Sunday, August 31, 2025
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उत्तर वैदिक साहित्य

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उत्तर वैदिक साहित्य

उत्तर वैदिक साहित्य का अर्थ उन ग्रंथों से हैं जो वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों एवं उपनिषदों के बाद लिखे गए। इनमें सांख्य, योग आदि षड्दर्शन ग्रंथ, स्मृतियाँ पुराण, रामायण एवं महाभारत नामक महाकाव्य ग्रंथ आते हैं।

उत्तर वैदिक साहित्य का अर्थ उन ग्रंथों से हैं जो वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों एवं उपनिषदों के बाद लिखे गए। इनमें सांख्य, योग आदि षड्दर्शन ग्रंथ, स्मृतियाँ पुराण, रामायण एवं महाभारत नामक महाकाव्य ग्रंथ आते हैं। उत्तर वैदिक साहित्य का रचनाकाल कई शताब्दियों में विस्तृत है।

उत्तर वैदिक साहित्य – दर्शन ग्रन्थ

आर्यों ने अन्य कई महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की भी रचना की, जिनका विश्व संस्कृति पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। अनेक ऋषियों ने दर्शन-शास्त्र के ग्रंथों का निर्माण किया। प्रमुख भारतीय दर्शनों की संख्या छः है-

(1.) कपिल मुनि का सांख्य-दर्शन,

(2.) पतन्जलि का योग-दर्शन,

(3.)  कण्व का वैशेषिक दर्शन,

(4.) गौतम का न्याय-दर्शन,

(5.) जैमिनि का पूर्व मीमांसा दर्शन तथा

(6.) बादरायण का उत्तर-मीमांसा दर्शन।

हिन्दू-धर्म के अध्यात्मवाद का भवन षडदर्शन के इन्हीं छः स्तम्भों पर खड़ा है।

महाकाव्य

महाकाव्यों की रचना ई.पू.800 से ई.पू. 400 के बीच हुई। महाकाव्यों का आशय संस्कृत भाषा में लिखे दो महाकाव्यों से है-

(1.) रामायण- इस ग्रंथ की रचना महर्षि वाल्मिीकि ने की।

(2.) महाभारत- इस ग्रंथ की रचना महर्षि वेदव्यास ने की। महाभारत का एक अंश गीता कहलाता है जिसमें निष्काम कर्म करने का उपदेश दिया गया है। रामायण एवं महाभारत का हिन्दू-समाज पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा है। धर्मशास्त्रों तथा पुराणों का भी भारतीय समाज पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा है।

स्मृतियाँ

आर्यों ने स्मृतियों की भी रचना की। स्मृतियों में मनु स्मृति, याज्ञवलक्य स्मृति तथा नारद स्मृति प्रमुख हैं। मनुस्मृति की रचना शुंगकाल में ई.पू.200 से ई.पू.100 के बीच होनी अनुमानित है। याज्ञवलक्य स्मृति की रचना ईस्वी 100 से ईस्वी 300 के बीच होनी अनुमानित है। नारद स्मृति की रचना ई.100 से ई.400 के बीच होनी अनुमानित है। ई.400 से ई.600 की अवधि में कात्यायन स्मृति एवं वृहस्पति स्मृति की भी रचना हुई। ये दोनों ही स्मृतियां अब तक अप्राप्य हैं। कुछ स्मृतियां, यथा- पराशर स्मृति, शंख स्मृति, देवल स्मृति का रचना काल ई.600 से ई.900 के बीच का माना जाता है।

पुराण

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प्रमुख पुराणों की संख्या 18 है जिनमें विष्णु-पुराण, शिव पुराण, स्कन्द पुराण तथा भागवत पुराण अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। वायु पुराण, विष्णु-पुराण, मार्कण्डेय पुराण, मत्स्य पुराण, कूर्म पुराण आदि प्रमुख पुराणों की रचना ई.300 से ई.600 के बीच हुई। अग्नि पुराण तथा गरुड़ पुराण की रचना ई.600 से ई.900 के बीच मानी जाती है। महाकाव्यों तथा पुराणों में वैदिक आदर्शों का प्रतिपादन किया गया है। अन्तर यह है कि महाकाव्यों में इसे मनुष्य के मुख से और पुराणों मे देवताओं के मुख से प्रतिपादित बताया गया है। 18 प्रमुख पुराणों के बाद 18 उप-पुराणों की रचना हुई। इनमें- आदि, आदित्य, बृहन्नारदीय, नन्दीश्वर, बृहन्नन्दीश्वर, साम्ब, क्रियायोगसार, कालिका, धर्म, विष्णुधर्मोत्तर, शिवधर्म, विष्णु धर्म, वामन, वारुण, नारसिंह, भार्गव और बृहद्धर्म पुराण सम्मिलित हैं। महापुराणों में वायु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, मार्कण्डेय पुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण और भागवत पुराण सबसे पुराने हैं और इनमें उस काल तक की ऐतिहासिक जानकारी है जब गुप्त सम्राटों का राज्य मगध से लेकर अयोध्या और प्रयाग तक विस्तृत था। भारतीय पुराण भारत के अति प्राचीन इहिास एवं वैदिक संस्कृति की जानकारी उपलब्ध करवाते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल लेख – उत्तर वैदिक सभ्यता एवं समाज

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था

उत्तरवैदिक समाज

उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म

उत्तरवैदिक साहित्य

त्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था

उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था

वेद

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वेद

वेद संसार के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं। आश्चर्य होता कि आज से 10 हजार साल पहले के युग में भी मानव ने इतनी उत्कृष्ट भाषा का विकास किया, इतनी उत्कृष्ट संस्कृति को जन्म दिया एवं इतने उत्कृष्ट साहित्य का सृजन किया!

वैदिक ग्रन्थों को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-

(1.) वेद अथवा संहिता (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद),

(2.) ब्राह्मण-ग्रंथ (ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद),

(3.) सूत्र (श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र और धर्म सूत्र)।

प्रथम दो अर्थात् संहिता तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों को श्रुति भी कहा गया है। श्रुति का अर्थ है जो सुना गया हो। प्राचीन आर्यों का विश्वास था कि संहिता और ब्राह्मण किसी मनुष्य की कृति नहीं थे। उनमें दिए गए उपदेशों को ऋषियों तथा मुनियों ने ब्रह्मा के मुख से सुना था। इसी से इन ग्रन्थों को श्रुति कहा जाता है।

इन ग्रन्थों में दिए गए उपदेश ब्रह्म-वाक्य हैं इसलिए वे सर्वथा सत्य हैं। उन पर संदेह नहीं किया जा सकता। संहिता तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों में जो उपदेश दिए गए हैं वे बहुत लम्बे हैं। अतः आर्य-विद्वानों ने जन-साधारण के लिए उपदेशों को संक्षेप में छोटे-छोटे वाक्यों में लिख दिया। इन्हीं रचनाओं को ‘सूत्र’ कहते हैं। सूत्र का अर्थ है- ‘संक्षेप में कहना।’ इन ग्रन्थों में बड़ी-बड़ी बातें संक्षेप में लिखी गई हैं इसलिए इन्हें सूत्र कहा गया।

(1.) वेद अथवा संहिता

वेद संस्कृत की विद् धातु से निकला है जिसका अर्थ है- जानना अथवा ज्ञान प्राप्त करना। वेद उन ग्रन्थों को कहते हैं जो ज्ञान की प्राप्ति के एकमात्र साधन समझे जाते थे। वेद-वाक्य ब्रह्म-वाक्य होने के कारण चिरन्तन सत्य थे और उनके अनुसार जीवन व्यतीत करने से इहलोक तथा परलोक दोनों ही सुधरता था। अर्थात् इस संसार में सुख की प्राप्ति होती थी और मृत्यु हो जाने पर मोक्ष मिलता था। वेदों का भारतीयों के जीवन में बहुत बड़ा महत्त्व है। वेद भारतीय धर्म और संस्कृति का शाश्वत और अक्षय कोष हैं।

 वेदों को संस्कृत-साहित्य की जननी कहा जाता है। सिन्धु-घाटी की सभ्यता भारत की प्राचीनतम सभ्यता थी तथा आर्य-सभ्यता का निर्माण वैदिक आर्यों द्वारा किया गया था। वेदों को हम भारतीय समाज का प्राण कह सकते हैं जिसके बिना वह जीवित नहीं रह सकता था। वेदों के उपरान्त जितने साहित्य लिखे गए उन सब का आधार वेद ही है। वेदों की संख्या चार है- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद। प्राचीन आर्यों द्वारा  केवल ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद की रचना की गई। इन्हें सम्मिलित रूप से ‘वेद-त्रयी’ अथवा ‘त्रयी’ कहा गया। अथर्ववेद बहुत बाद का है जो सबसे अन्त में लिखा गया।

प्रारम्भ में वेदों का पठन-पाठन मौखिक था। विभिन्न आश्रमों के ऋषि-मुनि अपने-अपने ढंग से इनका पाठ करते थे। इस कारण विभिन्न पाठ-परम्पराएँ चल पड़ीं। गुरु-शिष्य परम्परा एवं पिता-पुत्र परम्परा द्वारा ये मंत्र ऋषि कुलों में स्थिर रहते थे और श्रुति द्वारा शिष्य, गुरु से या पुत्र, पिता से जानता था। इस कारण  उन्हें श्रुति भी कहा जाता था।

 विविध ऋषिकुलों में जो विविध सूक्त, श्रुति द्वारा चले आते थे, धीरे-धीरे उन्हें संकलित किया जाने लगा। इस महत्त्वपूर्ण कार्य का प्रधान श्रेय महाभारत कलीन महर्षि वेदव्यास को है। उन्होंने वैदिक सूक्तों को एकत्रित करके ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्वेद को संहिता बद्ध किया। जब वेदों को लिखित रूप में संहिताबद्ध कर दिया गया तब इन्हें ‘संहिता’ कहा जाने लगा। संहिता का अर्थ होता है- संग्रह। चूँकि इन ग्रन्थों में मन्त्रों का संग्रह है, इसलिए इन्हें संहिता कहा गया।

(1.) ऋग्वेद

यह दो शब्दों से मिलकर बना है- ऋक् तथा वेद। ऋक् का अर्थ होता है स्तुति-मन्त्र। स्तुति-मन्त्र को ऋचा भी कहते हैं। जिस वेद में स्तुति मन्त्रों अर्थात् ऋचाओं का संग्रह किया गया है उसे ऋग्वेद कहते हैं। सूर्य, वायु, अग्नि आदि ऋग्वेद के प्रधान देवता हैं। इसलिए ये ऋचाएँ इन्हीं देवताओं की स्तुति में लिखी गयीं। ऋचाओं का संग्रह किसी एक ऋषि ने नहीं किया। वरन् वे विभिन्न ऋषियों द्वारा विभिन्न समय में संकलित की गईं। ऋग्वेद दस मण्डलों अथवा भागों में विभक्त है।

प्रत्येक मण्डल कई अनुवाकों में विभक्त है। अनुवाक् का अर्थ होता है जो बाद में कहा गया है। चूँकि इनका स्थान मण्डल के बाद है, इसलिए इन्हें अनुवाक् कहा गया है। प्रत्येक अनुवाक् कई सूक्तों में विभक्त है। सूक्त का अर्थ होता है अच्छी उक्ति अर्थात् जो अच्छी प्रकार कहा गया हो। ऋग्वेद में 10 मण्डल हैं जिनमें 1028 सूक्त हैं। प्रत्येक सूक्त कई ऋचाओं अर्थात् स्तुति-मन्त्रों में विभक्त है, ऋचाओं की कुल संख्या 10,580 है।

प्रत्येक सूक्त के साथ किसी ऋषि और देवता का नाम भी मिलता है। वस्तुतः ऋषि ही उस सूक्त का रचयिता होता था। इस प्रकार के ऋषियों में गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भारद्धाज और वशिष्ठ के नाम उल्लेखनीय हैं। मंत्र रचयिता ऋषियों में कुछ स्त्रियों के नाम भी हैं जिनमें लोपामुद्रा, घोषा, शची, पौलोमी और काक्षवृति के नाम उल्लेखनीय हैं। पहले, नौवें तथा दसवें मण्डल के प्रत्येक सूक्त के रचनाकार अलग-अलग ऋषि हैं। सम्भवतः ये ऋषि वैदिक सूक्तों के मूल लेखकों के पुराण पुरुष हैं।

नौवें मण्डल के सूक्त केवल सोम से सम्बद्ध हैं। कहीं-कहीं मण्डल के स्थान पर अष्टक शब्द का प्रयोग हुआ है। ऋग्वेद के अधिकांश सूक्त देव-स्तुति और प्रार्थना रूप में हैं तथा यज्ञ और कर्मकाण्ड प्रधान हैं। यज्ञों में सुगन्धित सामग्री की आहुति देकर आर्य ऋषि, देवताओं से लम्बी आयु, पुत्र-पौत्र और धन-धान्य की प्राप्ति तथा शत्रुओं का विनाश करने की प्रार्थना करते थे।

ऋग्वेद आर्यों का प्राचीनतम ग्रन्थ है। इसकी रचना सम्भवतः 4,000 ई.पू. से 2,500 ई.पू. तक के काल में हुई थी। यद्यपि ऋग्वेद स्तुति-मन्त्रों का संग्रह है जिनका प्रधानतः धार्मिक तथा आध्यात्मिक महत्त्व है तथापि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी इसका बहुत बड़ा महत्त्व है क्योंकि इस काल का इतिहास जानने के लिए यही ग्रन्थ एकमात्र साधन है। कुछ मन्त्रों से आर्यों के पारस्परिक तथा अनार्यों से किए गए युद्धों का पता लगता है। यह भारत ही नही, वरन् विश्व का सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ है। इसकी प्राचीनता के कारण ही भारत का मस्तक विश्व की समस्त संस्कृतियों में सबसे ऊँचा है। इसकी रचना सप्त-सिन्धु क्षेत्र में हुई।

मैक्समूलर ने लिखा है- ‘विश्व के इतिहास में वेद उस रिक्त स्थान की पूर्ति करता है जिसे किसी भी भाषा का कोई भी साहित्यिक ग्रन्थ नहीं भर सकता। यह हमें अतीत के उस काल में पहुँचा देता है जिसका कहीं अन्यत्र उल्लेख नहीं मिलता और उस पीढ़ी के लोगों के वास्तविक शब्दों से परिचित करा देता है जिसका हम इसके अभाव में केवल धुधंला ही मूल्यांकन कर सकते थे।’

(2.) यजुर्वेद

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यह दो शब्दों से मिलकर बना है- यजुः तथा वेद। यज् शब्द का अर्थ होता है यजन करना। यजुः उन मन्त्रों को कहते थे जिसके द्वारा यजन अथवा पूजन किया जाता था अर्थात् यज्ञ किए जाते थे। इसलिए यजुर्वेद उस वेद को कहते हैं जिसमें यज्ञों का विधान है। मूलतः यह कर्म-काण्ड प्रधान ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में बलि की प्रथा, उसकी महत्ता तथा विधियों का वर्णन है। यजुर्वेद में सूक्तों के साथ-साथ अनुष्ठान भी हैं जिन्हें सस्वर पाठ करते जाने का विधान है। ये अनुष्ठान अपने समय की उन सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों के परिचायक हैं जिनमें इनका उद्गम हुआ था। यह ग्रन्थ दो भागों में विभक्त है। पहला भाग शुक्ल यजुर्वेद कहलाता है जो स्वतन्त्र रूप से लिखा गया है और दूसरा भाग कृष्ण यजुर्वेद कहलाता है जिसमें पूर्व साहित्य का संकलन है। शुक्ल यजुर्वेद को ‘वाजसनेयी संहिता’ भी कहते है। पाठ भेद के कारण इसकी दो शाखाएँ है- ‘कृण्व’ और ‘माध्यन्दनीय’। कृष्ण यजुर्वेद की चार शाखाओं का उल्लेख मिलता है- काठक संहिता, कपिष्ठक संहिता, मैत्रेयी संहिता और तैतिरीय संहिता। इन सब में शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। इसमें चालीस अध्याय हैं जिनमें से प्रत्येक का सम्बन्ध किसी न किसी याज्ञिक अनुष्ठान से है। अन्तिम अध्याय ‘इशोपनिषद’ है जिसका सम्बन्ध याज्ञिक अनुष्ठान से न होकर अध्यात्म चिन्तन से है।

यजुर्वेद की रचना कुरुक्षेत्र में हुए थी। इस वेद की ऐतिहासिक उपयोगिता भी है। इसमें आर्यों के सामाजिक तथा धार्मिक जीवन की झांकी मिलती है। इस वेद से ज्ञात होता है कि अब आर्य, सप्त-सिन्धु से कुरुक्षेत्र में चले आए थे तथा अब प्रकृति-पूजा की उपेक्षा होने लगी थी और वर्ण-व्यवस्था का प्रादुर्भाव हो गया था। इस प्रकार यजुर्वेद, ऋग्वैदिक-काल के बाद, आर्यों के जीवन में आए परिवर्तनों को भी प्रकट करता है।

(3.) सामवेद

साम के दो अर्थ होते हैं- शान्ति तथा गीत। यहाँ पर साम का अर्थ है गीत। इसलिए सामवेद का अर्थ हुआ वह वेद जिसके पद गेय हैं और जो संगीतमय हैं। सामवेद में केवल 66 मन्त्र नए हैं। शेष मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं। सामवेद के मन्त्र गेय होने के कारण मन को शान्ति देते हैं। यज्ञादि अवसरों पर इन मन्त्रों का पाठ किया जाता है। पाठ-भेद के कारण इसकी तीन  शाखाएँ हैं- कौथुम शाखा, राणायीनय शाखा और जैमिनीय शाखा।

(4.) अथर्ववेद

‘अथ’ का अर्थ होता है मंगल अथवा कल्याण, अथर्व का अर्थ होता है अग्नि और अथर्वन् का अर्थ होता है पुजारी। इसलिए अथर्ववेद उस वेद को कहते है जिसमें पुजारी मन्त्रों तथा अग्नि की सहायता से भूत-पिशाचों से रक्षा कर मनुष्य का मंगल अथवा कल्याण करते हैं। इसकी रचना प्रथम तीन वेदों की रचना के बहुत बाद में हुई। अथर्ववेद की दो शाखाएँ मिलती हैं- शौनक और पिप्लाद। इसमें चालीस अध्याय हैं और इसका सम्बन्ध मुख्यतः आर्यों के घरेलू जीवन से है।

 अथर्ववेद में बहुत से प्रेतों तथा पिशाचों का उल्लेख है जिनसे बचने के लिए मन्त्र दिए गए हैं। विपत्तियों और व्याधियों के निवारण के लिए भी मंत्र-तंत्र दिए गए हैं। ये मन्त्र जादू-टोने की सहायता से मनुष्य की रक्षा करते हैं। इस ग्रन्थ में कुछ मन्त्र ऋग्वेद के हैं और कुछ सामवेद के। यह आर्यों के पारिवारिक, सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन पर प्रकाश डालता है तथा इसमें आर्येतर लोगों के विश्वासों तथा प्रथाओं की भी जानकारी मिलती है।

(2.) ब्राह्मण ग्रंथ

ब्राह्मण, ‘ब्रह्म’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ होता है वेद। इसलिए ब्राह्मण उन ग्रन्थों को कहते है जिनमें वैदिक मन्त्रों की व्याख्या की गई है। इनमें यज्ञों के स्वरूप तथा उनकी विधियों का वर्णन किया गया है। चूँकि यज्ञ करने तथा कराने का कार्य पुरोहित करते थे जो ब्राह्मण होते थे, इसलिए केवल ब्राह्मणों से संबंधित होने के कारण इन ग्रन्थों का नाम ब्राह्मण रखा गया। ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना ‘ब्रह्मर्षि देश’ में हुई थी।

ब्राह्मण ग्रन्थों के दो भाग हैं- (1.) विधि और (2.) अर्थनाद अर्थात् आख्यानों, पुराणों और इतिहास द्वारा नियमों के अर्थ की व्याख्या।

प्रत्येक वेद के अपने-अपने ब्राह्मण हैं। ऋग्वेद के कौषितकी या सांख्यायान और ऐतरेय ब्राह्मण हैं। कृष्ण यजुर्वेद का तैतिरीय ब्राह्मण तथा शुक्ल यजुर्वेद का शतपथ ब्राह्मण है। शतपथ ब्राह्मण एक विशाल ग्रन्थ है जिसमें एक सौ अध्याय हैं। इसके रचयिता याज्ञवल्क्य ऋषि हैं। इस ग्रंथ में याज्ञिक अनुष्ठानों का विस्तार से वर्णन है तथा विविध अनुष्ठानों के प्रयोजनों पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है।

सामवेद के तीन ब्राह्मण हैं- ताण्ड्य ब्राह्मण, षडविश ब्राह्मण और जैमिनीय ब्राह्मण। सामवेद के छान्दोग्य के मंत्र ब्राह्मण एवं सामविधान ब्राह्मण हैं। अर्थवेद का गोपथ ब्राह्मण है।

यद्यपि ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना याज्ञिकों के पथ-प्रदर्शन के लिए की गई थी तथापि इनसे आर्यों के सामाजिक, धार्मिक तथा राजनीतिक जीवन पर भी पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। ब्राह्मण-ग्रन्थों की रचना प्रधानतः गद्य में की गई है परन्तु कहीं-कहीं पद्य भी विरल रूप से मिलते हैं। इनकी भाषा परिष्कृत तथा उच्च कोटि की है।

आरण्यक तथा उपनिषद् भी ब्राह्मण-ग्रन्थों के अन्तर्गत आते हैं। ब्राह्मणों के परिशिष्ट ‘आरण्यक’ कहलाते हैं और उनके अन्तिम भाग ‘उपनिषद’ हैं।

आरण्यक

आरण्यक उन ग्रन्थों को कहते हैं जिनकी-रचना ‘अरण्यों’ अर्थात् ‘जंगलों’ के शान्त वातावरण में हुई और जिनका अध्ययन-चिन्तन भी जंगलों में एकान्तवास में किया जाना चाहिए। ये ग्रन्थ वानप्रस्थाश्रमियों के लिए होते थे। वानप्रस्थाश्रम में प्रवेश करने पर लोग जंगलों में चले जाते थे और वहीं पर चिन्तन तथा मनन किया करते थे। आत्मा क्या है, सृष्टि का निर्माण कैसे हुआ, सृष्टि किन तत्त्वों से बनी है, सृष्टि का नियन्त्रक कौन है, परमसत्ता का स्वरूप कैसा है, इस प्रकार के गूढ़ विषयों का चिन्तन आरण्यक ग्रन्थों में किया गया है। अध्यात्म-चिन्तन आरण्यक ग्रन्थों की सबसे बड़ी विशेषता है।

उपनिषद्

यह तीन शब्दों से मिलकर बना है- उप+नि+षद्। उप का अर्थ होता है समीप, नि का अर्थ होता है नीचे और षद् का अर्थ होता है बैठना। इसलिए उपनिषद् उन ग्रन्थों को कहते हैं जिनका अध्ययन गुरु के समीप नीचे बैठकर श्रद्धापूर्वक किया जाना चाहिए। उपनिषद ब्राह्मण ग्रन्थ के अन्तिम भाग में आते हैं। ये ज्ञान प्रधान ग्रन्थ हैं। इनमें उच्च कोटि का दार्शनिक विवेचन मिलता है। उपनिषदों की तुलना में संसार में कोई अन्य श्रेष्ठ दार्शनिक ग्रन्थ नहीं है।

उपनिषदों से हमें ज्ञात होता है कि इस युग में वर्ण तथा वर्णाश्रम व्यवस्था दृढ़ रूप से स्थापित हो गए थे तथा मानव की सभ्यता एवं संस्कृति में बहुत बड़ा परिवर्तन हो गया था।

उपलब्ध उपनिषद ग्रन्थों की संख्या लगभग दो सौ है किन्तु उनमें से केवल बारह का स्थान महत्त्वपूर्ण है। उनके नाम हैं- ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैतिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, कौषितकी और श्वेताश्वतर। अधिकांश उपनिषद ई.पू.1000 से ई.पू.300 के बीच की अवधि में रचे गए। विभिन्न काल-खण्डों में रचे जाने के कारण उपनिषदों की भाषा, कथन-शैली तथा वैचारिक पृष्ठभूमि में अंतर है।

उपनिषदों का प्रमुख विषय ‘दर्शन’ है। वेदों में ज्ञान-मार्ग सम्बन्धी जो बातें पाई जाती है, उन्हीं का विकास आगे चलकर उपनिषदों के रूप में हुआ। वस्तुतः उपनिषद्, वेद के उन स्थलों की व्याख्या है जिनमें यज्ञों से अलग हटकर ऋषियों ने जीवन के गहन तत्त्वों पर विचार किया गया है। दूसरे शब्दों में, उपनिषद आर्य मस्तिष्क के धर्म से दर्शन की ओर झुकाव का परिणाम हैं। इनकी प्रवृत्ति उपासना से ध्यान की ओर, यज्ञ से चिन्तन की ओर तथा बाह्य प्रकृति की आराधना से अन्तरात्मा की खोज की ओर है।

ये ब्रह्मज्ञान के श्रेष्ठतम ग्रन्थ हैं। आत्मा, ब्रह्म, मोक्ष तथा सृष्टि आदि के सम्बन्ध में उपनिषदों में व्यक्त विचार ही शंकर के दर्शन के मूल में है। उपनिषद ही वेदान्त के अन्य सम्प्रदायों- अद्वैत, द्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि को मूल सामग्री उपलब्ध करवाते हैं। गीता में भी उपनिषदों का सार है। बौद्ध और जैन मतों के अधिकांश सिद्धान्त भी इन्हीं पर आधारित हैं। वर्तमान समय में हिन्दू-धर्म के प्रमुख सिद्धान्त भी उपनिषदों से ही लिए गए हैं।

जर्मन विद्वान शोपेन हावर ने लिखा है- ‘सम्पूर्ण विश्व में उपनिषदों के समान जीवन को उँचा उठाने वाला कोई अन्य ग्रन्थ नहीं है। इनसे मुझे जीवन में शान्ति मिली है। इन्हीं से मृत्यु के समय भी शान्ति मिलेगी।’

(3.) सूत्र

सूत्र का शाब्दिक अर्थ होता है धागा। इसलिए सूत्र उन ग्रन्थों को कहते हैं जो इस प्रकार लिखे जाते थे मानो कोई चीज धागे में पिरो दी गई हो। और उनमें एक क्रम स्थापित हो गया हो। जब वैदिक साहित्य का रूप अत्यन्त विशाल हो गया तो उसे कंठस्थ करना बहुत कठिन हो गया। इसलिए एक ऐसी रचना-शैली का विकास किया गया जिसमें वाक्य तो छोटे-छोटे हों परन्तु उनमें बड़े-बड़े भावों तथा विचारों का समावेश हो। इन्हीं रचनाओं को सूत्र कहा गया। महर्षि पाणिनि ने सूत्रों की तीन विशेषताएँ बताई हैं-

(1.) वे कम अक्षरों में लिखे जाते हैं,

(2.) वे असंदिग्ध होते हैं और

(3.) वे सारगर्भित होते हैं।

सूत्र साहित्य के तीन भाग हैं- श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र और धर्म सूत्र। श्रौत सूत्रों में वैदिकयुगीन यज्ञों और उनके वर्गीकरण का समावेश है, गृह्य सूत्रों में गार्हस्थिक संस्कार, अनुष्ठान, आचार-विचार और कर्मकाण्ड का वर्णन है तथा धर्म सूत्रों में धार्मिक नियम, राजा-प्रजा के कर्त्तव्य और अधिकार, सामाजिक वर्ण प्रधान भेद, आश्रम आदि विभिन्न व्यवस्थाओं का उल्लेख है।

सूत्रों में कल्प-सूत्र सर्वाधिक महत्त्व का है। सूत्रों की रचना करने वालों में महर्षि पाणिनि प्रमुख हैं। इन ग्रन्थों की रचना 700 ई.पू. से 200 ई.पू. के बीच हुई। सूत्रों में आर्यों के धार्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन का भी पर्याप्त परिचय मिलता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल लेख – वैदिक सभ्यता एवं साहित्य

वैदिक सभ्यता

वेद

वेदांग

वैदिक साहित्य का महत्त्व

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

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वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर के कई कारण हैं जिनमें से सबसे बड़ा कारण यह है कि वैदिक सभ्यता के जनक हिमालय पर्वत की तरफ से सप्तसिंधु क्षेत्र में आए आर्य थे जबकि द्रविड़ सभ्यता के जनक भूमध्यसागरीय क्षेत्रों से आए हुए द्रविड़ थे।

वर्तमान समय में राखीगढ़ी आदि की खुदाई से प्रमाण मिले हैं कि जिन द्रविड़ों को भूमध्यसागरीय क्षेत्रों से भारत में आया हुआ बताया जा रहा है, वस्तुतः वे भारत से भूमध्यसागरीय क्षेत्रों की तरफ गए थे। आर्यों की तरह द्रविड़ों का भी मूल निवास क्षेत्र भारत भूमि ही थी।

सामान्यतः विद्वानों में यह धारणा प्रचलित है कि दक्षिण की द्रविड़ सभ्यता के जनक पश्चिमी भारत के सिंधु क्षेत्र में रहने वाले सैंधव थे। जबकि कुछ शोधकर्ताओं ने यह भी प्रमाणित किया है कि दक्षिण भारत में द्रविड़ सभ्यता को जन्म देने वाले भी मूल रूप से आर्य ही थे। वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर नृवंश की भिन्नता के कारण नहीं है, अपितु स्थान की भिन्नता के कारण है। इन विद्वानों के अनुसार सिंधुघाटी सभ्यता के जनक भी आर्य ही थे।

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

वैदिक सभ्यता तथा द्रविड़ सभ्यता का तुलनात्मक अध्ययन करने पर इनमें कई अन्तर दिखाई देते हैं। मुख्य अंतर इस प्रकार से हैं-

(1.) काल सम्बन्धी अन्तर

सिन्धु-घाटी की सभ्यता, वैदिक सभ्यता से अधिक प्राचीन है। माना जाता है कि सिन्धु-सभ्यता, वैदिक सभ्यता से लगभग दो हजार वर्ष अधिक पुरानी है। सिंधु घाटी सभ्यता ताम्र-कांस्य कालीन सभ्यता है जबकि वैदिक सभ्यता लौह युगीन सभ्यता है।

(2.) नृवंशीय अंतर

द्रविड़ लोग छोटे, काले तथा चपटी नाक वाले होते थे परन्तु आर्य लोग लम्बे, गोरे तथा सुन्दर शरीर के होते थे।

(3.) स्थान सम्बन्धी अंतर

सिंधु घाटी सभ्यता सिंधु नदी की घाटी में पनपी। इसकी बस्तियां पंजाब में हड़प्पा से लेकर सिंध में मोहनजोदड़ो, राजस्थान में कालीबंगा तथा गुजरात में सुत्कांगडोर तक मिली हैं जबकि आर्य सभ्यता सप्तसिंधु क्षेत्र में पनपी तथा इसका विस्तार गंगा-यमुना के दोआब, मध्य भारत तथा पूर्व में बिहार तथा बंगाल के दक्षिण-पूर्व तक पाया गया है।

(4.) सभ्यताओं के स्वरूप में अन्तर

सिन्धु-घाटी की सभ्यता नगरीय तथा व्यापार प्रधान थी जबकि वैदिक सभ्यता ग्रामीण तथा कृषि प्रधान थी। सिन्धु-घाटी के लोगों को सामुद्रिक जीवन प्रिय था और वे सामुद्रिक व्यापार में कुशल थे परन्तु आर्यों को स्थलीय जीवन अधिक प्रिय था। सिंधु घाटी की सभ्यता एवं संस्कृति उतनी उन्नत तथा प्रौढ़ नहीं थी जितनी आर्यों की थी।

(5.) सामाजिक व्यवस्था में अन्तर

द्रविड़ों का कुटुम्ब मातृक था अर्थात् माता कुटुम्ब की प्रधान होती थी, परन्तु आर्यों का कुटुम्ब पैतृक था जिसमें पिता अथवा कुटुुम्ब का अन्य कोई वयोवृद्ध पुरुष प्रधान होता था।

(6.) विवाह पद्धति में अंतर

सिन्धु-घाटी के लोगों में चचेरे भाई-बहिन में विवाह हो सकता था, परन्तु आर्यों में इस प्रकार के विवाहों का निषेध था।

(7.) उत्तराधिकार सम्बन्धी परम्पराओं में अंतर

सिन्धु-घाटी सभ्यता के निवासी, अपनी माता के भाई की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी होते थे। जबकि आर्य, अपने पिता की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी होते थे।

(8.) जाति-व्यवस्था में अन्तर

सिंधु घाटी के लोगों में जाति-व्यवस्था नहीं थी जबकि आर्यों के समाज का मूलाधार जाति-व्यवस्था थी जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के कार्य अलग-अलग निश्चित थे।

(9.) आवास सम्बन्धी अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग नगरों में पक्की ईटों के मकान बनाकर रहते थे किंतु वैदिक आर्य गाँवों में बांस के पर्ण-कुटीर बनाकर रहते थे।

(10.) धातुओं के प्रयोग में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग पाषाण उपकरणों के साथ-साथ सोने-चांदी का प्रयोग करते थे तथा लोहे से अपरिचित थे परन्तु वैदिक-काल के आर्य प्रारम्भ में सोने तथा ताम्बे का और बाद में चांदी, लोहे तथा कांसे का भी प्रयोग करने लगे थे।

(11.) अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग युद्ध कला में प्रवीण नहीं थे। इसलिए उनके अस्त्र-शस्त्र साधारण कोटि के थे। वे युद्ध क्षेत्र में कवच (वर्म) तथा शिरस्त्राण आदि का उपयोग नहीं करते थे जबकि वैदिक आर्य युद्ध कला में अत्यंत प्रवीण थे तथा युद्ध क्षेत्र में आत्मरक्षा के लिए कवच और शिरस्त्राण आदि का प्रयोग करते थे।

(12.) भोजन में अन्तर

सिन्धु सभ्यता के लोगों का प्रधान आहार मांस-मछली था। वैदिक आर्य भी प्रारम्भ में मांस-भक्षण करते थे, परन्तु उत्तर-वैदिक-काल में मांस भक्षण घृणा की दृष्टि से देखा जाने लगा।

(13.) पशुओं के ज्ञान तथा महत्त्व में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग बाघ तथा हाथी से भली-भांति परिचित थे किंतु ऊँट तथा घोड़े से अपरिचित थे। सिन्धु-घाटी के लोग साण्ड को गाय से अधिक महत्त्व देते थे। वैदिक आर्य बाघ तथा हाथी से अनभिज्ञ थे। वेदों में हाथी का बहुत कम उल्लेख है। वैदिक आर्य घोड़े पालते थे जिन्हें वे अपने रथों में जोतते थे तथा युद्ध में काम लेते थे। वैदिक-काल के आर्य गाय को पवित्र मानते थे और उसे पूजनीय समझते थे।

(14.) धार्मिक धारणा में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोगों में मूर्ति-पूजा की प्रतिष्ठा थी। वे शिव तथा शक्ति की पूजा करते थे और देवी को देवता से अधिक ऊँचा स्थान प्रदान करते थे। वे लिंग-पूजक थे तथा अग्नि को विशेष महत्त्व नहीं देते थे। वे भूत-प्रेतों की भी पूजा करते थे। वैदिक आर्यों ने भी देवी-देवताओं में मानवीय गुणों का आरोपण किया था परन्तु वे मूर्ति-पूजक नहीं थे। ऋग्वैदिक-काल के आर्यों में शिव को कोई स्थान प्राप्त नहीं था तथा वे लिंग-पूजा के विरोधी थे। आर्य लोग सर्वशक्तिमान दयालु ब्रह्म को मानते थे तथा अग्नि-पूजक थे। उनके प्रत्येक घर में अग्निशाला होती थी।

(15.) कला के ज्ञान में अन्तर

सिन्धु-घाटी के लोग लेखन-कला से परिचित थे और अन्य कलाओं में भी अधिक उन्नति कर गए थे, परन्तु प्रारम्भिक आर्य सम्भवतः लेखन-कला से परिचित नहीं थे और अन्य कलाओं में भी उतने प्रवीण नहीं थे परन्तु काव्य-कला में वे सैंधवों से बढ़कर थे।

(16.) लिपि एवं भाषागत अंतर

सिन्धु-घाटी के लोगों की लिपि अब तक नहीं पढ़ी जा सकी है किंतु अनुमान है कि वह एक प्रकार की चित्रलिपि थी। इस लिपि के अब तक नहीं पढ़े जाने के कारण सिन्धु-घाटी की भाषा के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं हो सकी है जबकि आर्यों की लिपि वर्णलिपि तथा भाषा संस्कृत थी।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि सिन्धु-घाटी सभ्यता तथा वैदिक-सभ्यता में पर्याप्त अन्तर था। दोनों सभ्यताओं का अलग-अलग कालों में और विभिन्न लोगों द्वारा विकास किया गया था परन्तु दोनों ही सभ्यताएँ, भारत की उच्च कोटि की सभ्यताएँ थीं। दोनों सभ्यताओं में इतना अन्तर होने पर शताब्दियों के सम्पर्क से दोनों ने एक दूसरे की संस्कृति को अत्यधिक प्रभावित किया और उनमें साम्य हो गया। यह साम्य आज भी भारत की संस्कृति पर दिखाई पड़ता है।

सैंधव एवं आर्य सभ्यताओं के अनसुलझे प्रश्न

सिंधु सभ्यता एवं आर्य सभ्यता के सम्बन्ध में पश्चिमी इतिहासकारों का मानना है कि-

1.  सिंधु सभ्यता नगरीय सभ्यता है।

2.  हड़प्पा सभ्यता का सर्वाधिक उचित नाम सिंधु सभ्यता है क्योंकि यह सभ्यता, सिंधु नदी घाटी के क्षेत्र में पनपी।

3.  सैंधव सभ्यता, आर्य सभ्यता से लगभग दो हजार साल पुरानी थी।

4.  सिंधु सभ्यता के लोग घोड़े से परिचित नहीं थे।

5.  सिंधु सभ्यता के लोग लोहे का प्रयोग करना नहीं जानते थे।

6.  सिंधु सभ्यता के लोगों के, मेसोपाटामिया (ईराक) के लोगों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे।

7.  भारत में आने से पहले आर्य ईरान में रहते थे।

8.  आर्यों ने सैंधव लोगों पर आक्रमण किया तथा उनकी बस्तियों को नष्ट कर दिया। आर्य ऐसा इसलिए कर पाए क्योंकि आर्यों के पास तेज गति की सवारी के लिए घोड़े तथा लड़ने के लिए लोहे के हथियार थे।

यदि पश्चिमी इतिहासकारों की उपरोक्त बातों को स्वीकार कर लिया जाये तो इतिहास में अनेक उलझनें पैदा हो जाती हैं। इनमें से कुछ विचारणीय बिंदु शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की सहायता के लिए यहाँ दिए जा रहे हैं-

1.  अब तक सैंधव सभ्यता के 1400 से अधिक स्थलों की खोज की गई है। इनमें से केवल 6 नगर हैं, शेष गांव हैं। ऐसी स्थिति में सैंधव सभ्यता को नगरीय सभ्यता कैसे कहा जा सकता है?

2.  सिंधु सभ्यता के स्थलों में से अधिकांश स्थल सरस्वती नदी की घाटी में पाए गए हैं न कि सिंधु नदी की घाटी में। अतः इस सभ्यता का नाम सिंधु घाटी सभ्यता कैसे हो सकता है?

3.  यदि सिंधुसभ्यता के लोगों के, मेसोपाटामिया के साथ व्यापारिक सम्बन्ध थे तो सिंधु घाटी तथा मेसोपाटिमया का मार्ग, ईरान अथवा उसके आसपास से होकर जाने का रहा होगा जहाँ आर्यों की प्राचीन बस्तियां थीं। तब सैंधव लोग, घोड़े एवं लोहे से परिचित क्यों नहीं हुए?

4.  यदि आर्यों ने सैंधवों पर आक्रमण किया था, तो इस दौरान युद्ध, बीमारी एवं स्वाभाविक मृत्यु से घोड़े भी मरे होंगे किंतु पूरी सैंधव सभ्यता के क्षेत्र से घोड़ों की केवल दो संदिग्ध मूर्तियाँ मिली हैं तथा एक घोड़े के अस्थिपंजर मिले हैं। अतः स्पष्ट है कि आर्यों ने सैंन्धवों पर न तो आक्रमण किए और न उन्हें नष्ट किया।

5.  यदि आर्यों ने सैंधवों पर आक्रमण किया था तो उनके द्वारा प्रयुक्त लोहे के कुछ हथियार युद्ध के मैदानों अथवा सैंधव बस्तियों में गिरे होंगे अथवा छूट गए होंगे अथवा टूटने के कारण आर्य सैनिकों द्वारा फैंक दिए गए होंगे किंतु सैंधव बस्तियों से लोहे के हथियार नहीं मिले हैं। अतः स्पष्ट है कि आर्यों ने सैंधवों पर आक्रमण नहीं किया।

6.  आर्यों के बारे में कहा जाता है कि वे भारत में लोहा लाए। यदि ऐसा था तो लौह-बस्तियां सबसे पहले उत्तर भारत में स्थापित होनी चाहिए थीं किंतु आर्यों के आने के बाद उत्तर भारत में ताम्र कालीन बस्तियां बसीं जबकि उसी काल में दक्षिण भारत में लौह बस्तियां बस रही थीं। यह कैसे हुआ कि भारत में लोहे को लाने वाले आर्यों की बस्तियां उत्तर भारत में थीं जबकि लौह बस्तियां दक्षिण भारत में बस रही थीं ?

निष्कर्ष

उपरोक्त विवेचन से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि –

1.  सैंधव सभ्यता को सिंधु-सरस्वती सभ्यता अथवा सरस्वती सभ्यता कहा जाना चाहिए।

2.  सैंधव सभ्यता, लोहे एवं घोड़े से अपिरिचित रही होगी किंतु वह लोहे के हथियारों से सुसज्जित एवं घोड़ों पर बैठकर आने वाले आर्यों के आक्रमणों में नष्ट हुई इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं।

3.  यूरोपीय इतिहासकारों को यह सिद्धांत प्रतिपादित करना था कि ब्रिटेन वासियों की तरह आर्य भी भारत में बाहर से आए हैं, इसलिए उन्होंने सैंधव सभ्यता को आर्यों के आक्रमण में नष्ट होने का मिथक गढ़ा।

4.  सुदूर संवेदी उपग्रहों द्वारा उपलब्ध कराए गए सिंधु तथा सरस्वती नदी के प्राचीन मार्गों के चित्र बताते हैं कि सरस्वती नदी द्वारा कई बार मार्ग बदला गया। इससे अनुमान होता है कि इसी कारण सिंधु सभ्यता की बस्तियां भी अपने प्राचीन स्थानों से हटकर अन्यत्र चली गई होंगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल लेख – वैदिक सभ्यता एवं साहित्य

वैदिक सभ्यता

वेद

वेदांग

वैदिक साहित्य का महत्त्व

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं (पेलियोलीथिक पीरियड)

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भारत में पूर्व.पाषाण कालीन सभ्यताएं (पेलियोलीथिक पीरियड) आज से लगभग पाँच लाख साल पहले आरम्भ हुईं तथा आज से लगभग दस हजार साल पहले तक अस्तित्व में रहीं।

मानव-सभ्यता के प्रारम्भिक काल को पूर्व-पाषाण-काल के नाम से पुकारा गया है। इसे पुरा पाषाण काल तथा उच्च पुरापाषाण युग भी कहते हैं। मानव की ‘होमो सेपियन’ प्रजाति इस संस्कृति की निर्माता थी।

काल निर्धारण

भारत में इस काल का आरम्भ आज से लगभग पाँच लाख वर्ष पहले हुआ। भारत में मानव आज से लगभग दस हजार साल पहले तक संस्कृति की इसी अवस्था में रहा। आज से लगभग दस हजार वर्ष पहले अर्थात् ई.पू. 8000 में, पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का अन्त हुआ।

पूर्व-पाषाण-कालीन स्थल

पूर्व-पाषाण-कालीन स्थल कश्मीर, पंजाब की सोहन नदी घाटी (अब पाकिस्तान), मध्यभारत, पूर्वी भारत तथा दक्षिणी भारत में पाए गए हैं। इस संस्कृति के औजार छोटा नागपुर के पठार में भी मिले हैं। ये ई.पू. 1 लाख तक पुराने हो सकते हैं। बिहार के सिंहभूमि जिले में लगभग 40 स्थानों पर पूर्व पाषाण कालीन स्थल मिले हैं। बंगाल के मिदनापुर, पुरुलिया, बांकुरा, वीरभूम, उड़ीसा के मयूरभंज, केऊँझर, सुंदरगढ़ तथा असम के कुछ स्थानों से भी इस काल के पाषाण-औजार प्राप्त हुए हैं।

आन्ध्र प्रदेश के कुर्नूल नगर से लगभग 55 किलोमीटर दूर ऐसे औजार मिले हैं जिनका समय ई.पू.25 हजार से ई.पू.10 हजार के बीच का है। इनके साथ हड्डी के उपकरण और जानवरों के अवशेष भी मिले हैं। आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले से, कर्नाटक के शिमोगा जिले तथा मालप्रभा नदी के बेसिन से भी इस युग के औजार मिले हैं। नागार्जुन कोंडा से भी पत्थर के फाल एवं अन्य उपकरण मिले हैं।

लिखित उल्लेख

पुराणों में पूर्व पाषाण कालीन मानवों के उल्लेख मिलते हैं जो कंद-मूल खाकर गुजारा करते थे। ऐसी पुरानी पद्धति से जीविका चलाने वाले लोग पहाड़ी क्षेत्रों में और गुफाओं में आधुनिक काल तक मौजूद रहे हैं।

शैल चित्र

भारत के अनेक स्थानों पर उपलब्ध पहाड़ियों में शैलचित्रों की प्राप्ति हेाती है जिनसे आदिमकालीन संस्कृति का ज्ञान होता है। विंध्याचल की पहाड़ियों में भीमबेटका नामक स्थान पर  200 से अधिक गुफाएं पाई गई हैं जिनमें पूर्व-पाषाण कालीन मानव द्वारा बनाए गए के शैल चित्र प्राप्त हुए हैं। इन चित्रों की संख्या कई हजार है। इनका काल एक लाख वर्ष पूर्व माना जाता है। इन गुफाओं में वे औजार भी मिले हैं जिनसे ये गुफाएं बनाई गई होंगी तथा इन चित्रों को उकेरा गया होगा। इन गुफाओं से 5,000 से भी अधिक वस्तुएं मिली हैं जिनमें से लगभग 1,500 औजार हैं।

जीवाश्म

कुर्नूल जिले की गुफाओं से बारहसिंघे, हिरन, लंगूर तथा गेंडे के जीवाश्म भी मिले हैं। ये जीवाश्म पूर्व-पाषाण युग के हैं। इन जीवाश्मों के क्षेत्र से पूर्व-पाषाण कालीन औजार मिले हैं।

पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति की विशेषताएं

इस काल का मानव पूर्णतः आखेटक अवस्था में था। वह पशु-पालन, कृषि, संग्रहण आदि मानवीय कार्यकलापों से अपरिचित था। इस काल के मानव की संस्कृति की विशेषताएं इस प्रकार से हैं-

निवासी

इतिहासकारों, पुरातत्त्ववेत्ताओं एवं समाजशास्त्रियों की धारणा है कि पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के लोग ‘हब्शी’ जाति के थे। इन लोगों का रंग काला और कद छोटा था। इनके बाल ऊनी थे और नाक चिपटी थी। ऐसे मानव आज भी अण्डमान एवं निकोबार द्वीपों में पाए जाते हैं।

औजार

पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव, पत्थर के अनगढ़ और अपरिष्कृत औजार बनाता था। वह कठोर चट्टानों से पत्थर प्राप्त करता था तथा उनसे हथौड़े एवं रुखानी आदि बनाता था जिनसे वह ठोकता, पीटता तथा छेद करता था। ये औजार अनगढ़ एवं भद्दे आकार के होते थे। पत्थर के औजारों से वह पशुओं का शिकार करता था। इन औजारों में लकड़ी तथा हड्डियों के हत्थे लगे रहते थे, लकड़ी तथा हड्डियों के भी औजार होंगे परन्तु अब वे नष्ट हो गए हैं।

आवास

पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव किसी एक स्थान पर स्थिर नहीं रहता था वरन् जहाँ कहीं उसे शिकार, कन्द, मूल, फल आदि पाने की आशा होती थी वहीं पर चला जाता था। प्राकृतिक विषमताओं एवं जंगली जानवरों से बचने के लिए वह नदियों के किनारे स्थित जंगलों में ऊँचे वृक्षों एवं पर्वतीय गुफाओं का आश्रय लेता था। समझ विकसित होने पर इस युग के मानव ने वृक्षों की डालियों तथा पत्तियों की झोपड़ियां बनानी आरम्भ कीं।

आहार

पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के लोग अपनी जीविका के लिए पूर्ण रूप से प्रकृति पर निर्भर थे। भोजन प्राप्त करने के लिए जंगली पशुओं का शिकार करते थे और नदियों से मछलियाँ पकड़ते थे। वनों में मिलने वाले कन्द-मूल एवं फल भी उनके मुख्य आहार थे।

कृषि

पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव कृषि करना नहीं जानता था।

पशु-पालन

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले की बेलन घाटी में मिले घरेलू पशुओं के अवशेषों से अनुमान होता है कि ई.पू.25 हजार के आसपास बकरी, भेड़ और गाय-भैंस आदि पाले जाते थे किंतु सामान्यतः इस युग का आदमी पशुपालन नहीं करता था।

वस्त्र

पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव पूर्णतः नंगे रहते थे। प्राकृतिक विषमताओं से बचने के लिए उन्होंने वृक्षों की पत्तियों, छाल तथा पशुचर्म से अपने शरीर को ढंकना प्रारम्भ किया होगा।

सामाजिक संगठन

पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव टोलियां बनाकर रहते थे। प्रत्येक टोली का एक प्रधान होता होगा जिसके नेतृत्व में ये टोलियाँ आहार तथा आखेट की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान को जाया करती होंगी।

शव-विसर्जन

अनुमान है कि पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के आरंभिक काल में शवों को जंगल में वैसे ही छोड़़ दिया जाता था जिन्हें पशु-पक्षी खा जाते थे। बाद में शवों के प्रति दायित्व की भावना विकसित होने पर वे शवों को लाल रंग से रंगकर धरती में गाड़ देते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

भारत की पाषाण सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ

पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं (पेलियोलीथिक पीरियड)

मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ (मीजोलिथिक पीरियड)

नवपाषाण कालीन सभ्यताएँ (निओलिथिक पीरियड)

भारत की आदिम जातियाँ (पाषाण युगीन जातियाँ)

भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

महापाषाण संस्कृति

पाषाण सभ्यताओं की तुलना

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पाषाण सभ्यताओं की तुलना

विश्व के अन्य स्थलों पर विकसित हुई पाषाण कालीन सभ्यताओं की तरह भारत में भी पुरापाषाण, मध्यपाषाण एवं नवपाषाण कालीन सभ्यताएं विकसित हुईं। तीनों पाषाण सभ्यताओं की तुलना करने पर हमें इनमें अंतर स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

तीनों पाषाण सभ्यताओं की तुलना

काल का अंतर

तीनों पाषाण सभ्यताओं की तुलना करने पर ज्ञात होता है कि पूर्व पाषाण काल आज से लगभग पांच लाख साल पहले आरंभ होकर आज से लगभग 10 हजार साल पहले तक अर्थात् ई.पू.8000 तक चला। मध्य-पाषाण-काल आज से 10 हजार साल पहले आरम्भ होकर आज से लगभग 6 हजार साल पहले तक अर्थात् ई.पू.4000 तक चला। नव-पाषाण-काल आज से लगभग 6 हजार साल पहले आरंभ हुआ तथा लगभग ई.पू.1000 तक चलता रहा।

स्थल

पूर्व पाषाण कालीन स्थल कश्मीर, पंजाब, सोहन नदी घाटी, छोटा नागपुर के पठार, विंध्याचल की पहाड़ियों में भीम बेटका, बिहार का सिंहभूम जिला, बंगाल, असम, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक मालप्रभा नदी बेसिन आदि विस्तृत क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं।

मध्य पाषाण कालीन स्थल हिमालय के द्वितीय हिमनद निक्षेप, बेलन घाटी, भीम बेटका, गुजरात, नर्मदा तट तथा तुंगभद्रा के दक्षिण में मिले हैं। नवपाषाण काल के स्थल कश्मीर की घाटी में बुर्जहोम, पटना के निकट चिरंड, गोदावरी नदी के दक्षिणी क्षेत्र, असम की पहाड़ियां, मेघालय की गारो पहाड़ियां, उड़ीसा, कर्नाटक में मास्की, ब्रह्मगिरि, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश आदि स्थानों पर पाए गए हैं।

औजार

पूर्व-पाषाण-कालीन औजार क्वार्टजाइट से बनते थे। मध्य-पाषाण कालीन औजार कैल्सेडोनी, जेस्पर, चर्ट और ब्लडस्टोन से बनते थे। नव-पाषाण-काल के औजार अच्छे दाने के गहरे हरे रंग के ट्रप से बनते थे। पूर्व-पाषाण-कालीन औजारों पर किसी तरह की पॉलिश नहीं है। वे अनगढ़, भद्दे और स्थूल हैं।

मध्य-पाषाण-कालीन औजार बहुत छोटे हैं इसलिए इन्हें लघुपाषाण, अणुपाषाण (Microlith) तथा लघु औजार भी कहा जाता है। इनका आकार आधा इंच से पौने दो इंच तक पाया गया है। नव-पाषाण-कालीन औजारों पर पॉलिश पाई गई है। अधिकांशतः पूरे औजारों पर पॉलिश की गई है। कुछ औजारों पर ऊपर तथा नीचे की ओर पॉलिश की गई है।

आवास

तीनों पाषाण सभ्यताओं की तुलना करने पर ज्ञात होता है कि पूर्व-पाषाण-कालीन मानव पर्वतीय कंदराओं, वृक्षों एवं प्राकृतिक आवासों में आश्रय लेता था। मध्य-पाषाण कालीन मानव भी आवास बनाने की कला से लगभग अपरिचित था। वह भी प्राकृतिक आवासों पर निर्भर था। नव-पाषाण-कालीन मानव पेड़ों की टहनियों एवं पशुओं की हड्डियों की सहायता से झौंपड़ियां बनाना सीख गया था।

कृषि

पूर्व-पाषाण-कालीन मानव कृषि करना नहीं जानता था। मध्य-पाषाण कालीन मानव बैलों एवं मानवों की सहायता से कृषि करना सीख गया था। वह पौधों को काटने के लिए हँसिया तथा अनाज को पीसने के लिए चक्कियों का प्रयोग करता था। वह गेहूँ, जौ बाजरा आदि की खेती करता था। नव-पाषाण-काल का मानव चावल, रागी और कुलथी भी पैदा करने लगा था। इनके पॉलिशदार औजारों में लघुपाषाणों के फलक भी हैं।

पशु-पालन

पूर्व-पाषाण-कालीन मानव ने ई.पू.25,000 के आसपास बकरी, भेड़ और गाय-भैंस आदि पालना आरंभ किया। मध्य-पाषाण-काल का मानव गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी, कुत्ता, घोड़ा आदि जानवरों को पालता था। पशुओं पर उसकी निर्भरता बढ़ गई। नव-पाषाण काल का मानव पशु-पालन पर और अधिक निर्भर हो गया। बोझा ढोने से लेकर हल खींचने तक के काम पशुओं से लिए जाने लगे।

बर्तन

पूर्व-पाषाण-कालीन मानव बर्तन बनाना नहीं जानता था। मध्य पाषाण-काल के मानव ने मिट्टी के बर्तन बनाना आरम्भ किया किंतु इस काल के बर्तन न तो चाक पर बनाए जाते थे और न उन्हें आग में पकाया जाता था। नव-पाषाण काल के मानव ने बर्तन बनाने के लिए चाक का अविष्कार किया तथा उन्हें पक्का बनाने के लिए आग में पकाना आरंभ किया।

सामाजिक संगठन

पूर्व-पाषाण-कालीन मानव टोलियां बनाकर रहता था। उसमें परिवार की भावना विकसित नहीं हुई थी। उनका नेतृत्व एक प्रधान मानव करता था। मध्यपाषाण कालीन मानव में सहकारिता की भावना विकसित हो चुकी थी। उसने परिवार का निर्माण कर लिया था। इसलिए वह कार्य विभाजन एवं वस्तु विनिमय की समझ विकसित कर सका।

अल्मोड़ा के निकट दलबंद की एक गुफा में मिले एक चित्र में दो वयस्क और दो बालक पांव से पांव एवं हाथ से हाथ मिलाकर चलते हुए दिखाये गए हैं। यह चित्र परिवार की एकता एवं सुबद्धता का परिचायक है। नव-पाषाण-काल में दूर-दूर रहने वाले मानवों ने समुदायों का गठन कर लिया जिससे कबीलाई संस्कृति का जन्म हुआ। एक कबीले में कई परिवार एक साथ रहते थे। कबीले का एक मुखिया होता था, जिसने आगे के युगों में चलकर राजा का रूप ले लिया।

कार्य विभाजन

पूर्व-पाषाण-कालीन मानव आखेटजीवी था इसलिए कार्य विभाजन नहीं हुआ था। वह आवास बनाना तथा खेती करना नहीं जानता था। मध्य-पाषाण-काल का मानव आवास निर्माण, कृषि, पशु-पालन एवं मिट्टी के बर्तन बनाने से परिचित हो चुका था इसलिए इस युग के मानव ने कार्य विभाजन आरंभ किया। नव-पाषाण काल में कार्य विभाजन और सुस्पष्ट हो गया।

शव विसर्जन

तीनों पाषाण सभ्यताओं की तुलना करने पर ज्ञात होता है कि पूर्व-पाषाण-कालीन सभ्यता के आरंभिक चरण में शवों को जंगल में छोड़़ दिया जाता था जहाँ वह पशु-पक्षियों द्वारा खा लिया जाता था। बाद में शवों को लाल रंग से रंगकर धरती में गाढ़ना आरंभ किया गया। मध्य-पाषाण-काल का मानव भी शवों को धरती में गाड़ता था। इस कार्य के लिए अलग से स्थान निर्धारित किया जाता था।

कभी-कभी घर के भीतर अथवा उनके निकट ही शव को गाड़ा जाता था। शव के साथ उपयोगी वस्तुएँ रखी जाती थीं। इस काल में शव को जलाने की प्रथा भी आरम्भ हो गई थी। शव दहन के पश्चात् उसकी राख को मिट्टी के बर्तन में आदरपूर्वक भूमि में गाड़ा जाता था। नव पाषाण काल में भी शव विसर्जन की यही परम्पराएं अपनाई गईं।

धर्म

पूर्व-पाषाण-कालीन सभ्यता के बाद के वर्षों में शवों को लाल रंग से रंगकर धरती में गाढ़ना आरंभ कर दिया गया था। इसलिए अनुमान होता है कि उस काल से ही मानव में धार्मिक भावना पनपने लगी। मध्य-पाषाण-संस्कृति का मानव मातृदेवी का उपासक था। देवी को प्रसन्न करने के लिए वह सम्भवतः पशुओं की बलि भी देता था। उसका विश्वास था कि ऐसा करने से पृथ्वी माता प्रसन्न होती है और पशु तथा कृषि में वृद्धि होती है। नव पाषाण काल में धार्मिक भावना और पुष्ट हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत की आदिम जातियाँ

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भारत की आदिम जातियाँ

भारत में छः नृवंश जातियों के कंकाल एवं खोपड़ियाँ पाई गई हैं। इन्हें भारत की आदिम जातियाँ माना जाता है। ये समस्त आदिम जातियाँ प्रस्तर युगीन अथवा पाषाण कालीन सभ्यताओं से सम्बन्ध रखती थीं।

भारत की आदिम जातियाँ

(1.) नीग्रेटो

यह भारत की प्राचीनतम जाति थी जो अफ्रीका से भारत में आई थी। यह नितांत असभ्य एवं बर्बर जाति थी। ये लोग जंगली पशुओं का मांस, मछली, कंद-मूल एवं फल खाकर पेट भरते थे और कृषि-कर्म एवं पशुपालन से अपरिचित थे। यद्यपि अब यह जाति भारत की मुख्य भूमि से विलुप्त हो चुकी है तथापि अण्डमान द्वीपों में इस जाति के कुछ लोग निवास करते हैं। असम की नागा जातियों तथा त्रावणकोर-कोचीन आदि कुछ क्षेत्रों की आदिम जातियों में भी इस जाति की कुछ विशेषताएं दृष्टिगत होती हैं।

(2.) प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड

ये संभवतः फिलीस्तीन से भारत आए थे। भारत की कोल और मुण्डा जातियों में प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड जाति के गुण पाए जाते हैं। जब आर्य भारत में आए तब यह जाति पंजाब एवं उसके आसपास रहती थी। आर्यों ने इन्हें ‘अनास’, ‘कृष्णवर्ण’ और ‘निषाद’ कहकर पुकारा। यह एक विकसित जाति थी। उन्हें कृषि, पशुपालन एवं वस्त्र निर्माण का ज्ञान था।

माना जाता है कि अण्डे से सृष्टि की कल्पना इन्हीं प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड लोगों की देन है। ये लोग पुनर्जन्म के सिद्धांत में विश्वास करते थे। ‘अमंगल निवारण’ के लिए ‘न्यौछावर करने’ की प्रथा भी इन्हीं की दी हुई है। हिन्दू-धर्म के पशु-देवता-  नाग, मकर, गणेश आदि भी इन्हीं की देन है। यह जाति आर्यों के आगमन के बाद उन्हीं में घुल-मिलकर एकाकार हो गई।

(3.) मंगोलायड

इस प्रजाति का निवास केवल एशिया महाद्वीप में पाया जाता है। इससे सम्बन्धित लोगो की त्वचा का रंग पीला, शरीर पर बालों की कमी और माथा चौड़ा होता है। इस प्रजाति की सबसे प्रमुख विशेषता इसकी अधखुली आंखें हैं। कतिपय प्रादेशिक विभिन्नताओं के साथ यह जाति सिक्किम, आसाम और भारत-बर्मा की सीमा पर निवास करती है।

(4.) भूमध्यसागरीय द्रविड़

दुनिया भर में इस जाति की कई शाखाएं हैं। भारत में इस जाति को द्रविड़ कहा जाता है। इनका सिर बड़ा, कद नाटा, नाक छोटी और रंग काला होता है। आर्यों के भारत आगमन के समय द्रविड़ जाति ईरान से लेकर अफगानिस्तान तथा बलोचिस्तान से लेकर पंजाब, सिंध, मालवा एवं महाराष्ट्र तक विस्तृत क्षेत्र में रहती थी।

आर्यों के भारत में आगमन से पूर्व यह जाति नीग्रेटो एवं प्रोटोऑस्ट्रेलॉयड जातियों के साथ मिलकर रह रही थी। पाकिस्तान के बलोचिस्तान प्रांत में आज भी ब्राहुई भाषा का प्रयोग होता है, यह भाषा भूमध्यसागरीय द्रविड़ों की ही देन है। दक्षिण भारत की अनेक भाषाओं की जननी द्रविड़ भाषा माना जाती है।

ऋग्वेद में प्रयुक्त ‘दस्यु’ और ‘दास’ शब्दों का प्रयोग द्रविड़ों के लिए किया गया है। ईरानी भाषा में भी दस्यु शब्द मिलता है। कैस्पियन सागर के दक्षिण-पूर्व में ‘दहइ’ जाति रहती थी। माना जाता है कि वही दहई जाति भारत में ‘द्रविड़’ कहलाई। भारत की संस्कृति पर पर द्रविड़ जाति का विशेष प्रभाव पड़ा जिसे आज भी देखा जा सकता है। इस जाति की सभ्यता एवं संस्कृति का अध्ययन हम ‘सैन्धव सभ्यता, धर्म एवं समाज’ नामक अध्याय में करेंगे।

(5.) पश्चिमी ब्रेचीसेफल्स

इस जाति के लोग बहुत छोटे समुदाय में भारत में रहते होंगे। भारत की सभ्यता एवं संस्कृति पर इन लोगों का विशेष प्रभाव नहीं पड़ा।

(6.) नॉर्डिक

यह भी एक छोटा आदिम समुदाय था जिसका भारतीय संस्कृति पर कोई प्रभाव दिखाई नहीं दिया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

भारत की पाषाण सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ

पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं (पेलियोलीथिक पीरियड)

मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ (मीजोलिथिक पीरियड)

नवपाषाण कालीन सभ्यताएँ (निओलिथिक पीरियड)

भारत की आदिम जातियाँ (पाषाण युगीन जातियाँ)

भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

महापाषाण संस्कृति

अनुक्रमणिका – चिश्तिया सूफी सम्प्रदाय एवं ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती

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अनुक्रमणिका - चिश्तिया सूफी सम्प्रदाय - www.bharatkaitihas.com
अनुक्रमणिका - चिश्तिया सूफी सम्प्रदाय

अनुक्रमणिका – चिश्तिया सूफी सम्प्रदाय एवं ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ई-बुक चिश्तिया सूफी सम्प्रदाय एवं ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती के अध्यायों की सूची दी गई है। पाठक इन अध्यायों के शीर्षकों पर क्लिक करके सम्बन्धि अध्याय तक पहुंच सकते हैं।

ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भारत में चिश्तिया सूफी सम्प्रदाय लेकर आए। उनके भारत आगमन का समय भारत के इतिहास की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था। उस काल में मुहम्मद गौरी हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान को मारकर दिल्ली, अजमेर, हांसी, संभल सहित सम्पूर्ण चौहान साम्राज्य को निगल जाना चाहता था।

ऐसे संकट काल में सूफी दरवेश बड़ी संख्या में भारत के विभिन्न नगरों में आकर बैठ गए। ये दरवेश अपने मीठे गीतों एवं सम्मोहक नृत्यों के द्वारा हिन्दू प्रजा को अपनी ओर लुभाने लगे। ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भी उनमें से एक थे। उन्होंने अजमेर में अपना डेरा जमाया। इस ई-बुक में भारत के चिश्तिया सम्प्रदाय तथा ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के इतिहास की संक्षिप्त जानकारी दी गई है।

यह पुस्तक अमेजन पर ई-बुक के रूप में एक साथ पढ़ी जा सकती है।

1. प्रस्तावना – चिश्तिया सूफी सम्प्रदाय एवं ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती

2. इस्लाम का उदय तथा प्रसार

3. भारत में सूफी मत की सफलता के कारण

4. सूफी परम्परा

5. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती

6. मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अनुक्रमणिका – रजिया सुल्तान

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अनुक्रमणिका - रजिया सुल्तान

अनुक्रमणिका – रजिया सुल्तान पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ई-बुक रजिया सुल्तान के अध्यायों का क्रम दिया गया है। आप नीचे दिए गए अध्याय शीर्षकों पर क्लिक करके सीधे ही उन अध्यायों तक पहुंच सकते हैं।

रजिया सुल्तान मध्यकालीन भारत के इतिहास की एक प्रमुख महिला शासक थी। भारतीय इतिहास के क्षितिज पर उसका आगमन कट्टरपंथी इस्लामिक चिंतन से ग्रस्त तुर्की अमीरों के बीच हुआ जिन पर नियंत्रण पाना कोई आसान बात नहीं थी। फिर भी रजिया ने उन्हें नियंत्रित किया तथा सुल्तान की अवज्ञा करने वाले अमीरों को कोड़ों से पीटा।

उस युग में एक मुस्लिम महिला के लिए किसी मुस्लिम पुरुष को पीटना सरल कार्य नहीं था किंतु रजिया ने यह किया।

रजिया सुल्तान बिना कोई पर्दा किए, पुरुष सुल्तानों की तरह घोड़े पर बैठकर अपनी प्रजा का सुख-दुख जानने के लिए दिल्ली की सड़कों पर निकलती थी। उस युग में किसी महिला के लिए ऐसा करना संभव नहीं था किंतु रजिया ने इसे संभव करके दिखाया।

इस ई-बुक में डॉ. मोहनलाल गुप्ता ने रजिया के इतिहास एवं जीवन चरित्र की इन्हीं विशेषताओं को उजागर किया है। यह एक रोचक पुस्तक है।

1. भूमिका – रजिया सुल्तान

2. इल्तुतमिश का उत्कर्ष

3. शहजादी रजिया

4. रुकुनुद्दीन फीरोजशाह

5. शाह तुर्कान का कहर

6. रजिया का दांव

7. रजिया सुल्तान

8. रजिया सुल्तान का शासन

9. रजिया सुल्तान की हत्या

10. रजिया सुल्तान की असफलता

11. रजिया सुल्तान का मूल्यांकन

12. इतिहास में रजिया सुल्तान का स्थान

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रुकुनुद्दीन फीरोजशाह

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रुकुनुद्दीन फीरोजशाह

30 अप्रेल 1236 को सुल्तान इल्तुमिश की मृत्यु हो गई। उसने शहजादी रजिया फीरोजशाह को अपनी उत्तराधिकारी घोषित किया किंतु तुर्की अमीरों ने रजिया के निकम्मे एवं अयोग्य भाई रुकुनुद्दीन फीरोजशाह को सुल्तान बनाने का निश्चय किया।

शहजादी रजिया के पिता इल्तुतमिश के द्वारा की गई व्यवस्था के अनुसार शहजादी रजिया को सुल्तान बनना था किंतु इतिहास को यह निर्णय इतनी आसानी से स्वीकार्य नहीं था। तुर्क शासकों में उत्तराधिकार के नियम निश्चित नहीं थे। सुल्तान के मरते ही सल्तनत के ताकतवर अमीरों में संघर्ष आरम्भ हो जाता था और विजयी अमीर सल्तनत पर अधिकार कर लेता था। यहाँ तक कि सुल्तान के प्रतिभाशाली पुत्र भी प्रायः राज्याधिकार से वंचित रह जाते थे।

इल्तुतमिश का योग्य एवं बड़ा पुत्र नासिरुद्दीन महमूद, इल्तुतमिश के जीवनकाल में ही मर गया था। उसका दूसरा पुत्र रुकुनुद्दीन निकम्मा और अयोग्य था तथा अन्य सभी पुत्र अवयस्क थे। इन सब बातों को सोच कर ही इल्तुमिश ने रजिया को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था।

तुर्की अमीरों द्वारा शहजादी रजिया का विरोध

जब इल्तुतमिश की मृत्यु हुई तो तुर्की अमीर, एक औरत को सुल्तान के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए। भारत में मुस्लिम सुल्तान, अरब के खलीफा के प्रतिनिधि के रूप में शासन करते थे। अरब वालों के रिवाजों के अनुसार औरत, मर्दों के द्वारा  भोगे जाने के लिये बनाई गई थी न कि शासन करने के लिये।

इस कारण मर्द अमीरों के लिए, औरत सुल्तान का अनुशासन मानना बड़े शर्म की बात थी। इल्तुतमिश के अमीरे हाजिब (प्रधानमंत्री) मुहम्मद जुनैदी ने रजिया का विरोध किया।

रुकुनुद्दीन फीरोजशाह की ताजपोशी

30 अप्रेल 1236 को इल्तुतमिश के सबसे बड़े जीवित पुत्र रुकुनुद्दीन फीरोजशाह को तख्त पर बैठा दिया। अमीरों के फैसले के आगे रजिया हाथ मलती रह गई और तख्त रुकुनुद्दीन फीरोजशाह के हाथ लग गया।

तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार रुकुनुद्दीन रूपवान, दयालु तथा दानी सुल्तान था परन्तु उसमें दूरदृष्टि नहीं थी। वह प्रायः मद्यपान करके दरबार में बैठकर रक्कासाओं के नाच देखा करता था और प्रायः हाथी पर चढ़कर दिल्ली की सड़कों पर चमकदार स्वर्ण-मुद्राएँ बाँटा करता था। वह अपने पिता इल्तुतमिश के जीवन काल में बदायूँ तथा लाहौर का गवर्नर रह चुका था परन्तु उसने सुल्तान बनने के बाद मिले अवसर से कोई लाभ नही उठाया और दिन रात मद्यपान तथा भोग-विलास में डूबा रहा।

मद्यपान में धुत्त रहने के कारण रुकुनुद्दीन राज्य कार्यों की उपेक्षा करता था। इस कारण उसकी माँ शाह तुर्कान ने शासन की बागडोर अपने हाथों में ले ली। शाह तुर्कान का जन्म अभिजात्य तुर्कों में न होकर निम्न समझे जाने वाले मुसलमानों में हुआ था। वह अपने दैहिक सौन्दर्य के बल पर इल्तुतमिश जैसे प्रबल सुल्तान की बेगम बनी थी और अब रुकुनुद्दीन जैसे निकम्मे सुल्तान की राजमाता बन गई थी। इसलिये तुर्कान के विरुद्ध भी षड़यंत्र आरम्भ हो जाने निश्चित ही थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

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ब्रिटिश कालीन स्थापत्य - www.bharatkaitihas.com
ब्रिटिश कालीन स्थापत्य - विक्टोरिया मेमोरियल हॉल

ब्रिटिश अधिकारियों ने भारत में अनेक विशाल भवन बनाए जिनमें भारतीय एवं मुस्लिम स्थापत्य शैलियों के साथ यूरोपीय स्थापत्य शैलियों का भी समावेश किया। इसे ब्रिटिश कालीन स्थापत्य कह सकते हैं।

सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में अंग्रेज, पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी आदि यूरोपीय जातियों ने भारत में प्रवेश किया। उन्होंने यूरोपियन शैली के कुछ चर्च, फोर्ट एवं चैपल बनवाए।

सत्रहवीं सदी का ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

ई.1639 में सेण्ट जॉर्ज फोर्ट मद्रास का निर्माण प्रारम्भ हुआ। ई.1696 में कलकत्ता में फोर्ट विलियम का निर्माण हुआ। इसी दुर्ग में चर्च भी स्थापित किया गया था।

अठारहवीं सदी का ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

कैप्टन जॉन ब्रोहिअर की डिजायन पर ई.1757 से 1773 तक फोर्ट विलियम का पुनर्निर्माण किया गया। ई.1787 में कलकत्ता में सेण्ट जॉन चर्च बना। इस चर्च का नक्शा लेफ्टिनेण्ट एजीजी ने तैयार किया था। पर्सी ब्राउन के अनुसार यह नक्शा बालबुक के सेण्ट स्टीफेंस चर्च के नक्शे के आधार पर बनाया गया था।

उन्नीसवीं सदी का ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

उन्नीसवीं शताब्दी ईस्वी की ब्रिटिश-भारतीय स्थापत्य कला पर यूरोप की गोथिक शैली का प्रभाव है। यरोपीय शैली के आधार पर ई.1802 में कलकत्ता का गवर्नमेण्ट हाउस बनाया गया। चार्ल्स वायट ने इस भवन का नक्शा बनाया था जो कि डर्बीशायर के केडिल्सटन हॉल के नक्शे पर आधारित था। अंग्रेजों ने कलकत्ता सहित भारत के अन्य नगरों में भवन बनवाए। इनमें से बहुत से भवन भारतीय स्थापत्य कला पर आधारित थे।

ब्रिटिश शासन काल में कुछ भारतीय पूंजीपतियों ने बड़े-बड़े भवनों का निर्माण करवाया जिन पर यूरोपीय स्थापत्य कला का प्रभाव है। इन भवनों के सामने यूरोपीय पद्धति के लॉन एवं ऑर्चर्ड्स होते थे। परन्तु इन भवनों में गैलरी एवं खम्भे भारतीय स्थापत्य कला के आधार पर बनते थे।

इस प्रकार की अर्द्ध-यूरोपीय स्थापत्य कला अधिक लोकप्रिय नहीं हो सकी। भारतीय और पाश्चात्य स्थापत्य कला का समन्वय करने में मथुरा के तत्कालीन कलेक्टर एफ. एस. ग्राउज ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया। सर स्विनटन जैकब ने बीकानेर और जयपुर रियासतों की स्थापत्य कला का अध्ययन करके भारतीय और पाश्चात्य स्थापत्य कलाओं का श्रेष्ठ समन्वयन किया। आर. एल. चिशहोम तथा एच. इर्विन ने मद्रास में ऐसे भवन बनवाए जिनमें भारतीय और यूरोपीय स्थापत्य कला का मिश्रण किया गया था।

पंजाब में सरदार रामसिंह ने स्थापत्य कला का एक नया नमूना प्रस्तुत किया। लाहौर का सीनेट हॉल इसी आधार पर बनाया गया। संयुक्त प्रदेश (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में एफ. सी. ओर्टेल ने और बंगाल में ई. बी. हैवेल ने भारतीय और पाश्चात्य स्थापत्य कला का समन्वय प्रस्तुत करने वाले भवन बनवाए। बम्बई में जी. विटेट ने गेट वे ऑफ इण्डिया और प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूजियम का निर्माण करवाया।

चर्चगेट रेलवे स्टेशन भवन

ई.1876 में अंग्रेजों ने बम्बई में चर्चगेट रेलवे स्टेशन भवन बनवाया। ई.1928 में इस रेल्वे स्टेशन भवन का पुनर्निर्माण किया गया। पहले इस स्थान पर सेंट जॉर्ज फोर्ट की तरफ जाने वाली सड़क पर चर्चगेट नामक एक द्वार बना हुआ था जो सेंट थॉमस कैथेड्रल चर्च की ओर जाता था। बम्बई नगर का आकार बढ़ाने के लिए ई.1860 में इस गेट को ध्वस्त कर दिया गया था। उसी गेट की स्मृति में इस स्टेशन का नाम चर्चगेट रखा गया।

इस भवन की स्थापत्य शैली को स्विस शैलेट शैली कहा जाता है। यह शैली मूलतः स्विट्जरलैण्ड और मध्य यूरोप की अल्पाइन पहाड़ियों में स्थित गांवों में बने शैलेटों पर आधारित है।

बीसवीं सदी का ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

बीसवीं शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में वायसराय एवं गवर्नर जनरल लॉर्ड कर्जन ने भारत में राजकीय भवनों के निर्माण के लिए जे. रेन्सम की अध्यक्षता में पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट स्थापित किया। इस विभाग ने कलकत्ता एवं दिल्ली सहित भारत के अनेक नगरों में बड़े एवं प्रसिद्ध भवन बनाए।

विक्टोरिया मेमोरियल हॉल

अंग्रेज सरकार ने ई.1906 में कलकत्ता में विक्टोरिया मेमोरियल हॉल बनवाना आरम्भ किया जो ई.1921 में पूरा हुआ। इस भवन का डिजायन विलियम इमर्सन ने तैयार किया था। विक्टोरिया मेमोरियल हॉल में मकराना का सफेद संगमरमर लगाया गया। यह भवन यूरोपीय पुनरुद्धार कला का श्रेष्ठ उदाहरण है।

नई दिल्ली के भवन

जब ई.1911 में अंग्रेज अपनी राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले आए, तब उन्होंने दिल्ली में नए भवन बनवाने आरम्भ किए। ई.1930 में सर एडविन ल्यूटेन्स तथा सर एडवर्ड बेकर ने नई दिल्ली का नक्शा तैयार किया। इस काल में नई दिल्ली में निर्मित समस्त भवन यूरोपीय और भारतीय स्थापत्य कला की मिश्रित शैली पर बने थे। ये विशाल भवन चौड़ी सड़कों के दोनों ओर बने हैं तथा अत्यंत सादगी पूर्ण हैं। इन भवनों के बाहरी हिस्सों में खम्भे, आर्च एवं लॉन आदि बनाकर उन्हें प्रभावशाली बनाया गया है।

ई.1911 से 1947 तक की अवधि में अंग्रेजों ने नई दिल्ली में राजकीय कार्यालयों के भवनों के साथ-साथ अनेक गिरजाघर और ईसाई कब्रिस्तान बनवाए जिनमें यूरोपीय स्थापत्य की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। इस काल में दिल्ली में बनवाए गए भवनों में वायसराय भवन, इण्डिया गेट तथा संसद भवन सबसे महत्वपूर्ण ब्रिटिश कालीन स्थापत्य हैं।

वायसराय भवन

भारत में कार्यरत अंग्रेज सरकार ने ने ई.1912 में नई दिल्ली में वायसराय भवन का निर्माण आरम्भ किया जिसे अब राष्ट्रपति भवन कहते हैं। वायसराय भवन में चार मंजिलें हैं जिनमें कुल 340 कमरे हैं। इस भवन का कारपेट एरिया दो लाख वर्ग फुट (19,000 वर्ग मीटर) है।

वायसरराय भवन के निर्माण में 70 करोड़ ईटें और दस लाख घन फुट (85,000 क्यूबिक मीटर) पत्थर लगा। इसके अतिरिक्त स्टील और लकड़ी का उपयोग भी बहुतायत से किया गया। वायसराय भवन की निर्माण सामग्री तैयार करने के लिए लुटियंस ने भारतीय कारीगरों का उपयोग किया तथा उनके लिए दिल्ली और लाहौर में कार्यशालाएँ स्थापित कीं।

वायसराय भवन का डिजाइन यूरोप के एडवर्डियन बारोक काल का है, उस काल में शासन की भव्यता प्रदर्शित करने के लिए भारी शास्त्रीय रूपांकनों का प्रयोग किया जाता था। लुटियंस के आरम्भिक डिजाइन पूर्णतः यूरोपियन क्लासिकल स्टाइल के थे। बाद में लुटियंस ने इस भवन के बाहरी डिजाइन में इंडो-सारसेनिक रूपांकनों (इण्डो-मुस्लिम शैली) को शामिल किया तथा इसमें विभिन्न भारतीय तत्वों को जोड़ा गया।

इनमें भवन के शीर्ष पर कई गोलाकार पत्थर के बेसिन शामिल थे। पारंपरिक भारतीय छज्जा भी सम्मिलित किया गया। यह एक पतला, फैला हुआ एलीमेंट था जो भवन से 8 फुट आगे तक बढ़ा हुआ था और गहरी छाया बनाता था। छज्जे के उपयोग से खिड़कियों पर गिरने वाली धूप एवं बरसात की सीधी बौछारों को रोकने में सहायता मिली। छत पर कई चुटरी थीं जो गुंबद से ढकी हुई नहीं थी। लुटियंस ने भारतीय डिजाइन तत्वों का पूरे भवन में संयम और प्रभावी ढंग से उपयोग किया।

स्तंभ के शीर्ष पर एक विशिष्ट रूप से अनोखा मुकुट है जिसमें कांस्य कमल के फूल से एक कांच का सितारा निकलता है। वायसराय भवन में राजस्थानी शैली की लाल बलुआ पत्थर की जालियां भी प्रयुक्त की गईं। महल के सामने पूर्व की ओर असमान रूप से फैले हुए 12 विशाल स्तंभ हैं। लुटियंस ने इस भवन में एक नॉन्स ऑर्डर भी लगाया जिसमें अशोक का लेख अंकित है। चार लटकन वाली भारतीय घंटियों के साथ अकेंथस के पत्तों का मिश्रण है। घंटियाँ भारतीय हिंदू और बौद्ध मंदिरों की शैली के समान हैं, यह अंकन कर्नाटक के मूदाबिद्री जैन मंदिर से प्रेरित है।

स्तंभ के शीर्ष पर प्रत्येक कोने पर एक घंटी है। ये शांत घंटियाँ इस बात की प्रतीक हैं कि भारत में ब्रिटिश राजवंश का अंत कभी नहीं होगा। वायसराय भवन से पहले के ब्रिटिश भवनों में इंडो-सरसेनिक रिवाइवल वास्तुकला का उपयोग किया गया था जिनमें मुगल वास्तुकला के तत्वों को अनिवार्य रूप से पश्चिमी ढांचे पर ग्राफ्ट किया गया था।

लुटियंस ने बहुत इस भवन के स्थापत्य में मौर्य कालीन बौद्ध कला से भी प्रेरणा ली। इसे देहली ऑर्डर और मुख्य गुंबद में देखा जा सकता है जहाँ नीचे के ड्रम की सजावट सांची बौद्ध स्तूप के चारों ओर की रेलिंग की याद दिलाती है। इसमें मुगल और यूरोपीय औपनिवेशिक स्थापत्य तत्वों की उपस्थिति है। यह संरचना अन्य समकालीन ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रतीकों से पूरी तरह अलग है।

लुटियंस ने वायसराय भवन में कई छोटे-छोटे अभिनव प्रयोग भी किए, जैसे कि उद्यान की दीवारों में एक क्षेत्र और स्टेटरूम में दो वेंटिलेटर खिड़कियाँ जो उनके चश्मे जैसी दिखती थीं। वाइसरीगल लॉज का अधिकांश भाग ई.1929 तक पूरा हो गया था। नई दिल्ली के अन्य भवनों के साथ ई.1931 में इस भवन का आधिकारिक उद्घाटन किया गया। ई.1932-33 में वायसराय भवन के बॉलरूम में महत्वपूर्ण सजावट जोड़ी गई जिसे इतालवी चित्रकार टॉमासो कर्नलो ने बनाया।

जयपुर स्तंभ में हाथियों की मूर्तियाँ और नागों की फव्वारा मूर्तियाँ भी लगाई गईं। साथ ही जयपुर स्तंभ के आधार के चारों ओर उभरी हुई आकृतियाँ भी थीं जिन्हें ब्रिटिश मूर्तिकार चार्ल्स सार्जेण्ट जैगर ने बनाया था।
भवन का लेआउट प्लान एक विशाल वर्गाकार भवन के चारों ओर डिजाइन किया गया है जिसके भीतर कई आँगन और खुले भीतरी क्षेत्र हैं। योजना में दो विंग बनाने का प्रस्ताव था; एक वायसराय के परिवार और उसके स्टाफ के लिए तथा दूसरा अतिथियों के लिए।

वायसराय भवन का रेजीडेंस विंग एक अलग चार मंजिला भवन है, जिसके भीतर इसका दरबार क्षेत्र भी है। यह विंग इतना बड़ा है कि भारत की आजादी के बाद प्रथम भारतीय गवर्नर-जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने छोटे अतिथि विंग में ही अपना निवास बनाया। बाद में भारत के समस्त राष्ट्रपतियों ने भी इसी विंग में अपना आवास बनाया। वायसराय के लिए बनी रेजीडेंस विंग का उपयोग अब राजकीय स्वागत समारोहों और राष्ट्राध्यक्षों के आगमन के समय गेस्ट विंग के रूप में किया जाता है।

वायसराय भवन में बने गणतंत्र मंडप का वास्तविक नाम दरबार हॉल था। यह मुख्य भवन के दोहरे गुंबद के ठीक नीचे स्थित है। आजादी से पहले इसे सिंहासन कक्ष के रूप में जाना जाता था। इसमें वायसराय और उसकी पत्नी के लिए दो अलग-अलग सिंहासन थे। भारत की स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रपति की एक ऊंची कुर्सी, 33 मीटर की ऊंचाई से लटके बेल्जियम के कांच के झूमर के नीचे रखी जाती है।

हॉल का फर्श चॉकलेटी रंग के इटैलियन संगमरमर से बना है। गणतंत्र मंडप के स्तंभ दिल्ली ऑर्डर में बने हैं जिनमें खड़ी रेखाओं को घंटी की आकृति से जोड़ा गया है। स्तंभ की खड़ी रेखाओं का उपयोग कमरे के चारों ओर बनी फ्रिज में भी किया गया है जो कि स्तंभों के पारंपरिक ग्रीक ऑर्डर में नहीं किया जाता। स्तंभ पीले जैसलमेरी संगमरमर से बने हैं, जिनके बीच में एक मोटी रेखा चलती है। गणतंत्र मंडप में 500 मनुष्य बैठ सकते हैं। इसी भवन में जवाहरलाल नेहरू ने 15 अगस्त 1947 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी।

वायसराय भवन में बने अशोक मंडप का वास्तविक नाम अशोक हॉल है। 32 मीटर गुणा 20 मीटर का एक आयताकार कमरा है। इसे लकड़ी के फर्श वाले नृत्य कक्ष के रूप में बनाया गया था। इसकी छत पर फारसी चित्रकला शैली का चित्रण है। यह चित्र मूलतः मेहर अली द्वारा कजर युग में बनाई गई एक ऑयल पेंटिंग की अनुकृति है। इसमें राजा फतह-अली शाह कजर के नेतृत्व में एक शाही शिकार अभियान को दर्शाया गया है। दीवारों पर इतालवी कलाकार टॉमासो कोलोनेलो द्वारा परिकल्पित भित्तिचित्र हैं जो फारसी लघुचित्र शैलियों से प्रेरित हैं।

वायसराय भवन के बीच में स्थित गुंबद में भारतीय और ब्रिटिश शैलियों का मिश्रण किया गया है। इनके बीच में एक ऊँचा ताँबे का मुख वाला गुंबद है जिसके कई हिस्सों में एक बहुत ऊँचे ढोल के ऊपर एक आकृति बनी हुई है जो भवन के बाकी हिस्सों से अलग दिखाई देती है। यह गुंबद वायसराय भवन के चारों कोनों के विकर्णों के ठीक बीच में है। यह भवन की ऊँचाई से दोगुने से भी अधिक ऊँचा है और शास्त्रीय और स्थानीय शैलियों का मिश्रण है। लुटियंस ने गुंबद को डिजाइन करते समय रोम के पैंथियन को एक मॉडल के रूप में लिया था, हालाँकि गुंबद के बाहरी हिस्से को भी आंशिक रूप से प्रारंभिक बौद्ध स्तूपों के अनुरूप बनाया गया।

मुगल गार्डन

मुगल गार्डन को अब अमृत उद्यान कहा जाता है। यह उद्यान राष्ट्रपति भवन के पीछे स्थित है। इस उद्यान में मुगल और अंग्रेजी भूनिर्माण शैलियों का मिश्रण किया गया है और इसमें फूलों एवं वृक्षों की एक विशाल विविधता है। समकोण पर एक-दूसरे को काटती हुई दो मुख्य धाराएँ इस उद्यान को वर्गों के एक जाल में विभाजित करती हैं इनके संगम पर कमलकार छः फव्वारे हैं जिनकी ऊँचाई 12 फुट है।

पक्षियों को दाना खिलाने के लिए पक्षी-मेजें भी रखी गई हैं। मुख्य उद्यान के दोनों ओर ऊँचे स्तर पर, उद्यान की दो अनुदैर्ध्य पट्टियाँ हैं, जो उत्तरी और दक्षिणी सीमाएँ बनाती हैं। यहाँ उगाए गए पौधे मुख्य उद्यान के समान ही हैं। दोनों पट्टियों के मध्य में एक फव्वारा है, जो अंदर की ओर गिरता है और एक कुआँ बनाता है। पश्चिमी सिरे पर दो गजेबो और पूर्वी सिरे पर दो अलंकृत संतरी चौकियाँ हैं।

मुगल गार्डन के पश्चिम में पर्दा उद्यान है जो केंद्रीय फुटपाथ के दोनों ओर फैला हुआ है। यह फुटपाथ गोलाकार उद्यान की ओर जाता है। लगभग 12 फुट ऊँची दीवारों से घिरा यह उद्यान मुख्यतः गुलाबों का उद्यान है। इसमें 16 वर्गाकार क्यारियाँ हैं जो कम ऊँचाई वाली बाड़ों से घिरी हैं। केंद्रीय फुटपाथ के ऊपर बीच में लाल बलुआ पत्थर का एक परगोला है जो विभिन्न प्रकार की लताओं से घिरा हुआ है।

इण्डिया गेट

1920 के दशक तक दिल्ली में केवल एक ही रेलवे स्टेशन था जिसे अब पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन कहते हैं। इस स्टेशन तक जाने वाली आगरा-दिल्ली रेलवे लाइन लुटियन्स दिल्ली और किंग्सवे अर्थात् राजाओं के गुजरने का रास्ता (आजादी के बाद राजपथ तथा अब कर्त्तव्य पथ) से होकर जाती थी। ई.1924 में अंग्रेज सरकार ने इस स्थान पर इण्डिया गेट बनाने का निश्चय किया। इसलिए यहाँ से निकलने वाली रेलवे लाइन को यमुना नदी के पास स्थानान्तरित किया गया।

ई.1931 में अंग्रेज सरकार ने किंग्सवे पर इण्डिया गेट का निर्माण करवाया। यह मूलतः युद्ध-स्मारक था जो प्रथम विश्वयुद्ध एवं अफगान युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए 90 हजार भारतीय सैनिकों को समर्पित किया गया था। इसकी ऊँचाई 43 मीटर है। इसका डिजाइन सर बालेन शाह ने तैयार किया था। यह स्मारक पेरिस के आर्क डे ट्रॉयम्फ़ से प्रेरित है। इसे सन् 1931 में बनाया गया था। यूनाइटेड किंगडम के कुछ सैनिकों और अधिकारियों सहित कुल 13,300 सैनिकों के नाम इण्डिया गेट पर उत्कीर्ण हैं। यह स्मारक लाल और पीले बलुआ पत्थरों से निर्मित है।

जब इण्डिया गेट बनकर तैयार हुआ था तब इसके सामने इंग्लैण्ड के राजा जार्ज पंचम की एक मूर्ति लगी हुई थी। उस मूर्ति को ब्रिटिश राज के समय की अन्य मूर्तियों के साथ कोरोनेशन पार्क में स्थापित कर दिया गया। अब जार्ज पंचम की मूर्ति की जगह प्रतीक के रूप में केवल एक छतरी रह गयी है। 625 मीटर के व्यास में स्थित इण्डिया गेट का षट्भुजीय क्षेत्र 306,000 वर्ग मीटर के क्षेत्रफल में फैला है।

मंदिरों का ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

अंग्रेजों के शासन काल में मंदिर-वास्तु भी नवीन स्वरूप के साथ विकसित हुआ। दिल्ली का लक्ष्मीनारायण मंदिर, बनारस के हिंदू विश्वविद्यालय के भवन, वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी का भारत माता मंदिर बीसवीं शती के मंदिर-वास्तु की उत्कृष्ट कृतियाँ हैं।

कुशीनगर में बने निर्वाण बिहार, बुद्ध मंदिर और सरकारी विश्रामगृह में बौद्ध कला को पुनर्जीवन मिला है। दिल्ली में लक्ष्मीनारायण मंदिर के साथ भी एक बुद्ध मंदिर है। इस काल में राजाओं के महलों और विद्यालय भवनों ने भी वास्तु-कला को नवीन स्वरूप प्रदान किया तथा हिन्दू, जैन, बौद्ध, मुस्लिम एवं ईसाई स्थापत्य पद्धतियों के मेल से भारतीय स्थापत्य कला पूर्ण रूप से नवीन स्वरूप में ढल गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें : मुगल स्थापत्य कला

अ. मुगल स्थापत्य कला की विशेषताएँ

ब. बाबर कालीन स्थापत्य

स. हुमायूँ कालीन स्थापत्य

द. अकबर कालीन स्थापत्य

य. जहाँगीर कालीन स्थापत्य

र. शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

ल. ताजमहल का स्थापत्य

व. औरंगजेब कालीन स्थापत्य

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