Wednesday, April 1, 2026
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निगम आगम और पुराण : सनातन धर्म और हिन्दू संस्कृति के आधार स्तंभ

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निगम आगम और पुराण

सनातन धर्म (Sanatan Dharma) और हिन्दू संस्कृति (Hindu Culture) के मूल आधार स्तंभों को यदि समझना हो, तो हमें निगम आगम और पुराण के त्रिकोण को समझना होगा।

निगम आगम और पुराण भारतीय ज्ञान परंपरा की वे धाराएँ हैं, जो अलग-अलग होते हुए भी अंततः एक ही सत्य (परमात्मा) की ओर ले जाती हैं। बहुत से लोग अज्ञान-वश इन तीनों को एक ही मान लेते हैं, किंतु इनके स्वरूप, उत्पत्ति और उद्देश्य में सूक्ष्म व स्पष्ट अंतर हैं।

निगम आगम और पुराण

भारतीय सनातन परंपरा में ज्ञान को प्राप्त करने के विभिन्न मार्ग बताए गए हैं। जहाँ निगम (वेद) ज्ञान का स्रोत हैं, वहीं आगम उपासना की विधि बताते हैं और पुराण कहानियों के माध्यम से उस ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाते हैं। यदि आप हिंदू धर्म की गहराइयों को समझना चाहते हैं, तो इन तीनों के बीच के अंतर को समझना अनिवार्य है।

1. निगम (Nigama): ज्ञान का सर्वोच्च शिखर

‘निगम’ शब्द मुख्य रूप से वेदों के लिए प्रयुक्त होता है। इसका शाब्दिक अर्थ है— ‘जो नीचे (परंपरा से) आया है’ या ‘निश्चित ज्ञान’।

  • उत्पत्ति: निगम को ‘अपौरुषेय’ माना जाता है, जिसका अर्थ है कि इनकी रचना किसी मनुष्य ने नहीं की, बल्कि ऋषियों ने ध्यान की अवस्था में इन्हें ईश्वर से साक्षात्कृत किया।
  • मुख्य ग्रंथ: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।
  • दर्शन: निगम का मुख्य जोर ‘यज्ञ’ और ‘ब्रह्म ज्ञान’ पर है। यहाँ ईश्वर का स्वरूप निराकार और व्यापक बताया गया है।
  • महत्व: यह भारतीय ज्ञान का संविधान है। उपनिषद, जो वेदों का अंतिम भाग हैं, निगम का ही हिस्सा माने जाते हैं।

2. आगम (Agama): क्रिया और उपासना का शास्त्र

‘आगम’ का अर्थ है ‘जो प्राप्त हुआ है’। यह ईश्वर की साकार उपासना और मंदिर पूजा की विधियों का शास्त्र है।

  • उत्पत्ति: आगम को भगवान शिव (शैव), भगवान विष्णु (वैष्णव) या देवी (शाक्त) के मुख से निकला हुआ माना जाता है।
  • मुख्य ग्रंथ: शैव आगम (जैसे कामिक), वैष्णव आगम (पाञ्चरात्र), और शाक्त आगम (तंत्र)।
  • दर्शन: आगम ‘सगुण’ उपासना पर बल देते हैं। मूर्ति पूजा, मंदिर निर्माण, यंत्र-मंत्र और दीक्षा की प्रक्रिया आगमों की देन है।
  • महत्व: वेदों के ज्ञान को क्रियात्मक रूप देने का कार्य आगमों ने किया। आज हमारे मंदिरों में होने वाली पूजा पद्धतियाँ आगमों पर आधारित हैं।

3. पुराण (Purana): कथाओं के माध्यम से धर्म

‘पुराण’ का शाब्दिक अर्थ है ‘प्राचीन’ या ‘पुरानी कथा’। ये वे ग्रंथ हैं जो वेदों के गूढ़ ज्ञान को सरल कथाओं और इतिहास के माध्यम से आम जनता तक पहुँचाते हैं।

  • उत्पत्ति: पुराणों के संकलनकर्ता महर्षि वेदव्यास माने जाते हैं।
  • मुख्य ग्रंथ: १८ महापुराण (जैसे विष्णु पुराण, शिव पुराण, श्रीमद्भागवत पुराण)।
  • दर्शन: पुराण भक्ति प्रधान हैं। ये अवतारवाद, तीर्थ, व्रत और राजाओं की वंशावलियों का वर्णन करते हैं।
  • महत्व: पुराणों ने धर्म को जनसाधारण के लिए सुलभ बनाया। एक साधारण व्यक्ति जो वेद नहीं पढ़ सकता, वह पुराण सुनकर धर्म की शिक्षा ले सकता है।

निगम आगम और पुराण की भाषा

इन तीनों प्रकार के ग्रंथों की भाषा संस्कृत (Sanskrit) है। नासा (NASA) के कुछ शोधकर्ताओं ने संस्कृत और वेदों के व्याकरण को कंप्यूटर कोडिंग और एआई (AI) के लिए सबसे उपयुक्त माना है, इसका कारण संस्कृत की तार्किक और गणितीय संरचना है जो ‘निगम’ ग्रंथों की विशेषता है।

निगम आगम और पुराण में मुख्य अंतर

विशेषतानिगम (वेद)आगम (तंत्र/शास्त्र)पुराण (कथा साहित्य)
मूल स्वरूपज्ञान और सूक्त प्रधानक्रिया और पद्धति प्रधानकथा और भक्ति प्रधान
मुख्य विषययज्ञ, ब्रह्म, प्रकृतिमंदिर, मूर्ति, पूजा विधिअवतार, इतिहास, वंशावली
सुलभताप्राचीन काल में कठिन नियम थेसभी वर्गों के लिए सुलभअत्यंत सरल और सुलभ
ईश्वर स्वरूपनिर्गुण, निराकारसगुण, साकारअवतार और लीला स्वरूप
प्रमाणिकतास्वतः प्रमाण (सर्वोच्च)वेदों के अनुकूल प्रमाणवेदों की व्याख्या के रूप में

निगम आगम और पुराण के बीच संबंध

निगम, आगम और पुराण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है:

  1. निगम (वेद) वह बीज है, जिसमें सारा ज्ञान समाहित है।
  2. आगम वह प्रक्रिया है, जिससे उस बीज को बोया जाता है और मंदिर रूपी वृक्ष तैयार किया जाता है।
  3. पुराण उस वृक्ष पर लगने वाले मीठे फल हैं, जिनका स्वाद हर कोई चख सकता है।

1. दार्शनिक अंतर

निगम (वेद) जहाँ “तत्त्वमसि” (वह तू ही है) जैसे महावाक्यों के माध्यम से ज्ञान की बात करते हैं, वहीं आगम कहते हैं कि उस सत्य तक पहुँचने के लिए अनुष्ठान और योग की आवश्यकता है। पुराण उसी सत्य को भगवान कृष्ण या शिव की लीलाओं के माध्यम से समझाते हैं।

2. सामाजिक प्रभाव

निगम काल में धर्म कुछ सीमित लोगों तक ही केंद्रित था क्योंकि संस्कृत का व्याकरण और वैदिक स्वर कठिन थे। आगमों ने इसे सरल किया और सामाजिक भेदभाव को कम करते हुए भक्ति का मार्ग सबके लिए खोला। पुराणों ने इसे मनोरंजन और प्रेरणा से जोड़कर भारतीय समाज के संस्कारों में घोल दिया।

3. मंदिर और संस्कृति

आज भारत में जो मंदिर संस्कृति हम देखते हैं, वह आगमों का उपहार है। वेदों में मंदिर का उल्लेख नहीं मिलता, वहाँ ‘यज्ञशाला’ का महत्व था। किंतु उन यज्ञशालाओं के देवताओं को भव्य स्वरूप और मंदिर देने का कार्य आगमों ने किया, और उन देवताओं की महिमा गान का कार्य पुराणों ने किया।

निगम आगम और पुराण : किसका मार्ग श्रेष्ठ है?

अध्यात्म में श्रेष्ठता का कोई प्रश्न नहीं होता, यह केवल रुचि और पात्रता का विषय है।

  • यदि कोई व्यक्ति बुद्धिजीवी है और सत्य की गहराई खोजना चाहता है तो उसके लिए निगम उपनिषद अधिक उपयोगी हैं।
  • यदि कोई व्यक्ति साधक है और अनुशासनपूर्ण पूजा एवं योग करना चाहता है तो उसके लिए आगम का मार्ग उपलब्ध है।
  • यदि कोई व्यक्ति भगवान् का भावुक भक्त है और ईश्वर की लीलाओं में आनंद पाता है तो उसके लिए पुराणों का अध्ययन अधिक उपयोगी है।

भारतीय परंपरा में कहा गया है कि वेदों का ज्ञान समुद्र की तरह है, आगम उस समुद्र की लहरें हैं और पुराण उस समुद्र के रत्न हैं।

निगम आगम और पुराण का वैज्ञानिक महत्व

निश्चित रूप से, इन ग्रंथों का वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण समझना बहुत रोचक है। आधुनिक युग में इनकी प्रासंगिकता केवल धार्मिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक भी है।

यहाँ आगम निगम और पुराण के वैज्ञानिक और तार्किक पक्षों का विश्लेषण दिया गया है-

1. निगम (वेदों) का वैज्ञानिक आधार: ध्वनि और कंपन

आधुनिक भौतिक विज्ञान (Physics) के अनुसार ब्रह्मांड में सब कुछ ऊर्जा है और ऊर्जा कंपन (Vibration) करती है। वेदों के मंत्र इसी सिद्धांत पर आधारित हैं।

  • ध्वनि विज्ञान (Acoustics): वेदों के मंत्रों का उच्चारण जिस विशेष स्वर और लय में किया जाता है, वह मस्तिष्क की तरंगों (Alpha, Beta waves) को प्रभावित करता है।
  • शून्य और ब्रह्मांड: उपनिषदों में वर्णित ‘ब्रह्म’ की अवधारणा आधुनिक ‘क्वांटम फील्ड’ या ‘स्ट्रिंग थ्योरी’ के काफी करीब है, जो मानती है कि एक ही तत्व सबमें व्याप्त है।

2. आगम का वैज्ञानिक आधार: ऊर्जा विज्ञान और वास्तुकला

आगम शास्त्र पूरी तरह से प्रौद्योगिकी (Technology) पर आधारित हैं।

  • मंदिर वास्तुकला (Temple Architecture): आगम के अनुसार मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि ‘ऊर्जा केंद्र’ (Energy Centres) हैं। मूर्तियों का निर्माण विशेष पत्थरों से और स्थापना ‘प्राण प्रतिष्ठा’ के जरिए की जाती है, ताकि वहाँ एक इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक फील्ड तैयार हो सके।
  • यंत्र और ज्यामिति: आगमों में प्रयुक्त होने वाले यंत्र (जैसे श्री यंत्र) उच्च स्तरीय ज्यामिति (Geometry) के उदाहरण हैं, जो ध्यान केंद्रित करने में मदद करते हैं।

3. पुराणों का वैज्ञानिक आधार: मनोविज्ञान और प्रतीकात्मकता

पुराणों को केवल कहानियाँ समझना भूल होगी; ये मनोविज्ञान (Psychology) के गहरे ग्रंथ हैं।

  • प्रतीकवाद (Symbolism): उदाहरण के लिए, भगवान गणेश का हाथी जैसा सिर उच्च बुद्धिमत्ता का प्रतीक है। समुद्र मंथन की कथा मानव मन के भीतर चल रहे द्वंद्व (Positive vs Negative thoughts) का वैज्ञानिक चित्रण है।
  • अवतारवाद और विकासवाद: विष्णु के १० अवतार डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत (Evolution) के काफी करीब हैं—मत्स्य (पानी का जीव), कूर्म (उभयचर), वराह (थलचर), नरसिंह (अर्ध-मानव) और फिर पूर्ण मानव।

आधुनिक जीवन में निगम आगम और पुराण का उपयोग

ग्रंथउपयोग
निगम (उपनिषद)तनाव मुक्त रहने और ‘स्वयं’ को समझने के लिए (Self-Realization)।
आगम (योग/तंत्र)अनुशासन, चक्र जागृति और शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के लिए।
पुराणजीवन की कठिन परिस्थितियों में नैतिक निर्णय (Ethical Decisions) लेने के लिए।

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डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तकें

ग्रंथ परिचय

शैव सिद्धांत एवं शैव आगम

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शैव सिद्धांत एवं शैव आगम

शैव सिद्धांत (Shaiva Siddhanta) शैव दर्शन की सबसे प्राचीन और प्रभावशाली शाखाओं में से एक है। यह मुख्य रूप से दक्षिण भारत (विशेषकर तमिलनाडु) में अत्यधिक प्रचलित है और इसे ‘शुद्ध अद्वैत’ या ‘द्वैत-अद्वैत’ के एक संतुलित रूप में देखा जाता है।

शैव सिद्धांत का मूल आधार 28 शैव आगम (Shaiv Agam) ग्रंथ हैं। दक्षिण भारत के अधिकांश शिव मंदिरों (जैसे चिदंबरम और रामेश्वरम) में आज भी कामिक और कारण आगम के अनुसार ही पूजा-अर्चना की जाती है।

शैव सिद्धांत का दर्शन

1. तीन मुख्य तत्व: पति, पशु और पाश

शैव सिद्धांत का पूरा दर्शन तीन शाश्वत तत्वों (पदार्थों) के इर्द-गिर्द घूमता है। इसे समझने के लिए नीचे दिए गए त्रिकोण को आधार माना जा सकता है-

  • पति (Pati): इसका अर्थ है ‘स्वामी’ या ‘ईश्वर’। यहाँ भगवान शिव ही ‘पति’ हैं। वे सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और दयालु हैं। वे सृष्टि के कर्ता, धर्ता और संहारक हैं, लेकिन वे माया से निर्लिप्त रहते हैं।
  • पशु (Pashu): इसका अर्थ है ‘जीव’ या ‘आत्मा’। प्रत्येक मनुष्य एक ‘पशु’ है क्योंकि वह अज्ञान और बंधनों में बंधा हुआ है। आत्मा स्वभाव से शिव के समान ही है, लेकिन मल (अशुद्धि) के कारण अपनी शक्तियों को भूल चुकी है।
  • पाश (Pasha): इसका अर्थ है ‘जाल’ या ‘बंधन’। वे तत्व जो आत्मा को ईश्वर से दूर रखते हैं, पाश कहलाते हैं।

2. आत्मा के तीन बंधन (मल)

शैव सिद्धांत के अनुसार, ‘पशु’ (आत्मा) तीन प्रकार के बंधनों या अशुद्धियों से जकड़ा होता है:

  • आणव मल (Anava Mala): यह सबसे सूक्ष्म और जन्मजात अहंकार है। यह आत्मा को यह अनुभव कराता है कि वह “अपूर्ण” है।
  • मायिक मल (Mayika Mala): यह माया का बंधन है, जो हमें भौतिक संसार के प्रति आकर्षित करता है और दृश्य जगत को ही सत्य मानने पर मजबूर करता है।
  • कार्मिक मल (Karma Mala): यह हमारे अच्छे और बुरे कर्मों का फल है, जिसके कारण आत्मा को बार-बार जन्म लेना पड़ता है।

3. शिव के पाँच कृत्य (Pancha-Kritya)

शैव सिद्धांत मानता है कि भगवान शिव निरंतर पाँच कार्य करते हैं, जिन्हें ‘पञ्चकृत्य’ कहा जाता है:

  • सृष्टि (Srishti): जगत का निर्माण।
  • स्थिति (Sthiti): जगत का पालन।
  • संहार (Samhara): विनाश या पुनर्चक्रण।
  • तिरोभाव (Tirobhava): अज्ञान का पर्दा डालना ताकि जीव अपने कर्मों का फल भोग सके।
  • अनुग्रह (Anugraha): कृपा करना जिससे जीव को मोक्ष प्राप्त हो सके।

4. प्रमाणिक ग्रंथ और साहित्य

शैव सिद्धांत के ज्ञान को दो स्तरों पर समझा जाता है-

  • संस्कृत आगम: 28 मुख्य आगम (जैसे कामिक, कारण, अजैत आदि)।
  • तमिल स्त्रोत (तिरुमुराई): 63 नयनारों (शिव भक्तों) द्वारा रचित भक्ति गीत। इनमें ‘तेवरम’ और ‘तिरुवाचकम’ सबसे प्रमुख हैं।
  • मेयकंद शास्त्र: 14 दार्शनिक ग्रंथ जिन्हें ‘मेयकंद देव’ और उनके शिष्यों ने लिखा। इनमें ‘शिवज्ञान बोधम’ को शैव सिद्धांत का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र ग्रंथ माना जाता है।

5. मुक्ति का मार्ग

शैव सिद्धांत में मुक्ति केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि चर्या, क्रिया, योग और ज्ञान के समन्वित अभ्यास से मिलती है। जब भक्त शिव की अनन्य भक्ति करता है, तो शिव की ‘शक्ति’ (शक्तिपात) के माध्यम से ‘पाश’ कट जाते हैं।

इस अवस्था में आत्मा शिव में विलीन नहीं होती (जैसा कि केवलाद्वैत मानता है), बल्कि वह शिव के साथ अद्वैत संबंध में रहती है—जैसे नमक पानी में घुल जाता है, फिर भी अपना अस्तित्व (स्वाद के रूप में) रखता है। इसे ‘सायुज्य’ मुक्ति कहा जाता है।

शैव आगम

शैव सिद्धांत के अनुसार, भगवान शिव के मुख से 28 मुख्य आगम (Mula Agamas) प्रकट हुए हैं। इन्हें दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है-

शिवभेद : जो शिव के सद्योजात आदि पाँच मुखों से प्रकट हुए और द्वैत दर्शन पर आधारित हैं।

रुद्रभेद : जो अद्वैत-द्वैत का मिश्रण हैं।

भगवान शिव के मुख्य आगमों की सूची (संख्या: 28)

क. शिवभेद आगम (संख्या: 10)

ये आगम भगवान शिव के सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष और ईशान मुखों से ऋषियों को प्राप्त हुए।

  1. कामिक आगम (Kamika): यह सबसे महत्वपूर्ण और विस्तृत आगम है, जिसमें मंदिर वास्तुकला और अनुष्ठानों का व्यापक वर्णन है।
  2. योगज आगम (Yogaja): योग साधना और ध्यान की विधियों पर केंद्रित।
  3. चिन्त्य आगम (Chintya): सूक्ष्म दर्शन और चिंतन से संबंधित।
  4. कारण आगम (Karana): मंदिर निर्माण और दैनिक पूजा के नियमों का वर्णन।
  5. अजित आगम (Ajita): अभिषेक और उत्सवों की विस्तृत व्याख्या।
  6. दीप्त आगम (Dipta): दीपदान, प्रकाश और आंतरिक ऊर्जा पर आधारित।
  7. सूक्ष्म आगम (Sukshma): तंत्र के सूक्ष्म रहस्यों की व्याख्या।
  8. सहस्र आगम (Sahasra): सहस्रार चक्र और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का वर्णन।
  9. अंशुमान आगम (Amshuman): मूर्तिकला (Iconography) और शारीरिक विज्ञान पर केंद्रित।
  10. सुप्रभेद आगम (Suprabheda): क्रिया पाद और कर्मकांडों का विस्तृत वर्णन।

ख. रुद्रभेद आगम (संख्या: 18)

इनका संबंध रुद्र शक्तियों से माना जाता है और ये साधना के गहरे पहलुओं को छूते हैं।

  1. विजय आगम (Vijaya): विजय प्राप्ति और शत्रुओं (आंतरिक व बाह्य) के दमन हेतु।
  2. निःश्वास आगम (Nishvasa): प्राण और श्वास की क्रियाओं पर आधारित।
  3. स्वायंभुव आगम (Svayambhuva): स्वयंभू चेतना और आत्मा के स्वरूप की व्याख्या।
  4. अनल आगम (Anala): अग्नि तत्व और हवन अनुष्ठानों पर केंद्रित।
  5. वीर आगम (Vira): वीर शैव परंपरा और साहसपूर्ण साधनाओं का वर्णन।
  6. रौरव आगम (Raurava): मोक्ष और जन्म-मरण के चक्र की व्याख्या।
  7. मकुट आगम (Makuta): मुकुट धारण और राजसी पूजा पद्धतियाँ।
  8. विमल आगम (Vimala): शुद्धता और मानसिक शुद्धि की विधियाँ।
  9. चन्द्रज्ञान आगम (Chandrajnana): चंद्रमा की कलाओं और ज्योतिषीय प्रभाव पर आधारित।
  10. बिम्ब आगम (Bimba): प्रतिबिंब और दिव्य स्वरूप के दर्शन।
  11. प्रोद्गीत आगम (Prodgita): मंत्रों और गायन के माध्यम से साधना।
  12. ललित आगम (Lalita): कोमल साधनाओं और सौंदर्य शास्त्र का वर्णन।
  13. सिद्ध आगम (Siddha): सिद्धियों की प्राप्ति और सिद्ध पुरुषों की परंपरा।
  14. संतान आगम (Santana): वंश वृद्धि और परंपरा की निरंतरता।
  15. सर्वोक्त आगम (Sarvokta): सभी आगमों का सार संक्षेप।
  16. पारमेश्वर आगम (Parameshvara): परमेश्वर के विराट स्वरूप की उपासना।
  17. किरण आगम (Kirana): ज्ञान की किरणों और अज्ञान के नाश पर आधारित।
  18. वापुल आगम (Vatula): ब्रह्मांडीय कंपन और शक्ति के संचार का वर्णन।

उप-आगम (संख्या: 207)

मुख्य 28 आगमों के अतिरिक्त इनके 207 उप-आगम (Upagamas) भी हैं। शैव सिद्धांत के अनुसार, इन ग्रंथों का अध्ययन और पालन करने से मनुष्य ‘पशु’ (जीवात्मा) के बंधनों से मुक्त होकर ‘शिवत्व’ को प्राप्त करता है।

– यह आलेख व्यापक शोध और प्राचीन पांडुलिपियों के आधार पर तैयार किया गया है।

निष्कर्ष

शैव सिद्धांत एक ऐसा दर्शन है जो भक्ति (Heart) और दर्शन (Intellect) को जोड़ता है। यह सिखाता है कि हम बंधन में भले ही हों, लेकिन हमारी मूल प्रकृति ‘शिव’ ही है।

👉डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक पुस्तकें-

डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तकें

ग्रंथ परिचय

आगम ग्रंथ : हिन्दू संस्कृति, दर्शन एवं अध्यात्म की अद्भुत विरासत

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आगम ग्रंथ : हिन्दू संस्कृति, दर्शन एवं अध्यात्म की अद्भुत विरासत

भारतीय धर्म और दर्शन के विशाल सागर में ‘आगम ग्रंथ’ (Agama Shastra) वे अनमोल रत्न हैं, जो न केवल अध्यात्म की गहराई बताते हैं, बल्कि ईश्वर की उपासना, मंदिर निर्माण और जीवन जीने की कला का व्यावहारिक मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। जहाँ वेदों को ‘निगम’ कहा जाता है, वहीं तंत्र और उपासना प्रधान ग्रंथों को ‘आगम’ की संज्ञा दी गई है।

👉 आगम ग्रंथ : परम्परा से आया हुआ ज्ञान

भारतीय धर्म और दर्शन की परंपरा में आगम ग्रंथों का विशेष स्थान है। ये ग्रंथ न केवल धार्मिक आचार-विचार का आधार हैं, बल्कि आध्यात्मिक साधना, मंदिर निर्माण और पूजा-पद्धति के लिए भी मार्गदर्शक हैं। “आगम” शब्द संस्कृत धातु “गम्” से बना है, जिसका अर्थ है “आना” या “प्राप्त होना”। आगम को परंपरा से आया हुआ ज्ञान भी कहा जाता है। अतः आगम वे ग्रंथ हैं जो ऋषियों और तीर्थंकरों के दिव्य उपदेशों के रूप में प्राप्त हुए। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में आगम ग्रंथों का स्थान वेदों के समान ही अत्यंत श्रद्धापूर्ण और प्रमाणिक माना जाता है।

👉 आगम का अर्थ और परिभाषा

‘आगम’ शब्द की व्युत्पत्ति आ’ (समंततः), ‘ग’ (गमतु) और ‘म’ (बोधक) से मानी जाती है। इसका अर्थ है वह शास्त्र जो मोक्ष का उपाय बताता है और जिसके माध्यम से ज्ञान प्राप्त होता है। एक प्रसिद्ध श्लोक के अनुसार-

आगतं शिववक्त्रेभ्यः गतं गिरिजामुखे।

मतं वासुदेवेन तस्मादागममुच्यते॥

अर्थात्, जो शिव के मुख से निकला, पार्वती के कान में गया और जिसे वासुदेव (विष्णु) ने भी स्वीकार किया, वही ‘आगम’ है। सरल शब्दों में, आगम वे शास्त्र हैं जो ईश्वर और जीव के संबंध तथा मोक्ष प्राप्ति की विधियों का वर्णन करते हैं।

👉 आगम ग्रंथों की भाषा

  • आगम ग्रंथों की भाषा प्रारंभ में अर्द्धमागधी और प्राकृत रही, बाद में संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं में भी इनका विस्तार हुआ।

👉 आगम ग्रंथों का वर्गीकरण (Classification of Agamas)

1. हिन्दू धर्म में आगम ग्रंथ

हिन्दू धर्म में आगम ग्रंथ शैव, वैष्णव और शाक्त संप्रदायों में विभक्त किए जा सकते हैं। ये पूजन-विधि, मंदिर निर्माण, ध्यान और योग से संबंधित ग्रंथ हैं। हिन्दू धर्म में आगम ग्रंथों का महत्व विशेष रूप से मंदिर और पूजा-पद्धति में है। इन ग्रंथों में ध्यान, योग, मंत्र, यंत्र और पूजा-विधि का विस्तृत वर्णन मिलता है।

अ. शैव आगम (Shaiva Agamas)

भगवान शिव की उपासना पर केंद्रित इन ग्रंथों की संख्या 28 मानी जाती है (मुख्य आगम)। इन्हें दो भागों में बांटा गया है-

  • कामिक आगम: यह सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण माना जाता है।
  • कारण आगम: इसमें मंदिर निर्माण और मूर्तिकला के विशेष नियम हैं।

शैव आगमों में ‘पाशुपत’, ‘शैव सिद्धांत’ और ‘काश्मीर शैव दर्शन’ प्रमुख हैं।

ब. वैष्णव आगम (Vaishnava Agamas)

भगवान विष्णु और उनके अवतारों की उपासना बताने वाले इन ग्रंथों को दो मुख्य शाखाओं में विभाजित किया गया है-

  • पाञ्चरात्र आगम: इसमें भगवान के पांच स्वरूपों और भक्ति मार्ग पर बल दिया गया है। ‘अहिर्बुध्न्य संहिता’ इसका प्रमुख ग्रंथ है।
  • वैखानस आगम: यह ऋषियों की परंपरा से आया है और दक्षिण भारत के तिरुपति जैसे मंदिरों में इसकी विधियों का पालन होता है।

स. शाक्त आगम (Shakta Agamas)

शक्ति या देवी की उपासना से संबंधित ग्रंथों को ‘तंत्र’ भी कहा जाता है। इनकी संख्या 64 मानी गई है। इनमें ‘कुलार्णव तंत्र’ और ‘महानिर्वाण तंत्र’ अत्यंत प्रसिद्ध हैं।

2. जैन धर्म के आगम ग्रंथ

भगवान महावीर की वाणी को उनके गणधरों द्वारा संकलित किया गया, जिसे ‘आगम’ कहा जाता है। इसमें 12 अंग, 12 उपांग आदि शामिल हैं। ये प्राकृत (अर्धमागधी) भाषा में हैं। जैन धर्म में जैन धर्म से सम्बन्धित सम्पूर्ण जैन साहित्य को भी आगम कह दिया जाता है। इसमें विभिन्न प्रकार के ग्रंथ सम्मिलित हैं-

  • 12 अंग आगम – महावीर स्वामी के उपदेशों का मूल संकलन।
  • 12 उपांग आगम – अंग ग्रंथों की व्याख्या और विस्तार।
  • 10 प्रकीर्ण आगम – विविध विषयों पर छोटे ग्रंथ।
  • 6 छेदसूत्र – अनुशासन और नियमों से संबंधित।
  • 4 मूलसूत्र – साधना और तपस्या के लिए आधारभूत ग्रंथ।
  • नन्दी सूत्र और अनुयोगद्वार – ज्ञान और तर्कशास्त्र से संबंधित।

इन ग्रंथों का संकलन मुख्यतः श्वेताम्बर परंपरा के आचार्यों द्वारा किया गया।

3. बौद्ध आगम

  • महायान बौद्ध परंपरा में प्रारंभिक सूत्रों के संकलन को ‘आगम’ कहा जाता है, जो पालि भाषा के ‘निकायों’ के समतुल्य हैं।

👉 आगम ग्रंथों की चार मुख्य विधाएँ (पादाः)

प्रत्येक आगम ग्रंथ मुख्य रूप से चार भागों में विभाजित होता है, जिन्हें ‘पाद’ कहा जाता है। यह आगमों की सबसे बड़ी विशेषता है:

  1. ज्ञान पाद (Jnana Pada): इसमें दार्शनिक सिद्धांतों, जीव, जगत और ईश्वर के स्वरूप की व्याख्या की गई है।
  2. योग पाद (Yoga Pada): इसमें मानसिक एकाग्रता, अष्टांग योग और कुंडलिनी जागृति की विधियां बताई गई हैं।
  3. क्रिया पाद (Kriya Pada): इसमें मंदिर निर्माण (वास्तु शास्त्र), मूर्ति स्थापना और विग्रह निर्माण के वैज्ञानिक नियम दिए गए हैं।
  4. चर्या पाद (Charya Pada): इसमें दैनिक पूजा-पाठ, त्यौहार, संस्कार और व्यक्तिगत आचरण के नियमों का वर्णन है।

👉 आगम ग्रंथों की विशेषताएँ

  • धार्मिक अनुशासन का आधार – साधु-संतों और भक्तों के लिए आचार संहिता।
  • मंदिर निर्माण की विधि – स्थापत्य कला और वास्तुशास्त्र का अद्भुत ज्ञान।
  • योग और ध्यान की शिक्षा – आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की साधना।
  • भाषा और साहित्यिक महत्व – प्राकृत, संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं में रचित।

👉 आगम और निगम (वेद) में अंतर

प्रायः लोग वेदों और आगमों के बीच भ्रमित रहते हैं। यद्यपि दोनों का लक्ष्य ‘मोक्ष’ है तथापि इनमें कुछ आधारभूत अंतर हैं-

विशेषतानिगम (वेद)आगम (तंत्र/शास्त्र)
प्रकृतिसैद्धांतिक और सूक्त प्रधानक्रियात्मक और उपासना प्रधान
अधिकारप्राचीन काल में वर्ण व्यवस्था का प्रभावजाति-पाति से परे, सभी के लिए सुलभ
पूजा पद्धतियज्ञ और आहुति मुख्यमूर्ति पूजा और अर्चना मुख्य
भाषावैदिक संस्कृतलौकिक संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाएँ

👉 आगम ग्रंथों का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

1. मंदिर वास्तुकला का आधार

आज दक्षिण भारत के विशाल और भव्य मंदिर (जैसे मदुरै मीनाक्षी, तंजावुर का बृहदेश्वर) पूरी तरह से आगम शास्त्र के नियमों पर बने हैं। बिना आगम ज्ञान के इन मंदिरों का निर्माण और वहां की ऊर्जा का प्रबंधन संभव नहीं था। मंदिर निर्माण और स्थापत्य कला में योगदान।

2. सामाजिकता का समावेश

आगम ग्रंथों ने भक्ति मार्ग को समाज के हर वर्ग के लिए खोल दिया। आगमों में स्पष्ट कहा गया है कि ईश्वर की भक्ति का अधिकार हर मनुष्य को है, चाहे वह किसी भी जाति या लिंग का हो।

3. मूर्ति पूजा और कर्मकांड

वैदिक काल में यज्ञ प्रधान थे, किंतु पौराणिक काल में जब मूर्ति पूजा का प्रचलन बढ़ा, तो उसके व्यवस्थित नियम आगमों ने ही दिए। पूजा-पद्धति और अनुष्ठानों का संकलन।

4. आध्यात्मिक मार्गदर्शन

साधकों को मोक्ष की ओर ले जाने वाले। तर्कशास्त्र, नैतिकता और आत्मज्ञान की शिक्षा।

👉 निष्कर्ष

आगम ग्रंथ भारतीय धर्म और संस्कृति की आत्मा हैं। इन ग्रंथों ने न केवल धार्मिक जीवन को दिशा दी, अपितु भारतीय कला, स्थापत्य और दर्शन को भी समृद्ध किया।

आगम ग्रंथों ने धर्म को किताबों से निकालकर मंदिरों और व्यक्तिगत जीवन के क्रियाकलापों तक पहुँचाया। ये ग्रंथ विज्ञान, कला, मनोविज्ञान और अध्यात्म का अद्भुत संगम हैं। यदि आप भारतीय संस्कृति की सूक्ष्मताओं को समझना चाहते हैं, तो आगम ग्रंथों का अध्ययन अनिवार्य है।

जैन धर्म में ये महावीर स्वामी के उपदेशों का संकलन हैं, जबकि हिन्दू धर्म में ये मंदिर निर्माण, पूजा और साधना की विधियों का आधार हैं।

आज के आधुनिक युग में भी, जब हम मानसिक शांति और व्यवस्थित जीवन की तलाश करते हैं, आगमों में वर्णित ‘योग’ और ‘चर्या’ के नियम उतने ही प्रासंगिक हैं जितने हजारों वर्ष पहले थे।

– यह आलेख व्यापक शोध और प्राचीन पांडुलिपियों के आधार पर तैयार किया गया है।

👉डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक पुस्तकें-

डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तकें

ग्रंथ परिचय

हयशीर्ष पांचरात्र: वैष्णव आगम परंपरा का अद्वितीय ग्रंथ

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हयशीर्ष पांचरात्र: वैष्णव आगम परंपरा का अद्वितीय ग्रंथ

हयशीर्ष पांचरात्र (Hayashirsha Pancharatra) वैष्णव आगम साहित्य का एक महत्वपूर्ण एक प्रमुख ‘तुलनात्मक आगम’ ग्रंथ है, जिसमें भगवान विष्णु के हयग्रीव रूप की उपासना, मंदिर विधि, पूजा-पद्धति और दार्शनिक सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन मिलता है। यदि हयशीर्ष पांचरात्र को भारतीय मंदिर वास्तुकला और मूर्ति विज्ञान का प्राचीन विश्वकोश कहा जाए तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

हयशीर्ष पांचरात्र ग्रंथ का संक्षिप्त परिचय

भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में ‘आगम’ ग्रंथों का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। जहाँ वेद ज्ञान का आधार हैं, वहीं आगम ग्रंथ उपासना, मंदिर निर्माण और अनुष्ठान की विधि समझाते हैं।

वैष्णव परंपरा के अंतर्गत आने वाला हयशीर्ष पांचरात्र (Hayashirsha Pancharatra) एक ऐसा ही अनमोल ग्रंथ है, जिसे ‘पाञ्चरात्र आगम’ का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक आधार माना जाता है। इसमें भगवान विष्णु की उपासना और मंदिर-पूजा की विधियों का विस्तार से वर्णन मिलता है।

हयशीर्ष पांचरात्र  एक प्रमुख वैष्णव संहिता है, जो भगवान विष्णु के हयग्रीव (घोड़े के मुख वाले) स्वरूप की उपासना पर केंद्रित है। मान्यता है कि भगवान हयग्रीव ने स्वयं ब्रह्मा जी को पांचरात्र का ज्ञान दिया था।

पांचरात्र परंपरा का संक्षिप्त परिचय

  • “पांचरात्र” शब्द का अर्थ है पाँच रातों का यज्ञ
  • महाभारत के शान्तिपर्व  में पांचरात्र सिद्धांत का उल्लेख मिलता है।
  • वैष्णव आगम साहित्य में लगभग 200 से अधिक संहिताएँ हैं, जिनमें हयशीर्ष संहिता  भी सम्मिलित है।
  • यह परंपरा श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में विशेष रूप से प्रतिष्ठित है।

हयशीर्ष पांचरात्र ग्रंथ की मुख्य विषय-वस्तु

हयशीर्ष पांचरात्र केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, अपितु यह स्थापत्य शास्त्र (Architecture) और शिल्प शास्त्र (Iconography) का एक विस्तृत मैन्युअल है। इसकी विषय-वस्तु को हम निम्नलिखित बिंदुओं में समझ सकते हैं:

1. हयग्रीव स्वरूप और उपासना

  • भगवान विष्णु का हयशीर्ष (हयग्रीव) रूप ज्ञान और विद्या का प्रतीक है।
  • ग्रंथ में इस स्वरूप की ध्यान विधि, मंत्र और पूजा-पद्धति का वर्णन है।
  • उपासक को हयग्रीव की उपासना से विद्या, स्मृति और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है।

2. मूर्ति विज्ञान (Iconography/Pratima Lakshana)

ग्रंथ का एक बड़ा हिस्सा मूर्तियों के निर्माण पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि भगवान विष्णु के विभिन्न स्वरूपों (केशव, नारायण आदि) और उनके 24 अवतारों की मूर्तियां कैसी होनी चाहिए।

  • ताल मान: मूर्ति के अंगों का सटीक अनुपात (जैसे दशताल विधि)।
  • आयुध: भगवान के हाथों में स्थित शंख, चक्र, गदा और पद्म का स्थान और महत्व।
  • मुद्राएं: अभय मुद्रा, वरद मुद्रा आदि का अर्थ।

3. मंदिर वास्तुकला (Temple Architecture)

इस ग्रंथ में मंदिर निर्माण के लिए भूमि चयन से लेकर कलश स्थापना तक की प्रक्रिया दी गई है।

  • ग्रंथ में मंदिर की योजना, मूर्ति-स्थापना और अनुष्ठान का विस्तार से उल्लेख है।
  • भू-परीक्षा: मंदिर के लिए मिट्टी की गुणवत्ता और रंग की जांच कैसे करें।
  • वास्तु पुरुष मंडल: मंदिर के विन्यास में देवताओं का स्थान निर्धारण।
  • शिखर और मंडप: मंदिर के विभिन्न अंगों का अनुपात और उनकी ऊंचाई का गणितीय विवरण।
  • इसमें वास्तु और शिल्पशास्त्र के सिद्धांतों का भी समावेश है।

4. खगोल विज्ञान और गणित (Astronomy and Mathematics)

  • मंदिर की दिशा तय करने के लिए यह ग्रंथ खगोलीय गणनाओं का सहारा लेता है। सूर्य की स्थिति और छाया (शंकु यंत्र) के माध्यम से दिशाओं का ज्ञान इसमें विस्तार से समझाया गया है।

5. प्रतिष्ठा और पूजा विधि (Consecration and Rituals)

  • बिना प्राण-प्रतिष्ठा के मूर्ति केवल पत्थर है। हयशीर्ष पांचरात्र में ‘अधिवास’ (शुद्धिकरण) और ‘प्राण-प्रतिष्ठा’ की जटिल प्रक्रियाओं का वर्णन है। इसमें मंत्रों के प्रयोग और मंडल निर्माण की विधियों का उल्लेख है।
  • पूजा में मंत्रोच्चार, अर्चन, होम और ध्यान की विधियाँ बताई गई हैं।

6. दार्शनिक विवेचन

  • पांचरात्र परंपरा के अनुसार सृष्टि के पाँच कारण हैं- पुरुष, प्रकृति, स्वभाव, कर्म और दैव।
  • हयशीर्ष संहिता में इन कारणों का दार्शनिक विवेचन मिलता है।

7. भक्त और साधक के लिए मार्गदर्शन

  • हयशीर्ष पांचरात्र ग्रंथ में भक्तों के लिए नियम, आचार और साधना पद्धति का उल्लेख है।
  • इसमें भक्ति, ध्यान और योग को एकीकृत रूप में प्रस्तुत किया गया है।
  • साधक को मोक्ष और परमज्ञान की प्राप्ति का मार्ग बताया गया है।

हयशीर्ष पांचरात्र ग्रंथ की अध्याय योजना

यह ग्रंथ मुख्य रूप से चार कांडों (भागों) में विभाजित है:

  1. आदिकुमार कांड
  2. संकर्ष कांड
  3. सौर कांड
  4. अध्यात्म कांड

इसमें लगभग 14,000 श्लोक हैं (हालाँकि वर्तमान में कुछ ही उपलब्ध हैं), जो मंदिर निर्माण (देवालय), प्रतिमा विज्ञान (मूर्ति लक्षण) और प्रतिष्ठा विधियों का विस्तार से वर्णन करते हैं।

हयशीर्ष पांचरात्र ग्रंथ की विशेषताएँ

  • वैष्णव आगम का हिस्सा: श्रीवैष्णव परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण।
  • ज्ञान का प्रतीक: हयग्रीव उपासना से विद्या और स्मृति की प्राप्ति।
  • मंदिर विधि: पूजा-पद्धति और स्थापत्य का विस्तृत विवरण।
  • दार्शनिक गहराई: सृष्टि के कारणों और भक्ति-योग का विवेचन।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

  • अग्नि पुराण जैसे महत्वपूर्ण पुराणों ने मंदिर निर्माण के संदर्भ में हयशीर्ष पांचरात्र को अपना मुख्य स्रोत माना है। यह ग्रंथ यह सिद्ध करता है कि प्राचीन भारत में कला और विज्ञान एक-दूसरे से अलग नहीं थे।

निष्कर्ष

  • हयशीर्ष पांचरात्र ग्रंथ भारतीय धार्मिक साहित्य का एक अद्वितीय अंग है। इसमें भगवान विष्णु के हयग्रीव स्वरूप की उपासना, मंदिर पूजा-पद्धति और दार्शनिक सिद्धांतों का समन्वित विवेचन मिलता है। यह ग्रंथ आज भी भक्ति, विद्या और आध्यात्मिक साधना के लिए मार्गदर्शक है।
  • हयशीर्ष पांचरात्र भारतीय ज्ञान परंपरा का वह स्तंभ है जिसने हमारे देश के भव्य मंदिरों को एक स्वरूप दिया। यह ग्रंथ हमें सिखाता है कि भक्ति और विज्ञान जब मिलते हैं, तो ऐसी रचनाएँ जन्म लेती हैं जो सदियों तक अडिग रहती हैं। यदि आप भारतीय संस्कृति, वास्तुकला या इतिहास के प्रेमी हैं, तो इस ग्रंथ का अध्ययन आपके लिए एक नया द्वार खोल सकता है।
  • यह ग्रंथ आज भी भारतीय वास्तुकला और मूर्तिकला के लिए मार्गदर्शक बना हुआ है।

– यह आलेख व्यापक शोध और प्राचीन पांडुलिपियों के आधार पर तैयार किया गया है।

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ग्रंथ परिचय

अपराजितपृच्छा में बावड़ी वर्णन

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अपराजितपृच्छा में बावड़ी वर्णन

मूलतः शक्ति-पूजा एवं शिल्पशास्त्र पर केन्द्रित ग्रंथ अपराजितपृच्छा विविध विषयों की जानकारी देता है। अन्य विषयों के साथ-साथ, अपराजितपृच्छा में बावड़ी वर्णन बड़े विस्तार से हुआ है।

बावड़ी – शक देश का कुंआ

बावड़ी को संस्कृत में वापी भी कहा जाता है। यह वस्तुतः सीढ़ीदार कुआं (Stepwells) होताहै। डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल का अनुमान है कि शक अपने साथ रहट और बावड़ी नामक दो विशेष प्रकार के कुएं भारत में लाए थे। बावड़ी (संस्कृत में वापी, गुजराती में बाव) के लिये प्राचीन नाम शकन्धु (शक देश का कुंआ) और रहट के लिये कर्कन्धु (कर्क देश का कुंआ) थे। कर्कदेश ईरान के दक्षिण पश्चिम में था। सातवीं शताब्दी ईस्वी के लेखक बाणभट्ट ने भी ‘हर्षचरित’ में रहट शब्द का प्रयोग किया है। राजस्थान के प्राचीन शिलालेखों में अरहट्ट भी इसी का द्योतक है।

जयपुर क्षेत्र में नगर नामक प्राचीन स्थल के वि.सं.741 (ई.684) के शिलालेख में एक वापी निर्माण का श्रेय मारवाड़ भीनमाल के कुशल शिल्पियों को दिया गया है और उन वास्तुविद्या विशारद सूत्रधारों की पर्याप्त प्रशंसा भी की गई है कि वे तो वास्तुविद्या के प्रगाढ़ पण्डित थे।  सातवीं शती की यह वापी आजतक ज्ञात प्राचीनतम वापी है। मारवाड़ में वापी और रहट दोनों ही विदेशी सम्पर्क के कारण प्रचलित हुए।

बीसवीं सदी के अंत तक भी राजस्थान के कुछ भागों में मृदभाण्डों वाले रहटों का प्रयोग किया जाता था। यही स्थिति बावड़ी की भी है। बहुत सी प्राचीन बावड़ियां आज भी जल प्राप्ति हेतु काम में ली जा रही हैं। भीनमाल के चण्डीनाथ मंदिर परिसर में एक पूर्वमध्य युगीन आयताकार वापी आज भी स्थित है।

यद्यपि बावड़ी निर्माण की कला विदेशी भूमि से आई थी तथापि यह भारत में इतनी लोकप्रिय हुई कि मध्यकाल आते-आते यह हिन्दू संस्कृति की प्रतीक बन गई।

अपराजितपृच्छा में बावड़ी वर्णन

अपराजितपृच्छा में बावड़ियों का वर्णन अत्यंत वैज्ञानिक और विस्तृत है। पश्चिम भारत, विशेषकर गुजरात और राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में जल प्रबंधन के लिए इन संरचनाओं का निर्माण एक आध्यात्मिक और सामाजिक कार्य माना जाता था।

भुवनदेवाचार्य ने इस ग्रंथ में बावड़ियों के वर्गीकरण, उनके माप और निर्माण की सूक्ष्म विधियों का उल्लेख किया है।

अपराजितपृच्छा में बावड़ी वर्णन चार मुख्य प्रकार

ग्रंथ में प्रवेश द्वारों की संख्या के आधार पर बावड़ियों को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया है:

  1. नंदा (Nanda): इसमें केवल एक प्रवेश द्वार और एक कूट (Pavilion) होता है। यह सबसे सरल संरचना है।
  2. भद्रा (Bhadra): इसमें दो प्रवेश द्वार होते हैं। यह मध्य आकार की बावड़ी होती है जिसमें विश्राम के लिए अधिक स्थान होता है।
  3. जया (Jaya): इसमें तीन प्रवेश द्वार होते हैं। यह काफी विशाल और भव्य होती है।
  4. विजया (Vijaya): इसमें चार प्रवेश द्वार होते हैं। यह सबसे दुर्लभ और राजसी प्रकार की बावड़ी है, जो स्थापत्य कला का शिखर मानी जाती है।

अपराजितपृच्छा में बावड़ी वर्णन – प्रमुख सिद्धांत और विशेषताएं

1. कूट और सोपान (Pavilions and Steps):

ग्रंथ के अनुसार, बावड़ी केवल जमीन में खोदा गया गड्ढा नहीं है, अपितु एक बहुमंजिला भूमिगत भवन है। इसमें सीढ़ियों के बीच-बीच में कूट (मंडप) बनाए जाते हैं, जो मिट्टी के दबाव को रोकने के साथ-साथ राहगीरों के बैठने के काम आते थे।

2. मान और प्रमाण (Measurement):

ग्रंथ में बावड़ी की लंबाई, चौड़ाई और गहराई का एक निश्चित अनुपात दिया गया है। यदि यह अनुपात सही न हो, तो संरचना के ढहने का भय रहता था। इसमें हस्त (हाथ की लंबाई) को मानक इकाई माना गया है।

3. जल का आध्यात्मिक महत्व:

अपराजितपृच्छा के अनुसार, जल के भीतर देवताओं का वास होता है। इसलिए, बावड़ी की दीवारों पर वराह, विष्णु, लक्ष्मी और गंगा-यमुना की मूर्तियां उकेरी जाती थीं। रानी की वाव (पाटन) इसका सबसे जीवंत उदाहरण है, जहाँ दीवारों पर लगभग 800 से अधिक मूर्तियां हैं।

4. इंजीनियरिंग और भूविज्ञान:

इसमें बताया गया है कि बावड़ी का निर्माण करते समय जल-शिरा (Aquifers) की पहचान कैसे की जाए और मिट्टी की प्रकृति के अनुसार नींव कैसे रखी जाए। यह आज के हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग का प्राचीन रूप है।

सामाजिक और सांस्कृतिक भूमिका

इन बावड़ियों का निर्माण केवल पानी पीने के लिए नहीं, अपितु सामुदायिक केंद्रों के रूप में किया जाता था। गर्मियों के दिनों में ये भूमिगत स्थल ठंडे रहते थे, जहाँ यात्री और स्थानीय लोग समय बिताते थे। यह महिलाओं के सामाजिक मेलजोल का भी एक प्रमुख स्थान था।

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ग्रंथ परिचय

अपराजितपृच्छा में महिषासुरमर्दिनी और सप्तमातृकाओं  का स्वरूप

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सप्तमातृकाओं के एक छोर पर वीरभद्र है तथा दूसरे छोर पर गणेश

अपराजितपृच्छा में महिषासुरमर्दिनी और सप्तमातृकाओं  का स्वरूप भारतीय संस्कृति में शक्ति पूजा की दार्शनिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करता है।

भारतीय संस्कृति में शक्ति पूजा की अवधारणा पुराणों के उन आख्यानों से आई हैै जिनमें देवताओं की माता अदिति के विविध स्वरूपों का वर्णन किया गया है। हालांकि अदिति का सर्वप्रथम उल्लेख वेदों में हुआ है किंतु अदिति का मानवीकरण पुराणों में आकर संभव हो सका। अपराजितपृच्छा में अदिति का यह रूप महिषासुरमर्दिनी और सप्तमातृकाओं के रूप में स्पष्ट हुआ है तथा उन्हें दार्शनिक आधार भी प्रदान करता है।

अपराजितपृच्छा के अनुसार देवी-प्रतिमा बनाना केवल कला नहीं, अपितु एक आध्यात्मिक साधना है। इस ग्रंथ में महिषासुरमर्दिनी और सप्तमातृकाओं के स्वरूप का जो वर्णन मिलता है, वह अद्भुत है।

अपराजितपृच्छा में महिषासुरमर्दिनी और सप्तमातृकाओं  का स्वरूप

1. महिषासुरमर्दिनी: शक्ति का पराक्रमी स्वरूप

अपराजितपृच्छा में महिषासुरमर्दिनी के अष्टादशभुजा (18 हाथ) और विंशतिभुजा (20 हाथ) रूपों को विशेष महत्व दिया गया है। ग्रंथ के अनुसार इनके मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं:

  • मुद्रा: देवी का दाहिना पैर सिंह पर और बायां पैर महिषासुर (भैंसे) की पीठ पर स्थित होना चाहिए। इसे प्रत्यालीढ़ मुद्रा कहा जाता है, जो युद्ध में विजय का प्रतीक है।
  • शस्त्र विधान: उनके हाथों में त्रिशूल, खड्ग (तलवार), चक्र, बाण, शक्ति, वज्र, और परशु जैसे मारक अस्त्र होते हैं। वहीं दूसरे हाथों में शंख, पाश, अंकुश और ढाल जैसे रक्षात्मक और प्रतीकात्मक आयुध होते हैं।
  • महिष का स्वरूप: महिष के कटे हुए गले से मनुष्य रूपी असुर बाहर निकलता हुआ दिखाया जाता है, जिसे देवी का त्रिशूल भेद रहा होता है।
  • भाव: उनके चेहरे पर उग्रता के स्थान पर एक दिव्य शांति और मंद मुस्कान होनी चाहिए, जो यह दर्शाती है कि बुराई का विनाश उनके लिए एक सहज खेल है।

2. सप्तमातृका: सात दिव्य माताएं

सप्तमातृकाओं का वर्णन करते समय अपराजितपृच्छा उनके वाहन, आयुध और ध्वज पर विशेष ध्यान देता है। ये सात शक्तियां अपने संबंधित देवताओं की स्त्री ऊर्जा (Consorts) मानी जाती हैं:

माता का नामवाहन/आसनमुख्य आयुध एवं विशेषता
ब्रह्माणीहंसअक्षमाला (माला) और कमंडलु धारण करती हैं। इनके चार मुख होते हैं।
माहेश्वरीवृषभ (बैल)त्रिशूल और कपाल धारण करती हैं। जटाजूट में चंद्रमा सुशोभित होता है।
कौमारीमयूर (मोर)हाथ में शक्ति (भाला) धारण करती हैं। यह कार्तिकेय की शक्ति हैं।
वैष्णवीगरुड़शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करती हैं। वनमाला से अलंकृत होती हैं।
वाराहीवराह (सूअर)इनका मुख वराह का होता है। ये दंड या हल धारण करती हैं।
इंद्राणीऐरावत हाथीहाथ में वज्र और अंकुश होता है। इनके शरीर पर सहस्त्र नेत्र (हजार आँखें) होते हैं।
चामुंडाप्रेत या शवये कृशकाय (दुबली) और विकराल रूप वाली होती हैं। मुंडमाला धारण करती हैं।

अपराजितपृच्छा में शिल्प विधान की मुख्य बातें

अपराजितपृच्छा स्पष्ट निर्देश देता है कि:

  1. स्थान: सप्तमातृकाओं की प्रतिमाएं हमेशा एक क्रम में होनी चाहिए, जिनके एक छोर पर वीरभद्र और दूसरे छोर पर गणेश का होना अनिवार्य है।
  2. अलंकरण: सभी देवियां दिव्य आभूषणों और करंड मुकुट से सुसज्जित होनी चाहिए (चामुंडा को छोड़कर)।
  3. वात्सल्य: चामुंडा के अतिरिक्त अन्य सभी माताओं की गोद में अक्सर एक बालक दिखाया जाता है, जो उनके सृजन और पोषण के पक्ष को दर्शाता है।

ये लक्षण आज भी भारत के मध्यकालीन मंदिरों (जैसे एलोरा की गुफाएं या ओसियां के मंदिर) में प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं।

अपराजितपृच्छा में दार्शनिक रहस्य

अपराजितपृच्छा में प्रतिमाओं के बाह्य स्वरूप के साथ-साथ उनके भीतर छिपे दार्शनिक रहस्यों और यंत्र-विज्ञान पर गहरा प्रकाश डाला गया है। यहाँ शिल्प और दर्शन के उस सूक्ष्म मिलन को समझा जा सकता है:

1. प्रतिमाओं के पीछे का दार्शनिक रहस्य

देवी के आयुध और मुद्राएं केवल सजावट नहीं, अपितु मनुष्य की चेतना के विभिन्न स्तरों के प्रतीक हैं:

  • अंकुश और पाश: देवी के हाथों में पाश (रस्सी) हमारी इंद्रियों की आसक्तियों और वासनाओं का प्रतीक है, जबकि अंकुश उन पर नियंत्रण पाने के विवेक का।
  • महिषासुर वध का दर्शन: यहाँ महिष (भैंसा) तामसिक प्रवृत्तियों, अज्ञान और आलस्य का प्रतीक है। देवी द्वारा उसका वध करना इस बात का संकेत है कि ज्ञान और शक्ति के उदय से ही हमारे भीतर के अंधकार का नाश संभव है।
  • सप्तमातृकाओं का मनोविज्ञान: ये सात माताएं मनुष्य की सात मानसिक वृत्तियों का भी प्रतिनिधित्व करती हैं। उदाहरण के लिए, चामुंडा क्रोध और संहार का रूप हैं, जो हमें सिखाती हैं कि नकारात्मकता को कैसे जड़ से मिटाया जाए।

2. यंत्र-विज्ञान: मंदिर की ऊर्जा देह

अपराजितपृच्छा के अनुसार, मंदिर का निर्माण यंत्र के आधार पर होता है। यंत्र को देवी की सूक्ष्म देह माना जाता है:

  • बिंदु और त्रिकोण: इस ग्रंथ में बताया गया है कि देवी मंदिर के गर्भगृह के नीचे श्रीचक्र या विशिष्ट यंत्रों की स्थापना की जानी चाहिए। यंत्र का केंद्रीय बिंदु शिव और शक्ति के मिलन का स्थान है।
  • वास्तु-पुरुष मंडल: मंदिर की भूमि को एक जीवित इकाई माना जाता है। शक्ति मंदिरों में त्रिकोण (Triangle) का विशेष महत्व है, जो शक्ति की क्रियाशील ऊर्जा को ऊपर की ओर प्रवाहित करता है।
  • बीज मंत्रों का अंकन: शिल्पशास्त्र के अनुसार, प्रतिमा के हृदय या पीठ के पीछे विशिष्ट बीज मंत्रों (जैसे ह्रीं, क्लीं) को उत्कीर्ण करने का विधान है, जिससे पत्थर की मूर्ति जीवंत होकर ऊर्जा विकीर्ण करने लगती है।

3. तांत्रिक पक्ष: परा और अपरा शक्ति

ग्रंथ में शक्ति के दो रूपों की चर्चा है:

  1. अपरा शक्ति: जो मूर्तियों और प्रतीकों में दिखाई देती है (सगुण रूप)।
  2. परा शक्ति: जो निराकार है और केवल यंत्र या गहरे ध्यान के माध्यम से अनुभव की जा सकती है।

अपराजितपृच्छा यह सुनिश्चित करता है कि एक साधारण भक्त अपरा (प्रतिमा) की पूजा करके धीरे-धीरे परा (ब्रह्मांडीय ऊर्जा) के रहस्य को समझ सके।

इस ग्रंथ की सबसे बड़ी देन यह है कि इसने कला (Art) को अध्यात्म (Spirituality) एवं दर्शन (Philosophy) से पूरी तरह जोड़ दिया। इस ग्रंथ के अनुसार बिना यंत्र के मूर्ति अधूरी है और बिना दर्शन के शिल्प केवल पत्थर।

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ग्रंथ परिचय

मानसार: भारतीय शिल्पशास्त्र का अद्वितीय ग्रंथ

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एरण का पुरास्थल

मानसार भारतीय शिल्पशास्त्र का एक अद्वितीय ग्रंथ है जिसमें वास्तुकला, मूर्तिकला और नगर नियोजन के विस्तृत सिद्धांत दिए गए हैं। इसे हिंदू वास्तुकला की परंपरा का एक मानक सूत्र‑ग्रंथ माना जाता है, जो आज भी वास्तु, पुरातत्त्व और इंडियन आर्किटेक्चर के शोध में व्यापक रूप से उद्धृत होता है।

परिचय

भारतीय संस्कृति में वास्तुशास्त्र और शिल्पकला का विशेष स्थान रहा है। मंदिर निर्माण, नगर नियोजन भवन और मूर्तिकला की परंपरा को समझने के लिए प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन आवश्यक है। मानसार ग्रंथ इन्हीं में से एक प्रमुख शिल्पशास्त्रीय ग्रंथ है, जिसे मानसार ऋषि  द्वारा रचित माना जाता है। यह ग्रंथ वास्तुशास्त्र, मूर्तिकला और नगर नियोजन के सिद्धांतों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है।

मानसार ग्रंथ क्या है?

मानसार (या मानसार शिल्पशास्त्र) संस्कृत में रचित एक प्राचीन वास्तु व शिल्पशास्त्र ग्रंथ है, जिसमें लगभग 70 अध्याय और करीब 10,000 श्लोक बताए जाते हैं। विद्वानों के अनुसार यह संभवतः पहली सहस्राब्दी ईस्वी के आसपास रचा गया और उत्तर भारत की वास्तु परंपरा का प्रामाणिक पाठ बन गया। ग्रंथ का नाम “मानसार” का अर्थ ही “माप‑मानों का सार” या “मापन‑शास्त्र का निचोड़” माना जाता है, जो इसके तकनीकी स्वरूप को दर्शाता है।[motilalbanarsidass]

संरचना और विषय‑वस्तु

मानसार ग्रंथ में लगभग 70 अध्याय हैं। इसकी शुरुआत ब्रह्मा की स्तुति से होती है और समापन शिव के तीसरे नेत्र के खुलने पर होता है।

  • प्रथम आठ अध्याय: शिल्प और वास्तु की मूलभूत परिभाषाएँ।
  • अध्याय 19 से 30: एक मंजिला से लेकर बारह मंजिला भवनों का वर्णन।
  • अध्याय 31 से 50: वास्तुशिल्प और नगर नियोजन की चर्चा।
  • अध्याय 51 से 70: मूर्तिकला और प्रतिमा निर्माण के नियम।

इस ग्रंथ में गर्भन्यास, भूमि परीक्षण, शङ्कु स्थापना, ग्राम और नगर की योजना, गोपुर और मण्डप निर्माण जैसे विषयों का विस्तार से उल्लेख मिलता है।

इस प्रकार मानसार के प्रारंभिक 8 अध्याय भूमिका और सिद्धांतात्मक चर्चा से जुड़े हैं, जिनमें वास्तुशास्त्र की उत्पत्ति, देवताओं से परंपरा का अवतरण और भूमि‑चयन जैसे विषय आते हैं। इसके बाद के 42 अध्याय में आवासीय भवन, बहुमंजिला इमारतें, महल, दुर्ग, बाजार, उद्यान, कुएँ‑तालाब और नगर‑योजना तक का विस्तृत वर्णन है। अंतिम लगभग 20 अध्याय मूर्तिकला, देवप्रतिमा, मानव‑प्रतिमा, पशु‑पक्षी की आकृतियों और अलंकरण‑विधान पर केंद्रित हैं।[samacharjustclick]​

वास्तुशास्त्र और नगर‑योजना में योगदान

मानसार के अनुसार किसी भी बस्ती के लिए ऐसी भूमि उपयुक्त मानी गई है जो ठोस मिट्टी की हो, हल्की ढलान के साथ पूर्व दिशा की ओर खुलती हो ताकि निवासी सूर्योदय का आनंद ले सकें। ग्रंथ में छोटे आवासीय परिसर से लेकर विशाल नगर तक के लिए माप, अनुपात और दिशा‑निर्देश दिए गए हैं; उदाहरण के लिए, नगरों को समुद्र, नदी या पर्वतों के समीप बसाने तथा मुख्य मार्गों को उत्तर‑दक्षिण या पूर्व‑पश्चिम दिशा में रखने की सलाह दी गई है। मानसार नगरों को आठ प्रकारों में विभाजित करता है, जिनमें राजधानियाँ, व्यापारिक नगर, तीर्थ‑नगर और दुर्ग‑नगर जैसे रूप शामिल हैं, जो प्राचीन भारत की उन्नत शहरी‑योजना परंपरा का संकेत देते हैं।[hi.wikipedia]​

मंदिर और मूर्ति‑निर्माण के सिद्धांत

यह ग्रंथ हिंदू मंदिर वास्तुकला के लिए भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है; कई विद्वान मानते हैं कि मध्य भारत के बटेश्वर मंदिर समूह जैसे स्थलों पर मानसार और मायामत जैसे शास्त्रों के सिद्धांत अपनाए गए। मंदिर के गर्भगृह, मंडप, शिखर, प्राकार, द्वार, स्तंभ, अलंकरण और प्रतिमा‑स्थापना के लिए इसमें विस्तृत माप‑मान, अनुपात और दिशा‑नियम वर्णित हैं। मूर्ति‑शिल्प संबंधी अध्यायों में विभिन्न देवताओं, बुद्ध, जैन तीर्थंकरों, महापुरुषों और पशु‑पक्षियों की प्रतिमाओं के आयाम, मुद्राएँ और लक्षण विस्तार से दिए गए हैं, जिससे यह संपूर्ण शिल्पशास्त्र का रूप ले लेता है।[transliteral]​

मानसार की विशेषताएँ

  1. वास्तुशास्त्र का वैज्ञानिक दृष्टिकोण – भूमि परीक्षण, दिशा निर्धारण और भवन निर्माण की विधियाँ आज भी प्रासंगिक हैं।
  2. नगर नियोजन – इसमें नगरों के मार्ग, प्राकार, गोपुर और मण्डप की योजना का उल्लेख है।
  3. मूर्तिकला का सौंदर्यशास्त्र – देव प्रतिमाओं के अनुपात, मुद्रा और स्थापत्य के नियम दिए गए हैं।
  4. प्राचीन तकनीकी कल्पनाएँ – 43वें अध्याय में ऐसे रथों का वर्णन है जो वायुवेग से चलते थे, जिससे तत्कालीन वैज्ञानिक सोच का पता चलता है।

ऐतिहासिक महत्व

मानसार ग्रंथ भारतीय वास्तु परंपरा का जीवंत दस्तावेज है। यह न केवल मंदिर निर्माण की विधियों को स्पष्ट करता है, बल्कि नगर नियोजन और सामाजिक संरचना की झलक भी देता है। श्री प्रसन्न कुमार आचार्य ने इस ग्रंथ को पुनः संकलित कर अंग्रेजी में अनुवाद किया और सात भागों में प्रकाशित किया।

आधुनिक सदंर्भों में मानसार

आज जब भारतीय वास्तुशास्त्र, मंदिर‑संरक्षण और हेरिटेज‑टूरिज़्म पर नए शोध हो रहे हैं, मानसार को एक मानक स्रोत के रूप में पढ़ा और उद्धृत किया जाता है। सतत विकास, जल प्रबंधन, प्राकृतिक ढलानों का उपयोग और सूर्य‑उन्मुख निर्माण जैसे सिद्धांत, जो आज “क्लाइमेट‑सेंसिटिव आर्किटेक्चर” में चर्चा का विषय हैं, मानसार में पारंपरिक रूप से व्यवस्थित रूप में मिलते हैं। इसीलिए इसे भारतीय वास्तुकला‑परंपरा का एक आधार‑ग्रंथ माना जाता है, जो प्राचीन ज्ञान और आधुनिक वास्तु‑चिंतन के बीच सेतु का कार्य करता है।[dharmawiki]​

निष्कर्ष

मानसार ग्रंथ भारतीय शिल्पशास्त्र का अद्वितीय ग्रंथ है जो वास्तु, मूर्तिकला और नगर नियोजन की परंपरा को संरक्षित करता है। यह ग्रंथ न केवल प्राचीन भारतीय ज्ञान का प्रतीक है, बल्कि आधुनिक समय में भी वास्तु और कला के क्षेत्र में मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।

  • आर्किटेक्ट्स और डिज़ाइनर्स के लिए यह ग्रंथ प्रेरणा का स्रोत है।
  • इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए यह भारतीय संस्कृति की गहराई को समझने का माध्यम है।

👉डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ऐतिहासिक पुस्तकें-

ग्रंथ परिचय

महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव – पालघर के साधुओं की हत्या का बदला ले लिया गया है!

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महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव - www.bharatkaitihas.com
महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव - पालघर के साधुओं की हत्या का बदला ले लिया गया है!

महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव – जनता की जीत, ठगों की हार

👉 16 जनवरी 2026 को महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव परिणामों ने भारतीय लोकतंत्र की दिशा और दशा को लेकर एक महत्वपूर्ण संकेत दिया है। इन चुनावों से यह स्पष्ट हो गया है कि महाराष्ट्र के मतदाताओं ने राजनीतिक ठगों को धता बताकर अपनी राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक अस्मिता को अक्षुण्ण रखने का संकल्प लिया है। यह केवल एक चुनावी परिणाम नहीं है, बल्कि जनता की चेतना का उद्घोष है कि अब वे जातीय, भाषाई और सांप्रदायिक छलावे में नहीं आने वाले।

राजनीतिक ठगों की रणनीतियाँ

इन चुनावों में कुछ राजनीतिक पार्टियाँ ‘मराठा मानुष’ के नाम पर मतदाताओं के बीच उतरीं। उन्होंने यह भ्रम फैलाने की कोशिश की कि मराठा पहचान ही महाराष्ट्र की असली पहचान है और उसी के नाम पर वोट माँगना उनका अधिकार है।

दूसरी ओर, कुछ राजनीतिक ठगों ने मराठी भाषा को चुनावी हथियार बनाया। उन्होंने यह प्रचार किया कि मराठी भाषा की रक्षा केवल उनके हाथों में है। मराठियों से बाहर के लोग चाहे वे महाराष्ट्र की जनता को सुखी बनाने के लिए किसी भी क्षेत्र में काम क्यों न कर रहे हों, उन्हें मारा-पीटा जाएगा और अपना राजनीतिक उल्लू सीधा किया जाएगा।

कुछ छुटभैये नेता जातीय समीकरणों के बल पर मतदाताओं को ठगना चाहते थे। उनका मानना था कि यदि वे जातीय आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण कर लें, तो सत्ता तक पहुँच आसान हो जाएगी। वहीं, कुछ षड्यंत्रकारी राजनीतिक ठग हमेशा की तरह साम्प्रदायिक एकता का नारा देकर विशेषकर मुस्लिम मतदाताओं के वोटों का ध्रुवीकरण करना चाहते थे।

कुछ राजनीतिक ठग विगत कई सालों से जातीय जनगणना करवाने के नाम पर जनता को भ्रमित करके उनसे वोट पाने की आस लगाए बैठे थे।

मतदाताओं की परिपक्वता

✨ महाराष्ट्र के मतदाताओं ने इन सभी चालों को न केवल समझा, बल्कि उन्हें पूरी तरह नकार दिया। जनता ने यह दिखा दिया कि उनकी प्राथमिकता केवल विकास, सुशासन और राष्ट्रीय-सांस्कृतिक अस्मिता है।

महाराष्ट्र के मतदाताओं ने यह साबित कर दिया कि वे अब जातीय, क्षेत्रीय, भाषाई एवं क्षुद्र राजीतिक चालों में फंसने वाले नहीं हैं। वे जान चुके हैं कि जातीय समीकरण, साम्प्रदायिक धु्रवीकरण या भाषाई पहचान से न तो उनके नगरों का विकास होगा और न ही उनकी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित होगा। उन्होंने राजनीतिक ठगों को स्पष्ट संदेश दिया है कि देशवासियों की राष्ट्रीय पहचान और सांस्कृतिक शक्ति ही मतदाताओं के वर्तमान एवं भविष्य को सुरक्षित बना सकती है।

महाराष्ट्र के मतदाताओं ने इन राजनीतिक ठगों को एक बार फिर बता दिया है कि आपने हमें बहुत ठग लिया, अब नहीं। लोकतंत्र में असली ताकत जनता के पास है और यदि जनता ठान ले तो किसी भी प्रकार के राजनीतिक छलावे को समाप्त कर सकती है।

हरियाणा, बिहार और उड़ीसा के उदाहरण

महाराष्ट्र से पहले हरियाणा, बिहार और उड़ीसा के मतदाता भी यही कार्य कर चुके हैं। हरियाणा में जातीय राजनीति लंबे समय से चुनावों पर हावी रही लेकिन पिछले विधान सभी चुनवों में वहाँ के मतदाताओं ने जातीय समीकरणों को दरकिनार करके विकास और सुशासन को प्राथमिकता दी। राष्ट्रीय अस्मिता और भारत की सांस्कृतिक पहचान को प्रमुखता दी।

इसी प्रकार बिहार में भी लंबे समय तक जातीय और साम्प्रदायिक राजनीति का बोलबाला रहा। परंतु वहाँ के मतदाताओं ने भी विगत विधानसभा चुनावों में यह दिखा दिया कि वे अब केवल जातीय पहचान के आधार पर वोट नहीं देंगे।

उड़ीसा के विगत विधान सभा चुनावों में राजनीतिक ठगों को सत्ता के सिंहासनों से दूर कर दिया गया। राजनीतिक धूर्त उड़ीसा के चुनावों में जातीय जनगणना का नारा वोटों में नहीं बदल सके।

इन तीनों राज्यों के उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय मतदाता अब परिपक्व हो चुके हैं। वे जानते हैं कि लोकतंत्र का असली उद्देश्य जनता की भलाई है, न कि कुछ नेताओं की सत्ता की भूख मिटाना।

👉 हरियाणा ने तोड़ाक – ठगों को डोला! 👉 बिहार ने फाड़ाक – ठगों का झोला!

पश्चिम बंगाल की ओर संकेत

अब यही कार्य पश्चिम बंगाल में होने जा रहा है। वहाँ भी लंबे समय से राजनीतिक ठगों ने भाषाई, क्षेत्रीय, सांप्रदायिक और जातीय समीकरणों का सहारा लेकर सत्ता पर अधिकार कर रखा है। लेकिन बदलते समय के साथ बंगाल के मतदाता भी जागरूक हो रहे हैं। वे समझ रहे हैं कि यदि वे अपनी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक अस्मिता को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो उन्हें राजनीतिक ठगों को सत्ता से बाहर करना होगा। शराब की एक बोतल में लोकतंत्र को गिरवी रखने से उनके बच्चों का भविष्य नष्ट हो जाएगा।

राष्ट्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक चेतना

इन चुनावों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारतीय जनता अपनी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक अस्मिता को लेकर सजग है। चाहे वह महाराष्ट्र हो, हरियाणा हो, बिहार हो या पश्चिम बंगालकृहर जगह जनता यह दिखा रही है कि उनकी प्राथमिकता केवल विकास और अस्मिता की रक्षा है।

राष्ट्रीय अस्मिता का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा भी है। जब जनता जातीय और भाषाई ठगों को नकारती है, तो वह यह संदेश देती है कि भारतीय संस्कृति की विविधता ही उसकी असली ताकत है।

लोकतंत्र की मजबूती

महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों ने यह भी साबित किया है कि भारतीय लोकतंत्र अब और मजबूत हो रहा है। जब जनता राजनीतिक ठगों को पहचानकर उन्हें सत्ता से बाहर करती है, तो लोकतंत्र की जड़ें और गहरी होती हैं। यह लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण है कि जनता अब केवल वादों और नारों से प्रभावित नहीं होती, बल्कि ठोस काम और ईमानदार नेतृत्व को महत्व देती है।

भविष्य की दिशा

यदि यह प्रवृत्ति पूरे देश में फैलती है, तो आने वाले समय में भारतीय राजनीति का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा। जातीय और सांप्रदायिक राजनीति का अंत होगा और विकास, सुशासन तथा सांस्कृतिक अस्मिता ही चुनावी मुद्दे बनेंगे। इससे न केवल लोकतंत्र मजबूत होगा, बल्कि देश की एकता और अखंडता भी सुदृढ़ होगी।

महाराष्ट्र की जनता ने अपनी राष्ट्रीय एवं सास्कृतिक अस्मिता को पहचान कर अपना जो निर्णय सुनाया है, उससे स्पष्ट है कि महाराष्ट्र की जनता ने पालघर के साधुओं की हत्या का बदला ले लिया है।

महाराष्ट्र के कुछ जगत् प्रसिद्ध राजनीतिक धूर्तों ने पालघर के निर्दोष साधुओं को दिन दहाड़े कैमरे के सामने, पुलिस और गुण्डों के हाथों मरवाया था, वस्तुतः वह भारत की राष्ट्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक पहचान को नष्ट करके साधुओं की चिताओं पर राजनीतिक रोटियां सेकने की घिनौनी साजिश थी।

महाराष्ट्र के मतदाताओं के संदेश

न केवल विगत विधान सभा चुनावों में अपितु हाल ही में हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में महाराष्ट्र की जनता ने उन हत्यारों के नाम स्पष्ट संदेश छोड़े हैं-

👉 जात-पात का खेल नहीं चलेगा, भाषा का छल नहीं चलेगा, धर्मनिपेक्षता के नाम पर सांप्रदायिक राजनीति नहीं चलेगी!

👉 विकास चाहिए, ठगी नहीं; सांस्कृतिक अस्मिता चाहिए, धर्मनिरपेक्षता का छल नहीं!

👉 महाराष्ट्र के मतदाता जगे हैं और पालघर के हत्यारे भगे हैं।

अब पश्चिम बंगाल की बारी है। वहाँ भी जनता राजनीतिक धूर्तों से निबटने को तैयार हैकृ

👉 बंगाली उठेंगे तो राजनीतिक ठग भगेंगे।

👉 हिन्दू संस्कृति ही भारत का धर्म है, विकास की लेखनी ही राष्ट्रीय कर्म है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अपराजित पृच्छा : शक्ति-पूजा और शिल्प परम्परा का अद्भुत ग्रंथ!

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अपराजित पृच्छा - www.bharatkaitihas.com
अपराजित पृच्छा

भारतीय संस्कृति में शक्ति-पूजा की परंपरा अत्यंत प्राचीन और गहन है। देवी-पूजन केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस परंपरा को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करने वाला अद्भुत ग्रंथ है – अपराजित पृच्छा

अपराजित पृच्छा का परिचय

यह भारतीय शिल्पशास्त्र और आगम परंपरा का ऐसा देदीप्यमान ग्रंथ है जो न केवल शक्ति-पूजा की विधियों और तत्त्वों का विवेचन करता है, बल्कि तंत्र-साधना के रहस्यों को भी उजागर करता है। यह ग्रंथ भारतीय कला, स्थापत्य और धर्मशास्त्र की अमूल्य धरोहर है।

अपराजित पृच्छा एक संस्कृत ग्रंथ है, जिसे 12वीं-13वीं शताब्दी के आसपास लिखा गया माना जाता है। गुजरात के चालुक्य राजाओं के संरक्षण में रचित यह ग्रंथ, विश्वकर्मा के मानस पुत्र अपराजित द्वारा पूछे गए प्रश्नों और उनके पिता द्वारा दिए गए उत्तरों के रूप में संकलित है।

यह ग्रंथ मुख्यतः वास्तुशास्त्र, मूर्तिशास्त्र और पूजा-विधान पर केंद्रित है। इसमें देवी-देवताओं की मूर्तियों के निर्माण, मंदिरों की संरचना और पूजा-पद्धति का विस्तृत वर्णन मिलता है। शक्ति-पूजा की परंपरा को इसमें विशेष स्थान दिया गया है, जिससे यह ग्रंथ भारतीय धार्मिक जीवन का दर्पण बन जाता है।

शक्ति-पूजा परंपरा में अपराजितपृच्छा का महत्व

1. शक्ति-पूजा की परंपरा

भारतीय दर्शन में शक्ति को सृष्टि की मूल ऊर्जा माना गया है। देवी को आदिशक्ति, जगतजननी और धर्मरक्षक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। ‘अपराजित पृच्छा’ में शक्ति-पूजा की विधियों का उल्लेख इस दृष्टि से अद्भुत है कि यह केवल अनुष्ठानिक क्रियाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि देवी-पूजन को जीवन की समग्र साधना से जोड़ता है।

  • देवी की मूर्तियों के निर्माण में सौंदर्य और शास्त्रीयता का संतुलन
  • पूजा में मंत्र, यंत्र और तंत्र का प्रयोग
  • शक्ति को मातृभाव से लेकर रक्षक और संहारक तक विभिन्न रूपों में स्वीकार करना
  • साधक के जीवन में शक्ति की उपस्थिति को आत्मबल और सामाजिक कल्याण से जोड़ना

2. शक्ति का दार्शनिक स्वरूप

अपराजितपृच्छा में शक्ति को केवल एक देवी के रूप में नहीं, अपितु ब्रह्मांड की मूल ऊर्जा के रूप में स्वीकार किया गया है। ग्रंथ के अनुसार, शिव और शक्ति का संबंध अविभाज्य है। जहाँ शिव ज्ञान हैं, वहीं शक्ति क्रिया और इच्छा का स्वरूप हैं। शक्ति-पूजा के इस ग्रंथ में देवी को आद्या कहा गया है, जो सृष्टि के सृजन, पालन और संहार की अधिष्ठात्री हैं।

3. प्रतिमा विज्ञान और शक्ति के विविध रूप

शक्ति-पूजा परंपरा में मूर्तिकला का बड़ा महत्व है, और अपराजितपृच्छा इस विषय पर विस्तृत प्रकाश डालती है। इसमें देवी के विभिन्न रूपों के आयुध (हथियार), वाहन, मुद्रा और उनके स्वरूप का सूक्ष्म विवरण मिलता है:

  • महिषासुरमर्दिनी: देवी के इस पराक्रमी रूप के दस, अठारह या बीस हाथों के आयुधों का वर्णन इसमें विस्तार से है।
  • सप्तमातृका: ब्रह्माणी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, इंद्राणी, वाराही और चामुंडा के शास्त्रीय स्वरूप का वर्णन शक्ति उपासना के सामाजिक और आध्यात्मिक पक्ष को दर्शाता है।
  • महाविद्या और योगिनी: ग्रंथ में 64 योगिनियों और उनके मंदिर विधान का भी उल्लेख है, जो मध्यकालीन भारत के तांत्रिक प्रभाव को रेखांकित करता है।

4. शक्तिपीठ और वास्तु विधान

इस ग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह शक्ति-पूजा को वास्तु (Architecture) के साथ जोड़ता है। अपराजितपृच्छा में बताया गया है कि शक्ति के मंदिर किस दिशा में होने चाहिए और उनके गर्भगृह की योजना कैसी होनी चाहिए।

  • पीठ विधान: इसमें विभिन्न प्रकार के पीठों (Altars) का वर्णन है, जो तंत्र साधना के लिए आवश्यक होते हैं।
  • मंडप संरचना: देवी मंदिरों के मंडप और शिखर की ऊँचाई के नियमों को शक्ति के दिव्य तेज के अनुरूप निर्धारित किया गया है।

5. तंत्र और उपासना पद्धति

अपराजितपृच्छा केवल एक शिल्प-ग्रंथ नहीं है, अपितु यह आगम परंपरा का संवाहक भी है। इसमें बीज मंत्रों, यंत्रों की रचना और साधना के मुहूर्त पर बल दिया गया है। ग्रंथ स्पष्ट करता है कि मूर्ति केवल पत्थर नहीं है; जब उसमें प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है और शक्ति का आह्वान होता है, तब वह साक्षात चैतन्य हो उठती है।

इसमें शक्ति की सौम्य (जैसे लक्ष्मी, सरस्वती) और रौद्र (जैसे काली, भैरवी) दोनों प्रकृतियों की उपासना का समन्वय मिलता है। यह ग्रंथ बताता है कि साधक की मनोकामना के अनुसार देवी के किस रूप की आराधना की जानी चाहिए।

6. कला और स्थापत्य में योगदान

‘अपराजित पृच्छा’ का महत्व केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि कला और स्थापत्य के क्षेत्र में भी है। इसमें मंदिर-निर्माण की सूक्ष्म विधियाँ दी गई हैं। देवी-पूजन के लिए विशेष प्रकार के मंदिरों, गर्भगृहों और वेदियों का उल्लेख मिलता है।

  • मंदिर की दिशा, आकार और अनुपात का निर्धारण
  • मूर्तियों की मुद्रा, आयाम और भावाभिव्यक्ति
  • पूजा के लिए आवश्यक उपकरण और वेदियाँ
  • शक्ति-पूजा हेतु विशेष रूप से निर्मित यंत्रों का विवरण

इस प्रकार यह ग्रंथ भारतीय स्थापत्य कला का भी अद्भुत मार्गदर्शक है।

7. दार्शनिक दृष्टि

‘अपराजित पृच्छा’ में शक्ति-पूजा को केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं माना गया, बल्कि इसे दार्शनिक साधना का रूप दिया गया है। शक्ति को ब्रह्म की अभिन्न अभिव्यक्ति मानते हुए साधक को आत्मज्ञान की ओर प्रेरित किया गया है।

  • शक्ति को सृष्टि, स्थिति और संहार की त्रिगुणात्मक शक्ति के रूप में देखा गया है।
  • पूजा का उद्देश्य केवल भौतिक लाभ नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति है।

साधक को शक्ति के माध्यम से आत्मबल, विवेक और करुणा प्राप्त करने की प्रेरणा दी जाती है।

8. सामाजिक महत्व

शक्ति-पूजा भारतीय समाज में स्त्री-शक्ति के सम्मान का प्रतीक रही है। ‘अपराजित पृच्छा’ इस परंपरा को और अधिक सुदृढ़ करता है। देवी को मातृभाव से लेकर योद्धा रूप तक स्वीकार करना समाज में स्त्री की बहुआयामी भूमिका को मान्यता देता है।

  • स्त्री को सृजनकर्ता और रक्षक दोनों रूपों में प्रतिष्ठित करना
  • समाज में स्त्री-शक्ति के प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव जगाना
  • सामूहिक पूजा और उत्सवों के माध्यम से सामाजिक एकता को बढ़ावा देना

9. सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व

ऐतिहासिक दृष्टि से अपराजितपृच्छा का लेखक भुवनदेव को माना जाता है। यह ग्रंथ उस समय लिखा गया जब भारत में शक्ति संप्रदाय (Shaktism) अपने चरमोत्कर्ष पर था। खजुराहो से लेकर उड़ीसा और गुजरात के मोढेरा तक, जो भी भव्य मंदिर बने, उनके पीछे अपराजितपृच्छा जैसे ग्रंथों का शास्त्रीय आधार रहा है।

यह ग्रंथ हमें यह भी बताता है कि मध्यकालीन समाज में नारी शक्ति को ब्रह्मांडीय शक्ति के प्रतीक के रूप में कितनी प्रधानता दी जाती थी। कला, धर्म और दर्शन का ऐसा संगम विरल ही देखने को मिलता है।

मानासर और अपराजितपृच्छा का संबंध

शिल्पशास्त्र की परंपरा में मानसार और अपराजितपृच्छा को अक्सर एक ही श्रेणी में रखा जाता है, हालांकि मानसार मुख्य रूप से दक्षिण भारतीय (द्रविड़) परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है और अपराजितपृच्छा उत्तर भारतीय (नागर/मारू-गुर्जर) परंपरा का।

मानासर की तरह ही अपराजितपृच्छा भी मान (Measurement) और प्रमाण (Proportion) पर अत्यधिक बल देती है। इन ग्रंथों के अनुसार, यदि कोई भवन सही माप और अनुपात में नहीं है, तो वह न केवल सौंदर्यहीन होगा, अपितु निवास करने वालों के लिए अशुभ भी हो सकता है।

निष्कर्ष

अपराजित पृच्छा शक्ति-पूजा परंपरा का अद्भुत ग्रंथ है, जो भारतीय धर्म, दर्शन, कला और समाज का समन्वित चित्र प्रस्तुत करता है। यह ग्रंथ हमें बताता है कि शक्ति-पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन की समग्र साधना है। देवी-पूजन के माध्यम से साधक आत्मबल, विवेक और करुणा प्राप्त करता है, वहीं समाज में स्त्री-शक्ति के प्रति सम्मान और एकता का भाव भी विकसित होता है।

अपराजितपृच्छा शक्ति-पूजा की परंपरा का एक ऐसा अक्षय कोष है, जो साधक, शिल्पी और इतिहासकार—तीनों के लिए समान रूप से उपयोगी है। यह हमें सिखाता है कि शक्ति की उपासना केवल कर्मकांड नहीं, अपितु कला और वास्तु के माध्यम से उस परम चेतना को अपने भीतर उतारने की एक प्रक्रिया है। आज भी जब हम प्राचीन भारतीय मंदिरों की दीवारों पर उत्कीर्ण देवी प्रतिमाओं को देखते हैं, तो उनमें अपराजितपृच्छा के शब्द ही जीवंत होकर मुस्कुराते प्रतीत होते हैं।

इस प्रकार ‘अपराजित पृच्छा’ भारतीय संस्कृति की उस अद्भुत परंपरा का प्रतिनिधि है, जिसमें शक्ति को जगतजननी, रक्षक और संहारक के रूप में स्वीकार कर जीवन के हर आयाम से जोड़ा गया है। यह ग्रंथ आज भी हमें प्रेरित करता है कि शक्ति-पूजा केवल मंदिरों तक सीमित न रहे, बल्कि हमारे जीवन और समाज में भी शक्ति का आदर और सम्मान बना रहे।

कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप में प्रकट हो गए! (84)

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कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप

वीर कल्लाजी राठौड़ और राजा जयमल राठौड़ दो-दो हाथों से तलवार चलाते हुए बढ़े! इसे चित्तौड़ के इतिहास में कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप में अवतरित हुए कहा गया। वे दोनों महावीर, शत्रुओं को मारते हुए अकबर (AKBAR) की सेना के लिए काल बन गए।

राजा जयमल के आदेश के बाद चित्तौड़ दुर्ग में जौहर की ज्वाला धधक उठी। जब दुर्ग के भीतर से गगनचुम्बी लपटें उठने लगीं तो वे अकबर (AKBAR) के शिविर तक दिखाई देने लगीं।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि एक जौहर फत्ता सिसोदिया के मकान में किया गया था और एक राणा के मुख्य सेवकों ने किया था। एक राठौड़ों ने किया था। इनमें कोठरिया का रावत साहिबखान मुख्य था। एक बहुत बड़ा जौहर चौहानों की हवेली में हुआ था जहाँ का मुख्य सरदार ईसरदास चौहान था।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लखता है कि लगभग 300 स्त्रियाँ इसमें जल मरी थीं। अबुल फजल (ABUL FAZAL) का यह विवरण अधूरा है। किले में जौहर की ज्वाला कई जगह धधकी थी तथा ठीक से कहा नहीं जा सकता कि इसमें भाग लेने वाली स्त्रियों, लड़कियों एवं बच्चों की संख्या कितनी थी!

रात के समय आकाश में ऊँची उठती अग्नि की लपटों को देखकर अकबर (AKBAR) बहुत विस्मित हुआ, उसने अपने मंत्रियों से इस अग्नि का कारण पूछा।

इस पर आम्बेर के राजा भगवानदास ने कहा कि जब हिन्दू वीर, युद्ध-क्षेत्र में मरने का निश्चय कर लेते हैं तो अपनी स्त्रियों और बच्चों को जौहर की अग्नि में जलाकर शत्रुओं पर टूट पड़ते हैं, इसलिये सावधान हो जाना चाहिये, कल सूर्योदय होते ही किले के दरवाजे खुलेंगे।

 राजा भगवानदास की यह बात सुनकर मुगल सेना को तैयार रहने के लिए कहा गया। 25 फरवरी 1568 को प्रातः होते ही किले के भीतर युद्ध के नगाड़े बजने लगे। मुगल सेना ने हैरान होकर देखा कि चित्तौड़ी वीर किले का दरवाजा खोलकर बाहर आ रहे हैं।

उन्होंने केसरिया पाग बांधी हुई है तथा देह पर केसरिया बाना धारण किया हुआ है। उनके माथे वीरत्व के दर्प से दमदमा रहे हैं। जिस प्रकार आज का बाल-सूर्य प्राची में उषा द्वारा सजाए गए लाल पथ पर प्रकट हुआ है, उसी प्रकार मेवाड़ी आन-बान और शान की रक्षा के लिए दुर्ग से बाहर निकले मेवाड़ी वीर रक्त के लाल पथ पर अग्रसर हो रहे थे।

मुगल सेना केवल इतना ही देख सकी किंतु वास्तविकता यह भी थी कि प्रत्येक हिन्दू वीर के माथे पर कुछ देर पहले ही उनकी पत्नियों, माताओं एवं बहिनों द्वारा अग्नि की लाल लपटों में प्रवेश करने से पहले अपने हाथों से कुमकुम और रोली के टीके सजाए गए थे।

प्रत्येक वीर की पगड़ी में भगवान श्रीकृष्ण का चित्र था और उनके मुख में पहले से ही तुलसी दल रखा हुआ था। वे गंगाजल पीकर तथा गले में तुलसी की कण्ठी डालकर दुर्ग से बाहर निकले थे।

उत्तर भारत के हिन्दुओं में विगत हजारों सालों से यह परम्परा रही है कि जब किसी शव को शमशान भूमि में ले जाया जाता है तो उसके मुँह में तुलसी दल और गंगाजल रखे जाते हैं तथा गले में तुलसी की कण्ठी धारण करवाई जाती है। इन चित्तौड़ी वीरों ने युद्ध-क्षेत्र में शत्रुओं को मारते हुए प्राणोत्सर्ग करने का निश्चय किया था, इसलिए वे पहले से ही ये सब तैयारियां करके आए थे।

चित्तौड़ी वीरों को दुर्ग के दरवाजे से बाहर निकलते देखकर मुगल सेना ने भी उन पर आक्रमण किया। राजा जयमल मेड़तिया ने अश्व पर चढ़ने का प्रयास किया किंतु टूटी हुई टांग के कारण अश्व पर सवार नहीं हो सका।

इस पर राजा जयमल ने अपने साथी सरदारों से कहा कि मैं पैर टूट जाने के कारण घोड़े पर नहीं चढ़ सकता परन्तु लड़ने की इच्छा तो रह गई है। इस पर जयमल के 23 वर्षीय भतीजे कल्ला राठौड़ ने अपने 60 वर्षीय काका जयमल को अपने कंधे पर बिठा लिया और बोला- अब लड़ने की आकांक्षा पूरी कर लीजिये!

इसके बाद दोनों वीरों ने अपने दोनों हाथों में तलवारें पकड़ीं और शत्रु दल पर टूट पड़े। भारत का इतिहास वीरता की घटनाओं से भरा पड़ा है किंतु इस तरह की घटना इतिहास में कहीं और नहीं हुई।

वीर कल्लाजी राठौड़ और राजा जयमल राठौड़ दो-दो हाथों से तलवार चलाते हुए बढ़े! इसे चित्तौड़ के इतिहास में कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप में अवतरित हुए कहा गया। वे दोनों महावीर, शत्रुओं को मारते हुए अकबर (AKBAR) की सेना के लिए काल बन गए।

जयमल और कल्ला चार हाथों से शत्रुओं का संहार करते हुए आगे बढ़ रहे थे। जिसके कारण उनके सामने पड़ने वाले मुगलों के पैर टिक नहीं पा रहे थे। इन दोनों वीरों ने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन करते हुए हनुमान पोल दरवाजे से मुगलों को बाहर खदेड़ दिया।

हनुमान पोल पार करने के कुछ ही समय बाद, भैरव पोल से पहले, राजा जयमल को बंदूक की गोलियां लगीं जिससे वह वीरगति को प्राप्त हुआ। शत्रु को मारते हुए मरने की उसकी साध पूरी हुई। वीरों का वसंत संभवतः इसी को कहते हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान ने इन्हीं क्षणों की वंदना करने के लिए वीरों का कैसा हो वसंत कविता लिखी थी-

कह दे अतीत अब मौन त्याग, लंके तुझमें क्यों लगी आग

ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग;

बतला अपने अनुभव अनंत वीरों का कैसा हो वसंत।

यह बताना समीचीन होगा कि राजा जयमल महाराणा सांगा का भांजा था। वह अपने ननिहाल के ममत्व का कर्ज चुकाकर इस नश्वर संसार से गया। अकबर (AKBAR) ने फतहनामा-ए-चित्तौड़ में जयमल राठौड़ की तुलना 1000 घुड़सवारों से की थी।

राजा जयमल द्वारा युद्धक्षेत्र में अपने जीवन का वसंत मनाकर वीरगति प्राप्त करने के बाद उसका भतीजा कल्ला राठौड़ और अधिक उग्र हो गया। उसने अकेले ही मुगलों को पीछे खदेड़ना आरम्भ किया। बहुत से मुगल सैनिक उसके पीछे लगे हुए थे।

भैरव पोल दरवाजे तक पहुंचने से कुछ ही पहले एक मुगल सैनिक ने वीर कल्ला राठौड़ का सिर काट दिया। चित्तौड़ अंचल में मान्यता है कि सिर कटने के बाद कल्ला राठौड़ का धड़ दोनों हाथों से तलवार चलाते हुए रनेला नामक स्थान पर पहुंचा, जहाँ पर उनकी पत्नी कृष्णकांता उनकी प्रतीक्षा कर रही थी।

अपने पति के सिर विहीन धड़ को प्रचण्ड रूप धारण करके आया देखकर रानी कृष्णकांता ने वहीं पर चिता जलाई तथा अपने पति के साथ चिता में बैठ गई।

कल्लाजी राठौड़ को मेवाड़ अंचल में लोकदेवता माना गया। संकटग्रस्त लोग आज भी उनकी मनौती मानते हैं। रनेला में जिस स्थान पर कल्लाजी का धड़ भूशायी हुआ था, लोकदेवता कल्लाजी का मुख्य मंदिर है।

चित्तौड़ दुर्ग में राजा जयमल राठौड़ एवं कल्ला राठौड़ की छतरियां बनी हुई हैं। कल्ला राठौड़ की छतरी 4 खंभों की है और जयमल राठौड़ की छतरी छः खंभों की है। किसी कवि ने लिखा है-

‘जठै झड्या जयमल कला छतरी छतरां मोड़।

कमधज कट बणिया कमंद गढ़ थारै चित्तौड़।’

राजस्थान, गुजरात एवं मध्यप्रदेश में कल्ला राठौड़ के लगभग 500 मंदिर हैं। इनमें से 175 मंदिर अकेले बांसवाड़ा जिले में हैं। इन मंदिरों में शनिवार एवं रविवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। मान्यता है कि जो बीमारी कल्लाजी के मंदिर में ठीक नहीं होती वह बीमारी आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को जयमलजी के मंदिर में ठीक होती है। इनमें से कई मंदिरों में कल्लाजी राठौड़ चतुर्भुज रूप में पूजे जाते हैं।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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