Wednesday, February 28, 2024
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पाकिस्तान मुस्लिम लीग का विभाजन

दिसम्बर 1947 में कराची में हुई ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग की बैठक में भारत एवं पाकिस्तान के लिए दो स्वतंत्र मुस्लिम लीग गठित करने का निर्णय लिया गया। ई.1934 से मुहम्मद अली जिन्ना ही ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग का अध्यक्ष था किंतु अब जिन्ना ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग का अध्यक्ष रह गया। ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग के लिए दूसरे अध्यक्ष की तलाश की गई।

पाकिस्तान ने लिया गांधीजी का बलिदान

जिस समय भारत स्वतंत्र हुआ, उस समय दोनों देशों के सैनिक, आर्थिक एवं वित्तीय संसाधनों का भी बंटवारा किया गया। अखण्ड भारत के जो प्रांत पाकिस्तान में मिलने वाले थे, उन प्रांतों पर भारत सरकार का 300 करोड़ रुपए का कर्ज था जो उन प्रांतों द्वारा भारत सरकार को लौटाया जाना था। यह तय किया गया कि पाकिस्तान इस कर्ज को चार साल में चुकाएगा। विभाजन के समझौते के अनुसार भारत के प्रति पाकिस्तान की देनदारियां 300 करोड़ रुपए थीं। यह राशि 15 अगस्त 1952 के बाद 50 समान किश्तों में पाकिस्तान द्वारा भारत को चुकाई जानी थी। पाकिस्तान इस ऋण-अदायगी के लिए प्रतिवर्ष अपने बजट में 7.5 करोड़ रुपये का प्रावधान करता था किंतु उसने यह राशि भारत को कभी नहीं चुकाई। दूसरी तरफ पाकिस्तान भारत से प्रतिरक्षा भण्डारों के बदले में 55 करोड़ रुपए मांगता था।

गोपाल गोडसे ने लिखा है कि भारत सरकार की तरफ से पाकिस्तान को 75 करोड़ रुपए दिए जाने थे जिसमें से 20 करोड़ रुपए तुरंत ही पाकिस्तान को दे दिए गए। शेष 55 करोड़ रुपए तब दिए जाने थे जब कि पाकिस्तान में जा रहे प्रांत अपना कर्ज भारत सरकार को चुका देंगे। 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर राज्य पर आक्रमण कर दिया तथा भारत सरकार से 55 करोड़ रुपए की मांग की। इस पर सरदार पटेल ने कहा कि पाकिस्तान को यह राशि काश्मीर समस्या का समाधान होने के बाद दी जाएगी।

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पटेल का कहना था कि पाकिस्तान इस राशि का उपयोग भारत के विरुद्ध हथियार खरीदने में करेगा। नेहरू मंत्रिमण्डल ने पटेल के इस निर्णय पर स्वीकृति दे दी। जिन्ना ने इस राशि के लिए माउंटबेटन पर दबाव डाला। माउंटबेटन ने गांधीजी से कहा कि वे नेहरू और पटेल से बात करके पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दिलवाएं। पटेल ने गांधीजी को साफ इन्कार कर दिया तो गांधीजी 13 जनवरी 1948 को पटेल के विरुद्ध दिल्ली में आमरण अनशन पर बैठ गए। गांधीजी के उपवास का निर्णय पटेल को भाया नहीं और वे दिल्ली छोड़कर बम्बई चले गए।

उपवास तोड़ने की जो शर्तें गांधीजी ने रखी थीं, उन्हें देश की जनता ने पसंद नहीं किया। पाकिस्तान को 55 करोड़ की रकम बिना शर्त, अविलम्ब दे दी जाए। उनके इस आग्रह ने असंख्य व्यक्तियों को आक्रोश से भर दिया।

12 जनवरी 1948 को पत्रकारों के बीच सरदार पटेल ने एक वक्तव्य दिया- ‘काश्मीर पर आक्रमण के प्रतिरोध की प्रक्रिया के रूप में इस संधि की कार्यवाही को अभी स्थगित करके हमने न्यायोचित कार्य किया है। हम इस संधि के प्रति निष्ठावान हैं, वचनबद्ध हैं, यह हमने पाकिस्तान शासन को एक बार नहीं, अनेक बार कहा है किंतु इस संधि में रुपया देने की निश्चित अवधि जैसा कोई बन्धन हमारे ऊपर नहीं है। पाकिस्तान ने अपनी सेना की सहायता से हमसे सशस्त्र संघर्ष छेड़ रखा है और उसके और अधिक विस्तार की भयानक संभावना है। ऐसी अवस्था में संधि का दुरुपयोग संभव है। ऋण के उत्तरदायित्व को स्वीकार करना, और सम्पत्ति का बंटवारा करना जैसे संधि में समाविष्ट अनुबन्धों पर उसका विपरीत परिणाम होगा। उस दशा में पाकिस्तान किसी भी प्रकार से सन्धि की शेष राशि प्राप्त करने के लिए अपनी मांग न्याय-संगत रूप से प्रस्तुत नहीं कर सकेगा। ‘

गांधीजी के दबाव में नेहरू ने 15 जनवरी 1948 को पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दे दिए। विचित्र स्थिति थी, जिस देश से हिन्दुओं की कटी हुई लाशों की ट्रेनें आ रही थीं और जो देश भारत के विरुद्ध युद्ध लड़ रहा था, भारत उसी देश को 55 करोड़ रुपए दे रहा था जबकि अभी तक पाकिस्तान के प्रांतों का 300 करोड़ रुपए का कर्ज वापिस लौटना बाकी था। उन्हीं दिनों गांधीजी ने घोषणा की कि वे जिन्ना को मनाने के लिए एक डेलिगेशन के साथ भारत-पाकिस्तान की सीमा पार करके पाकिस्तान जाएंगे ताकि पाकिस्तान को पुनः भारत में मिलाया जा सके।

गांधीजी ने बम्बई के कपास व्यापारी जहांगीर पटेल को पाकिस्तान भेजा ताकि वह जिन्ना से मिलकर गांधीजी की पाकिस्तान यात्रा का प्रबंध कर सके। …… भारत से पैदल चलकर पाकिस्तान पहुंचना और वहाँ भी हर जगह पैदल ही घूमना, इस उपाय से गांधीजी निःसंदेह एक विलक्षण आध्यात्मिक आभा का प्रकाशन करते किंतु उस समय उनके पैरों में इतनी भी शक्ति नहीं थी कि उठकर बिड़ला हाउस के लॉन तक जा सकते।

उन्हीं दिनों एक और घटना हुई। पाकिस्तान से बड़ी संख्या में हिन्दू शरणार्थी अपना सर्वस्व गांवाकर भारत आ रहे थे, उनमें से बहुत से हिन्दू दिल्ली भी आए और उन्होंने हिन्दू मंदिरों, गुरुद्वारों तथा स्कूलों में शरण ली। जब दिल्ली के समस्त सार्वजनिक स्थल शरणार्थियों से भर गए तो पाकिस्तान से आए कुछ हिन्दू शरणार्थी दिल्ली की एक मस्जिद में घुस गए। जब गांधीजी को यह ज्ञात हुआ तो वे मस्जिद के सामने धरने पर बैठ गए और शरणार्थियों से मस्जिद खाली करवाने के लिए सरकार पर दवाब बनाने लगे।

सरकार को हिन्दू शरणार्थियों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही करनी पड़ी। जिस समय हिन्दू शरणार्थियों को मस्जिद से उठाकर फैंका जा रहा था, उस समय दिल्ली में तेज बारिश हो रही थी जिसके कारण औरतें और बच्चे ठण्ड से ठिठुरने तथा रोने लगे। कहा जाता है कि महाराष्ट्र से दिल्ली आए नाथूराम गोडसे नामक एक युवा पत्रकार ने यह दृश्य अपनी आंखों से देखा। हिन्दू बच्चों को अपने ही देश में पिटते, रोते और ठण्ड तथा भूख से कांपते देखकर गोडसे का मन रोने लगा। उसने गांधीजी का वध करने का प्रण लिया।

30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने अपना प्रण पूरा किया और दिल्ली के बिड़ला भवन में गांधीजी को गोली मार दी। गोडसे ने अपने कृत्य को गांधी वध बताते हुए, इसका निर्णय इतिहास पर छोड़ दिया कि अगर भविष्य में तटस्थ इतिहास लिखा जाएगा तो वह अवश्य ही गोडसे के साथ न्याय करेगा।

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