Sunday, August 31, 2025
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हुमायूँ कालीन स्थापत्य

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हुमायूँ कालीन स्थापत्य

हुमायूँ कालीन स्थापत्य कुछ मस्जिदों तक सीमित था। उसने दिल्ली के पुराने किले में निवास स्थापित करने के लिए उसका परकोटा मरम्मत करवाया तथा वहाँ एक पुस्तकालय भी बनवाया।

बाबर के पुत्र नासिरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ ने ई.1533 में दिल्ली में यमुना के किनारे दीनपनाह नामक नवीन नगर का निर्माण आरम्भ करवाया। यह नगर ठीक उसी स्थान पर निर्मित किया गया जिस स्थान पर पाण्डवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ स्थित थी। इस परिसर से मौर्य एवं गुप्तकालीन मुद्राएं, मूर्तियाँ एवं बर्तन आदि मिले हैं तथा भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर भी मिला है जिसे कुंती का मंदिर कहा जाता है।

दीनपनाह नामक शहर में हुमायूँ ने अपने लिए कुछ महलों का निर्माण करवाया। इन महलों के निर्माण में स्थापत्य-सौंदर्य के स्थान पर भवनों की मजबूती पर अधिक ध्यान दिया गया। जब ई.1540 में शेरशाह सूरी ने हुमायूँ का राज्य भंग कर दिया तब शेरशाह ने दीनपनाह को नष्ट करके उसके स्थान पर एक नवीन दुर्ग का निर्माण करवाया जिसे अब दिल्ली का पुराना किला कहते हैं।

दीनपनाह के भीतर शेरमण्डल नामक एक भवन है। इसका निर्माण हुमायूँ ने अपने लिए पुस्तकालय के रूप में करवाया। शेरशाह सूरी कि समय में यह शेरमण्डल कहलाने लगा। यह अष्टकोणीय एवं दो मंजिला भवन है जो एक कम ऊँचाई के चबूतरे पर टावर की आकृति में खड़ा किया गया है। इसके निर्माण में लाल बलुआ पत्थर काम में लिया गया है।

हुमायूँ ने आगरा में एक मस्जिद बनवाई थी जिसके भग्नावशेष ही शेष हैं। इसकी मीनारें भी ध्वस्त प्रायः हैं जिसके कारण इसकी स्थापत्य सम्बन्धी विशेषताओं को समझा नहीं जा सकता। हिसार के फतेहाबाद कस्बे में भी हुमायूँ ने एक मस्जिद बनवाई जिसे हुमायूँ मस्जिद कहा जाता है। हुमायूँ ने यह मस्जिद दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगक द्वारा निर्मित लाट के निकट बनवाई।

मस्जिद में लम्बा चौक है। इस मस्जिद के पश्चिम में लाखौरी ईंटों से बना हुआ एक पर्दा है जिस पर एक मेहराब बनी हुई है। इस पर एक शिलालेख लगा हुआ है जिसमें बादशाह हूमायूँ की प्रशंसा की गई है। यह मस्जिद ई.1529 में बननी शुरु हुई थी किंतु हुमायूँ के भारत से चले जाने के कारण अधूरी छूट गई। ई.1555 में जब हुमायूँ लौट कर आया तब इसका निर्माण पूरा करवाया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख : मुगल स्थापत्य कला

अ. मुगल स्थापत्य कला की विशेषताएँ

ब. बाबर कालीन स्थापत्य

स. हुमायूँ कालीन स्थापत्य

द. अकबर कालीन स्थापत्य

य. जहाँगीर कालीन स्थापत्य

र. शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

ल. ताजमहल का स्थापत्य

व. औरंगजेब कालीन स्थापत्य

स्वामी विवेकानन्द

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स्वामी विवेकानन्द

शिकागो सम्मेलन में स्वामी विवेकानन्द ने कहा- मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूँ जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं।           

स्वामी विवेकानन्द ने हिन्दू-धर्म का प्रतिपादन ब्रह्मसमाज और आर्य समाज की अपेक्षा अधिक मनोबल एवं सम्मान से किया। राजा राममोहन राय हिन्दू-धर्म के लिये क्षमायाचक से अधिक नहीं थे। भारतीय हिन्दू-धर्म को उन्होंने पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में देखा।

स्वामी दयानन्द ने वेदों में निहित ज्ञान को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया तथा ईसाई मिशनरियों के आरोपों का प्रत्युत्तर दिया। स्वामी विवेकानन्द ने समस्त वेदान्त की सैद्धान्तिक व्याख्या करके हिन्दू-धर्म को पाश्चात्य धर्म में उपलब्ध ज्ञान से उच्चतर बताया। 

स्वामी विवेकानन्द, रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के दत्त परिवार में हुआ। बचपन में उनका नाम नरेन्द्र दत्त था। उन्होंने एक अँग्रेजी कॉलेज से बी. ए. की डिग्री प्राप्त की। उन पर यूरोप के बुद्धिवाद और उदारवाद का भारी प्रभाव था। उन्होंने जॉन स्टुअर्ट मिल, हर्बर्ट, स्पेन्सर, रूसो जैसे पाश्चात्य दार्शनिकों का गहन अध्ययन किया।

उनमें उच्चकोटि की बौद्धिकता के साथ-साथ जिज्ञासा-भाव भी प्रबल था। आरम्भ में वे ब्रह्मसमाज की ओर आकर्षित हुए किन्तु ब्रह्मसमाज के उपदेशक, उनकी आध्यात्मिक जिज्ञासा शान्त नहीं कर सके। किसी सम्बन्धी के कहने पर ई.1881 में उन्होंने दक्षिणेश्वर मंदिर जाकर स्वामी रामकृष्ण परमहंस से भेंट की।

रामकृष्ण परमहंस परम्पारगत हिन्दू-धर्म के प्रतीक थे, जबकि नरेन्द्र दत्त पश्चिमी शिक्षा, तर्क, विचार और बुद्धिवाद में विश्वास करने वाले थे। रामकृष्ण के सम्पर्क से नरेन्द्र के जीवन की दिशा ही बदल गई। स्वामी रामकृष्ण की मृत्यु के बाद उनके बहुत से शिष्य अपने-अपने घरों को चले गये किन्तु नरेन्द्र दत्त ने अपने तीन-चार साथियों के साथ काशीपुर के निकट बारा-नगर में एक टूटे हुए मकान में रहना आरम्भ किया।

ई.1887 में प्रथम बार इस मठ को, धार्मिक रूप में स्थापित किया गया। उस समय मठ के 12 सदस्यों ने वैदिक क्रियाओं के अनुसार सन्यास ग्रहण किया और अपने नाम भी बदल लिये। उसी समय नरेन्द्र दत्त का नाम स्वामी विवेकानन्द रखा गया।

शिकागो सर्व-धर्म-सम्मेलन में स्वामी विवेकाननन्द

संन्यास ग्रहण करने के बाद स्वामी विवेकानन्द ने भारत भ्रमण किया। जब वे कन्याकुमारी पहुँचे तो उन्हें ज्ञात हुआ कि अमेरिका के शिकागो नगर में विश्व के समस्त धर्मों की एक सभा हो रही है। ई.1893 में बड़ी कठिनाई से वे अमेरिका पहुँचे। इस सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने हिन्दुत्व के उज्वल पक्ष को इतने प्रभावशाली ढंग से विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया कि सम्पूर्ण विश्व में हिन्दू-धर्म की धूम मच गई। विश्व स्तर पर इस तरह का कार्य इससे पहले कभी नहीं हुआ था। स्वामी विवेकानंद की इस विदेश यात्रा के तीन मुख्य उद्देश्य थे-

(1.) स्वमी विवेकानंद इस यात्रा के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व को यह संदेश देना चाहते थे कि विश्व के समस्त धर्म, एक ही धर्म के विभिन्न अंग हैं। सम्पूर्ण विश्व में एक प्रकार की धार्मिक एकता का भाव जागृत होना चाहिए।

(2.) विवेकानंद अँग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीयों के समक्ष यह उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते थे कि यदि भारतवासी स्वयं को ऊँचा उठायें तो पश्चिम के सुशिक्षित एवं सुसम्पन्न लोग भी भारतीयों का आदर करने के लिये विवश होंगे।

(3.) विवेकानंद भारतीयों के इस भय को दूर करना चाहते थे कि समुद्र-यात्रा करने तथा विदेशियों के हाथ का अन्न-जल ग्रहण करने से धर्म और जाति नष्ट हो जाते हैं।

शिकागो नगर के सर्व-धर्म-सम्मेलन में स्वामीजी ने हिन्दू-धर्म के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया। उन्होंने सम्मेलन में जिस ज्ञान, जिस उदारता, जिस विवेक और जिस वाक्शक्ति का परिचय दिया, उससे विश्व भर से आये लोग विस्मित रह गये। उनके भाषणों ने श्रोताओं को मन्त्र-मुग्ध किया।

जब स्वामी विवेकानन्द ने अपने प्रथम भाषण में अमेरिका वासियों को ‘भाइयो और बहिनो!’ कहकर सम्बोधित किया तो विश्व के आश्चर्य का पार न रहा कि एक मानव संसार के समस्त मनुष्यों का भाई हो सकता है। उनके देश में सार्वजनिक आयोजनों में माई फैलो सिटीजन्स अथवा माई फैलो कन्ट्रीमैन कहने की परम्परा थी। इस सम्बोधन से एक मानव का दूसरे मानव से कोई आत्मिक सम्बन्ध स्थापित नहीं होता था। इसलिये स्वामीजी द्वारा कहे गये- ‘ब्रदर्स एण्ड सिस्टर्स!’ सम्बोधन का बड़ी देर तक भारी करतल-ध्वनि से स्वागत हुआ।

इस सम्मेलन की सभाएँ प्रतिदिन होती थीं। स्वामीजी ने अपने भाषण सभा के अन्त में ही दिये, क्योंकि सारी जनता उन्हीं का भाषण सुनने के लिए अन्त तक बैठी रहती थी। उन्होंने हिन्दू-धर्म की उदारता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिन्दुत्व के शब्दकोष में असहिष्णु शब्द ही नहीं है। हिन्दू-धर्म का आधार शोषण, रक्तपात या हिंसा नहीं है, वरन् प्रेम है।

स्वामीजी ने वेदान्त के सत्य पर भी प्रकाश डाला। जब तक सम्मेलन समाप्त हुआ, तब तक स्वामीजी अपना तथा भारत का प्रभाव अमेरिका में अच्छी तरह स्थापित कर चुके थे। स्वामीजी के भाषणों की प्रशंसा में अमेरिका के समाचार पत्र द न्यूयार्क हेराल्ड ने लिखा- ‘सर्व-धर्म-सम्मेलन में सबसे महान् व्यक्ति विवेकानन्द हैं। उनका भाषण सुन लेने पर अनायास ही यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि ऐसे ज्ञानी, देश को सुधारने के लिए धर्म-प्रचारक भेजने की बात कितनी मूर्खतापूर्ण है!’

इस सम्मेलन के बाद स्वामी विवेकानन्द लगभग तीन वर्ष तक विदेशों में वेदान्त पर भाषाण करते रहे। उनके भाषणों, वार्तालापों, लेखों और वक्तव्यों के द्वारा यूरोप व अमेरिका में हिन्दू-धर्म और संस्कृति की प्रतिष्ठा स्थापित हुई। फरवरी 1896 में उन्होंने न्यूयार्क में वेदान्त सोसायटी की स्थापना की जिसका लक्ष्य वेदान्त का प्रचार करना था।

अमेरिका में उनके अनेक अनुयायी हो गये जो चाहते थे कि कुछ भारतीय धर्म-प्रचारक, अमेरिका में भारतीय दर्शन तथा वेदान्त का प्रचार करें और उनके अमेरिकी शिष्य भारत जाकर विज्ञान और संगठन का महत्त्व सिखायें।

स्वामी विवेकानन्द ने भारत लौटकर मई 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की तथा 1 जनवरी 1899 को वेलूर में मिशन का मुख्यालय स्थापित किया। जून 1899 में वे दूसरी बार अमेरिका गये तथा लॉस एंजिल्स, सैनफ्रांसिस्को, केलिफोर्निया आदि विभिन्न नगरों में वेदान्त सोसायटी की स्थापना की। यहाँ से वे एक धार्मिक सम्मेलन में भाग लेने पेरिस गये जहाँ उन्होंने हिन्दू-धर्म पर भाषण दिया। अपने विदेश प्रवास में स्वामीजी ने हिन्दू-धर्म का व्यापक प्रचार किया।

प्रायः डेढ़ सौ वर्षों से ईसाई धर्म प्रचारक विश्व में हिन्दुत्व की आलोचना एवं निन्दा कर रहे थे। उन आलोचनाओं और निंदाओं पर विवेकानंद ने रोक लगा दी। जब भारतवासियों को ज्ञात हुआ कि समस्त पश्चिमी जगत् स्वामीजी के मुख से हिन्दुत्व का आख्यान सुनकर गद्गद् हो रहा है, तब हिन्दू भी अपने धर्म और संस्कृति के गौरव का अनुभव करने लगे।

ई.1900 में स्वामीजी सम्पूर्ण यूरोप का दौरा कर पुनः भारत लौटे। अब उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था। इसी कारण वे बनारस गये। वहाँ से कलकत्ता वापिस आने पर उनका स्वास्थ्य फिर खराब हो गया और 4 जुलाई 1902 को मात्र 39 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

स्वामी विवेकानंद द्वारा हिन्दू-धर्म के लिये की गई सेवाओं की प्रश्ंसा करते हुए रामधारीसिंह दिनकर ने लिखा है- ‘हिन्दुत्व को लीलने के लिए अँग्रेजी भाषा, ईसाई धर्म ओर यूरोपीय बुद्धिवाद के पेट से जो तूफान उठा था, वह स्वामी विवेकानन्द के हिमालय जैसे विशाल वृक्ष से टकराकर लौट गया। हिन्दू जाति का धर्म है कि वह जब तक जीवित रहे, विवेकानन्द की याद उसी श्रद्धा से करती जाये, जिस श्रद्धा से वह व्यास और वाल्मीकि को याद करती है।’

स्वामी विवेकानंद के धार्मिक सुधार

स्वामी विवेकानन्द ने विश्व धर्म सम्मेलन में विश्व के समस्त धर्मों की सत्यता में विश्वास व्यक्त किया। उन्हें जितनी आस्था वेदों में थी, उतनी ही आस्था उपनिषदों, पुराण, रामायण, महाभारत आदि ग्रंथों में भी थी। उन्हें ईश्वर के निराकार रूप की उपासना में जितनी रुचि थी, उतनी ही साकार रूप में थी। उन्होंने धार्मिक उदारता, समानता और सहयोग पर बल दिया। उन्होंने धार्मिक झगड़ों का मूल कारण बाहरी चीजों पर अधिक बल देना बताया। उनके अनुसार सिद्धान्त, धार्मिक क्रियाएँ, पुस्तकें, मस्जिद तथा गिरजाघर, ईश्वरीय उपासना के साधन मात्र हैं। इस कारण इन पर अधिक बल नहीं देना चाहिये।

स्वामी विवेकानन्द ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा- ‘धर्म मनुष्य के भीतर निहित देवत्व का विकास है; धर्म न तो पुस्तकों में है, न धार्मिक सिद्धान्तों में। यह केवल अनुभूति में निवास करता है…….

….. मनुष्य सर्वत्र अन्न ही खाता है किन्तु हर देश में अन्न से भोजन तैयार करने की विधियाँ अनेक हैं। इसी प्रकार धर्म मनुष्य की आत्मा का भोजन है और देश-देश में उसके भी अनेक रूप हैं। इससे यह स्पष्ट है कि समस्त धर्मों में मूलभूत एकता है, यद्यपि उसके स्वरूप भिन्न हैं। उन्होंने अन्य धर्म-प्रचारकों को बताया कि भारत ही ऐसा देश है जहाँ कभी धार्मिक भेदभाव नहीं हुआ। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म-परिवर्तन से कोई लाभ नहीं है, क्योंकि प्रत्येक धर्म का लक्ष्य समान है। उन्होंने ईसाई धर्म के अनुयायियों को स्पष्ट किया कि भारत में ईसाई धर्म के प्रचार से उतना लाभ नहीं हो सकता जितना पश्चिमी औद्योगिक तकनीकी तथा आर्थिक ज्ञान से हो सकता है। भारत पर विजय राजनीतिक हो सकती है, सांस्कृतिक नहीं।’

स्वामी विवेकानन्द ने हिन्दू समाज को सन्देश दिया कि हिन्दू राष्ट्र, विश्व का शिक्षक रहा है और भविष्य में भी रहेगा। प्रत्येक हिन्दू को अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा करनी चाहिये और साथ ही पाश्चात्य शिक्षा को भी अपनाना चाहिये अन्यथा हमारा उत्थान सम्भव नहीं है। उन्होंने दर्शन के सत्य की सुन्दर ढंग से व्याख्या की और बताया कि वेदान्त की आध्यात्मिकता के बल पर भारत सारे विश्व को जीत सकता है।

 विवेकानन्द वेदान्त की परम्परागत व्याख्या से सहमत नहीं थे। भारतीय संत, सांसारिक जीवन से विमुख होकर ध्यान-समाधि द्वारा ब्रह्म से साक्षात्कार का उपदेश देते थे किन्तु विवेकानन्द ने कहा कि ब्रह्म से साक्षात्कार करने के लिए सांसारिक जीवन से विमुख होना अनुचित है। सच्ची ईश्वरोपासना यह है कि हम अपने मानव बन्धुओं की सेवा में अपने आपको लगा दें।

स्वामी विवेकानन्द ने दीन-दुःखी तथा दरिद्र मानव को ईश्वर का रूप बताया और उसके लिए दरिद्रनारायण शब्द का प्रयोग किया। जब पड़ौसी भूखा हो तब मन्दिर में भोग चढ़ाना पुण्य नहीं, अपितु पाप है। स्वामीजी की इन घोषणाओं ने धार्मिक क्षेत्र में क्रान्ति उत्पन्न कर दी। जो लोग पश्चिम की भौतिकता तथा बुद्धिवाद से प्रभावित होकर ईसाइयत अथवा नास्तिकता की ओर दौड़ रहे थे, वे फिर से हिन्दू-धर्म में विश्वास करने लगे।

स्वामी विवेकानंद की मान्यता थी कि- ‘तुम समस्त व्यक्तियों की विचारधारा को एक नहीं कर सकते, यह सत्य है और मैं इसके लिए ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ। विचारों की भिन्नता और संघर्ष से ही नवीन विचार जन्म लेते हैं।’

स्वामी विवेकानन्द के समाज सेवा कार्य

(1.) मानवमात्र की सेवा को प्राथमिकता

स्वामी विवेकानंद ने अपने उपदेशों में मानव मात्र की सेवा को सबसे महत्त्वपूर्ण बताया। वे शिक्षा, स्त्री-पुनरुद्धार तथा आर्थिक प्रगति के पक्षधर थे। उन्होंने रूढ़िवाद, अन्धविश्वास और अशिक्षा की आलोचना की तथा कहा- ‘जब तक करोड़ों व्यक्ति भूखे और अज्ञानी हैं, तब तक मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को देशद्रोही मानता हूँ, जो उन्हीं के खर्च पर शिक्षा प्राप्त करता है किन्तु उनकी परवाह बिल्कुल नहीं करता।’ उन्होंने हिन्दू सन्यासियों को संकीर्णता से निकलकर मानव मात्र की सेवा करने को कहा।

(2.) देशवासियों के उत्थान हेतु नर्क में रहना स्वीकार

स्वामी विवेकानंद की मान्यता थी कि देश की गरीबी को दूर करना आवश्यक है। वे कहते थे कि देशवासियों के उद्धार के पुनीत कार्य के लिये उन्हें मोक्ष छोड़कर नरक में भी जाना स्वीकार है।

(3.) अस्पश्र्यता का विरोध

स्वामीजी छुआछूत के घोर विरोधी थे तथा जन्म पर आधारित वर्ण-भेद को नहीं मानते थे। उन्होंने अन्ध-विश्वासी और छुआछूत में विश्वास करने वाले सन्यासियों और ब्राह्मणों की तीव्र आलोचना की। वे थियोसॉफिकल सोसायटी से भिन्न विचार रखते थे, क्योंकि थियोसॉफिकल सोसायटी अन्ध-विश्वासों और तन्त्र-विद्या को प्रोत्साहन दे रही थी।

(4.) आध्यात्मिकता से आत्म-निर्माण

स्वामी विवेकानंद सामाजिक सुधारों में विश्वास नहीं करते थे। उनका कहना था कि आध्यात्मिकता से आत्म-निर्माण होता है जिससे देश की सामाजिक और आर्थिक प्रगति सम्भव है। आध्यात्मिक उन्नति के माध्यम से वे मनुष्य को मनुष्य बनाना चाहते थे और उसी को प्रगति मानते थे।

(5.) संगठित प्रयत्नों पर बल

विवेकानंद ने जन-कल्याण के लिये संगठित प्रयत्नों पर बल दिया तथा रामकृष्ण मिशन की स्थापना की जहाँ दीन-दुखियों की सहायतार्थ विभिन्न जातियाँ, वर्ग और धर्म मिल सकते थे। उनका कहना था कि गरीबों की सहायता करना ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग में एक यज्ञ होगा। विवेकानन्द की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि उन्होंने सन्यासियों के समक्ष व्यक्ति-निष्ठ मोक्ष की अपेक्षा समाज सेवा का आदर्श प्रस्तुत किया।

(6.) भारतीयों में आत्म-सम्मान की उत्पत्ति

स्वामी विवेकानंद ने पश्चिमी देशों में हिन्दुओं की आध्यात्मिक उपलब्धियों की चर्चा करके हिन्दुओं की हीन भावना को समाप्त करने का प्रयास किया। भारतीयों में आत्म-विश्वास उत्पन्न करना स्वामीजी की महान् देन है।

स्वामी विवेकानन्द द्वारा राष्ट्रीयता का निर्माण

स्वामी विवेकानन्द ने राष्ट्रीयता के निर्माण में विपुल योगदान दिया। उन्होंने हिन्दू-धर्म और आध्यात्मवाद की श्रेष्ठता को स्थापित करके हिन्दुओं में आत्मगौरव और देश-प्रेम उत्पन्न किया। उन्होंने वेदान्त की व्याख्याओं के माध्यम से यह सिद्ध किया कि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में ईश्वर की ज्योति देख सकता है। जिस प्रकार ईश्वर सदा स्वतन्त्र है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति भी सदा स्वतन्त्र है।

पश्चिमी राजनीति तथा अन्य संस्थाओं के पीछे जो भारतीय दौड़ रहे हैं, उन्हें ध्यान रखना चाहिये कि पश्चिमी देशों में व्यापक असन्तोष है, जबकि उनके यहाँ वे संस्थाएँ कई पीढ़ियों से चल रही है। स्वामी विवेकानन्द ने देश में सांस्कृतिक चेतना की जो धारा प्रवाहित की, उस पर भारतीय राष्ट्रीयता का भव्य भवन खड़ा किया जा सका।

उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता के बल से विश्व पर सांस्कृतिक विजय प्राप्त की जा सकती है किन्तु जब तक भारत दासता की बेड़ियों से जकड़ा हुआ है, वह इस महत्त्वपूर्ण भूमिका को नहीं निभा सकता। उनकी मान्यता थी कि भारत की राजनैतिक स्वतन्त्रता विश्व मानवता के उद्धार के लिये अनिवार्य है। उन्होंने भारतीयों में राजनीतिक स्वाधीनता की भावना जागृत की।

स्वामीजी ने भगवद्गीता के कर्मयोगी श्रीकृष्ण को भारतीय राष्ट्र का आदर्श बताया। वास्तव में विवेकानंद ने देशभक्ति और समाज सेवा के जिन आदर्शों का प्रतिपादन किया, उनसे भारत में देश-प्रेम की भावना नये सिरे से विकसित हुई।

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है- ‘यदि कोई भारत को समझना चाहता है तो उसे विवेकाननद को पढ़ना चाहिए।’

महर्षि अरविन्द ने लिखा है- ‘पश्चिमी जगत में विवेकानन्द को जो सफलता मिली, वही इस बात का प्रमाण है कि भारत केवल मृत्यु से बचने को जागृत नहीं हुआ है, एक बार इस हिन्दू सन्यासी को देख लेने के पश्चात् उसे और उसके संदेश को भुला देना कठिन है।’

विवेकानंद की मृत्यु के बाद उनके द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन ने उनके महान् कार्यों को आगे बढ़ाया। इस संस्था के द्वारा अँग्रेजी भाषा का मासिक प्रबुद्ध भारत तथा बंगाली भाषा का पाक्षिक उद्बोधन प्रकाशित गए। कई ग्रन्थों में स्वामी विवेकानन्द के भाषणों का प्रकाशन हुआ। रामकृष्ण मिशन की शाखाएँ भारत के विभिन्न नगरों में विद्यमान हैं तथा विविध प्रकार के कल्याणकारी कार्य यथा- चिकित्सालय, अनाथालय, विद्यालय, वाचनालय आदि का संचालन कर रही हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख : उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज-सुधार आंदोलन

भारतीय पुनर्जागरण

राजा राममोहन राय और उनका ब्रह्मसमाज

युवा बंगाल आन्दोलन

केशवचन्द्र सेन का भारतीय समाज

आत्माराम पाण्डुरंग और प्रार्थना समाज

स्वामी श्रद्धानंद का शुद्धि आंदोलन

रामकृष्ण परमहंस

स्वामी विवेकानन्द

थियोसॉफिकल सोसायटी

विभिन्न सम्प्रदायों में सुधार आंदोलन

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन

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समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन

उन्नीसवीं एवं बीसवीं शताब्दी ईस्वी में चले समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन करते समय इस बात पर विचार अवश्य किया जाना चाहिए कि उस समय देश पराधीन था और सीमित साधनों के बीच जो भी व्यक्ति या संगठन जितना कुछ भी कर पाया, उसका मूल्य किसी भी तरह कम नहीं था।

19वीं शताब्दी के मध्य में समाज सुधार आन्दोलन व्यक्तिगत प्रयत्नों तक सीमित रहा किन्तु ई.1880 के बाद कुछ संगठित प्रयास किए गए। विधवा-विवाह और स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में सुधारकों को कुछ सफलता मिली। ज्यों-ज्यों शिक्षा का प्रसार होता गया, ये कुरीतियां कम होती गईं। लार्ड विलियम बैंटिक ने सती-प्रथा को गैर कानूनी घोषित किया। इस कार्य में राजा राममोहन राय तथा द्वारिकानाथ टैगोर का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।

कानून का समर्थन प्राप्त होने पर भारत में यह प्रथा धीरे-धीरे समाप्त हो गयी किन्तु सती-प्रथा के बन्द होने से विधवाओं की समस्या पहले से भी अधिक गम्भीर हो गई क्योंकि देश में बाल-विधवाओं की संख्या भी बहुत अधिक थी। अतः समाज-सुधारकों ने विधवा-विवाह के लिए आन्दोलन चलाया। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए आन्दोलन चलाया।

उन्होंने शास्त्रों से उद्धरण देते हुए प्रमाणित किया कि शास्त्रों में विधवा के पुनर्विवाह का निषेध नहीं है। उनके प्रयत्नों से ई.1856 में सरकार ने विधवा-विवाह को वैध घोषित कर दिया गया। धीरे-धीरे भारतीयों ने इस परिवर्तन को स्वीकार कर लिया। ई.1872 में ब्रह्म मेरिजेज एक्ट पारित किया गया, जिसमें विधवा-विवाह और अन्तर्जातीय-विवाह को वैध मान लिया गया।

बाल-विवाह को रोकने के लिए सहवास-वय अधिनियम पारित किया गया। इन सारे प्रयासों का यद्यपि तुरन्त प्रभाव नहीं पड़ा तथापि लोगों को यह बात समझ आने लगी कि बाल-विवाह अनुचित है और विधवा-विवाह उचित है।

महाराष्ट्र समाज सुधार की दृष्टि से अग्रणी रहा। महाराष्ट्र में ईसाई धर्म में दीक्षित हिन्दुओं को पुनः हिन्दू-धर्म में शामिल करने की परम्परा थी। बाल-विवाह और विधवा-विवाह के अलावा वहाँ की दशा बंगाल की तरह पिछड़ी हुई नहीं थी। जाति-पाति के बन्धन थे किन्तु 19वीं शताब्दी के मध्य में इन बन्धनों को कम कने के लिए आन्दोलन आरम्भ हो चुका था।

समाज सुधार आन्दोलन की सबसे बड़ी दुर्बलता यह थी कि सुधारकों ने समाज सुधार के जिन सिद्धान्तों का प्रचार किया, उनका वे स्वयं उनका पालन नहीं कर सके, जिसका समाज पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा। इसके अतिरिक्त समस्त सुधारक, समाज सुधार की प्रत्येक बात से सहमत हों, यह आवश्यक नहीं था।

जो स्त्री-शिक्षा के समर्थक थे, उनमें से इस बात पर मतभेद था कि स्त्रियों को किस प्रकार की शिक्षा दी जाय। कुछ सुधारक सरकार से कानून बनवाकर सुधारों को लागू करने के पक्ष में थे। इसके विपरीत कुछ सुधारकों की यह दृढ़ मान्यता थी कि सामाजिक मामलों में सरकार का हस्तक्षेप अवांछनीय है।

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन करते समय प्रायः यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या यह आन्दोलन समाज की समस्त कुरीतियों को समाप्त करने में सफल हो सका? वस्तुतः भारतीय हिन्दू समाज शताब्दियों से एक व्यवस्था की परिधि में बंधा हुआ था। अतः उस परिधि को तोड़कर एकाएक परिवर्तन करना असम्भव था। आज भी भारत में बाल-विवाह होते हैं, कुछ लोग आज भी विधवा-विवाह को हेय समझते हैं अतः यह नहीं कहा जा सकता कि समाज द्वारा इन प्रथाओं को मान्यता प्राप्त है। किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि 19वीं-20वीं सदी के समाज सुधार आंदोलन निष्फल हो गए।

सुधार आन्दोलनों की शुरूआत बंगाल से हुई थी और उसके नेता राजा राममोहन राय थे। राजा राममोहन राय की मृत्यु के सौ वर्ष बाद जब ई.1933 में बंगाल के पुनर्जागरण के प्रमुख व्यक्तियों की उपस्थिति में उनकी मृत्यु-दिवस की शताब्दी मनाई गई, तब पुनर्जागरण काल के इतिहास का गौरवमय चित्र खींचा गया था, जिसमें राजा राममोहन राय को एक ‘चमकते सितारे’ के रूप में दिखाया गया।

कुछ विद्वानों ने समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन करते हुए इन प्रयासों को सामूहिक रूप से ‘भारतीय पुनर्जागरण’ कहा है। उनके अनुसार इन आन्दोलनों में बुद्धिवाद, विज्ञान, मानवतावाद जैसे कई ऐसे तत्त्व विद्यमान थे जो यूरोपिय पुनर्जागरण में भी उपस्थित थे किंतु तथ्यों के आधार पर यह धारणा पूर्णतः सत्य प्रतीत नहीं होती। इन आन्दोलनों का दृष्टिकोण छद्मवैज्ञानिकता पर आधारित था और मानवतावाद का व्यावहारिक पक्ष बहुत ही संकीर्ण था।

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन करते हुए यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इनमें यूरोपीय पुनर्जागरण के कई तत्त्वों का पूर्णतः अभाव था। भौगोलिक खोज, वैज्ञानिक आविष्कार और कला एवं साहित्य के क्षेत्र में अभूतपूर्ण प्रगति यूरोपीय पुनर्जागरण की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ थीं किंतु भारतीय पुनर्जागरण में इन तत्त्वों का सर्वथा अभाव था। इस प्रकार भारतीय पुनर्जागरण, यूरोपीय पुनर्जागरण से कई अर्थोंं में भिन्न था। फिर भी, सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया के रूप में इन आन्दोलनों को ‘नवजागरण’ मानने में कोई आपत्ति नहीं है।

कुछ विद्वानों का विचार है कि इस पुनर्जागरण से भारत का आधुनिकीकरण हुआ, क्योंकि पुनर्जागरण के मूल में बुद्धिवाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं वे आधुनिक विचार थे जो हर जगह आधुनिकता के वाहक रहे हैं। अंग्रेजी साम्राज्यवाद के समर्थकों ने भी इन आंदोलनों को भारत में आधुनिक युग का प्रारम्भ माना।

इन लोगों के अनुसार इन सुधार आन्दोलनों ने धार्मिक एवं सामाजिक अन्धविश्वास, रूढ़िवाद और क्रूर एवं अमानवीय प्रथाओं का विरोध किया, सामाजिक समता और विशेषकर महिलाओं की स्वतंत्रता का समर्थन किया तथा शिक्षा के माध्यम से आधुनिक ज्ञान, विचार एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जनमानस में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया किंतु कुछ विचारक इस बात से सहमत नहीं हैं।

उनके अनुसार आन्दोलनों से भले ही कुछ मौलिक परिवर्तन हुए हों परन्तु इनसे देश का आधुनिकीकरण नहीं हुआ। वस्तुतः जिसे देश का आधुनिकीकरण माना गया था, वह पश्चिमीकरण से अधिक कुछ नहीं था।

 यह सत्य है कि इन आन्दोलनों के परिणामस्वरूप देश में अंग्रेजी शिक्षा एवं पश्चिमी विचारों का प्रसार शुरू हुआ किंतु इनसे देश आधुनिक हो गया हो, ऐसा नहीं माना जा सकता। आधुनिकता के मुख्य आधार- मानव विवेक, ज्ञान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं मानवतावाद आदि हैं किंतु ये समस्त तत्त्व किसी समाज या देश विशेष को तभी आधुनिक बना सकते हैं जब इनका उस समाज के सन्दर्भ में स्वाभाविक रूप से विकास और विवेकपूर्ण उपयोग हो।

अलग-अलग देशों में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया एवं आयाम अलग-अलग हो सकते हैं। ब्रिटेन और भारतीय जीवन की पृष्ठभूमि एक-दूसरे से पूर्णतः भिन्न थी। ऐसी स्थिति में भारत का आधुनिकीकरण, ब्रिटेन के ही मॉडल पर हो, यह आवश्यक नहीं था। भारत में आधुनिकता केवल अंग्रेजी से नहीं, अपितु संस्कृत या हिन्दी के माध्यम से भी आ सकती थी और भारत के ज्ञान-विज्ञान को भारत के परम्परागत ज्ञान-विज्ञान (जैसे आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष, खगोल विज्ञान आदि) के अध्ययन एवं विकास के माध्यम से आधुनिक बनाया जा सकता था।

जापान और चीन का आधुनिकीकरण इस तथ्य के सफल उदाहरण हैं। इन देशों का आधुनिकीकरण स्वदेशी भाषा एवं स्वदेशी साधनों के माध्यम से हुआ। इस दृष्टि से तो भारतीय पुनर्जागरण में व्याप्त पश्चिमी प्रभाव ने भारत के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को कुछ सीमा तक अवरुद्ध कर दिया था।

इन आन्दोलनों के दौरान भारत में पश्चिमी उदारवाद का प्रचार हुआ। व्यावहारिक तौर पर उदारवाद के समर्थन का अन्तर्निहित परिणाम पूँजीवाद का पोषण एवं शोषण का समर्थन था। उदारवाद की जो कुछ उपयोगिता हो सकती थी, भारतीय परिस्थितियों के बीच वह भी निष्क्रिय एवं निष्फल होकर रह गई। ऐसी स्थिति में राजा राममोहन राय या सर सैयद अहमद खाँ के प्रयत्न ब्रिटिश साम्राज्यवाद के औपनिवेशिक ढांचे में तालमेल बैठाने तक ही सीमित थे।

तात्कालिक समस्या एक ब्रह्म की उपासना, सती-प्रथा या बाल-हत्या नहीं थी, अपितु आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक शोषण एवं गरीबी थी। इन आधारभूत प्रश्नों पर सुधारकों का ध्यान नाममात्र को ही गया। इस दिशा में अधिकांश प्रयत्न अस्पष्ट तथा असफल रहे। दूसरी तरफ, आन्दोलनों पर पश्चिमी संस्कृति के अत्यधिक प्रभाव एवं उदारवादी विचारों में आस्था ने भारत के देशी साधनों के माध्यम से आधुनिकीकरण के अवसर अवरुद्ध कर दिए और देश पश्चिमी सभ्यता की चकाचैंध में ‘आधुनिकता’ के भ्रम में जीने लगा।

सुधार आन्दोलनों के फलस्वरूप भारतीय समाज के बहुत थोड़े से हिस्से में चेतना जागृत हुई किंतु व्यापक परिवर्तन नहीं आया। आन्दोलन का वास्तविक स्वरूप मध्यमवर्गीय बना रहा और इसका कार्यक्षेत्र शहरों तक सिमट कर रह गया। सुधारकों ने किसानों या आम आदमी तक पहुँचने की कोशिश नहीं की। उनके विचारों ने अशिक्षित लोगों में सुधारों की प्रक्रिया आरम्भ नहीं की।

यदि ये सुधारवादी आन्दोलन सच्चे अर्थों में प्रगतिशील होते तो वे समाज के प्रत्येक वर्ग एवं नगरों से लेकर गांवों तक व्यापक सामाजिक परिवर्तन का शंखनाद कर सकते थे किंतु आधुनिकता का दम भरने के बावजूद ये आन्दोलन छद्म-वैज्ञानिकता के पोषक और एक सीमा तक रूढ़िवादी भी थे। पुर्जागरण काल का कोई भी आन्दोलन धर्म से ऊपर नहीं उठ सका।

ब्रह्मसमाज, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन आदि का सम्पूर्ण चिन्तन हिन्दू-धर्म पर आधारित था और अलीगढ़ आन्दोलन का इस्लाम पर। इनमें से कोई भी आन्दोलन समस्त भारतीय समाज को अपना कार्य-क्षेत्र नहीं बना सका। समस्त आन्दोलनों के मसले अलग-अलग थे। बाल-विवाह, सती-प्रथा एवं विधवा-विवाह हिन्दू समाज के दोष थे, जिनसे मुसलमानों का कोई सम्बन्ध नहीं था। इसी प्रकार बुरका-प्रथा एवं तीन तलाक से हिन्दुओं का कोई लेना-देना नहीं था।

बाल-विवाह और विधवा-विवाह के सम्बन्ध में हिन्दू सुधारकों में मतभेद थे। केशवचन्द्र सेन एवं उनके समर्थक बाल-विवाह के विरोधी थे किंतु स्वयं केशव चन्द्र सेन ने अपनी 13 वर्षीय पुत्री का विवाह पूरे वैदिक कर्मकाण्ड के साथ कूचबिहार के राजा के साथ कर दिया। अंतद्र्वद्व से राजा राममोहन राय भी मुक्त नहीं थे। उनके पास दो घर थे।

एक में स्वयं राजा राममोहन राय को छोड़़कर सब कुछ विदेशी था, दूसरे में राजा साहब को छोड़़ कर सब कुछ देशी था। वैसे ही सर सैयद अहमद खाँ पश्चिम के आधुनिक विचारों से प्रभावित तो थे किन्तु पर्दा प्रथा जैसे कई मुद्दों पर उनका दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं था।

इन आन्दोलनों की विफलताओं का एक बड़ा कारण भारत का पराधीन होना भी था। साम्राज्यवादी शोषण और औपनिवेशिक ढांचे के भीतर होने वाले इन आन्दोलनों को बहुत अधिक सफलता मिल भी नहीं सकती थी। समस्त तरह की स्वतंत्रताओं की सबसे महत्त्वपूर्ण शर्त आर्थिक एवं राजनैतिक शोषण से मुक्ति थी। भारत का तात्कालीन शासन तन्त्र ऐसी स्वतंत्रता के पक्ष में नहीं था। ऐसी परिस्थितियों में सीमित उदारवादी सुधार ही हो सकते थे, कोई सामाजिक या सांस्कृतिक क्रांति नहीं।

आन्दोलन के परिणामस्वरूप अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी विचारों का भारत में तेजी से प्रसार हुआ। इस काम में अंग्रेजों ने पश्चिमी विद्वानों तथा ईसाई पादरियों के साथ-साथ भारतीय सुधारकों के सहयोग एवं समर्थन का भी उपयोग किया। इससे देश में ब्रिटिश शासन के प्रति विरोध थमा रहा। राजा राममोहन राय और सैयद अहमद खाँ आदि ने अंग्रेजों का समर्थन भी किया।

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन यह तथ्य उजागर करता है कि इन सुधार आन्दोलनों पर पश्चिमी तत्त्वों का प्रभाव होने के कारण देश की वास्तविक सामाजिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं को ठीक से समझ पाना कठिन हो गया जिससे अधिक महत्त्वपूर्ण मसलों को छोड़़कर सुधारक छोटे-छोटे मसलों से उलझते रहे। इस प्रकार पश्चिमी प्रभाव ने सुधारकों में स्वतन्त्र चिन्तन की प्रक्रिया को कमजोर किया और देश की तत्कालीन वास्तविकताओं की पृष्ठभूमि में पुनर्जागरण के आन्दोलन को स्वतंत्र रूप से विकसित नहीं होने दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख : उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज-सुधार आंदोलन

भारतीय पुनर्जागरण

राजा राममोहन राय और उनका ब्रह्मसमाज

युवा बंगाल आन्दोलन

केशवचन्द्र सेन का भारतीय समाज

आत्माराम पाण्डुरंग और प्रार्थना समाज

स्वामी श्रद्धानंद का शुद्धि आंदोलन

रामकृष्ण परमहंस

स्वामी विवेकानन्द

थियोसॉफिकल सोसायटी

विभिन्न सम्प्रदायों में सुधार आंदोलन

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन

थियोसॉफिकल सोसायटी

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थियोसॉफिकल सोसायटी

थियोसॉफिकल सोसायटी भारत का एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक आन्दोलन था जिसने देश के धार्मिक तथा सामाजिक जीवन को प्रभावित किया।

थियोसॉफी का अर्थ होता है- ‘ईश्वर का ज्ञान।’ संस्कृत में इसे ‘ब्रह्मविद्या’ कहते हैं। थियोसॉ फी  शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग तीसरी शताब्दी ईस्वी में एलेक्जेण्ड्रिया के ग्रीक विद्वान इम्बीकस ने किया था।

आधुनिक काल में इस शब्द का प्रयोग थियोसॉफिकल सोसायटी ने किया। यह एक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था थी जिसकी स्थापना कर्नल एच. एम. आलकाट और सुश्री एच. पी. ब्लेवटास्की ने 7 सितम्बर 1876 को अमरीका के न्यूयार्क शहर में की। इस संस्था के उद्देश्य इस प्रकार से थे-

(1.) प्रकृति के नियमों की खोज करना तथा मनुष्य की दैवी शक्तियों का विकास करना।

(2.) किसी भी धर्म की कट्टरता को प्रश्रय न देकर समस्त धर्मों में समन्वय स्थापित करना।

(3.) प्राचीन धर्म, दर्शन और विज्ञान जो संसार में कहीं भी पाया जा सकता है, उसके अध्ययन में सहयोग देना।

(4.) विश्व बन्धुत्व अथवा विश्व मान्यता का विकास करना।

(5.) पूर्वी देशों के धर्मों तथा दर्शन का अध्ययन तथा प्रसार करना।

थियोसॉफिकल सोसायटी का भारत में आगमन

आलकाट व ब्लेवटास्की ई.1879 में स्वामी दयानन्द के निमन्त्रण पर भारत आए। उन्होंने हिन्दू-धर्म के गुणों पर प्रकाश डालते हुए भारतीयों को उपदेश दिया कि यह सब धर्मों से श्रेष्ठ है तथा इसमें सम्पूर्ण सत्य निहित है। थियोसॉफिकल सोसायटी का लक्ष्य भारतीयों को उनके प्राचीन गौरव और महानता की याद दिलाना है ताकि भारत अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त कर सके।

सात साल तक आलकाट व ब्लेवटास्की आर्य समाज के साथ मिलकर ईसाई धर्म के प्रभाव को कम करने का प्रयत्न करते रहे। स्वामी दयानन्द वेदों को ईश्वरीय ज्ञान मानते थे, जो थियोसॉफिस्ट्स विचारकों को स्वीकार्य नहीं था। ई.1886 में उन्होंने मद्रास के उपनगर आडियार में थियोसॉफिकल सोसायटी का केन्द्र स्थापित किया। अब इस संस्था का कार्यक्षेत्र भारत हो गया तथा यहीं से अन्य देशों में इसके विचारों का प्रचार होने लगा।

श्रीमती एनीबीसेण्ट का भारत में आगमन

 श्रीमती एनीबीसेण्ट उच्च शिक्षा प्राप्त, कुलीनवंशी, आयरिश महिला थीं। 16 नवम्बर 1873 को 46 वर्ष की आयु में वह भारत आईं और भारत के सांस्कृतिक आन्दोलन में सक्रिय हो गईं। उन्होंने थियोसॉफिकल सोसायटी के कार्य को फैलाने में बड़ा योगदान दिया। वे जन्म से आयरिश थीं किन्तु उन्होंने भारत को अपनी मातृभूमि मान लिया। उन्हें भारतीयता, हिन्दू-धर्म और हिन्दू समाज से अगाध प्रेम था।

उनकी मान्यता थी कि भारत का भविष्य हिन्दू-धर्म और संस्कृति से जुड़ा हुआ है। अनेक विद्वान् और नेता, उनके महान् व्यक्तित्व से प्रभावित होकर थियोसॉफिकल सोसायटी में सम्मिलित हो गये। एनीबीसेण्ट की मान्यता थी कि वे पूर्व जन्म में हिन्दू थीं। इसलिए उन्होंने भारत आते ही स्वयं को पूर्ण रूप से हिन्दुत्व के रंग में रंग लिया तथा भारतीय वेश-भूषा और खानपान को अपना लिया।

वे हिन्दू तीर्थों में घूमती रहती थीं। उन्होंने अपना अधिकांश समय काशी में व्यतीत किया जहाँ उन्होंने सेण्ट्रल हिन्दू कॉलेज की स्थापना की जो आगे चल कर हिन्दू विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ। बनारस में रहते हुए उन्होंने रामायण और महाभारत की कथाएँ लिखीं और गीता का अनुवाद किया। उन्होंने हिन्दू-धर्म और संस्कृति के पक्ष में ओजस्वी भाषण दिये।

श्रीमती एनीबीसेण्ट द्वारा हिन्दू-धर्म की सेवा

श्रीमती एनीबीसेण्ट का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य हिन्दू-धर्म की सेवा था। राजा राममोहन राय एवं स्वामी दयानन्द ने निराकार ईश्वर की उपासना पर बल दिया तथा मूर्ति-पूजा, अवतारवाद, तीर्थ, व्रत-अनुष्ठान एवं पौराणिक बातों का खण्डन किया किंतु एनीबीसेण्ट ने वेद और उपनिषदों के महत्त्व को मान्यता देते हुए मूर्ति-पूजा, बहुदेववाद, योग, पुनर्जन्म, कर्मवाद, तीर्थ, व्रत, गीता, स्मृति, पुराण, धर्मशास्त्र और महाकाव्य आदि के द्वारा हिन्दुत्व के समग्र रूप का तर्कपूर्ण एवं वैज्ञानिक ढंग से समर्थन किया।

श्रीमती एनीबीसेण्ट अपने भाषणों में प्रायः यह बात कहती थीं-

‘हिन्दुत्व ही भारत का प्राण है, हिन्दुत्व वह मिट्टी है जिसमें भारत का मूल गड़ा हुआ है। यदि वह मिट्टी हटा ली गई तो भारत रूपी वृक्ष सूख जायेगा। हिन्दुत्व के बिना भारत के सामने कोई भविष्य नहीं है

…….. हिन्दुत्व की रक्षा भारतवासी और हिन्दू ही कर सकते हैं। भारत में प्रश्रय पाने वाले अनेक धर्म हैं, अनेक जातियाँ हैं किन्तु इनमें किसी की भी शिरा भारत के अतीत तक नहीं पहुँची है। इनमें से किसी में भी यह दम नहीं कि भारत को एक राष्ट्र के रूप में जीवित रख सके। इनमें से प्रत्येक भारत से लोप हो जाये तब भी भारत, भारत ही रहेगा किन्तु यदि हिन्दुत्व लोप हो गया तो शेष कुछ भी नहीं बचेगा

…….. हिन्दुत्व के जागरण से ही विश्व का कल्याण हो सकता है।’

ई.1914 में एक भाषण में उन्होंने कहा था- ‘चालीस वर्ष के गम्भीर चिन्तन के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँची हूँ कि विश्व के समस्त धर्मों में मुझे हिन्दुत्व के समान कोई धर्म इतना पूर्ण, वैज्ञानिक, दर्शनयुक्त एवं आध्यात्मिकता से परिपूर्ण दिखाई नहीं देता। जितना अधिक तुमको इसका भान होगा, उतना ही अधिक तुम इससे प्रेम रखोगे।’

थियोसॉफिकल सोसायटी के धार्मिक सुधार

थियोसॉफिकल सोसायटी ने हिन्दू-धर्म की अनेक रहस्यमयी तथा आस्थापूर्ण बातों का वैज्ञानिक ढंग से समर्थन किया। जिस समय एनीबीसेण्ट भारत आईं, उस समय अँग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीयों का, हिन्दू-धर्म तथा संस्कृति से विश्वास उठने लगा था। ऐसे समय में एनीबीसेण्ट ने भारतीय आदर्शों को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया। एनीबीसेण्ट ने स्वयं हिन्दू तीर्थों की यात्रा की।

उन्होंने नंगे पैर अमरनाथ की यात्रा की और वहाँ शीतल जल से स्नान करके मन्दिर में प्रवेश किया। एक विदेशी महिला को ऐसा करते देखकर हिन्दुओं के मस्तिष्क में यह बात बैठ गई कि उनका धर्म अन्य धर्मों से श्रेष्ठ है। एनीबीसेण्ट ने काशी में रहकर गीता का अनुवाद किया, रामायण तथा महाभारत पर संक्षिप्त भाष्य लिखे।

यूरोप और अमरीका के लोगों के सामने हिन्दू-धर्म तथा संस्कृति की महत्ता और गौरवगान किया। जब भारत के अँग्रेजी पढ़े लिखे लोगों ने एक अँग्रेज महिला के मुँह से हिन्दू-धर्म और संस्कृति का गौरवगान सुना तो उन्हें अपने धर्म में पुनः आस्था जागृत होने लगी। एनीबीसेण्ट के भाषणों से भारतीयों में आत्मसम्मान की भावना उत्पन्न हुई।

वेलेन्टाइन शिरोल ने लिखा है- ‘जब अतिश्रेष्ठ बौद्धिक शक्तियों तथा अद्भुत वक्तृत्व शक्ति से सुसज्जित यूरोपियन, भारत जाकर भारतीयों से यह कहे कि उच्चतम ज्ञान की कुँजी यूरोप वालों के पास नहीं, तुम्हारे पास है तथा तुम्हारे देवता, तुम्हारे दर्शन तथा तुम्हारी नैतिकता की छाया भी यूरोप वाले नहीं छू सकते, तब यदि भारतवासी हमारी सभ्यता से मुँह मोड़ लें तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है!’

थियोसॉफिकल सोसायटी द्वारा राष्ट्रीय सुधार

थियोसॉफिकल सोसायटी तथा इसके संस्थापकों ने अपनी श्रेष्ठता के बारे में प्रचार किया किंतु सदस्यों के सम्बन्ध में अनेक झूठी-सच्ची बातें जनता के सामने प्रकट हुईं तो लोगों को इस सोसायटी के प्रति श्रद्धा कम होने लगी। इससे एनीबीसेण्ट को अत्यन्त दुःख हुआ और ई.1914 में उन्होंने अपना क्षेत्र धर्म से बदलकर राजनीति कर लिया।

वे लोकमान्य तिलक द्वारा चलाये गये होमरूल आन्दोलन में सम्मिलित हो गईं। ई.1917 में मद्रास सरकार ने एनीबीसेण्ट को नजरबन्द कर दिया किन्तु प्रबल जन-आन्दोलन के कारण सरकार ने उन्हें तत्काल मुक्त कर दिया। वे भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के सभापति पद पर चुन ली गईं। काँग्रेस की सक्रिय सदस्य के रूप में उन्होंने भारत में राजनीतिक चेतना जागृत करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

थियोसॉफिकल सोसायटी ने अनेक स्कूल, कॉलेज और छात्रावास स्थापित किये। इस संस्था ने बाल-विवाह, कन्या-वर-विक्रय, छुआछूत आदि कुरीतियों का विरोध कर समाज सुधार के कार्य किये। सोसायटी के कार्यों से न केवल धर्म एवं समाज सुधार आन्दोलन को बल प्राप्त हुआ, अपितु राष्ट्रीय आन्दोलन में भी नई जान आई। श्रीमती एनीबीसेण्ट ने हिन्दू जागरण के लिए जितना कार्य किया, किसी हिन्दू ने भी उतना काम नहीं किया।

गाँधीजी ने उनके बारे में लिखा है- ‘जब तक भारत वर्ष जीवित है, एनीबीसेण्ट की सेवाएं भी जीवित रहेंगी। उन्होंने भारत को अपनी जन्मभूमि मान लिया था। उनके पास देने योग्य जो कुछ भी था, उन्होंने भारत के चरणों में अर्पित कर दिया। इसलिए भारतवासियों की दृष्टि में वे इतनी प्यारी और श्रद्धेय हो गई हैं।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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आत्माराम पाण्डुरंग और प्रार्थना समाज

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आत्माराम पाण्डुरंग

डॉ. आत्माराम पाण्डुरंग ने 31 मार्च 1867 को जस्टिस महादेव गोविन्द रानडे तथा इतिहासकार आर. जी. भंडारकर के साथ मिलकर बम्बई में प्रार्थना समाज की स्थापना की।

प्रार्थना-समाज ब्रह्म-समाज से प्रेरित हिन्दूवादी आंदोलन था। यह प्राचीन वेदों पर आधारित था एवं पूर्णतः आस्तिक विचारधारा पर खड़ा था। आत्माराम पाण्डुरंग केशवचंद्र सेन से बहुत प्रभावित थे। इस कारण ब्रह्मसमाज तथा प्रार्थना समाज की बहुत सी बातें एक जैसी थीं।

ब्रह्मसमाज की तरह प्रार्थना समाज का उद्देश्य भी समाज सुधार करना था। आत्माराम पाण्डुरंग एकेश्वरवाद तथा ईश्वर के निराकार रूप के सिद्धांत को मानते थे।

प्रार्थना समाज के दार्शनिक सिद्धांत

आत्माराम पाण्डुरंग एवं उनके साथियों का मुख्य उद्देश्य ईश्वर को प्रार्थना एवं सेवा से प्रसन्न करना था, इसलिए प्रार्थना समाज के मुख्य सिद्धांत वैष्णव भक्ति के सिद्धांतों की ही तरह थे। प्रार्थना समाज के मुख्य सिद्धांत इस प्रकार थे-

1. ईश्वर ही ने इस ब्रह्मांड को रचा है।

2. ईश्वर की आराधना से इहलोक एवं परलोक में सुख प्राप्त हो सकता है।

3. ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और अनन्य आस्था रखकर उसकी प्रार्थना, उपासना और कीर्तन करना चाहिए।

4. ईश्वर को अच्छे लगने वाले कार्य करना ही ईश्वर की सच्ची आराधना है।

5. यद्यपि प्रार्थना समाज में मूर्ति-पूजा के त्याग की शर्त नहीं थी तथापि आत्माराम पाण्डुरंग एवं उनके साथी मानते थे कि ईश्वर की मूर्तियों अथवा अन्य मानव सृजित वस्तुओं की पूजा करनाए ईश्वर की आराधना का सच्चा मार्ग नहीं है।

6. प्रार्थना समाज का मानना था कि ईश्वर अवतार नहीं लेता। कोई भी पुस्तक ऐसी नहीं है जिसे स्वयं ईश्वर ने रचा अथवा प्रकाशित किया हो या पूर्णतः दोष.रहित हो।

प्रार्थना समाज के सामाजिक लक्ष्य

सामाजिक क्षेत्र में इस संस्था के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार थे-

(1.) विधवा-विवाह को बढ़ावा देना।

(2.) जाति-प्रथा को अस्वीकार करना।

(3.) स्त्री-शिक्षा को प्रोत्साहन देना।

(4.) बाल-विवाह का बहिष्कार करना।

(5.) विवेकपूर्ण उपासना करना।

(6.) अन्य सामाजिक सुधार करना।

केशवचन्द्र सेन, नवीनचन्द्र राय, पी. सी. मजूमदार और बाबू महेन्द्रनाथ बोस जैसे प्रसिद्ध ब्रह्म समाजियों के बम्बई आगमन से प्रार्थना समाज को प्रोत्साहन मिला। प्रार्थना समाज के अनुयायियों ने अपना ध्यान अन्तर्जातीय विवाह, विधवा-विवाह और महिलाओं एवं हरिजनों की दशा सुधारने पर केन्द्रित किया।

उन्होंने अनाथाश्रम, रात्रि पाठशालाएं, विधवाश्रम, अछूतोद्धार जैसी अनेक उपयोगी संस्थाएं स्थापित कीं। प्रार्थना समाज ने हिन्दू-धर्म से अलग होकर कोई नवीन सम्प्रदाय स्थापित करने का प्रयास नहीं किया और न इसने ईसाई धर्म का समर्थन किया। इसने अपने सिद्धान्त भागवत् सम्प्रदाय से सम्बन्धित रखे।

हिन्दू कट्टरता पर करारी चोट

आत्माराम पाण्डुरंग तथा प्रार्थना समाज के कुछ सदस्यों ने हिन्दू-कट्टरता पर करारी चोट की। महाराष्ट्र के समाज सुधारक गोपाल हरिदेशमुख (लोकहितवादी) ने लिखा है- ‘धर्म यदि सुधार की अनुमति नहीं देता तो उसे बदल देना चाहिये। क्योंकि धर्म को मनुष्य ने बनाया है और यह आवश्यक नहीं है कि बहुत पहले लिखे गये धर्म ग्रंथ आज भी प्रासंगिक हों।’

गोपाल हरिदेशमुख ने पुरोहितों तथा ब्राह्मणों पर प्रहार करते हुए उन्होंने लिखा- ‘पुरोहित बहुत ही अपवित्र हैं क्योंकि कुछ बातों को बिना उनका अर्थ समझे दुहराते रहते हैं……. पण्डित तो पुरोहितों से भी बुरे हैं क्योंकि वे और भी अज्ञानी हैं तथा अहंकारी भी हैं

…….. ब्राह्मण कौन हैं और किन अर्थों में वे हमसे भिन्न हैं ? क्या उनके बीस हाथ हैं और क्या हममें कोई कमी है ? अब जब ऐसे सवाल पूछे जायें तो ब्राह्मणों को अपनी मूर्खतापूर्ण धारणाएं त्याग देनी चाहिये, उन्हें यह मान लेना चाहिये कि समस्त मनुष्य बराबर हैं तथा हर व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार है।’

जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे का योगदान

जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे ने प्रार्थना-समाज के माध्यम से बहुत कार्य किया। जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे (ई.1842-1901) ने इस संस्था के माध्यम से बहुत काम किया। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन प्रार्थना समाज के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में लगाया। वे समाज सुधार के साथ राष्ट्रीय प्रगति के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने ई.1884 में दकन एजूकेशन सोसायटी तथा विधवा-विवाह संघ की स्थापना की।

उन्होंने भारतीय सुधारों को नवीन दिशा दी। प्रार्थना समाज धार्मिक गतिविधियों की अपेक्षा सामाजिक क्षेत्र में अधिक कार्यशील रहा और पश्चिमी भारत में समाज सुधार सम्बन्धी विभिन्न कार्यकलापों का केन्द्र रहा। प्रार्थना समाज ने महाराष्ट्र में समाज सुधार के लिए वही कार्य किया, जो ब्रह्मसमाज ने बंगाल में किया था।

प्रार्थना समाज का प्रभाव सीमित था और यह संस्था शीघ्र ही छिन्न-भिन्न हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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केशवचन्द्र सेन का भारतीय ब्रह्मसमाज

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केशवचन्द्र सेन
केशवचन्द्र सेन का भारतीय ब्रह्मसमाज

केशवचन्द्र सेन ने ई.1866 में भारतीय ब्रह्मसमाज की स्थापना की। ईसाई धर्म से प्रभावित होने के कारण भारतीय ब्रह्मसमाज ईसा मसीह को पूज्य मानने लगा।

केशवचन्द्र सेन द्वारा संत सभा की स्थापना

केशवचन्द्र सेन ई.1856 में ब्रह्मसमाज के सदस्य बने। उन्होंने अपने भाषणों तथा लेखों के माध्यम से नवयुवकों को ब्रह्मसमाज की ओर आकर्षित किया। उन्होंने संत सभा की स्थापना की। केशवचन्द्र सेन पाश्चात्य विचारों तथा ईसाई धर्म से अधिक प्रभावित थे और ब्रह्मसमाज को ईसाई धर्म के सिद्धान्तों के अनुसार चलाना चाहते थे।

केशवचन्द्र सेन का भारतीय ब्रह्मसमाज

चूंकि केशवचंद्र सेन ब्रह्मसमाज को ईसाई धर्म के सिद्धांतों पर चलाना चाहते थे और देवेन्द्रनाथ टैगोर ब्रह्मसमाज को हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार चलाना चाहते थे, इस कारण केशवचंद्र सेन और देवेन्द्रनाथ टैगोर में मतभेद हो गया।

ई.1866 में केशवचंद्र सेन ने भारतीय ब्रह्मसमाज की स्थापना की। ईसाई धर्म से प्रभावित होने के कारण भारतीय ब्रह्मसमाज, ईसा मसीह को पूज्य मानने लगा। इस संस्था के अनुयाइयों में बाइबिल तथा ईसाई पुराणों का अध्ययन होता था। केशवचन्द्र सेन ने भारतीय ब्रह्मसमाज के प्रार्थना संग्रह में हिन्दू, बौद्ध, यहूदी, ईसाई, मुस्लिम और चीनी आदि विविध धर्मों की प्रार्थनाएं तथा वैष्णव कीर्तन सम्मिलित किये।

केशवचंद्र सेन ने नवयुवकों में सामाजिक सुधार की उग्र भावना जागृत की। उन्होंने स्त्री-शिक्षा और विधवा-विवाह का प्रबल समर्थन किया तथा बाल-विवाह, बहु-विवाह और पर्दा-प्रथा का विरोध किया। उन्होंने अन्तर्जातीय-विवाह का भी समर्थन किया। इसके परिणामस्वरूप ई.1872 में ब्रह्म मेरिजेज एक्ट पारित हुआ जिसके अनुसार अन्तर्जातीय-विवाह एवं विधवा-विवाह हो सकते थे तथा बाल-विवाह एवं बहु-विवाह का निषेध कर दिया गया।

ई.1870 में केशवचन्द्र सेन ने इण्डियन रिफार्म एसोसिएशन की स्थापना की जिसमें स्त्रियों की स्थिति में सुधार, मजदूर वर्ग की शिक्षा, सस्ते साहित्य का निर्माण, नशाबन्दी आदि उद्देश्य रखे गये। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उन्होंने साप्ताहिक समाचार पत्र सुलभ समाचार आरम्भ किया। स्त्रियों को उनके घर पर शिक्षा देने के लिए एक समुदाय बनाया और एक समुदाय सस्ती एवं उपयोगी पुस्तकों के प्रकाशन के लिए स्थापित किया।

केशवचंद्र सेन के नेतृत्व में भारतीय ब्रह्मसमाज का तीव्र गति से उत्कर्ष हुआ। नवयुवकों ने बंगाल के गांव-गांव में जाकर भारतीय ब्रह्मसमाज के सिद्धांतों का प्रचार किया तथा अनेक नवयुवक बंगाल से बाहर भी गये। ई.1866 में छपे एक लेख से ज्ञात होता है कि भारतीय ब्रह्मसमाज की बंगाल में 50, उत्तर प्रदेश में 2, पंजाब तथा मद्रास में 1-1 शाखा स्थापित हुई। भारतीय ब्रह्मसमाज के सिद्धांतों के प्रचार के लिए विभिन्न भाषाओं में 37 पत्रिकाएं प्रकाशित की जाती थीं।

ई.1878 में कूचबिहार के अवयस्क राजकुमार और केशवचन्द्र सेन की अवयस्क पुत्री का विवाह हुआ। इससे केशवचन्द्र सेन की प्रतिष्ठा को गहरा आघात लगा। ब्रह्म मेरिजेज एक्ट पारित करवाने में केशवचन्द्र सेन सबसे अधिक सक्रिय थे और अब उन्होंने स्वयं उस कानून का उल्लंघन किया। इसलिये केशवचन्द्र सेन के विरुद्ध आवाज उठी और भारतीय ब्रह्मसमाज के दो टुकड़े हो गये। केशवचन्द्र सेन के विरोधियों ने साधारण ब्रह्मसमाज स्थापित किया। केशवचन्द्र सेन के नेतृत्व में नव विधान सभा गठित की गई।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का साधारण ब्रह्मसमाज

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी तथा शिवनाथ शास्त्री जैसे महान् समाज सुधारकों ने केशवचंद्र सेन से नाराज होकर साधारण ब्रह्मसमाज की स्थापना की। इसने कलकत्ता में एक स्कूल स्थापित किया, जो बाद में सिटी कॉलेज ऑफ कलकत्ता कहलाया। इस संस्था ने पुस्तकालय तथा छापाखाने की स्थापना की तथा समाचार पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन किया। बंगला में ‘तत्व कौमुदी’ और अँग्रेजी में ‘ब्रह्म पब्लिक ओपिनियन’ नामक दो समाचार पत्र चलाये।

ई.1884 में साप्ताहिक पत्रिका संजीवनी आरम्भ की गई। ई.1888 में ब्रह्म बालिका स्कूल खोला गया। इस प्रकार साधारण ब्रह्मसमाज ने भी धर्म और समाज सुधार आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण कार्य किया। बाद के समय में ब्रह्मसमाज की सबसे अधिक लोकप्रिय शाखा यही थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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युवा बंगाल आन्दोलन का जनक हेनरी लुई विवियन देरीजियो

हेनरी लुई विवियन देरीजियो युवा बंगाल आन्दोलन का जनक था। उसने कलकत्ता के विद्यार्थियों को इस संस्था से जोड़कर अंग्रेजी कुशासन के विरुद्ध आंदोलन चलाया। इस कारण अंग्रेज उससे नाराज हो गए। 

जनवरी 1817 में कलकत्ता में हिन्दू कॉलेज की स्थापना, भारत के धर्म और समाज सुधार आन्दोलन के इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटना थी। सार्वजनिक जीवन तथा जनजागरण का इतिहास हिन्दू कॉलेज से ही आरम्भ होता है। इससे पूर्व बंगाल के जनजीवन पर धर्म का गहरा प्रभाव था तथा भारतीयों का राजनीति से सम्पर्क नहीं के बराबर था।

ई.1826 में हेनरी लुई विवियन देरीजियो इस कॉलेज में शिक्षक के पद पर नियुक्त हुआ। वह एक स्वतंत्र विचारक था तथा 19वीं शताब्दी की उदारवादी विचारधारा से प्रभावित था। उसने हिन्दू कॉलेज को जन-जागरण का केन्द्र बना दिया। वह ऐसा वातावरण निर्मित करना चाहता था जिससे भारतीयों में राजनीति के प्रति रुचि उत्पन्न हो।

उसने कॉलेज के मेधावी छात्रों को यूरोप के राजनीतिक विचारकों की विचार धाराओं से परिचित कराया। अमृतलाल मित्र, कृष्णमोहन बनर्जी, रसिककृष्ण मल्लिक, दक्षिणरंजन मुखर्जी, रामगोपाल घोष आदि अनेक छात्र उसके निकट सम्पर्क में थे। देरीजियो और उसके मेधावी छात्रों की विचार गोष्ठियों में धर्म, राजनीति, नैतिकता और भारतीय इतिहास पर विचार-विमर्श होता था।

देरीजियो के छात्रों ने बंगाल में एक नया जागरूक वर्ग तैयार किया जिसे युवा बंगाल कहा जाता था। युवा बंगाल के सदस्य अन्धविश्वासों तथा भारतीय सामाजिक कुरीतियों के कटु आलोचक थे और सुधारों के प्रबल पक्षपाती थे। उन्होंने बंगाल में एक आन्दोलन आरम्भ किया जिसे युवा बंगाल आन्दोलन कहा जाता है।

देरीजियो के विचारों से प्रभावित होकर युवा बंगाल के सदस्यों ने ई.1828 में देरीजियो की अध्यक्षता में एकेडेमिक एसोसिएशन की स्थापना की। इस एसोसियेशन के तत्त्वावधान में आयोजित होने वाली सभाओं में विभिन्न विषयों पर चर्चा होती थी और विचारों का आदान-प्रदान होता था। इस प्रकार की विचार-गोष्ठियों में हिन्दू कॉलेज के छात्रों के साथ-साथ कलकत्ता के शिक्षित और जागरूक लोग भी भाग लेते थे।

देरीजियो और उसके ऐसासिएशन ने सुप्त भारतीयों को झकझोर दिया। छात्रों में आत्म-विश्वास की भावना उत्पन्न हुई और वे प्राचीन रूढ़ियों की आलोचना करने लगे। पुरातनपंथी भारतीयों ने इस एसोसिएशन के विरुद्ध आवाज उठाई। अनेक अभिभावकों ने अपने लड़कों को हिन्दू कॉलेज से निकाल लिया। इस पर कॉलेज की मैनेजिंग कमेटी ने इस एसोसिएशन पर प्रतिबंध लगा दिया।

मैनेजिंग कमेटी ने देरीजियो को कॉलेज से निकालने का निर्णय किया। मार्च 1831 में देरीजियो ने स्वयं त्याग पत्र दे दिया। इसके कुछ ही दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गयी। देरीजियो की मृत्यु के बाद भी उसके शिष्य उसके बताए हुए मार्ग पर चलते रहे और बंगाल में जनजागरण का कार्य करते रहे।

बंगाल में सार्वजनिक संगठनों की स्थापना का प्रारम्भ देरीजियो के युवा बंगाल तथा एकेडेमिक एसोसिएशन से होता है। उसने बंगाल में और अन्ततः सम्पूर्ण भारत में जनजागरण की नींव रखी। उसने वस्तुओं को तर्क के आधार पर परखने एवं अन्धविश्वासों तथा पुरानी मान्यताओं पर प्रहार करने की परम्परा आरम्भ की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य में अंतर

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हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य में अंतर

मध्यकालीन हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य का अंतर बहुत स्पष्ट है। इस काल में हिन्दू स्थापत्य को बड़े स्तर पर क्षतिग्रस्त किया गया तथा हिन्दू भवनों को तोड़कर उसी सामग्री से मुस्लिम स्थापत्य का निर्माण किया गया।

बारहवीं शताब्दी ईस्वी में दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ ही भारत में मुस्लिम स्थापत्य कला का प्रवेश हुआ। दिल्ली सल्तनत के तुर्क शासक अपने साथ जिस स्थापत्य कला को लेकर आए, उसका विकास ट्रान्स-ऑक्सियाना, ईरान, इराक, मिस्र, अरब, अफगानिस्तान, उत्तरी अफ्रीका तथा दक्षिण पश्चिम यूरोप की शैलियों के मिश्रण से हुआ था। इस मिश्रित स्थापत्य को ही भारत में मुस्लिम स्थापत्य कला कहा गया।

इस शैली की कुछ विशेषताएं इसे भारतीय स्थापत्य शैलियों से अलग करती थीं, जैसे- नोकदार तिपतिया मेहराब, मेहराबी डाटदार छतें, अष्टकोणीय भवन, ऊंचे गोल गुम्बज, पतली मीनारें आदि। इस शैली को सारसैनिक या इस्लामिक कला भी कहा जाता है।

हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य में अंतर

हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य में कई अंतर थे जिनमें से कुछ इस प्रकार से हैं-

(1.) भारतीय स्थापत्य में आदर्शवाद, काल्पनिकता, अलंकरण एवं रहस्य का समावेश था जबकि मुस्लिम स्थापत्य में यथार्थवाद, सादगी एवं वास्तविकता के तत्व अधिक थे।

(2.) भारतीय मंदिर पत्थरों में उत्कीर्ण एक मनोरम संसार का परिदृश्य प्रतीत होते हैं जबकि मुस्लिम स्थापत्य में बनी मस्जिदें सादगी का प्रतिबिम्ब प्रतीत होती हैं और उनका मुख सुदूर मक्का की दिशा में होता है।

(3.) मंदिर की दीवारों एवं शिखरों पर देवी-देवताओं एवं पौराणिक कथाओं का अंकन होता है जबकि मस्जिद की दीवारों पर कुरान की आयतें उत्कीर्ण की जाती हैं।

(4.) मंदिरों में देवी-देवताओं का मानवीय स्वरूप अंकित किया जाता है जबकि मस्जिद की दीवारों पर मानवीय आकृतियों का अंकन निषिद्ध होता है।

(5.) हिन्दू मंदिरों पर शिखर होते थे जबकि मुस्लिम इमारतों पर गोल गुम्बद होते थे।

(6.) हिन्दू मन्दिरों का गर्भगृह प्रकाश एवं वायु से रहित होता था जबकि मस्जिद का भीतरी भाग प्रकाश एवं वायु से युक्त होता था।

(7.) मंदिर का गर्भगृह छोटा होता था जबकि मस्जिद का मुख्यकक्ष विशाल होता था ताकि उसमें अधिक से अधिक लोग नमाज पढ़ सकें।

(8.) हिन्दू स्थापत्य में अलंकृत स्तम्भों एवं सीधे पाटों पर रखी अलंकृत छतों को प्रमुखता दी जाती थी जबकि इस्लामिक स्थापत्य में तिकाने मेहराबों, गोल गुम्बदों और लम्बी मीनारों को अधिक महत्त्व दिया जाता था।

(9.) हिन्दू मंदिरों के शिखरों पर कमल एवं कलश बनाए जाते थे, मंदिर के भीतरी स्तम्भों पर घण्टों, जंजीरों, घटपल्लवों, हथियों, कमल पुष्पों आदि का अंकन किया जाता था तथा खम्भों एवं छतों के जोड़ों पर कीचकों का अंकन किया जाता था किंतु मुस्लिम स्थापत्य में इस तरह के अलंकरणों का कोई प्रावधान नहीं था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख : भारतीय वास्तु एवं स्थापत्य कला

मौर्य कालीन स्थापत्य

हिन्दू स्थापत्य कला

राजपूत स्थापत्य कला

खजुराहो मंदिर शैली

कलिंग मंदिर शैली

हिन्दू दुर्ग स्थापत्य

हिन्दू जल स्थापत्य

हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य में अंतर

कलिंग मंदिर शैली

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कोणार्क का सूर्यमंदिर : कलिंग मंदिर शैली

उड़ीसा का स्थापत्य प्राचीनकाल में विकसित कलिंग वास्तुकला शैली में निर्मित है। उड़ीसा के मंदिर कलिंग मंदिर शैली के सबसे अच्छे उदाहरण हैं।

कोणार्क का सूर्य मंदिर

कोणार्क का सूर्य मंदिर 13वीं शताब्दी ईस्वी में गंगा राजवंश के राजा नरसिंघेव (प्रथम) ने बनवाया था। यह कलिंग शैली में बना है तथा भगवान बिरंचि-नारायण (सूर्य) को समर्पित है। कोणार्क शब्द, कोण और अर्क शब्दों के मेल से बना है। अर्क का अर्थ होता है सूर्य, जबकि कोण से अभिप्राय कोने या किनारे से रहा होगा।

प्रस्तुत कोणार्क सूर्य-मन्दिर का निर्माण लाल रंग के बलुआ पत्थरों तथा काले ग्रेनाइट के पत्थरों से हुआ है। इसे ई.1236-54 में गंग वंश के राजा नृसिंहदेव द्वारा बनवाया गया। यह मन्दिर, भारत के सबसे प्रसिद्ध स्थलों में से एक है। कलिंग शैली में निर्मित इस मन्दिर में सूर्य देव को रथ में विराजमान किया गया है तथा पत्थरों को उत्कृष्ट नक्काशी के साथ उकेरा गया है।

मन्दिर को बारह जोड़ी चक्रों के साथ सात घोड़ों से खींचते हुए निर्मित किया गया है, जिसमें सूर्य देव को विराजमान दिखाया गया है। वर्तमान में केवल एक घोड़ा बचा है। मन्दिर के आधार को सुन्दरता प्रदान करते ये बारह चक्र साल के बारह महीनों को व्यक्त करते हैं तथा प्रत्येक चक्र आठ अरों से मिल कर बना है, जो दिन के आठ पहरों को दर्शाते हैं। मुख्य मन्दिर तीन मंडपों में बना है।

इनमें से दो मण्डप ढह चुके हैं। तीसरे मण्डप में जहाँ मूर्ति थी, अंग्रेज़ों ने सभी द्वारों को रेत एवं पत्थर भरवा कर बंद करवा दिया था ताकि मन्दिर और क्षतिग्रस्त नहीं हो। मन्दिर में सूर्य भगवान की तीन प्रतिमाएं हैं- (1.) बाल्यावस्था-उदित सूर्य – 8 फुट, (2.) युवावस्था-मध्याह्न सूर्य – 9.5 फुट, (3.) प्रौढ़ावस्था-अपराह्न सूर्य- 3.5 फुट।

प्रवेश-द्वार पर दो सिंह हाथियों पर आक्रमण के लिए तत्पर दिखाये गए हैं। दोनों हाथी, एक-एक मानव के ऊपर स्थापित हैं। ये प्रतिमाएं एक ही पत्थर की बनीं हैं। ये 28 टन की 8.4 फुट लम्बी, 4.9 फुट चौड़ी तथा 9.2 फुट ऊंची हैं। मंदिर के दक्षिणी भाग में दो सुसज्जित घोड़े बने हैं, जिन्हें उड़ीसा सरकार ने अपने राजचिह्न के रूप में अंगीकार किया है।

ये 10 फुट लम्बे एवं 7 फुट चौड़े हैं। मंदिर सूर्य देव की भव्य यात्रा को दिखाता है। इसके प्रवेश द्वार पर नट मंदिर है। यहाँ मंदिर की नर्तकियां, सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिये नृत्य करतीं थीं। मंदिर में फूल, बेल और ज्यामितीय आकृतियों की नक्काशी की गई है। इनके साथ ही मानव, देव, गंधर्व, किन्नर आदि की प्रतिमाएं भी एन्द्रिक मुद्राओं में प्रदर्शित की गई हैं। इनकी मुद्राएं कामुक हैं और कामसूत्र से लीं गई हैं।

मंदिर लगभग खंडहर हो चुका है। यहाँ की शिल्प कलाकृतियों का एक संग्रह, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के सूर्य मंदिर संग्रहालय में सुरक्षित है। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस मन्दिर के बारे में लिखा है-‘कोणार्क जहाँ पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठतर है।’

यह सूर्य मन्दिर भारतीय मन्दिरों की कलिंग शैली का है, जिसमें कोणीय अट्टालिका (मीनार रूपी संरचना) के ऊपर मण्डप की तरह छतरी होती है। आकृति में, यह मंदिर उड़ीसा के अन्य शिखर मंदिरों से भिन्न नहीं लगता है। 229 फुट ऊंचा मुख्य गर्भगृह 128 फुट ऊंची नाट्यशाला के साथ बना है।

इसमें बाहर को निकली हुई अनेक प्रतिमाएं हैं। मुख्य गर्भ में प्रधान देवता का वास था, किंतु वह अब ध्वस्त हो चुका है। नाट्यशाला अभी पूरी बची है। नट मंदिर एवं भोग मण्डप के कुछ ही भाग ध्वस्त हुए हैं। मंदिर का मुख्य प्रांगण 857 फुट गुणा 540 फुट आकार का है। मंदिर पूर्व-पश्चिम दिशा में बना है।

जगन्नाथ मंदिर: पुरी के जगन्नाथ मंदिर की वास्तुकला प्राचीन काल की है। मंदिर के गर्भगृह में मुख्य देव की प्रतिमा स्थापित है तथा गर्भगृह के ऊपर ऊंचा शिखर बना हुआ है। उसके चारों ओर सहायक शिखर हैं। मंदिर परिसर एक दीवार से घिरा हुआ है, जिसमें से प्रत्येक तरफ एक द्वार है, जिसके ऊपर एक पिरामिड-आकार की छत है। राज्य में सबसे बड़ा मंदिर होने के कारण, इसमें रसोईघर सहित दर्जनों सहायक भवन स्थित हैं। मंदिर के शीर्ष पर अष्टधातुओं के मिश्रण से बना एक पहिया है।

कलिंग मंदिर शैली का मुक्तेश्वर मंदिर

यह छोटा मंदिर 10.5 मीटर ऊंचा है। इसके बाहरी हिस्सों पर मूर्तियों का अंकन किया गया है जिनमें देवी-देवताओं के साथ पौराणिक दृश्य भी दर्शाए गए हैं। मंदिर का तोरण द्वारा नक्काशीदार युक्त है। सभा भवन की छत में प्रत्येक पंखुड़ी पर मूर्ति के साथ एक अष्ट-दल कमल की सुंदर चंदवा बनाई गई है।

कलिंग मंदिर शैली का लिंगराज मंदिर

भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर 12वीं सदी में बना। यह मंदिर उड़ीसा की स्थापत्य कला का चरम माना जाता है। इसकी ऊँचाई 150 फुट है। इसकी वास्तुकला कलिंग शैली की सर्वोच्च उपलब्धियों में से एक है।

राजारानी मंदिर

भुवनेश्वर के राजारानी मंदिर का निर्माण ई.1000 के आसपास हुआ। इस मंदिर ने मध्य भारत के अन्य मंदिरों के वास्तुकला के विकास के लिए विशेष रूप से खजुराहो के मंदिरों का मार्गदर्शन किया। अप्सराओं और मिथुन मूर्तियों की कामुक नक्काशी के कारण प्रेम मंदिर के रूप में भी जाना जाता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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मध्यकालीन वेशभूषा एवं आभूषण

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मध्यकालीन वेशभूषा एवं आभूषण

मध्यकालीन वेशभूषा एवं आभूषण लोगों की आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक हैसियत के अनुसार होते थे। विभिन्न समुदायों के लोग प्रायः सूती वस्त्र पहनते थे।

मध्यकालीन वेशभूषा एवं आभूषण वर्तमान काल की अपेक्षा काफी अलग थे। निर्धन लोगों के पास पूरा तन ढकने के लिए भी कपड़े नहीं होते थे। मध्यमवर्गीय परिवारों के वस्त्राभूषण भी अत्यंत साधारण होते थे। केवल सामंती परिवारों एवं श्रेष्ठि परिवारों के पास अच्छे वस्त्राभूषण उपलब्ध थे।

मध्यकालीन वेशभूषा

जन-सामान्य की वेशभूषा

मध्यकालीन वेशभूषा में हिन्दू पुरुषों में धोती, कुर्ता तथा पगड़ी अधिक प्रचलित थे और हिन्दू औरतों में कांचली, घाघरा ओढ़नी अधिक लोकप्रिय थी किंतु साड़ी-ब्लाउज और पेटीकोट भी समान रूप से प्रचलित थीं। औरतें घर से निकलते समय शरीर को चादर से लपेट लेती थीं। मजदूर और किसान वर्ग के लोग घुटनों से ऊपर तक छोटी सी धोती लपेटते थे।

सर्दियों में साधारण लोग सूती कोट पहना करते थे, जिसमें रुई भरी होती थी। उत्तर भारत में पगड़ी अथवा साफा प्रचलित था किंतु कश्मीर और पंजाब में रुई भरी हुई टोपी का चलन था। अत्यंत निर्धन लोग केवल लंगोट लगाकर जीवन बिताते थे। मुसलमानों के राज्य में ऐसे लोगों की संख्या निरंतर बढ़ती चली गई थी।

सरकारी कारिंदों की वेशभूषा

मुसलमान सैनिकों की कोई विशेष पोशाक नहीं थी फिर भी वे चुस्त कपड़े पहनते थे जिन पर तलवार, ढाल, गुप्ती आदि हथियार कसे हुए होते थे। शाही कारिंदे एवं गुलाम कमरबंद, लाल जूते और ‘कुला’ पहनते थे।

तुर्की सुल्तानों के काल की वेशभूषा

दिल्ली सुल्तानों के काल में लम्बी तातारी टोपी पहनने का प्रचलन था किंतु बाद में तातारी टोपी का स्थान पगड़ी ने ले लिया। पगड़ी दोनों समुदायों के लोग सामान्य रूप से धारण करते थे। मुस्लिम सफेद और गोल पगड़ी बांधते थे जबकि हिन्दुओं में रंगीन, ऊँची और नोकदार पगड़ी प्रचलित थी। गर्मी के कारण जुर्राबें बहुत कम पहनी जाती थी।

अधिकांश हिन्दू नंगे पैर रहते थे। बलबन ने अपने गुलामों को जुर्राब पहनने का आदेश दिया था। कट्टर धार्मिक प्रवृत्ति के मुसलमान नमाज आदि में सफाई बनाए रखने के लिए जुर्राबों का इस्तेमाल आवश्यक मानते थे। उस समय तुर्की जूते अधिक प्रचलित थे, जो सामने से नोकदार तथा ऊपर से खुले हुए होते थे। इनको पहनने और उतारने में अधिक सुविधा रहती थी।

अमीर अपने जूते रंगीन मखमल या जरी के बनवाते थे जिन पर रेशम और चमड़े के फीते लगाए जाते थे। कुछ जूतों पर हीरे-जवाहरात भी जड़वाये जाते थे। कालीकट के ब्राह्मण जाड़ों में भूरे चप्पल तथा गर्मियों में काठ की खड़ाऊ पहनते थे। मध्यम-वर्गीय परिवार लाल चमड़े के जूते पहनते थे, जिन पर फूलों की आकृतियां बनी रहती थीं।

साधु-सन्तों, फकीरों एवं दरवेशों को उनकी पोषाक से पहचाना जाता था। मुस्लिम फकीर लम्बी ‘दरवेश-टोपी’ तथा पैरों में ‘काठ की चट्टी’ पहनते थे और शरीर पर एक लम्बा चोगा डालते थे। मुस्लिम दार्शनिक पगड़ी, चोगा तथा पाजामा पहनते थे। हिन्दू संन्यासी एवं योगी केवल लंगोटी से काम चलाते थे। हिन्दू पंडित कमर में रेशमी चादर लपेट लेते थे, जिसका एक छोर पांव तक लटकता रहता था और लाल रंग की रेशमी चादर कन्धों पर डाल लेते थे।

मुगलकाल में शाही अमीरों की वेशभूषा

मध्यकालीन वेशभूषा में उच्च वर्ग के लोगों के वस्त्र महंगे होते थे। अमीर मुसलमान सलवार, सुतन्नी और पाजामा पहनते थे। शरीर के ऊपरी भाग पर कुर्ता, जैकेटनुमा कोट, काबा या लम्बा कोट पहना जाता था जो घुटनों तक लटकता था। यह मलमल या बारीक ऊन का बना होता था। मुगल बादशाह रोएंदार फर के कोट पहनते थे। धनी लोग कन्धे पर रंगीन ऊनी चादर रखते थे।

मध्य-युगीन सुल्तान, अमीर, खान आदि शाही पुरुष जरी वाले रेशमी और मखमली कपड़े पहनते थे। उनकी पोषाकों में दिबा-ए-हफ्तरंग (सप्तरंगी किमखाब), बीसात-ए-जमुरादी (मोतिया रंग की पोशाक), जामा-ए-जारबफ्त (जरी या सोने के तारों से बुना कपड़ा), कतान-ए-रूसी (रूस में बना कपड़ा), कतान-ए-बिरारी, बरकरमान (कई रंगों का ऊनी कपड़ा) आदि का भी प्रयोग होता था।

अकबर की वेशभूषा

अकबर ने अपनी पोशाकों के लिए कुशल दर्जी नियुक्त किए। आइन-ए-अकबरी में ग्यारह प्रकार के कोट का विवरण मिलता है। उनमें ‘टकन चिया पेशवाज’ सर्वाधिक महत्त्व का था। यह गोल-घेरदार कोट था, जो सामने से खुला रहता था और दांयी ओर से बंद होता था।

इसके साथ ही रोएंदार कोट ‘शाह आजीदाह’ का भी महत्त्व था। अकबर मुलायम रेशम की धोती भी पहनता था। मॉन्सेरट ने अकबर की पोशाक के बारे में लिखा है- ‘बादशाह सलामत की पोशाक रेशम की थी, जिस पर सोने का सुन्दर काम किया रहता था। उनकी पोशाक घुटनों तक झूलती थी तथा उसके नीचे पूरे गांव का जूता होता था। वे मोती और सोने के जेवर भी पहनते थे।’

मध्यकालीन महिलाओं की वेशभूषा

मध्यकालीन वेशभूषा में महिलाओं की पोशाक साधारण थी। गरीब स्त्रियां साड़ी पहनती थीं जिसके एक छोर से उनका सिर ढका रहता था। गरीब और अमीर दोनों वर्ग की स्त्रियां वक्ष पर अंगिया पहनती थीं। दक्षिण भारत में निम्न-वर्ग की स्त्रियां सिर नहीं ढकती थीं। गरीब उड़िया स्त्रियां कपड़ा प्राप्त न होने के कारण पत्तियों से शरीर को ढकती थीं। मुसलमान स्त्रियां सलवार-कमीज पहनती थीं, ऊपर से बुर्का डालती थीं।

मध्य-कालीन चित्रों में स्त्रियों को ओढ़नी के साथ पीठ पर बंधने वाली चोली पहने हुए चित्रित किया गया है। स्त्रियां घाघरा भी पहनती थीं, जिनमें किनारी एवं कसीदाकारी का काम होता था। बंगाली स्त्रियां कांचुली या चोली पहनती थीं। यह दो प्रकार की होती थी, एक छोटी होती थी, जिससे केवल स्तन ढकते थे, दूसरी लम्बी होती थी और कमर तक जाती थी।

धनी औरतें कश्मीरी ऊन का बना बारीक ‘कावा’ पहनती थीं। कुछ स्त्रियां उत्तम प्रकार के कश्मीरी शॉल ओढ़ती थीं। हिन्दू और मुसलमान महिलाएं सूती, रेशमी या ऊनी दुपट्टे से सिर ढकती थी। उस काल में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियां जूतों का प्रयोग अधिक करती थीं।

मध्यकालीन समाज में सौन्दर्य प्रसाधन

मनुष्य में सुंदर एवं आकर्षक दिखने की ललक आदिकाल से है। इसलिए शरीर पर सुगंधित पदार्थों का लेप करने, अंगराग लगाने, उबटन मलने, बाल संवारने, काजल लगाने, वस्त्रों को रंगने, आभूषण पहनने आदि की परम्पराएं भी अत्यंत प्राचीन काल से चली आ रही हैं। मध्य-कालीन भारतीय समाज में भी ये परम्पराएं प्रचलन में थीं।

स्नान करने और कपड़ा धोने के लिए साबुन का उपयोग किया जाता था। शरीर एवं कपड़ों पर लगाने के लिए कई प्रकार की कीमती सुगंधियों का प्रयोग किया जाता था। केशों को काला करने के लिए ‘वस्मा’ और ‘खिजाब’ का प्रयोग होता था। कपड़ों को सफेद बनाए रखने के लिए नील का प्रयोग होता था। साबुन, पाउडर और क्रीम जैसी प्रसाधन सामग्रियों के रूप में ‘घासूल’, त्रिफला, उबटन और चन्दन का प्रयोग होता था।

अबुल फजल ने मुगल काल में स्त्रियों के सोलह शृंगारों का उल्लेख किया है जिनमें स्नान करना, केशों में तेल, लगाना, चोटी गूँथना, रत्नों से वेणी शृंगार करना, मोतियों से सजाकर बिन्दी लगाना, काजल लगाना, हाथ रंगना, पान खाना तथा स्वयं को फूलमालाओं तथा कर्णफूल, हार, करधनी आदि आभूषणों से सजाना आदि सम्मिलित हैं। हिन्दू महिलाएं अपने केश पीछे की ओर बांधती थीं।

धनी परिवारों की महिलाएं अपनी केशों को सिर के ऊपर शंक्वाकार गूँथकर उनमें सोने-चांदी के कांटे लगाती थीं। नकली केश लगाने का उल्लेख भी मिलता है। हिन्दू स्त्रियां सिन्दूर का टीका लगाने तथा उससे मांग भरने को शुभ मानती थीं। आंखों में काजल लगाती थीं तथा पलकों को रंगने के लिए सुरमे का प्रयोग करती थीं। भारतीय स्त्रियां अपने हाथों और पांवों में मेहन्दी लगाती थीं।

मुंह पर लगाने के लिए ‘गलगुना’ और ‘गाजा’ (लाल रंग) का प्रयोग किया जाता था। केश संवारने में लकड़ी, पीतल एवं हाथी दांत की कंघियों का प्रयोग होता था। अकबर ने शाही परिवार की सुगन्धित पदार्थों की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए शेख मन्सूर की अध्यक्षता में ‘खुशबूखाना’ स्थापित किया था। जहाँगीर की बेगम नूरजहाँ की माँ ने गुलाब से एक नवीन इत्र का निर्माण किया था जिसका नाम ‘इत्र-ए-जहाँगीरी’ रखा गया। नूरजहाँ स्वयं भी फूलों से इत्र तैयार करती थी और वह विभिन्न डिजाइनों के सुंदर कपड़े डिजाइन करती थी। उन पर चित्र भी बनाती थी।

मध्यकालीन समाज में आभूषण

सभ्यता के विकास के साथ ही स्त्रियों में आभूषणों के प्रति बोध उत्पन्न हुआ। वे अपने शरीर के विभिन्न अंगों को फूल, कौड़ी, छोटे शंख, मिट्टी, ताम्बे एवं सोने के बने मनकों तथा सिक्कों आदि से सजाती थीं। अत्यंत प्राचीन काल से ही हार, ताबीज एवं मनके मिलने लगते हैं।

मुगलकालीन लेखक अबुल फजल ने सैंतीस आभूषणों का उल्लेख किया है। चौक, मांग, कतबिलादर (संभवतः आधुनिक चंद्रमान), सेकर और बिंदुली आदि आभूषण सिर और ललाट पर धारण किए जाते थे। कर्णफूल, पीपल पत्ती, मोर भांवर और बाली कानों में पहने जाते थे। नाक में पहनने के आभूषणों की शुरुआत संभवतः मुसलमानों ने की थी। इनमें ‘नथ’ और ‘बेसर’ अधिक प्रचलित थे।

हिन्दू स्त्रियां सिर के आगे के भाग में सोने-चांदी का टीका या बोर धारण करती थीं। टीका माथे पर झूलता रहता था जबकि बोर माथे के अगले भाग पर स्थिर रहता था। नाक के बाएं भाग में सोने-चांदी की लौंग पहनी जाती थी जिसके आगे के भाग में मोती, हीरा या अन्य कीमती पत्थर जड़ा जाता था। गले में सोने-चांदी के हार पहने जाते थे जिनमें हीरे, जवाहरात एवं मोती आदि से बने नग जड़े जाते थे।

हार एक लड़ी से लेकर कई लड़ी के भी होते थे। धनी स्त्रियों के हार में पांच-सात लड़ियां होती थीं। हाथ के ऊपरी भाग में बाजूबन्द या तोड़े पहने जाते थे और कलाई में कंगन, चूड़ी एवं गजरा पहने जाते थे। कमर में तगड़ी, क्षुद्र खंटिका, कटि मेखला एवं सोने की पेटी धारण की जाती थी। अंगुलियों में अंगूठियां पहनी जाती थीं। पैरों में जेहर, घुंघरू, पायल आदि पहनते थे। पैरों की अंगुलियों में झांक, बिछुआ तथा आंवट पहने जाते थे।

हिन्दू पुरुष कानों में कर्णफूल, गले में साने की चेन तथा अंगुलियों में अंगूठियाँ पहनते थे। राजपूत पुरुषों में ‘कर्णफूल’ धारण करना अनिवार्य था। मुसलमान पुरुष आभूषणों के विरोधी थे, फिर भी कुछ मुसलमान ‘ताबीज’ और ‘गण्डा’ आदि पहनते थे। सुल्तान और मुगल बादशाह सोने, चांदी, हीरे, माणिक आदि के आभूषण पहनते थे।

सर टॉमस रो ने उल्लेख किया है कि- ‘जहाँगीर अपने जन्मदिन पर कीमती वस्त्रों तथा हीरे-जवाहर के आभूषणों से सजकर प्रजा के समक्ष आता था। उसकी पगड़ी सुंदर पक्षी के पंखों से सजी रहती थी, जिसमें एक ओर काफी बड़े आकार का माणिक, दूसरी ओर बड़े आकार का हीरा तथा बीच में हृदय की आकृति का पन्ना सुशोभित होता था। कन्धों पर मोतियों और हीरों की लड़ियां झूलती थीं तथा गले में मोतियों के तीन जोड़े हार होते थे। बाजुओं में हीरे के बाजूबन्द तथा कलाई में हीरे के तीन कंगन होते थे। हाथ की प्रायः प्रत्येक अंगुली में अंगूठी होती थी।’

बहूमूल्य हीरों की बनी ‘मांग टीका’ की कीमत पांच लाख टका तक हो सकती थी। सोने और चांदी के काम में गुजराती हिन्दू स्वर्णकार अधिक विख्यात थे। एक चतुर कारीगर की फीस 64 दाम प्रति तोला थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य लेख : मध्यकालीन भारतीय समाज

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