Monday, January 26, 2026
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गोआ के पुर्तगाली अकबर को लड़कियां भेंट करते थे! (103)

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गोआ के पुर्तगाली - www.bharatkaitihas.com
गोआ के पुर्तगाली अकबर को पुर्तगाली लड़कियां भेंट करते थे!

अकबर के स्त्री-प्रेम की चर्चा पूरी सल्तनत में थी। गोआ के पुर्तगाली भी अकबर की इस कमजोरी से परिचित थे। इसलिए उन्होंने अकबर के दरबार एवं महल में पहुंच बनाने के लिए पुर्तगाली लड़कियों का सहारा लेने का निश्चय किया। ऐसा करना उनके लिए कठिन भी नहीं था।

अबुल फजल लिखता है कि जब अकबर (AKBAR) सूरत में था, तब गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) अकबर से मिलने के लिए आए। उन दिनों गोआ और उसके आसपास के क्षेत्रों पर पुर्तगालियों का अधिकार था।

गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) ईसाई थे और इस क्षेत्र में ईसाई धर्म को बढ़ाने का प्रयास कर रहे थे। अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) नहीं चाहते थे कि अकबर (AKBAR) का सूरत के दुर्ग पर अधिकार हो। इसलिए वे लोग सूरत दुर्ग में रह रहे बागी मिर्जाओं की सहायता करने के लिए आए थे किंतु जब उन्होंने अकबर की विशाल सैन्य-शक्ति को देखा तो उन्होंने बागी मिर्जाओं की सहायता करने की बजाय अकबर से मित्रता करने का विचार किया।

गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) दल ने अकबर (AKBAR) को बहुत सारी भेंट एवं उपहार देकर अकबर के प्रति मित्रता का प्रदर्शन किया। अबुल फजल (ABUL FAZAL) लिखता है कि अकबर बड़ी उत्सुकता से उन पुर्तगालियों से मिला तथा उनसे पुर्तगाल देश के बारे में जानकारी प्राप्त की। अकबर ने उन लोगों से यूरोप के शिष्टाचार एवं अन्य प्रथाओं की भी जानकारी ली। अकबर पुर्तगालियों से मिलने में इसलिए भी रुचि रखता था क्योंकि कुछ वर्ष पहले पुर्तगालियों ने अकबरको दो सुंदर पुर्तगाली लड़कियां भेंट की थीं।

गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) जिन लड़कियों को भेंट करने के लिए लाए थे, इनमें से एक का नाम मारिया मस्केरेन्हास था, वह 18 साल की थी और दूसरी लड़की का नाम जूलियाना मस्केरेन्हास था, वह 17 साल की थी। अकबर (AKBAR) ने मारिया मस्केरेन्हास से विवाह कर लिया तथा उसकी बहिन जूलियाना मस्केरेन्हास अकबर के हरम में चिकित्सक नियुक्त की गई ताकि वह हरम की औरतों की चिकित्सा कर सके।

अकबर (AKBAR) के दरबारी लेखक अबुल फजल (ABUL FAZAL) तथा अकबर के कट्टर आलोचक मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अपनी पुस्तकों में इन पुर्तगाली औरतों का उल्लेख नहीं किया है, इसलिए बहुत समय तक इन पुर्तगाली औरतों का इतिहास अंधकार में ही रहा।

ग्रीस देश के पत्रकार थॉमस स्मिथ ने तथा फ्रांस के प्रथम बारबौन राजा फिलिप्पे पर शोध करने वाले ग्रीस के प्रिंस मिशेल ने अपनी पुस्तक ले राजाह डे बरबोन में इस स्त्री का उल्लेख किया तो अकबर (AKBAR) की गुमनाम पुर्तगाली बेगम का इतिहास भारतीयों के सामने आया।

जे. ए. इज्मेल ग्रेसियाज ने भी अपनी शोध में सिद्ध किया है कि अकबर (AKBAR) की एक पुर्तगाली बेगम थी।

ग्रीस तथा फ्रांस के इन लेखकों ने सिद्ध किया है कि लेडी जूलियाना अकबर (AKBAR) के दरबार में रहने वाली ईसाई स्त्री थी। वह अकबर के हरम की चिकित्सक थी। वह अकबर की एक पत्नी की बहिन थी। लेडी जूलियाना का विवाह बौरबन राजकुमार जीन फिलिप्पि से हुआ था। लेडी जूलियाना के प्रयासों से आगरा में पहला क्रिश्चियन चर्च बना।

यूरोपियन लेखक लिखते हैं कि किसी समय ये दोनों बहनें ईसाई मिशनियों द्वारा आगरा में लाई गई थीं तथा अकबर (AKBAR) को भेंट की गई थीं। कुछ स्थानों पर यह भी संदर्भ मिलता है कि ये दोनों बहिनें पुर्तगाली नहीं थीं अपितु अकबर के न्यायमंत्री अब्दुल हाई की पुत्रियां थीं तथा वे अपने पिता के साथ पश्चिमी आरमीनिया के सिलसिया कस्बे से भारत आई थीं।

थॉमस स्मिथ नामक पत्रकार ने लिखा है कि ये दोनों लड़कियां आरमीनिया से भारत आई थीं तथा अकबर (AKBAR) ने उनमें से एक का विवाह फ्रांस के राजकुमार जीन फिलिप्पे से किया था जो आगे चलकर फ्रांस का राजा बना। थॉमस स्मिथ लिखता है कि जीन फिलिप्पे एक धनी फ्रैंच सैनिक का पुत्र था। यह परिवार फ्रांस के शाही परिवार से सम्बन्धित था।

प्रिंस मिशेल ने अपनी पुस्तक ले राजाह डे बरबोन में लिखा है कि जीन फिलिप्पे ने अकबर (AKBAR) की पुर्तगाली क्रिश्चियन स्त्री की बहिन से विवाह किया था। अकबर ने जीन फिलिप्पे को भारत में बड़े क्षेत्र का राजा बनाया तथा उसे बहुत सी धनराशि भेंट की। प्रिंस मिशेल के अनुसार जीन फिलिप्पे फ्रांस के सम्राट हेनरी (चतुर्थ) का भतीजा था। बाद में जीन फिलिप्पे फ्रांस का प्रथम बोरबन राजा बना।

प्रिंस मिशेल के अनुसार जब जीन फिलिप्पे अकबर (AKBAR) से मिलने के लिए भारत आया तो आगरा आकर बीमार पड़ गया। अकबर के आदेश से अकबर के हरम की चिकित्सक जूलियाना ने फिलिप्पे की चिकित्सा की।

फिलिप्पे इस लेडी चिकित्सक से इतना प्रभावित हुआ कि उसने अकबर (AKBAR) से जूलियाना का हाथ अपने लिए मांग लिया। अकबर ने जूलियाना फिलिप्पे को सौंप दी। इस औरत से फिलिप्पे को कुछ औलादें हुईं जो भारत के भोपाल शहर में रहती थीं। बताया जाता है कि इस परिवार के वंशज आज भी भोपाल में निवास करते हैं।

कुछ विद्वानों ने लिखा है कि अकबर (AKBAR) के महल में जूलियाना नाम की और भी औरतें थीं जिनमें से एक का नाम लेडी जूलियाना डिया-डाकोस्टा था। संभवतः लेडी जूलियाना डिया-डाकोस्टा (Juliana D’Costa) एवं अकबर की साली जूलियाना मस्केरेन्हास ग्रेसियाज (Juliana Mascarenhas Gracias) के इतिहास एक दूसरे से गड्डमड्ड हो गए हैं।

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एक लेखक ने लिखा है कि जूलियाना मस्केरेन्हास (Juliana Mascarenhas Gracias) की बहिन मारिया मस्केरेन्हास (Maria Mascarenhas) को मरियम मकानी कहा गया क्योंकि वह ईसाई थी। जमन नामक एक शोधकर्ता ने इस मत को अस्वीकार करते हुए सिद्ध किया है कि मारिया मस्केरेन्हास (Maria Mascarenhas) को मरियम मकानी नहीं कहा गया। यह उपाधि तो मुगलों में पहले से ही चल रही थी। अकबर (AKBAR) की माँ हमीदा बानू बेगम को मरियम मकानी की उपाधि दी गई थी। अकबर की हिन्दू पत्नी जो आम्बेर की राजकुमारी थी, उसे भी मरियम मकानी की उपाधि दी गई थी। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि मारिया मस्केरेन्हास को ईसाई होने के कारण मरियम मकानी की उपाधि दी गई। फ्रैडरिक फैंथम ने ई.1895 में प्रकाशित अपनी पुस्तक रेमीनेंसेज ऑफ आगरा में लिखा है कि अकबर (AKBAR) की एक क्रिश्चियन पत्नी थी जिसका नाम मैरी था। वह लिखता है कि इतिहासकारों ने अकबर की इस बेगम का अकबर पर प्रभाव बहुत कम करके आंका है। इस बेगम के प्रभाव के कारण अकबरईसाई धर्म की तरफ झुकने लगा था। जमन नामक शोधकर्ता ने लिखा है कि इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि अकबर के शासन काल में मुगल एम्पायर पर यूरोप की ईसाई औरतों का प्रभाव था किंतु जूलिया मस्केरेन्हास की कहानी में कुछ काल्पनिक सामग्री भी जोड़ दी गई है।

अकबर (AKBAR) ने ई.1562 में आगरा में एक चर्च बनाने की अनुमति प्रदान की। लगभग 74 साल तक यह चर्च आगरा में खड़ा रहा। ई.1636 में अकबर के पोते शाहजहाँ ने इस चर्च को तुड़वाया। जब भारत पर अंग्रेजों का बोलबाला हो गया, तब उसी स्थान पर सेंट पीटर्स रोमन कैथोलिक कैथेडरल नाम से एक नया चर्च बनाया गया।

गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) मूल की भारतीय प्रोफेसर लुई डे आसिस कोरिया ने अपनी पुस्तक पोर्चूगीज इण्डिया एण्ड मुगल रिलेशन्स (1510-1735) में लिखा है कि अकबर (AKBAR) के जोधा नामक कोई स्त्री नहीं थी। डोना मारिया मैस्केरेन्हास (The Hindi phrase “डोना मारिया मैस्केरेन्हास” (Dona Maria Mascarenhas) एक पुर्तगाली स्त्री थी जिसे जोधा नाम दिया गया।

प्रोफेसर लिखती है कि मारिया मस्केरेन्हास तथा उसकी बहिन जूलियाना (Juliana Mascarenhas Gracias) को पुर्तगालियों ने तस्करों के हाथों से मुक्त करवाकर गुजरात के शासक बहादुरशाह को सौंपा था। बहादुरशाह ने उन बहिनों को बादशाह के दरबार में उपहार के रूप में भिजवाया।

प्रोफेसर लुई डे आसिस कोरिया के अनुसार अकबर ने मारिया मस्केरेन्हास (Maria Mascarenhas) की पहचान छिपाने के लिए उसे जोधा बाई नाम दिया। कुछ विद्वानों ने इस बात पर भी शोध की है कि मुगल इतिहासकारों ने इन बहिनों का इतिहास क्यों छिपाया!

यह बात सही नहीं लगती कि बादशाह अकबर ने इन बहिनों का इतिहास छुपाया। जब मुगल इतिहासकारों ने अकबर की हिन्दू बेगमों की पहचान नहीं छिपाई तो उन्होंने भला अकबर की ईसाई बेगमों की पहचान क्यों छिपाई होगी!

गोआ के पुर्तगाली (PORTUGUESE OF GOA ) मूल की इन बहिनों के इतिहास पर शोध के निष्कर्ष अलग-अलग बातें कह सकते हैं किंतु सारांश रूप में इतना कहा जा सकता है कि ये पुर्तगाली बहिनें गोआ के पुर्तगालियों द्वारा अकबर (AKBAR) को उपहार स्वरूप दी गई थीं तथा अकबर इन औरतों के प्रभाव के कारण ईसाई धर्म की तरफ झुकने लगा था।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

शरफुद्दीन मिर्जा ने अकबर की अधीनता अस्वीकार कर दी! (104)

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शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) ने अकबर की अधीनता अस्वीकार कर दी!

शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) तैमूरी खान का शहजादा था, इसलिए अकबर उसे मारना नहीं चाहता था, उसे अपनी सेवा में रखना चाहता था किंतु शरफुद्दीन मिर्जा ने अकबर की अधीनता अस्वीकार कर दी!

सूरत विजय के बाद अकबर (AKBAR) ने बहुत से लोगों को पकड़कर बंदीगृह में रख दिया तथा सूरत दुर्ग में मौजूद समस्त कीमती सामग्री आगरा के लिए रवाना कर दी। सूरत के दुर्ग (Surat Fort) में कुछ बड़ी तोपें भी थीं जिन्हें सुलेमानी तोपें कहा जाता था।

इन्हीं तोपों के कारण अकबर (AKBAR) को सूरत का किला जीतने में दो माह से अधिक का समय लगा था। अकबर ने इन तोपों को बैलगाड़ियों एवं ऊंटगाड़ियों पर लदवाकर आगरा के लिए रवाना कर दिया।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि अकबर (AKBAR) अभी कुछ और दिन सूरत में रुककर आसपास के बंदरगाहों तथा नगरों पर अधिकार करना चाहता था किंतु स्थानीय गवर्नरों ने इस कार्य में अकबर की सहायता नहीं की तथा सेना के पास रसद का अभाव होने लगा, इसलिए अकबर ने अपनी सेना को लौटने के आदेश दिए तथा स्वयं भी एक सेना के साथ रवाना हो गया।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है- ‘इसी समय बगलाना का जमींदार बहारजी अकबर (AKBAR) के दरबार में आया। यह उधर की ओर का बड़ा जमींदार था। बगलाना देश 100 कोस लम्बा और 30 कोस चौड़ा है। यहाँ के जागीरदार के पास 2000 सवार और 16 हजार प्यादे हैं। यहाँ की आय साढ़े छः करोड़ दाम सालाना है। पहाड़ियों की चोटी पर सालही और मालहीर दो दुर्ग हैं। इस देश में अंतःपुर एवं चिंतापुर नामक दो बड़े नगर हैं। यह देश गुजरात तथा दक्षिण के बीच स्थित है।’

मुगल बादशाह तथा उनके अधिकारी, भारत के स्थानीय राजाओं को जमींदार कहते थे। उस काल के मुगल अभिलेखों में जयपुर एवं जोधपुर जैसे बड़े राजाओं के लिए भी जमींदार शब्द का प्रयोग किया गया है।

अतः अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने जिसे बगलाना का जमींदार लिखा है, वह वस्तुतः उस क्षेत्र का कोई बड़ा राजा था। बहारजी नाम से अनुमान होता है कि यहाँ किसी गुजराती अथवा पारसी राजा की बात हो रही है क्योंकि ये लोग परम्परा से अपने नाम के पीछे आज भी जी लगाते हैं।

अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि बहारजी अपने साथ शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) के गले में जंजीर बांधकर अकबर (AKBAR) के दरबार में आया। किसी समय शरफुद्दीन मिर्जा अकबर का बड़ा कृपापात्र था किंतु पिछले कुछ वर्षों में वह भी बागी मिर्जाओं में सम्मिलित हो गया था।

अकबर (AKBAR) शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) को मारना नहीं चाहता था किंतु उसे मृत्यु का भय दिखाकर फिर से अपने पक्ष में करना चाहता था। इसलिए अकबर ने शरफुद्दीन मिर्जा को एक भयंकर हाथी के सामने पटकवाया तथा शरफुद्दीन मिर्जा से कहा कि यदि वह शपथ ले कि भविष्य में कभी भी बादशाह से बगावत नहीं करेगा तथा बादशाह की सेवा करेगा तो उसे क्षमा किया जा सकता है किंतु शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) ने हाथी के पैरों कुचले जाकर मरना पसंद किया, अकबर (AKBAR) की सेवा में दुबारा आने से मना कर दिया।

इस पर भी अकबर (AKBAR) ने शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) के प्राण नहीं लिए। हाथी को वहाँ से हटा दिया गया और शरफुद्दीन मिर्जा को जेल में बंद कर दिया गया। अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि शरफुद्दीन मिर्जा (SHARAFUDDIN MIRZA) दर-दर भटका करता था, इसी से उसकी नीचता प्रकट होती थी।

अकबर (AKBAR) को ज्ञात हुआ कि बगलाना के जमींदार बहारजी ने मरहूम इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) की बेगमों और लड़कियों को भी पकड़ने का प्रयास किया था जो बगलाना के क्षेत्र में से होकर गुजर रही थीं।

बहारजी इस कार्य में पूरी तरह सफल नहीं हो सका था फिर भी वह इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) की एक पुत्री तथा इब्राहीम हुसैन मिर्जा की दो साल की कमाई लूटने में सफल रहा था। अकबर (AKBAR) इस बात को कतई सहन नहीं कर सकता था कि कोई भी अमीर, शत्रु या जमींदार शाही परिवार के किसी भी व्यक्ति को कष्ट पहुंचाने का साहस करे, भले ही शाही परिवार का वह व्यक्ति अकबर का शत्रु ही क्यों न हो!

इसलिए अकबर (AKBAR) ने मीर खाँ यथावल को आदेश दिए कि वह बगलाना के जागीरदार बहारजी को बंदी बना ले। बहारजी की कैद से इब्राहीम हुसैन मिर्जा (IBRAHIM HUSSAIN MIRZA) की पुत्री को छुड़ा लिया गया। अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि बगलाना के जमींदार ने अकबर की बड़ी अच्छी सेवा की।

इससे अनुमान होता है कि अकबर (AKBAR) ने बहारजी को मुक्त करके अपनी सेवा में ले लिया था। गुजरात विजय के बाद अकबर सीकरी के लिए रवाना हो गया। बहुत से अमीर अकबर की वापसी में उसे सिद्धपुर तक छोड़ने के लिए गए। जब अकबर सिद्धपुर पहुंचा तो उसे खानेआजम अजीज कोका (AZIZ KOKA) की चिंता हुई। खानेआजम अकबर का धायभाई था।

अकबर (AKBAR) ने उसे गुजरात का गवर्नर बना तो दिया था किंतु उसे ज्ञात था कि मिर्जाओं का विद्रोह अभी पूरी तरह थमा नहीं है। वे फिर से उपद्रव कर सकते हैं और खानेआजम के सामने बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकते हैं। इसलिए अकबर ने खानेआजम को एक पत्र लिखा जिसमें उसने अपने हृदय की चिंताएं व्यक्त करते हुए लिखा कि शासक को सदैव सक्रिय रहना चाहिए।

लोगों की छोटी-छोटी भूलों की उपेक्षा करनी चाहिए। विवादों का निर्णय बहुत सोच-विचार कर करना चाहिए। मित्रों और शत्रुओं के प्रति निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए।

अकबर (AKBAR) के इस पत्र से लगता है कि अकबर बहुत समझदार व्यक्ति था किंतु जब हम उसके द्वारा शराब के नशे में की गई हरकतों के बारे में पढ़ते हैं तो हमें लगता है कि वह भी मुहम्मद बिन तुगलक की तरह ‘समझदार-पागल’ था।

खानदेश का शासक राजा अली खाँ भी अकबर (AKBAR) को विदा करने के लिए सिद्धपुर तक आया था। अकबर ने उसे भी वापस खानदेश भेज दिया। मालवा का गवर्नर मुजफ्फर खाँ भी सिद्धपुर आया था। उसे भी अकबर ने यहीं से मालवा के लिए रवाना कर दिया।

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इसके बाद अकबर (AKBAR) ने तीन हिन्दू सेनापतियों कुंअर मानसिंह, राजा जगन्नाथ और राजा गोपाल तथा छः मुस्लिम अमीरों को आदेश दिया कि वे ईडर होते हुए डूंगरपुर जाएं तथा वहाँ के राजाओं को अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए समझाएं। यहाँ अकबर का आशय ईडर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा तथा उदयपुर के शासकों से था जो अब भी अकबर की पहुंच से बाहर थे। इसके बाद अकबर ने सिद्धपुर से पाटन, सिरोही तथा जालौर होते हुए अजमेर का मार्ग पकड़ा। अकबर का पुत्र दानियाल इस समय आम्बेर में रह रहे थे। अकबर ने एक सेना भगवानदास के पुत्र माधोसिंह के नेतृत्व में आम्बेर भिजवाई ताकि वह शहजादे दानियाल को अपनी सुरक्षा में आम्बेर से अजमेर ला सके। इस सेना के साथ जयपुर की राजकुमारी हीराकंवर जो कि राजा भारमल की पुत्री, भगवंतदास की बहिन तथा मानसिंह एवं माधोसिंह की बुआ थी और जिसका विवाह अकबर के साथ हुआ था, आम्बेर भिजवाया गया ताकि वह अपने भतीजे भुवनपति की मृत्यु पर शोक व्यक्त करने अपने पीहर जा सके। राजा भगवान दास का पुत्र भुवनपति सरनाल की लड़ाई में काम आया था। अजमेर से अकबर सीकरी चला गया।

3 जून 1573 को अकबर (AKBAR) ने अपनी राजधानी में प्रवेश किया। बड़े-बड़े अमीर और सूबेदार अकबर (AKBAR) का स्वागत करने के लिए राजधानी में एकत्रित हुए। इस अवसर पर लाहौर का सूबेदार हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) भी अकबर के दरबार में उपस्थित हुआ।

वह अपने साथ मसूद हुसैन मिर्जा और उन तमाम लोगों को लेकर आया था जो लड़ाई में पकड़े गए थे। अबुल फजल (ABUL FAZAL) ने लिखा है कि इन सबको गाय के कच्चे चमड़े में लपेटा हुआ था और उनके सींग भी नहीं हटाए गए थे।              

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

तैमूरी शहजादे बगावत पर उतर आए (105)

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तैमूरी शहजादे

जब तैमूरी शहजादे (TIMURID PRINCE ) बगावत पर उतर आए तब अकबर ने उन्हें नष्ट करने की एक गुप्त योजना बनाई और उसे कार्यान्वित करने के लिए आगरा से गुजरात तक सेनाओं की दौड़ का आयोजन किया ताकि मुगल सेनाएं जल्दी से जल्दी गुजरात पहुंच जाएं तथा किसी को अकबर की योजना की भनक भी न लगे।

अकबर (AKBAR) सूरत का दुर्ग जीतने के बाद सिद्धपुर, पाटन, सिरोही, जालौर तथा अजमेर होता हुआ आगरा पहुंचा जहाँ अनेक बड़े सूबेदारों, अमीरों एवं मुगल बेगों ने अकबर का स्वागत किया।

लाहौर का सूबेदार हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) बगावत करने वाले मसूद हुसैन मिर्जा और उन तमाम लोगों को लेकर आया था जो लड़ाई में पकड़े गए थे। अबुल फजल ने लिखा है कि इन सबको गाय के कच्चे चमड़े में लपेटा हुआ था और उनके सींग भी नहीं हटाए गए थे। यह एक वीभत्स दृश्य था।

कच्ची खाल में लिपटे मिर्जाओं के मुँह पर मक्खियां भिनभिना रही थीं जिन्हें वे अपने हाथों से उड़ा भी नहीं सकते थे। इन मिर्जाओं की पीड़ा का वर्णन करना संभव नहीं है।

अकबर की तरह ये भी तैमूरी शहजादे (TIMURID PRINCE ) थे तथा इन्हें मिर्जा (Mirza) कहा जाता था। बाबर के बेटों की दर्दभरी दास्तान में हमने चर्चा की थी कि जब उज्बेक योद्धा शैबानी खाँ (SHAIBANI KHAN) ने बाबर (BABUR)  को समरकंद (SAMARAKAND)  से तथा अन्य तैमूरी बादशाहों को खुरासान (KHORASAN) तथा ट्रांसऑक्सियाना (TRANSOXIANA)  से निकाल दिया था, तब बहुत से तैमूरी शहजादे (TIMURID PRINCE ) तथा उनके सैनिक भाग-भाग कर बाबर (BABUR)  की शरण में आए थे।

बाबर (BABUR)  ने इन्हें बड़े प्रेम से अपने पास रखा था किंतु इन मिर्जाओं ने पग-पग पर बाबर (BABUR)  के साथ धोखा किया था। बाबर (BABUR)  के पुत्र हुमायूँ (HUMAYUN) ने भी अनेक मिर्जाओं को अपनी शरण में रखा तथा उन्होंने भी हुमायूँ के साथ धोखा किया। जब हुमायूँ (HUMAYUN) दुबारा भारत में अपने पैर जमाने में सफल रहा था, तब हुमायूँ ने इन मिर्जाओं को संभल की बड़ी जागीर दी थी, यह वही जागीर थी जो बाबर (BABUR) ने हुमायूँ को दे रखी थी।

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इस जागीर में वर्तमान उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में आजमपुर तथा निहटौर आदि के इलाके सम्मिलित थे। हुमायूँ (HUMAYUN) ने इन मिर्जाओं को यह अधिकार दे रखा था कि जब वह युद्ध के मैदान में लड़ रहा होता था तब ये मिर्जा हुमायूँ के घोड़े के चारों ओर रहकर युद्ध करते थे। जब हुमायूँ की मृत्यु हो गई, तब अकबर (AKBAR) ने भी मिर्जाओं की संभल की जागीर बनाए रखी तथा युद्ध के मैदान में बादशाह के घोड़े के पास रहकर लड़ने के अधिकार को भी अक्षुण्ण रखा किंतु मिर्जाओं के रक्त में वफादारी कम, धोखाधड़ी अधिक थी। ये सारे मिर्जा (Timurid Dynasty) के थे और इनमें से बहुत से मिर्जा, बाबर (BABUR) के चाचा, ताऊ तथा दादा-परदादा के वंशज थे। इनमें से बहुतों के साथ बाबर के खानदान की शहजादियों के विवाह किए गए थे और बहुत से मिर्जाओं की पुत्रियों के विवाह बाबर की बहिनों एवं बेटी-पोतियों के साथ हुए थे। इस कारण बाबर के खानदान में मिर्जाओं को अवध्य माना जाता था। फिर भी अवसर आने पर बाबर, हुमायूँ (HUMAYUN) और अकबर तीनों को ही इन मिर्जाओं के विरुद्ध कार्यवाही करनी पड़ी थी। मिर्जा लोग धूर्त, मक्कार और विश्वासघाती थे। इन्हें स्वयं पता नहीं था कि ये अपनी जिंदगी से तथा बाबर के परिवार से चाहते क्या थे!

इसलिए जब भी अवसर मिलता था, बगावत का झण्डा बुलंद कर देते थे। यद्यपि इतिहास की पुस्तकों में अकबर (AKBAR)  के काल में हुए मिर्जाओं के विद्रोह को बहुत कम महत्व दिया गया है तथापि जब हम अबुल फजल, मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी, राहुल सांकृत्यायन आदि लेखकों की पुस्तकों पर दृष्टिपात करते हैं तो ज्ञात होता है कि अकबर (AKBAR)  के काल में हुआ मिर्जाओं का विद्रोह देश-व्यापी था।

विद्रोही मिर्जाओं की गतिविधियां उत्तर में संभल से लेकर पूर्व में कालपी तथा कन्नौज तक, मध्य भारत में बयाना एवं मालवा तक, पश्चिम में गुजरात से लेकर दक्षिण में खानदेश तक फैली हुई थीं। इतने बड़े विद्रोह को दबाने में अकबर (AKBAR)  को बहुत शक्ति, ऊर्जा, समय, धन और संसाधन व्यय करने पड़े थे।

इस बार के मिर्जाओं के विद्रोह में मसूद हुसैन मिर्जा, मुहम्मद हुसैन मिर्जा, शाह मिर्जा, इब्राहीम मिर्जा तो सम्मिलित थे ही, साथ ही बाबर (BABUR)  के मरहूम बेटे कामरान की पुत्री गुलरुख बेगम भी बागी मिर्जाओं में सम्मिलित हो गई थी, वह इब्राहीम हुसैन मिर्जा की बीवी थी। बागी मिर्जा, अकबर (AKBAR) के अमीरों की सेनाओं द्वारा हर जगह हराए गए और वहाँ से उखाड़कर भगाए गए।

पाठकों को स्मरण होगा कि जब बादशाह अकबर (AKBAR) हकीम मिर्जा के पीछे पंजाब की तरफ गया था, तब संभल की तरफ के मिर्जाओं ने दिल्ली में आकर उत्पात किया था। जब खानखाना हकीम खाँ ने उन्हें दिल्ली से भगा दिया तो इन मिर्जाओं ने भागकर गुजरात में शरण ली थी। इस प्रकार ये तैमूरी शहजादे अकबर के शासनकाल के आरम्भ से ही अकबर को परेशान कर रहे थे।

गुजरात पर उन दिनों चिंगीज खाँ नामक एक अफगान अमीर का शासन था। उसने इन मिर्जाओं को भड़ौंच की जागीर दी। इतनी सी जागीर से मिर्जाओं का काम चलने वाला नहीं था। इसलिए मिर्जाओं ने चिंगीज खाँ को मार दिया तथा गुजरात से लेकर खानदेश तक के बहुत से नगरों पर कब्जा कर लिया।

इस प्रकार पाटन, अहमदाबाद, बड़ौदा, चम्पानेर, सूरत, भड़ौंच आदि नगर मिर्जाओं के प्रमुख केन्द्र बन गए। अकबर (AKBAR)  ने इन सभी स्थानों पर स्वयं जाकर उन्हें अपने अधिकार में लिया था और मिर्जाओं को मार भगाया था। अन्य स्थानों पर भी शाह कुली खाँ महरम, धायभाई अजीज कोका, राजा टोडरमल, खानखाना मुनीम खाँ, कुंअर मानसिंह, बीकानेर के कुंअर रायसिंह आदि ने मिर्जाओं को परास्त करके भगाया था।

शाह कुली खाँ महरम जब नगरकोट के अभियान में था, उस समय कुछ मिर्जा भागकर उस तरफ चले गए। शाह कुली खाँ ने उनमें से कई मिर्जाओं को मार दिया जिनमें गुलरुख बेगम का पति इब्राहीम हुसैन मिर्जा भी सम्मिलित था। शाह कुली खाँ ने मसूद हुसैन मिर्जा और उसके साथियों को पकड़ कर गाय की कच्ची खाल में लपेट दिया।

मुगलों के राज्य में किसी भी अमीर, उमराव अथवा बेग को यह अनुमति नहीं थी कि वह किसी तैमूरी शहजादे (TIMURID SHAHZADE) को इस तरह अपमानित अथवा पीड़ित करे किंतु हुसैन कुली खाँ (HUSAIN KULI KHAN) अकबर (AKBAR) का अत्यंत विश्वसनीय था और अकबर ने उसे खानेजहाँ की उपाधि दे रखी थी।

इसलिए उसने मसूद हुसैन मिर्जा तथा अन्य तैमूरी शहजादों को गाय की कच्ची खाल में बंद करके अकबर (AKBAR)  के समक्ष प्रस्तुत करने का दुस्साहस किया था।

अकबर (AKBAR)  को अपने खानदान के शहजादों को इस हालत में देखकर बहुत बुरा लगा किंतु अकबर (AKBAR)  के दरबारियों को बड़ी प्रसन्नता हुई। अकबर (AKBAR) के दरबारी लेखक अबुल फजल ने लिखा है कि बागियों को इस हालत में देखकर अकबर (AKBAR) के दरबारियों में हर्ष की लहर दौड़ गई किंतु अकबर (AKBAR) को उन पर बड़ी दया आई तथा अकबर (AKBAR) ने उन्हें इस पोषाक से मुक्त करवाकर अलग-अलग मुगल अधिकारियों के संरक्षण में रख दिया ताकि उन्हें सुधरने का अवसर मिल सके।

अकबर (AKBAR) के अमीरों को जिम्मेदारी दी गई कि वे इन मिर्जाओं का चाल-चलन देखकर उसकी सूचना अकबर (AKBAR)  को दें ताकि उनके सम्बन्ध में अंतिम निर्णय ले सके।

अभी अकबर (AKBAR) को गुजरात से आए हुए कुछ ही समय हुआ था कि सुल्तान ख्वाजा समाचार लेकर आया कि मुजफ्फर हुसैन मिर्जा ने खंभात में शाही सेना को परास्त कर दिया है और बागी मिर्जाओं एवं गुजरातियों ने अहमदाबाद घेर लिया है। तैमूरी शहजादे (TIMURID PRINCE) एक बार फिर से बगावत पर उतर आए थे।)

जब अकबर (AKBAR) को ये समाचार मिले तो अकबर (AKBAR) ने तुरंत गुजरात पहुंचने का निश्चय किया। राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि अकबर ने आगरा से पाटन तक एक सैनिक दौड़ का आयोजन किया।

इसमें 16 सेनापतियों ने भाग लिया जिनमें से 13 हिन्दू सेनापति थे। अकबर (AKBAR) स्वयं भी एक तेज सांडनी पर सवार होकर कुछ चुने हुए सैनिकों के साथ गुजरात के लिए रवाना हो गया। अबुल फजल ने अकबर की यात्रा का जो वर्णन किया है, उससे अकबर की बेचैनी का अनुमान लगाया जा सकता है।

  ✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

गुजरात की बगावत से विचलित हो गया अकबर (106)

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गुजरात की बगावत - www.bharatkaitihas.com
गुजरात की बगावत

अकबर को समाचार मिला कि कामरान की बेटी गुलरुख बेगम का पुत्र मुजफ्फर हुसैन मिर्जा अकबर के सैनिकों को मार रहा है। गुजरात की बगावत से अकबर बुरी तरह विचलित हो गया।

जब अकबर (Akbar) को ज्ञात हुआ कि मिर्जाओं ने गुजरात की बगावत (REVOLT OF GUJARAT) में आकर फिर से झण्डा बुलंद कर दिया है तो अकबर ने अपने 16 सेनापतियों को पाटन पहुंचने का आदेश दिया। अकबर स्वयं भी एक तेज सांडनी पर सवार होकर कुछ चुने हुए सैनिकों के साथ गुजरात की ओर दौड़ा। राजस्थान एवं गुजरात में मादा ऊंट को साण्ड कहा जाता है। कुछ लेखक उसे मादा ऊंट होने के कारण साण्डनी लिखते हैं।

इस बार गुजरात की बगावत (REVOLT OF GUJARAT) में खड़े किए गए उपद्रव के तीन बड़े नेता थे। एक तो था मुहम्मद हुसैन मिर्जा, दूसरा था मुजफ्फर हुसैन मिर्जा तथा तीसरा था अख्तियारुल्मुल्क। इनमें से मुजफ्फर हुसैन मिर्जा कामरान की बेटी गुलरुख बेगम और इब्राहीम हुसैन मिर्जा का 16 वर्षीय पुत्र था। अब वह जवान हो गया था।

बगावत का जो झण्डा कामरान ने हुमायूँ के खिलाफ उठाया था, अब उस झण्डे को बुलंद किए रखने की जिम्मेदारी कामरान के नवासे मुजफ्फर हुसैन मिर्जा के कंधों पर आ गई थी। मुजफ्फर हुसैन मिर्जा समझता था कि वह अकबर (Akbar) जैसे शक्तिशाली बादशाह को अपनी तलवार से काट डालेगा।

अबुल फजल ने लिखा है कि जब दौलताबाद में मुहम्मद हुसैन मिर्जा (MUHAMMA HUSAIN MIRZA) ने सुना कि अकबर (Akbar) राजधानी सीकरी की ओर प्रयाण कर रहा है तो उसने सूरत में आकर उत्पात खड़ा कर दिया। सूरत के किलेदार कुलीच खाँ को दुर्ग में बंद होकर अपनी जान बचानी पड़ी।

इस पर मुहम्मद हुसैन मिर्जा (MUHAMMA HUSAIN MIRZA) भड़ौंच चला गया। अकबर (Akbar) ने भड़ौंच में कुतुबुद्दीन खाँ को नियुक्त किया था किंतु कुतुबुद्दीन के अधिकारी कुतुबुद्दीन से गद्दारी करके मुहम्मद हुसैन मिर्जा (MUHAMMA HUSAIN MIRZA) से मिल गए। इस प्रकार मुहम्मद हुसैन मिर्जा (MUHAMMA HUSAIN MIRZA) ने भड़ौंच पर अधिकार कर लिया।

इस विजय से उत्साहित होकर मुहम्मद हुसैन मिर्जा (MUHAMMA HUSAIN MIRZA) ने खंभात पर भी अधिकार कर लिया। इख्तियारुल्मुल्क भी अहमदाबाद पर चढ़ बैठा। अकबर (Akbar) ने यहाँ धायभाई अजीज कोका (AJIJ KOKA) अर्थात् खानेआजम को नियुक्त कर रखा था। इस समय वह अहमदाबाद से बाहर किसी पहाड़ी क्षेत्र में था।

इसलिए खानेआजम को भागकर एक अज्ञात दुर्ग में शरण लेनी पड़ी। जब इख्तियारुल्मुल्क अहमदाबाद में घुसने को हुआ तो अजीज कोका (AJIJ KOKA) उस अज्ञात दुर्ग से बाहर निकलकर अहमदाबाद की तरफ भागा। इख्तियारुल्मुल्क को अहमदाबाद से दूर हटना पड़ा।

इसी समय मुहम्मद हुसैन मिर्जा (MUHAMMA HUSAIN MIRZA) खंभात से अहमदाबाद आया तथा इख्तियारुल्मुल्क और शेर खाँ फुलादी के पुत्रों से मिल गया। अब इन लोगों ने अहमदाबाद में घुसने की तैयारी की।

अबुल फजल ने लिखा है कि गुजरातियों ने लम्बे-लम्बे भाषण दिए तथा तीन दिन तक बहस की। तब तक खानेआजम ने अहमदाबाद में घुसकर अहमदाबाद की तरफ आने वाले मार्गों को बंद कर दिया।

खंभात का मुगल गवर्नर कुतुबुद्दीन भी भड़ौंच से पराजित होकर अहमदाबाद पहुंच गया तथा खानेआजम से आ मिला। इस प्रकार दोनों तरफ गोलबंदी हो गई। जब बहुत बड़ी संख्या में बागी मिर्जा एवं गुजराती अमीर अहमदाबाद पहुंच गए तो युद्ध अनिवार्य हो गया।

अबुल फजल लिखता है कि यदि शाही सेना बागियों का सामना करती तो जीत शाही सेना की होती किंतु न तो खानेआजम को अपने अधिकारियों पर भरोसा था और न खंभात से आए कुतुबुद्दीन को अपने सैनिकों पर भरोसा था।

इसलिए वे अहमदाबाद में बंद होकर बैठे रहे, उन्होंने अपनी तरफ से मिर्जाओं पर आक्रमण करने की कोई पहल नहीं की। खानेआजम ने इसका कारण यह बताया कि शहंशाह अकबर (Akbar) ने खानेआजम को सलाह दी थी कि जब बागी आपस में मिल जाएं और उनकी शक्ति बढ़ जाए, तब युद्ध के सम्बन्ध में सोच-समझ कर निर्णय करना चाहिए।

अहमदाबाद के मुगल अमीरों में फाजिल खाँ नामक एक उत्साही अमीर भी था। उसे यह अच्छा नहीं लगा कि शत्रु-दल अहमदाबाद को घेरकर खड़ा रहे और मुगल सेना अहमदाबाद के भीतर दुबक कर बैठी रहे।

इसलिए एक दिन फाजिल खाँ खानेआजम से अनुमति लेकर खानपुर दरवाजे से बाहर निकला और उसने बागियों को युद्ध के लिए ललकारा। जब मिर्जाओं तथा गुजराती अमीरों की सेना ने फाजिल खाँ तथा उसकी सेना को अहमदाबाद से बाहर आया देखा तो वे फाजिल खाँ तथा उसकी सेना पर टूट पड़े।

फाजिल खाँ के गद्दार सैनिक उसी समय मोर्चा छोड़कर भाग गए।

मिर्जाओं की सेना ने फाजिल खाँ को घायल कर दिया। वह फिर से भाग कर अहमदाबाद नगर में घुस गया। नगर में घुसने के कुछ देर बाद ही उसकी मृत्यु हो गई।

सुल्तान ख्वाजा भी फाजिल खाँ के साथ अहमदाबाद से बाहर निकला था। वह भी उल्टे पांव नगर की तरफ भागा किंतु उसका घोड़ा उछला और सुल्तान ख्वाजा एक खाई में गिर गया। इस पर एक टोकरी में रस्सी बांधकर सुल्तान ख्वाजा को खाई से बाहर निकाला गया। नगर के दरवाजे बंद हो गए तथा मिर्जाओं एवं गुजरातियों की सम्मिलित सेना नगर से थोड़ी दूर, अपने स्थान पर लौट गई।

खानेआजम अजीज कोका (AJIJ KOKA) (AJIJ KOKA) ने अगले ही दिन सुल्तान ख्वाजा को एक पत्र देकर अकबर (Akbar) के पास सीकरी भिजवाया। जब सुल्तान ख्वाजा अहमदाबाद के समाचार लेकर अकबर (Akbar) के पास पहुंचा तो अकबर (Akbar) विचलित हो गया।

अबुल फजल लिखता है कि अकबर (Akbar) का अजीज कोका (AJIJ KOKA) (AJIJ KOKA) से बड़ा प्रेम था। उसने तुरंत गुजरात की बगावत (REVOLT OF GUJARAT) को शांत करने का निर्णय लिया। अकबर (Akbar) ने अपना हरम कुंअर रायसिंह, सैयद महमूद बारहा तथा सुजात खाँ को सौंपा और अपने सेनापतियों को बुलाकर कहा कि आप सबको तुरंत पाटन पहुंचना है। मैं भी पाटन जा रहा हूँ किंतु मेरा दिल कहता है कि मुझसे पहले पाटन कोई नहीं पहुंच सकता।

अकबर (Akbar) ने मानसिंह कच्छावा, राजा टोडरमल, बिहारीमल, शेख इब्राहीम हकीमउलमुल्क, शेख अहमद आदि सेनापतियों को शहजादों की रक्षा के लिए सीकरी में नियुक्त किया। अबुल फजल ने यहाँ राजा बिहारी मल का नाम गलत लिखा है क्योंकि वह इस समय लाहौर में नियुक्त था।

23 अगस्त 1573 को अकबर (Akbar) एक तेज साण्डनी पर सवार होकर गुजरात के लिए रवाना हो गया। अकबर (Akbar) के वफादार सेनापतियों ने घोड़ों एवं साण्डनियों पर सवार होकर अकबर (Akbar) को चारों ओर से घेर लिया और वे भी अकबर (Akbar) के साथ तेज गति से अहमदाबाद की तरफ बढ़ने लगे।

राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि अकबर (Akbar) ने 27 अमीरों को पाटण पहुंचने के आदेश दिए थे जिनमें से 15 हिन्दू थे। अबुल फजल ने अकबर (Akbar) के साथ जाने वाले मुस्लिम सेनापतियों की संख्या 14 तथा हिन्दू सेनापतियों की संख्या 13 बताई है।

इस प्रकार अकबर (Akbar) ने पूरी शक्ति से गुजरात की बगावत (REVOLT OF GUJARAT) का सामना करने का संकल्प लिया। रविवार को सीकरी से रवाना होने के बाद अकबर (Akbar) एक पहर रात बीतने तक चलता रहा तथा टोडा नामक कस्बे में जाकर रुका। प्रातः होते ही वह फिर से रवाना हो गया तथा सोमवार को ही हंसमहल पहुंच गया। वहाँ थोड़ी देर विश्राम करने के बाद अकबर (Akbar) और भी अधिक तेज गति से चला और एक रात पहर बीतने तक चलता रहा। इस बार वह मुईज्जाबाद पहुंचकर रुका।             

 ✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

मिर्जाओं की बगावत : रात के अंधेरों में भी गुजरात की तरफ दौड़ता रहा अकबर! (107)

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मिर्जाओं की बगावत

गुजरात (Gujarat) के मिर्जाओं की बगावत को कुचलने तथा खानेआजम (Khan-e-Azam) अजीज कोका (Aziz Koka) को संकट (से उबारने के उद्देश्य से अकबर (Akbar) रविवार की सुबह फतहपुर सीकरी (Fatehpur Sikri) से रवाना हुआ और टोडा (Toda), हंसमहल (Hans Mahal) तथा मुईज्जाबाद (Muizzabad) में थोड़ी-थोड़ी देर विश्राम करता हुआ मंगलवार की सुबह नाश्ते के समय अजमेर (Ajmer) पहुंच गया।

अकबर (Akbar) ने ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (Khwaja Moinuddin Chishti) की दरगाह पर जाकर ख्वाजा से सहायता की याचना की तथा दरगाह के लोगों में बख्शीश बांटी। दिन भर वह दरगाह के पास बने अजमेर के किले (Ajmer Fort) में विश्राम करता रहा और शाम होने पर घोड़े पर बैठकर गुजरात (Gujarat) के लिए चल दिया। अगले दिन सुबह अकबर (Akbar) मेड़ता (Merta) पहुंच गया।

अबुल फजल (Abul Fazl) ने लिखा है कि इस समय तक शाह कुली खाँ महरम (Shah Quli Khan), सईद मुहम्मद खाँ बारहा (Sayyid Muhammad Khan Barha) और मुहम्मद कुली खाँ तोकबाई (Muhammad Quli Khan Tokbai) आदि अमीर (Mughal Nobles) मेड़ता (Merta) से भी आगे निकल चुके थे।

अकबर (Akbar) ने बहुत थोड़ी देर के लिए मेड़ता (Merta) में विश्राम किया और फिर घोड़े (Horse) पर बैठकर जैतारण (Jaitaran) की ओर चल दिया। कुछ देर जैतारण (Jaitaran) में ठहरने के बाद अकबर (Akbar) फिर से रवाना हो गया।

तब तक शाम (Evening) हो चुकी थी और अकबर (Akbar) घने जंगल से गुजर रहा था। अकबर (Akbar) ने इस स्थान पर शिकार खेलने का विचार किया। थोड़ी ही देर में अकबर (Akbar) को एक काला हिरण (Black Deer) दिखाई दिया। अकबर (Akbar) ने एक शीघ्रगामी चीता हिरण के पीछे छोड़ा तथा यह विचार किया कि यदि यह चीता इस हिरण को पकड़ लेगा तो अवश्य ही मिर्जाओं की बगावत का नेतृत्व करने वाला मुहम्मद हुसैन मिर्जा (Muhammad Husain Mirza) हमारे हाथ आ जाएगा।

कुछ देर की भागमभाग के बाद चीते ने हिरण को दबोच लिया। मध्यरात्रि तक अकबर (Akbar) सोजत (Sojat) पहुंच गया जो वर्तमान में जोधपुर (Jodhpur) के निकट पाली जिले (Pali District) में स्थित है। अकबर (Akbar) ने वहीं पर विश्राम करने का निश्चय किया।

बृहस्पतिवार के सूर्योदय तक अकबर (Akbar) ने सोजत (Sojat) में विश्राम किया। अकबर (Akbar) सिरोही (Sirohi) होते हुए गुजरात (Gujarat) जाना चाहता था किंतु उसके सेवक उसे जालौर (Jalore) होते हुए गुजरात (Gujarat) ले जाना चाहते थे क्योंकि उन्हें सिरोही (Sirohi) के रास्ते गुजरात (Gujarat) जाने में भय लगता था।

वे अकबर (Akbar) को भुलावे में डालकर जालोर (Jalore) की तरफ वाले मार्ग पर ले गए। जब अकबर (Akbar) जालोर (Jalore) पहुंचा तो बहुत नाराज हुआ।

शुक्रवार (Friday) की प्रातः (Morning) अकबर (Akbar) जालोर (Jalore) से आगे बढ़ा। कुछ दूर चलने पर उसे एक शेर (Lion) दिखाई दिया। अकबर (Akbar) के दरबारियों (Courtiers) ने उस शेर (Lion) का शिकार (Hunt) करने का विचार किया किंतु अकबर (Akbar) ने उन्हें शेर (Lion) का शिकार (Hunt) करने से रोक दिया और आगे बढ़ता रहा।

मार्ग में एक स्थान पर अकबर (Akbar) की अग्रिम सेना ने अकबर (Akbar) के लिए एक खेमा (Camp) लगा रखा था। जब आसपास के क्षेत्र (Region) में रहने वाले घोड़े के व्यापारियों को ज्ञात हुआ कि शहंशाह मिर्जाओं की बगावत दबाने के लिए अहमदाबाद जा रहा है और यहाँ से होकर निकलने वाला है तो वे बहुत से घोड़े लेकर खड़े हो गए ताकि उन्हें शंहशाह को अच्छे दामों पर बेचा जा सके।

अकबर (Akbar) ने उन लोगों के घोड़े खरीदकर अपने अमीरों एवं सेवकों में वितरित कर दिए। आधी रात के समय अकबर (Akbar) ने यहाँ विश्राम किया और फिर घोड़े पर बैठकर चल दिया। अगले दिन शनिवार की आधी रात तक वह लगातार चलता रहा।

रविवार के अंत तक भी उसने बहुत कम विश्राम किया और सोमवार की सायं, वह पाटन से बीस कोस दूर डीसा पहुंच गया। मिर्जाओं की बगावत ने अकबर को इतना उद्वेलित कर रखा था कि उसका दिन का चैन और रातों की नींद भी उड़ी हुई थी।

अकबर (Akbar) इतनी तेजी से क्यों चल रहा था और अपनी इस यात्रा का काफी हिस्सा रात में क्यों पूरा कर रहा था, इसका एक विशेष कारण था। अकबर (Akbar) किसी भी कीमत पर नहीं चाहता था कि उसके आने की सूचना शत्रु को पहले ही मिल जाए।

अकबर (Akbar) अपने शत्रुओं को अपने अचानक आगमन से चौंकाना चाहता था ताकि उन्हें संभलने का मौका दिए बिना ही दबोचा जा सके। अकबर (Akbar) यह भी नहीं चाहता था कि अकबर (Akbar) के आने की सूचना पाकर उसके शत्रु अहमदाबाद (Ahmedabad) पर आक्रमण करके अजीज कोका (Aziz Koka) को नुक्सान पहुंचाने का प्रयास करें।

संभवतः अपने धायभाई अजीज कोका (Aziz Koka) को लेकर अकबर (Akbar) के मन में कोई दबी हुई कुण्ठा भी काम कर रही थी। अपने एक धायभाई को तो अकबर (Akbar) ने स्वयं ही मरवा डाला था और अकबर (Akbar) नहीं चाहता था कि उसका दूसरा धायभाई अकबर (Akbar) की किसी ढिलाई की वजह से मारा जाए।

इसलिए अकबर (Akbar) रात-रात भर चलकर गुजरात (Gujarat) की तरफ दौड़ा जा रहा था। डीसा (Deesa) से एक संदेशवाहक पाटन (Patan) की ओर दौड़ाया गया ताकि वहाँ से एक सेना तुरंत अहमदाबाद (Ahmedabad) के लिए रवाना की जा सके।

अकबर (Akbar) स्वयं पाटन (Patan) को एक तरफ छोड़ता हुआ डीसा (Deesa) से सीधे ही अहमदाबाद (Ahmedabad) की ओर बढ़ गया। बालिसाना (Balisana) पहुंचकर अकबर (Akbar) रुक गया। पाटन (Patan) से अकबर (Akbar) की सेना भी आ पहुंची। यहाँ पर सेना को क्रमबद्ध किया गया।

बैराम खाँ (Bairam Khan) का पुत्र रहीम खाँ (Rahim Khan) पाटन (Patan) का सूबेदार था। वह भी पाटन (Patan) की सेना के साथ अकबर (Akbar) के समक्ष हाजिर हुआ। इस समय रहीम (Rahim) 16 साल का हो चुका था और सेना का नेतृत्व कर सकता था।

अकबर (Akbar) ने उसे अपनी सेना के मध्य भाग में नियुक्त किया। खान किला (Khan Qila) को दायें पक्ष का, वजीर खाँ (Wazir Khan) को बायें पक्ष का, मुहम्मद कुली खाँ (Muhammad Quli Khan) को हरावल (Front Guard) का नेतृत्व सौंपा गया। बादशाह ने स्वयं को अल्तमश (Altamash) में रखा। उसके साथ सौ चुने हुए खूंखार सैनिक थे जो पलक झपकते ही आदमी की जान ले लेते थे।

मुगल सेना (Mughal Army) में मध्य स्थान के अग्रगामी संरक्षक दल को इल्तमश या अल्तमश (Iltamash or Altamash) कहते थे। यह भाग हरावल (Front Guard) से कुछ दूरी बनाकर रखता था। जब हरावल (Front Guard) अपना काम कर चुकते थे तब अल्तमश (Altamash) आगे बढ़कर शत्रुओं का तेजी से सफाया करता था।

हमने अब तक अकबर (Akbar) के जिन अभियानों की चर्चा की है, वे सब किसी न किसी दुर्ग पर हुए थे। यह पहला अवसर था जब अकबर (Akbar) खुले मैदान में अपने शत्रु का सामना करने जा रहा था।

बालिसाना (Balisana) से कुछ संदेशवाहक अहमदाबाद (Ahmedabad) की तरफ दौड़ाए गए। उन्हें खानेआजम (Khan-e-Azam) तक यह संदेश पहुंचाना था कि शहंशाह मिर्जाओं की बगावत दबाने के उद्देश्य से, मिर्जाओं (Mirza Rebels) और गुजरातियों (Gujaratis) की सम्मिलित सेना पर हमला करने आ गया है, आप लोग भी नगर के दरवाजे खोलकर शहंशाह (Emperor) से आकर मिल जाएं।

बादशाह घोड़े पर सवार होकर बालिसाना (Balisana) से अहमदाबाद (Ahmedabad) के लिए रवाना हुआ। वह रात भर घोड़े पर चलता रहा और कुछ दिन चढ़े वह चैताना नामक गांव (Chaitana Village) पहुंचा। यहाँ पर शेर खाँ फुलादी (Sher Khan Fuladi) के स्थानीय सेनापति राबलिया (Rablio) ने अकबर (Akbar) का रास्ता (Path) रोका।

उसके सैनिकों (Soldiers) ने दुर्ग से बाहर निकलकर शाही सेना पर आक्रमण किया। अकबर (Akbar) की सेना ने बहुत कम समय में राबलिया (Rablio) के बहुत से सैनिकों को मार डाला। बचे हुए सैनिक भाग कर दुर्ग में चले गए।

इस पर अकबर (Akbar) ने आगे का मार्ग पकड़ा। दो कोस चलने के बाद बादशाह रुक गया। यहीं पर यूसुफ खाँ (Yusuf Khan) और कासिम खाँ (Qasim Khan) आदि अमीर (Mughal Nobles) अपनी सेनाएं लेकर आ गए।

उनके आने के बाद बादशाह फिर रवाना हुआ और अहमदाबाद (Ahmedabad) से तीन कोस पहले रुक गया। यहाँ से उसने आसफ खाँ (Asaf Khan) को अहमदाबाद (Ahmedabad) भिजवाया ताकि वह खानेआजम (Khan-e-Azam) को संदेश पहुंचा सके कि शाही सेना आ पहुंची है। वह भी नगर के द्वार खोलकर अपनी सेना को ले आए।

✍️- डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

अहमदाबाद का युद्ध अकबर के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गया (108)

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अकबर अपने दरबारियों के साथ

अहमदाबाद का युद्ध (Ahmedabad Ka Yuddh) अकबर के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गया। अकबर ने आगरा से अहमदाबाद तक का 960 किलोमीटर लम्बा मार्ग 10 दिन में तय किया।

अहमदाबाद (Ahmedabad) से तीन कोस पहले रुक कर अकबर ने अपनी सेनाओं (armies) को जमाया। इस समय तक अकबर के बहुत से सेनापतियों (commanders) की सेनाएं अकबर से आ मिली थीं जो अपनी-अपनी सेनाओं के साथ सीकरी (Fatehpur Sikri) और आगरा (Agra) और विभिन्न स्थानों से अहमदाबाद की तरफ दौड़ रही थीं।

राहुल सांस्कृत्यायन (Rahul Sankrityayan) ने लिखा है कि अकबर ने औसतन पचास मील अर्थात् अस्सी किलोमीटर प्रतिदिन की गति से सीकरी से अहमदाबाद तक की दूरी तय की। उसने लगभग 600 मील (miles) अर्थात् 960 किलोमीटर (kilometers) की दूरी लगभग दस दिन में पूरी की तथा ग्यारहवें दिन वह अहमदाबाद के पास जा पहुंचा।

अबुल फजल (Abul Fazl, historian) ने लिखा है कि इस समय अकबर के पास तीन हजार सैनिक (soldiers) थे किंतु उसके शत्रुओं (enemies) की संख्या 20 हजार थी। मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Abdul Qadir Badauni, chronicler) ने भी लिखा है कि अहमदाबाद का युद्ध भले ही कितना भयान क्यों न हो किंतु अकबर के सारे सैनिकों की संख्या कुल मिलाकर 3 हजार से ज्यादा नहीं थी किंतु गुजराती (Gujaratis) ने बीस हजार गुजराती, मुगल (Mughals), अफगान (Afghans), अबीसीनियन (Abyssinians) और राजपूत (Rajputs) एकत्रित कर रखे थे।

यदि अब्दुल कादिर बदायूंनी के इस कथन पर विचार किया जाए तो एक बड़ी विचित्र स्थिति सामने आती है, बाबर (Babur) के आगमन के समय जो मुगल और अफगान एक दूसरे के विरुद्ध लड़े थे, आज बहुत से मुगल और अफगान गुजराती अमीर (nobles) और मिर्जा (Mirzas) के झण्डों के तले एक पक्ष में होकर अकबर के विरुद्ध लड़ रहे थे।

खानवा (Battle of Khanwa) के मैदान में राजपूत बाबर के खिलाफ लड़े थे किंतु अहमदाबाद का युद्ध उस युद्ध से बहुत अलग था, आज बहुत से राजपूत अकबर के पक्ष में तो बहुत से राजपूत अकबर के विरुद्ध लड़ रहे थे। इसी प्रकार अबीसीनियन भी दोनों पक्षों में रहकर एक दूसरे के विरुद्ध लड़ रहे थे।

अहमदाबाद नगर के बाहर मुगल (Mughals)-मुगल से लड़ रहा था, राजपूत (Rajputs)-राजपूत से लड़ रहा था, हब्शी (Habshi, Abyssinians)-हब्शी से लड़ रहा था और अफगान (Afghans)-अफगान से लड़ रहा था।

अकबर ने सौ चुने हुए सैनिक (soldiers) को अपने चारों ओर रखा तथा शेष सेना को अलग-अलग सेनापतियों (commanders) के कमान में रखकर हरावल (vanguard), दायें पार्श्व (right flank), बायें पार्श्व (left flank), अल्तमश (Altamash unit) सहित मध्य भाग (center) आदि का गठन किया।

अबुल फजल ने अपने विवरणों में मुगल बादशाह (Mughal Emperor) के सैनिकों की संख्या सदैव कम करके दिखाई है तथा शत्रु-दल की सेना की संख्या खूब बढ़ा-चढ़ा कर लिखी है तथा अंत में मुगल बादशाहों की जीत दिखाई है।

यदि अकबर के 27 सेनापति एक-एक हजार सैनिक भी लेकर आए हों तो भी अकबर के सैनिकों की संख्या कम से कम 27 हजार हो गई होगी। जबकि वास्तव में इस युद्ध (Ahmedabad Ka Yuddh) में अकबर के सैनिकों की संख्या 50 हजार से किसी भी हालत में कम नहीं रही होगी।

राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि अकबर को आशा थी कि जब वह साबरमती नदी (Sabarmati River) के तट पर पहुंचेगा तब अजीज कोका (Aziz Koka, Mughal noble) अपनी सेना के साथ वहीं पर बादशाह को मिलेगा किंतु अजीज कोका अख्तियार-उल-मुल्क (Ikhtiyar-ul-Mulk) के भय से अहमदाबाद से बाहर ही नहीं निकल पाया।

अख्तियाररुलमुल्क इस ताक में था कि जैसे ही अजीज कोका अहमदाबाद से बाहर निकले, उसे मार डाला जाए।

अबुल फजल द्वारा दी गई सूची में हिंदू सेनानायक (Hindu Generals) में जगन्नाथ रायसल (Jagannath Raisal), जयमल (Jaimal), जगमल पटवार (Jagmal Patwar), राजा बीरबल (Birbal), राजा दीपचंद (Raja Deepchand), मानसिंह दरबारी (Man Singh), रामदास कच्छावा (Ramdas Kachhwaha), रामचंद्र (Ramchandra), सांवलदास (Sanwaldas), जाइन कायथ (Jain Kayath), हरदास (Hardas), ताराचंद (Tarachand), खवास (Khwas) और लाल कलावंत (Lal Kalawant) के नाम लिखे गए हैं।

अबुल फजल लिखता है कि रूपसिंह (Rupsingh) का पुत्र जयमल (Jaimal) एक भारी कवच (armor) पहनकर बादशाह के समक्ष उपस्थित हुआ। बादशाह ने अपने निजी उपयोग का एक हल्का कवच उसे दिलवा दिया तथा उसका भारी कवच मालदेव (Maldev) के पौत्र कर्ण (Karan) को भेंट कर दिया जिसके पास कवच नहीं था।

वास्तव में वह कवच जयमल के पिता रूपसिंह का था। जब जयमल के पिता रूपसिंह ने मालदेव के पुत्र कर्ण को अपना कवच पहने हुए देखा तो वह गुस्से से आग-बबूला हो गया।

कर्ण के पिता मालदेव तथा रूपसिंह के बीच परम्परागत शत्रुता (rivalry) थी। इसलिए रूपसिंह ने अपना कवच उतार दिया और नाराज होकर बादशाह के सेवकों (servants) से कहा कि वे बादशाह से मेरा कवच लाकर मुझे वापस लौटा दें।

जब बादशाह के सेवकों ने यह बात बादशाह से कही तो बादशाह ने रूपसिंह से कहलवाया कि हमने तुम्हारे पुत्र से तुम्हारा कवच हमारे कवच के बदले में लिया है, इसलिए अब उस कवच पर तुम्हारा अधिकार नहीं है।

इस पर रूपसिंह जोरों से चिल्लाने लगा। जब राजा भगवानदास कच्छावा (Raja Bhagwandas Kachhwaha) को रूपसिंह की इस बदतमीजी के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने जाकर रूपसिंह को शांत किया।

भगवानदास के कहने पर रूपसिंह ने बादशाह के समक्ष उपस्थित होकर अपनी गलती के लिए क्षमा-याचना (apology) की। बादशाह ने रूपसिंह की ओर बड़ी उपेक्षा (disdain) से देखा।

इस पर राजा भगवानदास ने बादशाह से कहा कि आप इसका अपराध क्षमा करें क्योंकि इसने भांग पी रखी है।

इस पर भी जब अकबर प्रसन्न नहीं हुआ तो राजा भगवानदास ने अकबर से कहा कि मैं आपको शत्रु (enemy) पर विजय (victory) प्राप्त करने की अग्रिम बधाई देता हूँ क्योंकि इस समय आपकी विजय के तीन लक्षण (omens) प्रकट हुए हैं। पहला लक्षण यह कि आप घोड़े (horse) पर सवार हैं, दूसरा लक्षण यह कि हवा (wind) हमारे पीछे की तरफ से चल रही है और तीसरा लक्षण यह है कि हमारे साथ आकाश में चील-कौवे (eagles-crows) भी चल रहे हैं।

कहा नहीं जा सकता कि इस कथन का अकबर पर क्या प्रभाव हुआ क्योंकि इस सम्बन्ध में कोई विवरण नहीं मिलता है।

राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि अकबर के सेनापतियों ने अकबर को सलाह दी कि अजीज कोका के आने तक इसी स्थान पर प्रतीक्षा की जाए किंतु अकबर अपने साथ दो अंगरक्षक (bodyguards) लेकर अहमदाबाद नगर की तरफ चल पड़ा।

मुहम्मद हुसैन मिर्जा (Muhammad Hussain Mirza) ने डेढ़ हजार सैनिक (soldiers) के साथ अकबर पर हमला बोला जिसके कारण अकबर का घोड़ा (horse) घायल हो गया तथा अफवाह (rumor) फैल गई कि अकबर मारा गया। इस कारण अहमदाबाद का युद्ध (Ahmedabad Ka Yuddh) एक नए दौर में पहुंच गया किंतु यह अफवाह अकबर के पक्ष पर कोई दुष्प्रभाव (impact) नहीं डाल सकी क्योंकि अकबर उनके साथ ही रहकर लड़ाई (battle) कर रहा था।

स्पष्ट है कि या तो यह विवरण (account) मनगढ़त है या फिर गलत ढंग से लिखा गया है। क्योंकि न तो अकबर अपनी सेना (army) से अलग होकर, केवल दो अंगरक्षक (bodyguards) के साथ अहमदाबाद (Ahmedabad) की तरफ जाने की गलती कर सकता था और न यह संभव था कि यदि इस अवस्था में अकबर पर डेढ़ हजार सैनिक हमला करते तो अकबर किसी भी हालत में जीवित रह सकता था।

अवश्य ही अकबर की काफी बड़ी सेना (army) अकबर के साथ चल रही थी।

अहमदाबाद का युद्ध (Ahmedabad Ka Yuddh) अकबर के समय के लगभग सभी लेखकों ने बहुत बढ़ा-चढ़ा कर लिखा है। अबुल फजल (Abul Fazl, historian) की अपेक्षा मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Abdul Qadir Badauni, chronicler) ने अपनी पुस्तक मुंतखब उत तवारीख (Muntakhab-ut-Tawarikh) में इस युद्ध (battle) का अधिक स्पष्ट वर्णन (description) किया है।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

गुजराती अमीर जौ की तरह काट डाले अकबर ने (109)

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गुजराती अमीर

गुजराती अमीर (Gujrati Nobles)) अकबर से बगावत करने पर उतारू थे। अकबर (Akbar) ने उन्हें जौ के दानों की तरह काट डाला।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने मुंतखब उत तवारीख (historical chronicle) में लिखा है कि जिस समय अकबर अहमदाबाद (Ahmedabad) के निकट पहुंचा, दुश्मन की सेना (enemy army) असावधानी की नींद में सो रही थी। जब उन्होंने बिगुल (bugle sound) की आवाज सुनी तो शत्रु के सैनिक असमंजस में पड़कर घोड़ों पर चढ़ने को दौड़े।

मुहम्मद हुसैन मिर्जा (बागी नेता (rebel leader)) दो-तीन और घुड़सवारों के साथ दरिया किनारा (river bank) भाग आया ताकि समझ सके कि माजरा क्या है! हुआ यह कि तुर्क सुमान कुली भी दो-तीन घुड़सवारों के साथ इस ओर से दरिया किनारे गया हुआ था।

मुहम्मद हुसैन मिर्जा ने उससे पूछा- ‘हुजूर यह कैसी फौज है?’
उसने जवाब दिया- ‘शाही फौज (Royal Army)!’

मिर्जा ने कहा- ‘मेरे सेवकों ने मुझे आज ही बताया है कि उन्होंने चौदह दिन पहले अकबर को फतेहपुर सीकरी (Fatehpur Sikri) में छोड़ा था। यदि यह शाही फौज है तो हमेशा साथ रहने वाले हाथी (war elephants) कहाँ हैं?’

इस पर सुमान कुली ने कहा- ‘चार सौ कोस नौ दिन में हाथी कैसे तय कर सकते हैं?’
तब हुसैन मिर्जा ने इख्तियार-उल-मुल्क (Ikhtiyar-ul-Mulk) के साथ पांच हजार घुड़सवार किला (fort) की ओर भेजे ताकि खान-ए-आजम बाहर निकल कर गुजराती (Gujaratis) पर आक्रमण नहीं कर सके।

उधर अकबर की शाही फौज (Mughal Army) ने आनन-फानन में दरिया पार कर लिया। मुहम्मद हुसैन मिर्जा ने पहले ही अनुमान लगा लिया था कि अकबर की सेना साबरमती नदी (Sabarmati River) को पार करने में विलम्ब नहीं करेगी।

इस कारण मुहम्मद हुसैन मिर्जा के पंद्रह सौ सैनिकों ने शाही सेना के हरावल (vanguard) पर हमला किया। यहीं पर बागी मिर्जाओं की तरफ से मुहम्मद कुली खाँ और तर खाँ दीवाना भी अपनी सेनाओं के साथ नियुक्त थे।

मुहम्मद हुसैन मिर्जा के सैनिकों ने अबीसीनियन (Abyssinians) और अफगान (Afghans) ने साथ मिलकर अकबर की सेना के बायें पक्ष पर धावा बोला जो वजीर खाँ (Wazir Khan) की कमान में था।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि दोनों ओर से नौजवान युद्धरत हुए तथा जौ के दाने की तरह साफ कर दिए गए।
इतनी घमासान जंग (battle) हुई कि यह पीढ़ियों तक याद रखी जाएगी। जब शहंशाह ने देखा कि उसकी फौज का हरावल बिखर गया है तो वह जोर से चिल्लाया- ‘या मुईन (Ya Muin, war cry)!’ उन दिनों मुगल (Mughals) में यही यलगार लगाई जाती थी।

अकबर ने एक मजबूत हमला (attack) करके दुश्मन की पंक्तियों को तोड़ दिया तथा उन्हें अस्त-व्यस्त कर दिया। बहुत से सिर हवा में उड़ गए। सैफ खाँ कोका दुश्मन के व्यूह (battle formation) में कूद पड़ा और उस भंवर में फंस गया जिसमें से वह कभी बाहर नहीं निकल सका।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि मुहम्मद हुसैन मिर्जा ने वह सब किया जो एक मनुष्य साहस के साथ कर सकता है, फिर भी वह जख्मी तक नहीं हुआ। अंत में उसकी भावना स्वयं ही थक गई तथा उसका घोड़ा जख्मी हो जाने से वह जंग का मैदान (battlefield) से भाग गया।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि मुहम्मद हुसैन मिर्जा ने वह सब किया जो एक मनुष्य साहस के साथ कर सकता है, फिर भी वह जख्मी तक नहीं हुआ। अंत में उसकी भावना स्वयं ही थक गई तथा उसका घोड़ा जख्मी हो जाने से वह जंग का मैदान (battlefield) से भाग गया।

उसका रास्ता एक कांटेदार झाड़ी ने रोका। उसका इरादा घोड़े को कुदा देने का था, ऐसे में दुर्भाग्य से उसके घोड़े की लगाम एक झाड़ी में अटक गई और घोड़े की काठी खींचते हुए उसे जमीन पर गिरा दिया।

गदाई अली (Turk soldier) नामक एक तुर्क, जो तेजी से मुहम्मद हुसैन मिर्जा का पीछा कर रहा था, धरती पर गिरे हुए मुहम्मद हुसैन मिर्जा पर तेजी से कूदा और उसे बंदी (captured) बनाकर शहंशाह के पास ले आया।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी लिखता है कि अकबर ने अपनी स्वाभाविक दयालुता (mercy) और अपने अच्छे स्वभाव के कारण मुहम्मद हुसैन मिर्जा को डांट-फटकार लगाने के बाद उसे रायसिंह (Raisingh, Rajput commander) के सुपुर्द कर दिया।

अबुल फजल (Abul Fazl, historian) ने लिखा है कि रायसिंह को सीकरी (Sikri, royal harem guard) में हरम की रक्षा के लिए नियुक्त किया गया था जबकि मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने रायसिंह को युद्ध का मैदान (battlefield) में मौजूद दिखाया है।

मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि इस दौरान वजीर खाँ (Wazir Khan) अबीसीनियनों और गुजरातियों से निबट रहा था और आमने-सामने की लड़ाई में अपना पैतृक जौहर (valor) दिखा रहा था। जब दुश्मनों ने मुहम्मद हुसैन मिर्जा और शाह मिर्जा की हार की सूचना सुनी तो उन्होंने जंग का मैदान (battlefield) से पीठ दिखाई।

विजय की संभावना से ज्यादा जान प्यारी समझ कर वे तेजी से भाग गए। इसी समय अकबर के सेनापति खान-ए-कलाँ (Khan-e-Kalan, Mughal general) ने शेर खाँ फुलादी (Sher Khan Fuladi) के बेटों को पूरी तरह परास्त कर दिया। इस प्रकार मैदान दुश्मनों से पूरी तरह खाली हो गया।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने इस युद्ध में अकबर के सिपाहियों की तुलना उन दर्जियों (tailors) से की है जो युद्ध के मैदान में शत्रु सैनिकों को अपनी तलवार (swords) से काटते हैं तथा तीर (arrows) से उनके शरीर सिलते हैं। वह लिखता है कि विजय के बाद शहंशाह मैदाने जंग (battlefield) के पास की पहाड़ी (hill) पर चढ़ा और जंगजुओं के भुजबल (strength) का अंदाजा लगाने में व्यस्त हो गया।

तब अचानक इख्तियार-उल-मुल्क (Ikhtiyar-ul-Mulk) जिसे खाने-आजम (Khan-e-Azam) को शहंशाह के साथ मिलने से रोकने के लिए नियुक्त किया गया था, मिर्जाओं की पराजय की सूचना सुनकर अपने मोर्चे से हट गया और अपने पांच हजार घुड़सवारों के साथ खुले मैदान में आ गया।

एक बार फिर से दोनों पक्षों में तेज संघर्ष (conflict) आरम्भ हो गया। शहंशाह ने अपनी टुकड़ियों को तीरों की बौछार (arrow volley) करने के आदेश दिए।

इख्तियार-उल-मुल्क से आगे चल रही टुकड़ी ने ‘या मुईन (Ya Muin, war cry)‘ का नारा लगाया और धूल पर लम्बे हो गए अर्थात् मृत्यु को प्राप्त हुए। हुसैन खाँ (Husain Khan) लड़ने वालों में आगे था इसलिए शहंशाह ने अना खंजर (ceremonial dagger) उसे भेंट कर दिया।

इख्तियार-उल-मुल्क के घोड़े की लगाम टूटने से वह एक रास से ही भाग खड़ा हुआ। जब तक कि उसका घोड़ा कांटों वाली झाड़ी में न गिर गया जैसे गधा (donkey) कीचड़ में गिरता है।

अकबर के तुर्क सिपाही (Turkish soldiers) इख्तियार-उल-मुल्क के पीछे चल रहे थे। उन्होंने इख्तियार-उल-मुल्क को घेर लिया। सोहराब बेग तुर्कमान (Sohrab Beg Turkmen) ने झपट कर इख्तियार-उल-मुल्क को पकड़ लिया।

इख्तियार-उल-मुल्क ने सोहराब बेग से कहा- ‘तुम तुर्कमान लगते हो जो पवित्र अली (Ali) और उसके साथियों के अनुयायी हैं। मैं बुखारा (Bukhara) का सैयद हूँ, मुझे छोड़ दो।’
सोहराब बेग ने जवाब दिया- ‘मैं तुम्हें कैसे छोड़ दूँ, तुम इख्तियार-उल-मुल्क हो। मैं तुम्हें पहचानता हूँ और काफी देर से तुम्हारा पीछा कर रहा हूँ।’

इसके बाद सोहराब बेग घोड़े से नीचे उतरा और उसने इख्तियार-उल-मुल्क का सिर (head) उसके धड़ (torso) से अलग कर दिया। कोई मुगल सैनिक (Mughal soldier) इख्तियार-उल-मुल्क का घोड़ा ले गया। इसलिए सोहराब बेग ने इख्तियार-उल-मुल्क का सिर एक कपड़े से ढंका और शाबाशी (reward) पाने के लिए बादशाह के पास ले गया।

इसी समय इख्तियार-उल-मुल्क का पैदा किया बवंडर (chaos) थम गया। रायसिंह (Raisingh) के सेवकों ने मुहम्मद हुसैन मिर्जा को हाथी से उतारा तथा उसे बल्लम (spear) के एक ही वार से बिना अस्तित्व वाले संसार में भेज दिया।

अकबर ने इख्तियार-उल-मुल्क तथा मुहम्मद हुसैन मिर्जा के सिर (heads) आगरा किला (Agra Fort) के बाहर लटकाने के लिए भेज दिए।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से।

नरमुण्डों की मीनार (Tower of Skulls) – 110

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नरमुण्डों की मीनार (Tower of Skulls)

अकबर स्वयं को मजहबी संकीर्णता से ऊपर उठा हुआ मानता था और ऐसा प्रदर्शित भी करता था किंतु अकबर ने साबरमती के तट पर नरमुण्डों की मीनार (Tower of Skulls) चिनवाकर यह सिद्ध कर दिया कि वह तैमूरी मानसिकता से ऊपर नहीं उठ सका है।

जैसे ही इख्तियार-उल-मुल्क (Ikhtiyar-ul-Mulk) का सिर काटा गया, खानेआजम (Khan-e-Azam) किले (Fort) से बाहर आया और उसने शहंशाह (Emperor Akbar) को सलाम किया। शहंशाह ने उसे छाती से लगा लिया, उसका बहुत ध्यान रखा और उसके अमीरों (Nobles) का हालचाल पूछा।

राहुल सांकृत्यायन (Rahul Sankrityayan) ने लिखा है कि शाह मदद (Shah Madad) ने राजा भगवानदास (Raja Bhagwandas) के पुत्र भूपत (Kunwar Bhuvanpati) को सरनाल की लड़ाई (Battle of Sarnal) में मारा था। उसका बदला लेने के लिए अकबर ने अपने हाथों से शाह मदद का सिर उसके धड़ से अलग किया।

राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि 2 सितम्बर 1573 (2 September 1573) को अकबर ने गुजरात (Gujarat Rebellion) के भयंकर विद्रोह को दबा दिया। वहाँ तैमूरी रिवाज (Timurid Tradition) के अनुसार दो हजार सिरों की मीनार खड़ी की।

अकबर के कट्टर आलोचक मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Mulla Abdul Qadir Badauni) ने लिखा है कि लगभग एक हजार सिर जंग (Battle Casualties) में गिरे। शहंशाह ने उनकी मीनार बनाने के आदेश दिए ताकि बगावत करने वालों को भविष्य के लिए चेतावनी (Warning to Rebels) मिल सके। अकबर के आदेश पर अहमदाबाद (Ahmedabad City) नगर के बाहर साबरमती के तट पर एक हजार नरमुण्डों की मीनार खड़ी की गई।

अकबर वही सब कुछ कर रहा था जो उसके पुरखे (Ancestors) करते आए थे। चित्तौड़ (Chittorgarh Fort) के दुर्ग में उसने तीस हजार निरअपराध मनुष्यों का कत्लेआम (Massacre) करवाया तथा साबरमती के तट पर कटे हुए सिरों की मीनार (Skull Monument) बनवाई।

हालांकि उसने बंगाल (Bengal Campaign) में भी शत्रुओं के कटे हुए सिरों से मीनारे बनवाई थीं। इससे यह सिद्ध होता है कि अकबर को चित्तौड़ दुर्ग के हिन्दू सैनिकों (Hindu Soldiers) का रक्त बहाने में उतना ही आनंद आता था जितना के गुजरात के अफगानी अमीरों (Afghan Nobles) के टुकड़े करने में।

उसे दया आती थी तो केवल अपने कुल के शहजादों (Timurid Princes) पर जो चंगेजी (Chinggisid Lineage) थे, तैमूरी (Timurid Dynasty) थे अथवा समरकंद (Samarkand) और फरगना (Fergana Valley) से आए हुए मुगल (Mughals) और मिर्जा (Mirza Nobility) थे!

बाबर (Babur) के बेटों की दर्द भरी दास्तान (Tragic Tale) तथा लाल किले (Red Fort) की दर्द भरी दास्तान में हमने अकबर के पूर्वजों तैमूर लंग (Timur the Lame), बाबर तथा हुमायूँ (Humayun) द्वारा अपने शत्रुओं के सिर काटकर मीनारें बनवाए जाने की चर्चा विभिन्न प्रसंगों में की थी।

तैमूरी बादशाह (Timurid Rulers) जिन कटे हुए सिरों की मीनार (Skull Towers) बनवाया करते थे, वे सिर शत्रु पक्ष के सैनिकों (Enemy Soldiers) के होते थे।

हालांकि तत्कालीन इतिहासकारों (Contemporary Historians) ने लिखा है कि पानीपत के मैदान (Battle of Panipat) में बाबर (Babur) ने नरमुण्डों की मीनार (Tower of Skulls) में अफगान सैनिकों (Afghan Soldiers) के साथ-साथ उन मुगल सैनिकों (Mughal Soldiers) के कटे हुए सिरों को भी सम्मिलित करवाया था जो पानीपत के मैदान (Panipat Battlefield) में बाबर के शत्रुओं (Enemies of Babur) द्वारा दूर-दूर तक बिखेर दिए गए थे क्योंकि बाबर को शत्रु सैनिकों के कटे हुए सिरों की संख्या थोड़ी लग रही थी।

जब बाबर ने खानवा के मैदान (Battle of Khanwa) में महाराणा सांगा (Maharana Sanga) के सैनिकों के कटे हुए सिरों की मीनारें (Skull Monuments) बनवाई थीं, तब उसमें मुगल सैनिकों (Mughal Soldiers) के कटे हुए सिरों को सम्मिलित नहीं किया गया था।

अकबर (Emperor Akbar) ने साबरमती (Sabarmati River) के तट पर नरमुण्डों की जो मीनार (Tower of Skulls) बनवाई, उसमें अकबर के पक्ष के सैनिकों (Akbar’s Soldiers) के कटे हुए सिरों को भी सम्मिलित किया गया। क्योंकि इस युद्ध (Battle) में दोनों तरफ से हर प्रकार के सैनिक लड़ रहे थे, शत्रु-मित्र (Friend or Foe) के शवों की पहचान करना संभव नहीं था।

दोनों तरफ मुगल (Mughals) थे, दोनों तरफ अफगान (Afghans) थे, दोनों तरफ अबीसीनियन (Abyssinians) थे और दोनों ही तरफ राजपूत (Rajputs) थे। ऐसी स्थिति में युद्ध के मैदान (Battlefield) में जिसका भी शव पड़ा मिला, उसी का सिर काटकर मीनार बना दी गई।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Mulla Abdul Qadir Badauni) ने लिखा है कि अकबर ने शाह मिर्जा (Shah Mirza) के खात्मे के लिए कुतुबुद्दीन मुहम्मद (Qutbuddin Muhammad) और उसके बेटे नौरंग खाँ (Naurang Khan) को बहरोंच (Bharuch) तथा चाम्पानेर (Champaner) की तरफ भेजा। अकबर ने खान-ए-कलां (Khan-e-Kalan) को पाटन (Patan) में तथा वजीर खाँ (Wazir Khan) को दुलाका एवं डूंडका (Dulaka & Dundka) की सरकार में नियुक्त किया।

इसके बाद अकबर ने शाह कुली खाँ महरम (Shah Quli Khan Mahram), राजा भगवानदास (Raja Bhagwandas) एवं लश्कर खाँ बख्शी (Lashkar Khan Bakhshi) को ईडर (Idar) के रास्ते मेवाड़ (Mewar Region) की ओर भेजा ताकि वे महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) के क्षेत्र पर कब्जा कर लें। इन दोनों ने ईडर होते हुए मेवाड़ के लिए प्रस्थान किया तथा बडनगर (Badnagar) पर कब्जा करके वहाँ मुगल थाना (Mughal Garrison) स्थापित करके आगरा (Agra) के लिए चल दिए।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि पांच दिन तक ऐतिमाद खाँ (Aitimad Khan) के घर में रुकने के बाद अकबर अहमदाबाद (Ahmedabad City) से रवाना हुआ। उसने गुजरात के सुल्तान महमूद (Sultan Mahmud of Gujarat) की एक रिहाइश महमूदाबाद (Mahmudabad) में खेमा लगाया।

मिर्जा गियासुद्दीन अली काजवीनी (Mirza Ghiyasuddin Ali Qazvini) को आसफ खाँ (Asaf Khan) का खिताब दिया गया। उसे गुजरात का दीवान (Diwan of Gujarat) एवं बक्षी (Bakshi) बना दिया गया। यहाँ से अकबर अजमेर (Ajmer) पहुंचा।

जब वह अजमेर से आगरा (Agra) के लिए रवाना हुआ तो मार्ग में सांगानेर (Sanganer) नामक स्थान पर अकबर ने राजा टोडरमल (Raja Todarmal) को गुजरात के भू-राजस्व-कर (Land Revenue Settlement) की जांच के लिए नियुक्त करके वापस गुजरात भेज दिया।

राहुल सांकृत्यायन (Rahul Sankrityayan) ने लिखा है कि गुजरात की यह विजय (Victory of Gujarat) स्थाई सिद्ध हुई। हालांकि इस विजय के बाद भी गुजरात में विद्रोह (Rebellions in Gujarat) होते रहे किंतु उन्हें सफलतापूर्वक दबाया जाता रहा और ई.1758 (Year 1758) तक अर्थात् पूरे 185 वर्ष तक गुजरात मुगलों (Mughals in Gujarat) के अधीन रहा। अंत में मराठों (Marathas) ने मुगलों से गुजरात छीन लिया।

राजा टोडरमल (Raja Todarmal) छः माह तक गुजरात में रहा। इस अवधि में उसने गुजरात की कृषि-भूमि (Agricultural Land) की पैमाइश करके भूराजस्व (Revenue Records) का हिसाब-किताब ठीक कर दिया तथा भू-राजस्व का प्रबंधन-तंत्र (Revenue Administration System) भी सुधार दिया। उस काल में इस कार्य को मालगुजारी बंदोबस्त (Malgujari Settlement) कहते थे।

ई.1574 (Year 1574) में अकबर ने गुजरात के हाकिम मुजफ्फर खाँ तुरबती (Muzzaffar Khan Turbati) को अपने दरबार (Royal Court) में बुलाया तथा उसे अपना वकील अर्थात् प्रधानमंत्री (Prime Minister) नियुक्त किया।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Mulla Badauni) बदायूं (Badaun) के सूबेदार हुसैन खाँ (Subedar Hussain Khan) की नौकरी करता था किंतु ई.1574 में वह बदायूं से आगरा (Agra) आया और पहली बार अकबर के दरबार (Akbar’s Court) में उपस्थित हुआ।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता (Dr. Mohanlal Gupta) की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से!

इब्राहीम सरहिंदी का सिर फोड़ दिया मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने (111)

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इब्राहीम सरहिंदी

अकबर के दरबार में यह कहावत चल पड़ी कि बदायूं के इस लड़के ने हाजी इब्राहीम सरहिंदी (Haji Ibrahim Sirhindi) का सिर फोड़ दिया है।

ई.1574 (AD 1574) में मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Abdul Qadir Badauni) अपने पुराने मालिक बदायूं (Badaun) के सूबेदार हुसैन खाँ (Husain Khan) की नौकरी छोड़कर आगरा (Agra) आया तथा अकबर (Akbar) के दरबार (Mughal Court) में नौकरी पाने में सफल हो गया।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि शहंशाह अकबर (Emperor Akbar) ने मुझे यह अधिकार दिया कि मैं शहंशाह के दरबार में मुल्ला लोग जो कुछ भी बोलते हैं, उनसे बहस करूं। बदायूंनी लिखता है कि ये मुल्ले अपने ज्ञान की गहराई की डींग हांका करते थे, अपनी उपस्थिति में किसी को कुछ नहीं गिनते थे तथा स्वयं को ही हर विषय में अंतिम निर्णायक मानते थे। मैंने शीघ्र ही उन सबको काबू में कर लिया।

जब मुल्ला बदायूंनी की अकबर के दरबार में धाक जम गई तो उन दिनों अकबर के दरबार में यह कहावत चल पड़ी कि बदायूं के इस लड़के ने हाजी इब्राहीम सरहिंदी (Haji Ibrahim Sirhindi) का सिर फोड़ दिया है।
इस कहावत से स्पष्ट होता है कि मुल्ला बदायूंनी के आने से पहले अकबर के दरबार में हाजी इब्राहीम सरहिंदी को सबसे विद्वान व्यक्ति माना जाता था किंतु अब वह प्रतिष्ठा मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी को प्राप्त हो गई थी।

पाठकों को स्मरण होगा कि जिस समय अकबर गुजरात अभियान (Gujarat Campaign) में लगा हुआ था, उस समय अकबर ने खानेजहाँ हुसैन कुली खाँ (Khan-e-Jahan Husain Quli Khan) को कांगड़ा (Kangra) के अभियान पर भेजा था।

ऐतिहासिक घटनाक्रम को गुजरात पर केन्द्रित किए रखने के लिए हमने कांगड़ा अभियान (Kangra Expedition) की घटनाओं को उस समय छोड़ दिया था किंतु अब इतिहास की धारा को हुसैन कली खाँ के कांगड़ा अभियान की ओर ले चलते हैं जो ई.1572-73 (AD 1572-73) में हुआ था।

हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) में कांगड़ा की घाटी (Kangra Valley) एक सुरम्य एवं प्रसिद्ध स्थान है जहाँ सदियों से हिन्दू राजा (Hindu Kings) शासन करते आए थे। इस क्षेत्र में प्राचीन काल में हिन्दूशाही राजाओं (Hindu Shahi Kings) का तथा मध्यकाल में कटोच राजपूतों (Katoch Rajputs) का बोलबाला था।

कांगड़ा घाटी में नगरकोट (Nagarkot) नामक अत्यंत प्राचीन एवं विख्यात कस्बा है जहाँ वज्रेश्वरी देवी (Vajreshwari Devi Temple) का अति प्राचीन तांत्रिक शक्तिपीठ (Shakti Peeth) स्थित है। महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni), मुहम्मद बिन तुगलक (Muhammad bin Tughlaq) तथा फीरोजशाह तुगलक (Firoz Shah Tughlaq) इस शक्तिपीठ को पहले भी तोड़ चुके थे किंतु भारत के हिन्दू अवसर पाते ही इस मंदिर को फिर से बना लेते थे।

महमूद गजनवी ने ई.1009 (AD 1009) में इस मंदिर को लूटा था। उसने इस मंदिर से प्राप्त सोने-चांदी के आभूषण (Gold & Silver Ornaments), बर्तन एवं सिक्के (Coins), तथा हीरे-मोतियों (Diamonds & Pearls) को अफगानिस्तान (Afghanistan) ले जाने के लिए जितने भी हाथी (Elephants), घोड़े (Horses), ऊंट (Camels) एवं खच्चर (Mules) मिल सकते थे, उन पर लाद लिया था।

अकबर के दरबार में यह कहावत चल पड़ी कि बदायूं के इस लड़के ने हाजी इब्राहीम सरहिंदी (Haji Ibrahim Sirhindi) का सिर फोड़ दिया है। ई.1574 (AD 1574) में मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Abdul Qadir Badauni) अपने पुराने मालिक बदायूं (Badaun) के सूबेदार हुसैन खाँ (Husain Khan) की नौकरी छोड़कर आगरा (Agra) आया तथा अकबर (Akbar) के दरबार (Mughal Court) में नौकरी पाने में सफल हो गया।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि शहंशाह अकबर (Emperor Akbar) ने मुझे यह अधिकार दिया कि मैं शहंशाह के दरबार में मुल्ला लोग जो कुछ भी बोलते हैं, उनसे बहस करूं। बदायूंनी लिखता है कि ये मुल्ले अपने ज्ञान की गहराई की डींग हांका करते थे, अपनी उपस्थिति में किसी को कुछ नहीं गिनते थे तथा स्वयं को ही हर विषय में अंतिम निर्णायक मानते थे। मैंने शीघ्र ही उन सबको काबू में कर लिया।

जब मुल्ला बदायूंनी की अकबर के दरबार में धाक जम गई तो उन दिनों अकबर के दरबार में यह कहावत चल पड़ी कि बदायूं के इस लड़के ने हाजी इब्राहीम सरहिंदी (Haji Ibrahim Sirhindi) का सिर फोड़ दिया है।

इस कहावत से स्पष्ट होता है कि मुल्ला बदायूंनी के आने से पहले अकबर के दरबार में हाजी इब्राहीम सरहिंदी को सबसे विद्वान व्यक्ति माना जाता था किंतु अब वह प्रतिष्ठा मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी को प्राप्त हो गई थी।

गुजरात अभियान (Gujarat Campaign) और कांगड़ा (Kangra Expedition)

पाठकों को स्मरण होगा कि जिस समय अकबर गुजरात अभियान (Akbar’s Gujarat Campaign) में लगा हुआ था, उस समय अकबर ने खानेजहाँ हुसैन कुली खाँ (Khan-e-Jahan Husain Quli Khan) को कांगड़ा (Kangra) के अभियान पर भेजा था।

ऐतिहासिक घटनाक्रम को गुजरात पर केन्द्रित किए रखने के लिए हमने कांगड़ा अभियान (Kangra Expedition) की घटनाओं को उस समय छोड़ दिया था किंतु अब इतिहास की धारा को हुसैन कली खाँ के कांगड़ा अभियान की ओर ले चलते हैं जो ई.1572-73 (AD 1572-73) में हुआ था।

कांगड़ा घाटी (Kangra Valley)

हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) में कांगड़ा की घाटी (Kangra Valley) एक सुरम्य एवं प्रसिद्ध स्थान है जहाँ सदियों से हिन्दू राजा (Hindu Kings) शासन करते आए थे। इस क्षेत्र में प्राचीन काल में हिन्दूशाही राजाओं (Hindu Shahi Kings) का तथा मध्यकाल में कटोच राजपूतों (Katoch Rajputs) का बोलबाला था।

कांगड़ा घाटी में नगरकोट (Nagarkot) नामक अत्यंत प्राचीन एवं विख्यात कस्बा है जहाँ वज्रेश्वरी देवी (Vajreshwari Devi Temple) का अति प्राचीन तांत्रिक शक्तिपीठ (Shakti Peeth) स्थित है। महमूद गजनवी (Mahmud of Ghazni), मुहम्मद बिन तुगलक (Muhammad bin Tughlaq) तथा फीरोजशाह तुगलक (Firoz Shah Tughlaq) इस शक्तिपीठ को पहले भी तोड़ चुके थे किंतु भारत के हिन्दू अवसर पाते ही इस मंदिर को फिर से बना लेते थे।

महमूद गजनवी का आक्रमण (Mahmud of Ghazni’s Invasion)

महमूद गजनवी ने ई.1009 (AD 1009) में इस मंदिर को लूटा था। उसने इस मंदिर से प्राप्त सोने-चांदी के आभूषण (Gold & Silver Ornaments), बर्तन एवं सिक्के (Coins), तथा हीरे-मोतियों (Diamonds & Pearls) को अफगानिस्तान (Afghanistan) ले जाने के लिए जितने भी हाथी (Elephants), घोड़े (Horses), ऊंट (Camels) एवं खच्चर (Mules) मिल सकते थे, उन पर लाद लिया था।

अकबर काल में नगरकोट (Nagarkot under Akbar)

अकबर के शासनकाल (Akbar’s Reign) में राजा जयचंद (Raja Jayachand) नगरकोट का राजा था।
मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अपनी पुस्तक मुंतखब-उत-तवारीख (Muntakhab-ut-Tawarikh) में लिखा है कि नगरकोट के राजा जयचंद से अकबर का मन मैला हो गया जो कि अकबर के दरबार का कर्मचारी था। इसलिए अकबर ने राजा बीरबल (Birbal) को नगरकोट जागीर के रूप में दिया।

राजा जयचंद को बंदी बना लिया गया तथा लाहौर (Lahore) के शासक हुसैन कुली खाँ को आदेश भेजा गया कि वह नगरकोट पर कब्जा करके उसे बीरबल को सौंप दे।

युद्ध और मंदिर विध्वंस (War and Temple Destruction)

बदायूंनी लिखता है कि शहर के बाहर का मंदिर पहले लिया गया। इस मंदिर में लाखों-लाख आदमी या शायद करोड़ों-करोड़ आदमी एक निश्चित अवधि में एकत्रित होते हैं। गधे (Donkeys) भारी बोझ, सोने-चांदी के सिक्के (Gold & Silver Coins), सामान व्यापार की वस्तुएं (Trade Goods), अन्य बहुमूल्य वस्तुएं (Precious Items), अनगिनत भंडार वहाँ चढ़ावे के रूप में लाते हैं।

इस समय तक बहुत से पहाड़ी लोग मुगलों (Mughals) की तलवार का ग्रास बन चुके थे। सोने का छत्र (Golden Canopy) जो मंदिर के शिखर (Temple Shikhara) पर चढ़ा हुआ था, तीरों की मार से छलनी कर दिया गया।

इस मंदिर की गौशाला (Cowshed) में 200 काली गायें (Black Cows) थीं जिन्हें हिन्दू बहुत सम्मान देते हैं और पूजते हैं। हुसैन कुली खाँ के सैनिकों ने उन गायों को मार दिया।

निजामुद्दीन अहमद का वर्णन (Nizamuddin Ahmad’s Account)

अकबर के एक अन्य समकालीन लेखक निजामुद्दीन अहमद (Nizamuddin Ahmad) ने अपनी पुस्तक तबकात-ए-अकबरी (Tabakat-i-Akbari) में अकबर की सेनाओं द्वारा नगरकोट में की गई हिंसा का उल्लेख किया है।

वह लिखता है कि भूण की गढ़ी में महामाया का मंदिर (Mahāmāyā Temple) है, उसे मुस्लिम सेनाओं ने अपने अधिकार में ले लिया। इस पर राजपूतों (Rajputs) का एक शहीदी जत्था (Martyr Band) मुगल सेना पर चढ़ बैठा जिसे शीघ्र ही काट डाला गया।

निष्कर्ष (Conclusion)

मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि बादशाह के घनिष्ट मित्र बीरबल (Birbal) को इस इलाके में एक जागीर दी गई किंतु कुछ ही समय बाद मिर्जा इब्रहीम (Mirza Ibrahim) नामक तैमूरी शहजादे (Timurid Prince) ने इस इलाके पर कब्जा कर लिया।

इस पर हुसैन कुली खाँ को यह इलाका छोड़ना पड़ा तथा बीरबल को इस जागीर के बदले में पांच मन सोना (Gold Revenue) देकर संतुष्ट किया गया। संभवतः यह वही सोना था जो हुसैन कुली खाँ द्वारा नगरकोट क्षेत्र के लोगों से छीना गया था।

✍️ – डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से

नकली सिपाही खड़े कर दिए अमीरों ने (112)

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नकली सिपाही खड़े कर दिए अमीरों ने

अकबर ने अपनी सल्तनत में मनसबदारी व्यवस्था लागू की। इस व्यवस्था का दुरुपयोग करते हुए अकबर के अमीरों ने नकली सिपाही खड़े कर दिए और राजकोष को चूना लगा दिया!

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Mulla Abdul Qadir Badauni ) ने लिखा है- ‘वह (अर्थात् मुल्ला ब्दुल कादिर बदायूंनी) ई.1574 में अकबर के दरबार (Akbar’s Court) में सम्मिलित हुआ। इसी वर्ष नागौर के शेख मुबारक का बेटा शेख अबू-अल-फजल भी अकबर के दरबार में हाजिर हुआ। उसके ज्ञान और समझ का सितारा बुलंद था। अकबर ने उसे बहुत सम्मानित किया। इसी वर्ष अकबर ने गुजरात के गवर्नर मुजफ्फर खाँ को सारंगपुर से आगरा बुलाकर उसे अपना प्रधानमंत्री बनाया तथा राजा टोडरमल (Raja Todarmal) को उसके नीचे वित्तमंत्री अथवा राजस्व मंत्री बनाया।’

इस प्रकार ई.1574 में अकबर की प्रशासनिक व्यवस्था (administrative system of Akbar) नया आकार लेने लगी। नई शासन व्यवस्था में समस्त दरबारियों, मंत्रियों, सेनापतियों, अमीरों, उमरावों तथा अन्य अधिकारियों को मनसब (Ranks of Mansabdari System) दिए गए।

शाही खालसा भूमि (Khalsa Bhumi) अर्थात् केन्द्र सरकार की भूमि को प्रांतीय सरकारों की भूमि से अलग किया गया। सरकारी सेना के घोड़ों पर जलते हुए लोहे से नम्बर लगाने आरम्भ किए गए जिसे दाग लगाना (Horse Tagging) कहा जाता था।

अंग्रेजी में इसे टैगिंग करना कहा जा सकता है जिसका प्रयोग पशुओं का बीमा करने वाली कम्पनियां पशु की पहचान करने के लिए करती हैं। भारत में यह व्यवस्था नई नहीं थी। अकबर (Akbar) से पूर्व भी दिल्ली के सुल्तान बलबन (Sultan Balban) तथा अल्लाउद्दीन खिलजी (Alauddin Khilji) और सूरी सल्तनत के सुल्तान शेरशाह सूरी (Shershah Suri) ने भी इस व्यवस्था को अपनाया था।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने अकबर द्वारा अपनाई गई घोड़ों को दाग लगाने की प्रथा (Horse Tagging) का रोचक वर्णन किया है। वह लिखता है कि यह निश्चय किया गया कि हर अमीर (Mughal Noble) बीस का नाम होगा। इसका अर्थ यह होता है कि बीस घुड़सवारों वाला एक बीसी, चालीस घुड़सवारों वाला दो बीसी और सौ घुड़सवारों वाला पांच बीसी कहलाएगा। उसे अपने घोड़े एवं घुड़सवार, शाही पंजीकरण कार्यालय में पंजीकृत करवाने होंगे तथा घोड़ों पर ठप्पा (दाग or Horse Tagging) लगवाना होगा। पंजीकृत घोड़े एवं घुड़सवारों की संख्या के अनुसार ही उस अमीर को शाही खजाने से वेतन मिलेगा।

प्रत्येक अमीर को पंजीकृत संख्या के अनुसार हाथी, घोड़े एवं ऊंट आदि रखने होंगे। उन्हीं के अनुपात में फौजी सामान रखना होगा। जिस अमीर को एक हजार हाथी, घोड़े एवं ऊंट रखने की स्वीकृति मिलेगी उसे एक हजारी मनसब (Ranks of Mansabdari System) दिया जाएगा।

इसी अनुपात में दो हजारी, तीन हजारी एवं पांच हजारी मनसब दिया जाएगा। जो अमीर (Mughal Noble)अपने पशुओं एवं सवारों को पंजीकरण करवाने के बाद अपनी नौकरी से हटा देगा, उन अमीरों को नीचे के मनसब मनसब (Ranks of Mansabdari System) में डाल दिया जाएगा।

मुल्ला लिखता है कि नए नियमों से फौजियों की स्थिति बदतर हो गई। बहुत से अमीरों ने वास्तविक सैनिकों को अपनी नौकरी से निकाल दिया तथा अपने आसपास के गांवों में रहने वाले ग्रामीणों तथा उनके पशुओं को शाही कार्यालय में पंजीकृत करवाकर शाहीकोष से वेतन स्वीकृत करवा लिया। इस प्रकार अकबर की सेना में नकली सिपाही भर लिए गए।

इनमें जुलाहे, कपास साफ करने वाले, सुथार, माली, धोबी, नाई, भिश्ती, सुनार, किसान, मोची आदि समस्त वर्गों के लोग नकली सिपाही बन गए। उनमें से बहुतों के पास अपने घोड़े नहीं थे अपितु वे अपने किसी पड़ौसी का या पड़ौसी गांव के किसी व्यक्ति का घोड़ा लाकर ठप्पा लगवाते थे।

मुगल अमीर (Mughal Noble) इन नकली सिपाही (Fake Soldiers) एवं उधार के घोड़ों का पंजीकरण करवाकर उनके नाम से वेतन उठाकर अपनी जेबें भरने लगे। जब बादशाह को सेना की आवश्यकता होती थी, तब वे अमीर अपने नकली सिपाहियों को फौजी लिबास पहनाकर इकट्ठा कर लेते थे और जब युद्ध होता था, तब वे नकली सिपाही (Fake Soldiers ) चुपचाप अपने गांवों को चले जाते थे।

इस व्यवस्था का लाभ यह हुआ कि कोई मुगल अधिकारी एक ही घोड़े को दो जगह दिखाकर उसके लिए शाहीकोष से वेतन नहीं ले सकता था और युद्ध के समय बादशाह को उतने ही घुड़सवार मिलने की उम्मीद होती थी जितने घोड़ों के लिए शाहीकोष से वेतन दिया जाता था।

इस व्यवस्था का नुक्सान यह हुआ कि असली सैनिकों की थाली में धूल पड़ गई, वे बेरोजगार हो गए। क्योंकि मुगल अमीर उन्हें पूरे साल का वेतन देने की बजाय नकली सिपाहियों (Fake Soldiers) को नाममात्र का वेतन देता था। असली सैनिकों के असली घोड़े को साल भर दाना-चारा खिलाने की बजाय कुछ ही दिनों का दाना-चारा देना पड़ता था।

मुल्ला लिखता है कि कई बार जब किसी अमीर को आदेश दिए गए कि वह अपने घुड़सवार सैनिक लेकर आए तो उसके अधिकांश सैनिक फटे हुए कपड़ों में, बिना किसी घोड़े के और बिना किसी हथियार के ही आते थे। अकर ने स्वयं पंजीकरण के अहाते में ऐसे सैनिकों को देखा।

कुछ लोगों के पास जो घोड़े होते थे, वे भी इतने मरियल थे कि जब उन्हें काठी, कपड़े एवं रास सहित हाथ-पैर बांधकर तोला गया तो वे 90 से 100 किलो के बीच होते थे। ऐसे घोड़ों पर बैठकर कोई भी असली या नकली सिपाही युद्ध कैसे लड़ सकता था! पूछताछ करने पर पता चलता था कि घोड़े से लेकर, काठी तक और सैनिक से लेकर सैनिक की पोषाक तक, सब-कुछ किराये का होता था।

 मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि अमीरों (Mughal Noble) की बेईमानी से फौज की वास्तविक दुकान बर्बाद हो गई किंतु सौभाग्य से बादशाह के सभी शत्रु परास्त हुए एवं उसे फौजियों की बड़ी संख्या में आवश्यकता नहीं पड़ी।

जब अकबर (Akbar) ने इन घटनाओं को बार-बार देखा तो वह समझ गया कि इस व्यवस्था से असली सैनिकों को बहुत नुक्सान हुआ है तथा बेईमान अमीरों की मौज आ गई है। मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि शहंशाह (Akbar or Akbarshah) ने कहा कि इन सैनिकों को देखकर मेरी आंखें खुल गईं। मुझे इन्हें वेतन देना चाहिए था।

अकबर के कहने आशय का आशय यह था कि अमीरों के माध्यम से सिपाहियों को वेतन न दिया जाकर उन्हें सीधे ही शाही कोष से वेतन दिया जाना चाहिए था। इससे अमीर लोग असली सिपाहियों की जगह नकली सिपाहियों की फौज खड़ी न करते।

इसके बाद अकबर (Akbar) ने सैनिकों एवं उनके घोड़ों को सीधे ही शाहीकोष से वेतन देने की व्यवस्था की। इन सैनिकों को यकस्पा, दुआस्पा तथा नीमास्पा में बांट दिया।

यकस्पा का अर्थ था- ऐसा सैनिक जो एक घोड़ा सदैव अपने साथ रखता है।

दुआस्पा का अर्थ था- ऐसा सैनिक जो दो घोड़े सदैव अपने साथ रखता है।

नीमास्पा से आशय इस बात से था कि दो सैनिक मिलकर एक घोड़ा रखते थे।

मुल्ला ने लिखा है कि नीमास्पा अर्थात् दो सैनिक और एक घोड़े को शाहीकोष से 6 रुपए प्रतिमाह दिए जाते थे, जिन्हें वे आपस में बांट लेते थे।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता (Dr. Mohanlal Gupta) की पुस्तक तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर (Third Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar) से!

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