Monday, January 26, 2026
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शेख फरीद शकरगंज की दरगाह पर पहुंचने से पहले अकबर ने तेरह जंगली गधे मार डाले (95)

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शेख फरीद शकरगंज की दरगाह पर अकबर - www.bharatkaitihas.com
शेख फरीद शकरगंज की दरगाह पर अकबर

शेख फरीद शकरगंज के पूर्वज समरकंद से काबुल आकर रहने लगे थे और बाद में भारत के पंजाब प्रांत में आकर बस गए थे। शेख फरीद शकरगंज का एक पूर्वज फरुख शाह काबुली था जो शाह काबूल कहलाता था। काबुल से आने के कारण यह परिवार भारत में काबूल एवं काबूली कहलाने लगा था।

 ई.1570 में अकबर (AKBAR) अजमेर होता हुआ नागौर गया जहाँ कई हिन्दू राजाओं एवं जागीरदारों ने बादशाह से भेंट करके उसकी अधीनस्थ-मित्रता स्वीकार की थी तथा कुछ हिन्दू राजाओं ने अपनी पुत्रियों के विवाह अकबर से करने स्वीकार किए थे।

Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar - www.bharatkaitihas.com
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जब बादशाह अकबर नागौर से आगरा के लिए रवाना होने लगा तो उसकी इच्छा हुई कि वह पंजाब के पट्टन नगर में जाकर शेख फरीद शकरगंज की दरगाह की यात्रा करे। इसलिए बादशाह पंजाब की तरफ रवाना हो गया। अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि शेख शकरगंज इन्द्रिय-पालना करने के बहुत विरुद्ध था और आत्मा की शुद्धि के लिए इंद्रिय-संयम पर जोर देता था। चंगेज खाँ के शासन काल में शेख फरीद शकरगंज का एक पूर्वज काजी सईद के नाम से जाना जाता था। वह अफगानिस्तान के कसूर नामक कस्बे में रहता था। बाद में ये लोग काबुल आकर रहने लगे थे जिसके कारण काबूल एवं काबूली कहलाने लगे थे। शेख फरीद शकरगंज का एक पूर्वज फरुख शाह काबुली था जो शाह काबूल कहलाता था। अबुल फजल ने लिखा है कि शेख फरीद शकरगंज दिल्ली के सुल्तान बलबन का समकालीन था और वह उसी समय काबुल से भारत आकर रहने लगा था। उसने पंजाब के मुलतान नगर में रहकर शिक्षा प्राप्त की थी। दिल्ली का सुल्तान बलबन उसका बड़ा सम्मान करता था। ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती का उत्तराधिकारी ख्वाजा कुतुबुद्दीन कूसी एक चमत्कारी दरवेश था। उसने शेख फरीद शकरगंज को अपनी सेवा में रख लिया।

अबुल फजल ने लिखता है कि ख्वाजा कुतुबुद्दीन कूसी (Khwaja Qutbuddin Kusi) की कृपा से शेख फरीद शकरगंज को भी करामाती व्यक्तित्व प्राप्त हो गया और उसमें बड़ी-बड़ी करामातें दिखाने की क्षमता आ गई।

अकबर (AKBAR) के पिता हुमायूँ (HUMAYUN) ने जब चुनार की तरफ अभियान किया था तब हुमायूँ ने शेख फरीद शकरगंज के वंशज शेख खलील को अपना एक गुप्त-संदेश देकर शेरशाह सूरी के पास भेजा था। उसके साथ बहुत सारे मुगल अधिकारी भी भेजे गए थे।

शेख खलील ने उन मुगल अधिकारियों के समक्ष शेरशाह सूरी से औपचारिक बातचीत की तथा जब मुगल अधिकारी शेरशाह के दरबार से चले गए तब शेख खलील ने शेरशाह सूरी को हुमायूँ का गुप्त-संदेश दिया- ‘यदि शेरशाह सूरी अपनी सेना हटा ले तो हुमायूँ (HUMAYUN) शेरशाह सूरी के पीछे केवल दिखावा करने के लिए आएगा और शेरशाह के विरुद्ध कार्यवाही नहीं करेगा।’

शेरशाह ने शेख खलील से कहा- ‘समस्त अफगान अमीर आपके पूर्वज शेख फरीद शकरगंज में विश्वास रखते आए हैं। उसी सम्बन्ध से मैं आपसे पूछता हूँ कि मुझे हुमायूँ से लड़ना चाहिए या लौट जाना चाहिए?’

इस पर शेख खलील ने कहा- ‘हालांकि मैं बादशाह हुमायूँ का दूत हूँ किंतु तुमने मुझे अपना जानकर मुझसे यह सवाल पूछा है तो मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि तुम्हें हुमायूँ से युद्ध करना चाहिए क्योंकि इस समय हुमायूँ की सेना बिखरी हुई है तथा उसके पास घोड़ों और पशुओं का अभाव है। तुम्हें इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए। क्योंकि ऐसा स्वर्णिम अवसर तुम्हें जीवन में फिर कभी नहीं मिलेगा।’

इस प्रकार शेख खलील ने अकबर (AKBAR) के पिता हुमायूँ (HUMAYUN) के साथ गद्दारी करके शेरशाह सूरी को हुमायूँ से लड़ने के लिए उकसाया था। फिर भी अकबर का शेख फरीद शकरगंज में विश्वास कम नहीं हुआ था और वह शकरगंज की दरगाह पर हाजिरी देने जा रहा था।

जब बादशाह अकबर नागौर से पंजाब की तरफ जा रहा था तब उसे एक रेगिस्तानी वन में जंगली गधे दिखाई दिए। बादशाह ने उनका शिकार करने का विचार किया और वह तीन-चार शिकारियों को अपने साथ लेकर गधों के पीछे चल दिया।

घोड़ों को देखकर गधे बिदक कर भाग खड़े होते थे, इसलिए घोड़ों की पीठ पर बैठे रहकर गधों का शिकार करना संभव नहीं था। अतः अकबर ने अपने घोड़े से उतरकर पैदल ही गधों का पीछा करना आरम्भ किया। अंततः एक गधा उसकी बंदूक की गोली की पहुंच में आ गया और अकबर (AKBAR) ने एक गोली से एक गधा मार डाला।

इस सफलता से अकबर (AKBAR) इतना उत्साहित हुआ कि वह पागलों की तरह तपती हुई रेत में गधों के पीछे तेजी से भागने लगा और उसने एक-एक करके तेरह गधों को बंदूक से मार डाला। इस भाग-दौड़ में अकबर (AKBAR) अपने लश्कर से काफी दूर निकल गया।

उसके संगी-साथी बिछड़ गए और उसने धूप में तपते हुए रेगिस्तान में स्वयं को अकेला पाया। शहंशाह अकबर को जोर से प्यास लग रही थी किंतु दूर-दूर तक पानी उपलब्ध नहीं था। जब वह एक भी कदम चलने की स्थिति में नहीं रहा तो बेदम होकर एक पेड़ के नीचे पड़ गया। काफी देर बार बादशाह के अनुचर उसे ढूंढते हुए आए और उन्होंने अकबर को पानी पिलाया।

अकबर शिकार खेलने के पीछे बचपन से ही दीवाना था और उम्र बढ़ने के साथ उसकी यह दीवानगी बढ़ती जा रही थी। उसने भारत के मैदानों में शेर-चीतों, बाघ-बघेरों, हाथी-हथिनियों, गैण्डों और हिरणों के शिकार तो सैंकड़ों बार किए थे किंतु जंगली गधों का शिकार करने का यह उसका पहला अनुभव था। हालांकि यह अनुभव उसके लिए काफी पीड़ादायक रहा था।

वहाँ से अकबर पंजाब गया और शेख फरीद शकरगंज की दरगाह पर उपस्थित हुआ। शहंशाह (AKBAR) वहाँ पर कई दिन तक रुका। अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि बादशाह ने वहाँ के लोगों को बड़े विचित्र तरीके से मछली पकड़ते हुए देखा।

वहाँ के लोग अपने मुँह और हाथों से मछलियां पकड़ते थे और फिर लोहे के चिमटों से काटकर उनको पानी के बाहर लाते थे। अकबर को ऐसी चीजें देखने में बड़ा आनंद आता था, इसलिए वह घण्टों नदी के किनारे खड़ा रहकर लोगों को मछलियां पकड़ते हुए देखता।

अबुल फजल लिखता है कि कुछ दिनों तक दरगाह पर शारीरिक एवं अध्यात्मिक लाभ करने के बाद 16 अप्रेल 1571 को अकबर (AKBAR) आगरा के लिए रवाना हो गया। मार्ग में उसने चीतों का शिकार किया।

 एक दिन छः चीते पकड़े गए। उनमें से एक का नाम मदनकली रखा गया और उसे शाही-चीतों का मुखिया बना दिया गया। इस समय तक अकबर (AKBAR) को शासन करते हुए सोलह साल हो चुके थे।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

अकबर की रंगीन मिजाजी – मंत्रियों के घर रात गुजारता था अकबर (96)

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अकबर की रंगीन मिजाजी - www.bharatkaitihas.com
अकबर की रंगीन मिजाजी - मंत्रियों के घर रात गुजारता था अकबर (96)

मुगलों का इतिहास मुगल शहजादों की रंगीन मिजाजी के किस्सों से भरा पड़ा है किंतु अकबर की रंगीन मिजाजी उन सभी शहजादों से बढ़कर थी जिन्हें मुगलों के तख्त पर बैठने का अवसर मिला था।

मिर्जा कोका की मेहमान-नवाजी

ईस्वी 1570 में बादशाह अकबर (AKBAR) द्वारा शेख फरीद शकरगंज की दरगाह के दर्शन करने के लिए पंजाब के पाकपट्टन शहर की यात्रा की गई। पाकपट्टन से बादशाह आगरा के लिए रवाना हुआ।

मार्ग में वह पंजाब के दीपालपुर सूबे में रुका जहाँ का हाकिम अजीम मिर्जा कोका था। उसने बादशाह को अपने घर बुलाकर उसकी शानदार दावत की। बादशाह ने दो तीन रात अजीम मिर्जा के घर में गुजारने के बाद लाहौर का रुख किया।

हुसैन कुली खाँ की मेहमान-नवाजी

लाहौर के हाकिम हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) ने भी बादशाह को अपने घर पर दावत का आनंद लेने के लिए आमंत्रित किया। अकबर (AKBAR) हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) के घर में भी दो-तीन दिन रुका और उसके बाद हिसार की तरफ रवाना हो गया।

शेख सलीम चिश्ती का मेहमान

यहाँ से अकबर आगरा जाने की बजाय फिर से अजमेर के लिए रवाना हो गया। अजमेर में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर कुछ दिन रुकने के बाद बादशाह अजमेर से सीकरी चला गया जहाँ वह शेख सलीम चिश्ती के मकान में ठहरा।

संसार में ऐसा उदाहरण शायद ही देखने को मिले कि किसी दरवेश के घर में कोई शहंशाह मेहमान बनकर ठहरे! कुछ समय पहले ही आगरा के लाल किले में अकबर ने नए महल बनवाए थे किंतु अब उसने आगरा के लाल किले के स्थान पर शेख सलीम के मकान को अपना निवास बना लिया। इस कारण शेख सलीम के बेटे और बहुएं भी तंग होकर शेख सलीम से अकबर (AKBAR) की शिकायतें करते थे।

सीकरी में शाही महलों का निर्माण

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि चूंकि शहंशाह के बेटों का जन्म सीकरी में हुआ था इसलिए शहंशाह को सीकरी में रहना अधिक पसंद था। अबुल फजल लिखता है कि बादशाह की इच्छा हुई कि इस स्थान का वैभव बढ़ाया जाए।

इसलिए उसने आदेश दिए कि सीकरी में शाही उपयोग के लिए भवनों का निर्माण किया जाए। शाही भवनों के साथ-साथ अनेक छोटे-बड़े सरकारी अधिकारियों ने भी सीकरी में मकान बनवा लिए। सीकरी के वैभव को बढ़ता हुआ देखकर व्यापारियों एवं धनी-मानी जनता ने भी सीकरी में अच्छे मकान बनवा लिए।

अबुल फजल लिखता है कि इस शहर के चारों ओर पत्थर की चारदीवारी खड़ी कर दी गई। थोड़े समय में एक बड़े नगर का निर्माण हो गया और उसमें सुंदर महल बन गए। खानकाह, स्कूल और स्नानागार जैसी लोकोपयोगी संस्थाओं का भी निर्माण हो गया।

एक बड़ा बाजार बनाया गया जिसके निकट बाग लगाए गए। यह नगर ऐसा बन गया कि संसार इससे ईर्ष्या करने लगा। बादशाह ने इसका नाम फतहाबाद रखा था परंतु लोगों में यह फतेहपुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

अकबर के मंत्री मुजफ्फर खाँ ने आगरा में अपने लिए एक सुंदर मकान बनवाया। उसकी इच्छा थी कि बादशाह स्वयं आकर उसके मकान को देखे। इसलिए मुजफ्फर खाँ की प्रार्थना पर बादशाह उसका मकान देखने आगरा गया।

मंत्रियों के घर दावत

अकबर (AKBAR) ने वैसे भी कुछ सालों से यह मुहिम चला रखी थी कि वह अपने मंत्रियों के घर जाकर दावत खाता था और एक-दो रात उसके घर में बिताता था। कई लोग बादशाह के इस काम को शंका की दृष्टि से भी देखते थे।

अकबर की रंगीन मिजाजी

इस समय तक अकबर अपने अधिकांश शत्रुओं से निबट चुका था। इसलिए अपने समय का अधिकांश भाग शराब पीने, शिकार खेलने और सुंदर स्त्रियों के बीच बिताने लगा। यहीं से अकबर की रंगीन मिजाजी परवान चढ़ने लगी।

अकबर के बागी मंत्रियों और सेनापतियों में से अधिकतर या तो ठिकाने लग चुके थे या सुधर कर बादशाह की शरण में आ चुके थे। फिर भी कोई न कोई व्यक्ति उद्दण्डता करके अकबर (AKBAR) के आमोद-प्रमोद में खलल डाल ही देता था।

एक दिन लश्कर खाँ नामक एक दरबारी शराब के नशे में धुत्त होकर अकबर (AKBAR) के सामने आ गया और दरबार में ही उत्पात मचाने लगा। इस पर बादशाह ने लश्कर खाँ को घोड़े की पूंछ से बांधकर शहर भर में घुमवाया और उसे जेल में डाल दिया।

चौपड़ खेलने का शौक

हरम की औरतों के बीच समय गुजारने के दौरान अकबर को चौपड़ खेलने का शौक लग गया और वह कई-कई घण्टे हरम की औरतों के साथ चौपड़ खेलने लगा। चौपड़ ने अकबर की रंगीन मिजाजी को और भी अधिक गहरा कर दिया। 

एक दिन जफर खाँ नामक एक दरबारी अकबर (AKBAR) के साथ चौपड़ खेलते हुए हार गया। उसने दुबारा खेलने की प्रार्थना की तो बादशाह ने दुबारा खेल शुरु कर दिया। इस बार भी जफर खाँ हार गया। उसने तिबारा खेलने का अनुरोध किया। अकबर (AKBAR) ने उसके साथ तिबारा चौपड़ खेली और इस बार भी जफर खाँ हार गया। जब ऐसा कई बार हुआ तो जफर खाँ का मिजाज बिगड़ गया। वह भूल गया कि बादशाह के समक्ष जिद्द करना ठीक नहीं है और बेअदबी तो बिल्कुल भी नहीं।

हार की खीझ के कारण उसके मुँह से बादशाह की शान के खिलाफ कुछ शब्द निकल गए। बादशाह समझ गया कि अकबर की रंगीन मिजाजी ने ही जफर खाँ को बेअदबी करने का साहस दिया है। बादशाह ने उसी समय खेल बंद कर दिया तथा उसे तुरंत एक सेना लेकर किसी अभियान के लिए रवाना कर दिया।

बगावत के समाचार

इन्हीं दिनों अकबर को समाचार मिले कि गुजरात में मिर्जा लोग भयानक उत्पात कर रहे हैं। इस पर अकबर ने गुजरात जाने का निश्चय किया। अकबर को यह भी समाचार मिल रहे थे कि काबुल का शासक मिर्जा हकीम एक बार फिर से बगावत करने की तैयारी कर रहा है।

नगरकोट की घेराबंदी

इससे बादशाह चिंतित हुआ और उसने पंजाब के शासक खानेजहाँ हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) को आदेश दिया कि वह एक सेना लेकर नगरकोट को घेर ले।

ऐसा करने के पीछे उद्देश्य यह था कि यदि काबुल का शासक हकीम खाँ अकबर के गुजरात अभियान में व्यस्त होने की सूचना पाकर बगावत करने का प्रयास करे तो नगरकोट की सेना को तत्काल काबुल के लिए रवाना किया जा सके। बादशाह अकबर ने मिर्जा यूसुफ खाँ फतू तथा राजा बीरबल के साथ भी एक बड़ी सेना नगरकोट के लिए रवाना कर दी।

गुजरात के लिए कूच

अकबर ने आगरा और फतहपुर सीकरी में भी सुरक्षा के प्रबंध किए और स्वयं गुजरात कूच की तैयारी करने लगा। हर बार की तरह उसने बड़े अभियान पर जाने से पहले अजमेर की यात्रा करना उचित समझा। सेना का अधिकांश हिस्सा गुजरात के लिए रवाना कर दिया गया और बादशाह स्वयं अजमेर के लिए चल पड़ा।

गर्भवती बेगम

अकबर की रंगीन मिजाजी का आलम यह था कि उसका हरम हर समय उसके साथ चलता था जिसमें हजारों बांदियां, बेगमें रक्कासाएं और शहजादियां होती थीं। मार्ग में अकबर ने अपने हरम को आगे भिजवा दिया तथा स्वयं शिकार खेलने के लिए जंगलों में रुक गया। बेगमों को आगे भेजने का कारण यह था कि एक बेगम गर्भवती थी और उसके प्रसव का समय निकट आ गया था। जब अकबर (AKBAR) के सेवक अकबर के हरम लेकर अजमेर पहुंचे तो गर्भवती बेगम की स्थिति काफी नाजुक हो गई।

वह यात्रा का कष्ट सहन करने की स्थिति में नहीं रही। किसी तरह अजमेर पहुंचकर बेगम के प्रसव के लिए एक मकान की व्यवस्था की गई। यह मकान ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के एक खादिम का था। उस मकान को खाली करवाकर बेगम को वहाँ रखा गया और उसका प्रसव कराया गया।

दानियाल का जन्म

9 सितम्बर 1572 को बेगम ने एक लड़के को जन्म दिया। तत्काल ऊंट-सवारों को यह सूचना देकर बादशाह के शिविर की तरफ दौड़ाया गया। उस समय बादशाह का शिविर नागौर सरकार के फलौदी परगने में था।

बादशाह ने अपने तीसरे पुत्र का नाम दानियाल रखा और आदेश दिया कि जब यह लड़का एक महीने का हो जाए तो उसे पालने के लिए आम्बेर के राजा भारमल के पास भेज दिया जाए। वस्तुतः अकबर का आशय भारमल की पुत्री हीराकंवर (मरियम उज्मानी) से रहा होगा जो अकबर (AKBAR) की बेगम थी और इन दिनों आम्बेर में निवास कर रही थी।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

माचातोड़ सैनिक अकबर की सेना को गाजर-मूली की तरह काटने लगे (97)

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माचातोड़ सैनिक अकबर की सेना को गाजर-मूली की तरह काटने लगे !

मुगल इतिहास में माचातोड़ सैनिक दो बार सामने आते हैं। ये वे हिन्दू सैनिक होते थे जो अपने देश पर शत्रु की सेना का आक्रमड़ होने पर माचा अर्थात् चारपाई पर लेट जाते थे और जब शत्रु सेना आती थी तो उसका खूब सर्वनाश करके वीर गति को प्राप्त करते थे। अकबर की सेना को सिरोही में और औरंगजेब की सेना को उदयपुर में माचातोड़ सैनिक देखने को मिले थे। निश्चित रूप से गुगलों को माचातोड़ सैनिकों का सामना अन्य स्थानों पर भी करना पड़ा होगा किंतु इतिहास में उल्लेख केवल दो ही स्थानों पर मिलता है।

जब ईस्वी 1570 में बादशाह अकबर (AKBAR) को गुजरात में मिर्जा लोगों द्वारा उत्पात मचाए जाने की सूचना मिली तो बादशाह एक सेना लेकर गुजरात के लिए निकल पड़ा। मार्ग में बादशाह ने अपने हरम को अजमेर भिजवा दिया तथा स्वयं शिकार खेलने के लिए जंगलों में रुक गया।

चीतों से शिकार

उन दिनों मरुस्थलीय जंगलों में एशियाई चीतों की बड़ी संख्या निवास करती थी। राजा एवं बादशाह उनका शिकार किया करते थे। साथ ही उन्हें पकड़ कर पालतू बना लिया जाता था ताकि उन्हें शिकार के आयोजनों में साथ ले जाया जा सके।

अकबर ने इस यात्रा में चीतों द्वारा जंगली जानवरों का शिकार करने का आयोजन किया। यह एक खतरनाक प्रकार का शिकार था। इसके अंतर्गत, सधे हुए पालतू चीतों को जंगली पशुओं के पीछे छोड़ा जाता था।

आज्ञाकारी चीते अपने स्वामी के आदेश पर जंगली पशु का पीछा करते और उसे पकड़कर अपने मुँह से उसकी गर्दन दबोच लेते। जब जंगली पशु की सांस थम जाती तब ये चीते जंगली पशु को घसीटकर अपने मालिक के पास ले आते।

एक दिन बादशाह ने अपने एक सधे हुए चीते के साथ एक हिरण का पीछा किया। हिरण भागने में बहुत तेज था और वह लगभग डेढ़ मील तक भागता चला गया। चीता भी उसके पीछे लगा रहा और घोड़े पर सवार अकबर (AKBAR) तथा उसके सेवक चीते के पीछे लगे रहे।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि एक स्थान पर लगभग 25 गज चौड़ा नाला आ गया। हिरण ने नाले की परवाह नहीं की तथा लम्बी-लम्बी छलांगें मारते हुए नाले के दूसरी तरफ चला गया। चीते ने भी उसका पीछा नहीं छोड़ा। वह भी नाले के दूसरी तरफ चला गया और उसने हिरण को पकड़ लिया।

बादशाह चीते के इस साहस से इतना प्रसन्न हुआ कि उसने चीते का पद बढ़ाकर उसको चीता-ए-खास नियुक्त कर दिया तथा आदेश दिया कि उस चीते के सम्मान में उसके सामने ढोल बजाया जाये।

शाहबाज खाँ का अपमान

अकबर (AKBAR) की सेवा में शाहबाज खाँ नामक एक अमीर रहा करता था। वह अफगानिस्तान से आया हुआ तुजक अमीर था जिन्हें आजकल ताजिक कहा जाता है। उसका काम शाही सवारी की व्यवस्था करने का था। बादशाहकी सेवा में बाबा खान काकशाल नामक अमीर भी रहा करता था। उसे अपने तुर्क होने पर बड़ा घमण्ड था।

इसलिए वह ताजिकों को अपने सामने कुछ भी नहीं गिनता था। एक दिन बाबा खान काकशाल ने शाहबाज खाँ तुजुक का बड़ा अपमान किया। शाहबाज खाँ ने बादशाह से बाबा खान की शिकायत की। इस पर बादशाह अकबर ने बाबा खान को बंदी बनाने तथा उसे कठोर सजा देने के आदेश दिए ताकि भविष्य में किसी भी अमीर को शहंशाह के सेवकों का अपमान करने की हिम्मत न हो सके।

अकबर के सेनापति

12 अगस्त 1572 को शहंशाह अकबर ने खान अकेला (Khan Akela) को गुजरात की ओर रवाना किया। उसके साथ अशरफ खाँ, शाहकुली खाँ, मेहरम शाहबुदाग खाँ, सईद महमूद खाँ कुलीच खाँ, सादिक खाँ, शाह फखरुद्दीन, हैदर मोहम्मद खान, अख्तर बेगी, सईद अहमद खान, क़त्लक कदम खाँ, खान किला का दामाद मुहम्मद कुली खान, मेहर अली खान सिल्दूज, सईद अब्दुल्लाह खान, अमीरजादा अली खाँ और बहादुर खाँ भेजे गए।

1 सितंबर 1572 को बादशाह ने भी अजमेर से प्रयाण किया। वह मार्ग में शिकार करना चाहता था और यह देखना चाहता था कि जो सेनानायक आगे भेजे गए हैं, वे कैसा काम करते हैं! वह यह भी चाहता था कि यथासंभव शीघ्र अति शीघ्र गुजरात प्रांत शाही सेवकों के हाथों में आ जाए।

खान कसाँ की छाती में जमधारा

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अपनी पुस्तक मुंतखब उत् तवारीख में लिखा है कि जब शहंशाह अकबर मेड़ता के पास पहुंचा तब यह खबर आई कि सिरोही राज्य में एक राजपूत ने खान कसाँ को जमधारा मारा जो कि एक हथियार है और भारत में बहुत प्रचलित है।

वह जमधारा खान कसाँ की छाती में घुसा और कंधे के पुट्ठे से बाहर निकल गया। घाव गहरा था किंतु मारक नहीं था। मुगल सेना ने उस राजपूत को वहीं पर घेरकर मार डाला। अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने यह घटना भाद्राजून की बताई है जो कि सिरोही राज्य में न होकर उसके निकटवर्ती जालौर राज्य में था।

इस सूचना से अकबर समझ गया कि सिरोही के राजपूत, शाही सेना का विरोध करेंगे और उसे अपने राज्य से होकर नहीं जाने देंगे। इस कारण वह संभल कर चलने लगा।

माचातोड़ सैनिक

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि जब शहंशाह की सेना सिरोही राज्य में पहुंची तो लगभग डेढ़ सौ राजपूतों की एक टुकड़ी ने अपने पैतृक रीति-रिवाज के अनुसार कुछ ने मंदिर में और कुछ ने सिरोही राजा के महल में मरने-मारने का प्रण किया। ये माचातोड़ सैनिक थे जो शरीर में प्राण रहने तक अपने शत्रु का नाश करते रहते थे!

वे लड़े तथा मुगल सैनिकों द्वारा काट दिए गए। इस लड़ाई में दिल्ली के प्रशासक मरहूम तातार खाँ का बेटा दोस्त मोहम्मद शहीद हो गया। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने बहुत संक्षेप में इस घटना का उल्लेख किया है। अबुल फजल ने लिखा है कि बहुत से लोग मंदिर में छिप गए।

वस्तुतः उस काल में हिन्दुओं में यह प्रथा थी कि जब उनके राज्य से मुसलमानों की बड़ी सेनाएं गुजरती थीं, जिनका वे सामना नहीं कर सकते थे तो वे अपने मंदिरों से देव-प्रतिमाओं को निकाल कर छिपा देते थे और प्रजा के साथ पूरा नगर खाली करके जंगलों में अथवा ऐसे स्थानों में चले जाते थे जहाँ से वे शत्रु सेना को नुक्सान पहुंचा सकें।

नगर खाली करते समय हिन्दू राजाओं द्वारा प्रतीकात्मक रूप से कुछ बलिष्ठ सैनिकों को मंदिरों एवं राजमहलों के बाहर सुला दिया जाता था। ये सैनिक अपने देवता एवं राजा के स्थान की रक्षा करने के लिए शत्रु से लड़ते हुए अपने प्राण न्यौछावर करने के लिए वहाँ छोड़े जाते थे।

ये हिन्दू सैनिक खूब खाते-पीते और दिन भर चारपाई पर पड़े रहकर शत्रु के आने की प्रतीक्षा करते। इसलिए उन्हें माचातोड़ अर्थात् चारपाई तोड़ने वाला कहा जाता था।

माचातोड़ सैनिक अपने शत्रु से एक साथ नहीं लड़ते थे। अपितु जब शत्रु सेना मंदिर अथवा राजमहल में प्रवेश करने का प्रयास करती तो माचातोड़ सैनिकों में से कोई एक सैनिक उठता और दोनों हाथों से तलवार चलाता हुआ शत्रुओं को गाजर-मूली की तरह काटता था।

इसी क्रम में वह अपने देवता एवं राजा के निमित्त अपने प्राणों को पुष्प की तरह अर्पित करता था। वस्तुतः सिरोही में अकबर (AKBAR) का सामना इन्हीं माचातोड़ सैनिकों से हुआ था। उसी समय अकबर को सूचना मिली कि राणा कीका, मुगल चौकियों पर हमला करके उन्हें फिर से अपने अधीन कर रहा है।

महाराणा प्रताप के धावे

अकबर कालीन मुस्लिम लेखकों की पुस्तकों में उदयपुर के महाराणा प्रतापसिंह को राणा कीका लिखा गया है। क्योंकि प्रताप के बचपन का नाम कीका था। मेवाड़ क्षेत्र के भील भी प्रताप को कीका के नाम से ही पुकारते थे। मेवाड़ी भाषा में कीका का अर्थ होता है- बच्चा!

पाठकों को स्मरण होगा कि ई.1568 में अकबर ने महाराणा उदयसिंह से चित्तौड़ छीन लिया था और चित्तौड़ के आसपास के काफी बड़े क्षेत्र में मुगल चौकियां स्थापित कर दी थीं जिन्हें उन दिनों थाना कहा जाता था।

28 फरवरी 1572 को महाराणा उदयसिंह का निधन हो चुका था और उसका बड़ा पुत्र प्रतापसिंह मेवाड़ की गद्दी पर बैठ चुका था। राणा प्रताप ने गद्दी पर बैठते ही मेवाड़ क्षेत्र की मुगल चौकियों को उजाड़कर उन्हें फिर से मेवाड़ राज्य में मिलाना आरम्भ कर दिया था।

मेवाड़ से आई इस सूचना से अकबर (AKBAR) चिंतित हुआ। उसने बीकानेर के राजकुमार रायसिंह को जो इन दिनों जोधपुर का भी प्रशासक था, महाराणा प्रताप के पीछे भेजा। 

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

शेर खाँ फुलादी बादशाह से डर कर भाग गया! (98)

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शेर खाँ फुलादी - bharatkaitihas.com
मुगल पेंटिंग

शेर खाँ फुलादी (Sher Khan Fuladi) अकबर (AKBAR) से डर कर भाग गया! अकबर के कर्मचारी मीर खाँ ने गुजराती शहजादे मुजफ्फर खाँ को पकड़ लिया जो कि एक खेत में छिपा हुआ था। बादशाह ने मुजफ्फर खाँ को करम अली के सुपुर्द कर दिया।

शेर खाँ फुलादी के बेटों का ईडर की तरफ पलायन

जब ईस्वी 1570 में बादशाह गुजरात में उत्पात मचा रहे मिर्जा लोगों के विरुद्ध कार्यवाही करने जा रहा था तब मार्ग में उसे सूचना मिली कि अहमदाबाद पर घेरा डालकर बैठे हुए अफगान नेता शेर खाँ फुलादी के बेटे अपने परिवारों को लेकर ईडर की तरफ गए हैं।

अकबर (AKBAR) ने तातार खाँ की अध्यक्षता में एक सेना उनकी तरफ भेजी जिसे सिरोही के सैनिकों ने मार डाला। मुल्ला कादिर बदायूंनी लिखता है कि अकबर ने आम्बेर के राजा भगवानदास के बेटे मानसिंह को एक प्रशिक्षित फौज के साथ ईडर की तरफ भेजा ताकि वह शेर खाँ फुलादी (Sher Khan Fuladi) के बेटों का पीछा कर सके जो बादशाह के डर से अपने परिवारों को अहमदाबाद से ईडर ले जा रहे थे।

 इस प्रकार अकबर अपने शत्रुओं के विरुद्ध कार्यवाही करता हुआ और अहमदाबाद की तरफ बढ़ता रहा।

रायसिंह राठौड़ द्वारा महाराणा प्रताप की खोज

बीकानेर के राजकुमार रायसिंह राठौड़ को AKBAR ने महाराणा प्रताप के विरुद्ध भेजा था। वह अपनी सेना लेकर मेवाड़ की पहाड़ियों में घुसा तथा कुंभलगढ़ होता हुआ गोगूंदा की तरफ गया किंतु महाराणा प्रताप के सैनिकों को नहीं ढूंढ सका। इस प्रकार वह मेवाड़ के पहाड़ों में भटकता रहा।

मानसिंह कछवाहा की कार्यवाही

उधर मानसिंह कछवाहा ने बड़ी तेजी से अफगान सेनापति शेर खाँ फुलादी के पुत्रों का पीछा किया। उसने अफगानों की सेना को तितर-बितर करके अफगानों का बहुत सा सामान लूट लिया और फिर से अकबर (AKBAR) की सेना से आ मिला।

अब्दुल रहीम को पट्टन की सूबेदारी

अब शहंशाह और आगे बढ़ा तथा पट्टन तक पहुंच गया। पट्टन गुजरात का एक अत्यंत प्राचीन शहर था जिसका पूरा नाम महमूद गजनवी के आक्रमण के समय अन्हिलपट्टन हुआ करता था किंतु अकबर के समय में घिसकर पट्टन रह गया था।

पाठकों को स्मरण होगा कि यह वही स्थान था जहाँ अफगानियों ने अकबर के संरक्षक बैराम खाँ की हत्या की थी। उस समय बैराम खाँ के पुत्र रहीम खाँ की आयु 5 वर्ष थी। अब वह 16 वर्ष का हो चुका था। अकबर (AKBAR) ने उसे मिर्जा खाँ की उपाधि दी थी। उस काल की पुस्तकों में रहीम का नाम मिर्जा खाँ ही मिलता है।

बैराम खाँ की मृत्यु के बाद से ही अब्दुल रहीम तथा उसकी माँ खानजादा बेगम बादशाह अकबर के हरम में रहते थे। बादशाह ने पट्टन पहुंचने पर बैराम खाँ को याद किया तथा उसके पुत्र अब्दुल रहीम अर्थात् मिर्जा खाँ को अपने पास बुलाया। अकबर ने अब्दुल रहीम को पट्टन का सूबेदार बना दिया तथा सैयद अहमद खाँ को रहीम की सहायता के लिए नियुक्त कर दिया।

शेर खाँ फुलादी का अहमदाबाद से पलायन

इस समय शेर खाँ फुलादी (Sher Khan Fuladi) अहमदाबाद का घेरा डाले हुए था। वह एक अफगान योद्धा था और गुजरात के सुल्तान महमूद गुजराती का अमीर था। उसी की तरफ से शेर खाँ ने अहमदाबाद घेर रखा था जो कि विगत काफी समय से अकबर (AKBAR) के अधीन था।

जब शेर खाँ को ज्ञात हुआ कि बादशाह पट्टन तक आ पहुंचा तो शेर खाँ फुलादी अपने सैनिकों के साथ अहमदाबाद का घेरा छोड़कर भाग खड़ा हुआ।

गुजराती शहजादे की गिरफ्तारी

गुजरात के सुल्तान महमूद गुजराती का वजीर इतिमाद खाँ अब भी अहमदाबाद के मोर्चे पर डटा हुआ था। इतिमाद खाँ ने गुजरात के सुल्तान महमूद गुजराती के पुत्र मुजफ्फर को बंदी बना रखा था ताकि गुजरात का सुल्तान इतिमाद खाँ की मुट्ठी में रह सके।

जब शहजादे मुजफ्फर खाँ ने सुना कि शहंशाह अकबर पट्टन तक आ पहुंचा है तो वह भी अवसर पाकर वजीर इतिमाद खाँ की कैद से भाग निकला। अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि बादशाह के कर्मचारी मीर खाँ ने मुजफ्फर खाँ को पकड़ लिया जो कि एक खेत में छिपा हुआ था।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि शहंशाह ने गुजरात के शहजादे मुजफ्फर खाँ को शाह मंसूर नामक अपने एक अमीर के संरक्षण में दे दिया तथा मुजफ्फर खाँ के गुजारे के लिए तीस रुपया मासिक की पेंशन बांध दी।

अहमदाबाद नगर की चाबियाँ

जबकि अबुल फजल ने लिखा है कि बादशाह ने मुजफ्फर खाँ को बंदी बनाकर कर्मअली के सुपुर्द कर दिया। उधर अहमदाबाद पर घेरा डालकर बैठे गुजराती वजीर इतिमाद खाँ को बादशाह का भय सताने लगा और वह बहुत सारे गुजराती अमीरों को अपने साथ लेकर बादशाह को सलाम करने के लिए उसकी सेवा में उपस्थित हुआ। इन अमीरों ने अहमदाबाद नगर की चाबियाँ अकबर (AKBAR) को सौंप दीं।

हब्शियों को मुगलों की गुलामी

कुछ अबीसीनियन अर्थात हब्शी सैनिक भी अहमदाबाद के मोर्चे से भागकर अकबर की शरण में आए। इनमें कुछ अमीर भी थे। बादशाह ने गुजराती वजीर इतिमाद खाँ से कहा कि वह इन हब्शियों की जमानत दे किंतु गुजराती अमीरों ने उनकी जमानत देने से मना कर दिया।

मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि उन सब हब्शियों को पकड़कर मुगल सेनापतियों के पहरे में रख दिया। जबकि अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि बादशाह ने आदेश दिए कि उन्हें गुलाम बना लिया जाए तथा वे मुगलों की सेवा चाकरी के काम में लगाए जाएं।

अकबर का हरम

जब अकबर अपनी राजधानी फतहपुर सीकरी से बाहर जाता था तो उसके हरम की हजारों लौण्डियाएँ, मुगल बेगमें तथा शहजादियाँ भी मुगल सेना के पहरे में बादशाह के पीछे-पीछे चलती थीं। यहाँ अकबर ने अपना हरम अपने विश्वासपात्र सैयद महमूद बारहा तथा शेख महमूद बुखारी के संरक्षण में छोड़ा और स्वयं तेजी से पट्टन से निकल गया।

साबरमती एवं साम्बे

से रवाना होकर अहमदाबाद के निकट साबरमती के तट पर जा पहुंचा। अकबर के तम्बू साबरमती के तट पर लगाए गए। कुछ दिनों तक साबरमती के तट पर मनोविनोद करने के बाद अकबर साम्बे की ओर रवाना हुआ। इसी बीच सैयद महमूद बारहा तथा शेख महमूद बुखारी बादशाह के हरम को लेकर साबरमती पहुंच गए।

गुजरात के शहरों की घेराबंदी

अहमदाबाद भले ही बादशाह के हाथ में आ गया था किंतु भुज, बड़ौदा एवं सूरत आदि शहरों को इस समय भी गुजरात के अफगान अमीरों तथा इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) और मुहम्मद हुसैन मिर्जा की सेनाओं ने घेर रखा था।

मुल्ला बदायूंनी ने अपनी पुस्तक में भुज को भोज लिखा है। इसलिए प्रतीत होता है कि भुज का वास्तविक नाम भोज रहा होगा। सातवीं-आठवीं शताब्दी से लेकर बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी ईस्वी में हिन्दू राजाओं में यह नाम खूब प्रचलन में था।

अतः भोज किसी हिन्दू राजा ने बसाया होगा। कच्छ के रण में स्थित होने के कारण आजकल इस स्थान को भुज कच्छ कहा जाता है।

अबीसीनियन अमीर फरार

गुजरात के अमीरों में इख्तियार उल मुल्क नामक एक अबीसीनियन अमीर भी था। वह अवसर पाकर अहमदाबाद से भागकर अहमदनगर चला गया। अकबर को आशंका हुई कि गुजरात के सुल्तान का वजीर इतिमाद खाँ भी भाग सकता है।

इसलिए अकबर (AKBAR) ने उसे शहबाज खाँ कंबो के संरक्षण में दे दिया अर्थात् इतिमाद खाँ पर शहबाज कंबो का पहरा लगा दिया। शेर खाँ फुलादी अब भी मुगल सेना की पकड़ से दूर था।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

इब्राहीम हुसैन मिर्जा  को मारने के लिए रात में नदी में उतर गया अकबर! (99)

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मुगल पेंटिंग

इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) की सेना लम्बे कांटेदार पेड़ों के पीछे से अचानक प्रकट हुई और उसने राजा भगवानदास पर हमला किया। यहाँ की धरती बहुत ऊबड़-खाबड़ थी। राजा भगवान दास घायल हो गया और उसे पीछे हटना पड़ा।

जब ईस्वी 1570 में अकबर (AKBAR) ने गुजरात के लिए अभियान किया तो अहमदाबाद को घेर कर बैठे अफगान अमीर एक-एक करके बादशाह की शरण में आने लगे किंतु बादशाह ने उनका विश्वास नहीं किया और उन्हें अपने अमीरों के संरक्षण में रख दिया।

रुस्तम खाँ रूमी की हत्या

बादशाह को सूचना मिली कि सुल्तान मिर्जा के पुत्र इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) ने भोज के किले में अकबर (AKBAR) के सेनापति रुस्तम खाँ रूमी को मार डाला है और इब्राहीम हुसैन मिर्जा बादशाह के शिविर से आठ कोस की दूरी से होकर निकलने वाला है।

इस पर शहंशाह ने अपने हरम तथा शहजादे सलीम को बहुत से अमीरों के संरक्षण में अपने शिविर में छोड़ा तथा स्वयं एक बड़ी सेना लेकर इब्राहीम हुसैन मिर्जा को नष्ट करने के लिए रवाना हुआ।

मिर्जा लोग अकबर के ही खानदान के शहजादे थे किंतु वे शहंशाह को हटाकर स्वयं बादशाह बनना चाहते थे। इनमें से कई मिर्जाओं को बाबर (BABUR)  की बेटियां, पोतियां, दोहितियां भी ब्याही गई थीं। इसलिए मुगल बादशाह प्रायः इनके प्राण नहीं लेते थे। उसी का लाभ उठाकर मिर्जा लोग बार-बार बगवात किया करते थे।

इब्राहीम हुसैन मिर्जा पर दो तरफा घेरा

शहंशाह अकबर ने मानसिंह कच्छावा को अपने आगे-आगे चलने को कहा। ये लोग रात में महिंद्री नदी के किनारे पहुंचे। शहंशाह के पास इतना समय नहीं था कि वह रात बीत जाने तक नदी के इस पार रुके, क्योंकि उसे सूचना मिल चकी थी कि इब्राहीम हुसैन का शिविर नदी के दूसरी तरफ सरनाल कस्बे में लगा हुआ है।

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यदि अकबर (AKBAR) नदी के इस तरफ ही रात भर रुक जाता तो अवश्य ही मिर्जा को पता लग जाता और वह भाग खड़ा होता। अतः रात में ही नदी पार करने का निश्चय किया गया। नावों का प्रबंध नहीं हो सकता था। इसलिए अकबर ने चालीस घुड़सवारों के घेरे में घोड़े पर ही नदी पार करने का निश्चय किया। अकबर (AKBAR) ने आदेश दिए कि इब्राहीम हुसैन को दो तरफ से घेरा जाए। इसलिए कुंअर मानसिंह महिंद्री नदी के छिछले भाग से होकर इब्राहीम हुसैन मिर्जा की सेना के दूसरी तरफ पहुंच गया। शहंशाह अकबर ने एक सेना कुछ दिन पहले ही सूरत की तरफ रवाना की थी। अकबर के भाग्य से वह सेना भी उसी क्षेत्र में आ पहुंची थी। अतः शहंशाह के आदेश से वह सेना भी रात में ही अकबर से आ मिली। इब्राहीम हुसैन मिर्जा के पास लगभग एक हजार घुड़सवार थे। जबकि बादशाह के पास चालीस और मानसिंह के पास लगभग 100 घुड़सवार थे। अतः सूरत जा रही मुगल सेना के आ मिलने से अकबर को बहुत सहायता मिल गई।

इब्राहीम हुसैन मिर्जा की फुर्ती

जब इब्राहीम हुसैन को सूचना मिली कि बादशाह ने बहुत थोड़े से सैनिकों के साथ नदी पार कर ली है तथा वह सरनाल गांव पर हमला करने की तैयारी कर रहा है तो इब्राहीम हुसैन (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) ने भी फुर्ती दिखाई और वह गांव से बाहर निकलकर एक मैदान में आ गया और मोर्चाबंदी करके बैठ गया।

उसे ज्ञात नहीं था कि सूरत जाने वाली मुगल सेना भी अकबर की सहायता के लिए आ गई है और कुंवर मानसिंह नदी के दूसरी तरफ से इब्राहीम हुसैन मिर्जा की तरफ बढ़ रहा है।

तीन ओर से मुगल सेना के आ जाने से इब्राहीम हुसैन बुरी तरह घिर गया। उसने इस स्थिति की कल्पना नहीं की थी। फिर भी हौंसला खोए बिना उसने युद्ध आरम्भ कर दिया।

हालांकि मुल्ला बदायूंनी ने नहीं लिखा है फिर भी अनुमान लगाया जा सकता है कि इन सब कार्यवाहियों में रात बीत चुकी होगी और धरती पर भगवान सूर्य नारायण का प्रकाश फैल चुका होगा। सबसे पहले बाबा खाँ काकशाल अपने तीरंदाजों के साथ इब्राहीम हुसैन मिर्जा की तरफ बढ़ा।

इब्राहीम हुसैन मिर्जा का आक्रमण

इब्राहीम हुसैन मिर्जा ने बाबा खाँ काकशाल और उसकी तीरंदाजी टुकड़ी पर धावा बोला और उसे काफी पीछे धकेल दिया। इस धावे में दोनों ओर के कई सैनिक मारे गए। अब कुंअर मानसिंह कच्छावा इब्राहीम हुसैन मिर्जा की तरफ बढ़ा। इस झड़प में राजा भगवान दास कच्छावा का एक अन्य पुत्र कुंअर भुवनपति मारा गया।

अब तो इब्राहीम हुसैन का हौंसला बढ़ गया और उसने अपने सैनिकों को आगे बढ़कर शाही सैनिकों पर हमला करने का आदेश दिया। उसने अपने सैनिकों को तीन दलों में बांट दिया। एक दल को राजा भगवान दास कच्छवाहा पर आक्रमण करने के आदेश दिए तथा दूसरे दो दलों को दो तरफ से अकबर (AKBAR) को घेरेने के लिए भेजा।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि जब इब्राहीम हुसैन मिर्जा की सेना शाही सेना की तरफ आई तो सबसे पहले राजा भगवान दास कच्छवाहा ने उसका मार्ग रोका। इब्राहीम हुसैन मिर्जा की सेना लम्बे कांटेदार पेड़ों के पीछे से अचानक प्रकट हुई और उसने राजा भगवानदास पर हमला किया। यहाँ की धरती बहुत ऊबड़-खाबड़ थी। राजा भगवान दास घायल हो गया और उसे पीछे हटना पड़ा।

अकबर पर संकट

दो तरफ से इब्राहीम हुसैन मिर्जा के सैनिकों को आया देखकर अकबर के सैनिकों ने AKBAR को अपने घेरे में ले लिया और वे इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) के सैनिकों से लड़ने लगे। इस समय बादशाह के सैनिकों की संख्या अधिक थी, अन्यथा कभी भी कुछ भी हो सकता था।

कुछ देर तक चली भीषण लड़ाई के बाद अकबर की सेना ने मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) के सैनिकों को काट कर फैंक दिया। बादशाह इस तरह किसी अन्य लड़ाई में लड़ा हो, इसका उल्लेख नहीं मिलता।

इब्राहीम हुसैन मिर्जा की पराजय

इब्राहीम हुसैन मिर्जा किसी तरह जान बचाकर भाग निकला। इस समय तक फिर से रात हो चुकी थी। इसलिए उस समय अकबर (AKBAR) की सेना उसका पीछा नहीं कर सकी। सुबह होने पर शाह कुली खाँ मरहम तथा सादिक मुहम्मद खाँ और कुछ अन्य अमीरों को इब्राहीम हुसैन मिर्जा के पीछे भेजा गया।

इस समय तक फिर से रात हो चुकी थी। इसलिए इब्राहीम हुसैन रात का लाभ उठाकर सिरोही की तरफ भागा। सिरोही से वह नागौर गया और वहाँ से दिल्ली होता हुआ संभल की ओर भाग गया जो मिर्जाओं की जागीर थी।

शाहकुली खाँ महरम द्वारा मिर्जा के खेमे की लूट

फिर भी शाहकुली खाँ महरम तथा अन्य अमीरों ने इब्राहीम हुसैन (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) का बहुत सा सामान लूट लिया तथा उसे लेकर अकबर (AKBAR) के पास लौट आए।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने शाहकुली खाँ के लिए महरम शब्द का प्रयोग किया है। इसका अर्थ होता है, वह आदमी जिसे शाही हरम में प्रवेश करने का अधिकार हो क्योंकि इस व्यक्ति का विवाह हरम की किसी भी औरत से नहीं हो सकता था।

कहा नहीं जा सकता कि वे कौनसी औरतें थीं जिनसे महरम का विवाह नहीं हो सकता था क्योंकि मुगलों में तो ममेरी, चचेरी, फुफेरी एवं मौसेरी बहिनों से भी विवाह होते थे। फिर भी यह तय है कि उस काल में कुछ लोगों को महरम कहा जाता था और उनका बहुत आदर होता था।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

गुजराती अमीरों की औरतें लूट लीं बदमाशों ने! (100)

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गुजराती अमीरों की औरतें

जब बदमाशों ने बादशाह अकबर की नाक के नीचे से गुजराती अमीरों की औरतें लूट लीं तो बादशाह की प्रतिष्ठा को बड़ा धक्का लगा। यह मुगल बादशाह के इकबाल के लिए सीधी चुनौती थी।

गुजराती अमीरों का विद्रोह

जब अकबर (AKBAR) ने इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) को परास्त करके सम्भल की तरफ भाग जाने के लिए विवश कर दिया तो बादशाह अहमदाबाद के लिए रवाना हुआ। एक दिन कुछ बदमाशों ने अफवाह फैला दी कि बादशाह ने शाही सेना को आदेश दिए हैं कि गुजरातियों के शिविर लूट लिए जाएं।

गुजराती अमीरों की औरतें

इस पर बहुत से लोग गुजराती अमीरों के शिविर पर चढ़ बैठे और लूटमार मचाने लगे। कुछ शाही सैनिक भी उन लुटेरों के बहकावे में आ गए और वे भी गुजरातियों का माल-असबाब लूटने लगे और उनकी स्त्रियों को ले भागे। यह एक विचित्र बात थी, गुण्डे शहंशाह की नाक के नीचे से गुजराती अमीरों की औरतें ले भागे थे!

जब शहंशाह अकबर को इस बात की जानकारी मिली तो उसने अपने उच्च सेनापतियों को आदेश दिए कि तुरंत इस लूटपाट को बंद किया जाए तथा लुटेरों को पकड़ कर मेरे समक्ष प्रस्तुत किया जाए। अकबर (AKBAR) के सेनापतियों ने थोड़ी ही देर में स्थिति पर नियंत्रण पा लिया।

लुटेरों को दण्ड

बादशाह अपने दरबार में जाकर बैठ गया। लुटेरों को पकड़कर उसके समक्ष प्रस्तुत किया गया। अकबर (AKBAR) ने वहीं पर हाथी बुलवाए और अपने सामने ही उन लोगों को हाथियों के पैरों तले कुचलवा दिया।

उस काल में अपराधियों को दण्ड देने में इतनी ही देर लगती थी। क्योंकि तब तक वकीलों की वह फौज अस्तित्व में नहीं आई थी जो अदालतों से तारीख पर तारीख लेकर मुकदमों को जीवन भर चला सके।

अकबर (AKBAR) के शासन काल में न अदालतों को कहीं पर समन भेजने पड़ते थे, न अदालत दर अदालत अपीलों का सिलिसिला चलता था, न साक्ष्य जुटाए जाते थे, न अपराधियों के मानवाधिकारों की चिंता करने वाले आयोग होते थे। न अपराधियों को जेल में बंद करके बिरयानी खिलाने का प्रबंध किया जाता था।

जराती अमीरों की औरतें वापस

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शहंशाह के विश्वसनीय लोग, शहंशाह के समक्ष जो कुछ भी कहते थे, उसी को आरोपी, उसी को गवाह, उसी को साक्ष्य तथा उसी को फोरेंसिक जांच मानकर फैसला कर दिया जाता था, वही न्याय था। उसे किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती थी। पैतृक अधिकार से प्राप्त, निर्णय एवं न्याय करने की इसी शक्ति में, शासकीय प्रतिभा का सर्वोच्च प्रदर्शन निहित था। अकबर (AKBAR) ने भी पैतृक अधिकार से प्राप्त इस न्यायिक प्रतिभा का आनन-फानन में प्रदर्शन करके अपने शिविर में शांति स्थापित कर ली। यदि अकबर (AKBAR) अपराधियों पर कार्यवाही करने में थोड़ी भी ढिलाई बरतता तो उसके शिविर में शांति स्थापित होनी संभव नहीं थी। अपराधियों के हौंसले बढ़ते रहते और ऐसी घटनाएं बार-बार होती रहतीं। गुजराती अमीरों की औरतें उन्हें वापिस लौटा दी गईं। इस विद्रोह को कुचलने के बाद अकबर ने उन गुजराती अमीरों को इब्राहीम हुसैन मिर्जा से छीने गए इलाकों का अधिकारी बना दिया जिन्हें वह अपने प्रति विश्वस्त समझने लगा था। इससे गुजराती अमीरों के शिविर में शांति का वातावरण बन गया। गुजराती सुल्तान के वजीर इतिमाद खाँ गुजराती को इन सब गुजराती अमीरों के ऊपर नियुक्त किया गया। इन अमीरों ने बादशाह को वचन दिया कि वे गुजरात से बागी मिर्जाओं को मार भगाएंगे तथा भविष्य में कभी भी उनका साथ नहीं देंगे।

अकबर की खंभात यात्रा

इसके बाद अकबर (AKBAR) ने खंभात जाने का विचार किया ताकि वह समुद्र देख सके। उसने आज तक कोई समुद्र नहीं देखा था। जब अकबर (AKBAR) खंभात पहुंचा तो उसने खंभात का बंदरगाह अपने अमीर हसन खाँ खजांची के सुपुर्द कर दिया।

अभी बादशाह खंभात में ही था कि उसे समाचार मिला कि उसने जिन गुजराती अमीरों पर विश्वास करके उन्हें जागीरें और अधिकार दिए थे, उन्होंने बगावत कर दी है। इख्तियारमुल्क नामक गुजराती अमीर शाही शिविर छोड़कर भाग गया है तथा इतिमाद खाँ ने अबू तुराब और हकीम एनुलमुल्क आदि मुगल अमीरों को बंदी बना लिया है।

इस पर अकबर (AKBAR) ने शाबास खाँ नामक सेनापति को खंभात से अहमदाबाद भेजा ताकि अबू तुराब और हकीम एनुलमुल्क आदि मुगल अमीरों को मुक्त करवाया जा सके और धोखेबाज गुजराती अमीरों को पकड़कर बंदी बनाया जा सके।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि जब बादशाह खंभात में था, तब रूम, सीरिया, ईरान और तूरान के रहने वाले लोग उसकी सेवा में उपस्थित हुए। अकबर (AKBAR) ने उनसे भेंट करके उन्हें संतुष्ट किया। खंभात से अकबर बड़ौदा के लिए रवाना हो गया।

बड़ौदा पर अधिकार

यह नगर इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) के अधिकारियों के अधीन था। अकबर (AKBAR) ने बड़ौदा पर अधिकार कर लिया। यहाँ से उसने अमीरों का एक दल चांपानेर के लिए रवाना किया ताकि वहाँ से भी विद्रोही मिर्जाओं के अधिकारियों को खदेड़ा जा सके।

मिर्जा अजीज कोका की नियुक्ति

जब अकबर (AKBAR) बड़ौदा में था, तब उसने मिर्जा अजीज कोका  (AZIZ KOKA) को गुजरात का सूबेदार नियुक्त करके उसे अहमदाबाद भेज दिया क्योंकि उन दिनों अहमदाबाद ही गुजरात की राजधानी थी। अभी अकबर (AKBAR) बड़ौदा में ही था कि शाबास खाँ आदि मुगल अमीर धोखेबाज गुजराती अमीरों को पकड़कर ले आए।

उन्हें अकबर (AKBAR) के समक्ष प्रस्तुत किया गया। वे बादशाह के समक्ष की गई प्रतिज्ञा भंग कर चुके थे तथा बादशाह का विश्वास खो चुके थे। इसलिए अकबर ने उन्हें फिर से अपने मंत्रियों एवं सेनापतियों के नियंत्रण में रख दिया।

सूरत दुर्ग पर आक्रमण का विचार

अब अकबर (AKBAR) ने सूरत दुर्ग पर आक्रमण करने का विचार किया। मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि सूरत का किला ई.1539 में मुगल सेनापति चिंगिज खाँ ने पुर्तगालियों को रोकने के लिए बनाया था।

 चिंगिज खाँ की मृत्यु के बाद यह दुर्ग विद्रोही मिर्जाओं का केन्द्र बन गया था किंतु हुमायूँ (HUMAYUN) ने उनका विद्रोह समाप्त करके उनकी जगह हम्जाबान को सूरत का दुर्गपति बनाया था। जब सूरत दुर्ग में यह सूचना पहुंची कि इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) पराजित होकर भाग गया है तथा बादशाह बड़ौदा तक आ पहुंचा है तो सूरत के किले में घबराहट फैल गई।

उस समय अकबर (AKBAR) के मरहूम चाचा मिर्जा कामरान की पुत्री गुलरुख बेगम भी अपने बेटे को लेकर सूरत के दुर्ग में छिपी हुई थी। वह अपने पुत्र को लेकर दक्षिण भारत भाग गई।

हम्जबान की बगावत

इस समय हम्जबान नामक एक तुर्की अमीर मिर्जाओं की तरफ से सूरत के दुर्ग की रक्षा कर रहा था। किसी समय हम्जाबान हुमायूँ (HUMAYUN) का विश्वस्त सेनापति था और उसी ने हम्जाबान को सूरत का किलेदार बनाया था किंतु अब वह अकबर (AKBAR) से बगावत करके बागी मिर्जाओं के साथ हो गया था।

राजा टोडरमल की रिपोर्ट

जब अकबर (AKBAR) बड़ौदा में था तब उसने राजा टोडरमल को सूरत के किले की स्थिति का पता लगाने भेजा। ताकि किले में प्रवेश करने एवं निकलने का मार्ग ढूंढा जा सके। राजा टोडरमल अपने सैनिकों को लेकर सूरत गया तथा उसने वहाँ से लौटकर शहंशाह को सूरत के समाचार दिए। टोडरमल ने कहा कि सूरत के किले को आसानी से जीता जा सकता है।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।                                                    

अकबर का सूरत अभियान – बादशाह ने हम्जाबान की जीभ कटवा ली। (101)

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सूरत का किला

अकबर का सूरत अभियान उसके राजनीतिक जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। इस अभियान के बाद लगभग सम्पूर्ण गुजरात मुगल सल्तनत के अधीन हो गया। इस अभियान में अकबर ने अपने विश्वस्त सेवक हम्जाबान की जीभ कटवा ली।

अकबर (AKBAR) ने ई.1572 में गुजरात के लिए अभियान किया। अब तक उसने अहमदाबाद (AHMEDABAD), साम्बे (SAMBE), खंभात (KHAMBHAT), चम्पानेर (CHAMPANER) तथा बड़ौदा (BARODA) आदि नगर, किले एवं बंदरगाह अपने अधीन कर लिये थे और इस समय वह बड़ौदा (BARODA) में डेरा डाले हुए था। जब इस इलाके पर पूरी तरह अधिकार कर लिया गया, तब वह बड़ौदा से सूरत (SURAT) के लिए चल दिया।

अकबर का सूरत अभियान

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि 11 जनवरी 1573 को शंहशाह ने सूरत (SURAT) से एक कोस की दूरी पर अपना शिविर लगाया। शाही सेना को आया देखकर बागियों की सेना सूरत (SURAT) के किले में सिमट गई। अकबर की सेना ने अपने दूत सूरत (SURAT) के बागी किलेदार हम्जाबान (HAMZABAN) के पास भेजे तथा उससे कहा कि वह बगावत का मार्ग छोड़ दे और शहंशाह के समक्ष समर्पण कर दे।

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हम्जाबान (HAMZABAN) ने शहंशाह के दूतों की बात मानने से मना कर दिया तथा शहंशाह की शान में गुस्ताखी करते हुए कुछ कठोर वचनों का प्रयोग किया। इस पर अकबर ने सूरत (SURAT) के किले पर गोलाबारी करने के आदेश दिए। इसके साथ ही अकबर का सूरत अभियान अपने असली रंग में आ गया। अबुल फजल ने लिखा है कि बादशाह का शिविर दुर्ग के इतने पास था कि दुर्ग से छोड़े गए तोपों के गोले और मनजानिक के गोले बादशाह के शिविर पर गिरा करते थे। अबुल फजल लिखता है कि अपने सेवकों के कहने पर बादशाह अपना शिविर छोड़कर पास के जंगल में चला गया किंतु यहाँ भी शिविर की सीमा में गोले एवं पत्थर गिरा करते थे। मुगल सेना भी दो महीने तक सूरत के किले पर गोलाबारी करती रही। मुल्ला बदायूंनी (BADAYUNI) ने लिखा है कि इस किले पर इतनी गोलाबारी की गई कि किले के भीतर से कोई सैनिक मुँह बाहर नहीं निकाल सकता था। जबकि अबुल फजल ने लिखा है कि कुछ लोग बार-बार किले से बाहर निकल कर अकबर के तोपमंचों पर आक्रमण करते थे। अबुल फजल ने लिखा है कि सैफ खाँ (SAIF KHAN) नामक एक मुगल अधिकारी बार-बार दुर्ग के गोलों की सीमा में जाकर लड़ाई करता था जिससे वह बुरी तरह से घायल हो गया।

इस पर किसी दूसरे मुगल अधिकारी ने सैफ खाँ से पूछा— “शहंशाह तुमसे प्रसन्न नहीं है फिर भी तुम बार-बार किले के निकट जाकर अपने प्राण संकट में क्यों डालते हो?”

सैफ खाँ ने उत्तर दिया— “सरनाल की लड़ाई के समय मैं मार्ग भटक कर जाने के कारण युद्ध में भाग नहीं ले सका था। इस कारण मुझे अपना जीवन भार स्वरूप दिखाई देता है। यही कारण है कि अब मैं बादशाह की सेवा करके उस बोझ से मुक्त होना चाहता हूँ।”

मिर्जाओं का विद्रोह और खानेआजम (AZIZ KOKA)

जब अकबर सूरत के घेरे में उलझा हुआ था, उस समय कुछ मिर्जाओं ने पाटन (PATAN, GUJARAT) में तथा कुछ मिर्जाओं ने कालपी (KALPI, UTTAR PRADESH) में उत्पात मचाना आरम्भ कर दिया। इसलिए बादशाह के लिए आवश्यक हो गया कि वह सूरत के घेरे के साथ-साथ, इधर-उधर उत्पात मचा रहे मिर्जाओं का भी दमन करे।

इसलिए बादशाह ने मालवा (MALWA) आदि क्षेत्रों से कुछ सेनाएं और बुलवा लीं तथा उन्हें खानेआजम (AZIZ KOKA) के नेतृत्व में बागी मिर्जाओं का दमन करने का काम सौंपा। खानेआजम अकबर का धाय भाई था। उसका असली नाम अजीज कोका था। अकबर ने उसे खानेआजम की उपाधि दी थी और कुछ समय पहले ही गुजरात का सूबेदार बनाया था।

हम्जाबान (HAMZABAN) का विश्वासघात

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि जब अकबर (AKBAR) दो महीने की गोलाबारी के बाद भी सूरत के किले (Surat Fort) पर अधिकार नहीं कर सका तो अकबर ने किले के चारों ओर सुरंगें खुदवानी आरम्भ कीं तथा साबात बनवाना आरम्भ किया ताकि किले को बारूद से उड़ाया जा सके।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी लिखता है कि शहंशाह ने किले में जाने वाली नहर पर बांध बनवाकर किले के भीतर जल-आपूर्ति बंद करवा दी। जब किले के लोग प्यास से मरने लगे तो किलेदार हम्जाबान (HAMZABAN) ने अपने ससुर मौलाना निजामुद्दीन (NIZAMUDDIN) को अकबर के पास यह संदेश देकर भेजा कि यदि किले के लोगों को क्षमादान दिया जाए तो वे किला शहंशाह को समर्पित करने को तैयार हैं।

अकबर ने मौलाना निजामुद्दीन को अभयदान दिया तथा उससे कहा कि हम्जाबान सहित किसी को तकलीफ नहीं दी जाएगी। इस पर किले के लोगों ने किले से बाहर आकर अकबर के समक्ष समर्पण कर दिया।

हम्जाबान भी अकबर (AKBAR) के समक्ष उपस्थित हुआ। अकबर ने बहुत से लोगों को रस्सियों से बंधवा दिया तथा हम्जाबान की जीभ कटवा दी। यह हम्जाबान के साथ विश्वासघात था क्योंकि अकबर ने उसे अभयदान देने के पश्चात् भी उसकी जीभ कटवाई थी।

निष्कर्ष

यह घटना अकबर के गुजरात अभियान और सूरत के किले (Surat Fort) की घेराबंदी का महत्वपूर्ण अध्याय है। इसमें अबुल फजल और बदायूंनी जैसे इतिहासकारों के विवरण से स्पष्ट होता है कि अकबर ने विद्रोहियों और बागी मिर्जाओं को दबाने के लिए कठोर सैन्य रणनीतियाँ अपनाईं।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

अकबर का शराब-प्रेम किसी के भी प्राण ले सकता था! (102)

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अकबर का शराब-प्रेम

अकबर हर समय शराब के नशे में धुत्त रहता था जिसके कारण उसे अपने शरीर का भी होश नहीं रहता था। यही कारण था कि अकबर का शराब-प्रेम (Akbar’s Alcohol Addiction) किसी के भी प्राण ले सकता था!

मार्च 1573 में अकबर (AKBAR) ने सूरत के किले पर अधिकार कर लिया। इस विजय की प्रसन्नता में अकबर ने भारी नशा किया। अकबर का शराब-प्रेम (Akbar’s Alcohol Addiction) उसके सिर पर सवार हो गया। राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि सूरत में हुई पानगोष्ठी अर्थात् मदिरापान गोष्ठी में अकबर ने अपनी बहादुरी का प्रदर्शन करने का निश्चय किया।

अकबर (AKBAR) ने शराब के नशे में धुत्त होकर दीवार में एक तलवार गाढ़ दी जिसकी नोक बाहर की तरफ थी। इसके बाद अकबर ने पूरे वेग से दीवार में गढ़ी हुई तलवार पर अपनी छाती मारने का उपक्रम किया ताकि तलवार को तोड़ा जा सके।

राजा मानसिंह नहीं चाहता था कि अकबर (AKBAR) यह काम करे। इसलिए उसने अकबर को रोकने का प्रयास किया किंतु अकबर ने मानसिंह को परे धकेल दिया। जब अकबर दीवार में गढ़ी तलवार पर छाती मारने ही जा रहा था, तब मानसिंह ने वह तलवार खींचकर निकाल ली।

अकबर (AKBAR) दीवार से टकराया किंतु उसके प्राण बच गए। अकबर शराब के नशे में धुत्त था। उसे पता नहीं था कि वह क्या कर रहा था। उसने नाराज होकर मानसिंह का गला पकड़ लिया और उसे घोटने लगा।

कहाँ तो अकबर अपनी जान लेने जा रहा था और कहाँ अब वह राजा मानसिंह की जान लेने पर उतारू हो गया। अकबर का शराब-प्रेम (Akbar’s Alcohol Addiction) अकबर का ही सर्वनाश करने पर उतारू हो गया क्योंकि यदि मानसिंह मर जाता तो अकबर का सर्वनाश होना निश्चित था। राजकीय मान-मर्यादाओं में पला-बढ़ा राजा मानसिंह, शाही प्रतिष्ठा का ध्यान रखते हुए तथा अकबर के साथ अपने रिश्ते का सम्मान करते हुए अकबर का प्रतिरोध नहीं कर सका।

इस कारण अकबर (AKBAR) उस पर इतनी बुरी तरह हावी हो गया कि मानसिंह के प्राण कंठ में आ गए। यदि यह स्थिति एक-दो पल और बनी रहती तो मानसिंह के प्राण-पंखेरू उड़ गए होते। कुछ दरबारियों ने अकबर को खींचकर मानसिंह के प्राण बचाए।

यदि राजा मानसिंह को उस रात कुछ हो गया होता तो आम्बेर राजघराने के लिए बहुत बड़ा संकट खड़ा हो गया होता। इस समय तक राजा भारमल 83 वर्ष का वृद्ध हो चुका था। अकबर ने उसे लाहौर में नियुक्त कर रखा था। अब उसके जीवन के कुछ ही महीने शेष बचे थे।

भारमल का पुत्र भगवानदास कुछ समय पहले हुई सरनाल की लड़ाई में घायल होकर चारपाई में पड़ा था। भगवानदास का पुत्र भुवनपति भी सरनाल की लड़ाई में काम आ चुका था। इस प्रकार इस समय केवल कुंअर मानसिंह ही ऐसा था जो आम्बेर के कच्छवाहा वंश को संभाल सकता था।

राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि अकबर (AKBAR) बड़ा भारी पियक्कड़ था। जब अकबर का शराब-प्रेम (Akbar’s Alcohol Addiction) नियंत्रण से बाहर हो गया तो उसने शराब कम करके ताड़ी और अफीम की लत लगा ली। अपने पिता की देखा-देखी अकबर के पुत्र जहांगीर (JAHANGIR), मुराद तथा दानियाल भी किशोरवस्था में ही भारी पियक्कड़ बन गए।

विंसेट स्मिथ ने लिखा है कि तैमूर लंग (TIMUR LANG) के राजपरिवार में मद्यपान उसी प्रकार की जन्मजात बुराई थी जिस प्रकार यह उस काल के अन्य मुस्लिम राजघरानों की दुर्बलता बनी हुई थी। अकबर का दादा बाबर गहरे पियक्कड़ स्वभाव का व्यक्ति था।  इसलिए अकबर का शराब-प्रेम (Akbar’s Alcohol Addiction) उसकी वंशानुगत कमजोरी था।

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अकबर (AKBAR) का पिता हुमायूँ (HUMAYUN) भी स्वयं को अफीम से धुत्त रखकर जड़बुद्धि बन चुका था। अकबर ने अपने भीतर दोनों गुण समाहित कर लिए थे। अर्थात् उसे शराब और अफीम दोनों की लत थी। अकबर के दो छोटे लड़के अधिक शराब पीने से मर गए। बड़ा लड़का सलीम भी हर समय शराब के नशे में डूबा हुआ रहता था। विंसेट स्मिथ कहता है कि अकबर (AKBAR) तेज नशीली वस्तुओं तथा मदान्ध कर देने वाली जड़ी-बूटियों का घोर व्यसनी था। इस तथ्य के असंख्य उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है। अकबर नशीले पेय तथा खाद्य वस्तुओं से निर्मित होने वाली भयंकर नशे वाली वस्तुओं का भी सेवन कर लेता था। अकबर (AKBAR) का बेटा जहांगीर (JAHANGIR) स्वयं कहता है कि मेरा पिता चाहे शराब पिए हुए हो, चाहे स्थिर चित्त हो, मुझे सदैव शेखू बाबा कहकर पुकारता था। इस वाक्य में यह भाव छिपा हुआ है कि अकबर के लिए नशे में रहना एक आम बात थी। स्मिथ लिखता है कि यद्यपि चाटुकार भांड किस्म के लेखकों ने अकबर की मदिरापान अवस्था का कोई वर्णन नहीं किया है, तथापि यह निश्चित है कि उसने पारिवारिक परम्परा बनाए रखी और वह प्रायः आवश्यकता से अधिक शराब पीता रहा।

अकबर (AKBAR) के दरबार का ईसाई पादरी अक्वावीवा लिखता है- ‘अकबर इतनी अधिक शराब पीने लगा था कि वह प्रायः आगंतुकों से बातें करते-करते ही सो जाया करता था। इसका कारण यह था कि वह दिन में कई बार तो ताड़ी पीता था। वह अत्यंत मादक ताड़ की शराब होती थी।

वह कई बार पोस्त की शराब पीता था जो उसी प्रकार अफीम में अनेक वस्तुएं मिलाकर बनाई जाती थी। मदिरापान के दुर्गुण का पूर्ण निष्ठापूर्ण पालन उसके तीनों बेटों ने किया।’

पादरी अक्वावीवा ने लिखा है- ‘जब अकबर (AKBAR) सीमा से अधिक पी लेता था, तब पागलों जैसी विभिन्न हरकतें किया करता था। उसे एक नशीली ताड़ से निकली शराब विशेष रूप से प्रिय थी। उसके साथ वह अतयंत चटपटी अफीम का मिश्रण लिया करता था। अत्यंत नशीले पेय पदार्थों तथा अफीम को विभिन्न रूपों में सेवन करने की, अनेक पीढ़ियों से चली आई पारिवारिक परम्परा को अकबर ने खूब निभाया, उनके बार तो अतिपान करके निभाया।’

इतिहासकार पी. एन. ओक ने लिखा है- ‘इस बात पर बल देने की आवश्यकता नहीं कि दुर्गुण आत्मा जो निरंतर पापोन्मुखी हो, वही मादकता का संरक्षण चाहती है। शराब के नशे में प्रायः मनुष्य में स्त्री-शरीर की भूख बढ़ जाती है और काम-वासना का ज्वार हिलोरें लेने लगता है।’

अबुल फजल (ABUL FAZAL) में इतनी हिम्मत नहीं थी कि कि वह अकबर का शराब-प्रेम (Akbar’s Alcohol Addiction) अपनी पुस्तक के माध्यम से इतिहास के समक्ष उजागर करता किंतु उसने इस बात को शब्दों की चालाकी के एक महीन आवरण में ढक कर लिखा। वह लिखता है कि अकबर (AKBAR) अपने शासन के प्रारम्भिक वर्षों में पर्दे के पीछे रहा।

पर्दे के पीछे रहने का अर्थ यह था कि वह अपने हरम में रहा। इसका मूल कारण अकबर का अकबर का शराब-प्रेम (Akbar’s Alcohol Addiction) और स्त्री-अनुराग ही था। संभवतः इसी काल में अकबर ने शराब का अत्यधिक सेवन करना सीखा था।

इस समय अकबर (AKBAR) का पिता हुमायूँ (HUMAYUN) मर चुका था, माता हमीदा बानू काबुल में थी और अकबर के परिवार का कोई भी व्यक्ति भारत में नहीं था जो अकबर को अत्यधिक शराब पीने से रोक सके।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है- ‘शहंशाह ने महल के पास ही शराब की एक दुकान स्थापित की है। दुकान पर इतनी अधिक वेश्याएं राज्य भर से आकर एकत्रित हो गई हैं कि उनकी गणना करना भी कठिन है।’

ईसाई धर्म-प्रचारक अक्वावीवा ने अकबर (AKBAR) को स्त्रियों से कामुक सम्बन्धों के लिए फटकार लगाने का साहस किया था। अकबर ने ईसाई पादरी की बात सुनकर उससे कहा कि बादशाह को अधिकार होता है कि वह किसी के भी अपराध क्षमा कर दे, मैं भी अपना यह अपराध क्षमा करता हूँ।

अकबर (AKBAR) के शराब एवं स्त्री-प्रेम को यहीं पर विराम देकर हम इतिहास को फिर से सूरत के उसी किले में लिए चलते हैं जहाँ अकबर ने शराब के नशे में चूर होकर कुंअर मानसिंह का गला घोटने का प्रयास किया था और कुछ दरबारियों ने बादशाह को खींचकर कुंअर मानसिंह के प्राण बचाए थे।  इस घटना के बाद अकबर का शराब-प्रेम (Akbar’s Alcohol Addiction) पूरी रियाया के समक्ष उजागर हो गया।

 ✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

गोआ के पुर्तगाली अकबर को लड़कियां भेंट करते थे! (103)

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गोआ के पुर्तगाली अकबर को पुर्तगाली लड़कियां भेंट करते थे!

अकबर के स्त्री-प्रेम की चर्चा पूरी सल्तनत में थी। गोआ के पुर्तगाली भी अकबर की इस कमजोरी से परिचित थे। इसलिए उन्होंने अकबर के दरबार एवं महल में पहुंच बनाने के लिए पुर्तगाली लड़कियों का सहारा लेने का निश्चय किया। ऐसा करना उनके लिए कठिन भी नहीं था।

अबुल फजल लिखता है कि जब अकबर (AKBAR) सूरत में था, तब गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) अकबर से मिलने के लिए आए। उन दिनों गोआ और उसके आसपास के क्षेत्रों पर पुर्तगालियों का अधिकार था।

गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) ईसाई थे और इस क्षेत्र में ईसाई धर्म को बढ़ाने का प्रयास कर रहे थे। अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) नहीं चाहते थे कि अकबर (AKBAR) का सूरत के दुर्ग पर अधिकार हो। इसलिए वे लोग सूरत दुर्ग में रह रहे बागी मिर्जाओं की सहायता करने के लिए आए थे किंतु जब उन्होंने अकबर की विशाल सैन्य-शक्ति को देखा तो उन्होंने बागी मिर्जाओं की सहायता करने की बजाय अकबर से मित्रता करने का विचार किया।

गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) दल ने अकबर (AKBAR) को बहुत सारी भेंट एवं उपहार देकर अकबर के प्रति मित्रता का प्रदर्शन किया। अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि अकबर बड़ी उत्सुकता से उन पुर्तगालियों से मिला तथा उनसे पुर्तगाल देश के बारे में जानकारी प्राप्त की। अकबर ने उन लोगों से यूरोप के शिष्टाचार एवं अन्य प्रथाओं की भी जानकारी ली। अकबर पुर्तगालियों से मिलने में इसलिए भी रुचि रखता था क्योंकि कुछ वर्ष पहले पुर्तगालियों ने अकबरको दो सुंदर पुर्तगाली लड़कियां भेंट की थीं।

गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) जिन लड़कियों को भेंट करने के लिए लाए थे, इनमें से एक का नाम मारिया मस्केरेन्हास था, वह 18 साल की थी और दूसरी लड़की का नाम जूलियाना मस्केरेन्हास था, वह 17 साल की थी। अकबर (AKBAR) ने मारिया मस्केरेन्हास से विवाह कर लिया तथा उसकी बहिन जूलियाना मस्केरेन्हास अकबर के हरम में चिकित्सक नियुक्त की गई ताकि वह हरम की औरतों की चिकित्सा कर सके।

अकबर (AKBAR) के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) तथा अकबर के कट्टर आलोचक मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अपनी पुस्तकों में इन पुर्तगाली औरतों का उल्लेख नहीं किया है, इसलिए बहुत समय तक इन पुर्तगाली औरतों का इतिहास अंधकार में ही रहा।

ग्रीस देश के पत्रकार थॉमस स्मिथ ने तथा फ्रांस के प्रथम बारबौन राजा फिलिप्पे पर शोध करने वाले ग्रीस के प्रिंस मिशेल ने अपनी पुस्तक ले राजाह डे बरबोन में इस स्त्री का उल्लेख किया तो अकबर (AKBAR) की गुमनाम पुर्तगाली बेगम का इतिहास भारतीयों के सामने आया।

जे. ए. इज्मेल ग्रेसियाज ने भी अपनी शोध में सिद्ध किया है कि अकबर (AKBAR) की एक पुर्तगाली बेगम थी।

ग्रीस तथा फ्रांस के इन लेखकों ने सिद्ध किया है कि लेडी जूलियाना अकबर (AKBAR) के दरबार में रहने वाली ईसाई स्त्री थी। वह अकबर के हरम की चिकित्सक थी। वह अकबर की एक पत्नी की बहिन थी। लेडी जूलियाना का विवाह बौरबन राजकुमार जीन फिलिप्पि से हुआ था। लेडी जूलियाना के प्रयासों से आगरा में पहला क्रिश्चियन चर्च बना।

यूरोपियन लेखक लिखते हैं कि किसी समय ये दोनों बहनें ईसाई मिशनियों द्वारा आगरा में लाई गई थीं तथा अकबर (AKBAR) को भेंट की गई थीं। कुछ स्थानों पर यह भी संदर्भ मिलता है कि ये दोनों बहिनें पुर्तगाली नहीं थीं अपितु अकबर के न्यायमंत्री अब्दुल हाई की पुत्रियां थीं तथा वे अपने पिता के साथ पश्चिमी आरमीनिया के सिलसिया कस्बे से भारत आई थीं।

थॉमस स्मिथ नामक पत्रकार ने लिखा है कि ये दोनों लड़कियां आरमीनिया से भारत आई थीं तथा अकबर (AKBAR) ने उनमें से एक का विवाह फ्रांस के राजकुमार जीन फिलिप्पे से किया था जो आगे चलकर फ्रांस का राजा बना। थॉमस स्मिथ लिखता है कि जीन फिलिप्पे एक धनी फ्रैंच सैनिक का पुत्र था। यह परिवार फ्रांस के शाही परिवार से सम्बन्धित था।

प्रिंस मिशेल ने अपनी पुस्तक ले राजाह डे बरबोन में लिखा है कि जीन फिलिप्पे ने अकबर (AKBAR) की पुर्तगाली क्रिश्चियन स्त्री की बहिन से विवाह किया था। अकबर ने जीन फिलिप्पे को भारत में बड़े क्षेत्र का राजा बनाया तथा उसे बहुत सी धनराशि भेंट की। प्रिंस मिशेल के अनुसार जीन फिलिप्पे फ्रांस के सम्राट हेनरी (चतुर्थ) का भतीजा था। बाद में जीन फिलिप्पे फ्रांस का प्रथम बोरबन राजा बना।

प्रिंस मिशेल के अनुसार जब जीन फिलिप्पे अकबर (AKBAR) से मिलने के लिए भारत आया तो आगरा आकर बीमार पड़ गया। अकबर के आदेश से अकबर के हरम की चिकित्सक जूलियाना ने फिलिप्पे की चिकित्सा की।

फिलिप्पे इस लेडी चिकित्सक से इतना प्रभावित हुआ कि उसने अकबर (AKBAR) से जूलियाना का हाथ अपने लिए मांग लिया। अकबर ने जूलियाना फिलिप्पे को सौंप दी। इस औरत से फिलिप्पे को कुछ औलादें हुईं जो भारत के भोपाल शहर में रहती थीं। बताया जाता है कि इस परिवार के वंशज आज भी भोपाल में निवास करते हैं।

कुछ विद्वानों ने लिखा है कि अकबर (AKBAR) के महल में जूलियाना नाम की और भी औरतें थीं जिनमें से एक का नाम लेडी जूलियाना डिया-डाकोस्टा था। संभवतः लेडी जूलियाना डिया-डाकोस्टा (Juliana D’Costa) एवं अकबर की साली जूलियाना मस्केरेन्हास ग्रेसियाज (Juliana Mascarenhas Gracias) के इतिहास एक दूसरे से गड्डमड्ड हो गए हैं।

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एक लेखक ने लिखा है कि जूलियाना मस्केरेन्हास (Juliana Mascarenhas Gracias) की बहिन मारिया मस्केरेन्हास (Maria Mascarenhas) को मरियम मकानी कहा गया क्योंकि वह ईसाई थी। जमन नामक एक शोधकर्ता ने इस मत को अस्वीकार करते हुए सिद्ध किया है कि मारिया मस्केरेन्हास (Maria Mascarenhas) को मरियम मकानी नहीं कहा गया। यह उपाधि तो मुगलों में पहले से ही चल रही थी। अकबर (AKBAR) की माँ हमीदा बानू बेगम को मरियम मकानी की उपाधि दी गई थी। अकबर की हिन्दू पत्नी जो आम्बेर की राजकुमारी थी, उसे भी मरियम मकानी की उपाधि दी गई थी। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि मारिया मस्केरेन्हास को ईसाई होने के कारण मरियम मकानी की उपाधि दी गई। फ्रैडरिक फैंथम ने ई.1895 में प्रकाशित अपनी पुस्तक रेमीनेंसेज ऑफ आगरा में लिखा है कि अकबर (AKBAR) की एक क्रिश्चियन पत्नी थी जिसका नाम मैरी था। वह लिखता है कि इतिहासकारों ने अकबर की इस बेगम का अकबर पर प्रभाव बहुत कम करके आंका है। इस बेगम के प्रभाव के कारण अकबरईसाई धर्म की तरफ झुकने लगा था। जमन नामक शोधकर्ता ने लिखा है कि इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि अकबर के शासन काल में मुगल एम्पायर पर यूरोप की ईसाई औरतों का प्रभाव था किंतु जूलिया मस्केरेन्हास की कहानी में कुछ काल्पनिक सामग्री भी जोड़ दी गई है।

अकबर (AKBAR) ने ई.1562 में आगरा में एक चर्च बनाने की अनुमति प्रदान की। लगभग 74 साल तक यह चर्च आगरा में खड़ा रहा। ई.1636 में अकबर के पोते शाहजहाँ ने इस चर्च को तुड़वाया। जब भारत पर अंग्रेजों का बोलबाला हो गया, तब उसी स्थान पर सेंट पीटर्स रोमन कैथोलिक कैथेडरल नाम से एक नया चर्च बनाया गया।

गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) मूल की भारतीय प्रोफेसर लुई डे आसिस कोरिया ने अपनी पुस्तक पोर्चूगीज इण्डिया एण्ड मुगल रिलेशन्स (1510-1735) में लिखा है कि अकबर (AKBAR) के जोधा नामक कोई स्त्री नहीं थी। डोना मारिया मैस्केरेन्हास (The Hindi phrase “डोना मारिया मैस्केरेन्हास” (Dona Maria Mascarenhas) एक पुर्तगाली स्त्री थी जिसे जोधा नाम दिया गया।

प्रोफेसर लिखती है कि मारिया मस्केरेन्हास तथा उसकी बहिन जूलियाना (Juliana Mascarenhas Gracias) को पुर्तगालियों ने तस्करों के हाथों से मुक्त करवाकर गुजरात के शासक बहादुरशाह को सौंपा था। बहादुरशाह ने उन बहिनों को बादशाह के दरबार में उपहार के रूप में भिजवाया।

प्रोफेसर लुई डे आसिस कोरिया के अनुसार अकबर ने मारिया मस्केरेन्हास (Maria Mascarenhas) की पहचान छिपाने के लिए उसे जोधा बाई नाम दिया। कुछ विद्वानों ने इस बात पर भी शोध की है कि मुगल इतिहासकारों ने इन बहिनों का इतिहास क्यों छिपाया!

यह बात सही नहीं लगती कि बादशाह अकबर ने इन बहिनों का इतिहास छुपाया। जब मुगल इतिहासकारों ने अकबर की हिन्दू बेगमों की पहचान नहीं छिपाई तो उन्होंने भला अकबर की ईसाई बेगमों की पहचान क्यों छिपाई होगी!

गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) मूल की इन बहिनों के इतिहास पर शोध के निष्कर्ष अलग-अलग बातें कह सकते हैं किंतु सारांश रूप में इतना कहा जा सकता है कि ये पुर्तगाली बहिनें गोआ के पुर्तगालियों द्वारा अकबर (AKBAR) को उपहार स्वरूप दी गई थीं तथा अकबर इन औरतों के प्रभाव के कारण ईसाई धर्म की तरफ झुकने लगा था।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

शरफुद्दीन मिर्जा ने अकबर की अधीनता अस्वीकार कर दी! (104)

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शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) ने अकबर की अधीनता अस्वीकार कर दी!

शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) तैमूरी खान का शहजादा था, इसलिए अकबर उसे मारना नहीं चाहता था, उसे अपनी सेवा में रखना चाहता था किंतु शरफुद्दीन मिर्जा ने अकबर की अधीनता अस्वीकार कर दी!

सूरत विजय के बाद अकबर (AKBAR) ने बहुत से लोगों को पकड़कर बंदीगृह में रख दिया तथा सूरत दुर्ग में मौजूद समस्त कीमती सामग्री आगरा के लिए रवाना कर दी। सूरत के दुर्ग (Surat Fort) में कुछ बड़ी तोपें भी थीं जिन्हें सुलेमानी तोपें कहा जाता था।

इन्हीं तोपों के कारण अकबर (AKBAR) को सूरत का किला जीतने में दो माह से अधिक का समय लगा था। अकबर ने इन तोपों को बैलगाड़ियों एवं ऊंटगाड़ियों पर लदवाकर आगरा के लिए रवाना कर दिया।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि अकबर (AKBAR) अभी कुछ और दिन सूरत में रुककर आसपास के बंदरगाहों तथा नगरों पर अधिकार करना चाहता था किंतु स्थानीय गवर्नरों ने इस कार्य में अकबर की सहायता नहीं की तथा सेना के पास रसद का अभाव होने लगा, इसलिए अकबर ने अपनी सेना को लौटने के आदेश दिए तथा स्वयं भी एक सेना के साथ रवाना हो गया।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है- ‘इसी समय बगलाना का जमींदार बहारजी अकबर (AKBAR) के दरबार में आया। यह उधर की ओर का बड़ा जमींदार था। बगलाना देश 100 कोस लम्बा और 30 कोस चौड़ा है। यहाँ के जागीरदार के पास 2000 सवार और 16 हजार प्यादे हैं। यहाँ की आय साढ़े छः करोड़ दाम सालाना है। पहाड़ियों की चोटी पर सालही और मालहीर दो दुर्ग हैं। इस देश में अंतःपुर एवं चिंतापुर नामक दो बड़े नगर हैं। यह देश गुजरात तथा दक्षिण के बीच स्थित है।’

मुगल बादशाह तथा उनके अधिकारी, भारत के स्थानीय राजाओं को जमींदार कहते थे। उस काल के मुगल अभिलेखों में जयपुर एवं जोधपुर जैसे बड़े राजाओं के लिए भी जमींदार शब्द का प्रयोग किया गया है।

अतः अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने जिसे बगलाना का जमींदार लिखा है, वह वस्तुतः उस क्षेत्र का कोई बड़ा राजा था। बहारजी नाम से अनुमान होता है कि यहाँ किसी गुजराती अथवा पारसी राजा की बात हो रही है क्योंकि ये लोग परम्परा से अपने नाम के पीछे आज भी जी लगाते हैं।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि बहारजी अपने साथ शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) के गले में जंजीर बांधकर अकबर (AKBAR) के दरबार में आया। किसी समय शरफुद्दीन मिर्जा अकबर का बड़ा कृपापात्र था किंतु पिछले कुछ वर्षों में वह भी बागी मिर्जाओं में सम्मिलित हो गया था।

अकबर (AKBAR) शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) को मारना नहीं चाहता था किंतु उसे मृत्यु का भय दिखाकर फिर से अपने पक्ष में करना चाहता था। इसलिए अकबर ने शरफुद्दीन मिर्जा को एक भयंकर हाथी के सामने पटकवाया तथा शरफुद्दीन मिर्जा से कहा कि यदि वह शपथ ले कि भविष्य में कभी भी बादशाह से बगावत नहीं करेगा तथा बादशाह की सेवा करेगा तो उसे क्षमा किया जा सकता है किंतु शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) ने हाथी के पैरों कुचले जाकर मरना पसंद किया, अकबर (AKBAR) की सेवा में दुबारा आने से मना कर दिया।

इस पर भी अकबर (AKBAR) ने शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) के प्राण नहीं लिए। हाथी को वहाँ से हटा दिया गया और शरफुद्दीन मिर्जा को जेल में बंद कर दिया गया। अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) दर-दर भटका करता था, इसी से उसकी नीचता प्रकट होती थी।

अकबर (AKBAR) को ज्ञात हुआ कि बगलाना के जमींदार बहारजी ने मरहूम इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) की बेगमों और लड़कियों को भी पकड़ने का प्रयास किया था जो बगलाना के क्षेत्र में से होकर गुजर रही थीं।

बहारजी इस कार्य में पूरी तरह सफल नहीं हो सका था फिर भी वह इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) की एक पुत्री तथा इब्राहीम हुसैन मिर्जा की दो साल की कमाई लूटने में सफल रहा था। अकबर (AKBAR) इस बात को कतई सहन नहीं कर सकता था कि कोई भी अमीर, शत्रु या जमींदार शाही परिवार के किसी भी व्यक्ति को कष्ट पहुंचाने का साहस करे, भले ही शाही परिवार का वह व्यक्ति अकबर का शत्रु ही क्यों न हो!

इसलिए अकबर (AKBAR) ने मीर खाँ यथावल को आदेश दिए कि वह बगलाना के जागीरदार बहारजी को बंदी बना ले। बहारजी की कैद से इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) की पुत्री को छुड़ा लिया गया। अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि बगलाना के जमींदार ने अकबर की बड़ी अच्छी सेवा की।

इससे अनुमान होता है कि अकबर (AKBAR) ने बहारजी को मुक्त करके अपनी सेवा में ले लिया था। गुजरात विजय के बाद अकबर सीकरी के लिए रवाना हो गया। बहुत से अमीर अकबर की वापसी में उसे सिद्धपुर तक छोड़ने के लिए गए। जब अकबर सिद्धपुर पहुंचा तो उसे खानेआजम अजीज कोका (AZIZ KOKA) की चिंता हुई। खानेआजम अकबर का धायभाई था।

अकबर (AKBAR) ने उसे गुजरात का गवर्नर बना तो दिया था किंतु उसे ज्ञात था कि मिर्जाओं का विद्रोह अभी पूरी तरह थमा नहीं है। वे फिर से उपद्रव कर सकते हैं और खानेआजम के सामने बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकते हैं। इसलिए अकबर ने खानेआजम को एक पत्र लिखा जिसमें उसने अपने हृदय की चिंताएं व्यक्त करते हुए लिखा कि शासक को सदैव सक्रिय रहना चाहिए।

लोगों की छोटी-छोटी भूलों की उपेक्षा करनी चाहिए। विवादों का निर्णय बहुत सोच-विचार कर करना चाहिए। मित्रों और शत्रुओं के प्रति निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए।

अकबर (AKBAR) के इस पत्र से लगता है कि अकबर बहुत समझदार व्यक्ति था किंतु जब हम उसके द्वारा शराब के नशे में की गई हरकतों के बारे में पढ़ते हैं तो हमें लगता है कि वह भी मुहम्मद बिन तुगलक की तरह ‘समझदार-पागल’ था।

खानदेश का शासक राजा अली खाँ भी अकबर (AKBAR) को विदा करने के लिए सिद्धपुर तक आया था। अकबर ने उसे भी वापस खानदेश भेज दिया। मालवा का गवर्नर मुजफ्फर खाँ भी सिद्धपुर आया था। उसे भी अकबर ने यहीं से मालवा के लिए रवाना कर दिया।

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इसके बाद अकबर (AKBAR) ने तीन हिन्दू सेनापतियों कुंअर मानसिंह, राजा जगन्नाथ और राजा गोपाल तथा छः मुस्लिम अमीरों को आदेश दिया कि वे ईडर होते हुए डूंगरपुर जाएं तथा वहाँ के राजाओं को अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए समझाएं। यहाँ अकबर का आशय ईडर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा तथा उदयपुर के शासकों से था जो अब भी अकबर की पहुंच से बाहर थे। इसके बाद अकबर ने सिद्धपुर से पाटन, सिरोही तथा जालौर होते हुए अजमेर का मार्ग पकड़ा। अकबर का पुत्र दानियाल इस समय आम्बेर में रह रहे थे। अकबर ने एक सेना भगवानदास के पुत्र माधोसिंह के नेतृत्व में आम्बेर भिजवाई ताकि वह शहजादे दानियाल को अपनी सुरक्षा में आम्बेर से अजमेर ला सके। इस सेना के साथ जयपुर की राजकुमारी हीराकंवर जो कि राजा भारमल की पुत्री, भगवंतदास की बहिन तथा मानसिंह एवं माधोसिंह की बुआ थी और जिसका विवाह अकबर के साथ हुआ था, आम्बेर भिजवाया गया ताकि वह अपने भतीजे भुवनपति की मृत्यु पर शोक व्यक्त करने अपने पीहर जा सके। राजा भगवान दास का पुत्र भुवनपति सरनाल की लड़ाई में काम आया था। अजमेर से अकबर सीकरी चला गया।

3 जून 1573 को अकबर (AKBAR) ने अपनी राजधानी में प्रवेश किया। बड़े-बड़े अमीर और सूबेदार अकबर (AKBAR) का स्वागत करने के लिए राजधानी में एकत्रित हुए। इस अवसर पर लाहौर का सूबेदार हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) भी अकबर के दरबार में उपस्थित हुआ।

वह अपने साथ मसूद हुसैन मिर्जा और उन तमाम लोगों को लेकर आया था जो लड़ाई में पकड़े गए थे। अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि इन सबको गाय के कच्चे चमड़े में लपेटा हुआ था और उनके सींग भी नहीं हटाए गए थे।              

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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