Monday, January 26, 2026
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कल्लाजी राठौड़ और राजा जयमल राठौड़ ने चित्तौड़ के पराक्रम को अमर बना दिया (85)

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कल्लाजी राठौड़ और राजा जयमल राठौड़ - bharatkaitihas.com
कल्लाजी राठौड़ और राजा जयमल राठौड़

कल्लाजी राठौड़ और राजा जयमल राठौड़ ने चित्तौड़ के पराक्रम को अमर बना दिया – ईसरदास चौहान ने अकबर के हाथी की सूण्ड काट कर अकबर पर व्यंग्य कसा!

 राजपूताने के इतिहास में दो कल्लाजी राठौड़ (KALLA RATHORE) हुए हैं। दोनों ही मुगल बादशाह अकबर (AKBAR) के समकालीन थे। दोनों ही रणक्षेत्र में लड़ते हुए काम आए। दोनों को ही लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है। दोनों के थानों पर मेले लगते हैं।

एक कल्लाजी राठौड़ चित्तौड़ दुर्ग (CHITTOR FORT) की लड़ाई में अमर हुए थे और दूसरे कल्लाजी राठौड़ सिवाना दुर्ग (SIWANA FORT) की लड़ाई में अमर हुए थे। एक कल्लाजी राठौड़ तो अकबर के जीवन से दूर जा चुके थे और दूसरे कल्लाजी राठौड़ से अकबर (AKBAR) का सामना होने में अभी कुछ समय शेष था। उनकी चर्चा हम यथा समय करेंगे।

चित्तौड़ के किले में जब राजा जयमल एवं कल्लाजी राठौड़ चार हाथों से तलवारें चलाते हुए मुगल सैनिकों को काटने लगे तब डोडिया सांडा (DODIYA SANDA) ने घोड़े पर सवार होकर शत्रु सेना में भारी मारकाट मचाई। वह मुगल सैनिकों के सिरों को काटता और उन्हें धरती पर लुढ़काता हुआ गंभीरी नदी के पश्चिमी तट तक जा पहुंचा।

डोडिया के इस विकराल रूप को देखकर मुगल सैनिकों ने डोडिया सांडा को घेर लिया। सैंकड़ों मुगलों ने उस पर तड़ातड़ वार करने आरम्भ किए। अंततः वीर डोडा उनके सिर काटता हुआ स्वयं भी काम आया।

हिन्दुओं का प्रचण्ड आक्रमण देखकर अकबर ने कई सधाये हुए हाथियों को सूण्डों में खाण्डे पकड़ाकर आगे बढ़ाया। कई हजार सवारों के साथ अकबर भी हाथी पर सवार होकर किले के भीतर घुसा। उसके आगे-आगे हाथियों का प्रचण्ड दल चल रहा था। ईसरदास चौहान (ISARDAS CHOUHAN) मुगल सैनिकों के सिर काटता हुआ अकबर (AKBAR) के हाथी तक जा पहुंचा।

ईसरदास ने एक हाथ से अकबर (AKBAR) के हाथी का दांत पकड़ा और दूसरे से हाथी की सूंड पर खंजर मारकर कहा- ‘गुणग्राहक बादशाह को मेरा मुजरा पहुंचे।’ वस्तुतः ईसरदास चौहान ने ऐसा कहकर अकबर पर भारी व्यंग्य किया था जिससे अकबर बुरी तरह से तिलमिला गया।

कुछ दिन पहले ही मुगल बादशाह ने ईसरदास चौहान को अपने पास बुलवाया था और उसके समक्ष प्रस्ताव रखा था कि मैं गुणग्राहक बादशाह हूँ, गुणियों की कद्र करता हूँ। आप बहुत वीर हैं, इसलिए मैं चाहता हूँ कि आप चित्तौड़ का दुर्ग छोड़कर मेरी तरफ आ जाएं। तब ईसरदास ने यह कहा था कि फिर कभी उचित अवसर आने पर मैं बादशाह को मुजरा करूंगा।

आज ईसरदास ने अकबर को उसी वार्तालाप का स्मरण दिलाते हुए उस पर व्यंग्य किया था। ईसरदास चौहान वहीं पर काम आया। देखते ही देखते चित्तौड़ी वीरों ने प्रचण्ड रूप धारण कर लिया। वे मुगलों को गाजर-मूली की तरह काटने लगे और स्वयं भी युद्ध की अग्नि में अपने प्राणों की आहुति देने लगे।

चित्तौड़ी वीरों ने अकबर द्वारा दुर्ग की तरफ दौड़ाए गए कई हाथियों के दांत तोड़ डाले और कइयों की सूण्डें काट डालीं जिससे वे जोर-जोर से चिंघाड़ने लगे और गुस्से में पागल होकर इधर-उधर दौड़ने लगे। बहुत से हाथी वहीं मर गए और बहुत से दोनों तरफ के सैनिकों को कुचलते हुए भाग निकले।

केलवा का ठाकुर फत्ता सिसोदिया (FATTA SISODIA) बड़ी बहादुरी से लड़ा परन्तु एक हाथी ने उसे सूण्ड से पकड़कर पटक दिया जिससे वह सूरजपोल के भीतर काम आया। उसे चित्तौड़ के इतिहास में फतहसिंह चूण्डावत के नाम से जाना जाता है। वह राजा जयमल राठौड़ का बहनोई था।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि बादशाह ने मुझे बताया कि जब बादशाह गोविंद शरण के मंदिर में पहुंचा तो एक महावत ने एक आदमी को अपने हाथी से कुचलवाया। हाथी उसको अपनी सूंड में पकड़कर बादशाह के सामने लाया।

महावत ने कहा कि मैं इस आदमी का नाम तो नहीं जानता परंतु यह कोई सरदार जान पड़ता है। इसके चारों ओर बहुत से आदमियों ने प्राणों का बलिदान किया है। अंत में ज्ञात हुआ कि वह फत्ता सिसोदिया था।

जिस समय उसको बादशाह के सामने उपस्थित किया गया, उस समय उसमें कुछ प्राण थे परंतु फिर शीघ्र ही उसकी मृत्यु हो गई।

राव संग्रामसिंह, राठौड़ नेतसी आदि अनेक हिन्दू सरदार काम आए। 25 फरवरी 1568 को वीरगति प्राप्त करने वाले योद्धाओं में राजराणा जैता सज्जावत एवं राजराणा सुलतान आसावत भी थे। ये दोनों अपना मोर्चा छोड़कर सूरजपोल दरवाजे पर रावत साईंदास चूंडावत की सहायता करने के लिए पहुंचे और वहीं पर काम आए।

कोठारिया का रावत साहिबखान चौहान भी वीरता से लड़ते हुए काम आया। लावा सरदारगढ़ का ठाकुर सांडासिंह डोडिया घोड़े पर सवार होकर तलवार चलाते हुए गंभीर नदी के पश्चिम में वीरगति को प्राप्त हुआ।

 मेड़तिया सरदारों में विजयसिंह, जीतसिंह, र्दुजन रायमलोत तथा ईश्वरदास वीरमदेवोत भी वीरगति को प्राप्त हुए। जयमल राठौड़ का भाई प्रतापसिंह राठौड़ भी इस युद्ध में काम आया।

सलूंबर रावत साईंदास चूंडावत सूरजपोल की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। उसका इकलौता पुत्र कुंवर अमर सिंह भी यहीं वीरगति को प्राप्त हुआ। इस तरह रावत साईंदास चूंडावत का वंश यहीं समाप्त हुआ। अकबर (AKBAR) ने इस युद्ध के बाद जिन तीन योद्धाओं की तुलना 1 हजार घुड़सवारों से की, उनमें से एक रावत साईंदास चूंडावत भी था।

बड़ी सादड़ी का राजराणा सुरतान सिंह झाला (RAJRANA SURTAN SINGH JHALA) भी सूरजपोल की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। बल्लू सिंह चौहान (BALLUSINGH CHOUHAN) भी रणखेत रहा। यह पृथ्वीराज चौहान का वंशज था। मदारिया का रावत दूदा भी बहुत से शत्रुओं को मार कर शहीद हुआ।

आमेर के दूदा शेखावत तथा कमर चंद कछवाहा भी काम आए। महाराणा उदयसिंह की एक रानी जालौर के सोनगरा चौहानों की राजकुमारी थी जिसका नाम जयवंता बाई (RANI JAIWANTA BAI) था। उसकी कोख से महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था।

रानी जयवंता बाई के पीहर वालों ने ईश्वर दास वीरमदेवोत के साथ मिलकर लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी। बल्लू सिंह सोलंकी अकबर (AKBAR) के मांडलगढ़ आक्रमण के समय मांडलगढ़ छोड़कर चित्तौड़ आ गया था। उसने भी इस युद्ध में अपना बलिदान दिया। 

वीरगति पाने वालों में कल्लाजी राठौड़, राजा जयमल राठौड़ तथा फत्ता सिसोदिया साहित लगभग सत्रह सौ राजपूत महाराणा उदयसिंह (MAHARANA UDAISINGH) के सम्बन्धी थे। इस युद्ध में कुछ अफगान बंदूकचियों ने भी महाराणा उदयसिंह की ओर से भाग लिया था किंतु जब अकबर ने चित्तौड़ के दुर्ग में प्रवेश किया तो उनमें से एक भी नहीं मारा गया। इसके कारण पर स्वयं अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने खुलासा किया है।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम करवाया अकबर ने तीस हजार लोगों का! (86)

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चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम - bharatkaitihas.com
चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम करवाया अकबर ने तीस हजार लोगों का!

जिस अकबर को पश्चिमी इतिहासकार तथा भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरूभारत का महान् राजा” और अकबर दी ग्रेट बताते नहीं थकते हैं, उसी अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग (CHITTOR FORT) में कत्लेआम करवाकर तीस हजार निरपराध हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया।

महान् कहे जाने वाले मुगल बादशाह अकबर (AKBAR THE GREAT) के समकालीन एवं पश्चवर्ती हिन्दू तथा मुसलमान लेखकों ने अकबर के चित्तौड़ घेरे (Siege of Chittor) के समय हुए युद्ध का वर्णन अपने-अपने दृष्टिकोण से किया है।

अकबर (AKBAR) का दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है- ‘ऐसी जंग आज से पहले ना किसी ने देखी और ना सुनी। इन चार महीनों में हजारों वाक्य लिखने लायक थे पर मैं सब-कुछ बयान नहीं कर सकता।’

अबुल फजल ने दुर्गरक्षकों द्वारा केसरिया किए जाने का उल्लेख नहीं किया है। उसने सारा विवरण इस प्रकार लिखा है जिससे ऐसा लगे कि राजपूतों की ओर से कोई प्रतिरोध नहीं किया गया और बादशाह की सेना ने उन्हें बड़ी आसानी से मार दिया। चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम का यह विवरण अबुल फजल की रचना में स्पष्ट झलकता है।

अबुल फजल लिखता है कि जयमल के मारे जाने पर सब राजपूतों का उत्साह भंग हो गया था और टूटी हुई प्राचीर के पास कोई राजपूत सैनिक दिखाई नहीं देता था। तो भी गाजियों अर्थात् शाही सैनिकों को सब ओर से एकत्र करके सावधानी बरती गई और उन्हें आदेश दिया गया कि प्रातःकाल दुर्ग में प्रवेश किया जाए।

बादशाह के आदेशानुसार प्रातःकाल होने पर योद्धाओं ने दुर्ग में प्रवेश करके पराजित लोगों को मारना और बांधना आरम्भ कर दिया। राजपूतों ने प्राण-प्रण से युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हो गए। अकबर (AKBAR) ने आदेश दिया कि साबात के सामने से मजबूत हाथी दुर्ग में लाए जाएं। इस पर मधुकर, जंगिया, सब्दालिया और कादिरा नामक कई हाथी मंगवाए गए।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि महान् मुगल बादशाह अकबर (AKBAR) स्वयं भी एक विशाल हाथी पर सवार हुआ। उसके साथ कई हजार प्यादे थे। ईसरदार चौहान ने मधुकर नामक हाथी की सूंड पर खंडार मारा और एक हाथ से उसका दांत पकड़कर कहा मेरे इस कार्य की खबर अकबर को दे देना।

एक राजपूत ने जंगिया नामक हाथी की सूंड अपनी तलवार से काट डाली। फिर भी मरने से पहले वह हाथी खूब लड़ा। उसने 30 आदमियों को पहले ही आहत कर दिया था, अब 15 आदमियों को और मार डाला। कादिर नामक एक हाथी इस शोर को सुनकर दुर्ग में घुस गया और एक तंग मार्ग पर उसने कितने ही लोगों को कुचल डाला।

उस समय प्राचीर पर खड़ा हुआ बादशाह इस दृश्य को देख रहा था। जब सब्दालिया नामक हाथी दुर्ग में घुसा तो एक राजपूत ने झपटकर उसकी सूण्ड पर घाव कर दिया परंतु हाथी ने उसको अपनी सूंड में पकड़कर मार डाला। यह भी अकबर ने अपनी आंखों से देखा।

आरंभ में केवल 50 हाथी ही दुर्ग में घुसाए गए थे। फिर इनकी संख्या 300 कर दी गई। इन्होंने सब राजपूतों को कुचल डाला। चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम का यह दृश्य अत्यंत भयावह था।

अबुल फजल लिखता है कि दुर्ग में लड़ने वाले राजपूतों की संख्या 8 हजार थी परंतु चालीस हजार किसान इनकी सेवा करने आ पहुंचे थे। महान् मुगल बादशाह ने इन लोगों से निबटने के लिए दुर्ग में प्रवेश किया। इस पर बहुत से दुर्ग-रक्षक तथा किसान मंदिरों में घुस गए। उन्होंने समझा कि मूर्तियां उनके प्राण बचा लेंगी।

अबुल फजल ने जिन्हें किसान लिखा है, वस्तुतः उनमें दुर्ग के आसपास रहने वाले भील एवं विभिन्न जातियों के लोग सम्मिलित रहे होंगे। चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम में इनकी भी भागीदारी दर्ज हुई।

अबुल फजल लिखता है कि कुछ लोग अपने घर में ही अपने अंत की प्रतीक्षा करते रहे। फिर कुछ लोग अपनी तलवारें लेकर मुसलमान सैनिकों का सामना करने के लिए आए और मारे गए। मंदिरों में से भी आदमी निकले और गाजियों ने उनको भी मार डाला।

अबुल फजल लिखता है कि प्रातःकाल से मध्यान्ह तक लगभग तीन हजार सैनिक मारे गए। जब ई.1303 में सुल्तान अलाउद्दीन ने छः मास और 7 दिन के घेरे के बाद यह दुर्ग जीता था तब उसने कृषकों को नहीं मारा था। क्योंकि कृषक उस लड़ाई में सम्मिलित नहीं हुए थे परंतु इस अवसर पर कृषकों ने बड़ा जोश और सक्रियता दिखाई। इसलिए महान् मुगल बादशाह ने उन्हें मारने के आदेश दिए।

इस पर कृषकों ने अकबर के पास जाकर इस युद्ध में अपनी सक्रियता के बारे में कई कारण बताए परंतु अकबर ने उनके तर्क स्वीकार नहीं किए तथा उसने अपनी सेना को आदेश दिए कि दुर्ग में मौजूद प्रत्येक कृषक को मार दिया जाए। इस पर शहंशाह की सेना ने लगभग 30 हजार मनुष्यों को मार डाला तथा लगभग इतने ही मनुष्यों को बंदी बना लिया। चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम की यह घटना महान कहे जाने वाले अकबर (AKBAR THE GREAT) के इतिहास को कलंकित करने वाली है।

अबुल फजल लिखता है कि एक आश्चर्यजनक बात यह हुई कि महान् मुगल बादशाह अकबर ने अफागन बंदूकचियों की दुर्ग में बड़ी तलाश करवाई क्योंकि अकबर (AKBAR) उनसे बड़ा तंग था किंतु बहुत तलाश करने पर भी उन बंदूकचियों का पता नहीं चला।

अंत में ज्ञात हुआ कि वे लोग बादशाह की सेना को भुलावे में डालकर दुर्ग से सुरक्षित निकल गए। जब बादशाह की सेना दुर्ग में लूटमार करने में लगी थी, तब ये अफगान बंदूकची, जिनकी संख्या लगभग 1000 थी, अपनी स्त्रियों एवं बच्चों को अपनी पगड़ियों से बांध कर ले गए। बादशाह के सैनिकों को पता नहीं चल सका कि वे कौन लोग हैं!

क्योंकि महान् मुगल बादशाह के सैनिकों ने समझा कि ये लोग शाही सेना के सैनिक हैं तथा दुर्ग के कैदियों को पकड़कर ले जा रहे हैं। इस प्रकार उन अफगान बंदूकचियों की युक्ति सफल हो गई और वे अकबर की सेना की आंखों में धूल झौंककर दुर्ग से बाहर चले गए।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि उस दिन चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम इतना भयानक था कि ऐसा कोई घर एवं मार्ग नहीं था जहाँ पर मुर्दों के ढेर नहीं लगे हों परंतु तीन स्थानों पर मारे जाने वालों की संख्या बहुत अधिक थी।

दुर्ग में महाराणा उदयसिंह के महल में बहुत से राजपूत इकट्ठे हो गए थे। वह दो-दो, तीन-तीन करके बाहर निकले और उन्होंने अपने प्राणों को रण में न्यौछावर कर दिया। बहुत से राजपूत महादेव के मंदिर में एकत्रित हो गए थे। उन्होंने रामपुर दरवाजे के बाहर अपने शरीर त्याग दिए।

उस दिन शाही सेना में जरा बलीकूची के अतिरिक्त और कोई नहीं मारा गया। महान् मुगल बादशाह (Akbar) ने अल्लाह को धन्यवाद दिया और दोपहर के बाद वह अपने शिविर में चला गया।

राहुल सांकृत्यायन (Rahul Sankrityayan) ने लिखा है कि किले में प्रवेश करते समय आठ हजार राजपूतों ने बड़े महंगे दामों पर अपने प्राणों को बेचा। अकबर को इस वीरता का सम्मान करना चाहिए था किंतु वह चूक गया। उसने चित्तौड़ दुर्ग में कत्लेआम का आदेश दिया। तीस हजार आदमियों ने प्राण गंवाए। कहा जाता है कि मरे हुए लोगों के जनेऊ को तौला गया तो उनका वजन 47 मन हुआ। इस प्रकार फरवरी 1568 में अकबर ने सदा के लिए निर्जन चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Mulla Abdul Qadir Badayun ) लिखता है कि दोपहर बाद शहंशाह ने थैला भराई बंद करने का आदेश दिया और मुकाम पर लौट गया। थैला भराई से मुल्ला बदायूंनी का आशय किस चीज से है, इसके बारे में ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता किंतु ऐसा लगता है कि जो शव किले में बिखरे पड़े थे उन्हें थैलों में बंद करके वहाँ से हटाया गया था।

अकबर (AKBAR) वहाँ पर वह तीन दिन रहा तथा विजय के पत्र लिखे और अपनी विजय के समाचार सभी दिशाओं में भेज दिए। युद्ध समाप्त होने के बाद तीन अकबर दिनों तक चित्तौड़ दुर्ग के सैनिक शिविर में रहा। उसने चित्तौड़ दुर्ग अब्दुल मजीद आसिफ खाँ के सुपुर्द कर दिया तथा चित्तौड़ नामक नवीन सरकार का गठन करके आसफ खाँ को इस सरकार का सूबेदार बना दिया।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

चित्तौड़ से पलायन कर गए हजारों राजपूत परिवार (87)

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चित्तौड़ से पलायन

जब अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार करके उसमें रहने वाले तीस हजार हिन्दुओं का कत्लेआम करवाया तो  हजारों राजपूत परिवार चित्तौड़ को स्वतंत्र कराने का संकल्प लेकर गाड़ियों में बैठकर चित्तौड़ से पलायन कर गए!

 24 फरवरी 1568 को चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार करने के बाद अकबर (AKBAR) ने दुर्ग में कत्लेआम के आदेश दिए। अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि अकबर के आदेश से तीस हजार लोग मार दिए गए तथा इतने ही बंदी बना लिए गए।

कहा नहीं जा सकता कि चित्तौड़ दुर्ग में काम आए आठ हजार चित्तौड़ी सैनिकों की संख्या तथा जौहर में प्राण देने वाली स्त्रियों एवं बच्चों की संख्या इन 30 हजार में सम्मिलित है, अथवा उनसे अलग है! कई लोग शंका करते हैं कि एक दुर्ग में आखिर कितने लोग आ सकते हैं!

ज्ञातव्य है कि चित्तौड़ का दुर्ग लगभग 8 किलोमीटर लम्बे और 2 किलोमीटर चौड़े पहाड़ पर बना हुआ है। इस दुर्ग का क्षेत्रफल लगभग 280 हैक्टेयर है। यह भारत का विशालतम दुर्ग है। इस दुर्ग में आज भी एक नगर बसा हुआ है।

अकबर से हुई लड़ाई के समय दुर्ग में लगभग 8 हजार सैनिक तैनात थे। उनके परिवार के सदस्यों की संख्या अलग थी। अबुल फजल ने लिखा है कि जब दुर्ग का पतन होने लगा था, तब आसपास के क्षेत्रों से रहने वाले 40,000 किसान भी दुर्ग की रक्षा के लिए आ गए थे।

अकबर (AKBAR) ने दुर्ग में इन्हीं में से तीस हजार मनुष्यों का कत्ल करवाया था क्योंकि दुर्ग में रहने वाले सैनिकों एवं उनके परिवारों के सदस्यों में से तो अधिकांश लोग या तो साका के अंतर्गत अपने प्राण दे चुके थे, या दुर्ग छोड़कर जा चुके थे।

चित्तौड़ के इस युद्ध में एक भूला-बिसरा पन्ना उन लोगों का भी है जो दुर्ग पर विदेशियों का अधिकार होते देखकर वहाँ से अपने परिवारों को साथ लेकर निकल गए थे। चित्तौड़ से पलायन करते समय उन्होंने प्रण लिया कि वे तब तक धरती पर अपना घर नहीं बनाएंगे जब तक चित्तौड़ स्वतंत्र नहीं हो जाएगा।

चित्तौड़ तो जहांगीर (JAHANGIR) के शासन काल में पुनः स्वतंत्र होकर महाराणा के पास आ गया किंतु इन लोगों की गाड़ियां कभी चित्तौड़ दुर्ग में नहीं लौटीं। हजारों राजपूत परिवारों की चित्तौड़ से पलायन की ऐतिहासिक परिणति यह है कि साढ़े पांच सौ साल बीत जाने पर भी उनके वंशज बैलगाड़ियों में बैठे हुए आज भी पूरे देश में घूम रहे हैं।

युद्धकर्म छूट जाने पर इन लोगों ने लुहार का काम पकड़ लिया और वे एक स्थान से दूसरे स्थान तक घूमने लगे। समय बीतने के बाद वे गाड़िया लुहार कहलाने लगे। आज भी राजस्थान की गाड़िया लोहार एक ऐसी अनोखी घुमक्कड़ जाति है, जो अपना घर नहीं बनाती, एक स्थान पर टिक कर नहीं रहती। यह जीवनशैली चित्तौड़ से पलायन की देन है।

बैलगाड़ी ही इनका चलता-फिरता घर है। इनका जीवन इसी बैलगाड़ी में पूरा होता है। जन्म, विवाह और मृत्यु सभी-कुछ बैलगाड़ी में होते हैं। यह परंपरा चित्तौड़ से पलायन की स्मृति को जीवित रखती है।

गाड़िया लोहारों में मान्यता है कि जब वे युद्ध के बाद अपने घरों को लौट रहे थे, तब मार्ग में इन्हें एक रथ पर बैठे भगवान मिले। भगवान के रथ की धुरी टूट गयी थी। इन लोगों ने भगवान के रथ की धुरी जोड़ दी। तब भगवान ने उन्हें वरदान दिया कि तुम्हें लोहे के काम में पराजित नहीं होना पड़ेगा।

तभी से गाड़िया लोहार पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही कार्य करते आ रहे हैं। ये लोग लोहे को पीटकर आजीविका चलाते हैं। पुरुष आग से गर्म लोहे को निकालकर एरन पर रखते हैं और स्त्रियां घन (भारी हथौड़े) से चोट करती हैं।

ये लोहे के तरह-तरह के सामान और औजार भी बनाते हैं जिनमें चिमटा, हंसिया, खुरपी, कुल्हाड़ी, करछली आदि होते हैं। इन लोगों की गाड़ियाँ बहुत कलात्मक ढंग से बनी होती हैं। गाड़ी के विविध हिस्सों में पीतल के गोल कलात्मक पतरे कील से जड़े रहते हैं।

गाड़ी के पहिये भी भव्य और भारी होते हैं जो किसी ऐतिहासिक रथ के पहिए की तरह दिखते हैं। इनकी गाड़ी का रंग गहरा काला होता है ताकि इनकी सुंदर बहू-बेटियों को किसी की बुरी नजर नहीं लगे।

गाड़िया लुहार पुरुष धोती और बंडी पहनते हैं जबकि महिलाएं कलात्मक पहनावा पहनती हैं। वे गले में चांदी का कड़ा, हाथों में भुजाओं तक कांच, लाख, सीप एवं तांबे की चूड़ियां, नाक में लंबी नथ, पांव में चांदी के भारी कड़े, कानों में पीतल या सीप की बालियां पहनती हैं।

 सिर पर आठ-दस तरह की चोटियां गूंथती हैं जिनमें कौड़ियों की माला जैसी गुंथाई भी होती है। महिलाएं अपने पैरों की लंबाई से आधा फुट छोटा छींटदार लहंगा पहनती हैं। कमर में कांचली पहनती हैं तथा अपने शरीर पर गोदने गुदवाती हैं जिसे गाड़िया लुहारों का पहचान-चिन्ह भी माना जाता है।

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ये लोग कई प्रतिज्ञाओं का पालन करते हैं। सिर पर टोपी नहीं पहनते, पलंग पर नहीं सोते, घर नहीं बनाते, दिया नहीं जलाते, कुएं से पानी नहीं भरते, बड़ी नली का हुक्का काम में नहीं लेते, कमर में काले रंग के अतिरिक्त अन्य किसी रंग का नाड़ा नहीं बांधते, अन्य जाति की स्त्री से विवाह नहीं करते, स्वजन की मृत्यु पर विलाप नहीं करते, एक से अधिक कंघा नहीं रखते। कंघा टूटने पर उसे जमीन में गाढ़ते हैं। नया कंघा कुलदेवी की तस्वीर के समक्ष रखकर पवित्र करते हैं। ये लोग माचिस से कभी आग नहीं जलाते, बल्कि इनकी अंगीठी में सुलगते कोयले के कुछ टुकड़े हमेशा पड़े रहते हैं। इनमें मान्यता है, नई आग जलाने से पुरखों की आत्माएं कष्ट पाती हैं। ये लोग प्रायः कुत्ते पालते हैं। विवाह होने पर नवदम्पत्ति अपने जीवन की पहली रात गाड़ी में गुजारते हैं तथा प्रण लेते हैं कि वे अपनी भावी संतान को चलती बैलगाड़ी में जन्म देंगे, ताकि उसमें भी घुमक्कड़ संस्कार समा सकें। इन लोगों में विवाह के तरीके अनोखे होते हैं। दुल्हन पाने के लिए दूल्हे को एक से दस किलो तक चांदी दुल्हन के पिता को भेंट करनी होती है। इनके विवाह में मोरपंख का बड़ा महत्व है। अग्नि के चारों ओर फेरे लेने के उपरांत दुल्हन अपने पति को एक मोरपंख भेंट करती है चित्तौड़ से पलायन के साढ़े पाँच सौ साल बाद भी इतिहास का यह भूला-बिसरा पन्ना सड़कों पर चलता.फिरता दिखाई देता है।

अबुल फजल लिखता है कि जब चित्तौड़ का घेरा शुरू हुआ था तो अकबर (AKBAR) ने संकल्प लिया था कि चित्तौड़ दुर्ग को जीतने के बाद वह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की पैदल यात्रा करेगा। इसलिए 28 फरवरी 1568 को अकबर ने वापसी के नगाड़े बजवाए और तपते हुए मरुस्थल में जब बड़ी ही गर्म लू चल रही थी तो उसने पैदल यात्रा करना शुरू कर दी।

 अबुल फजल ने चाटुकारिता की समस्त सीमाएं लांघकर फरवरी के महीने में चित्तौड़ और अजमेर के बीच में तपता हुआ मरुस्थल दिखाया है और वहाँ गर्म लूओं का बहना दिखाया है। न तो इस क्षेत्र में मरुस्थल है, न वह फरवरी के महीने में तपता है और न भारत के किसी भी भूभाग में फरवरी के महीने में लूएं चलती हैं।

इस क्षेत्र में फरवरी का महीना आज भी काफी ठण्ठा होता है। आज से पांच सौ साल पहले फरवरी का महीना और भी अधिक ठण्डा रहा होगा!

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि अपने वायदे के अनुसार पूरे रास्ते पैदल चलकर रमजान माह की सातवीं तारीख को अकबर (AKBAR) अजमेर पहुंच गया। वहाँ वह ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर गया। खैरात बांटी, अच्छे और नेक काम किए तथा दस दिन बाद सवार होकर राजधानी के लिए चल पड़ा।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

रणथंभौर पर अभियान – अकबर भारत विजय की ओर (88)

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रणथंभौर पर अभियान - bharatkaitihas.com
रणथंभौर पर अभियान

चित्तौड़ का गर्व धूल में मिलाने के बाद बादशाह अकबर (AKBAR THE GREAT) ने बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा  में अपनी सेनाएं भेजीं तथा स्वयं रणथंभौर पर अभियान करने चल दिया। वह भारत विजय के अपने अभियान को बड़ी तेजी से कार्यान्वित करना चाहता था।

चित्तौड़गढ़ हाथ से निकल जाने के बाद महाराणा उदयसिंह (MAHARANA UDAISINGH) कुछ समय के लिए कुम्भलगढ़ में रहा किंतु कुछ समय बाद महाराणा अपने बचे हुए हिन्दू सैनिकों के साथ उदयपुर पहुँचा और उसने अपने अधूरे पड़े महलों को पूरा कराया।

ई.1572 के आरम्भ में महाराणा उदयसिंह गोगूंदा (GOGUNDA) आया। 15 फरवरी 1572 को गोगूंदा में ही महाराणा उदयसिंह का निधन हुआ जहाँ उसकी छतरी बनी हुई है। चित्तौड़ दुर्ग के पतन से महाराणा की शक्ति इतनी अधिक क्षीण हो चुकी थी कि वह चित्तौड़ को दुबारा लेने का प्रयास नहीं कर सका।

उधर अकबर (AKBAR) भी अजमेर होता हुआ आगरा चला गया। अकबर जयमल (JAIMAL) और फत्ता (FATTA) को तो अपने अधीन नहीं कर सका किंतु आगरा पहुंचकर उसने हाथियों पर चढ़ी हुई जयमल और फत्ता की पाषाण प्रतिमाएं बनवाकर आगरा दुर्ग के द्वार पर खड़ी करवाईं।

औरंगजेब के शासन काल में जब फ्रैंच यात्री बर्नियर (Bernier) भारत आया था, तब भी ये मूर्तियां वहीं पर खड़ी थीं। बर्नियर की यात्रा के छः साल बाद औरंगजेब ने इन मूर्तियों को तुड़वा दिया।

जिस वर्ष अकबर (AKBAR) ने चित्तौड़ का किला जीता, अर्थात् ई.1568 में बंगाल के शासक सुलेमान ने अकबर (AKBAR) की अधीनता स्वीकार कर ली। उसने अकबर (AKBAR) के नाम का खुतबा पढ़वाया, अकबर (AKBAR) के नाम के सिक्के ढलवाए तथा खानखाना मुनीम खाँ से भेंट करके उससे संधि कर ली।

वस्तुतः बंगाल का शासक सुलेमान उड़ीसा के हिन्दू राजा को मारकर उसका राज्य हड़पना चाहता था, इसलिए उसने मुनीम खाँ से दोस्ती कर ली ताकि जब सुलेमान उड़ीसा के हिन्दू राज्य पर हमला करे तो मुगल सेना, सुलेमान के विरुद्ध कोई कार्यवाही न करे।

जब खानखाना मुनीम खाँ बंगाल के शासक सुलेमान से संधि करके लौट गया तब सुलेमान ने उड़ीसा के राजा के साथ छल करके उसके राज्य पर अधिकार कर लिया। सुलेमान की इस कार्यवाही पर मुगलों ने कोई आपत्ति नहीं की।

पाठकों को स्मरण होगा कि अकबर ने बादशाह बनते समय संकल्प लिया था कि वह सम्पूर्ण भारत को अपने अधीन करेगा। इस कारण जिस दिन से उसने बादशाहत संभाली थी, उसी दिन से अकबर इस दिशा में काम कर रहा था।

यदि हम उसके दरबारियों एवं समकालीन लेखकों द्वारा लिखे गए विवरणों को पढ़ें तो हम जान पाएंगे कि अकबर (AKBAR) ने अपने जीवन में तीन ही काम किए।

पहला यह कि वह जीवन भर अफगानियों एवं राजपूतों के राज्यों को अपने अधीन करने में लगा रहा। दूसरा यह कि जब तक उसके शरीर में दम रहा, वह जंगलों में जाकर शिकार खेलता रहा और तीसरा यह कि वह जीवन भर पराई औरतों को पाने के लिए तरह-तरह के उपाय करता रहा।

जब औरतों से उसका जी भर जाता तो वह शिकार खेलने चल देता था, जब शिकार से जी भर जाता तो वह युद्ध करने चला जाता था। जब युद्ध करने से जी भर जाता तो फिर से औरतों की तलाश में लग जाता था।

चित्तौड़ से लौटने के बाद अकबर (AKBAR) लगभग नौ माह तक अपने रनिवास में व्यस्त रहा। वर्ष 1568 के अंत में अकबर ने महाराणा उदयसिंह के दूसरे सबसे सुदृढ़ दुर्ग रणथंभौर पर अभियान करने का विचार किया।

दिल्ली से निकटता तथा मालवा और मेवाड़ के मध्य स्थित होने के कारण AKBAR के लिए यह आवश्यक हो गया था कि रणथंभौर पर अभियान करे तथा इस दुर्ग पर अधिकार जमाये।

मान्यता है कि रणथंभौर दुर्ग को सातवीं शताब्दी ईस्वी में चंद्रवंशी राजा रंतिदेव ने बनवाया था। अधिकतर विद्वान इस दुर्ग को नौवीं शताब्दी ईस्वी में चौहानों द्वारा निर्मित मानते हैं।

रणथंभौर का दुर्ग अरावली पर्वतमाला से घिरा हुआ एक पार्वत्य दुर्ग है। यह दुर्ग जिस पहाड़ी पर बना हुआ है, उसकी समुद्र तल से ऊँचाई 1578 फुट है। दुर्ग लगभग 500 फुट ऊंचा है। दुर्ग की परिधि लगभग 12 किलोमीटर तथा कुल क्षेत्रफल लगभग 11.45 वर्ग किलोमीटर है।

यह दुर्ग विषम आकार वाली सात पहाड़ियों से घिरा हुआ है। बीच-बीच में गहरी खाइयां और नाले हैं। ये सारे नाले चम्बल एवं बनास नदियों में जाकर मिलते हैं। रणथंभौर दुर्ग ऊंचे गिरि शिखर पर बना हुआ है। अपने निर्माण के समय यह दुर्ग घने जंगलों से घिरा हुआ था।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि यह दुर्ग पहाड़ियों के बीच में स्थित है। इसीलिए इस दुर्ग के बारे में कहा जाता है कि इस दुर्ग ने कवच धारण कर रखा है जबकि अन्य दुर्ग नंगे हैं। वह लिखता है कि यह दुर्ग रण नामक ऊँची पहाड़ी पर स्थित है जिसके कारण इस दुर्ग का नाम रणतःपुर है जिसका अर्थ होता है- ‘रण की घाटी में स्थित नगर।’

इस दुर्ग का प्रचलित नाम रणथंभौर है जो रण तथा थंभ नामक दो पहाड़ियों के नाम पर है। रण उस पहाड़ी का नाम है जो किले से ठीक नीचे स्थित है तथा थंभ उस पहाड़ी का नाम है जिस पर यह दुर्ग स्थित है।

अजमेर के चौहान शासक पृथ्वीराज चौहान की रानी रखल देवी ने इस दुर्ग के जैन मंदिर में स्वर्ण कलश चढ़ाया था। 12वीं शताब्दी के जैन लेखक सिद्धसेन सूरी ने इस दुर्ग को प्रमुख जैन तीर्थों में गिना है। मुहम्मद गौरी से लड़ने के लिये युद्ध पर जाने से पहले सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने इसी दुर्ग में अपनी सेना एकत्रित की थी।

ई.1192 में तराईन की लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान का राज्य समाप्त हो गया किंतु उसके बाद भी यह दुर्ग चौहानों के अधिकार में बना रहा। ई.1226 में दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने एक विशाल सेना लेकर रणथंभौर पर अभियान किया।

मिनहाज उस् सिराज ने लिखा है कि अल्लाह की रहमत से ई.1226 में रणथंभौर के उस मजबूत किले पर सुल्तान इल्तुतमिश का अधिकार हो गया, जिसे लेने में 70 बादशाह असफल हो गए थे।

रणथंभौर पर अभियान में असफल होने वाले 70 बादशाह कौनसे थे, इसके बारे में मिनहाज कुछ भी सूचना नहीं देता है। फिर भी मिनहाज के इस कथन से इस बात का आभास हो जाता है कि दिल्ली के मुसलमानों को रणथंभौर पर आसानी से जीत नहीं मिल सकी थी।

जब ई.1236 में इल्तुतमिश की मृत्यु हो गई तो पृथ्वीराज चौहान के वंशजों ने रणथंभौर पर अभियान किया। इल्तुतमिश के उत्तराधिकारी सुल्तान रुकनुद्दीन फीरोजशाह एवं उसकी माता शाह तुर्कान, रणथंभौर दुर्ग में फंसी हुई तुर्की सेना को कोई सहायता नहीं भेज सके।

इस कारण दिल्ली की तुर्की सेना रणथंभौर दुर्ग में फंस गई। कुछ माह बाद जब इल्तुतमिश की पुत्री रजिया दिल्ली की सुल्तान बनी तो उसने राजपूतों से समझौता करके अपने सैनिकों को रणथंभौर दुर्ग से बाहर निकाला।

जिस समय हम्मीरदेव चौहान इस दुर्ग का शासक था उस समय 12 मार्च 1291 को दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने रणथंभौर दुर्ग पर आक्रमण किया किंतु जब वह इस दुर्ग को नहीं जीत पाया तो यह कहकर दिल्ली लौट गया कि- ‘जलालुद्दीन खिलजी ऐसे दस किलों को मुसलमान के एक बाल के तुल्य भी नहीं समझता।’

 ई.1301 में दिल्ली के सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी ने रणथंभौर की ओर अभियान किया और दुर्ग रक्षकों को रिश्वत खिलाकर अपनी सेना को दुर्ग में घुसाने में सफल हो गया।

दुर्ग का पतन होता देखकर राजा हम्मीर देव चौहान की रानियों एवं दुर्ग में रहने वाली महिलाओं ने जौहर किया। आज रणथंभौर एक बार फिर इतिहस के उसी मुहाने पर आ खड़ा हुआ था। अकबर (AKBAR) की सेनाएं रणथंभौर के लिए चल पड़ीं।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

अकबर का रणथंभौर अभियान – लोहे एवं पत्थरों के भारी गोले बरसाने लगा अकबर (89)

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अकबर का रणथंभौर अभियान

 चित्तौड़ दुर्ग का अभियान पूरा करने के ठीक एक साल बाद अकबर (AKBAR) ने एक विशाल सेना लेकर रणथम्भौर दुर्ग  (Ranthambhor Fort) घेरने का निश्चय किया। यह अकबर का रणथंभौर अभियान कहलाता है। उस समय रणथंभौर दुर्ग मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह (Maharana Udaisingh) के अधीन था और पृथ्वीराज चौहान का वंशज राव सुरजन हाड़ा (Rao Surjan Hada) रणथंभौर दुर्ग का दुर्गपति था।

ई.1527 में खानवा के युद्ध (Battle of Khanwa) में घायल होने के बाद महाराणा सांगा (Maharana Sangramsingh) ने इसी रणथंभौर दुर्ग में आकर विश्राम किया था। महाराणा सांगा की एक रानी का नाम कर्मवती (Rani Karmavati) था जो महाराणा विक्रमादित्य तथा महाराणा उदयसिंह की माता थी।

रानी कर्मवती रणथंभौर के इसी हाड़ा राजवंश की राजकुमारी थी। इस कारण हाड़ा राजवंश मेवाड़ के सर्वाधिक विश्वसनीय एवं समर्पित राजवंशों में से माना जाता था।

21 दिसम्बर 1568 को बादशाह अकबर अगारा से दिल्ली के लिए रवाना हुआ। दिल्ली पहुंचकर वह हुमायूँ (HUMAYUN) की कब्र पर गया तथा कुछ दरवेशों की दरगाहों पर उपस्थित हुआ।

10 फरवरी 1569 को बादशाह रणथंभौर पहुंच गया। इस प्रकार चित्तौड़ दुर्ग जीतने के एक वर्ष बाद, फरवरी 1569 में अकबर का रणथंभौर अभियान आरम्भ हुआ। चित्तौड़ अभियान की तरह रणथंभौर अभियान में भी अकबर ने स्वयं रणक्षेत्र में मौजूद रहकर अपनी सेना का नेतृत्व करने का निर्णय लिया।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी लिखता है कि शहंशाह अकबर ने किले पर भारी गोलाबारी करवाई। उसने चित्तौड़ की तरह यहाँ भी साबातें बनवाईं ताकि अकबर की सेना किले की दीवारों तक पहुंच सके।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि लगभग सात-आठ सौ कहारों ने पंद्रह तोपों तथा तोप के दो-तीन क्विंटल तक भारी गोलों को अपने शारीरिक बल से रन नामक पहाड़ी पर पहुंचा दिया। यह पहाड़ी इतनी तीखी थी कि चढ़ाई में चींटी के पैर भी फिसल जाएं। जब गोलाबारी आरम्भ हुई तो बादशाह की सेना ने पहले ही दिन रणथंभौर दुर्ग के भीतर के भवनों को नष्ट कर दिया। इस प्रकार अकबर का रणथंभौर अभियान बड़ी भीषणता के साथ आरम्भ हुआ।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि राव सुरजन हाड़ा (Rao Surjan Hada) ने जब चित्तौड़ दुर्ग (Chittor Fort) की बर्बादी और किले की रक्षक सेना के अप्रभावी रहने को याद किया, अपने भविष्य को देखा, तो अपने पुत्रों, दूदा एवं भोज को कुछ जमींदारों की मध्यस्थता से शहंशाह को सलाम करने भेजा एवं बादशाह से शरण मांगी।

तब हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) अर्थात् खानेजहाँ रणथंभौर दुर्ग (Ranthambhore Fort) में आया और उसने राव सुरजन को आश्वस्त किया तथा उसे शहंशाह के दरबार में ले आया।

मुल्ला बदायूंनी ने इस दुर्ग पर अकबर (AKBAR) का अधिकार होने का वर्णन बहुत संक्षेप में किया है जबकि अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) का विवरण बदायूंनी के विवरण से अधिक विस्तृत एवं अधिक स्पष्ट है।

अबुल फजल लिखता है कि राव सुरजन हाड़ा ने बादशाह के आने की सूचना पाकर अपने दुर्ग को दृढ़ बना लिया तथा इसमें खाद्य सामग्री भरकर लड़ाई के लिए तैयार हो गया।

बादशाह अकबर ने अपने शिविर में से जो एक घाटी में लगा हुआ था बाहर निकलकर और पहाड़ी पर चढ़कर दुर्ग को देखा और समझ लिया कि उसको जीतने के लिए क्या उपाय सोचें जाएं।

अकबर (AKBAR) की आज्ञा से बख्शियों ने इस पहाड़ी के सब ओर तोपों के मोर्चे लगा दिए। अपार सेना ने इस को घेर लिया। दुर्ग में जाना और वहाँ से बाहर आना बंद कर दिया गया। तोपें निरंतर चलने लगीं। दुर्ग की चौतरफा घेराबंदी अकबर का रणथंभौर अभियान की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा थी।

अबुल फजल लिखता है कि जब रणथंभौर का घेरा चल रहा था, तब मेहंदी कासिम खाँ मक्का से लौटकर आया। उसका चित्त किंचित् विक्षिप्त हो गया था। इसलिए वह गढ़ा से जहाँ का वह शासक था, बिना इजाजत ही चल दिया।

वह लज्जित होकर हज गया तथा वहाँ से ईरान होते हुए कांधार आया और वहाँ से रणथंभौर आकर उसने बादशाह के प्रति अधीनता प्रकट की और उसे इराकी घोड़े भेंट किए। बादशाह ने उसका कृपा-पूर्ण स्वागत किया। उसे खिलअत प्रदान की, सरकार लखनऊ की जागीर प्रदान की तथा उसे भी रणथंभौर के मोर्चे पर नियुक्त कर दिया।

जब बादशाह अकबर की सेना बहुत दिनों तक तोपों से गोलाबारी करती रही और उसका कोई परिणाम नहीं निकला तो बहुत-कुछ विचार करने पर यह विदित हुआ कि साबात के उपयोग के बिना दुर्ग नहीं जीता जा सकता।

इसलिए कासिम खाँ और मीर बहर्रू को आदेश दिया गया कि साबात तैयार करें। राजा टोडरमल को भी साबात के निर्माण की देखभाल करने के लिए नियत किया गया। तब रन की घाटी के निकट एक बड़ा ऊंचा साबात तैयार हो गया। इसके लिए संग-तराशों, लोहारों और खातियों ने बड़ा परिश्रम किया। थोड़े ही समय में साबात किले के बराबर ऊंचा हो गया।

हमने चित्तौड़ दुर्ग के मोर्चे में बादशाह द्वारा बनवाए गए दो मंजिला कोठरियों वाले साबात की चर्चा की थी। वह साबात एक लम्बी सुरंग या छतदार बरामदे जैसा था जिसके भीतर हाथी पर बैठा हुआ सवार अपने हाथ में भाला लेकर चल सकता था।

रणथंभौर में बनाए गए साबात की रचना किसी बरामदे जैसी नहीं थी, अपितु एक ऊँचे चबूतरे या प्लेटफॉर्म या टीले जैसी थी जिस पर चढ़ने के लिए सीढ़ियां भी बनाई गई थीं। इस साबात को इतना ऊंचा बनाया गया था कि उस पर तोपें लगाकर वहाँ से किले के भीतर गोले बरसाए जा सकें।

किसी भी समकालीन लेखक ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि अकबर ने रणथंभौर में कितने साबात बनवाए थे। इस तरह के साबात ईसा के जन्म से लगभग 325 साल पहले भारत पर आक्रमण करने वाले सिकंदर ने भी बनवाए थे जिनके ऊपर खड़े होकर सिकंदर के सैनिक दुर्ग की दीवार पर चढ़ जाते थे और फिर रस्सी बांधकर दुर्ग के भीतर उतर जाते थे।

अबुल फजल लिखता है कि जब बादशाह के आदेश से बनाए जा रहे साबात दुर्ग की ऊंचाई तक पहुंच गए तो पत्थरों और लोहे के गोले फेंकने वाले बड़े-बड़े यंत्र ऊपर चढ़ाए गए।

जहाँ बदायूंनी ने लिखा है कि इन यंत्रों को सैनिकों ने अपने शरीर की ताकत से चढ़ाया था, वहीं अबुल फजल (ABUL FAZAL) बैलों का उल्लेख करते हुए लिखता है कि ऐसा एक यंत्र 400 बैलों से खींचा जाता था। यह सात मन का पत्थर फेंक सकता था और 30 मन लोहे का गोला चला सकता था।

अबुल फजल ने लिखा है कि जब ये यंत्र साबात पर जमा दिए गए तब शहंशाह ने गोलियां और तोपें चलाने का हुक्म दिया। जब ये गोले दुर्ग पर जाकर गिरने लगे तो दुर्ग की प्राचीरों में दरारें पड़ गईं और मकान ढेर हो गए।

अबुल फजल ने लिखा है कि 19 मार्च 1569 को अकबर (AKBAR) ने अपने मंत्रियों से कहा कि यदि दुर्ग रक्षक आज हमारी अधीनता प्रकट करने के लिए नहीं आएंगे तो भी कल तक दुर्ग अपना हो जाएगा। इस प्रकारअकबर का रणथंभौर अभियान पूरे जोश के साथ चलता रहा।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

अकबर की रणथंभौर विजय – रणथंभौर दुर्ग की सोने-चांदी की चाबियां अकबर के पास आ गईं (90)

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अकबर की रणथंभौर विजय - रणथंभौर दुर्ग की सोने-चांदी की चाबियां अकबर के पास आ गईं

मुगल बादशाह अकबर की रणथंभौर विजय ने ही मुगलों के लिए सम्पूर्ण राजपूताने की विजय का वास्तविक मार्ग खोला। अकबर की रणथंभौर विजय ने राजपूत राजाओं को स्पष्ट संदेश दे दिया कि अब अकबर को रोक पाना कठिन है।

 डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव का विवरण

 डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि लगभग डेढ़ माह तक अकबर (AKBAR) रणथम्भौर दुर्ग  (Ranthanhor Fort) पर घेरा डाले पड़ा रहा। इस दौरान दोनों ही पक्षों को अपार जन-धन की हानि हुई। वे लिखते हैं कि रणथंभौर का पतन किस प्रकार हुआ, इस सम्बन्ध में दो मत हैं।

कर्नल टॉड के अनुसार सुरजनराय ने ऐसा प्रबल प्रतिरोध किया कि अकबर (AKBAR) को यह निश्चय करना पड़ा कि इस संघर्ष को अधिक दिनों तक नहीं चलाना चाहिए और हाड़ा सरदार को समझा-बुझाकर किला उससे ले लेना चाहिए।

अकबर की रणथंभौर विजय के सम्बन्ध में दूसरा मत अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) एवं मुल्ला बदायूंनी का है। उनके अनुसार राव सुरजन हाड़ा ने अपने सर्वनाश से घबराकर रणथंभौर का किला बादशाह को समर्पित कर दिया।

अबुल फजल का विवरण

अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल ने लिखा है कि दुर्ग नष्ट होते देखकर राव सुरजन का दिल बैठ गया। उसने दरबारियों के द्वारा बीच-बचाव करवाया और अपने पुत्रों दूदा तथा भोज को बादशाह के दरबार में भेजकर संधि की बात करनी चाही।

दोनों राजकुमारों ने मुगल बादशाह के उच्च अधिकारियों के माध्यम से बादशाह से भेंट की तथा अपने पिता द्वारा किए गए अपराधों की क्षमा मांगी।

इस पर बादशाह अकबर ने राव सुरजन को क्षमा कर दिया तथा दोनों राजकुमारों को खिलअत पहना कर वापस अपने पिता के पास भेज दिया। राव सुरजन ने अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करने के लिए बादशाह से प्रार्थना की कि एक दरबारी उसको ले जाए और से मिलवा दे।

अकबर (AKBAR) ने सुरजन की यह प्रार्थना स्वीकार कर ली और हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) अर्थात् खानेजहाँ को इस काम के लिए नियुक्त किया।

अबुल फजल लिखता है कि जब हुसैन कुली खाँ रणथंभौर दुर्ग के समीप पहुंचा तो राव सुरजन ने बाहर आकर उसका स्वागत किया और फिर वह सबको अपने निवास स्थान पर ले गया।

22 मार्च 1569 को राव सुरजन दुर्ग से बाहर आकर शाही दरबार में हाजिर हुआ और उपयुक्त भेंटों के साथ उसने दुर्ग की चाबियां जो सोने और चांदी की बनी हुई थीं, बादशाह को अर्पित कर दीं।

अबुल फजल लिखता है कि बादशाह द्वारा सुरजन के साथ कृपापूर्ण व्यवहार किया गया जिससे उसको शांति हो गई और वह स्वयं को सुरक्षित समझने लगा।

राव सुरजन ने कुछ दरबारियों द्वारा बादशाह से कहलवाया कि मैं तीन दिन दुर्ग में रहकर अपने कुटुंब आदि को बाहर ले आऊंगा और तत्पश्चात दुर्ग शाही सेवकों को सुपुर्द करके मैं राजधानी आगरा के लिए रवाना हो जाऊंगा। मेरे पुत्र बादशाह के साथ रहेंगे।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है- ‘बादशाह ने राव सुरजन के इस प्रस्ताव को स्वीकार करके उसे वापस किले में जाने की अनुमति दे दी। सुरजन ने तीन दिन पश्चात् रणथंभौर दुर्ग अकबर के सेनानायक मिहतर खाँ के सुपुर्द कर दिया। सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को इस दुर्ग को जीतने में एक वर्ष लगा था परंतु अकबर की रणथंभौर विजय एक महीने में पूरी हो गई।

अगले दिन शहंशाह ने कुछ अंगरक्षकों के साथ किले का मुआइना किया। जब उसने रणथंभौर दुर्ग में प्रवेश किया तो अल्लाह हू अकबर (AKBAR) के नारों से आकाश गूंज उठा।’

जब शहंशाह द्वारा रणथंभौर की व्यवस्था कर दी गई तो खानेजहाँ और मुजफ्फर खाँ को दाहिने मार्ग से राजधानी की ओर प्रस्थान करने को कहा गया और शहंशाह अपने घनिष्ठ दरबारियों के साथ अजमेर-दरगाह की यात्रा पर रवाना हो गया।

मार्ग में वह प्रतिदिन शिकार करता था। अंत में वह अजमेर पहुंच गया और ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में गया और वहाँ के लोगों में रुपए उछाले।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी का विवरण

बदायूंनी के विवरण की चर्चा हम पिछली कड़ी में विस्तार से कर चुके हैं। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी लिखता है कि अकबर (AKBAR) की रणथंभौर विजय पर मौलाना शीरी ने एक कविता लिखी जिसमें उसने लिखा कि जब शहंशाह के सौभाग्य से काफिरों की मजबूती ले ली गई, तब शीरी ने उसकी तारीफ दी- ‘काफिरी तोड़ बादशाह’।

अर्थात् शीरी ने अकबर को पाप को नष्ट करने वाले बादशाह की उपाधि दी।

अकबर की रणथंभौर विजय पर शाह फतहउल्लाह शीराजी के भाई मीर फारिगी ने भी एक कविता लिखी जिसमें उसने कहा-

जब विजय का गुलाब

शाह की फतह वाले बाग में खिला

तो तारीख का ऐलान करने वाले ने कहा

उन्होंने किला जल्दी ही ले लिया।

ब्लॉकमैन का विवरण

ब्लॉकमैन द्वारा अनूदित आईने अकबरी के अनुसार 21 मार्च 1569 को सुरजन हाड़ा, अकबर (AKBAR) की सेवा में उपस्थित हुआ। उसने अकबर को दुर्ग की चाबियां सौंप दीं तथा महाराणा की सेवा छोड़कर अकबर की सेवा स्वीकार कर ली।

अकबर ने सुर्जन हाड़ा को गढ़कण्टक (गढ़कटंगा) का दुर्गपति बना दिया और बनारस तथा चुनार के सूबे भी उसे दे दिए। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी एवं अबुल फजल (ABUL FAZAL) द्वारा लिखे गए ये विवरण हिन्दू लेखकों द्वारा लिखे गए विवरणों से मेल नहीं खाते।

अकबर ने मुगल सल्तनत में रणथंभौर के नाम से एक सरकार का गठन किया। इस सरकार में 73 महाल थे और 60,24,196 बीघा 11 बिस्वा भूमि थी। इस सरकार की कुल राजस्व आय 8,98,245 दम्म थी। अकबर (AKBAR) ने रणथंभौर दुर्ग में शाही टकसाल भी स्थापित की और इसे जगन्नाथ कच्छवाहा को जागीर में दे दिया।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

राव सुरजन हाड़ा के समक्ष नौकर बनकर उपस्थित हुआ अकबर (91)

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राव सुरजन हाड़ा का समर्पण - bharatkaitihas.com
राव सुरजन हाड़ा का समर्पण

जब कुंवर मानसिंह (Kunwar Mansingh) ने अकबर (AKBAR) को राव सुरजन हाड़ा (Rao Surjan Hada) की शर्तें सुनाईं तो अकबर को इन शर्तों पर विश्वास नहीं हुआ। इस पर मानसिंह अकबर को नौकर के रूप में अपने साथ रणथंभौर दुर्ग में ले गया ताकि अकबर अपने कानों से राव सुरजन हाड़ा की शर्तें सुन सके।

अकबरनामा और आइने अकबरी के विवरण

21 मार्च 1569 को मुगल बादशाह अकबर ने रणथंभौर दुर्ग पर अधिकार कर लिया। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी, अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) तथा ब्लॉकमैन ((HEINRICH BLOCHMANN)) द्वारा अनूदित आईने अकबरी के आधार पर हमने विगत कड़ियों में अकबर की रणथंभौर विजय का प्रकरण लिखा था। इन लोगों द्वारा लिखे गए विवरण हिन्दू लेखकों द्वारा लिखे गए विवरणों से मेल नहीं खाते।

हिन्दू लेखकों के विवरण

डॉ. मथुरालाल शर्मा ने कोटा राज्य का इतिहास में लिखा है कि चित्तौड़ विजय से उत्साहित होकर ई.1569 के आरम्भ में बादशाह ने रणथंभौर दुर्ग विजय की तैयारी की। वह एक बार पहले भी विफल हो चुका था। इसलिए खूब सेना सजाई गई। चित्तौड़ विजय के अनुभव से भी काम लिया गया।

रणथंभौर दुर्ग का घेरा

 चारों ओर सुरंग खोदे गए और खाइयों में बारूद भरा गया। वी. ए. स्मिथ ने अकबर AKBAR : The Great Mughal में लिखा है कि उसे अनुमान था कि घेरा बहुत लम्बा चलेगा।

सूर्यमल्ल मीसण ने वंश भास्कर में लिखा है कि कुछ मास तक घेरा जारी रहा। अकबर (AKBAR) इस दुर्ग को तोड़ने के लिये आगरा से भारी भरकम तोपें खींच कर लाया। इन तोपों को खींचने के लिये बैलों की 100-100 जोड़ियां जोती गईं। इन तोपों से 30-30 मन के गोले दुर्ग की प्राचीरों पर बरसाये गये।

लगभग एक माह तक राव सुरजन हाड़ा वीरता पूर्वक अकबर का सामना करता रहा। रणथंभौर दुर्ग के लिये यह पहला अवसर था जब उसने तोप के गोलों का स्वाद चखा था।

जब तोपखाना अप्रभावी रहा तो बादशाह ने दुर्ग की दीवार की ऊंचाई तक साबात बनवाया जहाँ से पत्थर फैंकने की चर्खियों की सहायता से 30 मन भार के लोहे के गोले तथा 60 मन भार के पत्थर के गोले दुर्ग पर फैंके गये।

प्रत्येक चर्खी का संचालन 200 जोड़ी बैल करते थे जो पहाड़ी पर बड़े वेग से भागते थे और चर्खी से छूटा हुआ लोहे या पत्थर का गोला दुर्ग के अन्दर जाकर गिरता था। इससे दुर्ग की एक दीवार टूट गई और उसके अन्दर स्थित कुछ भवन भी नष्ट हो गये।

राजा भगवंतसिंह का प्रस्ताव

वंश भास्कर में लिखा है कि कुछ मास तक घेरा जारी रहा परंतु राव सुर्जन वीरतापूर्वक सामना करता रहा। तब भगवन्तसिंह कछावे (Raja Bhagwant Singh Kachchhwaha) ने अकबर से कहा कि रणथंभौर को जीतना चित्तौड़ जैसा सरल कार्य नहीं है। वहाँ देवयोग से जयमल मारा गया, अन्यथा कई साल तक घेरा जारी रखना पड़ता। अब यहाँ राव सुर्जन की चाही हुई शर्तें मंजूर करके युक्ति-पूर्वक दुर्ग पर अधिकार करना चाहिए।

राव सुर्जन से संधि की बात

वंश भास्कर में लिखा है कि बादशाह ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और मानसिंह ने राव सुर्जन से संधि की बात चलाई।

राव सुर्जन ने सात शर्तें पेश कीं और कहा कि यदि इनको स्वीकार कर लिया जावे तो रणथंभौर दुर्ग समर्पित कर दिया जाएगा। जब अकबर को ये शर्तें सुनाई गईं तो उसको विश्वास नहीं हुआ और उसने कहा कि तुम हिन्दू, हिंदुओं को ही चाहते हो और हमको धोखा देकर कल्पित बात कहते हो।

तब मानसिंह बादशाह को नौकर का वेष धारण करवा कर अपने साथ  सुर्जन के पास गढ़ के अंदर ले गया और उसके सामने शर्तों की बातें होने लगीं। मानसिंह ने सुर्जन से कहा कि इस विषय में हठ न करो और बादशाह का आदेश अपने सिर पर धारण करो।

इस पर राव सुर्जन ने क्रुद्ध होकर अपनी मूँछ पर हाथ रक्खा और कहा कि इस दुर्ग पर आपका अधिकार तभी हो सकता है जब सम्पूर्ण हाड़ा कुल नष्ट हो जाए या मेरे पुरातन-कुल-धर्म की रक्षा हो सके, ऐसी शर्तें आप स्वीकार कर लें।

इस विषय में सविस्तार बातचीत हो चुकने के बाद मानसिंह और अकबर वापस आए और बादशाह ने  शर्तें लिखकर भिजवा दीं। महाकवि सूर्यमल्ल मीसण ने वंश भास्कर में इस संधि का रोचक वर्णन किया है।

राव सुरजन हाड़ा की शर्तें

इन शर्तों में राव सुरजन हाड़ा द्वारा रखी गई समस्त सात शर्तें शमिल थीं। केवल एक शर्त अकबर (AKBAR) द्वारा जोड़ी गई थी। राव सुरजन की शर्तें इस प्रकार थीं-

1. बादशाह को लड़की नहीं दी जायेगी।

2. नौरोजा में बून्दी की रमणियां नहीं जायेंगी।

3. बून्दी नरेश अटक नदी के पार नौकरी करने नहीं जायेगा।

4. शाही महल के दरवाजे तक बून्दी वालों का नक्कारा बजता रहेगा।

5. बून्दी के घोड़ों पर दाग नहीं लगेंगे।

6. बून्दी राज्य में जजिया नहीं लगेगा।

7. बून्दी के राजा किसी अन्य आर्य राजा के नेतृत्व में नहीं लड़ेंगे।

8. बून्दी राज्य में मंदिर नहीं तोड़े जायेंगे।

9. जैसे मुगलों का राज्य दिल्ली है, वैसे हाड़ों की राजधानी बून्दी मानी जायेगी।

रणथंभौर पर अकबर का अधिकार

अकबर (AKBAR) द्वारा जोड़ी गई शर्त इस प्रकार थी- दीवाने आम तथा दीवाने खास में बून्दी नरेश शस्त्र लेकर नहीं जायेगा। संधि हो जाने के पश्चात् 21 मार्च 1569 को राव सुरजन हाड़ा, बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ। उसने बादशाह को दुर्ग की चाबियां सौंप दीं तथा महाराणा की सेवा छोड़कर अकबर (AKBAR) की सेवा स्वीकार कर ली।

देश का दुर्भाग्य

यह देश के लिये बहुत दुर्भाग्य का दिन था। यदि रणथंभौर का दुर्गपति बादशाह अकबर की सेवा में नहीं गया होता तो मेवाड़ के महाराणाओं ने निश्चित रूप से भारत का इतिहास बदल दिया होता। आगे चलकर बूंदी के चौहानों ने मुगलों की जैसी सेवा की, वैसी सेवा तो आम्बेर के कच्छवाहों ने भी नहीं की। इसके बाद 18वीं सदी तक यह दुर्ग मुगलों के अधीन बना रहा।

हिंदुओं को हिंदुओं से ही नष्ट करवाओ

डॉ मथुरालाल शर्मा ने लिखा है कि अकबर ने दस शर्तें स्वीकार करते हुए यह भी आदेश दिया कि रणथंभौर की एवज में राव सुर्जन सात परगने ले सकता है। बादशाह ने मानसिंह के माध्यम से कहलवाया कि यदि और अधिक राज्य की आवश्यकता है तो वह गोंडवाना को विजय कर सकता है।

उस समय तक गोंडवाना पर अकबर का अधिकार नहीं हुआ था। वंश भास्कर के अनुसार राव सुर्जन अकबर (AKBAR) की इस कूटनीतिक चाल को नहीं समझ सका कि बादशाह हिंदुओं को हिंदुओं से ही नष्ट करवाना चाहता है। इसलिए राव ने बादशाह से कहलवाया कि पहले गोंड राज्य को जीतकर बादशाह को भेंट करूंगा, तब मैं बादशाह से सात परगने लूंगा।

रणथंभौर दुर्ग से बहुमूल्य वस्तुओं का निष्कासन

वंश भास्कर लिखता है कि सब बातें निश्चित हो जाने पर राव सुर्जन ने किले में से अपनी सबसे बहुमूल्य सम्पत्ति अर्थात् भगवान विष्णु की दो प्रतिमाएं और दो तोपें निकालीं तथा किला अकबर (AKBAR) के सुपुर्द कर दिया।

 दुर्ग से निकाली गई दोनों प्रतिमाएं बूंदी में स्थापित की गईं जिनमें से एक प्रतिमा बारां के कल्याणराय मंदिर में भेज दी गई। दुर्ग से निकाली गई दो तोपों में से एक का नाम धूलधाणी था और दूसरी का कड़क बीजली।

रणथंभौर दुर्ग पर मुसलमानों के अधिकार

मथुरालाल शर्मा ने लिखा है- ‘इससे पहले मुहम्मद गौरी, इल्तुतमिश और अल्लाउद्दीन खिलजी ने रणथंभौर दुर्ग के स्वामियों को मारकर दुर्ग पर अधिकार किया था, किंतु ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी विदेशी आक्रांता ने रणथंभौर के स्वामी के जीवित रहते ही दुर्ग पर अधिकार किया था।’

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

शेख सलीम चिश्ती ने कहा दूसरी बेगमें ले आओ, क्या फर्क पड़ता है (92)

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शेख सलीम चिश्ती

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अपनी पुस्तक मुंतख़ब-उत-तवारीख़ (Muntakhab-ut-Tawarikh) में बादशाह अकबर तथा शेख सलीम चिश्ती की निकटता का विस्तार से उल्लेख किया है। इस लेख में बदायूंनी  द्वारा किए गए उल्लेखों के आधार पर अकबर तथा शेख सलीम चिश्ती के सम्बन्धों का वर्णन किया गया है।

रणथंभौर विजय के बाद अकबर (AKBAR) ने राव सुर्जन (RAO SURJAN) को गोंड राज्य पर आक्रमण करने का आदेश दिया और स्वयं अजमेर चला गया। अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि शहंशाह जब तक अजमेर में ठहरा, वह प्रतिदिन दरगाह में जाया करता था।

आम्बेर दुर्ग में एक मस्जिद

फिर अपनी राजधानी की ओर रवाना हुआ। मार्ग में जब अकबर आमेर में उतरा तो कच्छवाहा राजा भगवानदास ने उसका स्वागत किया और अकबर को एक भोज दिया तथा उसे अच्छी-अच्छी भेंटें अर्पित कीं।

राजा भारमल ने बादशाह के लिए आम्बेर दुर्ग में एक मस्जिद बनवाई जो आज भी देखी जा सकती है। अकबर को प्रसन्न करने के लिए भारमल ने यद्यपि इस मस्जिद को मुगल शैली में बनाने का प्रयास किया किंतु आम्बेर में मुगलिया शैली के जानकार शिल्पी नहीं थे।

इस कारण इस मस्जिद पर हिन्दू स्थापत्य की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। मस्जिद को बाहर से लाल रंग से पोतकर लाल बलुआ पत्थर से निर्मित होने का आभास दिया गया है क्योंकि अकबर (AKBAR) ने लगभग सभी भवन लाल रंग के पत्थर से बनवाए थे।

इस मस्जिद के प्रवेश द्वार को फारसी शैली के ईवान की तरह बनाने का प्रयास किया गया किंतु उसके ऊपर पत्थर की नक्काशी मुगलिया नक्काशी की जगह हिन्दू अलंकरण की तरह दिखाई देती है।

आम्बेर दुर्ग परिसर में आज भी अच्छी स्थिति में खड़ी इस मस्जिद के मुख्य द्वार के दोनों तरफ तीन-तीन मेहराब बनाए गए हैं तथा मुख्य द्वार के दोनों तरफ एक-एक गुम्बद बनाया गया है।

ये गुम्बद भी फारसी एवं मुगलिया शैली के गुम्बदों के स्थान पर मंदिर के गर्भगृहों के ऊपर बनने वाले शिखरनुमा निर्माण अधिक जान पड़ते हैं जो कि बंद कमल पुष्प की तरह दिखाई देते हैं।

इस भवन के सामने एक-एक पतली मीनार बनाई गई है जो मुगल शैली से बिल्कुल भी मेल नहीं खाती। बादशाह ने इसी मस्जिद में नमाज पढ़ी। वह अपने जीवन काल में दो-तीन बार आम्बेर आया।

कुछ दिन आमेर में रुकने के बाद बादशाह आगरा के लिए चल दिया। मार्ग में उसे दरबार खाँ की मृत्यु की खबर मिली जिससे बादशाह को बड़ा दुःख हुआ।

कुत्ते की कब्र के नीचे

दरबार खाँ की वसीयत के अनुसार उसे उसके स्वामिभक्त कुत्ते की कब्र के नीचे की ओर दफनाया गया जहाँ दरबार खाँ ने अपने लिए पहले से ही एक गुंबद बनवा लिया था।

राव सुरजन द्वारा हिन्दू राजाओं का दमन

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11 मई 1569 को अकबर आगरा पहुंच गया और बंगाली महल में गया जिसका निर्माण हाल ही में हुआ था। उधर राव सुरजन ने गोंड के राजा (GOMD RAJA) पर आक्रमण किया। गोंडों के राजा ने कुछ समय तक तो प्रतिरोध किया किंतु बाद में उसने आत्समर्पण कर दिया। राव सुरजन ने गोंडों की राजधानी बारीगढ़ में बादशाह अकबर (AKBAR) का अधिकार स्थापित करके वहाँ पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में सूरजपोल (SURAJPOL) नामक दरवाजा बनवाया। गोंड का राजा राव सुरजन की बात मानकर अकबर के दरबार में चलने को राजी हो गया। राव सुरजन उसे दिल्ली ले गया तथा उसे बादशाह के समक्ष प्रस्तुत किया। अकबर राव सुरजन के इस कार्य से बड़ा प्रसन्न हुआ और उसने सुरजन को पांच हजार सवारों का मनसब दिया। इस प्रकार राव सुरजन ने अकबर के समक्ष गोंड राज्य जीतने का जो भरोसा दिया था, उसे पूरा किया। वंश भास्कर के अनुसार राव सुर्जन बादशाह से अनुमति लेकर बूंदी गया और उसने बूंदी के निकटवर्ती 26 परगने बूंदी राज्य में मिलाए। बादशाह ने राव सुरजन को बनारस के पास भी 26 परगने प्रदान किए। अकबर ने राव सुर्जन को बनारस (BANARAS) और चुनार (CHUNAR) का हाकिम नियत कर दिया।

कालिंजर का पतन

कालिंजर (KALIANJAR) हिन्दुओं के प्रसिद्ध दुर्गों में से था। यह वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्थित है। अगस्त 1569 में अकबर  ने मजनू खाँ काकशाह को इस दुर्ग पर आक्रमण करने भेजा।

कालिंजर के दुर्गपति रामचन्द्र ने शत्रु का सामना किया परन्तु जब उसे चित्तौड़ तथा रणथम्भौर के पतन की जानकारी मिली तब उसका साहस भंग हो गया और उसने समर्पण कर दिया। अकबर (AKBAR) ने रामचन्द्र से कालिंजर का दुर्ग लेकर उसे इलाहाबाद के निकट एक जागीर दे दी। मजनू खाँ काकशाह को कालिंजर का दुर्गपति नियुक्त किया गया।

इस समय तक बादशाह के कई पुत्र उत्पन्न हो चुके थे किंतु वे सब शैशव अवस्था में ही मर जाते थे। इसलिए अकबर शेखुल इस्लाम अर्थात् सूफी दरवेश शेख सलीम चिश्ती से मिलने सीकरी गया। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अपनी पुस्तक मुंतखब उत् तवारीख में लिखा है कि अकबर बादशाह अपनी एक गर्भवती बेगम को सलीम चिश्ती के मकान में छोड़ आया ताकि उसे दरवेश का आर्शीवाद प्राप्त हो सके।

मुल्ला लिखता है कि अकबर ने सीकरी की पहाड़ी पर शेख के निवास के पास एक भव्य मस्जिद का निर्माण करवाया तथा एक नए दुर्ग की आधारशिला रखी।

अबुल फजल लिखता है कि अकबर बादशाह ने सीकरी में पत्थर की एक ऊंची व काफी बड़ी मस्जिद बनवाई, इतनी बड़ी कि उसे पहाड़ का एक हिस्सा कहा जा सकता है। यह इतनी दुर्लभ थी कि संसार में शायद ही कहीं दिखाई दे।

लगभग पांच साल में यह मस्जिद बनकर तैयार हुई। अकबर ने इस स्थान को फतहपुर नाम दिया। अकबर ने उसमें गुसलखाने एवं दरवाजे आदि भी बनवाए। बादशाह अकबर के अमीरों ने भी इस मस्जिद में मीनारें, बरामदे एवं भव्य महल बनवाए। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने इस मस्जिद के बनवाए जाने पर कविता लिखी, जो इस प्रकार है-

यह किला इस्लाम का गुम्बद है

अल्लाह इसके बनवाने वाले को कीर्ति दे।

गेब्रियल ने तारीख इस प्रकार दी

ऐसा जमीन पर नहीं देखा गया।

जन्नती काबा जन्नत से उतरकर आ गया।

अकबर के दरबारी अशरफ खाँ ने इस मस्जिद की तारीफ करते हुए लिखा- ‘यह मक्का मस्जिद के बाद दूसरी है।’

मुल्ला बदायूंनी ने अकबर (AKBAR) तथा शेख सलीम चिश्ती की निकटता का उल्लेख करते हुए लिखा है कि- ‘शेख ने शहंशाह को अपने घर में बने हुए सभी कमरों में जाने की अनुमति दे दी। इस कारण अकबर किसी भी कमरे में कभी भी चला जाता था।’

इस पर शेख के बच्चे और भतीजे नाराज होकर शेख से शिकायत करते कि बादशाह के बार-बार हमारे कमरों में आने के कारण हमरी बेगमें हमसे परायी होती जा रही हैं।

इस पर शेख उत्तर देता कि संसार में औरतों की कमी नहीं है, मैंने तुम लोगों को अमीर बनाया है, दूसरी बेगमें ले आओ, क्या फर्क पड़ता है?’

शेख के घर की इस स्थिति पर चुटकी लेते हुए मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि या तो महावत से दोस्ती मत करो, या फिर मकान हाथी के अनुकूल बनाओ!

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

सैयद मूसा और मोहिनी की प्रेम-कथा – सौ टका टंच सोने जैसा था मोहिनी का रूप (93)

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सैयद मूसा और मोहिनी

सैयद मूसा और मोहिनी की प्रेम-कथा मुगलों के इतिहास में कोई स्थान नहीं रखती किंतु इस कथा से इतना तो ज्ञात होता ही है कि अकबर के समय में भी मुसलमान शोहदे हिन्दू लड़कियों को अपने प्रेम जाल में फंसा कर उन्हें घर से भगा ले जाते थे।

बादशाह अकबर (AKBAR) ने फतेहपुर सीकरी की पहाड़ी पर एक विशाल मस्जिद तथा किले का निर्माण करवाया। बादशाह द्वारा आगरा को छोड़कर सीकरी पर ध्यान केन्द्रित करने का कारण संभवतः यह था कि सीकरी के सूफी दरवेश शेखुल इस्लाम अर्थात् सलीम चिश्ती से अकबर के सम्बन्ध काफी प्रगाढ़ हो गए थे।

इस कारण बादशाह आगरा छोड़कर फतेहपुर सीकरी में रहने लगा। जिस समय अकबर रणथंभौर के अभियान पर जा रहा था, उस समय आगरा के लाल किले में एक ऐसी घटना घटित हुई जिसका उस काल की राजनीति में अधिक महत्व नहीं है किंतु यह घटना सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में आगरा में लाल किले के भीतर के सामाजिक जन-जीवन पर किंचित् प्रकाश डालती है। संभवतः इसीलिए मुल्ला कादिर ने इस घटना का प्रमुखता से वर्णन किया है।

सैयद मूसा और मोहिनी की प्रेम-कथा

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अपनी पुस्तक मुंतखब उत् तवारीख में लिखा है कि कालपी का शासक सैयद मूसा शहंशाह अकबर (AKBAR) को सलाम करने के लिए आया। वह एक हिन्दू सुनार की पत्नी मोहिनी पर मोहित हो गया। उसका रूप भी सौ टका टंच सोने जैसा था। उसके शुद्ध दृष्टि-जाल ने सैयद को एक प्रेमी की तरह आकृष्ट किया और दोनों ओर से प्रेम बंधन मजबूती के साथ पैदा हो गया।

सैयद मूसा और मोहिनी के चर्चे

कुछ ही दिनों में सैयद मूसा और मोहिनी का यह प्रसंग इतना चर्चित हो गया कि आगरा  की गली-गली में उनकी बात होने लगी। जब रणथंभौर का अभियान शुरु हुआ तो सैयद मूसा पीछे रुक गया। अर्थात् वह बादशाह के साथ रणथंभौर अभियान पर नहीं गया। उसने आगरा के किले के अंदर अपनी प्रेमिका के घर के आसपास जमना किनारे एक मकान किराए पर ले लिया।

यह मकान मीर सैयद जलाल मुवक्किल के घर के पास था। सैयद और मोहिनी का मसला पागलपन के स्तर तक पहुंच गया। सैयद मूसा और मोहिनी की दूरी दो साल चार महीने तक रही, फिर भी वे एक-दूसरे को देखकर संतोष कर लेते। एक-दो बार जब सैयद अपने विश्वसनीय साथियों के साथ प्रेमिका के घर के बाहर गया तो या तो चौकीदारों के हाथों पड़ गया या उसकी जाति के सुनारों के हाथों आ गया।

मोहिनी के परिवार वालों ने सैयद की पिटाई कर दी और मोहिनी को घर से बाहर निकलने पर रोक लगा दी। इस कारण दो साल और चार महीने तक वे दूर से ही एक दूसरे को देखकर संतोष कर लेते।

मोहिनी का सयैद को निमंत्रण

एक रात उस मोहक महिला ने सैयद को रात के समय मकान की छत पर आने के लिए संकेत किया। इस पर सैयद ने रात के समय एक मजबूत कमंद मोहिनी के घर की छत पर फेंकी और नट की तरह उस पर चढ़ गया। इस प्रकार पूरी रात उन्होंने पवित्र प्यार में बिताई। सैयद मूसा के भाई सैयद शाही को जब इस घटना के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने एक कविता लिखी जो इस प्रकार थी-

हृदय में इच्छाओं का कितना भी उबाल आ रहा हो

शालीनता ने सावधान किया, संयमित रहो।

आंखों के आगे जीवन जल का अथाह सागर है

किंतु आपके पीने के लिए एक बूंद भी नहीं।

उनके हृदय दावानल में सीमांत तक जले

किंतु उनके होठ उच्च आदर्श पालन में सिले रहे।

पूर्णतः एकांत का एक स्थान, और दो प्रेमी प्रेमरत

उनके हृदय एकाकार शरीर फिर भी विलग।

यह कविता बहुत लम्बी है, इसका अंत इन शब्दों से हुआ है-

सैंकड़ों प्रेम स्पर्शों एवं फुसलावों के साथ अंततः

उन्होंने हजारों रहस्यों के द्वार खोले

और जब देखा कि प्रभात निकट है

उन्होंने एक दूसरे से अलविदा कहा।

मोहिनी का गृहत्याग

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि विदाई के समय में कुछ ऐसा हुआ कि प्रेमिका ने नींद के आगोश से उठते हुए अपने घर-मकान को अलविदा कह दिया, और लोकलाज छोड़ अपने प्रेमी सैयद के साथ चल पड़ी जैसे चांदनी चांद के साथ और आदमी की छाया आदमी के साथ। सैयद मूसा और मोहिनी की यह कथा आगरा से फतहपुर तक फैल गई और लोग इसे चटखारे लेकर सुनाने लगे।

 मोहिनी ने सैयद से कहा कि मैं जीवन भर तुम्हारे साथ प्रेम-बंधन में रहना चाहती हूँ। हमारे बारे में किसी को पता नहीं चलेगा यदि हम थोड़ी सावधानी रखते हुए छत से नीचे उतर जाएं और सुबह होने से पहले दूर निकल जाएं।

इस पर सैयद उस मोहिनी को अपने साथ लेकर सुनार के घर से निकल गया और अपने घर न जाकर अपने एक मित्र के घर में छिप गया। तीन दिनों तक सैयद मूसा और मोहिनी उस घर में छिपे रहे। अंत में सुनार के घर वालों ने उस स्त्री को ढूंढ लिया।

मोहिनी की गृहवापसी

मुल्ला लिखता है कि सैयद मूसा के घर को महिला के सम्बन्धियों ने अंगूठी की तरह घेर लिया और मूसा पर कई आरोप लगाए। पहले तो उस महिला ने अपने परिवार के साथ वापस लौटने से इन्कार कर दिया किंतु महिला के पिता ने कहा कि यदि तू वापस घर नहीं चलेगी तो हम सैयद की शिकायत हाकिम से करेंगे। हाकिम सैयद को फांसी पर चढ़ा देगा। इस पर महिला को सैयद के जीवन की चिंता हुई और वह अपने पिता के साथ उसके घर चली गई।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि उस महिला ने अपने घर वालों को सुनाने के लिए एक कहानी बनाई कि मैं उस रात को जब गहरी नींद में थी, तब एक रूपवान पुरुष ने जिसको सपने में भी किसी ने न देखा होगा, मुझे हाथ पकड़कर ले गया और मैं सपनों के संसार से कल्पना लोक में चली गई और मेरी नींद जाग में बदल गई। तब मैंने उसके सिर पर एक रत्नजड़ित मुकुट देखा। उसके सीने पर दो प्रकाश-पंख थे।

उसने मुझ पर मंत्रों का उच्चारण किया जैसे कोई तांत्रिक करता है। उसने मुझे अपनी सुंदरता से मोहित कर दिया और मुझे अपने पंखों में समेट लिया। इसके बाद वह मुझे किसी ऐसे नगर में ले गया जैसा नगर परियों की कहानियों में होता है।

उसने मुझे एक ऊंची मीनार में रख दिया जिसमें हर प्रकार की अजीब और अजनबी चीजें रखी हुई थीं। हर कोने में परीजादों की टुकड़ियां तैयार थीं।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि बेवकूफ हिंदुओं ने इस खूबसूरत धोखे पर विश्वास कर लिया। अच्छा होता कि यदि वे इस मसले को छिपाकर रखते किंतु उन्होंने उस खूबसूरत मोहिनी को लोहे की जंजीरों से बांध दिया और ऊपर के कमरे में ताला-चाबी में बंद कर दिया।

इस कारण इस बात की खबर लाल किले में रहने वाले प्रत्येक आदमी को हो गई। लोग चटखारे लेकर यह बात एक-दूसरे को बताने लगे।

मोहिनी का सैयद मूसा को संदेश

एक दिन किसी तरह उस मोहिनी ने सैयद के पास अपनी एक दूती के माध्यम से संदेश भिजवाया कि मैं हजारों परेशानियों और प्रताड़नाओं के बीच बहाने बना-बनाकर और स्पष्टीकरण दे-देकर अपने निंदकों से बच रही हूँ।

जब सैयद को मोहिनी से मिलने की आशा नहीं रही तो वह शहंशाह अकबर (AKBAR) से मिलने के लिए रणथंभौर के लिए रवाना होने की तैयारी करने लगा।

मोहिनी का फिर से गृहत्याग

जब मोहिनी को यह ज्ञात हुआ तो उसने फिर से अपनी दूती को सैयद के पास भेजकर कहलवाया कि तुम शाम के समय भिखारी के भेस में मेरे घर भीख मांगने के लिए आना। उस समय मैं तुम्हें भीख देने के लिए बाहर आउंगी और तुम्हारे साथ निकल जाउंगी।

सैयद ने मोहिनी को ले भागने की तैयारी की और शाम के समय भिखारी का भेस धरकर मोहिनी को भगा लाया। तीन दिनों तक शहर में छिपे रहने के बाद सैयद मूसा और मोहिनी फतहपुर और बिवाना की तरफ रवाना हो गए।

शिवकानपुर के काजी की बदमाशी

सैयद मूसा और मोहिनी जब मार्ग में थे, तब उस औरत के रिश्तेदारों ने उन दोनों को घेर लिया। मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि पहलवान जमाल का दस्ता जो उस समय पुलिस काजी था, आ गया। सैयद ने तलवार लेकर सिपाहियों का सामना किया किंतु घायल होने पर बंदी बना लिया गया।

औरत उसके घर वालों को सौंप दी गई किंतु सैयद को कालपी के निकट शिवकानपुर की जेल में बंद कर दिया गया। वहाँ का काजी पहलवान जमाल, सैयद मूसा का मित्र था।, पहलवान जमाल ने सैयद से कहा कि तू चिंता मत कर मैं स्वयं उस औरत को आगरा से लेकर आता हूँ।

पहलवान जमाल एक घोड़े पर चढ़कर आगरा गया और मौका पाकर उस औरत को घोड़े पर बैठाकर ले आया। जब पहलवान मोहिनी को घोड़े पर चढ़ा रहा था तो मोहिनी के घर वालों ने उसे देख लिया।

वे भी पहलवान के घोड़े के पीछे भागे। अंत में पहलवान का घोड़ा एक नहर के किनारे कीचड़ में जाकर अटक गया। उसकी पीठ पर मोहिनी और पहलवान जमाल काजी का बोझ था।

इसलिए वह कीचड़ में से पैर नहीं निकाल पाया। इस पर मोहिनी जानबूझ कर घोड़े से नीचे गिर पड़ी और पहलवान से बोली कि मेरा जो होगा, सो होगा, तू भाग कर अपनी जान बचा। मेरे प्रेमी से कहना कि मैंने लाख चाहा किंतु भाग्य ने नहीं चाहा इसलिए मैं तुझे नहीं पा सकी।

सैयद मूसा और मोहिनी की मृत्यु

पहलवान भाग गया और मोहिनी फिर से अपने पिता के घर आ गई। जब सैयद ने यह समाचार सुना तो दुःख के कारण उसके प्राण-पंखेरू उड़ गए। सैयद मूसा और मोहिनी की यह करुण गाथा अंततः कब्रगाह तक जा पहुँची।

उसकी लाश कब्रगाह में दफना दी गई। उधर मोहिनी फिर से जंजीरों में बांध दी गई। वह अपनी दूती की सहायता से जंजीरें खोलकर पागलों की तरह घर से निकल भागी और सैयद की कब्र पर जा पहुंची। वह कब्र पर सिर पटक-पटक कर रोने लगी। मोहिनी के घर वालों ने उसे ऐसी हालत में देखा तो वे मोहिनी को अपने साथ लिए बिना चुपचाप अपने घर लौट गए।

अल्लाह मुझे प्रेम के दर्द में रहने देगा

अंत में मोहिनी का क्या हुआ, इस पर मुल्ला बदायूंनी ने कुछ नहीं लिखा है किंतु इस लम्बे प्रकरण का अंत इन शब्दों के साथ किया है- ‘मुझे अल्लाह से आशा है, वह मुझे प्रेम के दर्द में रहने देगा और इसी दर्द में मरने देगा।’

आज भी मर रही हैं मोहिनियाँ

सैयद मूसा और मोहिनी की प्रेम-कथा आज भी भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी तक घटित होती हुई देखी जा सकती है। आज भी सैंकड़ों मोहिनियां प्रतिवर्ष सैयद मूसाओं के प्रेम में पागल होकर अपना और अपने परिवार वालों का जीवन बरबाद करती हैं।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

अकबर की अधीनता स्वीकार करने को लालायित हो उठे हिन्दू राजा (94)

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अकबर की अधीनता स्वीकार करने को लालायित हो उठे हिन्दू राजा

 आम्बेर के राजा भारमल ने ई.1562 में अकबर की अधीनता स्वीकार की थी। ई.1563 में मेड़ता राज्य तथा ई.1564 में जोधपुर राज्य ने भी अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली! ई.1568 में चित्तौड़ का तथा ई.1569 में रणथंभौर का दुर्ग बादशाह अकबर (AKBAR) के अधीन हो गए।

इन दोनों किलों के पतन के बाद ई.1569 के अंतिम महीनों में कालिंजर के राजा रामचंद्र ने भी अकबर की अधीनता स्वीकार करते हुए  अपने दुर्ग की चाबियां अकबर को भिजवा दीं। इस आलेख में हम ई.1570 में बीकानेर एवं जैसलमेर रियासतों द्वारा अकबर  की अधीनता स्वीकार किए जाने की चर्चा करेंगे।

अकबर (AKBAR) की ढेर सारी बेगमों ने कई लड़कों को जन्म दिया था किंतु वे सब शैशव काल में ही मृत्यु को प्राप्त हुए। इस पर अकबर अपनी बेगम मरियम उज्जमानी अर्थात् हीराकंवर के गर्भवती होने पर उसे फतहपुर सीकरी में शेख सलीम चिश्ती के घर में छोड़ आया ताकि बेगम को सूफी दरवेश का आशीर्वाद मिल सके और अकबर को कोई पुत्र प्राप्त हो सके।

अकबर (AKBAR) के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि ऐसा समझा गया कि शेख सलीम चिश्ती की कृपा से ई.1569 में बेगम मरियम उज्जमानी की कोख से एक पुत्र का जन्म हुआ इसलिए शहजादे का नाम सलीम रखा गया। सलीम के जन्म के कुछ समय बाद ही अकबर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के दर्शन करने के लिए पैदल ही अजमेर के लिए रवाना हो गया।

बादशाह अकबर की इस यात्रा का विवरण हम पूर्व की कड़ियों में कर चुके हैं। जिस समय मरियम उज्मानी गर्भवती थी, उस समय अकबर की एक और बेगम गर्भवती थी किंतु उसे शेख सलीम चिश्ती के आशीर्वाद के लिए सीकरी नहीं भेजा गया था। सलीम के जन्म के कुछ दिनों बाद इस बेगम की कोख से एक पुत्री ने जन्म लिया जिसका नाम खानम रखा गया।

जब अकबर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की यात्रा के बाद वापस लौटा, तब शुक्ल पक्ष चल रहा था और आकाश साफ होने से रात्रि में चंद्रमा बड़ी तेजी से चमकता था।

इसलिए अकबर (AKBAR) ने चंद्रमा के प्रकाश में शिकार खेलने की योजना बनाई। वह रात होते ही जंगलों में चला जाता और जंगलों में निर्भय होकर आराम करते हुए हिरणों को मार डालता। इस शिकार में अकबर (AKBAR) का बड़ा मनोरंजन हुआ जिसके बारे में उसके दरबारी लेखक ने विस्तार से लिखा है।

ई.1570 में शहजादे मुराद का जन्म हुआ। इस पर अकबर (AKBAR) पुनः अजमेर की यात्रा पर गया। इसी वर्ष उसने अजमेर के मैदानी दुर्ग का जीर्णोद्धार करने के आदेश दिए। यह एक प्राचीन हिन्दू किला था किंतु इस जीर्णोद्धार के बाद इसे अकबर का किला कहा जाने लगा।

इसी यात्रा के बाद अकबर नागौर गया था। नागौर के सूबेदार ने अकबर के स्वागत में एक शानदार भोज का आयोजन किया जिसमें मुगल अधिकारियों के साथ-साथ बहुत से हिन्दू राजाओं एवं जागीरदारों को भी बुलाया गया ताकि वे अकबर की अधीनता स्वीकार कर सकें।

अकबर की नागौर यात्रा का उल्लेख कुछ पिछले आलेखों में भी हुआ है। बीकानेर तथा जैसलमेर के राजाओं ने नागौर में ही अकबर की अधीनता स्वीकार करके मुगलों से अधीनस्थ मित्रता स्थापित कर ली।

जोधपुर का अपदस्थ राव चंद्रसेन भी अकबर से मिलने के लिए नागौर आया। वह छः साल से जोधपुर से बाहर भाद्राजून की पहाड़ियों में रहकर अकबर की सेनाओं से संघर्ष कर रहा था।

अकबर बादशाह ने राव चंद्रसेन से कहा कि वह अकबर की अधीनता स्वीकार कर ले किंतु राव चंद्रसेन ने बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया तथा फिर से भाद्राजून की पहाड़ियों में चला गया।

राजपूताना राज्यों में अब केवल सिसोदिये ही अपनी स्वतंत्र सत्ता बनाए हुए थे जिनमें मेवाड़ और उसके अधीनस्थ राज्य डूंगरपुर, बांसवाड़ा तथा प्रतापगढ़ सम्मिलित थे। इन सभी राज्यों के राजा चित्तौड़ के सिसोदिया कुल से निकले थे तथा मेवाड़ राज्य के अधीन थे। ये अकबर की अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।

अकबर (AKBAR) के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि कजली के राजा का दूत अकबर के दरबार में आया। यह राज्य मलाबार के समीप स्थित था। वहाँ का राजा अपने देश और धन के लिए प्रसिद्ध था।

उसे जोगियों से बड़ा लाभ पहुंचा था इसलिए वह उनका सम्मान करता था और उनके जैसे ही कपड़े पहनता था। अबुल फजल लिखता है कि कजली का राजा बहुत अरसे से बादशाह की सेवा में भेंट भेजने का विचार कर रहा था परंतु दूरी के कारण और अन्य भौगोलिक कठिनाइयों के कारण वह अपनी इच्छा पूरी नहीं कर पा रहा था।

कजली के राज-सेवकों में से कोई व्यक्ति इतनी दूर आने को तैयार नहीं था। कजली के राजा के एक मंत्री के पुत्र ने यह काम करना स्वीकार किया।

कजली के राजा ने मंत्री के पुत्र को बादशाह अकबर के लिए बहुमूल्य उपहार दिए तथा उससे कहा कि मेरे पास एक चमत्कारी चाकू है जो कजली देश के प्राचीन वैद्य ने बनाया है। प्रत्यक्ष रूप में इस चाकू में कोई गुण नहीं है परंतु इसको जिसे भी छुआ जाए उसकी सूजन दूर हो जाती है। तुम इस चाकू को ले जाओ और अकबर (AKBAR) को भेंट करना।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि कजली का राजदूत अकबर (AKBAR) की राजधानी आ गया परंतु बहुत अर्से तक वह बादशाह के दरबार में उपस्थित नहीं हो सका। फिर उसका परिचय राजा बीरबल से हुआ।

बीरबल ने कजली के राजदूत का परिचय बादशाह से करवाया। कजली के राजदूत ने वह चाकू बादशाह को भेंट किया तथा उसे चाकू के रहस्य के बारे में बताया। इस पर अकबर ने राजदूत पर कृपा करके उसे पुरस्कार दिया। इसके बाद कजली का राजदूत अकबर (AKBAR) से अनुमति लेकर अपने देश को लौट गया।

अबुल फजल लिखता है कि यह चाकू अब तक शाही-कोष में रखा हुआ है। मैंने स्वयं बादशाह से सुना है कि इससे 200 से अधिक रोगियों को लाभ हो चुका है।

हालांकि बदायूंनी ने इस घटना का उल्लेख नहीं किया है किंतु इस घटना से यह स्पष्ट हो जाता है कि अकबर के उत्तर भारत विजय अभियानों की चर्चा अब दक्षिण भारत में मलाबार प्रांत तक होने लगी थी और उस क्षेत्र के राजा भी अकबर (AKBAR) अकबर की अधीनता स्वीकार करने को लालायित हो उठे थे।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

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