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माउण्टबेटन का सुझाव

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माउण्टबेटन का सुझाव था किजूनागढ़ के मसले को यूनाईटेड नेशन्स में ले जाना चाहिये अन्यथा भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ जायेगा। सरदार पटेल ने माउण्टबेटन का सुझाव मानने से मना कर दिया!

जूनागढ़ नवाब द्वारा पाकिस्तान में मिलने की घोषणा करने से जूनागढ़ की जनता में बेचैनी फैल गई तथा जनता ने नवाब की कार्यवाही का विरोध करते हुए एक स्वतन्त्र अस्थायी सरकार स्थापित कर ली। भारत सरकार ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली को तार भेजकर कहलवाया कि वह जूनागढ़ के सम्मिलन को अस्वीकृत कर दे।

लॉर्ड माउण्टबेटन ने इस तार को चीफ ऑफ द गवर्नर जनरल्स स्टाफ लॉर्ड इस्मे के हाथों कराची भिजवाया। लियाकत अली ने भारत सरकार की इस मांग को यह कहकर मानने से अस्वीकार कर दिया कि जो टेलिग्राम लॉर्ड इस्मे के साथ भेजा गया है, उस पर सम्बन्धित मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था। 13 सितम्बर 1947 को पाकिस्तान सरकार ने घोषणा की कि जूनागढ़ नवाब का निर्णय मान लिया गया है तथा अब वह पाकिस्तान का हिस्सा माना जायेगा।

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पाकिस्तान से एक छोटी टुकड़ी समुद्र के रास्ते जूनागढ़ को रवाना कर दी गई। पाकिस्तान की यह कार्यवाही कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के मध्य, हुए उस समझौते का उल्लंघन थी जिसमें दोनों पक्षों ने यह मान लिया था कि भारत की सीमाओं से घिरी हुई रियासतों को भारत में ही मिलना होगा।

जूनागढ़ के पाकिस्तान में मिलने की घोषणा को पाकिस्तान द्वारा स्वीकार कर लिये जाने के बाद, नवाब मुहम्मद महाबत खानजी के सैनिकों ने, जूनागढ़ राज्य की हिन्दू जनता का उत्पीड़न करना आरम्भ कर दिया ताकि बहुसंख्यक हिन्दू, जूनागढ़ छोड़कर भाग जायें। जूनागढ़ के चारों तरफ छोटी हिन्दू रियासतों का जमावड़ा था।

नवाब ने अपनी सेनाएं भेजकर इन रियासतों पर अधिकार कर लिया। उन्होंने भारत सरकार से सहायता मांगी। माउण्टबेटन ने सुझाव दिया कि इस मसले को यूनाईटेड नेशन्स में ले जाना चाहिये अन्यथा भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ जायेगा। सरदार पटेल को यह सुझाव पसंद नहीं आया। वे जूनागढ़ को कड़ा सबक सिखाकर हैदराबाद और कश्मीर को भी चुनौती देना चाहते थे।

24 सितम्बर 1947 को भारत सरकार ने काठियावाड़ डिफेंस फोर्स को जूनागढ़ के विरुद्ध कार्यवाही करने को कहा। इस सेना ने जूनागढ़ को चारों तरफ से घेर लिया। कुछ दिन बाद जब जूनागढ़ की सेना के पास रसद की कमी हो गई तब भारतीय सेना आगे बढ़ी। जूनागढ़ की जनता ने इस सेना का स्वागत किया।

24 अक्टूबर 1947 को नवाब अपने विशेष हवाई जहाज में बैठकर पाकिस्तान भाग गया। वह अपनी चार बेगमों एवं सैंकड़ों कुत्तों को हवाई जहाज में ले जाना चाहता था किंतु एक बेगम तथा बहुत से कुत्ते जूनागढ़ में ही छूट गये। नवाब अपने साथ अपने समस्त जवाहरात भी ले गया। नवाब तथा उसका परिवार कराची में बस गये। 9 नवम्बर 1947 को भारतीय सेना ने जूनागढ़ पर अधिकार कर लिया। यदि सरदार पटेल माउण्टबेटन का सुझाव मान लेते तो जूनागढ़ का भारत में विलय समय पर नहीं हो पाता तथा यह भी काश्मीर समस्या की तरह एक नासूर बन जाता।

20 फरवरी 1948 को भारत सरकार द्वारा जूनागढ़ में जनमत-संग्रह करवाया गया जिसमें रियासत की 2 लाख से अधिक जनसंख्या ने भाग लिया तथा 99 प्रतिशत जनसंख्या ने भारत में मिलने की इच्छा व्यक्त की। 17 नवम्बर 1959 को पाकिस्तान में नवाब मुहम्मद महाबत खानजी की मृत्यु हुई। जूनागढ़ का नवाब शाह नवाज भुट्टो भी पाकिस्तान चला गया जहाँ उसे कराची में बहुत बड़ी जमीन दी गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

निजाम हैदराबाद ने हैदराबाद की समस्या को भारत के पेट में नासूर बना दिया!

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भारत की आजादी के समय हैदराबाद भारत का सबसे बड़ा राज्य था। यहां की जनता हिन्दू थी किंतु शासक मुसलमान था जिसे निजाम हैदराबाद कहा जाता था। वह भारत में शामिल नहीं होना चाहता था। इसलिए निजाम हैदराबाद ने हैदराबाद की समस्या को भारत के पेट में नासूर बना दिया!

15 अगस्त 1947 तक भारत में न मिलने वाली दूसरी रियासत हैदराबाद थी। हैदराबाद रियासत की स्थापना ई.1720 में मुगल सूबेदार चिनकुलीजखाँ ने की थी। उसने निजामुल्मुल्क की उपाधि धारण की थी। इस कारण हैदराबाद के शासक को निजाम कहा जाता था। ई.1798 में हैदराबाद रियासत ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सहायता की संधि (सबसीडरी एलायंस) की।

हैदराबाद निजाम को अंग्रेज सरकार द्वारा 21 तोपों की सलामी दी जाती थी। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हैदराबाद रियासत का क्षेत्रफल 2,14,190 वर्ग किलोमीटर था।

यह भारत का सबसे बड़ा तथा सबसे समृद्ध देशी राज्य था। क्षेत्रफल में वह फ्रांस जितना बड़ा था। हैदराबाद की जनसंख्या लगभग 1,63,40,000 थी। वर्तमान में स्थित महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश प्रांतों के भू-भाग, हैदाराबाद राज्य में स्थित थे।

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जूनागढ़ की भांति हैदराबाद का शासक भी मुसलमान था किंतु राज्य की 85 प्रतिशत जनता हिन्दू थी। हैदराबाद राज्य चारों तरफ से भारतीय सीमाओं से घिरा हुआ था। हैदराबाद के अंतिम निजाम ओस्मान अली खान आसिफ जाह (सप्तम) के 28 पुत्र तथा 44 पुत्रियां थीं। निजाम को सोना तथा हीरे-जवाहर एकत्र करने की सनक थी। निजाम को भारत का सबसे अमीर शासक माना जाता था।

निजाम प्रजातन्त्र को दूषित प्रणाली समझता था और राजाओं के दैवीय अधिकारों में विश्वास रखता था। उसने रियासत के समस्त शासनाधिकार स्वयं में केन्द्रित कर रखे थे। निजाम के अधिकारी भी उसी के समान चालाक तथा लालची थे। राज्य की समस्त नौकरियां मुसलमानों के लिये आरक्षित थीं।

1947 में हैदाराबाद में एक विधान सभा बनाई गई जिसमें 48 पद मुसलमानों के लिये तथा 38 पद हिन्दुओं के लिये रखे गये ताकि कोई कानून ऐसा न बन सके जो मुसलमान रियाया के अधिकारों के विरुद्ध हो। इस विधानसभा को इतने अधिकार दिये गये कि यदि निजाम स्वयं भी चाहे तो मुसलमान रियाया के अधिकारों में कटौती न कर सके।

निजाम को अपने राज्य के विशाल भू-भाग, विपुल धन-सम्पत्ति, ब्रिटिश शासकों से पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे सम्बन्धों तथा विशाल सेना पर बड़ा भरोसा था। इसलिये वह हैदराबाद राज्य को भारत अथवा पाकिस्तान में मिलाने के स्थान पर स्वतन्त्र देश बनाना चाहता था। निजाम को विश्वास था कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा ब्रिटिश क्राउन से समय-समय पर जो संधियां की गई थीं, उनके बल पर वह हैदराबाद को स्वतंत्र बनाये रखने में सफल होगा।

जब 15 मार्च 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भारतीयों के आत्मनिर्णय के अधिकार को स्वीकार करने की घोषणा की, तभी से निजाम ने अपने राज्य को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दिलवाने के प्रयास आरभ्भ कर दिये। निजाम लॉर्ड माउण्टबेटन को अपना मित्र मानता था तथा उसे विश्वास था कि माउण्टबेटन हैदराबाद को भारत एवं पाकिस्तान से अलग डोमिनियन नेशन के रूप में मान्यता दिलवाने में निजाम की सहायता करेगा।

हैदाराबाद को इस तरह का आचरण करते देख सरदार पटेल को कहना पड़ा कि हैदराबाद भारत के पेट में नासूर की तरह है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हैदराबाद में सत्याग्रह आंदोलन

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जब निजाम हैदराबाद ने भारत में सम्मिलन के पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए तो पटेल ने कांग्रेस को हैदराबाद में सत्याग्रह आंदोलन चलाने का निर्देश दिया !

9 जून 1947 को निजाम ने वायसराय माउण्टबेटन को एक पत्र लिखा जिसमें उसने अपने मन की अकुलाहट को खुलकर व्यक्त किया- ‘पिछले कुछ दिनों में मैंने स्वाधीनता बिल का सातवां हिस्सा (क्लॉज) जैसा कि अखबारों में आया है, देखा। मुझे अफसोस है कि पिछले महीनों में जैसा अक्सर होता रहा, कि इस मामले में राजनैतिक नेताओं से अच्छी तरह बातचीत की गई और रजवाड़ों के प्रतिनिधियों से बातचीत तो दूर, उन्हें यह दिखाया भी नहीं गया।

यह देखकर मुझे दुःख हुआ कि यह बिल न सिर्फ एक तरफा ढंग से ब्रिटिश सरकार के साथ की गई संधियों और समझौतों को रद्द करती है बल्कि यह आभास भी देती है कि अगर हैदराबाद पाकिस्तान या हिन्दुस्तान का हिस्सा नहीं बन सका तो ब्रिटिश कॉमनवैल्थ में भी नहीं रह सकेगा।

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जिन संधियों के आधार पर बरसों पहले ब्रिटिश सरकार ने विदेशी हमले और आंतरिक विद्रोह के खिलाफ मेरे खानदान और इस राज्य को बचाने का वादा किया था उसकी हमेशा दाद दी जाती रही और हिमायत होती रही।

इनमें सर स्टैफर्ड क्रिप्स का 1941 का वादा प्रमुख है। मैंने समझा था कि ब्रिटिश फौज और वादे पर मैं अच्छी तरह भरोसा कर सकता हूँ। मैं अपनी फौज नहीं बढ़ाने पर राजी हो गया, अपने कारखानों में हथियार नहीं तैयार करने के लिये राजी हो गया। और उधर हमारी सहमति तो दूर, हमसे या हमारी सरकार से सलाह किये बगैर बिल पास हो गया। आपको पता है कि जब आप इंग्लैण्ड में थे, मैंने मांग की थी कि जब अँग्रेज हिन्दुस्तान छोड़कर जायें तो हमें भी उपनिवेश का दर्जा मिले।

मैंने हमेशा महसूस किया है कि एक शताब्दी से ज्यादा की वफादार दोस्ती, जिसमें हमने अँग्रेजों को अपना सारा विश्वास दिया, का इतना तो नतीजा होगा ही कि बिना किसी सवाल के हमें कॉमनवेल्थ में रहने दिया जाये। लेकिन अब लगता है कि वह भी इन्कार किया जा रहा है।

मैं अब भी उम्मीद करता हूँ कि किसी तरह का मतभेद मेरे और ब्रिटिश सरकार के सीधे रिश्ते के बीच नहीं आयेगा। हाल में ही मुझे बताया गया कि आपने यह भार अपने ऊपर ले लिया है कि पार्लियामेंट में ऐसी घोषणा होगी ताकि ऐसे सम्बन्ध सम्भव हों।’

इस पर वासयराय माउण्टबेटन ने नवाब को सूचित किया कि हैदराबाद को उपनिवेश का दर्जा नहीं दिया जा सकता क्योंकि इसके चारों ओर उस देश का हिस्सा होगा जो इस स्थिति में दुश्मन बन जायेगा।

ब्रिटिश सरकार की दृष्टि में हैदराबाद के लिये एक ही रास्ता है कि वह हिन्दुस्तान में सम्मिलित हो जाये किंतु हैदराबाद के अधिकारियों एवं कोनार्ड कोरफील्ड के कहने पर चल रहे भारत सरकार के राजनैतिक विभाग के अधिकारियों ने नवाब को सलाह दी कि वह वायसराय की सलाह को न माने।

7 अगस्त 1947 को कांग्रेस ने सरदार के निर्देश पर हैदराबाद रियासत में एक सत्याग्रह आंदोलन आरम्भ किया। निजाम ने इस आंदोलन को सख्ती से कुचलने के लिये रियासती पुलिस के साथ-साथ कट्टर साम्प्रदायिक मुस्लिम रजाकारों को भी प्रोत्साहित किया। इस कारण यह आंदोलन हिंसक हो गया। इसी समय तेलंगाना में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में एक शक्तिशाली किसान संघर्ष भी हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

माउण्टबेटन योजना घर चली गई!

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माउण्टबेटन योजना घर चली गई

पटेल ने हैदराबाद के नवाब से कहा कि माउण्टबेटन योजना घर चली गई है! उस समय नेहरू यूरोप दौरे पर थे तथा सरदार पटेल कार्यकारी प्रधानमंत्री के रूप में काम कर रहे थे।

वायसराय के दबाव से नवम्बर 1947 में हैदराबाद निजाम ने भारत के साथ स्टेंडस्टिल एग्रीमेंट पर दस्तख्त कर दिये जिसके अनुसार भारत और हैदराबाद के बीच पोस्ट ऑफिस, टेलिग्राफ, रेल, सड़क यातायात एवं व्यापार आदि सुचारू रूप से जारी रहें परन्तु निजाम, भारत संघ में सम्मिलित होने की बात को टालता रहा। इसी के साथ-साथ वह अपने राज्य में कट्टर साम्प्रदायिक मुस्लिम रजाकारों को भी प्रोत्साहित करता रहा।

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निजाम ने रजाकारों को विश्वास दिलाया कि जब हम विद्रोह करेंगे तो हमारे अँग्रेज दोस्त हमारी सहायता करेंगे। निजाम की शह पाकर मुस्लिम साम्प्रदायिक संगठन इतिदाद-उल-मुसलमीन और उसके अर्द्ध सैनिक रजाकरों ने हैदराबाद रियासत के बहुसंख्यक हिन्दुओं को डराना-धमकाना तथा लूटना-खसोटना आरम्भ कर दिया ताकि वे रियासत छोड़कर भाग जायें। रजाकारों की हिंसक वारदातों से रियासत में शान्ति एवं व्यवस्था बिगड़ गई। हैदराबाद रियासत से होकर गुजरने वाले रेलमार्गों तथा सड़कों को क्षतिग्रस्त किया जाने लगा तथा रेलों एवं बसों से यात्रा करने वाले हिन्दुओं को लूटा जाने लगा। इससे स्थिति बहुत खराब हो गई। मुस्लिम रजाकारों के नेता कासिम रिजवी ने भारत सरकार को धमकी दी कि वे सम्पूर्ण भारत को जीतकर दिल्ली के लाल किले पर निजाम का आसफजाही झण्डा फहरायेंगे। इसके बाद हैदराबाद राज्य में बड़े पैमाने पर हिन्दुओं की हत्याएं की जाने लगीं तथा उनकी सम्पत्ति को लूटा अथवा नष्ट किया जाने लगा। माउण्टबेटन, सरदार पटेल और वी. पी. मेनन ने निजाम को समझाने का प्रयास किया परन्तु अब स्थिति उसके नियन्त्रण में भी नहीं रही थी। रजाकार और कट्टर मुल्ला-मौलवी, मुसलमान जनता को भड़काकर साम्प्रदायिक दंगे करवा रहे थे। सरदार पटेल और वी. पी. मेनन तब तक चुप रहे जब तक कि माउण्टबेटन इंग्लैण्ड नहीं लौट गये।

जून 1948 में माउण्टबेटन के लौटने के दो माह बाद, सितम्बर 1948 में निजाम ने घोषणा की कि वह माउण्टबेटन योजना को स्वीकार करने के लिये तैयार है। इस पर 13 सितम्बर 1948 को पटेल ने उत्तर दिया- ‘अब बहुत देरी हो चुकी। माउण्टबेटन योजना तो घर चली गई है।’ उस समय नेहरू यूरोप दौरे पर थे तथा सरदार पटेल कार्यकारी प्रधानमंत्री के रूप में काम कर रहे थे।

इसलिये उन्होंने उसी दिन सेना को हैदराबाद को भारत में एकीकृत करने के आदेश दिये। इस कार्यवाही को ऑपरेशन पोलो नाम दिया गया। मेजर जनरल जोयन्तोनाथ चौधरी के नेतृत्व में भारतीय सेना हैदराबाद में प्रवेश कर गई। पांच दिन की कार्यवाही में भारतीय सेना ने मुस्लिम रजाकारों के प्रतिरोध को कुचल डाला।

हजारों रजाकार मारे गये। पूरे हैदराबाद में रजाकरों के शव पड़े हुए दिखाई देने लगे। 17 सितम्बर 1948 को हैदराबाद के सेनापति जनरल ई.आई. एड्रूस ने सिकंदराबाद में जनरल चौधरी के समक्ष समर्पण कर दिया। इस प्रकार केवल 5 दिन की पुलिस कार्यवाही में हैदराबाद को भारत में मिला लिया गया।

न कोई बम चला, न कोई क्रांति हुई, जैसा कि डराया जा रहा था। 18 सितम्बर को मेजर जनरल चौधरी ने हैदराबाद रियासत के सैनिक गवर्नर का पद संभाल लिया। हैदराबाद रियासत को भारतीय संघ में सम्मिलित कर लिया गया। विवश होकर निजाम को नई व्यवस्था स्वीकार करनी पड़ी।

सरदार पटेल ने उसके साथ सम्मान पूर्वक व्यवहार किया। उसे रियासत का मानद मुखिया बना रहने दिया गया। बाद में जब राज्यों का पुनर्गठन हुआ तो हैदराबाद रियासत को तोड़कर उसके क्षेत्र आंध्र प्रदेश, कर्नाटक तथा महाराष्ट्र प्रांतों में मिला दिये गये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

काश्मीर की समस्या यू.एन.ओ. में ले जाने पर पटेल, जवाहरलाल से नाराज हो गये

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अब यह सर्वविदित एवं निर्विवाद रूप से ज्ञात तथ्य है कि काश्मीर की समस्या जवाहरलाल नेहरू ने अपने स्वार्थ के कारण उत्पन्न की। इसमें काश्मीर के राजा हरिसिंह एवं काश्मीर के नेता शेख अब्दुल्ला की भी बड़ी भूमिकाएं थीं।

जब सितम्बर 1947 में पाकिस्तान ने काश्मीर पर आक्रमण किया तो सरदार पटेल ने तत्काल सेनाएं भेजकर काश्मीर को बचाने की इच्छा व्यक्त की किंतु जवाहरलाल नेहरू और माउण्टबेटन ने पटेल की इस इच्छा का यह कहकर विरोध किया कि जब तक काश्मीर का राजा भारत में मिलने की इच्छा व्यक्त न करे तब तक भारतीय सेना को काश्मीर में न भेजा जाये। इस पर पटेल ने श्रीनगर तथा बारामूला दर्रे को बचाने का प्रयास किया।

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पटेल ने रक्षामंत्री बलदेवसिंह को विश्वास में लेकर भारतीय सुरक्षा दलों को काश्मीर की सीमा पर भारतीय क्षेत्रों में इस प्रकार नियोजित किया जिससे उन्हें तत्काल युद्ध क्षेत्र में भेजा जा सके। उन्होंने श्रीनगर से पठानकोट तक सड़क बनाने का भी कार्य करवाया। सरदार पटेल इस मामले को संयुक्त राष्ट्रसंघ में ले जाने के पक्ष में नहीं थे परन्तु माउण्टबेटन की सलाह पर पं. नेहरू इस मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गये। 1 जनवरी 1948 को भारत ने सुरक्षा परिषद् में शिकायत की कि भारत के एक अंग कश्मीर पर सशस्त्र कबाइलियों ने आक्रमण कर दिया है और पाकिस्तान प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष, दोनों तरीकों से उन्हें सहायता दे रहा है।

उनके आक्रमण से अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं व्यवस्था को खतरा उत्पन्न हो गया है। अतः पाकिस्तान को अपनी सेना वापस बुलाने तथा कबाइलियों को सैनिक सहायता न देने को कहा जाये और पाकिस्तान की इस कार्यवाही को भारत पर आक्रमण माना जाये। 15 जनवरी 1948 को पाकिस्तान ने भारत के आरोपों को अस्वीकार कर दिया और भारत पर बदनीयती का आरोप लगाते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय असंवैधानिक है और इसे मान्य नहीं किया जा सकता।

सुरक्षा परिषद् ने इस समस्या के समाधान के लिए पांच राष्ट्रों की एक समिति गठित की और इस समिति को मौके पर स्थिति का अवलोकन करके समझौता कराने को कहा।

संयुक्त राष्ट्र समिति ने कश्मीर आकर मौके का निरीक्षण किया और 13 अगस्त 1948 को दोनों पक्षों से युद्ध बन्द करने और समझौता करने हेतु कई सुझाव दिये जिन पर दोनों पक्षों के बीच लम्बी वार्त्ता हुई। अंत में 1 जनवरी 1949 को दोनों पक्ष युद्ध-विराम के लिए सहमत हो गये।

यह भी तय किया गया कि अन्तिम फैसला जनमत-संग्रह के माध्यम से किया जायेगा। इसके लिए एक अमरीकी नागरिक चेस्टर निमित्ज को प्रशासक नियुक्त किया गया परन्तु पाकिस्तान ने समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया और जनमत-संग्रह नहीं हो पाया।

निमित्ज ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। काश्मीर की समस्या को यूएनओ में ले जाकर बुरी तरह उलझा दिया गया। इसके लिये सरदार पटेल जवाहरलाल नेहरू से नाराज हो गये।

आगे चलकर ई.1965 में पाकिस्तान और भारत के बीच काश्मीर को लेकर एक बार पुनः युद्ध हुआ तथा पाकिस्तान ने काश्मीर का बहुत बड़ा भू-भाग दबा लिया। काश्मीर का बहुत बड़ा भू-भाग आज भी पाकिस्तान के कब्जे में है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भोपाल नवाब को घुटने टेकने पर विवश कर दिया!

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भोपाल रियासत की स्थापना औरंगजेब की सेना के एक अफगान अधिकारी दोस्त मोहम्मद खान ने ई.1723 में की थी। भारत की स्वतंत्रता के समय भोपाल नवाब हमीदुल्लाह खां था जो कि ई.1926 में भोपाल रियासत का नवाब बना था। वह 1931 तथा 1944 में दो बार नरेन्द्र मण्डल का चांसलर चुना गया था। भारत की आजादी के समय भी वह नरेन्द्र मण्डल का चांसलर था। वह किसी भी हालत में भारत में नहीं मिलना चाहता था।

उसने जिन्ना के साथ मिलकर देश की अधिकांश रियासतों को पाकिस्तान में समिम्मलित होने अथवा स्वतंत्र रहने की घोषणा करने के लिये उकसाया। इससे नाराज होकर अधिकांश राजाओं ने नरेन्द्र मण्डल का बहिष्कार कर दिया। इससे भोपाल नवाब को नरेन्द्र मण्डल से त्यागपत्र देना पड़ा और नरेन्द्र मण्डल भंग हो गया। जिन्ना ने हमीदुल्लाह खां को पाकिस्तान में आने तथा जनरल सेक्रेटरी का पद स्वीकार करने का निमंत्रण दिया।

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13 अगस्त 1947 को हमीदुल्लाह खां ने अपनी पुत्री आबिदा को भोपाल रियासत का शासक बनने के लिये कहा ताकि स्वयं पाकिस्तान जा सके। आबिदा ने अपने पिता की इच्छा मानने से मना कर दिया। मार्च 1948 में हमीदुल्लाह खां ने भोपाल के स्वतंत्र रहने की घोषणा की। मई 1948 में नवाब ने भोपाल सरकार का मंत्रिमण्डल नियुक्त किया जिसके प्रधानमंत्री चतुरनारायण मालवीय थे। सरदार पटेल तथा वी. पी. मेनन, हमीदुल्लाह खां पर लगातार दबाव बना रहे थे कि वे भारत में सम्मिलित होेने की घोषणा करें। प्रधानमंत्री चतुर नारायण मालवीय भी रियासत को भारत में मिला देने के पक्ष में थे। भोपाल की जनता प्रजामण्डल आंदोलन चला रही थी।

वह भी रियासत को भारत में मिलाना चाहती थी। अक्टूबर 1948 में नवाब हज पर गया। दिसम्बर 1948 में भोपाल में विलीनीकरण को लेकर जबर्दस्त प्रदर्शन हुआ। भोपाल  की सरकार द्वारा ठाकुर लालसिंह, शंकर दयाल शर्मा, भैंरो प्रसाद तथा उद्धवदास आदि नेता बंदी बना लिये गये। 23 जनवरी 1949 को वी. पी. मेनन एक बार पुनः भोपाल आये तथा उन्होंने रियासत के अधिकारियों से कहा कि भोपाल स्वतंत्र नहीं रह सकता।

29 जनवरी 1949 को नवाब ने मंत्रिमण्डल को बर्खास्त करते हुए सत्ता के सारे सूत्र अपने हाथ में ले लिये। पण्डित चतुर नारायण मालवीय 21 दिन के उपवास पर बैठ गये। पटेल के निर्देश पर वी. पी. मेनन भोपाल में लाल कोठी में ठहरे हुए थे तथा रियासत की स्थिति पर दृष्टि रख रहे थे।

30 अप्रेल 1949 को नवाब ने भोपाल रियासत के विलीनीकरण पर हस्ताक्षर कर दिये। सरदार पटेल ने नवाब को पत्र लिखकर उसे धिक्कारा कि मेरे लिये यह एक बड़ी निराशाजनक और दुःख की बात थी कि आपके विवादित हुनर तथा क्षमताओं को आपने देश के उपयोग में उस समय नहीं आने दिया जब देश को उसकी जरूरत थी।

1 जून 1949 को भोपाल रियासत भारत का हिस्सा बन गई। केन्द्र द्वारा नियुक्त चीफ कमिश्नर एन. बी. बैनर्जी ने कार्यभार संभाल लिया। नवाब को 11 लाख वार्षिक का प्रिवीपर्स दिया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारतीय नागरिक सेवाएँ बनाए रखने का निर्णय लिया पटेल ने!

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भारत की आजादी के बाद जवाहर लाल नेहरू भारतीय नागरिक सेवाएँ भंग करना चाहते थे किंतु सरदार पटेल ने देश का शासन चलाने के लिए भारतीय नागरिक सेवाएँ बनाए रखने का निश्चय किया ताकि देश को मजबूत शासन तंत्र दिया जा सके!

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारतीय नागरिक सेवाओं (आईसीएस) में दक्षिण भारतीयों का बोलबाला था। दक्षिणात्य अधिकारियों की नौकरशाही इस कदर हावी थी कि अंग्रेजों के राज्य में यह कहावत चल पड़ी थी कि देहली इज रूल्ड आईदर बाई मद्रासी और बाई चपरासी। भारत की स्वतंत्रता के समय यह नौकरशाही बहुत काम आई। इसने आगे बढ़कर स्वेच्छा से अपनी सेवाएं, राष्ट्रीय नेताओं को दीं। यही कारण था कि सरदार पटेल का अत्यधिक झुकाव भारतीय नागरिक सेवाओं के अधिकारियों की तरफ रहता था।

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भारत की आजादी के समय राजपूताना के चारों बड़े राज्यों के प्रधानमंत्री भी दक्षिण भारतीय थे। वे देश की राजनीति में एक शक्तिशाली समूह के रूप में कार्य करने में सक्षम रहे। उदयपुर में सर टी. विजयराघवाचारी, जयपुर में सर वी. टी. कृष्णामाचारी, जोधपुर में सी. एस. वेंकटाचार एवं बीकानेर में सरदार के. एम. पनिक्कर दीवान के पद पर कार्यरत थे। वे चारों ही अच्छे मित्र थे

तथा उन्हें एक दूसरे का विश्वास प्राप्त था इसलिये उन्होंने निकट संगति के साथ कार्य किया और राजपूताना के इन चारों देशी राज्यों ने भारत की राजनीति में सम्मिलित प्रभाव बनाया। राज्यों के भारत में विलय तथा बाद में राजस्थान में सम्मिलन में भी इन दक्षिणात्य प्रधानमंत्रियों की भूमिका प्रभावी एवं सकारात्मक रही। सर वी. टी. कृष्णामाचारी (जयपुर), सरदार के. एम. पनिक्कर (बीकानेर), एम. ए. श्रीनिवासन (ग्वालियर), सर बी. एल. मित्रा (बड़ौदा) एवं सी. एस. वेंकटाचार (जोधपुर) ने इस महान उद्देश्य के लिये दोनों पक्षों को एक साथ लाने तथा देश को बलकान प्रांतों की तरह बिखरने से बचाने के लिये कठोर परिश्रम से कार्य किया।

उनके महान प्रयासों के बिना, 3 जून 1947 को माउण्टबेटन द्वारा भारत को स्वतंत्रता दिये जाने की घोषणा करने के बाद से लेकर 15 अगस्त 1947 तक की मात्र 11 सप्ताह की अवधि में इस कार्य को पूरा नहीं किया जा सकता था।

लंदन से बैरिस्टरी करने के कारण तथा अपने व्यक्तित्व की विलक्षणता के कारण सरदार पटेल इन अधिकारियों के अनुभव और ज्ञान का लाभ उठाने में समर्थ थे। यद्यपि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का मानना था कि इस सेवा के अधिकारियों में अहंकार की मात्रा अधिक है जो कि प्रजातंत्र के लिये अनुकूल नहीं है। भारत की गरीब जनता के उत्थान के लिये विनम्र सेवकों की आवश्यकता है न कि अहंकारी कठोर अधिकारियों की।

इसलिये आजादी के बाद नेहरू ने चाहा कि इन सेवाओं को समाप्त कर दिया जाये किंतु सरदार पटेल ने इन अधिकारियों की आवश्यकता को समझते हुए उन्हें बनाये रखने एवं उनका भारतीयकरण करने का पक्ष लिया।

संसद में चली लम्बी बहस के बाद अंत में पटेल की ही जीत हुई। इस प्रकार गृहमंत्री के नाते उन्होंने भारतीय नागरिक सेवाओं (इण्डियन सिविल सर्विसेज) का भारतीयकरण करके उन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवा में बदल दिया तथा अंग्रेजों की सेवा करने वाले काले साहबों को राजभक्ति से देशभक्ति की ओर मोड़ दिया। यदि सरदार पटेल कुछ वर्ष और जीवित रहते तो भारतीय नौकरशाही का पूर्ण कायाकल्प हो जाता।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

फांसी चढ़ाने का अधिकार

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देशी रियासतों के राजाओं के पास अपनी जनता को सजा देने के अधिकार थे। वे किसी को भी फांसी पर चड़ा सकते थे।सरदार पटेल नहीं चाहते थे कि भारत की आजादी के बाद भी राजाओं के पास प्रजा को फांसी चढ़ाने का अधिकार हो!

देशी राज्यों को भारत में सम्मिलित कर लेना सरदार पटेल की बड़ी सफलता थी किंतु यह सफलता तब तक अधूरी थी जब तक देशी राज्यों में प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था स्थापित न हो जाये। स्वतंत्र भारत में मिलने से पहले देशी राज्य अंग्रेजों के अधीन थे तथा अंग्रेजों को इन राज्यों में अबाध राज्य करने का अधिकार था।

यहाँ तक कि किसी भी राज्य में कोई राजा तब तक ही अपने सिंहासन पर बना रह सकता था जब तक कि अंग्रेज उससे खुश था। यह खुशी प्रायः तब तक ही बनी रहती थी जब तक उस राज्य का खजाना, अंग्रेजों को लूट के लिये उपलब्ध रहता था। बड़े से बड़े राज्य में उत्तराधिकारी भी अंग्रेज अपनी पसंद से चुनता था और उसे राजा बनाता था किंतु स्वतंत्र भारत में राजाओं की स्थिति बदल चुकी थी। उन्होंने केवल रक्षा, संचार और विदेश मामले ही भारत सरकार को समर्पित किये थे। शेष मामलों में वे पूरी तरह स्वतंत्र हो गये थे।

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अंग्रेजों के जाने के बाद देशी राजा बड़ी शान से अपने स्वर्ण मुकुट और चमकीली पगड़ियां पहन सकते थे तथा अपने गगनचुम्बी राजप्रासादों में विलासिता का जीवन जी सकते थे। वे अपनी दीन-हीन प्रजा को बात-बात पर फांसी पर चढ़ा सकते थे और अपने राज्य के समस्त प्राकृतिक संसाधनों एवं प्रजा से मिलने वाले विभिन्न करों को अपनी विलासिता पर खर्च कर सकते थे। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि भारत की आजादी का असली मजा राजा लोगों को ही आने वाला था।

पटेल नहीं चाहते थे कि दो गांवों से लेकर बड़े से बड़े राजा के पास प्रजा को फांसी चढ़ाने का अधिकार बना रहे। इसलिये इन रियासतों को लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के अंतर्गत लाना अनिवार्य हो गया। पटेल ने भारतीय नरेशों को समझाया कि आधुनिक विश्व की तरह देशी राज्यों में भी राजसत्ता का प्रयोग जनता के द्वारा एवं जनता के कल्याण के लिए होना चाहिए। उन्होंने राजाओं को चेतावनी दी कि किसी भी देशी राज्य में अशान्ति एवं अव्यवस्था सहन नहीं की जायेगी। देशी रियासतों में प्रजा मण्डल आंदोलन, आजादी के पहले से ही चल रहे थे

किंतु उन्हें अपने प्रयासों में आंशिक सफलता ही मिली थी। कुछ बड़े राज्यों में लोकप्रिय मंत्रिमण्डलों का गठन हुआ था किंतु उनमें प्रधानमंत्री से लेकर सामान्य मंत्रियों के अधिकांश पद राजाओं के रिश्तेदारों के पास थे। कुछ राज्यों में स्थानीय संविधानों का निर्माण भी हुआ था किंतु उनमें भी जागीरदारों को सामान्य जनता से अधिक अधिकार दिये गये थे।

कुछ देशी राज्यों में निर्वाचन पद्धति के आधार पर भी सरकारों का गठन हुआ था किंतु उनके संविधानों का निर्माण इस प्रकार किया गया था कि अधिक संख्या में जमींदार ही चुने जा सकें।

पटेल चाहते थे कि समस्त देशी रियासतों की प्रजा को भी भारतीय प्रांतों की प्रजा के समान आर्थिक, शैक्षणिक एवं अन्य क्षेत्रों में समान अवसर एवं सुविधाएं मिलें परन्तु राजाओं और उनके जागीरदारों के बने रहने तक ऐसा हो पाना संभव नहीं था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

देशी राज्यों का विलय

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देशी राज्यों का विलय स्वतंत्र भारत के सामने एक उलझन भरी समस्या बन गया। राजा लोग किसी भी कीमत पर न अपने राज्य छोड़ना चाहते थे और न अधिकार।

भारत संघ में रह गये 554 देशी राज्यों में से अधिकांश, आर्थिक दृष्टि से इतने कमजोर एवं छोटे थे कि वे अपने संसाधनों से एक छोटी सी सड़क भी नहीं बनवा सकते थे। बड़ी रियासतों में भी शासन की पद्धति इतनी पुरानी और मध्यकालीन थी कि प्रजा का सहज विकास संभव नहीं था।

अतः पटेल ने देशी राज्यों का एकीकरण करके संतुलित प्रशासनिक इकाइयां गठित करने का निर्णय लिया। यह काम आसान नहीं था। राजाओं को अपने स्वर्ण मुकुट और चमकीली पगड़ियां उतारने, गगनचुम्बी राजप्रासादों का त्याग करने तथा दीन-हीन प्रजा पर शासन करने का अबाध अधिकार छोड़ने के लिये मनाना एक तरह से असंभव को संभव कर दिखाने जैसा था। अंग्रेजों के जाने के बाद छोटे-से छोटे राजा को अपनी निरीह प्रजा को फांसी पर चढ़ाने का मनमाना अधिकार मिल गया था। इस अधिकार को राजा लोग भला क्यों त्यागने वाले थे ?

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राजाओं को अपने राज्य के समस्त प्राकृतिक संसाधनों एवं प्रजा से मिलने वाले विभिन्न करों को खर्च करने का अधिकार मिल गया था, ऐसे खीर भरे कटोरे को भला कौन राजा त्यागने को तैयार होता ?

सरदार पटेल जानते थे कि देशी राज्यों का विलय करने से पहले एक जोर का झटका इन राजाओं को दिया जाना आवश्यक है। सौभाग्य से देश की परिस्थितियां सरदार पटेल के अनुकूल थीं। देशी राज्य हमेशा के लिये भारत में आ चुके थे, वे भागकर बाहर नहीं जा सकते थे। उनका संरक्षण करने वाला अंग्रेज, सात समंदर पार जा चुका था। राजाओं को विद्रोह के लिये उकसाने वाला जिन्ना पाकिस्तान में अपनी जीत का जश्न मना रहा था। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को वैसे ही देशी राजाओं के नाम से चिढ़ थी। अतः 554 रियासतों के राजाओं से उनके मुकुट उतरवाना, पटेल के जीवन का अंतिम लक्ष्य बन गया।

पटेल को सूचना मिली कि बस्तर नामक रियासत में सोने का बड़ा भण्डार है। इस भूमि को दीर्घकालिक पट्टे के आधार पर हैदराबाद का निजाम खरीद रहा है। सरदार ने उसी दिन अपना थैला उठाया और वी. पी. मेनन के साथ बस्तर चल पड़े। बस्तर से निबटकर सरदार पटेल और वी. पी. मेनन उड़ीसा पहुंचे तथा उस क्षेत्र के 23 राजाओं को उड़ीसा नामक प्रांत में एकीकृत होने के लिये तैयार कर लिया।

इसके बाद पटेल और मेनन नागपुर पहुंचे तथा वहाँ के 38 राजाओं से मिले। इन्हें सैल्यूट स्टेट कहा जाता था। पटेल ने इन राज्यों से आखिरी सलामी ली और इन्हें भी प्रजातांत्रिक व्यवस्था में ले आया गया। इसके बाद पटेल काठियावाड़ पहुंचे जहाँ 250 बौनी रियासतें थीं। पटेल ने इन रियासतों का भी एकीकरण कर लिया।

पटेल का अगला पड़ाव बम्बई हुआ। वहाँ उन्होंने दक्षिण भारत की रियासतों को अपनी गठरी में बांधा और पंजाब आ गये। पटियाला का खजाना खाली था, सरदार ने परवाह नहीं की। फरीदकोट के राजा ने आनाकानी की तो पटेल ने फरीदकोट के नक्शे पर लाल पैंसिल घुमाते हुए पूछा कि क्या मर्जी है ?

राजा कांप उठा और पटेल की बात मानने पर सहमत हो गया। इस प्रकार राजाओं को उनके सिंहासनों से उतारकर सामान्य इंसान बना दिया गया। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बन गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पटेल का व्यावहारिक रुख

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पांच सौ चौवन राजाओं के सैंकड़ों साल पुराने राज्य खत्म होने जा रहे थे, मुसलमान अपना बोरिया-बिस्तर लेकर पाकिस्तान भाग रहे थे। सिक्खों के सैलाब पश्चिमी पंजाब से भारत की तरफ भागे चल आ रहे थे। सिंध प्रदेश पाकिस्तान में छूट गया था, देश में चारों तरफ अफरा-तफरी मची हुई थी। ऐसी स्थिति में सरदार पटेल का व्यावहारिक रुख भारत के बहुत काम आया।

सरदार पटेल जितने दृढ़ संकल्प के धनी थे, उतने ही व्यावहारिक भी थे। वे थोथे आदर्शों को व्यर्थ मानते थे और हर समय अपनी दृष्टि लक्ष्य पर गढ़ाये रहते थे। इसलिये उन्होंने राजाओं के साथ जोर-जबरदस्ती के स्थान पर, व्यावहारिक बुद्धि से काम लिया। उन्होंने राजाओं को अनेक राजसी सुविधायें, प्रिवीपर्स की लम्बी रकमें तथा राजप्रमुख और उपराजप्रमुख के पदों का लालच देकर अपनी राजनीति को सफल बनाया।

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कपूरथला रियासत के दीवान जरमनी दास ने राजाओं को दी गई सुविधाओं के बारे में लिखा है- पटेल ने राजाओं को जी खोलकर सुविधायें दीं। राजाओं के महल उनके अधिकार में रहेंगे। उन्हें समस्त प्रकार के करों से मुक्ति मिलेगी। उनके महलों में बिजली, पानी मुफ्त मिलेगा। उन्हें अपनी मोटरों पर खास लाल रंग की प्लेट लगाने की छूट होगी। वे अपनी मोटरों और महलों पर रियासती झण्डा लगा सकेंगे। वे जब विदेशों से लौटेंगे तो उनके सामान की जांच नहीं होगी। उन्हें अदालतों में हाजिरी से छूट रहेगी।

भारत सरकार की अनुमति के बिना, किसी महाराजा पर दीवानी या फौजदारी मुकदमा नहीं चलेगा। उन्हें फौजी सलामियां, तोपों की सलामियां, और लाल कालीन के दस्तूर वैसे ही मिलेंगे जैसे कि अंग्रेजों के समय मिलते थे। वे अपने महलों पर सैनिक गार्ड रख सकेंगे। महाराजाओं को अपने करोड़ों रुपयों के हीरे जवाहरात, सिवाय राजमुकुट के जवाहरातों के जो रियासत की सम्पत्ति समझे जाते थे और असली निकाल कर नकली लगा दिये गये, रखने का अधिकार रहा।

राजाओं द्वारा लाखों रुपयों के मूल्य के असली मोतियों के हार नकली मोतियों के हारों से बदल दिये गये। बड़ौदा के राजा ने दो करोड़ रुपये मूल्य का सात लड़ियों का मोतियों का हार, तीन बेशकीमती हीरों वाला हार, स्टार ऑफ साउथ, यूजीन, शाहे अकबर नामक विख्यात रत्न तथा मोती टँके दो कालीन, बड़ौदा के खजाने से गायब कर दिये।

सरदार पटेल ने जानबूझकर राजाओं की इस लुटेरी प्रवृत्ति की ओर से आंखें मूंद लीं। पटेल को ज्ञात था कि प्रजा को राजाओं के सामंती शासन के चंगुल से बाहर निकालने के लिये चुकाई गई यह कीमत बहुत कम है। इस प्रकार राजाओं ने सरदार के जाल में फंसकर अपनी शासन-सत्ता और अधिकार भारत सरकार को दे दिये तथा भेड़ों की तरह पंक्तिबद्ध होकर एकीकरण के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर दिये। पटेल का व्यावहारिक रुख अच्छे परिणाम देने में सफल रहा।

राजाओं के प्रिवीपर्स तथा सुविधाओं के मामले तय करने में एक साल से अधिक समय लगा। भारत सरकार की ओर से विश्वास दिलाया गया कि राजाओं के अधिकार, सुविधायें और खिताब, जो उन्होंने भारत की ब्रिटिश सरकार से संधियों एवं सेवाओं के बदले प्राप्त किये थे, उन्हें भारत सरकार द्वारा मान्यता देकर सुरक्षित रखा जायेगा। राजाओं को सरदार पर भरोसा हो गया, भरोसा करने के अतिरिक्त कोई चारा भी नहीं था।

इसलिये उन्होंने जो मिल रहा था, उसे लेकर अपने राज्य छोड़ दिये। उनके स्वर्ण मुकुट उतर चुके थे, अब तो केवल चमकीला रंग ही शेष था जिसे साफ करने का काम आगे चलकर भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को करना था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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