभवतः पहली सहस्राब्दी ईस्वी के आसपास रचा गया और उत्तर भारत की वास्तु परंपरा का प्रामाणिक पाठ बन गया। ग्रंथ का नाम “मानसार” का अर्थ ही “माप‑मानों का सार” या “मापन‑शास्त्र का निचोड़” माना जाता है, जो इसके तकनीकी स्वरूप को दर्शाता है।[motilalbanarsidass]

संरचना और विषय‑वस्तु

मानसार ग्रंथ में लगभग 70 अध्याय हैं। इसकी शुरुआत ब्रह्मा की स्तुति से होती है और समापन शिव के तीसरे नेत्र के खुलने पर होता है।

  • प्रथम आठ अध्याय: शिल्प और वास्तु की मूलभूत परिभाषाएँ।
  • अध्याय 19 से 30: एक मंजिला से लेकर बारह मंजिला भवनों का वर्णन।
  • अध्याय 31 से 50: वास्तुशिल्प और नगर नियोजन की चर्चा।
  • अध्याय 51 से 70: मूर्तिकला और प्रतिमा निर्माण के नियम।

इस ग्रंथ में गर्भन्यास, भूमि परीक्षण, शङ्कु स्थापना, ग्राम और नगर की योजना, गोपुर और मण्डप निर्माण जैसे विषयों का विस्तार से उल्लेख मिलता है।

इस प्रकार मानसार के प्रारंभिक 8 अध्याय भूमिका और सिद्धांतात्मक चर्चा से जुड़े हैं, जिनमें वास्तुशास्त्र की उत्पत्ति, देवताओं से परंपरा का अवतरण और भूमि‑चयन जैसे विषय आते हैं। इसके बाद के 42 अध्याय में आवासीय भवन, बहुमंजिला इमारतें, महल, दुर्ग, बाजार, उद्यान, कुएँ‑तालाब और नगर‑योजना तक का विस्तृत वर्णन है। अंतिम लगभग 20 अध्याय मूर्तिकला, देवप्रतिमा, मानव‑प्रतिमा, पशु‑पक्षी की आकृतियों और अलंकरण‑विधान पर केंद्रित हैं।[samacharjustclick]​

वास्तुशास्त्र और नगर‑योजना में योगदान

मानसार के अनुसार किसी भी बस्ती के लिए ऐसी भूमि उपयुक्त मानी गई है जो ठोस मिट्टी की हो, हल्की ढलान के साथ पूर्व दिशा की ओर खुलती हो ताकि निवासी सूर्योदय का आनंद ले सकें। ग्रंथ में छोटे आवासीय परिसर से लेकर विशाल नगर तक के लिए माप, अनुपात और दिशा‑निर्देश दिए गए हैं; उदाहरण के लिए, नगरों को समुद्र, नदी या पर्वतों के समीप बसाने तथा मुख्य मार्गों को उत्तर‑दक्षिण या पूर्व‑पश्चिम दिशा में रखने की सलाह दी गई है। मानसार नगरों को आठ प्रकारों में विभाजित करता है, जिनमें राजधानियाँ, व्यापारिक नगर, तीर्थ‑नगर और दुर्ग‑नगर जैसे रूप शामिल हैं, जो प्राचीन भारत की उन्नत शहरी‑योजना परंपरा का संकेत देते हैं।[hi.wikipedia]​

मंदिर और मूर्ति‑निर्माण के सिद्धांत

यह ग्रंथ हिंदू मंदिर वास्तुकला के लिए भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है; कई विद्वान मानते हैं कि मध्य भारत के बटेश्वर मंदिर समूह जैसे स्थलों पर मानसार और मायामत जैसे शास्त्रों के सिद्धांत अपनाए गए। मंदिर के गर्भगृह, मंडप, शिखर, प्राकार, द्वार, स्तंभ, अलंकरण और प्रतिमा‑स्थापना के लिए इसमें विस्तृत माप‑मान, अनुपात और दिशा‑नियम वर्णित हैं। मूर्ति‑शिल्प संबंधी अध्यायों में विभिन्न देवताओं, बुद्ध, जैन तीर्थंकरों, महापुरुषों और पशु‑पक्षियों की प्रतिमाओं के आयाम, मुद्राएँ और लक्षण विस्तार से दिए गए हैं, जिससे यह संपूर्ण शिल्पशास्त्र का रूप ले लेता है।[transliteral]​

मानसार की विशेषताएँ

  1. वास्तुशास्त्र का वैज्ञानिक दृष्टिकोण – भूमि परीक्षण, दिशा निर्धारण और भवन निर्माण की विधियाँ आज भी प्रासंगिक हैं।
  2. नगर नियोजन – इसमें नगरों के मार्ग, प्राकार, गोपुर और मण्डप की योजना का उल्लेख है।
  3. मूर्तिकला का सौंदर्यशास्त्र – देव प्रतिमाओं के अनुपात, मुद्रा और स्थापत्य के नियम दिए गए हैं।
  4. प्राचीन तकनीकी कल्पनाएँ – 43वें अध्याय में ऐसे रथों का वर्णन है जो वायुवेग से चलते थे, जिससे तत्कालीन वैज्ञानिक सोच का पता चलता है।

ऐतिहासिक महत्व

मानसार ग्रंथ भारतीय वास्तु परंपरा का जीवंत दस्तावेज है। यह न केवल मंदिर निर्माण की विधियों को स्पष्ट करता है, बल्कि नगर नियोजन और सामाजिक संरचना की झलक भी देता है। श्री प्रसन्न कुमार आचार्य ने इस ग्रंथ को पुनः संकलित कर अंग्रेजी में अनुवाद किया और सात भागों में प्रकाशित किया।

आधुनिक सदंर्भों में मानसार

आज जब भारतीय वास्तुशास्त्र, मंदिर‑संरक्षण और हेरिटेज‑टूरिज़्म पर नए शोध हो रहे हैं, मानसार को एक मानक स्रोत के रूप में पढ़ा और उद्धृत किया जाता है। सतत विकास, जल प्रबंधन, प्राकृतिक ढलानों का उपयोग और सूर्य‑उन्मुख निर्माण जैसे सिद्धांत, जो आज “क्लाइमेट‑सेंसिटिव आर्किटेक्चर” में चर्चा का विषय हैं, मानसार में पारंपरिक रूप से व्यवस्थित रूप में मिलते हैं। इसीलिए इसे भारतीय वास्तुकला‑परंपरा का एक आधार‑ग्रंथ माना जाता है, जो प्राचीन ज्ञान और आधुनिक वास्तु‑चिंतन के बीच सेतु का कार्य करता है।[dharmawiki]​

निष्कर्ष

मानसार ग्रंथ भारतीय शिल्पशास्त्र का अद्वितीय ग्रंथ है जो वास्तु, मूर्तिकला और नगर नियोजन की परंपरा को संरक्षित करता है। यह ग्रंथ न केवल प्राचीन भारतीय ज्ञान का प्रतीक है, बल्कि आधुनिक समय में भी वास्तु और कला के क्षेत्र में मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।

  • आर्किटेक्ट्स और डिज़ाइनर्स के लिए यह ग्रंथ प्रेरणा का स्रोत है।
  • इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए यह भारतीय संस्कृति की गहराई को समझने का माध्यम है।

👉डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक पुस्तकें-

ग्रंथ परिचय

महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव – पालघर के साधुओं की हत्या का बदला ले लिया गया है!

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महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव - पालघर के साधुओं की हत्या का बदला ले लिया गया है!

महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव – जनता की जीत, ठगों की हार

👉 16 जनवरी 2026 को महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव परिणामों ने भारतीय लोकतंत्र की दिशा और दशा को लेकर एक महत्वपूर्ण संकेत दिया है। इन चुनावों से यह स्पष्ट हो गया है कि महाराष्ट्र के मतदाताओं ने राजनीतिक ठगों को धता बताकर अपनी राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक अस्मिता को अक्षुण्ण रखने का संकल्प लिया है। यह केवल एक चुनावी परिणाम नहीं है, बल्कि जनता की चेतना का उद्घोष है कि अब वे जातीय, भाषाई और सांप्रदायिक छलावे में नहीं आने वाले।

राजनीतिक ठगों की रणनीतियाँ

इन चुनावों में कुछ राजनीतिक पार्टियाँ ‘मराठा मानुष’ के नाम पर मतदाताओं के बीच उतरीं। उन्होंने यह भ्रम फैलाने की कोशिश की कि मराठा पहचान ही महाराष्ट्र की असली पहचान है और उसी के नाम पर वोट माँगना उनका अधिकार है।

दूसरी ओर, कुछ राजनीतिक ठगों ने मराठी भाषा को चुनावी हथियार बनाया। उन्होंने यह प्रचार किया कि मराठी भाषा की रक्षा केवल उनके हाथों में है। मराठियों से बाहर के लोग चाहे वे महाराष्ट्र की जनता को सुखी बनाने के लिए किसी भी क्षेत्र में काम क्यों न कर रहे हों, उन्हें मारा-पीटा जाएगा और अपना राजनीतिक उल्लू सीधा किया जाएगा।

कुछ छुटभैये नेता जातीय समीकरणों के बल पर मतदाताओं को ठगना चाहते थे। उनका मानना था कि यदि वे जातीय आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण कर लें, तो सत्ता तक पहुँच आसान हो जाएगी। वहीं, कुछ षड्यंत्रकारी राजनीतिक ठग हमेशा की तरह साम्प्रदायिक एकता का नारा देकर विशेषकर मुस्लिम मतदाताओं के वोटों का ध्रुवीकरण करना चाहते थे।

कुछ राजनीतिक ठग विगत कई सालों से जातीय जनगणना करवाने के नाम पर जनता को भ्रमित करके उनसे वोट पाने की आस लगाए बैठे थे।

मतदाताओं की परिपक्वता

✨ महाराष्ट्र के मतदाताओं ने इन सभी चालों को न केवल समझा, बल्कि उन्हें पूरी तरह नकार दिया। जनता ने यह दिखा दिया कि उनकी प्राथमिकता केवल विकास, सुशासन और राष्ट्रीय-सांस्कृतिक अस्मिता है।

महाराष्ट्र के मतदाताओं ने यह साबित कर दिया कि वे अब जातीय, क्षेत्रीय, भाषाई एवं क्षुद्र राजीतिक चालों में फंसने वाले नहीं हैं। वे जान चुके हैं कि जातीय समीकरण, साम्प्रदायिक धु्रवीकरण या भाषाई पहचान से न तो उनके नगरों का विकास होगा और न ही उनकी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित होगा। उन्होंने राजनीतिक ठगों को स्पष्ट संदेश दिया है कि देशवासियों की राष्ट्रीय पहचान और सांस्कृतिक शक्ति ही मतदाताओं के वर्तमान एवं भविष्य को सुरक्षित बना सकती है।

महाराष्ट्र के मतदाताओं ने इन राजनीतिक ठगों को एक बार फिर बता दिया है कि आपने हमें बहुत ठग लिया, अब नहीं। लोकतंत्र में असली ताकत जनता के पास है और यदि जनता ठान ले तो किसी भी प्रकार के राजनीतिक छलावे को समाप्त कर सकती है।

हरियाणा, बिहार और उड़ीसा के उदाहरण

महाराष्ट्र से पहले हरियाणा, बिहार और उड़ीसा के मतदाता भी यही कार्य कर चुके हैं। हरियाणा में जातीय राजनीति लंबे समय से चुनावों पर हावी रही लेकिन पिछले विधान सभी चुनवों में वहाँ के मतदाताओं ने जातीय समीकरणों को दरकिनार करके विकास और सुशासन को प्राथमिकता दी। राष्ट्रीय अस्मिता और भारत की सांस्कृतिक पहचान को प्रमुखता दी।

इसी प्रकार बिहार में भी लंबे समय तक जातीय और साम्प्रदायिक राजनीति का बोलबाला रहा। परंतु वहाँ के मतदाताओं ने भी विगत विधानसभा चुनावों में यह दिखा दिया कि वे अब केवल जातीय पहचान के आधार पर वोट नहीं देंगे।

उड़ीसा के विगत विधान सभा चुनावों में राजनीतिक ठगों को सत्ता के सिंहासनों से दूर कर दिया गया। राजनीतिक धूर्त उड़ीसा के चुनावों में जातीय जनगणना का नारा वोटों में नहीं बदल सके।

इन तीनों राज्यों के उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय मतदाता अब परिपक्व हो चुके हैं। वे जानते हैं कि लोकतंत्र का असली उद्देश्य जनता की भलाई है, न कि कुछ नेताओं की सत्ता की भूख मिटाना।

👉 हरियाणा ने तोड़ाक – ठगों को डोला! 👉 बिहार ने फाड़ाक – ठगों का झोला!

पश्चिम बंगाल की ओर संकेत

अब यही कार्य पश्चिम बंगाल में होने जा रहा है। वहाँ भी लंबे समय से राजनीतिक ठगों ने भाषाई, क्षेत्रीय, सांप्रदायिक और जातीय समीकरणों का सहारा लेकर सत्ता पर अधिकार कर रखा है। लेकिन बदलते समय के साथ बंगाल के मतदाता भी जागरूक हो रहे हैं। वे समझ रहे हैं कि यदि वे अपनी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक अस्मिता को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो उन्हें राजनीतिक ठगों को सत्ता से बाहर करना होगा। शराब की एक बोतल में लोकतंत्र को गिरवी रखने से उनके बच्चों का भविष्य नष्ट हो जाएगा।

राष्ट्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक चेतना

इन चुनावों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारतीय जनता अपनी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक अस्मिता को लेकर सजग है। चाहे वह महाराष्ट्र हो, हरियाणा हो, बिहार हो या पश्चिम बंगालकृहर जगह जनता यह दिखा रही है कि उनकी प्राथमिकता केवल विकास और अस्मिता की रक्षा है।

राष्ट्रीय अस्मिता का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा भी है। जब जनता जातीय और भाषाई ठगों को नकारती है, तो वह यह संदेश देती है कि भारतीय संस्कृति की विविधता ही उसकी असली ताकत है।

लोकतंत्र की मजबूती

महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों ने यह भी साबित किया है कि भारतीय लोकतंत्र अब और मजबूत हो रहा है। जब जनता राजनीतिक ठगों को पहचानकर उन्हें सत्ता से बाहर करती है, तो लोकतंत्र की जड़ें और गहरी होती हैं। यह लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण है कि जनता अब केवल वादों और नारों से प्रभावित नहीं होती, बल्कि ठोस काम और ईमानदार नेतृत्व को महत्व देती है।

भविष्य की दिशा

यदि यह प्रवृत्ति पूरे देश में फैलती है, तो आने वाले समय में भारतीय राजनीति का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा। जातीय और सांप्रदायिक राजनीति का अंत होगा और विकास, सुशासन तथा सांस्कृतिक अस्मिता ही चुनावी मुद्दे बनेंगे। इससे न केवल लोकतंत्र मजबूत होगा, बल्कि देश की एकता और अखंडता भी सुदृढ़ होगी।

महाराष्ट्र की जनता ने अपनी राष्ट्रीय एवं सास्कृतिक अस्मिता को पहचान कर अपना जो निर्णय सुनाया है, उससे स्पष्ट है कि महाराष्ट्र की जनता ने पालघर के साधुओं की हत्या का बदला ले लिया है।

महाराष्ट्र के कुछ जगत् प्रसिद्ध राजनीतिक धूर्तों ने पालघर के निर्दोष साधुओं को दिन दहाड़े कैमरे के सामने, पुलिस और गुण्डों के हाथों मरवाया था, वस्तुतः वह भारत की राष्ट्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक पहचान को नष्ट करके साधुओं की चिताओं पर राजनीतिक रोटियां सेकने की घिनौनी साजिश थी।

महाराष्ट्र के मतदाताओं के संदेश

न केवल विगत विधान सभा चुनावों में अपितु हाल ही में हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में महाराष्ट्र की जनता ने उन हत्यारों के नाम स्पष्ट संदेश छोड़े हैं-

👉 जात-पात का खेल नहीं चलेगा, भाषा का छल नहीं चलेगा, धर्मनिपेक्षता के नाम पर सांप्रदायिक राजनीति नहीं चलेगी!

👉 विकास चाहिए, ठगी नहीं; सांस्कृतिक अस्मिता चाहिए, धर्मनिरपेक्षता का छल नहीं!

👉 महाराष्ट्र के मतदाता जगे हैं और पालघर के हत्यारे भगे हैं।

अब पश्चिम बंगाल की बारी है। वहाँ भी जनता राजनीतिक धूर्तों से निबटने को तैयार हैकृ

👉 बंगाली उठेंगे तो राजनीतिक ठग भगेंगे।

👉 हिन्दू संस्कृति ही भारत का धर्म है, विकास की लेखनी ही राष्ट्रीय कर्म है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अपराजित पृच्छा : शक्ति-पूजा और शिल्प परम्परा का अद्भुत ग्रंथ!

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अपराजित पृच्छा

भारतीय संस्कृति में शक्ति-पूजा की परंपरा अत्यंत प्राचीन और गहन है। देवी-पूजन केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस परंपरा को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करने वाला अद्भुत ग्रंथ है – अपराजित पृच्छा

अपराजित पृच्छा का परिचय

यह भारतीय शिल्पशास्त्र और आगम परंपरा का ऐसा देदीप्यमान ग्रंथ है जो न केवल शक्ति-पूजा की विधियों और तत्त्वों का विवेचन करता है, बल्कि तंत्र-साधना के रहस्यों को भी उजागर करता है। यह ग्रंथ भारतीय कला, स्थापत्य और धर्मशास्त्र की अमूल्य धरोहर है।

अपराजित पृच्छा एक संस्कृत ग्रंथ है, जिसे 12वीं-13वीं शताब्दी के आसपास लिखा गया माना जाता है। गुजरात के चालुक्य राजाओं के संरक्षण में रचित यह ग्रंथ, विश्वकर्मा के मानस पुत्र अपराजित द्वारा पूछे गए प्रश्नों और उनके पिता द्वारा दिए गए उत्तरों के रूप में संकलित है।

यह ग्रंथ मुख्यतः वास्तुशास्त्र, मूर्तिशास्त्र और पूजा-विधान पर केंद्रित है। इसमें देवी-देवताओं की मूर्तियों के निर्माण, मंदिरों की संरचना और पूजा-पद्धति का विस्तृत वर्णन मिलता है। शक्ति-पूजा की परंपरा को इसमें विशेष स्थान दिया गया है, जिससे यह ग्रंथ भारतीय धार्मिक जीवन का दर्पण बन जाता है।

शक्ति-पूजा परंपरा में अपराजितपृच्छा का महत्व

1. शक्ति-पूजा की परंपरा

भारतीय दर्शन में शक्ति को सृष्टि की मूल ऊर्जा माना गया है। देवी को आदिशक्ति, जगतजननी और धर्मरक्षक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। ‘अपराजित पृच्छा’ में शक्ति-पूजा की विधियों का उल्लेख इस दृष्टि से अद्भुत है कि यह केवल अनुष्ठानिक क्रियाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि देवी-पूजन को जीवन की समग्र साधना से जोड़ता है।

  • देवी की मूर्तियों के निर्माण में सौंदर्य और शास्त्रीयता का संतुलन
  • पूजा में मंत्र, यंत्र और तंत्र का प्रयोग
  • शक्ति को मातृभाव से लेकर रक्षक और संहारक तक विभिन्न रूपों में स्वीकार करना
  • साधक के जीवन में शक्ति की उपस्थिति को आत्मबल और सामाजिक कल्याण से जोड़ना

2. शक्ति का दार्शनिक स्वरूप

अपराजितपृच्छा में शक्ति को केवल एक देवी के रूप में नहीं, अपितु ब्रह्मांड की मूल ऊर्जा के रूप में स्वीकार किया गया है। ग्रंथ के अनुसार, शिव और शक्ति का संबंध अविभाज्य है। जहाँ शिव ज्ञान हैं, वहीं शक्ति क्रिया और इच्छा का स्वरूप हैं। शक्ति-पूजा के इस ग्रंथ में देवी को आद्या कहा गया है, जो सृष्टि के सृजन, पालन और संहार की अधिष्ठात्री हैं।

3. प्रतिमा विज्ञान और शक्ति के विविध रूप

शक्ति-पूजा परंपरा में मूर्तिकला का बड़ा महत्व है, और अपराजितपृच्छा इस विषय पर विस्तृत प्रकाश डालती है। इसमें देवी के विभिन्न रूपों के आयुध (हथियार), वाहन, मुद्रा और उनके स्वरूप का सूक्ष्म विवरण मिलता है:

  • महिषासुरमर्दिनी: देवी के इस पराक्रमी रूप के दस, अठारह या बीस हाथों के आयुधों का वर्णन इसमें विस्तार से है।
  • सप्तमातृका: ब्रह्माणी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, इंद्राणी, वाराही और चामुंडा के शास्त्रीय स्वरूप का वर्णन शक्ति उपासना के सामाजिक और आध्यात्मिक पक्ष को दर्शाता है।
  • महाविद्या और योगिनी: ग्रंथ में 64 योगिनियों और उनके मंदिर विधान का भी उल्लेख है, जो मध्यकालीन भारत के तांत्रिक प्रभाव को रेखांकित करता है।

4. शक्तिपीठ और वास्तु विधान

इस ग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह शक्ति-पूजा को वास्तु (Architecture) के साथ जोड़ता है। अपराजितपृच्छा में बताया गया है कि शक्ति के मंदिर किस दिशा में होने चाहिए और उनके गर्भगृह की योजना कैसी होनी चाहिए।

  • पीठ विधान: इसमें विभिन्न प्रकार के पीठों (Altars) का वर्णन है, जो तंत्र साधना के लिए आवश्यक होते हैं।
  • मंडप संरचना: देवी मंदिरों के मंडप और शिखर की ऊँचाई के नियमों को शक्ति के दिव्य तेज के अनुरूप निर्धारित किया गया है।

5. तंत्र और उपासना पद्धति

अपराजितपृच्छा केवल एक शिल्प-ग्रंथ नहीं है, अपितु यह आगम परंपरा का संवाहक भी है। इसमें बीज मंत्रों, यंत्रों की रचना और साधना के मुहूर्त पर बल दिया गया है। ग्रंथ स्पष्ट करता है कि मूर्ति केवल पत्थर नहीं है; जब उसमें प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है और शक्ति का आह्वान होता है, तब वह साक्षात चैतन्य हो उठती है।

इसमें शक्ति की सौम्य (जैसे लक्ष्मी, सरस्वती) और रौद्र (जैसे काली, भैरवी) दोनों प्रकृतियों की उपासना का समन्वय मिलता है। यह ग्रंथ बताता है कि साधक की मनोकामना के अनुसार देवी के किस रूप की आराधना की जानी चाहिए।

6. कला और स्थापत्य में योगदान

‘अपराजित पृच्छा’ का महत्व केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि कला और स्थापत्य के क्षेत्र में भी है। इसमें मंदिर-निर्माण की सूक्ष्म विधियाँ दी गई हैं। देवी-पूजन के लिए विशेष प्रकार के मंदिरों, गर्भगृहों और वेदियों का उल्लेख मिलता है।

  • मंदिर की दिशा, आकार और अनुपात का निर्धारण
  • मूर्तियों की मुद्रा, आयाम और भावाभिव्यक्ति
  • पूजा के लिए आवश्यक उपकरण और वेदियाँ
  • शक्ति-पूजा हेतु विशेष रूप से निर्मित यंत्रों का विवरण

इस प्रकार यह ग्रंथ भारतीय स्थापत्य कला का भी अद्भुत मार्गदर्शक है।

7. दार्शनिक दृष्टि

‘अपराजित पृच्छा’ में शक्ति-पूजा को केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं माना गया, बल्कि इसे दार्शनिक साधना का रूप दिया गया है। शक्ति को ब्रह्म की अभिन्न अभिव्यक्ति मानते हुए साधक को आत्मज्ञान की ओर प्रेरित किया गया है।

  • शक्ति को सृष्टि, स्थिति और संहार की त्रिगुणात्मक शक्ति के रूप में देखा गया है।
  • पूजा का उद्देश्य केवल भौतिक लाभ नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति है।

साधक को शक्ति के माध्यम से आत्मबल, विवेक और करुणा प्राप्त करने की प्रेरणा दी जाती है।

8. सामाजिक महत्व

शक्ति-पूजा भारतीय समाज में स्त्री-शक्ति के सम्मान का प्रतीक रही है। ‘अपराजित पृच्छा’ इस परंपरा को और अधिक सुदृढ़ करता है। देवी को मातृभाव से लेकर योद्धा रूप तक स्वीकार करना समाज में स्त्री की बहुआयामी भूमिका को मान्यता देता है।

  • स्त्री को सृजनकर्ता और रक्षक दोनों रूपों में प्रतिष्ठित करना
  • समाज में स्त्री-शक्ति के प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव जगाना
  • सामूहिक पूजा और उत्सवों के माध्यम से सामाजिक एकता को बढ़ावा देना

9. सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व

ऐतिहासिक दृष्टि से अपराजितपृच्छा का लेखक भुवनदेव को माना जाता है। यह ग्रंथ उस समय लिखा गया जब भारत में शक्ति संप्रदाय (Shaktism) अपने चरमोत्कर्ष पर था। खजुराहो से लेकर उड़ीसा और गुजरात के मोढेरा तक, जो भी भव्य मंदिर बने, उनके पीछे अपराजितपृच्छा जैसे ग्रंथों का शास्त्रीय आधार रहा है।

यह ग्रंथ हमें यह भी बताता है कि मध्यकालीन समाज में नारी शक्ति को ब्रह्मांडीय शक्ति के प्रतीक के रूप में कितनी प्रधानता दी जाती थी। कला, धर्म और दर्शन का ऐसा संगम विरल ही देखने को मिलता है।

मानासर और अपराजितपृच्छा का संबंध

शिल्पशास्त्र की परंपरा में मानसार और अपराजितपृच्छा को अक्सर एक ही श्रेणी में रखा जाता है, हालांकि मानसार मुख्य रूप से दक्षिण भारतीय (द्रविड़) परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है और अपराजितपृच्छा उत्तर भारतीय (नागर/मारू-गुर्जर) परंपरा का।

मानासर की तरह ही अपराजितपृच्छा भी मान (Measurement) और प्रमाण (Proportion) पर अत्यधिक बल देती है। इन ग्रंथों के अनुसार, यदि कोई भवन सही माप और अनुपात में नहीं है, तो वह न केवल सौंदर्यहीन होगा, अपितु निवास करने वालों के लिए अशुभ भी हो सकता है।

निष्कर्ष

अपराजित पृच्छा शक्ति-पूजा परंपरा का अद्भुत ग्रंथ है, जो भारतीय धर्म, दर्शन, कला और समाज का समन्वित चित्र प्रस्तुत करता है। यह ग्रंथ हमें बताता है कि शक्ति-पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन की समग्र साधना है। देवी-पूजन के माध्यम से साधक आत्मबल, विवेक और करुणा प्राप्त करता है, वहीं समाज में स्त्री-शक्ति के प्रति सम्मान और एकता का भाव भी विकसित होता है।

अपराजितपृच्छा शक्ति-पूजा की परंपरा का एक ऐसा अक्षय कोष है, जो साधक, शिल्पी और इतिहासकार—तीनों के लिए समान रूप से उपयोगी है। यह हमें सिखाता है कि शक्ति की उपासना केवल कर्मकांड नहीं, अपितु कला और वास्तु के माध्यम से उस परम चेतना को अपने भीतर उतारने की एक प्रक्रिया है। आज भी जब हम प्राचीन भारतीय मंदिरों की दीवारों पर उत्कीर्ण देवी प्रतिमाओं को देखते हैं, तो उनमें अपराजितपृच्छा के शब्द ही जीवंत होकर मुस्कुराते प्रतीत होते हैं।

इस प्रकार ‘अपराजित पृच्छा’ भारतीय संस्कृति की उस अद्भुत परंपरा का प्रतिनिधि है, जिसमें शक्ति को जगतजननी, रक्षक और संहारक के रूप में स्वीकार कर जीवन के हर आयाम से जोड़ा गया है। यह ग्रंथ आज भी हमें प्रेरित करता है कि शक्ति-पूजा केवल मंदिरों तक सीमित न रहे, बल्कि हमारे जीवन और समाज में भी शक्ति का आदर और सम्मान बना रहे।

कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप में प्रकट हो गए! (84)

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कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप

वीर कल्लाजी राठौड़ और राजा जयमल राठौड़ दो-दो हाथों से तलवार चलाते हुए बढ़े! इसे चित्तौड़ के इतिहास में कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप में अवतरित हुए कहा गया। वे दोनों महावीर, शत्रुओं को मारते हुए अकबर (AKBAR) की सेना के लिए काल बन गए।

राजा जयमल के आदेश के बाद चित्तौड़ दुर्ग में जौहर की ज्वाला धधक उठी। जब दुर्ग के भीतर से गगनचुम्बी लपटें उठने लगीं तो वे अकबर (AKBAR) के शिविर तक दिखाई देने लगीं।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि एक जौहर फत्ता सिसोदिया के मकान में किया गया था और एक राणा के मुख्य सेवकों ने किया था। एक राठौड़ों ने किया था। इनमें कोठरिया का रावत साहिबखान मुख्य था। एक बहुत बड़ा जौहर चौहानों की हवेली में हुआ था जहाँ का मुख्य सरदार ईसरदास चौहान था।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लखता है कि लगभग 300 स्त्रियाँ इसमें जल मरी थीं। अबुल फजल (ABUL FAZAL) का यह विवरण अधूरा है। किले में जौहर की ज्वाला कई जगह धधकी थी तथा ठीक से कहा नहीं जा सकता कि इसमें भाग लेने वाली स्त्रियों, लड़कियों एवं बच्चों की संख्या कितनी थी!

रात के समय आकाश में ऊँची उठती अग्नि की लपटों को देखकर अकबर (AKBAR) बहुत विस्मित हुआ, उसने अपने मंत्रियों से इस अग्नि का कारण पूछा।

इस पर आम्बेर के राजा भगवानदास ने कहा कि जब हिन्दू वीर, युद्ध-क्षेत्र में मरने का निश्चय कर लेते हैं तो अपनी स्त्रियों और बच्चों को जौहर की अग्नि में जलाकर शत्रुओं पर टूट पड़ते हैं, इसलिये सावधान हो जाना चाहिये, कल सूर्योदय होते ही किले के दरवाजे खुलेंगे।

 राजा भगवानदास की यह बात सुनकर मुगल सेना को तैयार रहने के लिए कहा गया। 25 फरवरी 1568 को प्रातः होते ही किले के भीतर युद्ध के नगाड़े बजने लगे। मुगल सेना ने हैरान होकर देखा कि चित्तौड़ी वीर किले का दरवाजा खोलकर बाहर आ रहे हैं।

उन्होंने केसरिया पाग बांधी हुई है तथा देह पर केसरिया बाना धारण किया हुआ है। उनके माथे वीरत्व के दर्प से दमदमा रहे हैं। जिस प्रकार आज का बाल-सूर्य प्राची में उषा द्वारा सजाए गए लाल पथ पर प्रकट हुआ है, उसी प्रकार मेवाड़ी आन-बान और शान की रक्षा के लिए दुर्ग से बाहर निकले मेवाड़ी वीर रक्त के लाल पथ पर अग्रसर हो रहे थे।

मुगल सेना केवल इतना ही देख सकी किंतु वास्तविकता यह भी थी कि प्रत्येक हिन्दू वीर के माथे पर कुछ देर पहले ही उनकी पत्नियों, माताओं एवं बहिनों द्वारा अग्नि की लाल लपटों में प्रवेश करने से पहले अपने हाथों से कुमकुम और रोली के टीके सजाए गए थे।

प्रत्येक वीर की पगड़ी में भगवान श्रीकृष्ण का चित्र था और उनके मुख में पहले से ही तुलसी दल रखा हुआ था। वे गंगाजल पीकर तथा गले में तुलसी की कण्ठी डालकर दुर्ग से बाहर निकले थे।

उत्तर भारत के हिन्दुओं में विगत हजारों सालों से यह परम्परा रही है कि जब किसी शव को शमशान भूमि में ले जाया जाता है तो उसके मुँह में तुलसी दल और गंगाजल रखे जाते हैं तथा गले में तुलसी की कण्ठी धारण करवाई जाती है। इन चित्तौड़ी वीरों ने युद्ध-क्षेत्र में शत्रुओं को मारते हुए प्राणोत्सर्ग करने का निश्चय किया था, इसलिए वे पहले से ही ये सब तैयारियां करके आए थे।

चित्तौड़ी वीरों को दुर्ग के दरवाजे से बाहर निकलते देखकर मुगल सेना ने भी उन पर आक्रमण किया। राजा जयमल मेड़तिया ने अश्व पर चढ़ने का प्रयास किया किंतु टूटी हुई टांग के कारण अश्व पर सवार नहीं हो सका।

इस पर राजा जयमल ने अपने साथी सरदारों से कहा कि मैं पैर टूट जाने के कारण घोड़े पर नहीं चढ़ सकता परन्तु लड़ने की इच्छा तो रह गई है। इस पर जयमल के 23 वर्षीय भतीजे कल्ला राठौड़ ने अपने 60 वर्षीय काका जयमल को अपने कंधे पर बिठा लिया और बोला- अब लड़ने की आकांक्षा पूरी कर लीजिये!

इसके बाद दोनों वीरों ने अपने दोनों हाथों में तलवारें पकड़ीं और शत्रु दल पर टूट पड़े। भारत का इतिहास वीरता की घटनाओं से भरा पड़ा है किंतु इस तरह की घटना इतिहास में कहीं और नहीं हुई।

वीर कल्लाजी राठौड़ और राजा जयमल राठौड़ दो-दो हाथों से तलवार चलाते हुए बढ़े! इसे चित्तौड़ के इतिहास में कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप में अवतरित हुए कहा गया। वे दोनों महावीर, शत्रुओं को मारते हुए अकबर (AKBAR) की सेना के लिए काल बन गए।

जयमल और कल्ला चार हाथों से शत्रुओं का संहार करते हुए आगे बढ़ रहे थे। जिसके कारण उनके सामने पड़ने वाले मुगलों के पैर टिक नहीं पा रहे थे। इन दोनों वीरों ने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन करते हुए हनुमान पोल दरवाजे से मुगलों को बाहर खदेड़ दिया।

हनुमान पोल पार करने के कुछ ही समय बाद, भैरव पोल से पहले, राजा जयमल को बंदूक की गोलियां लगीं जिससे वह वीरगति को प्राप्त हुआ। शत्रु को मारते हुए मरने की उसकी साध पूरी हुई। वीरों का वसंत संभवतः इसी को कहते हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान ने इन्हीं क्षणों की वंदना करने के लिए वीरों का कैसा हो वसंत कविता लिखी थी-

कह दे अतीत अब मौन त्याग, लंके तुझमें क्यों लगी आग

ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग;

बतला अपने अनुभव अनंत वीरों का कैसा हो वसंत।

यह बताना समीचीन होगा कि राजा जयमल महाराणा सांगा का भांजा था। वह अपने ननिहाल के ममत्व का कर्ज चुकाकर इस नश्वर संसार से गया। अकबर (AKBAR) ने फतहनामा-ए-चित्तौड़ में जयमल राठौड़ की तुलना 1000 घुड़सवारों से की थी।

राजा जयमल द्वारा युद्धक्षेत्र में अपने जीवन का वसंत मनाकर वीरगति प्राप्त करने के बाद उसका भतीजा कल्ला राठौड़ और अधिक उग्र हो गया। उसने अकेले ही मुगलों को पीछे खदेड़ना आरम्भ किया। बहुत से मुगल सैनिक उसके पीछे लगे हुए थे।

भैरव पोल दरवाजे तक पहुंचने से कुछ ही पहले एक मुगल सैनिक ने वीर कल्ला राठौड़ का सिर काट दिया। चित्तौड़ अंचल में मान्यता है कि सिर कटने के बाद कल्ला राठौड़ का धड़ दोनों हाथों से तलवार चलाते हुए रनेला नामक स्थान पर पहुंचा, जहाँ पर उनकी पत्नी कृष्णकांता उनकी प्रतीक्षा कर रही थी।

अपने पति के सिर विहीन धड़ को प्रचण्ड रूप धारण करके आया देखकर रानी कृष्णकांता ने वहीं पर चिता जलाई तथा अपने पति के साथ चिता में बैठ गई।

कल्लाजी राठौड़ को मेवाड़ अंचल में लोकदेवता माना गया। संकटग्रस्त लोग आज भी उनकी मनौती मानते हैं। रनेला में जिस स्थान पर कल्लाजी का धड़ भूशायी हुआ था, लोकदेवता कल्लाजी का मुख्य मंदिर है।

चित्तौड़ दुर्ग में राजा जयमल राठौड़ एवं कल्ला राठौड़ की छतरियां बनी हुई हैं। कल्ला राठौड़ की छतरी 4 खंभों की है और जयमल राठौड़ की छतरी छः खंभों की है। किसी कवि ने लिखा है-

‘जठै झड्या जयमल कला छतरी छतरां मोड़।

कमधज कट बणिया कमंद गढ़ थारै चित्तौड़।’

राजस्थान, गुजरात एवं मध्यप्रदेश में कल्ला राठौड़ के लगभग 500 मंदिर हैं। इनमें से 175 मंदिर अकेले बांसवाड़ा जिले में हैं। इन मंदिरों में शनिवार एवं रविवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। मान्यता है कि जो बीमारी कल्लाजी के मंदिर में ठीक नहीं होती वह बीमारी आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को जयमलजी के मंदिर में ठीक होती है। इनमें से कई मंदिरों में कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप में पूजे जाते हैं।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

सुप्रभेदागम: शैव आगम, दर्शन और मंदिर वास्तुकला का अद्भुत ग्रंथ

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सुप्रभेदागम

सुप्रभेदागम (Suprabhedagama) हिन्दू धर्म के शैव संप्रदाय की शैव सिद्धांत (Shaiva Siddhanta) परंपरा  का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। सामान्यतः ‘आगम’ शब्द का प्रयोग जैन और शैव (हिंदू) दोनों परंपराओं में किया जाता है, जिससे कभी-कभी भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है।

आगम क्या है? (What is Agama?)

शैव दर्शन में ‘आगम’ वे पवित्र ग्रंथ हैं जिन्हें भगवान शिव के मुख से निःसृत माना जाता है। शैव संप्रदाय में ‘आगम’ ग्रंथों को वेदों के समान ही प्रामाणिक माना जाता है, जो भगवान शिव द्वारा प्रकट किए गए माने जाते हैं।

सुप्रभेदागम क्या है? (What is Suprabhedagama?)

सुप्रभेदागम (Suprabhedagama) शैव संप्रदाय के 28 प्रमुख आगमों में से एक है। इसे ‘शैव सिद्धांत’ के अंतर्गत ‘पूर्व आगमों’ की श्रेणी में रखा गया है। इसका मुख्य उद्देश्य साधक को ज्ञान, योग, क्रिया और चर्या के माध्यम से शिवत्व की प्राप्ति कराना है। यह न केवल आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है, बल्कि दक्षिण भारतीय मंदिर वास्तुकला (द्रविड़ शैली) के लिए एक प्रामाणिक मार्गदर्शिका के रूप में भी जाना जाता है।

सुप्रभेदागम के महत्वपूर्ण तथ्य

1. अट्ठाइस मुख्य शैवागमों में से एक

शैव परंपरा में कुल 28 मूल आगम (Original Agamas) माने जाते हैं। सुप्रभेदागम इन्हीं 28 प्रमुख ग्रंथों में से एक है। इसे भगवान शिव के ‘वामदेव’ मुख से प्रकट हुआ माना जाता है।

2. वेदों का सार

सुप्रभेदागम में कहा गया है कि ‘सिद्धांत’ वेदों का सार है। यह ग्रंथ द्वैत और अद्वैत दोनों प्रकार के दार्शनिक विचारों पर चर्चा करता है।

3. सुप्रभेदागम की संरचना और विभाग

सुप्रभेदागम को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया गया है:

  1. पूर्व भाग (Purvabhaga): इसमें मुख्य रूप से मंदिर निर्माण, मूर्तिकला और अनुष्ठानों का वर्णन है।
  2. उत्तर भाग (Uttarabhaga): इसमें व्यक्तिगत साधना, दीक्षा और दार्शनिक सिद्धांतों पर जोर दिया गया है।

अन्य आगमों की तरह, सुप्रभेदागम भी चार प्रमुख भागों (पादों) में विभाजित है:

1. चर्या पाद (Charya Pada)

यह भाग दैनिक आचरण और अनुशासन से संबंधित है। इसमें भक्त के व्यक्तिगत आचरण, दैनिक जीवन, स्वच्छता, और बाहरी पूजा के नियमों का विवरण मिलता है।

2. क्रिया पाद (Kriya Pada)

सुप्रभेदागम का सबसे विस्तृत हिस्सा यही है। इसमें शिल्प शास्त्र (Architectural Science), मंदिर निर्माण, मूर्ति विज्ञान (Iconography) और पूजा विधियों का विस्तृत विवरण मिलता है।

  • मंदिर निर्माण: भूमि चयन से लेकर नींव (अधिष्ठान) और शिखर निर्माण तक की तकनीक।
  • प्रतिमा लक्षण: शिवलिंग और विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियों के माप और निर्माण की विधि।

3. योग पाद (Yoga Pada)

यह आंतरिक साधना का मार्ग है। इसमें प्राणायाम, ध्यान और चक्रों के भेदन के माध्यम से आत्मा को परमात्मा (शिव) से जोड़ने की प्रक्रिया बताई गई है।

4. ज्ञान पाद (Jnana Pada)

यह भाग दार्शनिक सिद्धांतों और मोक्ष की व्याख्या करता है। इसमें पति (ईश्वर), पशु (जीव) और पाश (बंधन) के त्रैत सिद्धांत की व्याख्या की गई है, जो शैव सिद्धांत का मूल आधार है।

सुप्रभेदागम का महत्व

1. सुप्रभेदागम और अध्यात्म (Spirituality)

सुप्रभेदागम हमें ‘शिवोहम’ (मैं शिव हूँ) का बोध कराता है। यह सिखाता है कि भक्ति केवल कर्मकांड नहीं है, बल्कि एक विज्ञान है। इसके अनुसार:

  • दीक्षा: बिना गुरु की दीक्षा के आध्यात्मिक प्रगति संभव नहीं है।
  • मुक्ति: संसार के बंधनों (पाश) से मुक्त होकर शिव के समान गुण प्राप्त करना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है।

2. सुप्रभेदागम और मंदिर वास्तुकला (Architecture and Iconography)

दक्षिण भारतीय वास्तुशास्त्र (Architecture) और शिल्पशास्त्र में सुप्रभेदागम का विशेष महत्व है। दक्षिण भारत के कई प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण और उनमें मूर्तियों की स्थापना सुप्रभेदागम ग्रंथ में दिए गए निर्देशों के आधार पर की गई है।

सुप्रभेदागम का ऐतिहासिक महत्व इसके वास्तुकला संबंधी विवरणों के कारण बढ़ जाता है। चोल और पल्लव काल के कई मंदिरों का निर्माण इसी आगम के सिद्धांतों के अनुसार किया गया है।

  • विमान निर्माण: यह ग्रंथ मंदिर के ऊपरी ढांचे (विमान) के विभिन्न प्रकारों का वर्णन करता है।
  • अनुष्ठानिक शुद्धता: गर्भगृह की पवित्रता बनाए रखने के लिए विशिष्ट नियमों का उल्लेख है।
  • जीर्णोद्धार: यदि कोई मंदिर क्षतिग्रस्त हो जाए, तो उसके पुनरुद्धार के लिए ‘संप्रोक्षण’ की विधि भी इसमें वर्णित है।

निश्चित रूप से, सुप्रभेदागम में वर्णित मंदिर वास्तुकला अत्यंत वैज्ञानिक और विस्तृत है। इस ग्रंथ के अनुसार, मंदिर केवल एक भवन नहीं, बल्कि भगवान का ‘स्थूल शरीर’ है।

3. सुप्रभेदागम के अनुसार मंदिर के विभिन्न अंग (Parts of Temple)

सुप्रभेदागम के अनुसार, मंदिर के अंगों की तुलना मानव शरीर से की जाती है:

  • अधिष्ठान (Base): पैर
  • पाद/स्तंभ (Pillars): जंघा (Thighs)
  • प्रस्तर (Roof level): कंधा (Shoulders)
  • शिखर (Top): सिर (Head)
  • स्तूपिका (Finial): शिखा (Crown/Tuft)

4. सुप्रभेदागम की अनूठी विशेषता: ‘षड्वर्ग’ सिद्धांत

सुप्रभेदागम मंदिर की ऊंचाई को निर्धारित करने के लिए षड्वर्ग’ (Shadvarga) गणना पर जोर देता है। इसमें छह प्रमुख मापदंड होते हैं:

  1. आय (Income)
  2. व्यय (Expenditure)
  3. योनि (Source/Orientation)
  4. वार (Weekday)
  5. नक्षत्र (Star)
  6. अंश (Quality/Portion)

इन गणनाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मंदिर का निर्माण ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ सामंजस्य बिठा सके और वहां पूजा करने वाले भक्तों को शांति प्राप्त हो।

सुप्रभेदागम में मंदिर निर्माण एवं शिल्प शास्त्र की प्रमुख विधियाँ

नीचे दी गई तालिका सुप्रभेदागम के क्रिया पाद में वर्णित मंदिर निर्माण के प्रमुख चरणों और उनके तकनीकी महत्व को दर्शाती है:

क्रम संख्याचरण (Phase)विवरण और महत्व (Description & Significance)
1भू-परीक्षा (Land Testing)भूमि के रंग, गंध, स्वाद और बनावट के आधार पर उसकी उपयुक्तता की जाँच।
2कर्पण (Ploughing)निर्माण से पहले भूमि की शुद्धि के लिए उसे जोतना और वहां पवित्र बीज बोना।
3पद विन्यास (Grid Planning)मंदिर के नक्शे को वर्गाकार ग्रिड (जैसे 8×8 या 9×9) में विभाजित करना, जिसे ‘वास्तु पुरुष मंडल’ कहते हैं।
4अधिष्ठान (Foundation)मंदिर का आधार या चबूतरा। सुप्रभेदागम में इसके विभिन्न प्रकार जैसे ‘पादबंध’ और ‘प्रतिबंध’ बताए गए हैं।
5स्तंभ (Pillars)खंभों के माप, उनकी आकृति (गोलाकार, वर्गाकार या अष्टकोणीय) और उन पर की जाने वाली नक्काशी के नियम।
6प्रस्तर (Entablature)स्तंभों के ऊपर का हिस्सा जो छत को सहारा देता है, इसमें सजावटी तत्वों का विवरण होता है।
7विमान (Vimana)गर्भगृह के ऊपर का शिखर। ग्रंथ में एक-मंजिला (अल्प) से लेकर बहु-मंजिला शिखरों का वर्णन है।
8मूर्तिकला (Iconography)शिवलिंग की ऊँचाई और चौड़ाई का अनुपात (ताल मान) और मूर्तियों के आयुध (हथियार) एवं मुद्राएँ।

निष्कर्ष

सुप्रभेदागम भारतीय ज्ञान परंपरा का वह अनमोल रत्न है जो अध्यात्म और विज्ञान (वास्तुकला) के बीच सेतु का कार्य करता है। चाहे आप एक इतिहासकार हों, एक वास्तुकार हों या शिव के अनन्य भक्त, इस ग्रंथ का अध्ययन जीवन और ब्रह्मांड के प्रति एक नई दृष्टि प्रदान करता है। हमें अपनी प्राचीन विरासत को सहेजना चाहिए और उसके महत्व को आधुनिक संदर्भों में भी समझना चाहिए।

👉 डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक पुस्तकें-

ग्रंथ परिचय

नटराज शिव के तांडव में छिपा हिन्दू दर्शन और ब्रह्मांड विज्ञान

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नटराज शिव - www.bharatkaitihas.com
नटराज शिव के तांडव में छिपा हिन्दू दर्शन और ब्रह्मांड विज्ञान

नटराज का शाब्दिक अर्थ है— नृत्य का राजा। यह शिव का वह अद्वितीय रूप है जिसमें वे नृत्य के माध्यम से सृष्टि के सृजन, पालन और संहार की शाश्वत प्रक्रिया को व्यक्त करते हैं। यह रूप भारतीय दर्शन, कला और संस्कृति में ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक है।

नटराज शिव के तांडव में छिपा दर्शन और ब्रह्मांड विज्ञान

परिचय

भारतीय संस्कृति में नटराज का स्वरूप केवल एक मूर्ति या प्रतिमा नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांडीय सत्य और जीवन की गति का प्रतीक है। भगवान शिव का यह रूप दर्शाता है कि सम्पूर्ण सृष्टि एक निरंतर नृत्य है, जिसमें जन्म, पालन और विनाश की प्रक्रियाएँ एक साथ चलती रहती हैं।

भगवान शिव का यह स्वरूप उनके ‘आनंद तांडव’ को दर्शाता है, जिसमें सृष्टि का निर्माण, पालन और संहार समाहित है। यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा, जीवन चक्र और मोक्ष  का जीवंत प्रतीक है।

नटराज का दार्शनिक महत्व

  • सृष्टि का नृत्य: शिव का नटराज रूप यह स्पष्ट करता है कि ब्रह्मांड की रचना और उसका संचालन किसी स्थिर प्रक्रिया से नहीं, बल्कि निरंतर गति और कंपन से होता है।
  • तांडव के दो रूप:
    • रौद्र तांडव – विनाश और प्रलय का प्रतीक।
    • आनंद तांडव – आनंद, सृजन और जीवन की निरंतरता का प्रतीक।
  • वैज्ञानिक दृष्टि: आधुनिक भौतिकविज्ञानी भी मानते हैं कि ब्रह्मांड की गति और ऊर्जा को नृत्य के रूप में समझा जा सकता है। इसीलिए नटराज का नृत्य “कॉस्मिक डांस” कहलाता है।

नटराज स्वरूप के प्रमुख प्रतीक और उनके अर्थ

नटराज की प्रतिमा के हर अंग और मुद्रा के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा है-

1. अग्नि का घेरा (प्रभा मंडल)

नटराज के चारों ओर जो ज्वालाओं का घेरा है, वह ब्रह्मांड का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि पूरा संसार ऊर्जा और अग्नि से व्याप्त है और समय के चक्र में निरंतर परिवर्तनशील है।

2. डमरू (सृष्टि का आरंभ)

शिव के ऊपरी दाहिने हाथ में डमरू है। डमरू की ध्वनि ‘नाद’ (ब्रह्मांडीय कंपन) का प्रतीक है। माना जाता है कि इसी ध्वनि से क्वाण्टम उत्पन्न होते हैं जिनसे सृष्टि की रचना हुई है। यह समय (Time) के प्रवाह को भी दर्शाता है।

3. अग्नि (विनाश की शक्ति)

ऊपरी बाएं हाथ में अग्नि की लपटें हैं। यदि डमरू निर्माण का प्रतीक है, तो अग्नि विनाश का। यह सिखाता है कि जो जन्मा है, उसका अंत निश्चित है ताकि नई रचना हो सके।

4. अभय मुद्रा (संरक्षण)

दूसरा दाहिना हाथ ‘अभय मुद्रा’ में है, जो भक्तों को भय से मुक्ति, सुरक्षा और शांति का आश्वासन देता है। यह संदेश देता है कि धर्म के मार्ग पर चलने वालों को डरने की आवश्यकता नहीं।

5. अपस्मार पुरुष (अज्ञानता का अंत)

नटराज जिस बौने राक्षस के ऊपर नृत्य कर रहे हैं, उसका नाम अपस्मार’ है। यह अज्ञानता, अहंकार और विस्मृति का प्रतीक है। शिव का उस पर पैर रखना दर्शाता है कि ज्ञान और सचेत अवस्था के माध्यम से ही हम अपनी बुराइयों पर विजय पा सकते हैं।

6. उठा हुआ पैर (मुक्ति का मार्ग)

शिव का उठा हुआ बायां पैर मोक्ष’ या मुक्ति का प्रतीक है। उनकी ओर इशारा करता हुआ हाथ (गजहस्त मुद्रा) यह बताता है कि भगवान के चरणों में ही परम शांति और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति संभव है।

7. नृत्य की मुद्रा

जीवन की गति, संतुलन और लय।

पंचकृत्य: नटराज के नृत्य के पांच कार्य

नटराज का नृत्य ब्रह्मांड की पांच महत्वपूर्ण गतिविधियों को दर्शाता है, जिन्हें पंचकृत्य’ कहा जाता है:

  1. सृष्टि (Creation): डमरू के माध्यम से नवीन ऊर्जा का संचार।
  2. स्थिति (Preservation): अभय मुद्रा के माध्यम से संतुलन बनाए रखना।
  3. संहार (Destruction): अग्नि के माध्यम से पुरानी चीजों का अंत।
  4. तिरोभाव (Illusion): संसार की माया, जिसमें जीव उलझा रहता है।
  5. अनुग्रह (Grace/Liberation): उठा हुआ पैर, जो भक्त पर कृपा और मुक्ति का प्रतीक है।

नटराज और जीवन दर्शन

नटराज का नृत्य हमें यह सिखाता है कि:

  • जीवन स्थिर नहीं है, बल्कि निरंतर परिवर्तनशील है।
  • सृजन और विनाश दोनों ही आवश्यक हैं।
  • अज्ञान का अंत करके ही आनंद और मुक्ति प्राप्त होती है।

कला और आध्यात्मिकता का संगम ही जीवन को पूर्णता देता है।

सांस्कृतिक और कलात्मक महत्व

  • भारतीय शास्त्रीय नृत्य: नटराज का स्वरूप भरतनाट्यम और अन्य नृत्य शैलियों में प्रेरणा का स्रोत है।
  • मंदिरों में प्रतिष्ठा: चिदंबरम का नटराज मंदिर विश्व प्रसिद्ध है, जहाँ शिव को ब्रह्मांडीय नर्तक के रूप में पूजा जाता है।
  • आधुनिक संदर्भ: हाल ही में भारत मंडपम (G-20 शिखर सम्मेलन) में 27 फुट ऊँची नटराज प्रतिमा स्थापित की गई, जो भारतीय कला और दर्शन की वैश्विक पहचान बनी।

नटराज और आधुनिक विज्ञान (CERN का संबंध)

दिलचस्प बात यह है कि नटराज की अवधारणा केवल धर्म तक सीमित नहीं है। आधुनिक भौतिकी (Physics) में क्वांटम फील्ड थ्योरी’ और कणों के कंपन की तुलना शिव के नृत्य से की गई है।

प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी फ्रिटजॉफ कैपरा ने अपनी पुस्तक द ताओ ऑफ फिजिक्स में लिखा है कि उप-परमाणु कणों (Sub-atomic particles) का निरंतर होने वाला नृत्य नटराज के नृत्य जैसा ही है। यही कारण है कि जिनेवा स्थित दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशाला CERN के बाहर नटराज की एक विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है।

निष्कर्ष

नटराज की मूल अवधारणा यह है कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक नृत्य है, जिसमें शिव स्वयं नर्तक हैं। उनका नृत्य हमें जीवन की गति, संतुलन और शाश्वत सत्य का बोध कराता है। यह रूप भारतीय संस्कृति का अनमोल रत्न है, जो कला, दर्शन और विज्ञान तीनों को जोड़ता है। नटराज की प्रतिमा हमें यह सिखाती है कि जीवन गतिमान है। निर्माण और विनाश एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब हम अपने भीतर के अहंकार (अपस्मार) को दबाकर ज्ञान की ज्योति जलाते हैं, तभी हम उस आनंद तांडव का अनुभव कर सकते हैं।

इस प्रकार नटराज की अवधारणाकला, दर्शन और विज्ञान का एक अनूठा समन्वयन है जो सदियों से मानवता को प्रेरित करता आ रहा है।

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ग्रंथ परिचय

कामिकागम (Kamikagama): शैव दर्शन और मंदिर वास्तुकला का आधार स्तंभ

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कामिकागम

कामिकागम ग्रंथ शैवसिद्धान्त परंपरा का एक प्रमुख संस्कृत ग्रंथ है, जिसमें मंदिर निर्माण, पूजा-विधि और तांत्रिक अनुष्ठानों का विस्तृत वर्णन मिलता है।

शैव दर्शन और मंदिर वास्तुकला का आधार स्तंभ कामिकागम

कामिकागम शैव आगम साहित्य के 28 मुख्य ग्रंथों (किरण, कारण, कामिक आदि) में सबसे महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित माना जाता है। यह ‘शैव सिद्धांत’ परंपरा का मूल ग्रंथ है, जो न केवल आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है, बल्कि दक्षिण भारतीय मंदिरों की वास्तुकला, अनुष्ठानों और मूर्तिशिल्प का संविधान भी है।

परिचय

भारतीय धार्मिक साहित्य में आगम ग्रंथों  का विशेष स्थान है। इनमें से कामिकागम ग्रंथ (Kamikagama Granth) शैवसिद्धान्त परंपरा का एक महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथ है। इसे कामिकातन्त्र  भी कहा जाता है। विद्वानों के अनुसार यह ग्रंथ लगभग 12वीं शताब्दी में लिखा गया। इसमें मंदिर निर्माण, पूजा-पद्धति, अनुष्ठान और तांत्रिक विधियों का विस्तृत वर्णन मिलता है।

कामिकागम की संरचना और वर्गीकरण

इस ग्रंथ में कुल 75 अध्याय हैं। पूर्वभाग में मंदिर निर्माण, मूर्ति-स्थापना, स्नान, अर्चन, नैवेद्य, अग्निकार्य, वास्तु-नियम आदि का वर्णन है। उत्तरभाग में तांत्रिक साधनाओं और गूढ़ विधियों का विवरण मिलता है।

कामिकागम को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया गया है:

  1. पूर्व भाग (Purva Pada): इसमें मंदिर निर्माण, भूमि चयन, वास्तु शास्त्र और लिंग स्थापना जैसे विषयों का विस्तार से वर्णन है।
  2. उत्तर भाग (Uttara Pada): इसमें दैनिक पूजा (नित्य नैमित्तिक), उत्सव, प्रायश्चित विधान और विसर्जन की प्रक्रियाओं का उल्लेख है।

इस ग्रंथ को चर्या’ (आचरण) और क्रिया’ (कर्मकांड) के दृष्टिकोण से अत्यंत समृद्ध माना जाता है।

कामिकागम की विषय-वस्तु

यद्यपि कामिकागम ग्रंथ का मुख्य उद्देश्य शिवभक्ति को व्यवस्थित रूप देना है तथापि यह  केवल एक धार्मिक पुस्तक नहीं है, अपितु धर्म, विज्ञान और कला का संगम है। इस ग्रंथ में निम्नलिखित विषयों को समाहित किया गया है-

  • मंदिर निर्माण के नियम: भूमि परीक्षण, वास्तु-निर्धारण, शिल्प और स्थापत्य की विधियाँ।
  • पूजा-विधि: स्नान, अर्चन, नैवेद्य, दीपदान और यज्ञ की प्रक्रिया।
  • अनुष्ठान: अग्निकार्य, बलि, ग्राम-पूजन और देवताओं की स्थापना।
  • तांत्रिक साधना: मंत्रोच्चारण, ध्यान और योग की विधियाँ।

1. मंदिर वास्तुकला और शिल्पशास्त्र (Vastu & Architecture)

कामिकागम में मंदिर निर्माण के लिए भूमि के परीक्षण से लेकर ‘शिखर’ निर्माण तक के सूक्ष्म नियम दिए गए हैं। इसमें गर्भगृह की माप, स्तंभों की संख्या और द्वारों की दिशा का वैज्ञानिक विवरण मिलता है। आज भी दक्षिण भारत के अधिकांश मंदिरों (जैसे चिदंबरम और मदुरै) में इसी आगम के नियमों का पालन किया जाता है।

2. प्रतिमा लक्षण (Iconography)

भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों, जैसे नटराज, दक्षिणामूर्ति और सोमस्कंद की मूर्तियों को बनाने के सटीक नियम और अनुपात (ताल मान) कामिकागम में वर्णित हैं। यह मूर्तिकारों के लिए एक अनिवार्य मार्गदर्शिका है।

3. आध्यात्मिक दर्शन (Shaiva Siddhanta Philosophy)

यद्यपि यह क्रिया प्रधान है, लेकिन इसमें ‘पति-पशु-पाश’ का दर्शन अंतर्निहित है।

  • पति: परमेश्वर शिव।
  • पशु: जीवात्मा।
  • पाश: बंधन (माया, कर्म और आणव मल)।

कामिकागम के अनुसार, अनुष्ठानों और भक्ति के माध्यम से इन बंधनों को काटकर शिवत्व प्राप्त किया जा सकता है।

4. अनुष्ठान और उत्सव (Rituals and Festivals)

अभिषेक, षोडशोपचार पूजा और वार्षिक ब्रह्मोत्सव का जैसा वर्णन कामिकागम में है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। इसमें मंत्रों के शुद्ध उच्चारण और मुद्रा (हाथों के संकेत) के महत्व पर बल दिया गया है।

कामिकागम का धार्मिक महत्व

कामिकागम ग्रंथ शैवसिद्धान्त सम्प्रदाय का आधारभूत ग्रंथ माना जाता है। यह न केवल धार्मिक अनुष्ठानों का मार्गदर्शन करता है, बल्कि मंदिर संस्कृति को भी व्यवस्थित करता है। दक्षिण भारत के कई मंदिरों में आज भी पूजा-पद्धति इसी ग्रंथ के अनुसार होती है।

सांस्कृतिक योगदान

  • शिल्पकला और वास्तुशास्त्र: मंदिर निर्माण की शैलियाँ आज भी वास्तुशास्त्र के अध्ययन में उपयोगी हैं।
  • संगीत और नृत्य: पूजा-विधियों में संगीत और नृत्य का उल्लेख मिलता है, जो भारतीय कला परंपरा को समृद्ध करता है।
  • समाज और धर्म: यह ग्रंथ समाज में धार्मिक अनुशासन और सांस्कृतिक एकता स्थापित करने में सहायक रहा।
कामिकागमविवरण
मूल भाषासंस्कृत
शाखाशैव सिद्धांत
प्रकार२८ मूल आगमों में प्रथम
मुख्य देवताभगवान शिव

कामिकागम की प्रासंगिकता

डिजिटल युग में, भारतीय विरासत और शैव आगम के प्रति जिज्ञासा बढ़ी है। कामिकागम न केवल शोधकर्ताओं के लिए बल्कि वास्तुकला के छात्रों के लिए भी एक अमूल्य संसाधन है। यह ग्रंथ यह सिद्ध करता है कि प्राचीन भारत में धर्म और विज्ञान (Engineering & Aesthetics) एक दूसरे के पूरक थे।

निष्कर्ष

कामिकागम भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर है जिसने सदियों से मंदिरों को जीवंत बनाए रखा है। इसमें मंदिर निर्माण से लेकर पूजा-विधि और तांत्रिक साधना तक का विस्तृत विवरण मिलता है। यह ग्रंथ न केवल शैवसिद्धान्त सम्प्रदाय का मार्गदर्शक है, बल्कि भारतीय संस्कृति और कला का भी महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह हमें सिखाता है कि बाह्य अनुष्ठान और आंतरिक शुद्धि दोनों ही मोक्ष के मार्ग हैं। दक्षिण भारतीय मंदिरों की दिव्यता को समझने के लिए कामिकागम का अध्ययन अनिवार्य है। आज के समय में जब हम भारतीय परंपराओं को पुनः समझने का प्रयास कर रहे हैं, कामिकागम ग्रंथ हमें हमारी जड़ों से जोड़ने का कार्य करता है।

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ग्रंथ परिचय

समरांगण सूत्रधार – भारतीय स्थापत्य कला का विश्वकोश

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राजा भोज द्वारा निर्मित धार का मंदिर

समरांगण सूत्रधार (Samrangana Sutradhara) राजा भोज (Raja Bhoj) द्वारा रचित 11वीं शताब्दी का अद्वितीय ग्रंथ है। इसमें भारतीय स्थापत्य कला (Indian architecture) मंदिर निर्माण (Temple construction) , नगर नियोजन (Town planning), मूर्तिकला (Sculpture) और प्राचीन यंत्रविद्या (Ancient engineering) के गहन सिद्धांत मिलते हैं।

राजा भोज द्वारा रचित स्थापत्य ग्रंथ – समरांगण सूत्रधार

समरांगण सूत्रधार का परिचय

समरांगण सूत्रधार (Samarangana Sutradhara) 11वीं शताब्दी (ई.1000–1055) का एक महत्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथ है, जिसे परमार वंश के महान राजा भोज ने रचा था। यह ग्रंथ भारतीय वास्तुशास्त्र और स्थापत्य कला का विश्वकोश माना जाता है। इसमें न केवल मंदिर निर्माण के नियम बताए गए हैं, बल्कि मूर्तिकला, नगर नियोजन और यंत्रविद्या तक का विस्तृत वर्णन मिलता है।

समरांगण सूत्रधार को भारतीय स्थापत्य कला का विश्वकोश (Encyclopedia of Indian architecture) कहा जाता है।यह ग्रंथ न सिर्फ प्राचीन भारतीय स्थापत्य की उन्नत समझ को दिखाता है, बल्कि आधुनिक वास्तु-विचार के लिए भी समृद्ध स्रोत है।

समरांगण सूत्रधार की संरचना

समरांगण सूत्रधार ज्ञानकोशीय ग्रंथ है, इसमें कुल 83 अध्याय हैं, जिनमें नगर-योजना, भवन-शिल्प, मंदिर-निर्माण, मूर्तिकला, मुद्राएँ और यंत्र-विधानों का विस्तार से वर्णन मिलता है। यह ग्रंथ दिखाता है कि प्राचीन भारत की वास्तु परंपरा कितनी व्यवस्थित, वैज्ञानिक और अनुभव-समृद्ध थी।

  • इसमें लगभग 7,430 श्लोक और 83 अध्याय हैं।
  • ग्रंथ का सबसे पूर्ण संस्करण 15वीं शताब्दी में संकलित हुआ।

समरांगण सूत्रधार की विषय-वस्तु

  • इस ग्रंथ में वर्णित सिद्धांत वास्तुशास्त्र की शास्त्रीय नींव को मजबूत करते हैं, जैसे भूमि-परीक्षा, माप-प्रणाली (हस्तादि एकक), दिशा-संतुलन और ऊर्जा प्रवाह की अवधारणा। राजा भोज नगर-योजना में जल-स्रोत, जलवायु, संसाधन और सुरक्षा जैसे व्यावहारिक पक्षों पर ज़ोर देते हैं, जो आधुनिक शहरी नियोजन की सोच से भी मेल खाते हैं।
  • समरांगण सूत्रधार को भारतीय स्थापत्य परंपरा का एक मार्गदर्शक ग्रंथ माना जाता है शोध संस्थान और वास्तु-विशेषज्ञ आज भी इस ग्रंथ का अध्ययन करते हैं।
  • इस ग्रंथ का बड़ा भाग नगरों और भवनों की योजना पर केंद्रित है, जिसमें भूमि-चयन, दिशाओं का महत्व, सड़कों की रूपरेखा, दुर्ग-निर्माण और महलों की संरचना जैसे विषय आते हैं। छोटे आलय (घर) से लेकर महालय (महल) और मंदिर तक, कैसे बनाए जाएँ, उनके अनुपात, माप और सौंदर्य-मानकों को सूक्ष्मता से बताया गया है।

स्थापत्य और वास्तुशास्त्र

समरांगण सूत्रधार में मंदिर निर्माण की विधियाँ, भूमि चयन, दिशा-निर्धारण और मूर्तियों की स्थापना के नियम दिए गए हैं।

  • मंदिर वास्तु: गर्भगृह, मंडप, शिखर और तोरण की संरचना का विस्तृत वर्णन।
  • नगर नियोजन: सड़कों, चौक, जलस्रोत और आवासीय क्षेत्रों की योजना।
  • मूर्तिकला: देव प्रतिमाओं के अनुपात और सौंदर्यशास्त्र।

यंत्रविद्या और तकनीक

समरांगण सूत्रधार में यंत्रों और स्वचालित मशीनों का भी उल्लेख है। भोज ने उड़ने वाले यंत्रों, यांत्रिक दरवाजों और स्वचालित मूर्तियों का वर्णन किया है। यह दर्शाता है कि भारतीय सभ्यता में तकनीकी कल्पनाएँ कितनी उन्नत थीं। यन्त्रविधान अध्याय में विभिन्न यंत्रों और मशीनों का उल्लेख मिलता है, जिससे यह ग्रंथ तकनीकी दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है और भोज की वैज्ञानिक दृष्टि को दर्शाता है।

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व

  • समरांगण सूत्रधार भारतीय वास्तु परंपरा का प्रमाण है।
  • यह ग्रंथ दर्शाता है कि भारतीय स्थापत्य केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टि से भी विकसित था।
  • राजा भोज को “भारतीय स्थापत्य पुनर्जागरण का अग्रदूत” कहा जाता है और यह ग्रंथ उनकी बहुआयामी प्रतिभा का साक्ष्य है।

आधुनिक संदर्भ में प्रासंगिकता

आज सम्पूर्ण विश्व में पर्यावरण के खतरों को देखते हुए सतत विकास के साथ-साथ पर्यावरण-संतुलन और सांस्कृतिक वास्तु की चर्चा बढ़ रही है। समरांगण सूत्रधार के सिद्धांत इस दिशा में महत्वपूर्ण दृष्टि प्रदान करते हैं। मिश्रित उपयोग वाली बसाहट, पैदल चलने योग्य नगर और प्रकृति के अनुकूल निर्माण जैसे विचार इस ग्रंथ में प्राचीन रूप से मौजूद हैं। इसी कारण यह ग्रंथ परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सेतु की तरह भारतीय ज्ञान-परंपरा की समृद्धि को सामने लाता है।

निष्कर्ष

समरांगण सूत्रधार केवल एक स्थापत्य ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, विज्ञान और कला का अद्वितीय संगम है। राजा भोज ने इस ग्रंथ के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों को वास्तु और तकनीकी ज्ञान का अमूल्य भंडार दिया। आज भी यह ग्रंथ भारतीय स्थापत्य और वास्तुशास्त्र के अध्ययन में मार्गदर्शक है।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक पुस्तकें-

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