Sunday, June 16, 2024
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अध्याय – 26 भारतीय संस्कृति में चालुक्यों का योगदान

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चालुक्य वंश

चालुक्यों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वान एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार वे प्राचीन क्षत्रियों के वंशज थे तो कुछ इतिहासकार उन्हें विदेशियों की संतान बताते हैं। स्मिथ के अनुसार वे विदेशी गुर्जर थे जो राजपूताना से दक्षिण की ओर जा बसे। डॉ. बी. सी. सरकार उन्हें कन्नड़ जातीय मानते हैं जो आगे चलकर स्वयं को क्षत्रिय कहने लगे। चालुक्यों की अनुश्रुतियों में चालुक्यों का मूल स्थान अयोध्या बताया गया है। चालुक्यों ने दक्षिण भारत में पाँचवी शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक शासन किया और बहुत ख्याति प्राप्त की।

चालुक्यों की शाखाएँ: दक्षिण भारत के चालुक्यों की तीन प्रमुख शाखाएँ थीं- 1. बादामी (वातापी) के पूर्वकालीन पश्चिमी चालुक्य, 2. कल्याणी के उत्तरकालीन पश्चिमी चालुक्य तथा 3. वेंगी के पूर्वी चालुक्य। चालुक्यों की एक शाखा गुजरात अथवा अन्हिलवाड़ा में भी शासन करती थी। ये चालुक्य, दक्षिण के चालुक्यों से अलग थे। कुछ इतिहासकार उन्हें प्राचीन काल में एक ही शाखा से उत्पन्न होना मानते हैं।

बादामी अथवा वातापी के चालुक्य

जिन चालुक्यों ने बीजापुर जिले में स्थित बादामी (वातापी) को अपनी राजधानी बनाकर शासन किया वे वातापी के चालुक्य कहलाये। इन चालुक्यों ने 550 ई. से 750 ई. तक शासन किया।

आरंभिक शासक: इस वंश का पहला राजा जयसिंह था। वह बड़ा ही वीर तथा साहसी था। उसने राष्ट्रकूटों से महाराष्ट्र छीना था। जयसिंह के बाद रणराज, पुलकेशिन् (प्रथम) कीर्तिवर्मन, मंगलेेेेश आदि कई राजा हुए।

पुलकेशिन् (द्वितीय): इस वंश का सबसे प्रतापी राजा पुलकेशिन् (द्वितीय) था, जिसने 609 ई. से 642 ई. तक सफलतापूर्वक शासन किया। वह अत्यंत महत्त्वाकांक्षी शासक था। उसने राष्ट्रकूटों के आक्रमण का सफलतापूर्वक सामना किया और कदम्बों के राज्य पर आक्रमण कर उनकी राजधानी वनवासी को लूटा। उसके प्रताप से आंतकित होकर कई पड़ोसी राज्यों ने उसके प्रभुत्व को स्वीकार कर लिया। पुलकेशिन् की सबसे बड़ी विजय कन्नौज के राजा हर्षवर्धन पर हुई। इससे उसकी प्रतिष्ठा में वृद्धि हो गई। पल्लवों के साथ भी उसने युद्ध किया। चोलों के राज्य पर भी उसने आक्रमण किया। उसने पाण्ड्य तथा केरल राज्य के राजाओं को भी अपना प्रभुत्व स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। विदेशी राज्यों के साथ भी पुलकेशिन् ने कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित किये। उसने फारस के शासक के साथ राजदूतों का आदन-प्रदान किया था। पुलकेशिन् के अन्तिम दिन बड़े कष्ट से बीते। पल्लव राजा नरसिंहवर्मन ने कई बार उसके राज्य पर आक्रमण किया और उसकी राजधानी वातापी को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। सम्भवतः इन्हीं युद्धों में पुलकेशिन् की मृत्यु हो गई।

पुलकेशिन् (द्वितीय) के उत्तराधिकारी: पुलकेशिन् (द्वितीय) के बाद उसके पुत्रों में उत्तराधिकार के लिये संघर्ष हुआ। इस कारण 642 ई. से 655 ई. तक चालुक्य राज्य में कोई भी एकच्छत्र राज्य नहीं रहा। इस वंश में कई निर्बल शासक हुए, जो इसे नष्ट होने से बचा नहीं सके। अन्त में 753 ई. के आस-पास राष्ट्रकूटों ने इस वंश का अन्त कर दिया।

कल्याणी के चालुक्य

753 ई. में राष्ट्रकूटों ने वातापी के चालुक्यों की सत्ता उखाड़ फैंकी किंतु चालुक्यों का समूल नाश नहीं किया। परवर्ती चालुक्य राष्ट्रकूटों के अधीन सामंत के रूप में शासन करने लगे। 950 ई. में चालुक्य सामंत तैलप (द्वितीय) ने राष्ट्रकूटों के राजा कर्क को परास्त करके कल्याणी में अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित की। उसके वंशजों ने 1181 ई. तक शासन किया। इस प्रकार चालुक्यों की जिस शाखा ने 950 ई. से 1181 ई. तक कल्याणी को अपनी राजधानी बनाकर शासन किया, वे कल्याणी के चालुक्य कहलाते हैं।

तैलप (द्वितीय): तैलप राष्ट्रकूटों का सामन्त था। 950 ई. में परमार सेनाओं ने राष्ट्रकूट राज्य पर आक्रमण किया। अवसर पाकर तैलप ने स्वयं को स्वतन्त्र घोषित कर दिया। उसने 47 वर्ष तक सफलतापूर्वक शासन किया। 997 ई. में तैलप की मृत्यु हुई। तैलप के बाद सत्याश्रय, विक्रमादित्य (पंचम), जयसिंह, सोमेश्वर (प्रथम), सोमेश्वर (द्वितीय) आदि कई राजा हुए।

विक्रमादित्य षष्ठम्: कल्याणी के चालुक्यों में विक्रमादित्य (षष्ठम्) सबसे प्रतापी शासक था। उसने चोल, होयसल तथा वनवासी के राजाओं को परास्त किया। उत्तर भारत में परमारों से उसकी मैत्री थी परन्तु सुराष्ट्र के चालुक्यों के साथ उसका निरन्तर संघर्ष चलता रहता था। विक्रमादित्य बड़ा विद्यानुरागी था। ‘विक्रमांकदेव चरित्र’ के रचियता विल्हण को उसका आश्रय प्राप्त था। उसने बहुत से भवनांे तथा मन्दिरों का निर्माण करवाया। विक्रमादित्य के बाद इस वंश में कई निर्बल राजा हुए, जो इसे पतनोन्मुख होने से नहीं बचा सके। अन्त में 1181 ई. के आसपास देवगिरि के यादवों ने कल्याणी के चालुक्यों का अन्त कर दिया।

वेंगी के चालुक्य

इन्हें पूर्वी चालुक्य भी कहा जाता है क्योंकि इनका राज्य कल्याणी के पूर्व में स्थित था। वातापी के चालुक्य राजा पुलकेशिन (द्वितीय) ने 621 ई. के लगभग आन्ध्र प्रदेश को जीतकर वहां अपने भाई विष्णुवर्धन को प्रशासक नियुक्त किया। विष्णुवर्धन ने इस क्षेत्र में अपने नये राजवंश की स्थापना की। इस राजवंश ने वेंगी को राजधानी बनाकर लगभग 500 वर्षों तक शासन किया। विष्णुवर्धन ने 625 ई. से 633 ई. तक शासन किया। उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र जयसिंह (प्रथम) वेंगी के सिंहासन पर बैठा। उसके शासन काल में चालुक्यों के मूल राज्य वातापी पर पल्लव नरेश नरसिंहवर्मन ने आक्रमण किया। इस युद्ध में पुलकेशिन (द्वितीय) मारा गया। इससे वातापी के चालुक्य कमजोर पड़ गये। उनकी कमजोरी का लाभ उठाकर वेंगी के चालुक्यों ने अपने राज्य का विस्तार करना आरंभ किया। जयसिंह के बाद इन्द्रवर्मन, मंगि, जयसिंह (द्वितीय), विष्णुवर्धन (तृतीय), विजयादित्य (प्रथम), विष्णुवर्धन (चतुर्थ), विजयादित्य (द्वितीय) और (तृतीय), भीम (प्रथम), विजयादित्य (चतुर्थ) एवं अम्म (प्रथम) आदि राजा हुए। 970 ई. में दानार्णव चालुक्यों के सिंहासन पर बैठा। 973 ई. में उसके साले जटाचोड भीम ने उसकी हत्या कर चालुक्यों के सिंहासन पर अधिकार कर लिया। 999 ई. में राजराज चोल ने वेंगी पर आक्रमण करके वेंगी के राजा जटाचोड भीम को मार डाला और जटाचोड भीम के पूर्ववर्ती राजा दानार्णव के पुत्र शक्तिवर्मन को वेंगी का राजा बनाया। 1063 ई. में कुलोत्तुंग चोल, वेंगी के सिंहासन पर बैठा। उसमें चोलों की अपेक्षा चालुक्य रक्त की प्रधानता थी। अतः उसके शासनकाल में चालुक्य राज्य और चोल राज्य एक ही हो गये। वेंगी के चालुक्यों का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया।

चालुक्यों की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ

विभिन्न धर्मों को प्रश्रय

चालुक्यों ने दक्षिण भारत में एक विशाल राज्य की स्थापना की तथा उनकी तीन शाखाओं ने दक्षिण में दीर्घ काल तक शासन किया। इसलिये उन्हें कला एवं साहित्य में योगदान देने का विपुल अवसर प्राप्त हुआ।

वैदिक यज्ञों का प्रसार: चालुक्य राजा हिन्दू धर्म के मतावलम्बी थे। उनके समय के साहित्य तथा अभिलेखों में अनेक प्रकार के वैदिक यज्ञों के उल्लेख मिलते हैं। पुलकेशिन (प्रथम) ने अश्वमेध, वाजपेय तथा हिरण्य गर्भ आदि यज्ञ किये। उसके पुत्र कीर्तिवर्मन ने बहुसुवर्ण तथा अग्निष्टोम यज्ञ किया। इस काल में वैदिक यज्ञों के सम्बन्ध में कई ग्रंथों की रचना हुई।

जैन धर्म को सहायता: चालुक्यों के राज्य में हिन्दुओं के बाद जैन धर्मावलम्बी बड़ी संख्या में रहते थे। इसलिये चालुक्यों ने जैन प्रजा की भावनाओं का सम्मान करते हुए जैन धर्म के लिये काफी दान दिया तथा जैन मंदिरों का निर्माण करवाया। ऐहोल अभिलेख का लेखक रविकीर्ति जैन धर्म का अनुयायी था, वह पुलकेशिन (द्वितीय) के दरबार की शोभा बढ़ाता था। पुलकेशिन भी उसका बहुत सम्मान करता था। चालुक्य नरेश विजयादित्य की बहन कुंकुम महादेवी ने लक्ष्मीश्वर में एक जैन मंदिर का निर्माण करवाया। विजयादित्य ने अनेक जैन पण्डितों को ग्राम दान में दिये।

बौद्ध चैत्यों का निर्माण: अजंता की गुफाओं में कुछ बौद्ध चैत्यों का निर्माण चालुक्य शासकों के काल में हुआ। ह्वेनसांग के अनुसार चालुक्य राज्य में लगभग 100 बौद्ध विहार थे जिनमें 5000 से अधिक भिक्षु निवास करते थे। ह्वेनसांग ने वातापी के भीतर और बाहर 5 अशोक स्तूपों का भी उल्लेख किया है। इससे स्पष्ट है कि चालुक्य शासकों ने बौद्ध धर्म को भी संरक्षण दे रखा था।

चालुक्य वास्तु कला

इस काल में ऐहोल, वातापी और पट्टड़कल में बड़ी संख्या में हिन्दू देवताओं के मंदिर बने। चालुक्य शासकों ने विष्णु के अनेक अवतारों को अपना अराध्य देव माना। इनमें भी विष्णु के नृसिंह और वाराह रूपों की लोकप्रियता अधिक थी। इस काल में भगवान शिव के कैलाशनाथ, विरूपाक्ष, लोकेश्वर, त्रैलोक्येश्वर आदि रूपों की पूजा की जाती थी। अतः भगवान शिव के मंदिर भी बड़ी संख्या में बने।

वातापी राज्य में इस काल में बने मंदिरों को चालुक्य शैली के मंदिर कहा जाता है। चालुक्य शैली की वास्तु कला के तीन प्रमुख केन्द्र थे- ऐहोल, वातापी और पट्टड़कल। ऐहोल में लगभग 70 मंदिर मिले हैं। इसी कारण इस नगर को मंदिरों का नगर कहा गया है। समस्त मंदिर गर्भगृह और मण्डपों से युक्त हैं परंतु छतों की बनावट एक जैसी नहीं है। कुछ मंदिरों की छतें चपटी हैं तो कुछ की ढलवां हैं। ढलवां छतों पर भी शिखर बनाये गये हैं। इन मंदिरों में लालखां का मंदिर तथा दुर्गा का मंदिर विशेष उल्लेखनीय हैं। बादामी में चालुक्य वास्तुकला का निखरा हुआ रूप देखने को मिलता है। यहां पहाड़ को काटकर चार मण्डप बनाये गये हैं। इनमें एक मंडप जैनियों का है, शेष तीन मण्डप हिन्दुओं के हैं। इनके तीन मुख्य भाग हैं- गर्भगृह, मण्डप और अर्धमण्डप। पट्टड़कल के मंदिर वास्तु की दृष्टि से और भी सुंदर हैं। पट्टड़कल के वास्तुकारों ने आर्य शैली तथा द्रविड़ शैली को समान रूप से विकसित करने का प्रयास किया। पट्टड़कल में आर्य शैली के चार मंदिर तथा द्रविड़ शैली के 6 मंदिर हैं। आर्य शैली का सर्वाधिक सुंदर मंदिर पापनाथ का मंदिर है। द्रविड़ शैली का सर्वाधिक आकर्षक मंदिर विरुपाक्ष का मंदिर है। पापनाथ का मंदिर 90 फुट की लम्बाई में बना हुआ है। इस मंदिर के गर्भगृह और मण्डप के मध्य में जो अंतराल बना हुआ है, वह भी मण्डप जैसा ही प्रतीत होता है। गर्भगृह के ऊपर एक शिखर है जो ऊपर की ओर संकरा होता चला गया है। विरुपाक्ष मंदिर 120 फुट लम्बाई में बना हुआ है। मंदिर की स्थापत्य कला भी अनूठी है।

चालुक्य कालीन साहित्य

चालुक्य शासकों ने साहित्य को भी प्रोत्साहन दिया। उनके दरबार में अनेक विद्वान रहते थे। ह्वेनसांग ने भी लिखा है कि चालुक्य शासक विद्यानुरागी थे। विक्रमादित्य (षष्ठम्) के दरबार में विक्रमांकदेव चरित्र का लेखक विल्हण और मिताक्षरा के लेखक विज्ञानेश्वर का बड़ा सम्मान था। सोमेश्वर (तृतीय) स्वयं परम विद्वान था। उसने मानसोल्लास नामक ग्रंथ की रचना की। अपनी विद्वत्ता के कारण वह सर्वज्ञभूप कहा जाता था। 

अध्याय – 27 भारतीय संस्कृति में चोलों का योगदान

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चोल वंश

चोल तमिल भाषा के ‘चुल’शब्द से निकला है, जिसका अर्थ होता है घूमना। चूंकि ये लोग एक स्थान पर स्थिर नहीं रहते थे इसलिये ये चोल कहलाये। चोल स्वयं को सूर्यवंशी क्षत्रिय् कहते थे। चोलों का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। इनका उल्लेख अशोक के शिलालेखों में भी मिलता है। दक्षिण भारत के इतिहास में लम्बे अन्धकार काल के बाद नौवीं शताब्दी ईस्वी में चोलों का अभ्युत्थान हुआ। अनुमान है कि ये पहले उत्तर भारत के निवासी थे परन्तु घूमते हुए दक्षिण भारत में पहुँच गये। कालांतर में आधुनिक तंजौर तथा त्रिचनापल्ली के जिलों में अपनी राजसत्ता स्थापित कर और तंजौर को अपनी राजधानी बनाकर शासन करने लगे। धीरे-धीरे चोलों ने अपने साम्राज्य की सीमा बढ़ा ली और वे दक्षिण भारत के शक्तिशाली शासक बन गये। प्रारम्भ में चोल आंध्र तथा पल्लव राज्यों की अधीनता में शासन करते थे परन्तु जब पल्लवों की शक्ति का ह्रास होने लगा, तब इन लोगों ने पल्लव राज्य को समाप्त कर दिया और स्वतंत्र रूप से शासन करने लगे।

विजयालय: नौवीं शताब्दी के मध्य तक चोल शासक, पल्लवों के अधीन राज्य करते थे। वि

जयालय ने 846 ई. में स्वतंत्र चोल वंश की स्थापना की। उसका शासनकाल 846 ई. से 871 ई. माना जाता है।

आदित्य (प्रथम): विजयालय का उत्तराधिकारी उसका पुत्र आदित्य (प्रथम) हुआ। पल्लव नरेश ने उसकी सेवाओं से प्रसन्न होकर उसे तंजौर के निकटवर्ती कुछ क्षेत्रों पर राज्य करने का अधिकार दे दिया। आदित्य (प्रथम) ने शीघ्र ही पल्लवों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया तथा तोण्डमण्डलम् पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में पल्लव नरेश अपराजित मारा गया। इस प्रकार पल्लव वंश का अंत हो गया और पल्लव राज्य पर चोल वंश का शासन हो गया। आदित्य (प्रथम) ने पाण्ड्य नरेश पर आक्रमण करके उससे कोंगु प्रदेश छीन लिया। इस प्रकार आदित्य (प्रथम) ने शक्तिशाली चोल राज्य की स्थापना की।

परांतक प्रथम: आदित्य का उत्तराधिकारी उसका पुत्र परान्तक (प्रथम) हुआ। उसने मदुरा के पाण्ड्य नरेश को परास्त करके मदुरा पर अधिकार कर लिया। इस उपलक्ष्य में उसने मदुरईकोण्ड् अर्थात् मदुरा के विजेता की उपाधि धारण की। लंका नरेश ने पाण्ड्य नरेश का साथ दिया था किंतु वह भी परान्तक से परास्त होकर चला गया। राष्ट्रकूट वंश के शासक कृष्ण (द्वितीय) को भी परांतक (प्रथम) ने परास्त किया किंतु बाद में वह स्वयं राष्ट्रकूट शासक कृष्ण (तृतीय) से तक्कोलम् के युद्ध में परास्त हो गया। परान्तक ने अनेक शैव मंदिरों का निर्माण करवाया। संस्कृत का प्रसिद्ध विद्वान वैंकट माधव इसी समय हुआ। उसके द्वारा ऋग्वेद पर लिखा गया भाष्य बड़ा प्रसिद्ध है।

राजराज (प्रथम): चोल वंश का प्रथम शक्तिशाली विख्यात शासक राजराज (प्रथम) था, जिसने 985 ई. से 1014 ई. तक शासन किया। राजराज एक महान् विजेता तथा योग्य शासक था। सबसे पहले उसका संघर्ष चेर राजा के साथ हुआ। उसने चेरों के जहाजी बेड़े को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। इसके बाद उसने पाण्ड्य राज्य पर आक्रमण किया और मदुरा पर अधिकार कर लिया। उसने कोल्लम तथा कुर्ग पर भी प्रभुत्व जमा लिया। उसने सिंहल द्वीप पर भी आक्रमण कर दिया और उसके उत्तरी भाग पर विजय प्राप्त कर उसे अपने साम्राज्य का प्रान्त बना लिया। उसने कुछ अन्य पड़ोसी राज्यों पर भी अधिकार जमा लिया। इसके बाद राजराज का चालुक्यों के साथ भीषण संग्राम आरम्भ हो गया। यह संग्राम बहुत दिनों तक चलता रहा। अन्त में राजराज की विजय हुई। राजराज ने कंलिग पर भी विजय प्राप्त की।

राजराज (प्रथम) की सांस्कृतिक उपलब्धियां: यद्यपि राजराज (प्रथम) शैव था, परन्तु उससमें उच्च कोटि की धार्मिक सहिष्णुता थी। उसने कई वैष्णव मन्दिर भी बनवाये। उसने चक्र बौद्ध विहार को गाँव दान में दिया। तंजौर का भव्य एवं विशाल राजराजेशवर शिव मन्दिर उसी का बनवाया हुआ है। यह मंदिर द्रविड़ वास्तु का सर्वोत्तम नमूना है। यह मंदिर शिल्पकला, उत्कृष्ट अलंकरण विधानों एवं प्रभावोत्पादक स्थापत्य योजना के लिये प्रख्यात है। मंदिर की दीवारों पर उसकी उपलब्धियों के लेख मिले हैं। स्वयं शिवभक्त होने पर भी राजराज ने विष्णु मंदिरों का निर्माण करवाया। उसने जावा के राजा को एक बौद्ध विहार के निर्माण में सहायता दी और उसके लिये दान भी दिया। वास्तव में राजराज चोल वंश का महान् शासक था। चोल इतिहास का स्वर्णकाल राजराज (प्रथम) से आरम्भ होता है।

राजेन्द्र (प्रथम): राजराज के बाद उसका पुत्र राजेन्द्र (प्रथम) शासक हुआ। उसने 1015 ई. से 1042 ई. तक शासन किया। वह चोल वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। उसने अपने पिता की साम्राज्यवादी नीति का अनुसरण किया। उसने सबसे पहले दक्षिण के राज्यों पर विजय की। उसने सिंहल द्वीप, चेर एवं पाण्ड्यों पर विजय प्राप्त की। उसने कल्याणी के चालुक्यों से लम्बा संघर्ष किया। इसके बाद उसने उत्तर की ओर प्रस्थान किया। उसने बंगाल, मगध, अण्डमान, निकोबार तथा बर्मा के अराकान और पीगू प्रदेश को भी जीत लिया। इसके बाद उसने अपनी जलसेना के साथ पूर्वी द्वीप समूह की ओर प्रस्थान किया और मलाया, सुमात्रा, जावा तथा अन्य कई द्वीपों पर अधिकार कर लिया।

राजेन्द्र (प्रथम) की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ: राजेन्द्र (प्रथम) की राजनैतिक विजयों से विदेशों में भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति का प्रचार हुआ। राजेन्द्र (प्रथम) कलाप्रेमी भी था और उसने बहुत से नगरों, भवनों आदि का निर्माण करवाया। उसने गंगईकोण्डचोलपुरम् का निर्माण करवाकर सुंदर मंदिरों, भवनों तथा तड़ागों से अलंकृत कर उसे अपनी राजधानी बनाया। वह साहित्यप्रेमी तथा विद्यानुरागी था। वेद विद्या एवं शास्त्रों के अध्ययन के लिये उसने एक विद्यालय स्थापित किया।

राजेन्द्र (प्रथम) के बाद भी चोलवंश में कई योग्य राजा हुए जिन्होंने अपने पूर्वजों के राज्य को सुरक्षित तथा सुसंगठित रखा परन्तु बारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में चोल साम्राज्य का पतन आरम्भ हो गया। पड़ोसी राज्यों के साथ निरन्तर संघर्ष करने तथा सामन्तों के विद्रोहों के कारण चोल साम्राज्य धीरे-धीरे निर्बल होता गया। अन्त में पाण्ड्यों ने उसे छिन्न-भिन्न कर दिया।

चोल शासकों की सास्कृतिक उपलब्धियाँ

स्थापत्य कला

चोल शासकों ने अपने पूर्ववर्ती पल्लव राजाओं की भांति द्रविड़ स्थापत्य एवं शिल्प को चरम पर पहुंचा दिया। चोल शासक परान्तक ने अपने राज्य में अनेक शैव मंदिरों का निर्माण करवाया। राजराज (प्रथम) ने कई शिव मंदिर तथा वैष्णव मन्दिर बनवाये। तंजौर का भव्य एवं विशाल राजराजेशवर शिव मन्दिर उसी का बनवाया हुआ है। यह मंदिर द्रविड़ वास्तु का सर्वोत्तम नमूना है। यह मंदिर शिल्पकला, उत्कृष्ट अलंकरण विधानों एवं प्रभावोत्पादक स्थापत्य योजना के लिये प्रख्यात है। राजराज ने जावा के राजा को बौद्ध विहार के निर्माण में सहायता दी और उसके लिये दान भी दिया।

चोल शासकों के काल में विकसित मंदिर शैली, दक्षिण भारत के अन्य भागों एवं श्रीलंका में भी अपनाई गई। उनके शासन के अंतर्गत सम्पूर्ण तमिल प्रदेश बड़ी संख्या में मंदिरों से सुशोभित हुआ। कहा जाता है कि चोल कलाकारों ने इन मंदिरों के निर्माण में दानवों की शक्ति और जौहरियों की कला का प्रदर्शन किया। चोल मंदिरों की विशेषता उनके विशाल शिखर या विमान हैं।

चोल मंदिरों में तंजौर का बृहदीश्वर मंदिर प्रमुख है जो एक दुर्ग के भीतर निर्मित है। इसका निर्माता राजराज (प्रथम) था। इसके विमान का 13 मंजिला शिखर 58 मीटर ऊँचा है। प्रवेशद्वार का गोपुर 29 मीटर वर्गाकार आधार ढांचे पर निर्मित है। गुम्बदाकार शिखर 7.8 मीटर की वर्गाकार शिला पर अधिष्ठित है। इसके ऊपर एक अष्टकोणीय स्तूप तथा 12 फुट ऊँचा कलश स्थापित है। 81 फुट की इस भीमकाय शिला को ऊपर तक ले जाने के लिये मिश्र शैली को अपनाते हुए ऊँचाई में उत्तरोत्तर बढ़ती सड़क का निर्माण किया गया जिसकी लम्बाई 6.4 किलोमीटर थी। शिखर के चारों तरफ 2 मीटर गुणा 1.7 मीटर के आकार में दो-दो नंदी प्रतिष्ठित हैं। स्तूप और विमान इस तरह से निर्मित हैं कि उनकी छाया भूमि पर नहीं पड़ती। इस मंदिर के गर्भगृह में विशाल शिवलिंग स्थापित है जिसे वृहदीश्वर कहा जाता है। पर्सी ब्राउन के अनुसार बृहदीश्वर मंदिर का विमान भारतीय स्थापत्य कला का निचोड़ है। इसी मंदिर की अनुकृति पर राजेन्द्र चोल (प्रथम) ने गंगईकोण्डचोलपुरम् में शिव मंदिर का निर्माण करवाया। यह मंदिर भी चोल कला का उत्कृष्ट नमूना है।

चोल शासक राजेन्द्र (प्रथम) कलाप्रेमी था। उसने बहुत से नगरों, भवनों आदि का निर्माण करवाया। उसने गंगईकोण्डचोलपुरम् का निर्माण करवाकर सुंदर मंदिरों और भवनों तथा तड़ागों से अलंकृत कर उसे अपनी राजधानी बनाया।

दक्षिण के चोल मंदिरों में मण्डप नामक बड़ा कक्ष होता था जिसमें स्तम्भों पर बारीक नक्काशी की जाती थी तथा छतें सपाट रखी जाती थीं। मण्डप सामान्यतः गर्भगृह के सामने बनाये गये। इसमें भक्त एकत्र होकर विधि-विधानपूर्वक नृत्य करते थे। कहीं-कहीं देव प्रतिमों से युक्त एक गलियारा गर्भगृह के चारों ओर जोड़ दिया जाता था ताकि भक्तगण उसकी परिक्रमा कर सकें। सम्पूर्ण ढांचे के चारों ओर ऊँची दीवारों और विशाल द्वारों वाला एक आहता बनाया जाता था जिसे गोपुरम कहते थे। कुछ मंदिरों में राजा और उसकी रानियों के चित्र भी लगाये गये।

साहित्य

चोल काल में तमिल भाषा एवं सहित्य का विकास हुआ। इस काल का प्रसिद्ध लेखक जयगोन्दर था जिसने कलिंगत्तुप्परणि की रचना की। परांतक (प्रथम) के शासन काल में संस्कृत का प्रसिद्ध विद्वान वैंकट माधव हुआ जिसके द्वारा ऋग्वेद पर लिखा गया भाष्य बड़ा प्रसिद्ध है। चोल शासक राजेन्द्र (प्रथम) साहित्य एवं विद्यानुरागी था। वेद विद्या एवं शास्त्रों के अध्ययन के लिये उसने एक विद्यालय स्थापित किया। जयगोन्दर, कुलोत्तुंग (प्रथम) के दरबार को सुशोभित करता था। कुलोत्तुंग (प्रथम) के समय में कम्बन नामक प्रसिद्ध कवि हुए जिन्होंने तमिल रामायण की रचना की। इसे तमिल साहित्य का महाकाव्य माना जाता है। इस काल की अन्य रचनाओं में जैन कवि विरुत्तक्कदेवर कृत जीवक चिंतामणि, जैन विद्वान तोलामोल्लि कृत शूलमणि, बौद्ध विद्वान बुद्धमित्त कृत वीर सोलियम, आदि प्रमुख हैं। चोलकाल के संस्कृत लेखकों में वैष्णव आचार्य नाथमुनि, यमुनाचार्य तथा रामानुज सुप्रसिद्ध हैं।

अध्याय – 28 : भारत में राजपूतों का उदय

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पुष्यभूति राजा हर्षवर्द्धन की मृत्यु के उपरान्त भारत की राजनीतिक एकता पुनः भंग हो गई और देश के विभिन्न भागों में छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना हुई। इन राज्यों के शासक राजपूत थे। इसलिये इस युग को ‘राजपूत-युग’ कहा जाता है। इस युग का आरम्भ 648 ई. में हर्ष की मृत्यु से होता है और इसका अन्त 1206 ई. में भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना से होता है। इसलिये 648 ई. से 1206 ई. तक के काल को भारतीय इतिहास में ‘राजपूत-युग’ कहा जाता है।

राजपूत युग का महत्त्व

भारतीय इतिहास में राजपूत युग का बहुत बड़ा महत्त्व है। इस युग में भारत पर मुसलमानों के आक्रमण आरम्भ हुए। लगभग साढ़े पाँच शताब्दियों तक राजपूत योद्धाओं ने वीरता तथा साहस के साथ मुस्लिम आक्रांताओं का सामना किया और देश की स्वतन्त्रता की रक्षा करते रहे। यद्यपि वे अंत में विदेशी आक्रांताओं से परास्त हुए परन्तु लगभग छः शताब्दियों तक उनके द्वारा की गई देश सेवा भारत के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। राजपूत शासकों में कुछ ऐसे विशिष्ट गुण थे, जिनके कारण उनकी प्रजा उन्हें आदर की दृष्टि से देखती थी। राजपूत योद्धा अपने वचन का पक्का होता था और किसी के साथ विश्वासघात नहीं करता था। वह शत्रु को पीठ नहीं दिखाता था। वह रणक्षेत्र में वीरतापूर्वक युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त करना पसंद करता था। राजपूत योद्धा, निःशस्त्र शत्रु पर प्रहार करना महापाप और शरणागत की रक्षा करना परम धर्म समझता था। वह रणप्रिय होता था और रणक्षेत्र ही उसकी कर्मभूमि होती थी। वह देश की रक्षा का सम्पूर्ण भार वहन करता था।

राजपूत योद्धाओं के गुणों की प्रशंसा करते हुए कर्नल टॉड ने लिखा है- ‘यह स्वीकार करना पड़ेगा कि राजपूतों में उच्च साहस, देशभक्ति, स्वामि-भक्ति, आत्म-सम्मान, अतिथि-सत्कार तथा सरलता के गुण विद्यमान थे। डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने राजपूतों के गुणों की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘राजपूत में आत्म-सम्मान की भावना उच्च कोटि की होती थी। वह सत्य को बड़े आदर की दृष्टि से देखता था। वह अपने शत्रुओं के प्रति भी उदार था और विजयी हो जाने पर उस प्रकार की बर्बरता नहीं करता था, जिनका किया जाना मुस्लिम-विजय के फलस्वरूप अवश्यम्भावी था। वह युद्ध में कभी बेईमानी या विश्वासघात नहीं करता था और गरीब तथा निरपराध व्यक्तियों को कभी क्षति नहीं पहुँचाता था।’ राजपूत राजाओं ने देश को धन-धान्य से परिपूर्ण बनाने के अथक प्रयास किये।

सांस्कृतिक दृष्टि से भी राजपूत युग का बड़ा महत्त्व है। उनके शासन काल में साहित्य तथा कला की उन्नति हुई और धर्म की रक्षा का प्रयत्न किया गया। राजपूत राजाओं ने अपनी राजसभाओं में कवियों तथा कलाकारों को प्रश्रय, पुरस्कार तथा प्रोत्साहन दिया। इस काल में असंख्य मन्दिरों एवं देव प्रतिमाओं का निर्माण हुआ और मंदिरों को दान-दक्षिणा से सम्पन्न बनाया गया।

राजपूत शब्द की व्याख्या

राजपूत शब्द संस्कृत के ‘राजपुत्र’ का बिगड़ा हुआ स्वरूप है। प्राचीन काल में राजपुत्र शब्द का प्रयोग राजकुमारों तथा राजवंश के लोगों के लिए होता था। प्रायः क्षत्रिय ही राजवंश के होते थे, इसलिये ‘राजपूत’ शब्द सामान्यतः क्षत्रियों के लिए प्रयुक्त होने लगा। जब मुसलमानों ने भारत में प्रवेश किया तब उन्हें राजपुत्र शब्द का उच्चारण करने में कठिनाई हुई, इसलिये वे राजपुत्र के स्थान पर राजपूत शब्द का प्रयोग करने लगे। राजपूत शब्द की व्याख्या करते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘राजपूताना के कुछ राज्यों में साधारण बोलचाल में राजपूत शब्द का प्रयोग क्षत्रिय सामन्त या जागीदार के पुत्रों को सूचित करने के लिए किया जाता है परन्तु वास्तव में यह संस्कृत के राजपुत्र शब्द का विकृत स्वरूप है जिसका अर्थ हेाता है राजवंश का।’

राजपूत शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सातवीं शताब्दी के दूसरे भाग में हुआ। उसके पूर्व कभी इस शब्द का प्रयोग नहीं हुआ, इसलिये राजपूतों की उत्पति के सम्बन्ध में विद्वानों में बड़ा मतभेद उत्पन्न हो गया। इस सम्बन्ध में डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘राजपूतों की उत्पति विवाद ग्रस्त है। राजपूतों की उत्पत्ति को निश्चित रूप से निर्धारत करने के लिए ऐतिहासिक विदग्धता का प्रयोग किया गया है और ब्राह्मण साहित्य तथा चारणों की प्रशस्तियों में उन्हें जो उच्च अभिजातीय स्थान प्रदान किया गया है उसने कठिनाई को अत्यधिक बढ़ा दिया है।’

राजपूतों की उत्पत्ति

राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों में बड़ा मतभेद है। कुछ विद्वान् उन्हें विशुद्ध प्राचीन क्षत्रियों की सन्तान बताते हैं तो कुछ उन्हें विदेशियों के वशंज। कुछ विद्वानों के अनुसार राजपूत मिश्रित-रक्त के हैं।

(1) प्राचीन क्षत्रियों से उत्पत्ति: अधिकांश भारतीय इतिहासकारों के अनुसार राजपूत प्राचीन क्षत्रियों के वंशज हैं जो अपने को सूर्यवंशी तथा चन्द्रवंशी मानते हैं। यह विचार भारतीय अनुश्रुतियों तथा परम्परा के अनुकूल पड़ता है। प्राचीन अनुश्रुतियों से ज्ञात होता है कि प्राचीन क्षत्रिय समाज दो भागों में विभक्त था। इनमें से एक सूर्यवंशी और दूसरा चन्द्रवंशी कहलाता था। कालान्तर में इनकी एक तीसरी शाखा उत्पन्न हो गई जो यदुवंशी कहलाने लगी। इन्हीं तीन शाखाओं के अन्तर्गत समस्त क्षत्रिय आ जाते थे। इनका मुख्य कार्य शासन करना तथा आक्रमणकारियों से देश की रक्षा करना था। क्षत्रियों का यह कार्य भारतीय जाति-व्यवस्था के अनुकूल था। कालान्तर में कुल के महान् ऐश्वर्यशाली व्यक्तियों के नाम पर भी वंश के नाम पड़ने लगे। इससे क्षत्रियों की अनेक उपजातियाँ बन गईं। हर्ष की मृत्यु के उपरान्त क्षत्रियों की इन्हीं विभिन्न शाखाओं ने भारत के विभिन्न भागों में अपने राज्य स्थापित कर लिये। ये शाखाएं सामूहिक रूप से राजपूत कहलाईं। राजपूतों का जीवन, उनके आदर्श तथा उनका धर्म उसी प्रकार का था, जो प्राचीन क्षत्रियों का था। उनमें विदेशीपन की कोई छाप नहीं थी। इसलिये अधिकांश भारतीय इतिहासकारों ने उन्हें प्राचीन क्षत्रियों की सन्तान माना है।

(2) अग्निकुण्ड से उत्पत्ति: पृथ्वीराज रासो के अनुसार राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुण्ड से हुई। जब परशुराम ने क्षत्रियों का विनाश कर दिया तब समाज में बड़ी गड़बड़ी फैल गई और लोग कर्त्तव्य भ्रष्ट हो गये। इससे देवता बड़े दुःखी हुए और आबू पर्वत पर एकत्रित हुए, जहाँ एक विशाल अग्निकुण्ड था। इसी अग्निकुण्ड से देवताओं ने प्रतिहारों (पड़िहारों), परमारों (पँवारों), चौलुक्यों (सोलंकियों) तथा चाहमानों (चौहानों) को उत्पन्न किया। इसलिये ये चारों वंश अग्निवंशी कहलाते हैं।

इस अनुश्रुति के स्वीकार करने में कठिनाई यह है कि यह अनुश्रुति सोलहवीं शताब्दी की है। इसके पूर्व इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता। इसलिये यह चारणों की कल्पना प्रतीत होती है। कुछ इतिहासकारों की धारणा है कि इन राजपूतों ने अग्नि के समक्ष, अरबों तथा तुर्कों से देश की रक्षा की शपथ ली। इसलिये ये अग्निवंशी कहलाये। कुछ अन्य इतिहासकारों की धारणा है कि ब्राह्मणों ने यज्ञ द्वारा जिन विदेशियों की शुद्धि करके क्षत्रिय समाज में समाविष्ट कर लिया था, वही अग्निवंशी राजपूत कहलाये।

अग्निकुण्ड से राजपूतों की उत्पति मानने वाले बहुत कम विद्वान हैं। डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘यह स्पष्ट है कि कथा कोरी गल्प है और इसे सिद्ध करने के लिए प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। यह ब्राह्मणों द्वारा उस जाति को अभिजातीय सिद्ध करने का प्रयास प्रतीत होता है, जिसका समाज में बड़ा ऊँचा स्थान था और जो ब्राह्मणों को मुक्त हस्त होकर दान देते थे। ब्राह्मणों ने बड़े उत्साह के साथ उस उदारता का बदला देने का प्रयत्न किया।’

(3) विदेशियों से उत्पत्ति: पुराणों में हैहय राजपूतों का उल्लेख शकों तथा यवनों के साथ किया गया है। इस कारण कुछ इतिहासकारों ने राजपूतों की उत्पत्ति विदेशियों से बतलाई है। कर्नल टॉड ने राजपूतों तथा मध्य एशिया की शक तथा सीथियन जातियों में बड़ी समानता पाई है। इसलिये वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि राजपूत उन्हीं विदेशियों के वंशज हैं। ये जातियाँ समय-समय पर भारत में प्रवेश करती रही हैं। उन्होंने कालान्तर में हिन्दू धर्म तथा हिन्दू रीति रिवाजों को स्वीकार कर लिया। चूँकि ये विदेशी जातियाँ, शासक वर्ग में आती थीं, जिस वर्ग में भारत के प्राचीन क्षत्रिय आते थे, इसलिये उन्होेंने प्राचीन क्षत्रियों का स्थान ग्रहण कर लिया और राजपूत कहलाने लगे। टॉड के इस मत का अनुमोदन करते हुए स्मिथ ने लिखा है- ‘ मुझे इस बात मंें कोई संदेह नहीं है कि शकों तथा कुषाणों के राजवंश, जब उन्होंने हिन्दू धर्म को स्वीकार कर लिया तब हिन्दू जाति-व्यवस्था में क्षत्रियों के रूप में सम्मिलित कर लिये गये।’ राजपूतों की विदेशी उत्पत्ति का समर्थन करते हुए क्रुक ने लिखा है- ‘आजकल के अनुसन्धानों ने राजपूतों की उत्पत्ति पर काफी प्रकाश डाला है। वैदिक क्षत्रियों तथा मध्य काल के राजपूतों में ऐसी खाई है जिसे पूरा करना असंभव है।’ इस मत को स्वीकार करने में बड़ी कठिनाई यह है कि यदि समस्त राजदूत विदेशी थे तो हर्ष की मृत्यु के उपरान्त भारत के प्राचीन क्षत्रियों की एक जीवित तथा शक्तिशाली जाति, जिसके हाथ में राजनीतिक शक्ति थी, सहसा कहाँ, कैसे और कब विलुप्त हो गई ? इस मत को स्वीकार करने में दूसरी कठिनाई यह है कि राजपूतों का जीवन उनके आदर्श, उनका नैतिक स्तर तथा उनका धर्म विदेशियों से बिल्कुल भिन्न और प्राचीन क्षत्रियों के बिल्कुल अनुरूप है। इसलिये उन्हें विदेशी मानना अनुचित है।

(4) मिश्रित उत्पत्ति: इस मत के अनुसार विभिन्न कालखण्डों में शक, कुषाण, हूण, सीथियन गुर्जर आदि जो विदेशी जातियाँ भारत में आकर शासन करने लगीं, उन्होंने भारतीय क्षात्र-धर्म स्वीकार कर लिया, वे भारतीय क्षत्रियों में घुल-मिल गईं। भारतीय समाज में विदेशियों को आत्मसात् करने की बहुत बड़ी क्षमता थी इसलिये विदेशी जातियाँ भारतीयों में घुल-मिल गईं। इनके विलयन की सर्वाधिक सम्भावना थी, क्योंकि विदेशी शासक भी भारतीय क्षत्रियों की भाँति शासक वर्ग के थे और उन्हीं के समान वीर तथा साहसी थे। इसलिये यह स्वाभाविक प्रतीत होता है कि विदेशी शासकों एवं प्राचीन भारतीय क्षत्रिय कुलों में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हो गये और उनके आचार-व्यवहार तथा रीति-रिवाज एक से हो गये हो। इसी से कुछ विद्वानों की यह धारणा है कि राजपूत लोग निश्चय ही प्राचीन क्षत्रियों के वशंज हैं तथा उनमें विदेशी रक्त के सम्मिश्रण की भी सम्भावना है।

(5) अन्य मत: परशुराम स्मृति में राजपूत को वैश्य पुरुष तथा अम्बष्ठ स्त्री से उत्पन्न बताया है। इससे वह शूद्र सिद्ध होता है किंतु विद्वानों के अनुसार परशुराम स्मृति का यह कथन मूल ग्रंथ का नहीं है, उसे बाद के किसी काल में क्षेपक के रूप में जोड़ा गया है।

अध्याय – 29 : भारत के प्रमुख राजपूत-वंश

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गुर्जर-प्रतिहार वंश

गुर्जर-प्रतिहार वंश का उदय राजस्थान के दक्षिण-पूर्व में गुर्जर प्रदेश में हुआ। इसी कारण इस वंश के नाम के पहले गुर्जर शब्द जोड़ दिया गया। प्राचीन क्षत्रियों के शासन काल में सम्राट के अंगरक्षक को प्रतिहार कहते थे। अनुमान है कि प्रतिहार वंश के संस्थापक, पूर्व में किसी राजा के प्रतिहार थे। इसी से इस वंश का नाम प्रतिहार वंश पड़ा। ग्वालियर अभिलेख के अनुसार प्रतिहार वंश सौमित्र (लक्ष्मण) से उत्पन्न हुआ। लक्ष्मण ने मेघनाद की सेना का प्रतिहरण किया था (भगा दिया था) इसी कारण उनका वंश प्रतिहार कहलाया। इस वंश के लोग स्वयं को सूर्यवंशी क्षत्रिय तथा लक्ष्मण के वंशज मानते हैं। डॉ. गौरीशंकर ओझा उन्हें ईक्ष्वाकु वंशी मानते हैं।

डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘यह कहना बहुत बड़ी मूर्खता होगी कि राजपूत लोग प्राचीन वैदिक काल के क्षत्रियों की शुद्ध सन्तान हैं। ऐसा सोचकर हम मिथ्याभिमान कर सकते हैं, परन्तु मिथ्याभिमान प्रायः तथ्य से दूर होता है। पाँचवी तथा छठीं शताब्दी ई. में भी विदेशी भारत में आये, वे प्रतिहार थे इसलिये उस वंश के लोग प्रतिहार कहलाये।’ कनिंघम ने प्रतिहारों को यूचियों की संतान माना है। स्मिथ आदि विद्वानों ने प्रतिहारों को हूणों की संतान माना है। आर.सी. मजूमदार आदि इतिहासकार प्रतिहारों को खिजरों की संतान मानते हैं तथा खिजर शब्द से ही गुर्जर शब्द की उत्पत्ति मानते हैं।

प्रतिहार वंश का उदय सर्वप्रथम राजस्थान में जोधपुर के निकट मण्डोर नामक स्थान पर हुआ। इस वंश की एक शाखा ने उन्नति करते हुए अवंति (उज्जैन) में अपनी प्रभुता स्थापित कर ली और वहीं पर शासन करने लगी।

नागभट्ट (प्रथम): इस शाखा का प्रथम शासक नागभट्ट (प्रथम) था। उसने जालोर को अपनी राजधानी बनाया। वह बड़ा प्रतापी शासक था। उसने सम्पूर्ण मालवा तथा पूर्वी राजस्थान पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। उसके शासनकाल में 725 ई. में अरब आक्रांताओं ने मालवा पर आक्रमण किया। नागभट्ट ने बड़ी वीरता तथा साहस के साथ विदेशी आक्रमणकारियों का सामना किया और उन्हें मार भगाया। इस प्रकार नागभट्ट (प्रथम) ने मुसलमानों से देश की रक्षा का प्रशंसनीय कार्य किया।

वत्सराज: नागभट्ट (प्रथम) के बाद नाममात्र के दो शासक हुए। इस वंश का चौथा शासक वत्सराज था। वह प्रतापी राजा था, उसने राजपूताना के भट्टी वंश के राजा को परास्त किया और गौड़ (बंगाल) के राजा धर्मपाल को परास्त कर बंगाल तक शक्ति बढ़ा ली परन्तु राष्ट्रकूट राजा ध्रुव ने वत्सराज को परास्त कर मरूभूमि में शरण लेने के लिए बाध्य किया।

नागभट्ट (द्वितीय): वत्सराज की मृत्यु के उपरान्त उसका पुत्र नागभट्ट (द्वितीय) प्रतिहारों के सिंहासन पर बैठा। वह साहसी तथा महत्त्वकांक्षी शासक था। उसने राष्ट्रकूट राजा से अपने पिता की पराजय का बदला लेने का प्रयत्न किया परन्तु सफल नहीं हो सका। उसने कन्नौज पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया तथा कन्नौज को राजधानी बनाकर वहीं से शासन करने लगा। उसका बंगाल के राजा धर्मपाल से भी संघर्ष हुआ, नागट्ट (द्वितीय) ने उसे मंुगेर के निकट परास्त किया। इससे नागभट्ट (द्वितीय) की प्रतिष्ठा में बड़ी वृद्धि हुई।

रामचन्द्र: नागभट्ट (द्वितीय) के बाद उसका पुत्र रामचन्द्र सिंहासन पर बैठा, परन्तु वह अयोग्य सिद्ध हुआ।

मिहिरभोज: रामचन्द्र के बाद उसका पुत्र मिहिरभोज शासक हुआ। वह बड़ा ही प्रतापी राजा सिद्ध हुआ। सिंहासन पर बैठते ही उसने बुन्देलखण्ड पर अधिकार कर लिया। मारवाड़ में भी उसने अपने वंश की सत्ता फिर से स्थापित की। बंगाल के शासक देवपाल के साथ भी उसका युद्ध हुआ परन्तु उसमें वह सफल नहीं हो सका। मिहिरभोज एक कुशल शासक था। मिहिरभोज की उपलब्धियों का वर्णन आगे के अध्याय में किया गया है।

महेन्द्रपाल (प्रथम): मिहिरभोज के बाद महेन्द्रपाल (प्रथम) शासक हुआ। वह भी योग्य तथा प्रतापी शासक था। उसने मगध के बहुत बड़े भाग तथा उत्तरी बंगाल पर अधिकार कर लिया तथा दक्षिण-पश्चिम में सौराष्ट्र तक अपनी सत्ता स्थापित कर ली।

महिपाल: महेन्द्रपाल के बाद महिपाल कन्नौज का शासक हुआ। उसे भयानक विपत्तियों का सामना करना पड़ा। दक्षिण के राष्ट्रकूट राजा ने उसके राज्य पर आक्रमण कर दिया और उसे खूब लूटा। पूर्व में बंगाल के राजा ने भी अपना खोया हुआ राज्य फिर से छीन लिया। महिपाल ने धैर्य के साथ इन विपत्तियों का सामना किया परन्तु वह कन्नौज राज्य को गिरने से नहीं बचा सका। उसके जीवन के अन्तिम भाग में राष्ट्रकूट राजा ने कन्नौज पर आक्रमण किया जिसके फलस्वरूप वह पतनोन्मुख हो गया।

महमूद गजनवी का कन्नौज पर आक्रमण: महिपाल के बाद उस वंश में कई अयोग्य शासक हुए। इनमें राजपाल का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उसके शासन काल में 1018 ई. में महमूद गजनवी ने कन्नौज पर आक्रमण किया। राजपाल ने बड़ी कायरता दिखाई। वह कन्नौज छोड़कर भाग गया और अपने एक सामन्त के यहाँ शरण ली। महमूद ने कन्नौज तथा उसमें स्थित मन्दिरों को खूब लूटा।

प्रतिहारों के कन्नौज राज्य का अंत: यशपाल इस वंश का अन्तिम राजा था। 1058 ई. में गहड़वाल वंश के राजा चन्द्रदेव ने कन्नौज पर विजय प्राप्त कर उसे अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया। इस प्रकार कन्नौज के प्रतिहार वंश के शासन का अन्त हो गया।

गहड़वाल वंश

इस वंश का उदय ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में मिर्जापुर के पहाड़ी प्रदेश में हुआ था। गुहायुक्त पहाड़ी प्रदेश में रहने के कारण ही यह लोग गहड़वाल अर्थात् गुहावाले कहलाये।

चन्द्रदेव: इस वंश के संस्थापक का नाम चन्द्रदेव था जिसकी राजधानी वाराणसी थी। लगभग 1085 ई. में उसने कन्नौज पर अधिकार कर लिया और वहीं से शासन करने लगा। पूर्व की ओर उसने सेन राजाओं की प्रगति को रोका। लगभग 1100 ई. में चन्द्रदेव की मृत्यु हुई।

गोविन्दचन्द्र तथा विजयचन्द्र: चन्द्रदेव के बाद गोविन्दचन्द्र तथा उसके बाद विजयचन्द्र नामक दो प्रतापी शासक हुए जिन्होंने अपने पूर्वजों के राज्य तथा गौरव को सुरक्षित रखा।

जयचन्द: इस वंश का अन्तिम शक्तिशाली राजा जयचन्द था जो लगभग 1170 ई. में सिंहासन पर बैठा। कहा जाता है कि उसने मुस्लिम आक्रमणकारी शहाबुद्दीन को कई बार युद्ध में परास्त किया। दुर्भाग्यवश जयचन्द्र की दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान से शत्रुता हो गई। जयचन्द की पुत्री संयोगिता के विवाह ने इस शत्रुता को और बढ़ा दिया। जयचन्द ने अपनी पुत्री संयोगिता का स्वयंवर किया। इस स्वयंवर में जयचन्द ने पृथ्वीराज को अपमानित करने के लिए पृथ्वीराज की एक प्रतिमा स्वयंवर स्थल के द्वार पर द्वारपाल के रूप में रखवा दी। संयोगिता पृथ्वीराज की वीरता की कहानियाँ सुन चुकी थी। इसलिये उसने उसी के साथ विवाह करने का निश्चय कर लिया। फलतः उसने पृथ्वीराज की प्रतिमा के गले में जयमाला डाल दी। पृथ्वीराज अपने सैनिकों के साथ वहीं निकट ही छिपा हुआ था। उसने स्वयंवर स्थल पर पहुंचकर संयोगिता को अपने घोड़े पर बिठा लिया और उसे लेकर दिल्ली चला गया। इससे जयचन्द तथा पृथ्वीराज की शत्रुता और बढ़ गई। जयचन्द इस अपमान को नहीं भूल सका। जब मुहमद गौरी ने दिल्ली पर आक्रमण किया तब जयचन्द ने पृथ्वीराज का साथ नहीं दिया। पृथ्वीराज को परास्त करने के बाद मुहमद गौरी ने 1194 ई. में कन्नौज पर आक्रमण किया। जयचन्द युद्ध में परास्त होकर मारा गया।

हरिश्चन्द्र: जयचन्द के बाद उसका पुत्र हरिश्चन्द्र राजा हुआ जो मुहम्मद गौरी के सामन्त रूप में शासन करता था। 1225 ई. में इल्तुतमिश ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार गहड़वाल वंश का अन्त हो गया।

चौहान वंश

चौहानों का उदय छठी शताब्दी ईस्वी के लगभग हुआ। उन्होंने सांभर झील के आसपास अपनी शक्ति बढ़ाई। राजशेखर द्वारा लिखित प्रबंधकोष के अनुसार चौहान शासकों में वासुदेव पहला शासक था जिसने 551 ई. में सपादलक्ष (सांभर) में शासन किया। बिजोलिया अभिलेख कहता है कि वासुदेव सांभर झील का प्रवर्तक था। उसका पुत्र सामंतदेव हुआ।

अजयपाल: सामंतदेव का वंशज अजयराज अथवा अजयपाल 683 ई. के आसपास अजमेर का राजा हुआ। उसने अजमेर नगर की स्थापना की। अपने अंतिम वर्षों में वह अपना राज्य अपने पुत्र को देकर पहाड़ियों में जाकर तपस्या करने लगा। अजयराज के वंशज प्रतिहार शासकों के अधीन रहकर राज्य करते थे किन्तु ईसा की ग्याहरवीं शताब्दी के लगभग उन्होंने स्वयं को प्रतिहारों से स्वतन्त्र कर लिया।

विग्रहराज (प्रथम) से गोविंदराज (प्रथम): अजयपाल के बाद उसका पुत्र विग्रहराज (प्रथम) अजमेर का शासक हुआ। विग्रहराज (प्रथम) के बाद विग्रहराज (प्रथम) का पुत्र चंद्रराज (प्रथम), चंद्रराज (प्रथम) के बाद विग्रहराज (प्रथम) का दूसरा पुत्र गोपेन्द्रराज अजमेर का राजा हुआ। इसे गोविंदराज (प्रथम) भी कहते हैं। यह मुसलमानों से लड़ने वाला पहला चौहान राजा था। उसने मुसलमानों की सेनाओं को परास्त करके उनके सेनापति सुल्तान बेग वारिस को बंदी बना लिया।

दुर्लभराज (प्रथम): गोविंदराज (प्रथम) के बाद दुर्लभराज (प्रथम) अजमेर का राजा हुआ। इसे दूलाराय भी कहते हैं। जब प्रतिहार शासक वत्सराज ने बंगाल के शासक धर्मपाल पर चढ़ाई की तब दुर्लभराज, प्रतिहारों के सेनापति के रूप में इस युद्ध में सम्मिलित हुआ। उसने बंगाल की सेना को परास्त कर अपना झण्डा बंगाल तक लहरा दिया। दुर्लभराय का गौड़ राजपूतों से भी संघर्ष हुआ। दुर्लभराज पहला राजा था जिसके समय में अजमेर पर मुसलमानों का सर्वप्रथम आक्रमण हुआ।

गूवक (प्रथम): दुर्लभराज प्रथम (दूलाराय) के बाद उसका पुत्र गूवक (प्रथम) अजमेर का शासक हुआ। संभवतः उसी ने आठवीं शताब्दी के किसी कालखण्ड में, मुसलमानों से अजमेर पुनः छीनकर अजमेर का उद्धार किया। वह सुप्रसिद्ध योद्धा हुआ। 805 ई. में कन्नौज के शासक नागावलोक (नागभट्ट द्वितीय) की राजसभा में गूवक को वीर की उपाधि दी गई। गूवक (प्रथम) ने अनंत प्रदेश (वर्तमान में राजस्थान का सीकर जिला) में अपने अराध्य हर्ष महादेव का मंदिर बनवाया।

चंद्रराज (द्वितीय) तथा गूवक (द्वितीय): गूवक (प्रथम) के बाद उसका पुत्र चंद्रराज (द्वितीय) अजमेर का शासक हुआ। उसके बाद गूवक (द्वितीय) अजमेर का राजा हुआ। उसकी बहिन कलावती का विवाह प्रतिहार शासक भोज (प्रथम) के साथ हुआ।

चंदनराज: गूवक (द्वितीय) के बाद चंदनराज अजमेर की गद्दी पर बैठा। चंदनराज ने दिल्ली के निकट तंवरावटी पर आक्रमण किया तथा उसके राजा रुद्रेन अथवा रुद्रपाल का वध कर दिया। चंदनराज की रानी रुद्राणी ने पुष्कर के तट पर एक सहस्र शिवलिंगों की स्थापना एवं प्राण प्रतिष्ठा की।

वाक्पतिराज: चंदनराज का उत्तराधिकारी वाक्पतिराज हुआ जिसे बप्पराज भी कहा जाता है। उसका राज्य समृद्ध था। उसने अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। उसके राज्य की दक्षिणी सीमा विंध्याचल पर्वत तक जा पहुँची। वह एक महान योद्धा था। उसने 188 युद्ध जीते।

सिंहराज: सिंहराज महान राजा हुआ। तोमरों ने राजा लवण की सहायता से सिंहराज के राज्य पर आक्रमण किया। सिंहराज ने तोमरों को परास्त करके लवण को बंदी बना लिया। प्रतिहार शासक ने सिंहराज से प्रार्थना करके लवण को मुक्त करवाया। हम्मीर महाकाव्य कहता है कि जब उसके अभियान का डंका बजता तो कर्नाटक का राजा उसकी चापलूसी करने लगता। लाट का राजा अपने दरवाजे उसके लिये खोल देता। चोल नरेश (मद्रास नरेश) कांपने लगता, गुजरात का राजा अपना सिर खो देता तथा अंग (पश्चिमी बंगाल) के राजा का हृदय डूब जाता। उसने मुसलमानों के सेनापति हातिम का वध किया तथा उसके हाथियों को पकड़ लिया। उसने अजमेर तक आ पहुँची सुल्तान हाजीउद्दीन की सेना को खदेड़ दिया। सिंहराज ई.956 तक जीवित रहा। हर्ष मंदिर का निर्माण उसके काल में ही पूरा हुआ। इस अभिलेख में चौहानों की तब तक की वंशावली दी गई है।

विग्रहराज (द्वितीय): सिंहराज का पुत्र विग्रहराज (द्वितीय) ई.973 में उसका उत्तराधिकारी हुआ। उसने अपने राज्य का बड़ा विस्तार किया। उसने प्रतिहारों की अधीनता त्याग दी और पूर्ण रूप से स्वतंत्र हो गया। उसने 973 ई. से 996 ई. के बीच गुजरात पर आक्रमण किया। गुजरात का शासक मूलराज राजधानी खाली करके कच्छ में भाग गया। इस पर विग्रहराज अपनी राजधानी अजमेर लौट आया। उसने दक्षिण में अपना राज्य नर्बदा तक बढ़ा लिया। उसने भरूच में आशापूर्णा देवी का मंदिर बनवाया। चौदहवीं शताब्दी में लिखे गये हम्मीर महाकाव्य के अनुसार विग्रहराज (द्वितीय) ने गुजरात के राजा मूलराज का वध किया। यहाँ से चौहानों तथा चौलुक्यों का संघर्ष आरंभ हुआ जिसका लाभ आगे चलकर अफगानिस्तान से आये आक्रांताओं ने उठाया।

दुर्लभराज (द्वितीय) तथा गोविंदराज (द्वितीय): विग्रहराज (द्वितीय) के बाद दुर्लभराज (द्वितीय) तथा उसके बाद गोविंदराज (द्वितीय) अजमेर के शासक हुए।

वाक्पतिराज (द्वितीय): गोविंदराज (द्वितीय) का उत्तराधिकारी उसका पुत्र वाक्पतिराज (द्वितीय) हुआ। उसने मेवाड़ के शासक अम्बाप्रसाद का वध किया।

वीर्यराम: वाक्पतिराज (द्वितीय) के बाद वीर्यराम अजमेर का राजा हुआ। वह मालवा के राजा भोज का समकालीन था। वीर्यराम के शासन काल में ई.1024 में महमूद गजनवी ने अजमेर पर आक्रमण किया तथा गढ़ बीठली को घेर लिया किंतु घायल होकर अन्हिलवाड़ा को भाग गया। वीर्यराम ने मालवा पर आक्रमण किया किंतु भोज के हाथों परास्त होकर मारा गया।

चामुण्डराज: वीर्यराम का उत्तराधिकारी चामुण्डराज हुआ। उसने शक मुसलमानों के स्वामी हेजामुद्दीन को पकड़ लिया।

दुर्लभराज (तृतीय): चामुण्डराज के बाद 1075 ई. में दुर्लभराज (तृतीय) राजा हुआ जिसे दूसल भी कहते हैं। उसने मुस्लिम सेनापति शहाबुद्दीन को परास्त किया। 1080 ई. में मेवात के शासक महेश ने दूसल की अधीनता स्वीकार की। दूसल ने ई.1091 से 1093 के मध्य गुजरात पर आक्रमण किया तथा वहाँ के राजा कर्ण को मार डाला ताकि मालवा का शासक उदयादित्य, गुजरात पर अधिकार कर सके। मेवाड़ के शासक वैरिसिंह ने दूसल को कुंवारिया के युद्ध में मार डाला।

विग्रहराज (तृतीय): दुर्लभराज के बाद विग्रहराज (तृतीय) अजमेर का शासक हुआ। इसे बीसल अथवा वीसल भी कहा जाता था। उसने भी मुस्लिम आक्रांताओं के विरुद्ध एक संघ बनाया तथा हांसी, थाणेश्वर और नगरकोट से मुस्लिम गवर्नरांे को मार भगाया। इस विजय के बाद दिल्ली में एक स्तम्भ लेख लगावाया गया जिसमें लिखा है कि विन्ध्य से हिमालय तक म्लेच्छों को निकाल बाहर किया गया जिससे आयावर्त एक बार फिर पुण्यभूमि बन गया। वीसल ने अन्हिलवाड़ा पाटन के चौलुक्य राजा कर्ण को युद्ध में परास्त किया। कर्ण ने अपनी पुत्री का विवाह विग्रहराज के साथ कर दिया। विग्रहराज ने विजय स्थल पर अपने नाम से वीसलनगर नामक नगर की स्थापना की। यह नगर आज भी विद्यमान है।

पृथ्वीराज (प्रथम): वीसलदेव का उत्तराधिकारी पृथ्वीराज (प्रथम) हुआ। उसके समय में चौलुक्यों की सेना पुष्कर को लूटने आई। इस पर पृथ्वीराज (प्रथम) ने चौलुक्यों पर आक्रमण करके 500 चौलुक्यों को मार डाला। उसने सोमनाथ के मार्ग में एक भिक्षागृह बनाया। शेखावटी क्षेत्र में स्थित जीणमाता मंदिर में लगे वि.सं.1162 (ई.1105) के अभिलेख में अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान (प्रथम) का उल्लेख है।

अजयदेव (अजयराज अथवा अजयपाल): पृथ्वीराज (प्रथम) के बाद अजयदेव अजमेर का राजा हुआ। अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार ई.1113 के लगभग अजयदेव ने अजमेर को राजधानी बनाया। उसके बाद ही अजमेर का विश्वसनीय इतिहास प्राप्त होता है। अजदेव ने चांदी तथा ताम्बे के सिक्के चलाये। उसके कुछ सिक्कों पर उसकी रानी सोमलवती का नाम भी अंकित है। उसने अजमेर पर चढ़कर आये मुस्लिम आक्रांताओं को परास्त कर उनका बड़ी संख्या में संहार किया। अजयराज ने चाचिक, सिंधुल तथा यशोराज पर विजय प्राप्त की तथा उन्हें मार डाला। ई.1123 में वह मालवा के प्रधान सेनापति सल्हण को पकड़ कर अजमेर ले आया तथा एक मजबूत दुर्ग में बंद कर दिया। उसने मुसलमानों को परास्त करके बड़ी संख्या में उनका वध किया। उसने उज्जैन तक का क्षेत्र जीत लिया। अजयराज को अजयराज चक्री भी कहते थे क्योंकि उसने चक्र की तरह दूर-दूर तक बिखरे हुए शत्रुदल को युद्ध में जीता था। अर्थात् वह चक्रवर्ती विजेता था। ई.1130 से पहले किसी समय अजयराज अपने पुत्र अर्णोराज को राज्य का भार देकर पुष्करारण्य में जा रहा।

अर्णोराज: अजयदेव का पुत्र अर्णोराज 1133 ई. के आसपास अजमेर का शासक हुआ। उसे आनाजी भी कहते हैं। वह 1155 ई. तक शासन करता रहा। उसने 1135 ई. में उन तुर्कों को पराजित किया जो मरुस्थल को पार करके अजमेर तक आ पहुँचे थे। उसने अजमेर में आनासागर झील बनाई। उसने मालवा के नरवर्मन को परास्त किया। उसने अपनी विजय पताका सिंधु और सरस्वती नदी के प्रदेशों तक फहराई तथा हरितानक देश तक युद्ध अभियान का नेतृत्व किया। उसने पंजाब के पूर्वी भाग और संयुक्त प्रांत के पश्चिमी भाग, हरियाणा, दिल्ली तथा वर्तमान उत्तरप्रदेश के बुलन्दशहर जिले (तब वराणा राज्य अथवा वरण नगर) पर भी अधिकार कर लिया। अर्णोराज के समय में चौहान-चौलुक्य संघर्ष अपने चरम को पहुँच गया। ई.1134 में सिद्धराज जयसिंह ने अजमेर पर आक्रमण किया किंतु अर्णोराज ने उसे परास्त कर दिया। इसके बाद हुई संधि के अनुसार सिद्धराज जयसिंह ने अपनी पुत्री कांचनदेवी का विवाह अर्णोराज से कर दिया। ई.1142 में चौलुक्य कुमारपाल, चौलुक्यों की गद्दी पर बैठा तो चाहमान-चौलुक्य संघर्ष फिर से तीव्र हो गया। ई.1150 में चौलुक्य कुमारपाल ने अजमेर पर अधिकार कर लिया। पराजित अर्णोराज को विजेता कुमारपाल के साथ अपनी पुत्री का विवाह करना पड़ा तथा हाथी-घोड़े भी उपहार में देने पड़े। इस पराजय से अर्णोराज की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचा फिर भी उसके राज्य की सीमाएं अपरिवर्तित बनी रहीं।

विग्रहराज चतुर्थ (वीसलदेव): कुमारपाल के हाथों अर्णोराज की पराजय के बाद ई.1150 अथवा ई.1151 में राजकुमार जगदेव ने अपने पिता अर्णोराज की हत्या कर दी और स्वयं अजमेर की गद्दी पर बैठ गया किन्तु शीघ्र ही ई.1152 में उसे उसके छोटे भ्राता विग्रहराज (चतुर्थ) द्वारा हटा दिया गया। विग्रहराज (चतुर्थ) को बीसलदेव अथवा वीसलदेव के नाम से भी जाना जाता है। वह ई.1152 से ई.1163 तक अजमेर का राजा रहा। उसका शासन न केवल अजमेर के इतिहास के लिये अपितु सम्पूर्ण भारत के इतिहास के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वीसलदेव ने ई.1155 से 1163 के बीच तोमरों से दिल्ली तथा हॉंसी छीन लिए। उसने चौलुक्यों और उनके अधीन परमार राजाओं से भारी युद्ध किये तथा उन्हें पराजित कर उनसे नाडोल, पाली और जालोर नगर एवं आसपास के क्षेत्र छीन लिए। उसने जालोर के परमार सामन्त को दण्ड देने के लिए जालोर नगर को जलाकर राख कर दिया। उसने चौलुक्य कुमारपाल को परास्त करके अपने पिता की पराजय का बदला लिया। उसने मुसलमानों से भी अनेक युद्ध लड़े। दिल्ली से अशोक का एक स्तंभ लेख मिला है जिस पर वीसलदेव के समय में एक और शिलालेख उत्कीर्ण किया गया। यह शिलालेख 9 अप्रेल 1163 का है तथा इसे शिवालिक स्तंभ लेख कहते हैं। इस शिलालेख के अनुसार वीसलदेव ने देश से मुसलमानों का सफाया कर दिया तथा अपने उत्तराधिकारियों को निर्देश दिया कि वे मुसलमानों को अटक नदी के उस पार तक सीमित रखें। वीसलदेव के राज्य की सीमायें शिवालिक पहाड़ी, सहारनपुर तथा उत्तर प्रदेश तक प्रसारित थीं। शिलालेखों के अनुसार जयपुर और उदयपुर जिले के कुछ भाग उसके राज्य के अंतर्गत थे।

अमरगंगेय: ई.1163 में विग्रहराज (चतुर्थ) की मृत्यु के बाद उसका अवयस्क पुत्र अमरगंगेय अथवा अपरगंगेय अजमेर की गद्दी पर बैठा। वह मात्र 5-6 वर्ष ही शासन कर सका और चचेरे भाई पृथ्वीराज (द्वितीय) द्वारा हटा दिया गया। पृथ्वीराज (द्वितीय), जगदेव का पुत्र था।

पृथ्वीराज (द्वितीय): पृथ्वीराज (द्वितीय) ने राजा वास्तुपाल को हराया, मुसलमानों को पराजित किया तथा हांसी के दुर्ग में एक महल बनवाया। उसने मुसलमानों को अपने राज्य से दूर रखने के लिये अपने मामा गुहिल किल्हण को हांसी का अधिकारी नियुक्त किया। उसका राज्य अजमेर और शाकम्भरी के साथ-साथ थोड़े (जहाजपुर के निकट), मेनाल (चित्तौड़ के निकट) तथा हांसी (पंजाब में) तक विस्तृत था। ई.1169 में पृथ्वीराज (द्वितीय) की निःसंतान अवस्था में ही मृत्यु हो गई।

सोमेश्वर: सोमेश्वर, चौलुक्य राजा सिद्धराज जयसिंह की पुत्री कंचनदेवी तथा चौहान शासक अर्णोराज का पुत्र था। ई.1169 में पृथ्वीराज (द्वितीय) के निःसंतान मरने पर, उसके पितामह अर्णोराज का अब एक पुत्र सोमेश्वर ही जीवित बचा था। अतः अजमेर के सामंतों द्वारा सोमेश्वर को अजमेर का शासक बनने के लिये आमंत्रित किया गया। सोमेश्वर अपनी रानी कर्पूरदेवी तथा दो पुत्रों पृथ्वीराज एवं हरिराज के साथ अजमेर आया। सोमेश्वर प्रतापी राजा हुआ। उसके राज्य में बीजोलिया, रेवासा, थोड़, अणवाक आदि भाग सम्मिलित थे। उसके समय में फिर से चौलुक्य-चौहान संघर्ष छिड़ गया जिससे उसे हानि उठानी पड़ी। ई.1179 में सोमेश्वर की मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका पुत्र पृथ्वीराज (तृतीय) अजमेर का शासक हुआ। उसका वर्णन आगे किया जायेगा।

चन्देल वंश

चंदेल वंश का उदय जयजाकभुक्ति (बुन्देलखण्ड) प्रदेश में हुआ था, जो यमुना तथा नर्मदा नदियों के बीच स्थित था। ये लोग स्वयं को चंदात्रेय नामक व्यक्ति का वंशज मानते हैं। इसी से ये चन्देल कहलाते हैं। प्रारम्भ में चंदेल, प्रतिहारों के सामन्त के रूप में शासन करते थे। बाद में स्वतन्त्र रूप से शासन करने लगे।

यशोवर्मन: इस वंश का प्रथम स्वतन्त्र शासक यशोवर्मन था। उसने कालिंजर पर अधिकार स्थापित कर लिया और महोबा को राजधानी बना कर वहीं से शासन करना आरम्भ किया। राजपूताना के इतिहास में कालिंजर दुर्ग का बहुत बड़ा महत्त्व है। यशोवर्मन ने कन्नौज के राजा को भी युद्ध में परास्त किया। उसका शासन काल 925 ई. से 950 ई. तक माना जाता है।

धंग: यशोवर्मन के बाद उसका पुत्र धंग शासक हुआ। उसने उत्तर तथा दक्षिण के कई राज्यों पर विजय प्राप्त की। उसके शासन काल में खजुराहो में बहुत से मन्दिर बने।

गण्ड: धंग के बाद उसका पुत्र गण्ड शासक हुआ। 1008 ई. में उसने महमूद गजनवी के विरुद्ध आनन्दपाल शाही की सहायता की। चूंकि कन्नौज के राजा राज्यपाल ने महमूद की अधीनता स्वीकार कर ली थी इसलिये गण्ड ने राज्यपाल को दण्ड देने के लिए कन्नौज पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में राज्यपाल परास्त हुआ और मारा गया। राज्यपाल की मृत्यु का बदला लेने के लिए महमूद ने गण्ड पर आक्रमण कर दिया। विवश होकर गण्ड को महमूद की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी।

परमार्दी: परमार्दी इस वंश का अन्तिम शक्तिशाली शासक था। 1203 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने कालिंजर पर अधिकार कर लिया। विवश होकर परमार्दी को मुसलमानों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी। इस वंश के राजा सोलहवीं शताब्दी तक बुन्देलखण्ड के कुछ भाग पर शासन करते रहे।

परमार वंश

परमार वंश का उदय नौवीं शताब्दी के आरम्भ में आबू पर्वत के निकट हुआ था।

कृष्णराज (उपेन्द्र): इस वंश का संस्थापक कृष्णराज (उपेन्द्र) था। वह राष्ट्रकूटों का सामन्त था। प्रारम्भ में परमार लोग गुजरात में निवास करते थे परन्तु बाद में वे मालवा चले गये और वहीं पर स्वतन्त्र रूप से शासन करने लगे।

श्रीहर्ष: इस वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक श्रीहर्ष था। इस वंश का दूसरा प्रतापी शासक मुंज था। उसने 974 ई. से 995 ई. तक शासन किया। वह बड़ा ही विद्यानुरागी था। वह स्वयं उच्च कोटि का कवि तथा विद्वानों का आश्रयदाता था।

भोज: परमार वंश का सबसे प्रतापी तथा विख्यात राजा भोज था। उससे 1018 से 1060 ई. तक शासन किया। सर्वप्रथम उसने कल्याणी के चालुक्य राजा को परास्त किया। उसने अन्य राजाओं के साथ भी सफलतापूर्वक युद्ध किया। भोज अपनी विजयों के लिए उतना प्रसिद्ध नहीं है, जितना अपने विद्यानुराग तथा दानशीलता के लिए। कहा जाता है कि वह कवियों को एक-एक श्लोक की रचना के लिए एक-एक लाख मुद्राएँ दान में देता था। वह धारा नगरी के राजा के नाम से प्रसिद्ध है।

उदयादित्य: परमार वंश का अन्तिम शक्तिशाली शासक उदयादित्य था जिसने 1059 ई. से 1088 ई. तक शासन किया। चौदहवीं शताब्दी के आरंभ में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति ऐनुलमुल्क ने मालवा पर विजय प्राप्त कर उसे खिलजी साम्राज्य में मिला लिया।

गुजरात अथवा अन्हिलवाड़ा के चालुक्य

चालुक्यों की इस शाखा का उदय गुजरात में हुआ था। इन्हें चौलुक्य तथा सोलंकी भी कहा जाता है। दक्षिण के चालुक्यों तथा गुजरात के चालुक्यों के पूर्वज एक ही माने जाते हैं।

मूलराज: इस वंश का संस्थापक मूलराज था जिसने 941 ई. से 995 ई. तक शासन किया। सोलंकियों की राजधानी अन्हिलवाड़ा थी।

भीम (प्रथम): इस वंश का दूसरा शक्तिशाली राजा भीम (प्रथम) था। उसे महमूद गजनवी के आक्रमण का सामना करना पड़ा। 1025 ई. में महमूद गजनवी ने सोमनाथ के मन्दिर पर चढ़ाई की। भीम भयभीत होकर भाग खड़ा हुआ। महमूद ने मन्दिर को लूट लिया। महमूद के चले जाने पर भीम ने अपनी स्थिति सुधारने का प्रयत्न किया।

जयसिंह सिद्धराज: इस वंश का सबसे प्रतापी राजा जयसिंह सिद्धराज था। उसने 1096 ई. से 1143 ई. तक शासन किया। उसने सिहासंन पर बैठते ही पड़ौसी राज्यों को जीतना आरम्भ किया। उसने सौराष्ट्र को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया। उसने चौहान शासक को भी युद्ध में परास्त किया। उसका परमार राजाओं के साथ बहुत दिनों तक संघर्ष चला। अंत में उसने सम्पूर्ण मालवा पर अधिकार कर लिया। सिद्धराज ने बुन्देलखण्ड पर आक्रमण किया परन्तु चंदेल राजा ने उसे परास्त कर दिया। सिद्धराज भगवान शिव का उपासक था। उसने बहुुत से मन्दिर बनवाये। साहित्य से भी उसे बड़ा प्रेम था।

भीम (द्वितीय): इस वंश का अन्तिम शक्तिशाली शासक भीम (द्वितीय) था। उसके शासन काल में मुहम्मद गोरी ने गुजरात पर आक्रमण किया। 1197 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने अन्हिलवाड़ा पर अधिकार कर लिया। इसके एक सौ वर्ष बाद 1297 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने गुजरात को जीत कर अपने राज्य में मिला लिया।

कलचुरि वंश

इस वंश का उदय नर्मदा तथा गोदावरी नदियों के मध्य के प्रदेश में हुआ। ये लोग अपने को हैहय क्षत्रियों के वंशज मानते हैं। इनकी राजधानी त्रिपुरी थी जो वर्तमान जबलपुर के निकट स्थित है। प्रारम्भ में ये लोग प्रतिहार वंश की अधीनता में शासन करते थे परन्तु जब प्रतिहार वंश का पतन आरम्भ हुआ तब दसवीं शताब्दी के मध्य में इन लोगों ने अपने को स्वतन्त्र कर लिया। इस वंश का संस्थापक कोकल्ल नामक व्यक्ति माना जाता है। इस वंश का सर्वाधिक प्रतापी स्वतंत्र शासक लक्ष्मणराज था। वह महान् योद्धा तथा वीर विजेता था। मालवा के परमार तथा कालिंजर के चंदेल राजाओं के साथ इस वंश का निरन्तर संघर्ष चलता रहा। इससे यह राज्य अधिक उन्नति न कर सका और तेरहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में इसका अन्त हो गया।

पाल वंश

इस वंश का उदय बंगाल में आठवीं शताब्दी के प्रथम चरण में हुआ। चूँकि इस वंश के समस्त राजाओं के नाम के साथ पाल शब्द जुड़ा हुआ है, इसलिये इसे पाल वंश कहा जाता है। हर्ष की मृत्यु के उपरान्त, बंगाल में जब भंयकार अराजकता फैल गई तब उसे दूर करने के लिए जनता ने गोपाल नामक व्यक्ति को 725 ई. में अपना राजा चुन लिया। गोपाल सफल शासक सिद्ध हुआ। उसने बंगाल की अराजकता को दूर कर वहाँ पर शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित की और बिहार पर भी अधिकार कर लिया। उसने लगभग 45 वर्षों तक शासन किया।

धर्मपाल: गोपाल के बाद उसका पुत्र धर्मपाल शासक हुआ। उसे अपने शासन काल में प्रतिहारों तथा राष्ट्रकूटों के साथ कई बार युद्ध करने पड़े। धर्मपाल साहित्य तथा कला का बड़ा प्रेमी था। उसने भागलपुर के पास गंगा नदी के किनारे विक्रमशिला विहार बनवाया जो विख्यात विश्वविद्यालय बन गया।

 देवपाल: धर्मपाल के बाद 815 ई. में उसका पुत्र देवपाल राजा हुआ। वह शक्तिशाली शासक था। उसने आसाम तथा उड़ीसा पर अधिकार कर लिया। उसने बर्मा, सुमात्रा, जावा आदि के साथ भी कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित किया था।

अन्य शासक: देवपाल के बाद इस वंश में नारायणपाल, महिपाल, विग्रहपाल आदि कई शक्तिशाली राजा हुए। इस वंश का अन्तिम शक्तिशाली शासक रामपाल था। वह बड़ा ही उदार तथा दयालु शासक था। रामपाल के उत्तराधिकरी बड़े निर्बल सिद्ध हुए और वे पाल-वंश को पतनोन्मुख होने से नहीं बचा सके। पूर्व से सेनवंश ने और पश्चिम से गहड़वाल वंश ने इन्हें दबा लिया और इनका विनाश कर दिया।

सेन वंश

पाल वंश के विनाश के उपरान्त बंगाल में सेन वंश का उदय हुआ। इस वंश के राजाओं के नाम के साथ सेन शब्द जुड़ा है, इसलिये इस वंश को सेन वंश कहा जाता है।

सामंतसेन: इस वंश का संस्थापक सामन्त सेन था। उसने ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य में उड़ीसा में सुवर्ण रेखा नामक नदी के तट पर अपने राज्य की स्थापना की।

विजयसेन: इस वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक विजयसेन था जिसने 1095 ई. से 1158 ई. तक शासन किया। वह वीर विजेता था। उसने पाल वंश के मदनपाल को परास्त किया और पालों को उत्तरी भारत से मार भगाया। उसने पूर्वी बंगाल तिरहुत, आसाम तथा कंलिग पर भी अधिकार जमा लिया।

बल्लालसेन: विजयसेन के बाद उसका पुत्र बल्लालसेन शासक हुआ। वह भी वीर तथा साहसी शासक था। वह उच्चकोटि का विद्वान् तथा लेखक भी था।

लक्ष्मणसेन: इस वंश का अन्तिम शक्तिशाली शासक लक्ष्मणसेन था। उसके शासन काल के अन्तिम भाग में आन्तरिक उपद्रव के कारण दक्षिण तथा पूर्वी बंगाल में छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्य स्थापित हो गये। तुर्को के आक्रमणों ने भी सेन वंश की जड़ को हिला दिया। लगभग 1260 ई. तक लक्ष्मणसेन के वंशज बंगाल में शासन करते रहे। अन्त में मुसलमानों ने इस वंश का अन्त कर दिया।

अध्याय – 30 : राजपूतकालीन भारत

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राजपूत काल का भारत के इतिहास में बहुत बड़ा महत्त्व है। राजपूतों ने लगभग साढ़े पांच शताब्दियों तक अदम्य उत्साह के साथ मुस्लिम आक्रांताओं से देश की रक्षा की। यद्यपि वे अन्त में अपने देश की स्वतंत्रता की रक्षा न कर सके परन्तु उनके त्याग, उनके देशप्रेम, उनके साहस तथा उनके उच्चादर्श की कहानियां अमर हो गईं।

राजनीतिक दशा

राजपूत काल भारत की राजनीतिक विच्छिन्नता का युग था। उस काल में देश के विभिन्न भागों में छोटे-छोटे राजपूत राज्यों की स्थापना हो गई थी। इन राजपूत राज्यों में अनेक ऐसे थे, जो बड़े ही शक्तिशाली थे परन्तु देश में ऐसी कोई सार्वभौम सत्ता नहीं थी जो सबको एक सूत्र में बांध सकती और संकट काल में विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा उपस्थित कर सकती। इस राजनैतिक एकता के अभाव में भारत अशक्त होता जा रहा था।

इस काल की राजनैतिक विच्छिन्नता पर प्रकाश डालते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘भारतवर्ष में राजनीतिक एकता और सामाजिक संगठन की कमी थी। उसके सैकड़ों नेता थे और आपस के छोटे-छोटे झगड़ों में वह अपनी शक्ति को नष्ट कर रहा था। वस्तुतः इस काल में वह केवल भौगोलिक अभिव्यंजना ही रह गया था। यह बड़ी ही दुःखद स्थिति थी, जिसमें वह उस समय असहाय हो गया जब उसे विदेशियों के साथ जीवन-मरण का युद्ध करना पड़ा, जिन्होंने बढ़ती हुई संख्या में उसकी सुन्दर और उपजाऊ भूमि पर आक्रमण किया।

राजपूतकाल में न केवल भारत की राजनैतिक एकता समाप्त हो गई अपितु पारस्परिक कलह तथा ईर्ष्या-द्वेष भी बहुत बढ़ गया था। प्रत्येक राज्य अपने पड़ौसी राज्य के विरुद्ध संघर्ष करता था और उसे नीचा दिखाना चाहता था। पारस्परिक संघर्ष के फलस्वरूप राजपूतों की शक्ति धीरे-धीरे क्षीण हाती जा रही थी। उनके संघर्ष प्रायः आनुवांशिक हो जाते थे और संघर्ष कई पीढ़ियों तक चलता रहता था। आन्तरिक कलह के कारण विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा उपस्थित करना सम्भव न हो सका। इस काल की राजनीतिक दशा का चित्रण करते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘नेतृत्व के लिए एक राज्य दूसरे से लड़ रहा था और कोई ऐसी सार्वभौम सत्ता नहीं थी, जो उन्हें एकता के सिद्धान्त द्वारा संगठित रख सकती।’

राजपूत कालीन राज-संस्था राजतंत्रात्मक तथा आनुवंशिक थी। इससे प्रायः बड़े ही अयोग्य तथा निर्बल शासक सिंहासन पर आ जाते थे, जो न अपने पूर्वजों के राज्य को सुसंगठित रख पाते थे और न उनमें विदेशी आक्रमणकारियों से सफलतापूर्वक लोहा लेने की क्षमता होती थी। ऐसी दशा में उनका विध्वंस हो जाना अनिवार्य हो जाता था। राजपूतकालीन शासन व्यवस्था स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश थी। इसलिये जनसाधारण की राजनीति में कोई विशेष रुचि नहीं थी। प्रजा की राजनीतिक उदासीनता राज्य के लिए बड़ी हानिकारक सिद्ध हुई।

राजपूत युग में सामन्तीय प्रथा का प्रचलन था। प्रायः जब शक्तिशाली राज्य अपने पड़ौसी राज्यों पर विजय प्राप्त कर लेते थे तब उन्हें समाप्त नहीं कर देते थे वरन् उन्हें अपना सामन्त बनाकर छोड़ देते थे। ये सामन्त अपने राजा की अधीनता में शासन करते थे और युद्ध के समय धन तथा सेना में उसकी सहायता करते थे परन्तु इन सामन्तों की स्वामिभक्ति बड़ी संदिग्ध रहती थी और वे प्रायः स्वतंत्र होने का प्रयत्न करते रहते थे।

अत्यंत प्रचीन काल से उत्तर-पश्चिम के पर्वतीय भागों से भारत पर विदेशियों के आक्रमण हो रहे थे परन्तु कभी भी उत्तर-पश्चिम सीमा की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं की गई। राजपूत युग में भी सीमान्त प्रदेश की सुरक्षा का कोई प्रबंध नहीं किया गया। न तो उस प्रदेश की किलेबन्दी की गई और न वहाँ पर स्थायी सेनाएं रखी गईं। पश्चिमोत्तर प्रदेश में अनेक छोटे-छोटे राज्य विद्यमान थे, जो विदेशी आक्रमणकारियों के आक्रमण की बाढ़ को रोकने में सर्वथा अशक्त थे। विदेशी आक्रमणकारियों को पर्वतीय भागों को पार कर भारत में प्रवेश करने में कोई कठिनाई नहीं होती थी और एक बार जब वे देश में घुस आते थे तब उनका मार्ग साफ हो जाता था।

सामाजिक दशा

राजपूतकालीन समाज में विभिन्न प्रकार के दोष उत्पन्न हो गये थे। अब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के अतिरिक्त अनेक उपजातियां उत्पन्न हो गई थीं और जाति-प्रथा के बन्धन अत्यंत कठोर हो गये थे। अब ऊँच-नीच का भेदभाव और अस्पृश्यता जैसी बुराइयां बहुत बढ़ गयी थीं। समाज में शूद्रों की दशा बड़ी शोचनीय हो गई। वे घृणा की दृष्टि से देखे जाते थे। इस कारण जब भारत पर मुसमानों के आक्रमण हुए और उनके पैर यहाँ जम गये तब उन्होंने बहुत बड़ी संख्या में निम्नवर्ग के हिन्दुओं को इस्लाम धर्म में सम्मिलित कर लिया क्योंकि इस्लाम धर्म में ऊँच-नीच तथा छुआछूत की भावना बहुत कम थी।

राजपूत कालीन समाज में हिन्दुओं का दृष्टिकोण उतना व्यापक तथा उदार नहीं था, जितना वैदिक एवं उत्तर वैदिक काल में था। जाति प्रथा के बंधन दृढ़ होने के कारण अब भारतीय समाज में विदेशियों को आत्मसात करने की क्षमता समाप्त हो गई थी। राजपूत युग के पूर्व यूनानी, शक, कुषाण, हूण आदि जितनी जातियां भारत में प्रविष्ट हुई थीं, उन सबको भारतीयों ने अपने में आत्मसात कर लिया था। वे सब कालान्तर में भारतीयों में घुल-मिल गई थीं और अपने अस्तित्त्व को खो बैठी थीं परन्तु हिन्दू, मुसलमानों को आत्मसात न कर सके। मुसलमानों के पूर्व जो जातियां भारत में आईं, उनका एक मात्र उद्देश्य भारत पर विजय प्राप्त कर अपना शासन स्थापित करना था। उनकी कोई निश्चित सभ्यता तथा संस्कृति नहीं थी और न वे उसका प्रचार करना चाहते थे। इसलिये वे भारतवर्ष की सभ्यता तथा संस्कृति से आकृष्ट हुए और उसके रंग में रंग गये। राजनीतिक सत्ता समाप्त हो जाने पर वे भारतीयों में घुल-मिल गये और अपने अस्तित्त्व को खो बैठे परन्तु मुसलमानों की अपनी निश्चित सभ्यता तथा संस्कृति थी और वे उसका प्रचार करने के लिए दृढ़ संकल्प थे।

मुसलमान आक्रमणकारियों का लक्ष्य राज्य तथा सम्पत्ति प्राप्त करने के साथ-साथ इस्लाम का प्रचार करना भी था। इसलिये मुसलमानों के हिन्दू संस्कृति में आत्मसात हो जाने का कोई प्रश्न ही नहीं था। यहाँ तो हिन्दू-धर्म तथा हिन्दू-सभ्यता स्वयं बहुत बड़े संकट में पड़ी थी और उसे अपनी रक्षा का उपाय ढँूढना था। फलतः हिन्दुओं ने जाति-प्रथा के बन्धनों को अत्यंत जटिल बना दिया और अपनी शुद्धता और पवित्रता पर बल देना आरम्भ किया। उन्होंने मुसलमानों को म्लेच्छ कहा और उन्हें स्पर्श करना महापाप बताया। हिन्दुओं की यह संकीर्णता अपनी परिस्थितियों के अनुकूल थी और अपने धर्म तथा अपनी सभ्यता एवं संस्कृति की रक्षा के लिए की गई थी परन्तु इसके भावी परिणाम अच्छे न हुए, क्योंकि हिन्दुओं तथा मुसलमानों के बीच एक ऐसी खाई उत्पन्न हो गई जो कभी पाटी न जा सकी।

राजपूत युग के भारतीय समाज में राजपूत जाति का एक विशिष्ट स्थान है। जिस प्रदेश में वे अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए चले गए और निवास करने लगे, उसका नाम राजपूताना पड़ गया। राजपूत जाति अपने विशिष्ट गुणों तथा उच्च आदर्शों के कारण समाज में आदर की दृष्टि से देखी जाती थी। राजपूतों में उच्चकोटि का आत्माभिमान था। वे अपनी आन पर सहर्ष जान दे देते थे। उनमें कुलाभिमान भी उच्चकोटि का था। अपने कुल की मर्यादा की रक्षा के लिए वे सर्वस्व निछावर करने के लिए उद्यत रहते थे। राजपूत योद्धा अपने वचन के बड़े पक्के होते थे और अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहते थे। रणप्रिय होते हुए भी वे उदार होते थे और तन-मन-धन से शरणागत की रक्षा करते थे। दान-दक्षिणा देने में उनकी उदारता तथा सहृदयता सीमा का उल्लंघन कर जाती थी। राजपूतों के गुणों की प्रशंसा करते हुए टॉड ने लिखा है- ‘उच्चकोटि का साहस, देशभक्ति, स्वामिभक्ति, आत्मसम्मान, अतिथिसत्कार तथा सरलता के गुण राजपूतों में पाये जाते हैं।’

राजपूत काल में स्त्रियों को बड़े आदर की दृष्टि से देखा जाता था। राजपूत रमणियों की प्रशंसा करते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘राजपूत लोग अपनी स्त्रियों का आदर करते थे। यद्यपि जन्म से मृत्यु तक उनका जीवन भयंकर कठिनाइयों का होता था तथापि संकट काल में वे अद्भुत साहस तथा दृढ़ संकल्प का प्रदर्शन करती थीं और ऐसी वीरता का कार्य सम्पन्न करती थीं जो विश्व के इतिहास में अद्वितीय है।’ राजपूत युद्ध काल में भी कभी स्त्रियों पर हाथ नहीं उठाता था और वह उसके सतीत्व को आदर की दृष्टि से देखता था। इस युग में पर्दे की प्रथा नहीं थी। स्त्रियों को बाहर जाने की स्वतन्त्रता थी परन्तु मुसलमानों के आगमन से पर्दा आरम्भ हो गया। स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा पर भी ध्यान दिया जाता था। इस काल की राजपूत स्त्रियों के आदर्श पुरुषों की भाँति बड़े ऊँचे थे। उनका पतिव्रत धर्म प्रशंसनीय था। वे अपने पति के मृत शरीर के साथ चिता में सहर्ष जल कर भस्म हो जाती थीं। इससे इस युग में सती-प्रथा का प्रचलन बहुत बढ़ गया था। राजपूतों में स्वयंवर की भी प्रथा थी परन्तु अन्य जातियों में माता-पिता ही कन्या दान करते थे। राजवंशों में भी बहु-विवाह की प्रथा का प्रचलन था, यद्यपि स्वजातीय विवाह अच्छे समझे जाते थे परन्तु यदा-कदा अन्तर्जातीय विवाह भी हो जाया करते थे।

राजपूत काल में राजपूतों में जौहर की प्रथा का प्रचलन था। जब राजपूत योद्धा अपने दुर्गों में शत्रुओं से घिर जाते थे और बचने की कोई आशा नहीं रह जाती थी तब वे केसरिया वस्त्र पहनकर और नंगी तलवार लेकर निकल पड़ते थे और शत्रु से लड़कर अपने प्राण खो देते थे। उनकी स्त्रियाँ चिता में बैठकर अपने को अग्नि में समर्पित कर देती थीं और इस प्रकार अपने सतीत्व की रक्षा करती थीं।

धार्मिक दशा

प्राचीन क्षत्रियों की भांति राजपूत, ब्राह्मण धर्म में पूर्ण विश्वास रखते थे। अधिकांश राजपूत राजवंशों ने ब्राह्मण धर्म को प्रश्रय दिया। इस काल में कुमारिल, शंकराचार्य, रामानुज आदि आचार्यों ने ब्राह्मण धर्म का खूब प्रचार किया। कुमारिल भट्ट ने वेदों की प्रामाणिकता को न मानने वाले बौद्ध धर्म का खण्डन किया। शंकराचार्य ने अद्वैतवाद अर्थात् ‘जीवात्मा तथा परमात्मा एक है, के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। शंकराचार्य ने उपनिषदों को आधर बनाकर वैदिक-धर्म का खूब प्रचार किया और बौद्ध धर्म के प्रभाव को समाप्त सा कर दिया। शंकराचार्य ने भारत के चारों कोनों अर्थात् बद्रीनाथ, द्वारिका, रामेश्वरम् तथा जगन्नाथपुरी में चार मठ स्थापित किये। रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वेतवाद का समर्थन किया जिसका यह तात्पर्य है कि ब्रह्म, जीव तथा जगत् मूलतः एक होने पर भी क्रियात्मक रूप में एक-दूसरे से भिन्न हैं और कुछ विशिष्ट गुणों से युक्त हैं। इस युग के प्रमुख देवता विष्णु तथा शिव थे। इस युग में वैष्णव तथा शैव धर्म का खूब प्रचार हुआ। दक्षिण भारत में लिगांयत सम्प्रदाय का खूब प्रचार हुआ। ये लोग शिवलिंग की पूजा किया करते थे। इस काल में शक्ति की भी पूजा प्रचलित थी। शक्ति के पूजक दुर्गा तथा काली की पूजा किया करते थे। तान्त्रिक सम्प्रदाय की भी इस युग में अभिवृद्धि हुई। ये लोग जादू-टोना भूत-प्रेत तथा मन्त्र-तन्त्र में विश्वास करते थे। इस प्रकार अन्धविश्वास का प्रकोप बढ़ रहा था।

राजपूत राजाओं के युद्ध प्रिय होने के कारण राजपूत काल बौद्ध धर्म के पतन का काल था। इस धर्म का तान्त्रिक धर्म से बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध हो गया था। इसका भिक्षुओं पर बड़ा प्रभाव पड़ा। कुमारिल तथा शंकराचार्य ने भी बौद्ध धर्म का खण्डन करके उसे बड़ी क्षति पहुँचाई। विदेशी आक्रमणकारियों ने तो बौद्ध धर्म को बिल्कुल नष्ट-भ्रष्ट कर दिया और वह अपनी जन्मभूमि में उन्मूलित प्रायः हो गया।

राजपूत काल में जैन धर्म बड़ी ही अवनत दशा में था। इसका प्रचार दक्षिण भारत में सर्वाधिक था। इसे पश्चिम में चौलुक्य राजाओं का संरक्षण प्राप्त था परन्तु वहां भी बारहवीं शताब्दी में लिंगायत सम्प्रदाय का प्रचार हो जाने से जैन धर्म को बड़ी क्षति पहुँची परन्तु जैन धर्म का समूल विनाश नहीं हुआ। वह धीरे-धीरे ब्राह्मण धर्म के सन्निकट आता गया और आज भी अपने अस्तित्त्व को बनाए हुए है।

साहित्य

राजपूत काल में साहित्य की बड़ी उन्नति हुई। इस काल में संस्कृत भाषा की भी बड़ी उन्नति हुई। इस काल में वह साहित्य की भाषा बनी रही परन्तु संस्कृत के साथ-साथ प्रान्तीय भाषाओं का भी विकास हुआ। हिन्दी, बँगला, गुजराती आदि भाषाओं में भी साहित्य की रचना होने लगी। इस युग में देश में कई शिक्षण संस्थाओं की स्थापना हुई। विक्रमशिला विश्वविद्यालय का विकास इसी युग में हुआ।

अनेक राजपूत शासक साहित्यानुरागी थे। वे साहित्यकारों के आश्रयदाता भी थे। वे कवियों तथा विद्वानों को दान तथा पुरस्कार देने में बड़े उदार तथा सहृदय थे। इस युग में ऐसे अनेक राजा हुए जो स्वयं उच्चकोटि के विद्वान् तथा कवि थे। इनमें वाक्पतिराज, मंुज, भोज, विग्रहराज आदि प्रमुख हैं। राजपूत राजाओं के दरबार में अनेक कवियों को आश्रय प्राप्त था। कन्नौज के राजा महेन्द्रपाल के दरबार में राजशेखर नामक कवि रहता था जिसने प्राकृत भाषा में ‘कर्पूर-मंजरी’ नामक ग्रन्थ लिखा था। बंगाल के राजा लक्ष्मणसेन के दरबार में जयदेव नामक कवि को आश्रय प्राप्त था, जिसने ‘गाीतगोविन्द’ नामक ग्रन्थ की रचना की। काश्मीर में कल्हण ने ‘राजतरंगिणी’ की और सोमदेव ने ‘कथा-सरित-सागर’ की रचना की। चारण कवियों में चन्दबरदाई का नाम अग्रगण्य है, जो पृथ्वीराज चौहान के दरबार में रहता था। उसने ‘पृथ्वीराज रासो’ नामक ग्रन्थ की रचना की। भवभूति इस काल का सबसे प्रसिद्ध नाटककार था, जिसने ‘महावीर-चरित’, ‘उत्तर-रामचरित’ तथा ‘मालती-माधव’ नामक नाटकों की रचना की। कुमारिल भट्ट, शंकराचार्य तथा रामानुजाचार्य इस काल के प्रसिद्ध दार्शनिक थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं में तत्त्वों की विवेचना की। इस प्रकार राजपूत युग यद्यपि प्रधानतः संघर्ष तथा युद्धों का युग था परन्तु उनमें साहित्य की पर्याप्त उन्नति हुई ।

कला

राजपूत राजा कलानुरागी थे। राजपूत काल प्रधानतः युद्ध तथा संघर्ष का काल था इसलिये राजपूत राजाओं ने आत्मरक्षा के लिए अनेक सुदृढ़़ दुर्गों का निर्माण करवाया। रणथम्भौर, चितौड़, ग्वालियर आदि दुर्ग इसी काल में बने थे। राजपूत राजाओं को भवन बनवाने का भी बड़ा शौक था। इनमें ग्वालियर का मानसिंह का राजमहल, उदयपुर का हवामहल तथा जयपुर के अन्य महल प्रसिद्ध हैं। इस प्रकार इस युग में वास्तुकला की बड़ी उन्नति हुई। इस काल में मन्दिरों का खूब निर्माण हुआ। इस काल में उत्तरी भारत में जो मन्दिर बने उसके शिखर बड़े ऊँचे तथा नुकीले हैं। इनमें अंलकार तथा सजावट की अधिकता है परन्तु सुदूर दक्षिण में रथ तथा विमान के आकार के मन्दिर बने। ये अपेक्षाकृत सरल हैं। इस काल के बने हुए मन्दिरों में खजुराहो के मन्दिर, उड़ीसा में भुवनेश्वर का मन्दिर, काश्मीर का मार्त्तण्ड मन्दिर, अजन्ता के गुहा मन्दिर, एलोरा का कैलाश मन्दिर, आबू पर्वत के जैन मन्दिर, तंजौर, काँची, मथुरा आदि के मन्दिर प्रसिद्ध हैं।

मन्दिर निर्माण के साथ-साथ इस काल में मूर्ति-निर्माण कला की भी उन्नति हुई। ब्राह्मण-धर्म के अनुयायियों ने शिव, विष्णु शक्ति, सूर्य, गणेश आदि की मूर्तियों का, बौद्ध धर्मावलम्बियों ने बुद्ध तथा बोधिसत्वों की मूर्तियों का और जैनियों ने तीर्थंकरों की मूर्तियों का निर्माण कराया। चित्रकारी का भी कार्य उन्नत दशा में था। गायन, वादन, अभिनय तथा नृत्य आदि कलाओं का भी इस युग में पर्याप्त विकास हुआ।

अध्याय – 31 : सर्वोच्चता के लिए त्रिकोणीय संघर्ष (गुर्जर-प्रतिहार, पाल और राष्ट्रकूट वंश)

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अवंति का गुर्जर-प्रतिहार वंश

गुर्जर-प्रतिहारों का उदय मण्डोर में हुआ तथा वे जालोर होते हुए अवन्ति तक जा पहुंचे थे। गुर्जर प्रदेश का स्वामि होने के कारण उन्हें गुर्जर-प्रतिहार कहा गया। हरिवंश पुराण में प्रतिहार शासक वत्सराज को अवंति-भू-भृत अर्थात् अवंति का राजा कहा गया है। राष्ट्रकूट नरेश अमोघवर्ष के संजन ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि दंतिदुर्ग ने एक महादान का आयोजन किया उसमें उसने गुर्जर-प्रतिहार नरेश को उज्जैन में प्रतिहार (द्वारपाल) बनाया था। इन कथनों से स्पष्ट है कि गुर्जर-प्रतिहार वंश का उदय अवंति में हुआ था। ग्वालियर अभिलेख में प्रतिहार नरेशों वत्सराज तथा नागभट्ट (द्वितीय) को क्षत्रिय कहा गया है। यही अभिलेख प्रतिहार वंश को सौमित्र (लक्ष्मण) से उत्पन्न बताता है। राजेशखर प्रतिहार नरेशों महेन्द्रपाल तथा महीपाल को क्रमशः रघुकुलतिलक और रघुवंशमुकटमणि कहता है। इस वंश का संस्थापक नागभट्ट (प्रथम) (730 ई.-760 ई.) था। उसके वंशजों ने अवंति पर शासन किया। इस वंश का चौथा राजा नागभट्ट (द्वितीय) (805 ई. से 833 ई.) प्रतापी राजा था।

बंगाल का पाल वंश

इस वंश की स्थापना गोपाल नामक व्यक्ति ने की। बंगाल की जनता ने बंगाल में व्याप्त दीर्घकालीन अराजकता का अंत करने के लिये गोपाल को अपना राजा चुना। राजा बनने के पूर्व गोपाल सेनापति था। गोपाल ने 750 ई. से 770 ई. तक राज्य किया। इसके पश्चात् धर्मपाल तथा देवापाल नामक दो राजा हुए। उनके समय से पाल वंश भारत के प्रमुख राजवंशों में गिना जाने लगा।

दक्षिण का राष्ट्रकूट वंश

यह वंश प्रतिहारों एवं पालों का समकालीन था। अशोक के अभिलेखों में रठिकों का उल्लेख हुआ है। नानिका के नानाघाट अभिलेख में महारठियों का उल्लेख है। डॉ. अल्तेकर का मत है कि राष्ट्रकूट इन्हीं रठिकों की संतान थे। अभिलेखों में राष्ट्रकूटों को लट्टलूरपुरवराधीश कहा गया है। इससे अनुमान होता है कि वे लट्टलूर के निवासी थे। लट्टलूर सम्भवतः आज का लाटूर था। राष्ट्रकूट यदुवंशी क्षत्रियों की सन्तान माने जाते हैं। इनका मूल पुरुष रट्ट नामक व्यक्ति था जिसके पुत्र का नाम राष्ट्रकूट था। इसी से इस वंश का नाम राष्ट्रकूट वंश पड़ा। आरम्भ में राष्ट्रकूट वातापी के चालुक्यों के सामन्त के रूप में शासन करते थे परन्तु जब चालुक्य साम्राज्य कमजोर पड़ गया तब राष्ट्रकूट सामन्त दन्तिदुर्ग ने चालुक्य राजा कीर्ति वर्मन को परास्त करके चालुक्य राज्य पर अधिकार कर लिया और स्वतन्त्र रूप से शासन करने लगा। दन्तिदुर्ग के बाद उसका चाचा कृष्णराज (प्रथम) शासक हुआ। एलोरा का विख्यात कैलाश मन्दिर उसी के शासन-काल में बना था। इस वंश का दूसरा प्रतापी शासक ध्रुवराज था, जिसने 780 से 796 ई. तक शासन किया। ध्रुवराज का पुत्र गोविन्दराज (तृतीय) शक्तिशाली राजा था जिसने गंड शासक की सत्ता को समाप्त किया और काँची के राजा को भी युद्ध में परास्त किया। राष्ट्रकूट वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा इन्द्र था, जिसने 880 ई. से 914 ई. तक शासन किया। उसने अपने प्रभाव को उत्तर में गंगा नदी से दक्षिण में कन्याकुमारी तक फैला दिया था। उसने कन्नौज के प्रतिहार राजा महिपाल को युद्ध में परास्त किया था। उसने ‘परम-माहेश्वर’ की उपाधि धारणा की, जिससे स्पष्ट है कि वह शैव धर्म का अनुयायी था। राष्ट्रकूट वंश का अन्तिम प्रतापी शासक कृष्ण (तृतीय) था। उसके बाद इस वंश का पतन आरम्भ हो गया। 973 ई. में कल्याणी के चालुक्य राजा तैलप (द्वितीय) ने राष्ट्रकूट वंश का अन्त कर दिया और नये राजवंश की स्थापना की, जिसे कल्याणी का परवर्ती चालुक्य वंश कहते हैं।

कान्यकुब्ज का आयुध वंश

जिस समय उत्तरी भारत में गुर्जर-प्रतिहार वंश तथा पाल वंश अपना-अपना राज्य बढ़ाने की योजना बना रहे थे, उस समय कान्यकुब्ज में निर्बल आयुध वंश का शासन था। इस वंश का उदय यशोवर्मन की मृत्यु के बाद हुआ था। इसमें तीन राजा हुए- वज्रायुध, इन्द्रायुध तथा चक्रायुध। इन्होंने लगभग 770 ई. से लेकर 810 ई. तक शासन किया।

त्रिकोणीय संघर्ष का सूत्रपात

गुर्जर-प्रतिहारों और पालों ने कान्यकुब्ज के आयुध वंश की निर्बलता का लाभ उठाने और कान्यकुब्ज को अपने अधिकार में लेने के प्रयास किये। इसी समय दक्षिण के राष्ट्रकूट वंश ने भी उत्तर भारत की राजनीति में भाग लिया। परिणामतः गुर्जर-प्रतिहारों, पालों तथा राष्ट्रकूटों के बीच त्रिकोणीय संघर्ष का सूत्रपात हुआ। इसे त्रिवंशीय संघर्ष भी कहते हैं।

गुर्जर-प्रतिहारों का कान्यकुब्ज पर आक्रमण

अवंति के प्रतिहार वंश का राजा वत्सराज (780 ई. से 805 ई.) अपने वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा था। उसने 783 ई. के लगभग कान्यकुब्ज पर आक्रमण किया तथा वहां के शासक इन्द्रायुध को अपने प्रभाव में रहने के लिये विवश किया। इस समय बंगाल में पाल वंश का राजा धर्मपाल राज्य कर रहा था। वह गुर्जर-प्रतिहार वंश की बढ़ती हुई शक्ति के प्रति उदासीन नहीं रह सकता था। अतः उसने वत्सराज को चुनौती दी। दोनों में युद्ध हुआ। इसमें वत्सराज विजयी रहा।

राष्ट्रकूट आक्रमण

इसी समय राष्ट्रकूट नरेश ध्रुव ने उत्तरी भारत पर आक्रमण किया और वत्सराज को पराजित कर दिया। राधनपुर तथा वनी डिण्डोरी अभिलेखों के अनुसार वत्सराज को पराजित होकर मरुस्थल में शरण लेनी पड़ी। वत्सराज को परास्त करने के बाद राष्ट्रकूट नरेश धु्रव ने बंगाल नरेश धर्मपाल को भी परास्त किया। संजन अभिलेख तथा सूरत अभिलेख के अनुसार धु्रव ने धर्मपाल को गंगा-यमुना के दोआब में परास्त किया। बड़ौदा अभिलेख कहता है कि धु्रव ने गंगा-यमुना के दोआब पर अपना अधिकार कर लिया था।

धर्मपाल का प्रभुत्व

उत्तर भारत की विजय के बाद राष्ट्रकूट नरेश धु्रव वापस चला गया। उसके जाने के बाद धर्मपाल ने पुनः अपनी शक्ति का संगठन किया और कान्यकुब्ज पर आक्रमण करके उसके राजा इन्द्रायुध को सिंहासन से उतार दिया तथा चक्रायुध को कान्यकुब्ज की गद्दी पर बैठाया। धर्मपाल ने कान्यकुब्ज में एक विशाल दरबार किया जिसमें उसने भोज, मत्स्य, मद्र, कुरु, यदु, यवन अवन्ति, गंधार और कीर के राजाओं को आमंत्रित किया। यहां अवंति से तात्पर्य वत्सराज से है। डॉ. मजूमदार के अनुसार ये समस्त राज्य धर्मपाल के अधीन थे। इस प्रकार धर्मपाल कुछ समय के लिये उत्तरी भारत का सर्वशक्तिशाली सम्राट बन गया। गुजराती लेखक सोढल ने उदयसुंदरीकथा में धर्मपाल को उत्तरापथस्वामिन् कहा है।

नागभट्ट (द्वितीय) तथा गोविंद (तृतीय) का संघर्ष

850 ई. में वत्सराज की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र नागभट्ट (द्वितीय) (805 ई. से 833 ई.) सिंहासन पर बैठा। इस समय दक्षिण में राष्ट्रकूट शासक गोविंद (तृतीय) (793 ई. से 814 ई.) शासन कर रहा था। उसने उत्तरी भारत पर आक्रमण किया तथा प्रतिहार नरेश नागभट्ट (द्वितीय) को परास्त किया। राधनपुर ताम्रलेख के अनुसार गोविंद (तृतीय) के भय से नागभट्ट (द्वितीय) विलुप्त हो गया जिससे उसे स्वप्न में भी युद्ध दिखाई नहीं पड़े।

धर्मपाल और गोविंद (तृतीय) का संघर्ष

संजन ताम्रपत्र के अनुसार बंगाल नरेश धर्मपाल तथा उसके संरक्षित कन्नौज नरेश चक्रायुध ने स्वयं ही गोविंद (तृतीय) की अधीनता स्वीकार कर ली। इस प्रकार गोविंद (तृतीय) के नेतृत्व में एक बार फिर राष्ट्रकूट वंश ने उत्तरी भारत को पदाक्रांत किया। धु्रव की भांति गोविंद (तृतीय) ने भी उत्तरी भारत को अपने राज्य में नहीं मिलाया। विजय अभियान पूरा करके वह अपने राज्य को लौट गया।

नागभट्ट की कन्नौज विजय

गोविंद (तृतीय) के दक्षिण को लौट जाने के बाद नागभट्ट (द्वितीय) ने कन्नौज पर आक्रमण करके चक्रायुध को परास्त कर दिया तथा कन्नौज पर अधिकार कर लिया। इसके बाद कन्नौज प्रतिहार राज्य की राजधानी बन गया।

नागभट्ट के हाथों धर्मपाल की पराजय

चक्रायुध की पराजय का समाचार पाकर धर्मपाल ने नागभट्ट के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। दोनांे पक्षों में मुंगेर में युद्ध हुआ जिसमें धर्मपाल परास्त हो गया। ग्वालियर अभिलेख, बड़ौदा अभिलेख तथा जोधपुर अभिलेख नागभट्ट की विजय की पुष्टि करते हैं। इस प्रकार त्रिवंशीय संघर्ष में अंततोगत्वा नागभट्ट को सर्वाधिक लाभ हुआ। वह उत्तरी भारत का सर्वशक्तिशाली सम्राट बन गया।

मिहिरभोज की उपलब्धियाँ

नागभट्ट (द्वितीय) के बाद उसका पुत्र रामभद्र (833 ई. से 836 ई.) प्रतिहारों के सिंहासन पर बैठा। उसके समय की उपलब्धियों के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं मिलती है। उसके बाद उसका पुत्र मिहिरभोज प्रथम (836 ई. से 885 ई.) प्रतिहारों का राजा हुआ। वह अपने समय का प्रतापी राजा सिद्ध हुआ। मिहिरभोज (प्रथम) ने राष्ट्रकूट राज्य के उज्जैन प्रदेश पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया परंतु उज्जैन पर प्रतिहारों का अधिकार अधिक समय तक नहीं रह सका। बगुभ्रा दानपत्र से विदित होता है कि गुजरात के राष्ट्रकूट धु्रव ने मिहिरभोज को परास्त कर दिया था।

अमोघवर्ष के बाद उसका पुत्र कृष्ण द्वितीय (878 ई.-914 ई.) राष्ट्रकूटों का राजा हुआ। उसके समय में राष्ट्रकूटों की प्रतिहारों से वंशानुगत शत्रुता चलती रही। इस शत्रुता का विशेष कारण मालवा था। दोनों ही इस क्षेत्र पर अधिकार करना चाहते थे। इस संघर्ष के सम्बन्ध में दोनों ही पक्षों के अभिलेख प्राप्त हुए हैं जिनमें दोनों ने ही अपनी-अपनी विजय का दावा किया है जिससे अनुमान होता है कि उनके बीच एक से अधिक अनिर्णित युद्ध हुए।

मिहिरभोज का पालों से युद्ध

इस समय बंगाल में पाल वंश का देवपाल (910 ई.-950 ई.) पराक्रमी नरेश शासन कर रहा था। उसके शासन काल में प्रतिहार-पाल संघर्ष चलता रहा। ग्वालियर अभिलेख से ज्ञात होता है कि मिहिरभोज ने धर्मपाल के पुत्र देवपाल को परास्त किया। कहला अभिलेख पाल नरेश मिहिरभोज की विजय का उल्लेख करते हुए कहता है- मिहिरभोज के सामन्त गुणाम्बोधिदेव ने गौड़-लक्ष्मी का हरण कर लिया। बदल अभिलेख का कथन है कि पाल नरेश ने गुर्जरनाथ (मिहिरभोज) का दर्प नष्ट कर दिया। इन परस्पर विरोधी दावों से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि पालों और प्रतिहारों के बीच हुए इस युद्ध का भी स्पष्ट निर्णय नहीं हो सका था।

सुलेमान का विवरण

इस काल में अरब यात्री सुलेमान भारत आया। उसके वर्णन से प्रकट होता है कि रुहमी (पाल नरेश) की बल्लहरा (राष्ट्रकूट) और गुज (गुर्जर-प्रतिहार) से शत्रुता थी। राष्ट्रकूट सेना और प्रतिहार सेना की अपेक्षा पाल सेना बहुसंख्यक थी।

महेन्दपाल (प्रथम) और नारायण पाल का संघर्ष

मिहिरभोज के बाद उसके पुत्र महेन्द्रपाल प्रथम (885 ई.-910 ई.) ने शासन किया। पाल वंश का नारायण पाल (854 ई.-908 ई.) उसका समकालीन था। मिहिरभोज के अभिलेख उत्तर प्रदेश के पूर्व में प्राप्त नहीं होते किंतु महेन्द्रपाल (प्रथम) के तीन अभिलेख बिहार में और एक अभिलेख बंगाल में प्राप्त हुआ है। इनके आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महेन्द्रपाल ने बंगाल नरेश नारायणपाल को पराजित कर बंगाल के कुछ भागों और बिहार पर अधिकार कर लिया था। नारायणपाल का कोई भी अभिलेख उसके शासन के 17वें वर्ष से लेकर 37वंे वर्ष तक मगध में नहीं मिला है परंतु 908 ई. में उसका एक अभिलेख मगध (उदन्तपुर) में मिलता है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि नारायणपाल ने फिर से मगध पर अधिकार कर लिया था।

अमोघवर्ष तथा नारायणपाल का संघर्ष

सिरुर अभिलेख का कथन है कि अंग, बंग, मगध तथा वेंगी के राजा राष्ट्रकूट अमोघवर्ष (814 ई.-878 ई.) के अधीन थे। इस आधार पर डॉ. मजूमदार का मत है कि अमोघवर्ष ने पाल नरेश नारायणपाल को पराजित किया था परंतु इस मत के पक्ष में कोई अन्य प्रमाण नहीं है। पाल शासक नारायणपाल, अमोघवर्ष के पुत्र तथा उत्तराधिकारी कृष्ण द्वितीय (878 ई. से 914 ई.) का भी समकालीन था। उत्तर पुराण से ज्ञात होता है कि कृष्ण (द्वितीय) के हाथियों ने गंगा नदी का पानी पिया था। इस आधार पर कुछ विद्वानों ने मत स्थिर किया है कि कृष्ण (द्वितीय) ने बंगाल पर आक्रमण किया था और उसके राजा नारायणपाल को परास्त किया था परंतु अन्य प्रमाणों के अभाव में यह मत संदिग्ध है।

महीपाल (प्रथम) का पांच राष्ट्रकूट राजाओं से संघर्ष

महेन्द्रपाल के पश्चात् उसका पुत्र भोज द्वितीय (910 ई.-913 ई.) प्रतिहारों का राजा हुआ। उसे उसके भाई महीपाल (प्रथम) ने पराजित करके सिंहासन पर अधिकार कर लिया। महीपाल (प्रथम) को विनायकपाल तथा हेरम्बपाल भी कहते हैं। उसने 913 ई. से 945 ई. तक शासन किया। वह प्रतिहार वंश का प्रतापी शासक सिद्ध हुआ। उसके समय दक्षिण में राष्ट्रकूट राजा इंद्र तृतीय (914 ई.-922 ई.) का शासन था। काम्बे दानपत्र से ज्ञात होता है कि इन्द्र ने मालवा पर आक्रमण किया। उसके हाथियों ने अपने दांतों के घातों से भगवान् कालप्रिय के मंदिर के प्रांगण को विषम बना दिया। तत्पश्चात् यमुना को पार करके शत्रु नगर महोदय (कान्यकुब्ज) पर आक्रमण किया तथा उसे नष्ट कर दिया। महीपाल भाग खड़ा हुआ। इन्द्र के सेनापति नरसिंह चालुक्य ने प्रयाग तक उसका पीछा किया और अपने घोड़ों को गंगा और यमुना के संगम में नहलाया।

इन्द्र (तृतीय) के पश्चात् उसका पुत्र अमोघवर्ष (द्वितीय) (922 ई.-923 ई.) राष्ट्रकूटों का राजा हुआ। उसका भाई गोविंद (चतुर्थ) (923 ई.-936 ई.) उसे गद्दी से उतार कर स्वयं राजा बन गया। वह विलासी राजा था। उसके काल में राष्ट्रकूट शक्ति का हा्रस होने लगा। 936 ई. में गोविंद (चतुर्थ) के चाचा अमोघवर्ष तृतीय (936 ई.-939 ई.) ने सिंहासन पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार इन्द्र (तृतीय) से लेकर अमोघवर्ष (द्वितीय), गोविंद (चतुर्थ) और अमोघवर्ष (तृतीय) तक चार राष्ट्रकूट राजा, प्रतिहार नरेश महीपाल के समकालीन थे। इनकी कमजोरी का लाभ उठाकर महीपाल ने कन्नौज पर पुनः अधिकार कर लिया। क्षेमीश्वर के नाटक चण्डकौशिकम् में महीपाल की कर्नाट् विजय का उल्लेख है। डॉ. मजूमदार का मत है कि कर्नाटांे से आशय राष्ट्रकूटों से है। देवली और कर्हाद अभिलेखों से ज्ञात होता है कि अमोघवर्ष (तृतीय) के युवराज कृष्ण (तृतीय) ने गुर्जर को परास्त करके उससे कालिंजर तथा चित्रकूट छीन लिये। संभवतः यह गुर्जर महीपाल (प्रथम) था। इस प्रकार प्रतिहार राजा महीपाल (प्रथम) ने पांच राष्ट्रकूट राजाओं से संघर्ष किया।

अलमसूदी का विवरण

अरब यात्री अलमसूदी लिखता है कि प्रतिहार नरेश बऊर (महीपाल प्रथम) और बल्हर (राष्ट्रकूट नरेश) में शत्रुता थी और बऊर ने राष्ट्रकूटों से अपनी रक्षा के लिये दक्षिण में एक प्रथक् सेना रखी थी।

महीपाल (प्रथम) के पाल राजाओं से सम्बन्ध

पाल वंश के दो राजा राज्यपाल तथा गोपाल (द्वितीय) प्रतिहार नरेश महीपाल (प्रथम) के समकालीन थे। अभिलेखों से ज्ञात होता है कि इन दोनों के अधीन बंगाल और मगध थे। इनके समय में संभवतः पालों तथा प्रतिहारों के बीच शांति बनी रही।

त्रिवंशीय संघर्ष का अंत

महीपाल (प्रथम) जीवन भर लड़ता रहा था, निश्चित रूप से उसकी शक्ति का बहुत ह्रास हुआ होगा। अंत में वह कृष्ण (तृतीय) से परास्त हो गया था। इस कारण उसके पश्चात् प्रतिहार वंश में अनेक निर्बल राजा हुए। वे अपने राज्य की रक्षा नहीं कर सके तथा शनैःशनैः उनके राज्य का विलोपन हो गया।

बंगाल में भी नारायणपाल के पश्चात् पाल वंश पतनोन्मुख था। अतः यह वंश भी प्रतिहारों की निर्बलता का लाभ नहीं उठा सका। 1001 ई. में जब महमूद गजनवी का भारत पर आक्रमण हुआ तो पाल वंश के राजा राज्यपाल ने महमूद की अधीनता स्वीकार कर ली। इस पर चंदेल राजा गण्ड ने राज्यपाल पर आक्रमण करके उसे दण्डित किया। इस प्रकार ये राज्य इतने कमजोर हो गये कि उनमें परस्पर लड़ने की भी शक्ति नहीं रही।

राष्ट्रकूट राजा कृष्ण (तृतीय) (939 ई.-968 ई.) पराक्रमी राजा था किंतु इस बात के निश्चित प्रमाण नहीं मिलते कि उसने उत्तर भारत में अपने राज्य का प्रसार किया। कृष्ण (तृतीय) के पश्चात् राष्ट्रकूट राज्य की अवनति होने लगी और शनैःशनैः वह भी छिन्न-भिन्न हो गया।

इस प्रकार गुर्जर-प्रतिहार, पाल तथा राष्ट्रकूट राजा 783 ईस्वी से लेकर भारत में महमूद गजनवी के आक्रमण आरम्भ होने तक परस्पर लड़कर एक दूसरे को क्षीण एवं दुर्बल बनाते रहे और अंत में तीनों ही नष्ट हो गये और त्रिवंशीय संघर्ष का अंत हुआ।

अध्याय – 32 इस्लाम का उत्कर्ष

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इस्लाम का अर्थ

इस्लाम अरबी भाषा के ‘सलम’ शब्द से निकला है जिसका अर्थ होता है आज्ञा का पालन करना। इस्लाम का अर्थ है आज्ञा का पालन करने वाला। इस्लाम का वास्तविक अर्थ है खुदा के हुक्म पर गर्दन रखने वाला। व्यापक अर्थ में इस्लाम एक धर्म का नाम है, जिसका उदय सातवीं शताब्दी में अरब में हुआ था। इस धर्म के मानने वाले ‘मुसलमान’ कहलाते हैं। मुसलमान शब्द मुसल्लम-ईमान का बिगड़ा हुआ स्वरूप है। मुसल्लम का अर्थ है पूरा और ईमान का अर्थ है दीन या धर्म। इसलिये मुसलमान उन लोगों को कहते है जिनका दीन इस्लाम में पूरा विश्वास है।

अरब का प्राचीन धर्म

इस्लाम का उदय होने से पहले, अरब वालों के धार्मिक विचार प्राचीन काल में हिन्दुओं के समान थे। वे भी हिन्दुओं की भाँति मूर्ति पूजक थे और उनका अनेक देवी-देवताओं में विश्वास था। जिस प्रकार हिन्दू लोग कुल-देवता, ग्राम-देवता आदि में विश्वास करते थे उसी प्रकार इन लोगों के भी प्रत्येक कबीले का एक देवता होता था, जो उसकी रक्षा करता था। अरब वालों में अन्धविश्वास भी कूट-कूट कर भरा था। उनकी धारणा थी कि भूत-प्रेत वृक्षों तथा पत्थरों में निवास करते हैं और मनुष्य को विभिन्न प्रकार के कष्ट देने की शक्ति रखते हैं। मक्का में काबा नामक प्रसिद्ध स्थान है जहाँ किसी समय 360 मूर्तियों की पूजा होती थी। यहाँ अत्यंत प्राचीन काल से एक काला पत्थर मौजूद है। अरब वालों का विश्वास था कि इस पत्थर को ईश्वर ने आसमान से गिरा दिया था। इसलिये वे इसे बड़ा पवित्र मानते थे और इसके दर्शन तथा पूजन के लिए काबा जाया करते थे। यह पत्थर आज भी आदर की दृष्टि से देखा जाता है। काबा की रक्षा का भार कुरेश नामक कबीले के ऊपर था, कुरेश कबीले में मुहम्मद साहब का जन्म हुआ जिन्होंने अरब की प्राचीन धार्मिक व्यवस्था के विरुद्ध बहुत बड़ी क्रान्ति की और एक नये धर्म को जन्म दिया, जो इस्लाम-धर्म के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

मुहम्मद साहब का परिचय: मुहम्मद साहब का जन्म 570 ई. में मक्का के एक साधारण परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम अब्दुल्ला था। उनकी माता का नाम अमीना था। मुहम्मद साहब के जन्म से पहले ही उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। जब वे छः साल के हुए तो उनकी माता की भी मृत्यु हो गई। जब वे आठ साल के हुए तो उनके दादा की भी मृत्यु हो गई। बारह साल की आयु से उन्होंने अपने चाचा के साथ व्यापार के काम में हाथ बंटाना आरम्भ किया।

मुहम्मद साहब बाल्यकाल से ही बड़े मननशील थे। वे सरल जीवन व्यतीत करते थे। धीरे-धीरे एक ईश्वर तथा प्रार्थना में उनका विश्वास बढ़ता गया। चालीस वर्ष की अवस्था तक उनके जीवन में कोई विशेष घटना नहीं घटी। एक दिन उन्हें फरिश्ता जिबराइल के दर्शन हुए जो उनके पास ईश्वर का पैगाम अर्थात् संदेश लेकर आया। यह संदेश इस प्रकार से था- ‘अल्लाह का नाम लो, जिसने सब वस्तुओं की रचना की है।’ इसके बाद मुहम्मद साहब को प्रत्यक्ष रूप में ईश्वर के दर्शन हुए और यह संदेश मिला- ‘अल्लाह के अतिरिक्त कोई दूसरा ईश्वर नहीं है और मुहम्मद उसका पैगम्बर है।’

अब मुहम्मद साहब ने अपने मत का प्रचार करना आरम्भ किया। उन्हांेने अपने ज्ञान का पहला उपदेश अपनी पत्नी खदीजा को दिया। उन्होंने मूर्तिपूजा तथा बाह्याडम्बरों का विरोध किया। अरब वासियों ने उनके विचारों का स्वागत नहीं किया और उनका विरोध करना आरम्भ कर दिया। विवश होकर 28 जून 622 ई. को उन्हें अपनी जन्मभूमि मक्का को छोड़ देना पड़ा। वे मदीना चले गये। यहीं से मुसलमानों का हिजरी संवत् आरम्भ होता है। हिजरी अरबी के हज्र शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है जुदा या अलग हो जाना। चूंकि मुहम्मद साहब मक्का से अलग होकर मदीना चले गये इसलिये इस घटना को ‘हिजरत’ कहते है। मदीना में मुहम्मद साहब का स्वागत हुआ। वे वहाँ पर नौ वर्ष तक रहे। उनके अनुयायियों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी। 632 ई. में मुहम्मद साहब का निधन हो गया। उनके उत्तराधिकारी खलीफा कहलाये।

मुहम्मद साहब का उपदेश

मुहम्मद साहब ने जिस धर्म का प्रचार किया उसके उपदेश ‘कुरान’ में संकलित हैं। कुरान अरबी भाषा केे ‘किरन’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है निकट या समीप। इस प्रकार कुरान वह ग्रन्थ है, जो लोगों को ईश्वर के निकट ले जाता है। मुहम्मद साहब का एक ईश्वर में विश्वास था, जिसका न आदि है न अन्त, अर्थात् न वह जन्म लेता है और न मरता है। वह सर्वशक्तिमान्, सर्वद्रष्टा तथा अत्यन्त दयावान है। मुहम्मद साहब का कहना था कि चूंकि समस्त इंसानों को अल्लाह ने बनाया है इसलिये समस्त इंसान एक समान है। मुहम्मद साहब ने अपने अनुयायियों से कहा था- ‘सच्चे धर्म का यह तात्पर्य है कि तुम अल्लाह, कयामत, फरिश्तों, कुरान तथा पैगम्बर में विश्वास करते हो और अपनी सम्पत्ति को दीन-दुखियों को खैरात में देते रहो।’ अल्लाह अरबी के ‘अलह’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है पाक या पवित्र, जिसकी पूजा करनी चाहिए। कमायत अरबी के ‘कयम’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है खड़ा होना। कयामत अर्थात् प्रलय के दिन मुर्दों को अपनी कब्रों से निकल कर खड़ा होना पड़ेगा। कयामत का वास्तविक अर्थ है दुनिया का मिट जाना। फरिश्ता का शाब्दिक अर्थ होता है मिलाप या एक चीज का दूसरी चीज से मेल। खुदा के पास से पैगाम लेकर जो फरिश्ता हजरत मुहम्मद के पास उतरा था, उसका नाम जिबराइल था। फरिश्ते वे पवित्र आत्माएँ हैं, जो ईश्वर तथा मनुष्य में सामीप्य स्थापित करती हैं। कुरान में मुहम्मद साहब के उपदेशों का संग्रह है। चूंकि मुहम्मद साहब ने लोगों को ईश्वर का पैगाम दिया इसलिये वे पैगम्बर कहलाते हैं। कुरान के अनुसार प्रत्येक मुसलमान के पांच कर्त्तव्य हैं- कलमा, नमाज, जकात, रमजान तथा हज। कलमा अरबी भाषा के ‘कलम’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है शब्द। कलमा का अर्थ होता है ईश्वर वाक्य अर्थात् जो कुछ ईश्वर की ओर से लिखकर आया है कलमा है। नमाज का अर्थ खिदमत या बंदगी करना है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है- नम तथा आज। नम का अर्थ होता है ठण्डा करने वाली या मिटाने वाली और आज का अर्थ होता है वासनाएँ अथवा बुरी इच्छाएँ। इस प्रकार नमाज उस प्रार्थना को कहते हैं जिससे मनुष्य की बुरी इच्छाएँ नष्ट हो जाती हैं। नमाज दिन में पाँच बार पढ़ी जाती है- प्रातःकाल, दोपहर, तीसरे पहर, संध्या समय तथा रात्रि में। शुक्रवार को समस्त मुसलमान इकट्ठे होकर नमाज पढ़ते हैं। जकात का शाब्दिक अर्थ होता है ज्यादा होना या बढ़ना परन्तु इसका व्यावहारिक अर्थ होता है भीख या दान देना। चूंकि भीख या दान देने से धन बढ़ता है इसलिये जो धन दान दिया जाता है उसे ‘जकात’ कहते हैं। प्रत्येक मुसलमान को अपनी आय का चालीसवाँ हिस्सा खुदा की राह में, अर्थात् दान में दे देना चाहिए। रमजान चाँद का नौवाँ महीना होता है। रमजान अरबी में ‘रमज’ शब्द से बना है; जिसका अर्थ होता है शरीर के किसी अंग को जलाना। चूंकि इस महीने में रोजा या व्रत रखकर शरीर को जलाया जाता है इसलिये इसका नाम ‘रमजान’ रखा गया है। रोजा में सूर्य निकलने के बाद और सूर्यास्त के पहले खाया-पिया नहीं जाता। रोजा रखने से बरकत (वृद्धि) होती है और कमाई बढ़ती है। हज का शाब्दिक अर्थ होता है इरादा परन्तु इसका व्यावहारिक अर्थ होता है मक्का में जाकर बन्दगी करना। प्रत्येक मुसलमान का यह धार्मिक कर्त्तव्य है कि वह अपने जीवन में कम से कम एक बार मक्का जाकर बन्दगी करे।

इस्लाम के अनुयायी दो सम्प्रदायों में विभक्त हैं- शिया और सुन्नी। शिया का शाब्दिक अर्थ होता है गिरोह परन्तु व्यापक अर्थ में शिया उस सम्प्रदाय को कहते हैं जो केवल अली को मुहम्मद साहब का वास्तविक उत्तराधिकारी मानता है, पहले तीन खलीफाओं को नहीं। सुन्नी शब्द अरबी के ‘सुनत’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ होता है मुहम्मद के कामों की नकल करना। सुन्नी उस सम्प्रदाय को कहते है, जो प्रथम तीन खलीफाओं को ही मुहम्मद साहब का वास्तविक उतराधिकारी मानता है, मुहम्मद साहब के दामाद अली को नहीं। शिया सम्प्रदाय का झण्डा काला होता है और सुन्नी सम्प्रदाय का सफेद।

खलीफाओं का उत्कर्ष

खलीफा अरबी के ‘खलफ’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है लायक बेटा अर्थात् योग्य पुत्र परन्तु खलीफा का अर्थ है जाँ-नशीन या उत्तराधिकारी। मुहम्मद साहब की मृत्यु के उपरान्त जो उनके उत्तराधिकारी हुए, वे खलीफा कहलाये। प्रारम्भ में खलीफा का चुनाव होता था परन्तु बाद में यह पद आनुवंशिक हो गया। मुहम्मद साहब के मरने के बाद अबूबकर, जो कुटम्ब में सर्वाधिक बूढ़े तथा मुहम्मद साहब के ससुर थे, प्रथम खलीफा चुन लिए गये। वे बड़े ही धर्मपरायण व्यक्ति थे। उनके प्रयास से मेसोपोटमिया तथा सीरिया में इस्लाम धर्म का प्रचार हुआ। अबूबकर के मर जाने पर 634 ई. में उमर निर्विरोध चुन लिये गये। उन्होंने इस्लाम के प्रचार में जितनी सफलता प्राप्त की उतनी सम्भवतः अन्य किसी खलीफा ने न की। उन्होंने इस्लाम धर्म के अनुयायियों की एक विशाल तथा योग्य सेना संगठित की और साम्राज्य विस्तार तथा धर्म प्रचार का कार्य साथ-साथ आरम्भ किया। जिन देशों पर उनकी सेना विजय प्राप्त करती थी वहाँ के लोगों को मुसलमान बना लेती थी और वहाँ पर इस्लाम का प्रचार आरम्भ हो जाता था। इस प्रकार थोड़े ही समय में फारस, मिस्र आदि देशों में इस्लाम का प्रचार हो गया।

उमर के बाद उसमान खलीफा हुए परन्तु थोड़े ही दिन बाद उनकी विलास प्रियता के कारण उनकी हत्या कर दी गई और उनके स्थान पर अली खलीफा चुन लिये गये। कुछ लोगों ने इसका विरोध किया। इस प्रकार गृह युद्ध आरम्भ हो गया और इस्लाम के प्रचार में भी शिथिलता आ गई। अन्त में अली का वध कर दिया गया। अली के बाद उनका पुत्र हसन खलीफा चुना गया परन्तु उसमें इस पद को ग्रहण करने की योग्यता न थी। इसलिये उसने इस पद को त्याग दिया। अब सीरिया का गवर्नर मुआविया, जो खलीफा उमर के वंश का था, खलीफा चुन लिया गया। हसन ने मुआविया के पक्ष में खलीफा का पद इस शर्त पर त्यागा था कि खलीफा का पद निर्वाचित होगा, आनुवांशिक नहीं परन्तु खलीफा हो जाने पर मुआविया के मन में कुभाव उत्पन्न हो गया और वह अपने वंश की जड़ जमाने में लग गया। उसने मदीना से हटकर दमिश्क को खलीफा की राजधानी बना दिया। चूंकि वह उमर के वंश का था, इसलिये दश्मिक के खलीफा उमैयद कहलाये।

मुआविया लगभग बीस वर्ष तक खलीफा के पद पर रहा। इस बीच में उसने अपने वंश की स्थिति अत्यन्त सुद्धढ़ बना ली। हसन के साथ उसने जो वादा किया था उसे तोड़ दिया और अपने पुत्र यजीद को अपना उतराधिकारी नियुक्त किया। इससे बड़ा अंसतोष फैला। इस अंसतोष का नेतृत्व अली के पुत्र तथा हसन के भाई इमाम हुसैन ने ग्रहण किया। उन्होंने अपने थोड़े से साथियों के साथ फरात नदी के पश्चिमी किनारे के मैदान में उमैयद खलीफा की विशाल सेना का बड़ी वीरता तथा साहस के साथ सामना किया। इमाम हुसैन अपने साथियों के साथ मुहर्रम महीने की दसवीं तारीख को तलवार के घाट उतार दिये गये। जिस मैदान में इमाम हुसैन ने अपने प्राणों की आहुति दी, वह कर्बला कहलाता है। कर्बला दो शब्दों से मिलकर बना है- कर्ब तथा बला। कर्ब का अर्थ होता है मुसीबत और बला का अर्थ होता है दुःख। चूंकि इस मैदान में मुहम्मद साहब की कन्या के पुत्र का वध किया गया था इसलिये इस मुसीबत और दुःख की घटना के कारण इस स्थान का नाम कर्बला पड़ गया। मुहर्रम मुसलमानों के वर्ष का पहला महीना है। चूंकि इस महीने की दसवीं तारीख को इमाम हुसैन की हत्या की गई थी इसलिये यह शोक और रंज का महीना माना जाता है। मुसलमान लोग मुहर्रम का त्यौहार मनाते हैं।

इमाम हुसैन के बाद अब्दुल अब्बास नामक व्यक्ति ने इस लड़ाई को जारी रखा। अन्त में वह सफल हुआ और उसने उमैयद वंश के एक-एक व्यक्ति का वध करवा दिया। अब्बास के वंशज अब्बासी कहलाये। इन लोगों ने बगदाद को अपनी राजधानी बनाया। बगदाद के खलीफाओं में हारूँ रशीद का नाम बहुत विख्यात है, जो अपनी न्याय-प्रियता के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। अन्त में तुर्कों ने बगदाद के खलीफाओं का अन्त कर दिया। खलीफाओं ने मिस्त्र में जाकर शरण ली। खलीफाओं ने इस्लाम की एक बहुत बड़ी सेवा की। उन्होंने इस्लाम का दूर-दूर तक प्रचार किया। इन्हीं लोगों ने भारत में भी इसका प्रचार किया।

इस्लाम का राजनीति स्वरूप

इस्लाम आरम्भ से ही राजनीति तथा सैनिक संगठन से सम्बद्ध रहा। मुहम्मद साहब के जीवन काल में ही इस्लाम को सैनिक तथा राजनीतिक स्वरूप प्राप्त हो गया था। जब 622 ई. में मुहम्मद साहब मक्का से मदीना गये तब वहाँ पर उन्होंने अपने अनुयायियों की एक सेना संगठित की और मक्का पर आक्रमण कर दिया। इस प्रकार उन्होंने अपने सैन्य-बल से मक्का में सफलता प्राप्त की। मुहम्मद साहब न केवल इस्लाम के प्रधान स्वीकार कर लिये गये वरन् वे राजनीति के भी प्रधान बन गये और उनके निर्णय सर्वमान्य हो गये। इस प्रकार मुहम्मद साहब के जीवन काल में इस्लाम तथा राज्य के अध्यक्ष का पद एक ही व्यक्ति में संयुक्त हो गया।

मुहम्मद साहब की मृत्यु के उपरान्त जब खलीफाओं का उत्कर्ष हुआ, तब भी इस्लाम तथा राजनीति में अटूट सम्बन्ध बना रहा क्योंकि खलीफा भी न केवल इस्लाम के अपितु राज्य के भी प्रधान होते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि राज्य का शासन कुरान के अनुसार होने लगा। इससे राज्य में मुल्ला-मौलवियों का प्रभाव बढ़ा। राज्य ने धार्मिक असहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया जिसके फलस्वरूप अन्य धर्म वालों के साथ अन्याय तथा अत्याचार किया जाने लगा। खलीफा उमर ने अपने शासन काल में इस्लाम के अनुयायियों को सैनिक संगठन में परिवर्तित कर दिया। इसका परिणम यह हुआ कि जहाँ कहीं खलीफा की सेनायें विजय के लिये गईं, वहाँ पर इस्लाम का प्रचार किया गया। यह प्रचार शान्ति पूर्वक सन्तों द्वारा नहीं वरन् राजनीतिज्ञों और सैनिकों द्वारा बलात् तलवार के बल से किया गया। परिणाम यह हुआ कि जहाँ कहीं इस्लाम का प्रचार हुआ वहाँ की धरा रक्त-रंजित कर दी गई।

इस्लामी सेनाध्यक्ष युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिये ‘जेहाद’ अर्थात् धर्म युद्ध का नारा लगाते थे। धर्म युद्ध प्रायः ऐसा भयंकर रूप धारण कर लेता था कि दानवता ताण्डव करने लगती थी और मजहब के नाम पर घनघोर अमानवीय कार्य किये जाते थे। शताब्दियाँ व्यतीत हो जाने पर भी इस्लाम की कट्टरता का स्वरूप अभी समाप्त नहीं हुआ।

अध्याय – 33 : अरब वालों का भारत पर आक्रमण

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अरबवासियों का परिचय

अरब एशिया महाद्वीप के दक्षिण-पश्चिमी भाग में स्थित एक प्रायद्वीप है। इसके दक्षिण में हिन्द महासागर, पश्चिमी में लालसागर और पूर्व में फारस की खाड़ी स्थित है। इस क्षेत्र के निवासी प्राचीन काल से कुशल नाविक रहे हैं और उनकी विदेशों से व्यापार करने में रुचि रही है। अरब एक रेगिस्तान है परन्तु उसके बीच-बीच में उपजाऊ भूमि भी है जहाँ पानी मिल जाता है। इन्हीं उपजाऊ स्थानों में इस देश के लोग निवास करते हैं। ये लोग कबीले बनाकर रहते थे। प्रत्येक कबीले का एक सरदार होता था। इन लोगों की अपने कबीले के प्रति बड़ी भक्ति होती थी और ये उसके लिए अपना सर्वस्व निछावर करने के लिए तैयार रहते थे। ये लोग तम्बुओं में निवास करते थे और खानाबदोशों का जीवन व्यतीत करते थे। ये लोग एक स्थान से दूसरे स्थान में घूमा करते थे और लूट-खसोट करके पेट भरते थे। ऊँट उनकी मुख्य सवारी थी और खजूर उनका मुख्य भोजन था। ये लोग बड़े लड़ाके होते थे।

अरबवालों का भारत के साथ सम्बन्ध

अरबवालों का भारत के साथ अत्यन्त प्राचीन काल में ही सम्बन्ध स्थापित हो गया था। अरब नाविकों द्वारा भारत तथा पाश्चात्य देशों के साथ व्यापार होता था। धीरे-धीरे भारत के साथ अरबवासियों के व्यापारिक सम्बन्ध बढ़ने लगे और वे भारत के पश्चिमी समुद्र तट पर आकर बसने लगे। कुछ भारतीय राजा, जिन्हें नाविकों की आवश्यकता थी, उन्हें अपने राज्य में बसने के लिए प्रोत्साहित करने लगे। इस प्रकार इनकी संख्या बढ़ने लगी। जब अरब में इस्लाम का प्रचार हो गया तब भारत में आने वाले व्यापारियों ने व्यापार करने के साथ-साथ इस्लाम का प्रचार करना भी आरम्भ कर दिया। हिन्दू समाज में निम्न समझी जाने वाली जातियों के लोगों ने इस्लाम को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार अरबवालों का भारतीयों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध के साथ-साथ सांस्कृतिक सम्बन्ध भी स्थापित हो गया। 

सातवीं शताब्दी के मध्य में जब अरब में खलीफाओं का उत्थान आरम्भ हुआ तब उन्होंने साम्राज्यवादी नीति अपनाई और अपने साम्राज्य का विस्तार आरम्भ किया। खलीफाओं को भारत आने वाले व्यापारियों से भारत की अपार सम्पति का पता लग गया था। उन्हें यह भी मालूम हो गया कि भारत के लोग मूर्ति पूजक हैं। इसलिये उन्होंने भारत की सम्पत्ति लूटने तथा मूर्ति-पूजकों के देश पर आक्रमण करने का निश्चय किया।

अरबवासियों के भारत पर आक्रमण करने के लक्ष्य

अरबवालों के भारत पर आक्रमण करने के तीन प्रमुख लक्ष्य प्रतीत हेाते हैं। उनका पहला लक्ष्य भारत की अपार सम्पति को लूटना था। दूसरा लक्ष्य भारत में इस्लाम का प्रचार करना तथा मूर्तियों और मन्दिरों को तोड़ना था। तीसरा लक्ष्य भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करना था। अपने इन ध्येयों की पूर्ति के लिए उन्हें भारत पर आक्रमण करने का कारण भी मिल गया। अरब व्यापारियों के एक जहाज को सिन्ध के लुटेरों ने लूट लिया। ईरान के गवर्नर हज्जाज को, जो खलीफा के प्रतिनिधि के रूप में वहाँ शासन करता था, भारत पर आक्रमण करने का बहाना मिल गया। उसने खलीफा की आज्ञा लेकर अपने भतीजे तथा दामाद मुहम्मद बिन कासिम की अध्यक्षता में एक सेना सिन्ध पर आक्रमण करने के लिए भेज दी।

मुहम्मद बिन कासिम का आक्रमण

इन दिनों सिंध में दाहिरसेन नामक राजा शासन कर रहा था। मुहम्मद बिन कासिम ने 711 ई. में विशाल सेना लेकर देबुल नगर पर आक्रमण किया। इस आक्रमण से नगरवासी अत्यन्त भयभीत हो गये और वे कुछ न कर सके। देबुल पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। देबुल में मुहम्मद बिन कासिम ने कठोरता की नीति का अनुसरण किया। उसने नगरवासियों को मुसलमान बन जाने की आज्ञा दी। सिंध के लोगों ने ऐसा करने से इन्कार कर दिया। इस पर मुहम्मद बिन कासिम ने उनकी हत्या की आज्ञा दे दी। सत्रह वर्ष से ऊपर की आयु के समस्त पुरुषों को तलवार के घाट उतार दिया गया। स्त्रियों तथा बच्चों को दास बना लिया गया। नगर को खूब लूटा गया और लूट का सामान सैनिकों में बाँट दिया गया।

देबुल पर अधिकार कर लेने के बाद मुहम्मद बिन कासिम की विजयी सेना आगे बढ़ी। नीरून, सेहयान आदि नगरों पर प्रभुत्व स्थापित कर लेने के उपरान्त वह दाहिरसेन की राजधानी ब्राह्मणाबाद में पहुँची। यहाँ पर दाहिर उसका सामना करने के लिए पहले से ही तैयार था। उसने बड़ी वीरता तथा साहस के साथ शत्रु का सामना किया परन्तु वह परास्त हो गया और रणक्षेत्र में ही उसकी मृत्यु हो गई। उसकी रानी ने अन्य स्त्रियों के साथ चिता में बैठकर अपने सतीत्व की रक्षा की।

ब्राह्मणाबाद पर प्रभुत्व स्थापित कर लेने के बाद मुहम्मद बिन कासिम ने मुल्तान की ओर प्रस्थान किया। मुल्तान के शासक ने बड़ी वीरता तथा साहस के साथ शत्रु का सामना किया परन्तु जल के अभाव के कारण उसे आत्म समर्पण कर देना पड़ा। यहाँ भी मुहम्मद बिन कासिम ने भारतीय सैनिकों की हत्या करवा दी और उनकी स्त्रियों तथा बच्चों को गुलाम बना लिया। जिन लोगों ने उसे जजिया कर देना स्वीकार कर लिया उन्हें मुसलमान नहीं बनाया गया। यहाँ पर हिन्दुओं के मन्दिरों को भी नहीं तोड़ा गया परन्तु उनकी सम्पति लूट ली गई। मुल्तान विजय के बाद मुहम्मद बिन कासिम अधिक दिनों तक जीवित न रह सका। खलीफा उससे अप्रसन्न हो गया। इसलिये उसने उसे वापस बुला कर उसकी हत्या करवा दी।

सिन्ध में अरबी शासन व्यवस्था

सिन्ध पर अधिकार कर लेने के उपरान्त अरबी आक्रमणकारियों को वहाँ के शासन की व्यवस्था करनी पड़ी। चूंकि मुसलमान विजेता थे इसलिये कृषि करना उनकी शान के खिलाफ था। फलतः कृषि कार्य हिन्दुओं के हाथ में रहा। इन किसानों को नये विजेताओं को भूमि कर देना पड़ता था। यदि वे सिंचाई के लिए राजकीय नहरों का प्रयोग करते थे तो उन्हे 40 प्रतिशत और यदि राजकीय नहरों का प्रयोग नहीं करते थे तो केवल 25 प्रतिशत कर देना पड़ता था। जिन हिन्दुओं ने इस्लाम को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था, उन्हें जजिया नामक कर देना पड़ता था। इससे जनसाधारण की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी। हिन्दू प्रजा को अनेक प्रकार की असुविधाओं का सामना करना पड़ता था। वे अच्छे वस्त्र नहीं पहन सकते थे। घोड़े की सवारी नहीं कर सकते थे। न्याय का कार्य काजियों के हाथों में चला गया जो कुरान के नियमों के अनुसार न्याय करते थे। इसलिये हिन्दुओं के साथ प्रायः अत्याचार होता था। अरब वाले बहुत दिनों तक सिन्ध में अपनी प्रभुता स्थापित न रख सके और उनका शासन अस्थायी सिद्ध हुआ।

अरब आक्रमण का प्रभाव अरब आक्रमण का भारत पर राजनीतिक दृष्टिकोण से कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। लेनपूल ने इस आक्रमण को भारत के इतिहास की एक घटना मात्र कहा है जिसका भारत के इतिहास पर कोई प्रभाव नही पड़ा परन्तु इतना तो स्वीकार करना ही पडेगा कि इस समय से सिन्ध पर मुसलमानों के बार-बार आक्रमण होने आरम्भ हो गये। अरबी यात्री तथा इस्लाम प्रचारक इस मार्ग से निरन्तर भारत आने लगे और भारत के विषय में लिखते-पढ़ते रहे। इससे आगे चलकर तुर्कों को भारत विजय करने में सहायता मिली। अरब आक्रमण का सांस्कृतिक प्रभाव महत्त्वपूर्ण था। इस आक्रमण के बाद मुसलमान सिन्ध के नगरों में बस गये। उन्होंने हिन्दू स्त्रियों से विवाह कर लिये। इस प्रकार अरब रक्त का भारतीय रक्त में सम्मिश्रण हो गया। अरब आक्रमणकारियों ने सिन्ध में इस्लाम का प्रचार किया। हिन्दू समाज में निम्न मानी जाने वाली जातियों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। अरब आक्रमणकारी भारतीयों की उत्कृष्ट संस्कृति की ओर आकृष्ट हुए। उन्होंने भारतीय ज्योतिष, चिकित्सा, रसायन, दर्शन आदि सीखने का प्रयत्न किया। बगदाद के खलीफाओं विशेषकर खलीफा हारूँ रशीद ने इस कार्य में बड़ी रुचि ली। उन्होंने भारतीय विद्वानों तथा वैद्यों को बगदाद बुलाया और उनका आदर-सम्मान कर उनसे बहुत कुछ सीखा। अरबवालों ने भारतीयों से शतरंज का खेल, गणित के अनेक सिद्धान्त, शून्य से नौ तक के अंक, दशमलव प्रणाली तथा औषधि विज्ञान की अनेक बातें सीखीं।

अध्याय – 34 (अ) : भारत पर तुर्क आक्रमण एवं हिन्दू प्रतिरोध – महमूद गजनवी

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सिंध में अरबों के आक्रमण के लगभग 350 वर्ष बाद उत्तर-पश्चिमी दिशा से भारत भूमि पर तुर्क आक्रमण आरंभ हुए। उस समय भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर हिन्दूशाही वंश का राजा जयपाल शासन कर रहा था। उसका राज्य पंजाब से हिन्दूकुश पर्वत तक विस्तृत था।

तुर्कों का उत्कर्ष

माना जाता है कि तुर्कों के पूर्वज हूण थे। उनमें शकों तथा ईरानियों के रक्त का भी मिश्रण हो गया था तथा उन्होंने इस्लाम को अंगीकार कर लिया था। डॉ. अवध बिहारी पाण्डेय के अनुसार तुर्क चीन की पश्मिोत्तर सीमा पर रहते थे। उनका सांस्कृतिक स्तर निम्न श्रेणी का था। वे खूंखार और लड़ाकू थे। युद्ध से उन्हें स्वाभाविक प्रेम था। जब अरब में इस्लाम का प्रचार आरंभ हुआ तब बहुत से तुर्कों को पकड़ कर गुलाम बना लिया गया तथा उन्हें इस्लाम स्वीकार करने के लिये बाध्य किया गया। लड़ाकू होने के कारण गुलाम तुर्कों को अरब के खलीफाओं का अंगरक्षक नियुक्त किया जाने लगा। बाद में वे खलीफा की सेना में उच्च पदों पर नियुक्त होने लगे। जब खलीफा निर्बल पड़ गये तो तुर्कों ने खलीफाओं से वास्तविक सत्ता छीन ली। खलीफा नाम मात्र के शासक रह गये। जब खलीफाओं की विलासिता के कारण इस्लाम के प्रसार का काम मंदा पड़ गया तब तुर्क ही इस्लाम को दुनिया भर में फैलाने के लिये आगे आये। उन्होंने 10 वीं शताब्दी में बगदाद एवं बुखारा में अपने स्वामियों अर्थात् खलीफाओं के तख्ते पलट दिये और 943 ई. में उन्होंने मध्य ऐशिया के अफगानिस्तान में अपने स्वतंत्र राज्य की स्थापना की।

गजनी का राज्य

अफगानिस्तान में गजनी नामक एक छोटा सा दुर्ग था जिसका निर्माण यदुवंशी भाटियों ने किया था। इस दुर्ग में 943 ई. में तुर्की गुलाम अलप्तगीन ने अपने स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। 977 ई. में अलप्तगीन का गुलाम एवं दामाद सुबुक्तगीन गजनी का शासक बना। सुबुक्तगीन का वंश गजनी वंश कहलाने लगा। सुबुक्तगीन तथा उसके उत्तराधिकारी महमूद गजनवी ने गजनी के छोटे से राज्य को विशाल साम्राज्य में बदल दिया जिसकी सीमाएं लाहौर से बगदाद तथा सिंध से समरकंद पहुंच गईं। गजनी से तुर्क, भारत की ओर आकर्षित हुए। भारत में इस्लाम का प्रसार इन्हीं तुर्कों ने किया। माना जाता है कि अरबवासी इस्लाम को कार्डोवा तक ले आये। ईरानियों ने उसे बगदाद तक पहुंचाया और तुर्क उसे दिल्ली ले आये।

सुबुक्तगीन का भारत आक्रमण

गजनी के सुल्तान सुबुक्तगीन ने एक विशाल सेना लेकर पंजाब के राजा जयपाल के राज्य पर आक्रमण किया। जयपाल ने उससे संधि कर ली तथा उसे 50 हाथी देने का वचन दिया किंतु बाद में जयपाल ने संधि की शर्तों का पालन नहीं किया। इस पर सुबुक्तगीन ने भारत पर आक्रमण कर लमगान को लूट लिया। सुबुक्तगीन का वंश गजनी वंश कहलाता था। 997 ई. में सुबुक्तगीन की मृत्यु हो गई।

महमूद गजनवी

महमूद गजनवी का जन्म 1 नवम्बर 971 ई. को हुआ। 997 ई. में सुबुक्तगीन की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों में उत्तराधिकार के लिये युद्ध हुआ। इस युद्ध में विजयी होने पर महमूद गजनवी ने 998 ई. में गजनी पर अधिकार कर लिया। उस समय महमूद गजनवी की आयु 27 वर्ष थी। उसने खुरासान को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया। इसी समय बगदाद के खलीफा अल-कादिर-बिल्लाह ने उसे मान्यता एवं यामीन-उद-दौला अर्थात् साम्राज्य का दाहिना हाथ और अमीन-उल-मिल्लत अर्थात् मुसलमानों का संरक्षक की उपाधियां दीं। इस कारण महमूद गजनी के वंश को यामीनी वंश भी कहते हैं। उसने अपने 32 वर्ष के शासन काल में गजनी के छोटे से राज्य को विशाल साम्राज्य में बदल दिया। उसने सुल्तान की पदवी धारण की। ऐसा करने वाला वह पहला मुस्लिम शासक था। उत्बी के अनुसार उसने ऑटोमन शासकों की भांति ‘पृथ्वी पर ईश्वर की प्रतिच्छाया’ की उपाधि धारण की। जब खलीफा अल-कादिर-बिल्लाह ने महमूद को सुल्तान के रूप में मान्यता दी तो महमूद ने खलीफा के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए प्रतिज्ञा की कि वह प्रतिवर्ष भारत के काफिरों पर आक्रमण करेगा। उसने भारत पर 1000 से 1027 ई. तक 17 बार आक्रमण किये।

भारत पर आक्रमण करने के उद्देश्य

1. गजनवी के दरबारी उतबी के अनुसार भारत पर आक्रमण वस्तुतः जिहाद (धर्मयुद्ध) था जो मूर्ति पूजा के विनाश एवं इस्लाम के प्रसार के लिये किये गये थे।

2. इतिहासकार डॉ. निजामी एवं डॉ. हबीब का मत है कि उसके भारत आक्रमण का उद्देश्य धार्मिक उन्माद नहीं था अपितु भारत के मंदिरों की अपार सम्पदा को लूटना था क्योंकि गजनवी ने मध्य एशिया के मुस्लिम शासकों पर भी आक्रमण किया था।

3. गजनवी, हिन्दू शासक जयपाल तथा आनंदपाल को दबाना चाहता था क्योंकि वे गजनी राज्य की सीमाओं को खतरा उत्पन्न करते रहते थे।

4. डॉ. ए. बी. पाण्डे के अनुसार गजनवी का लक्ष्य भारत से हाथी प्राप्त करना था जिनका उपयोग वह मध्य एशिया के शत्रु राज्यों के विरुद्ध करना चाहता था।

5. एक अन्य मतानुसार महमूद का आक्रमण धार्मिक एवं आर्थिक उद्देश्य से तो प्रेरित था ही साथ ही उसके आक्रमण में राजनीतिक उद्देश्य भी निहित थे। वह अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था।

निष्कर्ष: विभिन्न इतिहासकार भले ही भिन्न-भिन्न तर्क दें किंतु महमूद के भारत आक्रमणों तथा उसके परिणामांे से यह स्पष्ट हो जाता है कि उसके दो स्पष्ट उद्देश्य थे, पहला यह कि वह भारत की अपार सम्पदा लूटना चाहता था और दूसरा यह कि वह भारत से मूर्ति पूजा समाप्त करके इस्लाम का प्रसार करना चाहता था क्योंकि अपने समस्त 17 आक्रमणों में उसने ये ही दो कार्य किये, अपने राज्य का विस्तार नहीं किया।

गजनवी के आक्रमण के समय भारत की स्थिति

गजनवी के आक्रमण के समय भारत की राजनीतिक स्थिति अच्छी नहीं थी। भारत छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था। इन राज्यों के शासक परस्पर लड़कर अपनी शक्ति का हा्रस करते थे। उनमें बाह्य आक्रमणों का सामना करने की शक्ति नहीं थी। उनमें राष्ट्रीय एकता का विचार तक नहीं था। वे बाह्य शत्रुओं के प्रति पूरी तरह उदासीन थे तथा अपने घमण्ड के कारण किसी एक राजा का नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। वे निरंतर एक दूसरे के राज्य पर आक्रमण करते रहते थे इस कारण भारत में अच्छे सैनिक भी उपलब्ध नहीं थे।

गजनवी के आक्रमण के समय उत्तरी भारत में मुलतान तथा सिंध में दो स्वतंत्र मुस्लिम राज्य थे, पंजाब पर हिन्दूशाही वंश के जयपाल का शासन था। उसका राज्य चिनाब नदी से हिन्दूकुश पर्वतमाला तक फैला हुआ था। उसके पड़ौस में काश्मीर का स्वतंत्र राज्य था। कन्नौज पर परिहार शासक राज्यपाल का शासन था। बंगाल में पाल वंश के शासक महीपाल का शासन था। राजपूताना पर चौहानों का शासन था, गुजरात, मालवा व बुंदेलखण्ड एवं मध्य भारत में भी स्वतंत्र राज्य थे। दक्षिण में चालुक्य एवं चोल वंश का शासन था। पाल, गुर्जर प्रतिहार तथा राष्ट्रकूट राजाओं में विगत ढाई सौ वर्षों से त्रिकोणीय संघर्ष चल रहा था।

इस राजनीतिक कमजोरी के उपरांत भी भारत की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी क्योंकि युद्ध क्षेत्र में लड़ने का काम केवल राजपूत योद्धा करते थे। किसानों तथा कर्मकारों को इन युद्धों से कोई लेना देना नहीं था। वे अपने काम में लगे रहते थे। देश में धार्मिक वातावरण था। हिन्दू राजाओं द्वारा प्रजा पर कर बहुत कम लगाये जाने के कारण प्रजा की आर्थिक स्थिति अच्छी थी। मंदिरों में इतना चढ़ावा आता था कि वे अपार धन सम्पदा से भर गये थे। इस सम्पत्ति की ओर ललचा कर महमूद गजनवी जैसा कोई भी विदेशी आक्रांता भारत की ओर सरलता से मुंह कर सकता था।

महमूद गजनवी के आक्रमण

1. सीमान्त प्रदेश पर आक्रमण (1000 ई.): 1000 ई. में महमूद गजनवी ने भारत के सीमावर्ती प्रदेश पर आक्रमण कर जनजातियों को परास्त किया। उसने वहां के कुछ दुर्ग तथा नगर जीतकर उन पर अपने अधिकारी नियुक्त किये।

2. पंजाब पर आक्रमण (1001 ई.): महमूद गजनवी का प्रथम प्रसिद्ध आक्रमण पंजाब के हिन्दूशाही शासक जयपाल पर हुआ। इस युद्ध में जयपाल परास्त हुआ। उसे बंदी बना लिया गया। जयपाल ने गजनवी को विपुल धन अर्पित कर स्वयं को मुक्त करवाया किंतु आत्मग्लानि के कारण ई.1002 में उसने आत्मदाह कर लिया।

3. भेरा पर अधिकार (1003 ई.): 1003 ई. में महमूद ने झेलम के तट पर स्थित भेरा राज्य पर आक्रमण किया। वहां के शासक बाजीराव ने पराजित होकर आत्महत्या कर ली। महमूद का भेरा पर अधिकार हो गया।

4. मुल्तान पर आक्रमण (1005 ई.): 1005 ई. में महमूद ने मुल्तान के शासक दाऊद पर आक्रमण किया। दाऊद ने महमूद का सामना किया किंतु पराजित हो गया। उसने महमूद को अपार धन देकर अपनी जान बचाई। उसने महमूद को वार्षिक कर देना भी स्वीकार कर लिया। महमूद ने राजा आनंदपाल के पुत्र सेवकपाल को मुल्तान का शासक नियुक्त किया।

5. सेवकपाल पर आक्रमण (1007 ई.): महमूद ने आनंदपाल के पुत्र सेवकपाल को मुल्तान का शासक नियुक्त किया परंतु सेवकपाल ने महमूद के लौटते ही स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। महमूद ने सेवकपाल को दण्डित करने के लिये पुनः मुल्तान पर आक्रमण किया। सेवकपाल परास्त होकर बंदी हुआ। उसने महमूद को 4 लाख दिरहम भेंट किये। महमूद ने उसे मुल्तान से खदेड़कर दाऊद को पुनः मुल्तान का शासक नियुक्त किया।

6. नगर कोट की लूट: 1008 ई. में महमूद ने पंजाब के शासक जयपाल के उत्तराधिकारी आनंदपाल पर आक्रमण किया। आनंदपाल ने तुर्कों से लोहा लेने के लिये राजपूत राजाओं का एक संघ बनाया। उसने उज्जैन, ग्वालियर, कालिंजर, दिल्ली तथा अजमेर के राजाओं की सहायता से एक विशाल सेना तैयार की। मुल्तान के खोखरों ने भी आनंदपाल की सहायता की। झेलम नदी के किनारे उन्द नामक स्थान पर दोनों पक्षों में भयानक युद्ध हुआ। इस युद्ध में आनंदपाल का पलड़ा भारी पड़ा किंतु उसका हाथी बिगड़ गया जिससे राजपूत सेना में खलबली मच गई। तभी महमूद ने तीव्र गति से आक्रमण किया जिससे युद्ध की दिशा बदल गई। इस विजय के बाद महमूद ने तीन दिन तक नगर कोट के प्रसिद्ध मंदिर को लूटा और उजाड़ा। लेनपूल ने लिखा है कि नगरकोट की लूट में महमूद को इतना धन मिला कि सारी दुनिया भारत की अपार धनराशि को देखने के लिये चल पड़ी।

7. नारायणपुर पर आक्रमण (1009 ई.): महमूद ने 1009 ई. में नारायणपुर (अलवर) पर आक्रमण किया तथा मंदिरों को लूटकर तोड़ डाला।

8. मुल्तान पर पुनः आक्रमण (1011 ई.): मुल्तान के शासक दाऊद ने स्वतंत्र होने का प्रयास किया। इस पर 1011 ई. में महमूद ने मुल्तान पर आक्रमण किया तथा मुल्तान की सारी सम्पत्ति लूटकर वापस चला गया।

9. त्रिलोचनपाल पर आक्रमण (1013 ई.): महमूद ने 1013 ई. में आनंदपाल के पुत्र त्रिलोचनपाल के विरुद्ध अभियान किया। इस अभियान में उसे विशेष सफलता नहीं मिली। इस पर उसने कुछ समय बाद फिर से आक्रमण किया। इस बार त्रिलोचनपाल परास्त होकर काश्मीर भाग गया। महमूद ने उसका पीछा किया। इस पर काश्मीर के शासक और त्रिलोचन पाल ने संयुक्त रूप से तुर्की सेना का सामना किया किंतु महमूद पुनः सफल हुआ। महमूद ने त्रिलोचनपाल की राजधानी नंदन पर अधिकार जमा लिया तथा वहां पर तुर्क शासन की स्थापना की।

10. थानेश्वर पर आक्रमण (1014 ई.): महमूद ने 1014 ई. में थानेश्वर पर आक्रमण किया। सरस्वती नदी के तट पर भीषण संघर्ष के बाद थानेश्वर का पतन हुआ। इसके बाद महमूद की सेनाओं ने थानेश्वर को लूटा और नष्ट किया। थानेश्वर की प्रसिद्ध चक्रस्वामी की प्रतिमा गजनी ले जाई गई जहां उसे सार्वजनिक चौक में डाल दिया गया।

11. काश्मीर पर आक्रमण: (1015 ई.): 1015 ई. में महमूद ने काश्मीर पर आक्रमण किया। मौसम की खराबी के कारण महमूद को इस आक्रमण में विशेष सफलता नहीं मिली।

12. बुलंदशहर, मथुरा तथा कन्नौज पर आक्रमण (1018 ई.): 1018 ई. में महमूद गजनवी ने बुलंदशहर, मथुरा तथा कन्नौज पर आक्रमण किया। इन स्थानों पर भी उसने मंदिरों तथा नगरों को लूटा और भयंकर लूट मचायी। डॉ. ईश्वरी प्रसाद के अनुसार इस अभियान में उसे 30 लाख दिरहम मूल्य की सम्पत्ति, 55 हजार दास तथा 350 हाथी प्राप्त हुए।

13. कालिंजर पर आक्रमण (1019 ई.): 1019 ई. में महमूद ने कालिंजर के चंदेल राजा पर आक्रमण किया। चंदेल राजा अपने समय का विख्यात एवं वीर राजा था किंतु महमूद के भय से कालिंजर का दुर्ग खाली करके भाग गया। इस प्रकार कालिंजर पर महमूद का अधिकार हो गया। महमूद ने नगर को  जमकर लूटा तथा अपार धन प्राप्त किया।

14. पंजाब पर आक्रमण (1020 ई.): 1020 ई. में महमूद ने पंजाब पर आक्रमण किया तथा पंजाब में नये सिरे से मुस्लिम शासन की स्थापना की।

15. ग्वालियर तथा कालिंजर पर आक्रमण (1022 ई.): महमूद गजनवी ने 1022 ई. में एक बार फिर से ग्वालियर तथा कालिंजर पर आक्रमण किया तथा जमकर लूटपाट की।

16. सोमनाथ पर आक्रमण (1025 ई.): 1025 ई. में महमूद ने सौराष्ट्र के सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया। सोमनाथ भारत के प्रमुख तीर्थों में से एक था। इस मंदिर के रखरखाव के लिये हजारों गांवों का राजस्व प्राप्त होता था। एक कड़े संघर्ष में लगभग 50 हजार लोगों ने अपने प्राण गंवाये। सौराष्ट्र का राजा भीमदेव भाग खड़ा हुआ। महमूद ने उसकी राजधानी को लूटा और उस पर अधिकार कर लिया। अलबरुनी के अनुसार महमूद ने मूर्ति नष्ट कर दी। वह मूर्ति के बचे हुए भाग को सोने, आभूषण और कढ़े हुए वस्त्रों सहित अपने निवास गजनी ले गया। इसका कुछ हिस्सा चक्रस्वामिन् की कांस्य प्रतिमा जिसे वह थाणेश्वर से लाया गया था, के साथ गजनी के चौक में फैंक दिया गया। सोमनाथ की मूर्ति का दूसरा हिस्सा गजनी की मस्जिद के दरवाजे पर पड़ा है। इस मंदिर से महमूद 65 टन सोना ले गया।

17. सिंध के जाटों पर आक्रमण (1027 ई.): जब महमूद सोमनाथ से गजनी लौट रहा था तब सिंध के जाटों ने उसे लूटने का प्रयास किया। इससे नाराज होकर महमूद ने 1027 ई. में सिंध के जाटों को दण्डित करने के लिये उन पर आक्रमण किया। यह उसका अंतिम भारत आक्रमण था। उसने खलीफा को संतुष्ट करने के लिये जो प्रण लिया था, उसकी पालना के लिये वह भारत पर 17 बार भयानक आक्रमण कर चुका था। इन आक्रमणों में उसने भारत के हिन्दू काफिरों को जमकर मौत के घाट उतारा और इस्लाम का झण्डा बुलंद किया। उसने हजारों मंदिरों की मूर्तियों को नष्ट किया। मंदिरों को भग्न किया। लाखों स्त्री-पुरुषों को गुलाम बनाकर तथा रस्सियों से बांधकर अपने देश ले गया। भारत की अपार धन-सम्पत्ति को लूटा और हाथियों, ऊँटों तथा घोड़ों पर बांधकर गजनी ले गया।

गजनी के आक्रमणों का प्रभाव

महमूद गजनी द्वारा लगातार किये गये 17 आक्रमणांे का भारत पर स्थाई और गहरा प्रभाव पड़ा।

1. महमूद के हमलों के कारण भारत को जन-धन की अपार हानि उठानी पड़ी। हजारों हिन्दू उसकी बर्बरता के शिकार हुए

2. भारत की सैन्य शक्ति को गहरा आघात पहुंचा।

3. भारतीयों की लगातार 17 पराजयों से विदेशियों को भारत की सामरिक कमजोरी का ज्ञान हो गया। इससे अन्य आक्रांताओं को भी भारत पर आक्रमण करने का साहस हुआ।

4. भारत के मंदिरों, भवनों, देव प्रतिमाओं के टूट जाने से भारत की वास्तुकला, चित्रकला और शिल्पकला को गहरा आघात पहुंचा।

4. भारत को विपुल आर्थिक हानि उठानी पड़ी। लोग निर्धन हो गये जिनके कारण उनमें जीवन के उद्दात्त भाव नष्ट हो गये। नागरिकों में परस्पर ईर्ष्या-द्वेष तथा कलह उत्पन्न हो गई।

5. देश की राजनीतिक तथा धार्मिक संस्थाओं के बिखर जाने तथा विदेशियों के समक्ष सामूहिक रूप से लज्जित होने से भारतीयों में पराजित जाति होने का मनोविज्ञान उदय हुआ जिसके कारण वे अब संसार के समक्ष तनकर खड़े नहीं हो सकते थे और वे जीवन के हर क्षेत्र में पिछड़ते चले गये।

6. लोगों में पराजय के भाव उत्पन्न होने से भारतीय सभ्यता और संस्कृति की क्षति हुई।

7. भारत का द्वार इस्लाम के प्रसार के लिये पूरी तरह खुल गया। देश में लाखों लोग मुसलमान बना लिये गये।

महमूद गजनवी के आक्रमणों से भारतीयों को सबक

जिस देश के शासक निजी स्वार्थों और घमण्ड के कारण हजारों साल से परस्पर संघर्ष करके एक दूसरे को नष्ट करते रहे हों, उस देश के शासकों तथा उस देश के नागरिकों को महमूद गजनवी ने जी भर कर दण्डित किया। उसके क्रूर कारनामों, हिंसा और रक्तपात के किस्सों को सुनकर मानवता कांप उठती है किंतु भारत के लोगों ने शायद ही कभी इतिहास से कोई सबक लिया हो। यही कारण है कि भारत के पराभव, उत्पीड़न और शोषण का जो सिलसिला महमूद गजननवी ने आरंभ किया वह मुहम्मद गौरी, चंगेज खां, बाबर, अहमदशाह अब्दाली तथा ब्रिटिश  शासकों से होता हुआ आज भी बदस्तूर जारी है। इस देश के लोग कभी एक नहीं हुए। आजादी के बाद भी नहीं। आज की प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था में परस्पर लड़ने वाले शासक मौजूद नहीं हैं किंतु राजनीतिक दल जिस गंदे तरीके से एक दूसरे के शत्रु बने हुए हैं, वे राजपूत काल के उन शासकों की ही याद दिलाते हैं जिन्होंने विदेशियों के हाथों नष्ट हो जाना तो पसंद किया किंतु कभी निजी स्वार्थ तथा अपने घमण्ड को छोड़कर एक दूसरे का साथ नहीं दिया।

महमूद गजनवी के उत्तराधिकारी

1030 ई. में महमूद की मृत्यु हो गई। उसके बाद मासूद, मादूर, इब्राहीम, अलाउद्दीन आदि शासक गजनी के सिंहासन पर बैठे। वे सभी कमजोर शासक थे। उनकी कमजोरी का लाभ उठाकर अफगानिस्तान के गौर नगर पर शासन करने वाले  गयासुद्दीन गौरी ने गजनी पर अधिकार कर लिया। गजनी का शासक खुसरो मलिक गजनी से भागकर पंजाब आ गया। 1186 ई. में गयासुद्दीन के छोटे भाई मुहम्मद गौरी ने मलिक खुसरो को जान से मरवा दिया। इस प्रकार भारत से महमूद वंश का राज्य पूर्णतः समाप्त हो गया।

अध्याय – 34 (ब) : भारत पर तुर्क आक्रमण एवं हिन्दू प्रतिरोध – मुहम्मद गौरी

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गौर साम्राज्य का उत्कर्ष

महमूद गजनवी की मृत्यु के बाद उसका साम्राज्य छिन्न-भिन्न होने लगा तथा एक नवीन राजवंश का उदय हुआ जिसे गौर वंश कहा जाता है। गौर का पहाड़ी क्षेत्र गजनी और हिरात के बीच में स्थित है। गौर प्रदेश के निवासी गौरी कहे जाते हैं। 1173 ई. में गयासुद्दीन गौरी ने स्थायी रूप से गजनी पर अधिकार कर लिया और अपने छोटे भाई शहाबुद्दीन को वहां का शासक नियुक्त किया। यही शहाबुद्दीन, मुहम्मद गौरी के नाम से जाना गया। उसने 1175 ई. से 1206 ई. तक भारत पर कई आक्रमण किये तथा दिल्ली में मुस्लिम शासन की आधारशिला रखी।

मुहम्मद गौरी के भारत आक्रमणों के उद्देश्य

मुहम्मद गौरी ने महमूद गजनवी की भांति भारत पर अनेक आक्रमण किये और सम्पूर्ण उत्तर-पश्चिमी भारत को रौंद डाला। भारत पर उसके आक्रमण के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे-

1. वह पंजाब में गजनवी वंश के लोगों का नाश करना चाहता था ताकि भविष्य में उसके साम्राज्य विस्तार को कोई खतरा नहीं हो।

2. वह भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना करके इतिहास में अपना नाम अमर करना चाहता था।

3. वह भारत की असीम धन-दौलत को प्राप्त करना चाहता था।

4. वह कट्टर मुसलमान था, इसलिये भारत से बुत परस्ती अर्थात् मूर्ति पूजा को समाप्त करना अपना परम कर्त्तव्य समझता था।

इस प्रकार मुहम्मद गौरी द्वारा भारत पर आक्रमण करने के राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक कारण थे। अपने जीवन के 30 वर्षों तक वह इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति में लगा रहा।

मुहम्मद गौरी के आक्रमणों के समय भारत की स्थिति

राजनीतिक दशा

गौरी के आक्रमणों के समय सिंध, मुल्तान और पंजाब में मुसलमान शासक शासन कर रहे थे। उस समय उत्तर भारत में चार प्रमुख हिन्दू राजा शासन कर रहे थे- 1. दिल्ली तथा अजमेर में चौहान वंश का राजा पृथ्वीराज, 2. कन्नौज में गहड़वाल या राठौड़ वंश का राजा जयचंद, 3. बिहार में पाल वंश का राजा …. तथा बंगाल में सेन वंश का राजा लक्ष्मण सेन। इन समस्त राज्यों में परस्पर फूट थी तथा परस्पर संघर्षों में व्यस्त थे। पृथ्वीराज तथा जयचंद में वैमनस्य चरम पर था। दानों एक दूसरे को नीचा दिखाने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देते थे। दक्षिण भारत भी बुरी तरह बिखरा हुआ था। देवगिरि में यादव, वारंगल में काकतीय, द्वारसमुद्र में होयसल तथा मदुरा में पाण्ड्य वंश का शासन था। ये भी परस्पर युद्ध करके एक दूसरे को नष्ट करके अपनी आनुवांशिक परम्परा निभा रहे थे।

सामाजिक दशा

सामाजिक दृष्टि से भी भारत की दशा बहुत शोचनीय थी। समाज का नैतिक पतन हो चुका था। शत्रु से देश की रक्षा और युद्ध का समस्त भार पहले की ही तरह अब भी राजपूत जाति पर था। शेष प्रजा इससे उदासीन थी। शासकों को विलासिता का घुन भी खाये जा रहा था। राष्ट्रीय उत्साह पहले की ही भांति पूर्णतः विलुप्त था। कुछ शासकों में देश तथा धर्म के लिये मर मिटने का उत्साह था किंतु वे परस्पर फूट का शिकार थे। स्त्रियों की सामाजिक दशा, उत्तर वैदिक काल की अपेक्षा काफी गिर चुकी थी।

आर्थिक दशा

यद्यपि महमूद गजनवी भारत की आर्थिक सम्पदा को बड़े स्तर पर लूटने में सफल रहा था तथापि कृषि, उद्योग एवं व्यापार की उन्नत अवस्था के कारण भारत फिर से संभल गया था। राजवंश फिर से धनी हो गये थे और जनता का जीवन साधारण होते हुए भी सुखी एवं समृद्ध था।

धार्मिक दशा

इस समय हिन्दू धर्म की शैव तथा वैष्णव शाखायें शिखर पर थीं। बौद्ध धर्म का लगभग नाश हो चुका था। जैन धर्म दक्षिण भारत तथा पश्चिम के मरुस्थल में जीवित था। सिंध, मुलतान तथा पंजाब में मुस्लिम शासित क्षेत्रों में इस्लाम के अनुयायी भी निवास करते थे।

इस प्रकार देश की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक परिस्थतियां ऐसी नहीं थीं जिनके बल पर भारत, मुहम्मद गौरी जैसे दुर्दान्त आक्रांता का सामना कर सकता।

मुहम्मद गौरी के भारत पर आक्रमण

मुल्तान तथा सिंध पर आक्रमण

मुहम्मद गौरी का भारत पर पहला आक्रमण 1175 ई. में मुल्तान पर हुआ। मुल्तान पर उस समय शिया मुसलमान करमाथियों का शासन था। मुहम्मद गौरी ने उनको परास्त करके मुल्तान पर अधिकार कर लिया। उसी वर्ष गौरी ने ऊपरी सिंध के कच्छ क्षेत्र पर आक्रमण किया तथा उसे अपने अधिकार में ले लिया। इस आक्रमण के 7 साल बाद 1182 ई. में उसने निचले सिंध पर आक्रमण करके देवल के शासक को अपनी अधीनता स्वीकार करने पर विवश किया।

गुजरात पर आक्रमण

मुलतान पर आक्रमण के पश्चात् गौरी का अगला आक्रमण 1178 ई. में गुजरात के चालुक्य राज्य पर हुआ जो उस समय एक धनी राज्य था। गुजरात पर इस समय मूलराज शासन कर रहा था। उसकी राजधानी अन्हिलवाड़ा थी। गौरी मुल्तान, कच्छ और पश्चिमी राजपूताना में होकर आबू के निकट पहुंचा। वहां कयाद्रा गांव के निकट मूलराज (द्वितीय) की सेना से उसका युद्ध हुआ। इस युद्ध में गौरी बुरी तरह परास्त होकर अपनी जान बचाकर भाग गया। यह भारत में उसकी पहली पराजय थी।

पंजाब पर अधिकार

गौरी ने गुजरात की असफलता के बाद पंजाब के रास्ते भारत के आंतरिक भागों पर आक्रमण करने की योजना बनाई। उस समय पंजाब पर गजनवी वंश का खुसरव मलिक शासन कर रहा था। गौरी ने 1179 ई. में पेशावर पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। उसके बाद 1181 ई. में गौरी ने दूसरा तथा 1185 ई. में तीसरा आक्रमण करके स्याल कोट तक का प्रदेश जीत लिया। अंत में लाहौर को भी उसने अपने प्रांत का अंग बना लिया। पंजाब पर अधिकार कर लेने से गौरी के अधिकार क्षेत्र की सीमा दिल्ली एवं अजमेर के चौहान शासक पृथ्वीराज (तृतीय) से आ लगीं। मुहम्मद गौरी ने चौहान साम्राज्य पर आक्रमण करने का निर्णय लिया।

पृथ्वीराज चौहान (तृतीय)

ई.1179 में अजमेर के प्रतापी चौहान शासक सोमेश्वर की मृत्यु होने पर उसका 11 वर्षीय पुत्र पृथ्वीराज (तृतीय) अजमेर की गद्दी पर बैठा। उसने 1192 ई. तक उत्तर भारत के बड़े भू-भाग पर शासन किया। भारत के इतिहास में वह पृथ्वीराज चौहान तथा रायपिथौरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। गद्दी पर बैठते समय अल्प वयस्क होने के कारण उसकी माता कर्पूर देवी अजमेर का शासन चलाने लगी। कर्पूर देवी, चेदि देश की राजकुमारी थी तथा कुशल राजनीतिज्ञ थी। उसने बड़ी योग्यता से अपने अल्पवयस्क पुत्र के राज्य को संभाला। उसने दाहिमा राजपूत कदम्बवास को अपना प्रधानमंत्री बनाया जिसे केम्बवास तथा कैमास भी कहते हैं। कदम्बवास ने अपने स्वामि के षट्गुणों की रक्षा की तथा राज्य की रक्षा के लिये चारों ओर सेनाएं भेजीं। वह विद्यानुरागी था जिसे पद्मप्रभ तथा जिनपति सूरि के शास्त्रार्थ की अध्यक्षता का गौरव प्राप्त था। उसने बड़ी राजभक्ति से शासन किया। नागों के दमन में कदम्बवास की सेवाएं श्लाघनीय थीं। चंदेल तथा मोहिलों ने भी इस काल में शाकम्भरी राज्य की बड़ी सेवा की। कर्पूरदेवी का चाचा भुवनायक मल्ल अथवा भुवनमल्ल पृथ्वीराज की देखभाल के लिये गुजरात से अजमेर आ गया तथा उसके कल्याण हेतु कार्य करने लगा। जिस प्रकार गरुड़ ने राम और लक्ष्मण को मेघनाद के नागपाश से मुक्त किया था, उसी प्रकार भुवनमल्ल ने पृथ्वीराज को शत्रुओं से मुक्त रखा।

कर्पूरदेवी के संरक्षण से मुक्ति

कर्पूरदेवी का संरक्षण काल कम समय का था किंतु इस काल में अजमेर और भी सम्पन्न और समृद्ध नगर बन गया। पृथ्वीराज ने कई भाषाओं और शास्त्रों का अध्ययन किया तथा अपनी माता के निर्देशन में अपनी प्रतिभा को अधिक सम्पन्न बनाया। इसी अवधि में उसने राज्य कार्य में दक्षता अर्जित की तथा अपनी भावी योजनाओं को निर्धारित किया जो उसकी निरंतर विजय योजनाओं से प्रमाणित होता है। पृथ्वीराज कालीन प्रारंभिक विषयों एवं शासन सुव्यवस्थाओं का श्रेय कर्पूरदेवी को दिया जा सकता है जिसने अपने विवेक से अच्छे अधिकारियों को अपना सहयोगी चुना और कार्यों को इस प्रकार संचालित किया जिससे बालक पृथ्वीराज के भावी कार्यक्रम को बल मिले। पृथ्वीराज विजय के अनुसार कदम्बवास का जीवन पृथ्वीराज व उसकी माता कर्पूरदेवी के प्रति समर्पित था। कदम्बवास की ठोड़ी कुछ आगे निकली हुई थी। वह राज्य की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखता था। कहीं से गड़बड़ी की सूचना पाते ही तुरंत सेना भेजकर स्थिति को नियंत्रण में करता था।

कदम्बवास की मृत्यु

संभवतः संरक्षण का समय एक वर्ष से अधिक न रह सका तथा ई.1178 में पृथ्वीराज ने स्वयं सभी कार्यों को अपने हाथ में ले लिया। इस स्थिति का कारण उसकी महत्त्वाकांक्षा एवं कार्य संचालन की क्षमता उत्पन्न होना हो सकता है। संभवतः कदम्बवास की शक्ति को अपने पूर्ण अधिकार से काम करने में बाधक समझ कर उसने कुछ अन्य विश्वस्त अधिकारियों की नियुक्ति की जिनमें प्रतापसिंह विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भाग्यवश कदम्बवास की मृत्यु ने कदम्बवास को पृथ्वीराज के मार्ग से हटाया। रासो के लेखक ने कदम्बवास की हत्या स्वयं पृथ्वीराज द्वारा होना लिखा है तथा पृथ्वीराज प्रबन्ध में उसकी मृत्यु का कारण प्रतापसिंह को बताया है। डॉ. दशरथ शर्मा पृथ्वीराज या प्रतापसिंह को कदम्बवास की मृत्यु का कारण नहीं मानते क्योंकि हत्या सम्बन्धी विवरण बाद के ग्रंथों पर आधारित है। मृत्यु सम्बन्धी कथाओं में सत्यता का कितना अंश है, यह कहना कठिन है किंतु पृथ्वीराज की शक्ति संगठन की योजनाएं इस ओर संकेत करती हैं कि पृथ्वीराज ने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति में कदम्बवास को बाधक अवश्य माना हो तथा उससे मुक्ति का मार्ग ढूंढ निकाला हो। इस कार्य में प्रतापसिंह का सहयोग मिलना भी असम्भव नहीं दिखता। इस कल्पना की पुष्टि कदम्बवास के ई.1180 के पश्चात् कहीं भी महत्त्वपूर्ण घटनाओं के साथ उल्लेख के अभाव से होती है।

पृथ्वीराज चौहान की उपलब्ध्यिाँ

अपरगांग्य तथा नागार्जुन का दमन

उच्च पदों पर विश्वस्त अधिकारियों को नियुक्त करने के बाद पृथ्वीराज ने अपनी विजय नीति को आरंभ करने का बीड़ा उठाया। पृथ्वीराज के गद्दी पर बैठने के कुछ समय बाद उसके चाचा अपरगांग्य ने विद्रोह का झण्डा उठाया। पृथ्वीराज ने उसे परास्त किया तथा उसकी हत्या करवाई। इस पर पृथ्वीराज के दूसरे चाचा तथा अपरगांग्य के छोटे भाई नागार्जुन ने विद्रोह को प्रज्ज्वलित किया तथा गुड़गांव पर अधिकार कर लिया। पृथ्वीराज ने गुड़गांव पर भी आक्रमण किया। नागार्जुन गुड़गांव से भाग निकला किंतु उसके स्त्री, बच्चे और परिवार के अन्य सदस्य पृथ्वीराज के हाथ लग गये। पृथ्वीराज ने उन्हें बंदी बना लिया। पृथ्वीराज बहुत से विद्रोहियों को पकड़कर अजमेर ले आया तथा उन्हें मौत के घाट उतार कर उनके मुण्ड नगर की प्राचीरों और द्वारों पर लगाये गये जिससे भविष्य में अन्य शत्रु सिर उठाने की हिम्मत न कर सकें। नागार्जुन का क्या हुआ, कुछ विवरण ज्ञात नहीं होता।

भण्डानकों का दमन

राज्य के उत्तरी भाग में मथुरा, भरतपुर तथा अलवर के निकट भण्डानक जाति रहती थी। विग्रहराज (चतुर्थ) ने इन्हें अपने अधीन किया था किंतु उसे विशेष सफलता नहीं मिली। ई.1182 के लगभग पृथ्वीराज चौहान दिगिवजय के लिये निकला। उसने भण्डानकों पर आक्रमण किया तथा उनकी बस्तियां घेर लीं। बहुत से भण्डानक मारे गये और बहुत से उत्तर की ओर भाग गये। इस आक्रमण का वर्णन समसामयिक लेखक जिनपति सूरि ने किया है। इस आक्रमण के बाद भण्डानकों की शक्ति सदा के लिये क्षीण हो गई। इसका परिणाम यह हुआ कि पृथ्वीराज के राज्य की दो धुरियां- अजमेर तथा दिल्ली एक राजनीतिक सूत्र में बंध गईं।

चंदेलों का दमन

अब पृथ्वीराज चौहान के राज्य की सीमायें उत्तर में मुस्लिम सत्ता से, दक्षिण-पश्चिम में गुजरात से, पूर्व में चंदेलों के राज्य से जा मिलीं। चंदेलों के राज्य में बुन्देलखण्ड, जेजाकभुक्ति तथा महोबा स्थित थे। कहा जाता है कि एक बार चंदेलों के राजा परमारदी देव ने पृथ्वीराज के कुछ घायल सैनिकों को मरवा दिया। उनकी हत्या का बदला लेने के लिये पृथ्वीराज चौहान ने चंदेलों पर आक्रमण किया। उसने जब चंदेल राज्य को लूटना आरंभ किया तो परमारदी भयभीत हो गया। परमारदी ने अपने सेनापतियों आल्हा तथा ऊदल को पृथ्वीराज के विरुद्ध रणक्षेत्र में उतारा। तुमुल युद्ध के पश्चात् परमारदी के सेनापति परास्त हुए। आल्हा तथा ऊदल ने इस युद्ध में अद्भुत पराक्रम का प्रदर्शन किया। उनके गुणगान सैंकड़ों साल से लोक गीतों में किये जाते हैं। आल्हा की गणना सप्त चिरंजीवियों में की जाती है। महोबा राज्य का बहुत सा भूभाग पृथ्वीराज चौहान के हाथ लगा। उसने अपने सामंत पंजुनराय को महोबा का अधिकारी नियुक्त किया।

ई.1182 के मदनपुर लेख के अनुसार पृथ्वीराज ने जेजाकभुक्ति के प्रवेश को नष्ट किया। सारंगधर पद्धति और प्रबंध चिंतामणि के अनुसार परमारदी ने मुख में तृण लेकर पृथ्वीराज से क्षमा याचना की। चंदेलों के राज्य की दूसरी तरफ की सीमा पर कन्नौज के गहरवारों का शासन था। माऊ शिलालेख के अनुसार महोबा और कन्नौज में मैत्री सम्बन्ध था। चंदेलों और गहड़वालों का संगठन, पृथ्वीराज के लिये सैनिक व्यय का कारण बन गया।

चौहान-चौलुक्य संघर्ष

पृथ्वीराज (तृतीय) के समय में चौहान-चौलुक्य संघर्ष एक बार पुनः उठ खड़ा हुआ। पृथ्वीराज ने आबू के सांखला परमार नरेश की पुत्री इच्छिना से विवाह कर लिया। इससे गुजरात का चौलुक्य राजा भीमदेव (द्वितीय) पृथ्वीराज से नाराज हो गया क्योंकि भीमदेव भी इच्छिना से विवाह करना चाहता था। डॉ. ओझा इस कथन को सत्य नहीं मानते क्योंकि ओझा के अनुसार उस समय आबू में धारावर्ष परमार का शासन था न कि सांखला परमार का।

पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज के चाचा कान्हड़देव ने भीमदेव के चाचा सारंगदेव के सात पुत्रों की हत्या कर दी। इससे नाराज होकर भीमदेव ने अजमेर पर आक्रमण कर दिया और सोमेश्वर चौहान की हत्या करके नागौर पर अधिकार कर लिया। पृथ्वीराज ने अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिये भीमदेव को युद्ध में परास्त कर मार डाला और नागौर पर पुनः अधिकार कर लिया। इन कथानकों में कोई ऐतिहासिक महत्त्व नहीं है क्योंकि सोमेश्वर की मृत्यु किसी युद्ध में नहीं हुई थी तथा भीमदेव (द्वितीय) ई.1241 के लगभग तक जीवित था।

चौहान-चालुक्य संघर्ष के फिर से उठ खड़े होने का कारण जो भी हो किंतु वास्तविकता यह भी थी कि चौहानों तथा चौलुक्यों के राज्यों की सीमायें मारवाड़ में आकर मिलती थीं। इधर पृथ्वीराज (तृतीय) और उधर भीमदेव (द्वितीय), दोनों ही महत्त्वाकांक्षी शासक थे। इसलिये दोनों में युद्ध अवश्यम्भावी था। खतरगच्छ पट्टावली में ई.1187 में पृथ्वीराज द्वारा गुजरात अभियान करने का वर्णन मिलता है। बीरबल अभिलेख से इसकी पुष्टि होती है। कुछ साक्ष्य इस युद्ध की तिथि ई.1184 बताते हैं। इस युद्ध में चौलुक्यों की पराजय हो गई। इस पर चौलुक्यों के महामंत्री जगदेव प्रतिहार के प्रयासों से चौहानों एवं चौलुक्यों में संधि हो गई। संधि की शर्तों के अनुसार चौलुक्यों ने पृथ्वीराज चौहान को काफी धन दिया।

खतरगच्छ पट्टावली के अनुसार अजमेर राज्य के कुछ धनी व्यक्ति जब इस युद्ध के बाद गुजरात गये तो गुजरात के दण्डनायक ने उनसे भारी राशि वसूलने का प्रयास किया। जब चौलुक्यों के महामंत्री जगदेव प्रतिहार को यह बात ज्ञात हुई तो उसने दण्डनायक को लताड़ा क्योंकि जगदेव के प्रयासों से चौलुक्यों एवं चौहानों के बीच संधि हुई थी और वह नहीं चाहता था कि यह संधि टूटे। इसलिये जगदेव ने दण्डनायक को धमकाया कि यदि तूने चौहान साम्राज्य के नागरिकों को तंग किया तो मैं तुझे गधे के पेट में सिलवा दूंगा। वि.सं.1244 के वेरवल से मिले जगदेव प्रतिहार के लेख में इससे पूर्व भी अनेक बार पृथ्वीराज से परास्त होना सिद्ध होता है। इस अभियान में ई.1187 में पृथ्वीराज चौहान ने आबू के परमार शासक धारावर्ष को भी हराया।

चौहान-गहड़वाल संघर्ष

जैसे दक्षिण में चौलुक्य चौहानों के शत्रु थे, वैसे ही उत्तर पूर्व में गहड़वाल चौहानों के शत्रु थे। जब पृथ्वीराज ने नागों, भण्डानकों तथा चंदेलों को परास्त कर दिया तो कन्नौज के गहड़वाल शासक जयचंद्र में चौहानराज के प्रति ईर्ष्या जागृत हुई। कुछ भाटों के अनुसार दिल्ली के राजा अनंगपाल के कोई लड़का नहीं था अतः अनंगपाल तोमर ने दिल्ली का राज्य भी अपने दौहित्र पृथ्वीराज चौहान को दे दिया। अनंगपाल की दूसरी पुत्री का विवाह कन्नौज के राजा विजयपाल से हुआ था जिसका पुत्र जयचन्द हुआ। इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) तथा जयचन्द मौसेरे भाई थे। जब अनंगपाल ने पृथ्वीराज को दिल्ली का राज्य देने की घोषणा की तो जयचन्द पृथ्वीराज का शत्रु हो गया और उसे नीचा दिखाने के अवसर खोजने लगा। पृथ्वीराज चौहान स्वयं तो सुन्दर नहीं था किन्तु उसमें सौन्दर्य बोध अच्छा था। उसने पांच सुन्दर स्त्रियों से विवाह किये जो एक से बढ़ कर एक रमणीय थीं।

पृथ्वीराज रासो के लेखक कवि चन्द बरदाई ने चौहान तथा गहड़वाल संघर्ष का कारण जयचंद की पुत्री संयोगिता को बताया है। कथा का सारांश इस प्रकार से है- पृथ्वीराज की वीरता के किस्से सुनकर जयचन्द की पुत्री संयोगिता ने मन ही मन उसे पति स्वीकार कर लिया। जब राजा जयचन्द ने संयोगिता के विवाह के लिये स्वयंवर का आयोजन किया तो पृथ्वीराज को आमन्त्रित नहीं किया गया। जयचंद ने पृथ्वीराज की लोहे की मूर्ति बनवाकर स्वंयवर शाला के बाहर द्वारपाल की जगह खड़ी कर दी। संयोगिता को जब इस स्वयंवर के आयोजन की सूचना मिली तो उसने पृथ्वीराज को संदेश भिजवाया कि वह पृथ्वीराज से ही विवाह करना चाहती है। पृथ्वीराज अपने विश्वस्त अनुचरों के साथ वेष बदलकर कन्नौज पंहुचा। संयोगिता ने प्रीत का प्रण निबाहा और अपने पिता के क्रोध की चिन्ता किये बिना, स्वयंवर की माला पृथ्वीराज की मूर्ति के गले में डाल दी। जब पृथ्वीराज को संयोगिता के अनुराग की गहराई का ज्ञान हुआ तो वह स्वयंवर शाला से ही संयोगिता को उठा लाया। कन्नौज की विशाल सेना उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकी। पृथ्वीराज के कई विश्वस्त और पराक्रमी सरदार कन्नौज की सेना से लड़ते रहे ताकि राजा पृथ्वीराज, कन्नौज की सेना की पकड़ से बाहर हो जाये। सरदार अपने स्वामी की रक्षा के लिए तिल-तिलकर कट मरे। राजा अपनी प्रेयसी को लेकर राजधानी को सुरक्षित पहुँच गया।

भाटों की कल्पना अथवा वास्तविकता

प्रेम, बलिदान और शौर्य की इस प्रेम गाथा को पृथ्वीराज रासो में बहुत ही सुन्दर विधि से अंकित किया है। सुप्रसिद्ध उपन्यासकार आचार्य चतुरसेन ने अपने उपन्यास पूर्णाहुति में भी इस प्रेमगाथा को बड़े सुन्दर तरीके से लिखा है। रोमिला थापर, आर. एस. त्रिपाठी, गौरीशंकर ओझा आदि इतिहासकारों ने इस घटना के सत्य होने में संदेह किया है क्योंकि संयोगिता का वर्णन रम्भामंजरी में तथा जयचंद्र के शिलालेखों में नहीं मिलता। इन इतिहासकारों के अनुसार संयोगिता की कथा 16वीं सदी के किसी भाट की कल्पना मात्र है। दूसरी ओर सी. वी. वैद्य, गोपीनाथ शर्मा तथा डा. दशरथ शर्मा आदि इतिहासकारों ने इस घटना को सही माना है।

रहस्यमय शासक

पृथ्वीराज चौहान का जीवन शौर्य और वीरता की अनुपम कहानी है। वह वीर, विद्यानुरागी, विद्वानों का आश्रयदाता तथा प्रेम में प्राणांे की बाजी लगा देने वाला था। उसकी उज्जवल कीर्ति भारतीय इतिहास के गगन में धु्रव नक्षत्र की भांति दैदीप्यमान है। आज आठ सौ साल बाद भी वह कोटि-कोटि हिन्दुओं के हदय का सम्राट है। उसे अन्तिम हिन्दू सम्राट कहा जाता है। उसके बाद इतना पराक्रमी हिन्दू राजा इस धरती पर नहीं हुआ। उसके दरबार में विद्वानों का एक बहुत बड़ा समूह रहता था। उसे छः भाषायें आती थीं तथा वह प्रतिदिन व्यायाम करता था। वह उदारमना तथा विराट व्यक्तित्व का स्वामी था। चितौड़ का स्वामी समरसी (समरसिंह) उसका सच्चा मित्र, हितैषी और शुभचिंतक था। पृथ्वीराज का राज्य सतलज नदी से बेतवा तक तथा हिमालय के नीचे के भागों से लेकर आबू तक विस्तृत था। जब तक संसार में शौर्य जीवित रहेगा तब तक पृथ्वीराज चौहान का नाम भी जीवित रहेगा। उसकी सभा में धार्मिक एवं साहित्यक चर्चाएं होती थीं। उसके काल में कार्तिक शुक्ला 10 वि.सं. 1239 (ई.1182) में अजमेर में खतरगच्छ के जैन आचार्य जिनपति सूरि तथा उपकेशगच्छ के आचार्य पद्मप्रभ के बीच शास्त्रार्थ हुआ। ई.1190 में जयानक ने सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘पृथ्वीराज विजय’ की रचना की। डा. दशरथ शर्मा के अनुसार, अपने गुणों के आधार पर पृथ्वीराज चौहान योग्य व रहस्यमय शासक था।

शहाबुद्दीन गौरी द्वारा चौहान साम्राज्य पर आक्रमण

पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच 21 लड़ाइयां हुईं जिनमें चौहान विजयी रहे। हम्मीर महाकाव्य ने पृथ्वीराज द्वारा सात बार गौरी को परास्त किया जाना लिखा है। पृथ्वीराज प्रबन्ध आठ बार हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष का उल्लेख करता है। प्रबन्ध कोष का लेखक बीस बार गौरी को पृथ्वीराज द्वारा कैद करके मुक्त करना बताता है। सुर्जन चरित्र में 21 बार और प्रबन्ध चिन्तामणि में 23 बार गौरी का हारना अंकित है।

तराइन का प्रथम युद्ध

ई.1189 में मुहम्मद गौरी ने भटिण्डा का दुर्ग हिन्दुओं से छीन लिया। उस समय यह दुर्ग चौहानों के अधीन था। पृथ्वीराज उस समय तो चुप बैठा रहा किन्तु ई.1191 में जब मुहम्मद गोरी, तबरहिंद (सरहिंद) जीतने के बाद आगे बढ़ा तो पृथ्वीराज ने करनाल जिले के तराइन के मैदान में उसका रास्ता रोका। यह लड़ाई भारत के इतिहास में तराइन की प्रथम लड़ाई के नाम से जानी जाती है। युद्ध के मैदान में गौरी का सामना दिल्ली के राजा गोविंदराय से हुआ। गौरी ने गोविंदराय पर भाला फैंक कर मारा जिससे गोविंदराय के दो दांत बाहर निकल गये। गोविंदराय ने भी प्रत्युत्तर में अपना भाला गौरी पर देकर मारा। इस वार से गौरी बुरी तरह घायल हो गया और उसके प्राणों पर संकट आ खड़ा हुआ। यह देखकर एक खिलजी सैनिक उसे घोड़े पर बैठाकर मैदान से ले भागा। बची हुई फौज में भगदड़ मच गई। राजपूतों ने चालीस मील तक गौरी की सेना का पीछा किया। मुहम्मद गौरी लाहौर पहुँचा तथा अपने घावों का उपचार करके गजनी लौट गया। पृथ्वीराज ने आगे बढ़कर तबरहिंद का दुर्ग गौरी के सेनापति काजी जियाउद्दीन से छीन लिया। काजी को बंदी बनाकर अजमेर लाया गया जहाँ उससे विपुल धन लेकर उसे गजनी लौट जाने की अनुमति दे दी गई।

तराइन का द्वितीय युद्ध

गजनी पहुँचने के बाद पूरे एक साल तक मुहम्मद गौरी अपनी सेना में वृद्धि करता रहा। जब उसकी सेना में 1,20,000 सैनिक जमा हो गये तो 1192 ई. में वह पुनः पृथ्वीराज से लड़ने के लिये भारत की ओर चल दिया। इस बीच उसने अपनी सहायता के लिये कन्नौज के राजा जयचंद को भी अपनी ओर मिला लिया। हर बिलास शारदा के अनुसार कन्नौज के राठौड़ों तथा गुजरात के सोलंकियों ने एक साथ षड़यंत्र करके पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिये शहाबुद्दीन को आमंत्रित किया। गौरी को कन्नौज तथा जम्मू के राजाओं द्वारा सैन्य सहायता उपलब्ध करवाई गई।

संधि का छलावा

जब गौरी लाहौर पहुँचा तो उसने अपना दूत अजमेर भेजा तथा पृथ्वीराज से कहलवाया कि वह इस्लाम स्वीकार कर ले और गौरी की अधीनता मान ले। पृथ्वीराज ने उसे प्रत्युत्तर भिजवाया कि वह गजनी लौट जाये अन्यथा उसकी भेंट युद्ध स्थल में होगी। मुहम्मद गोरी, पृथ्वीराज को छल से जीतना चाहता था। इसलिये उसने अपना दूत दुबारा अजमेर भेजकर कहलवाया कि वह युद्ध की अपेक्षा सन्धि को अच्छा मानता है इसलिये उसके सम्बन्ध में उसने एक दूत अपने भाई के पास गजनी भेजा है। ज्योंही उसे गजनी से आदेश प्राप्त हो जायेंगे, वह स्वदेश लौट जायेगा तथा पंजाब, मुल्तान एवं सरहिंद को लेकर संतुष्ट हो जायेगा।

इस संधि वार्ता ने पृथ्वीराज को भुलावे में डाल दिया। वह थोड़ी सी सेना लेकर तराइन की ओर बढ़ा, बाकी सेना जो सेनापति स्कंद के साथ थी, वह उसके साथ न जा सकी। पृथ्वीराज का दूसरा सेनाध्यक्ष उदयराज भी समय पर अजमेर से रवाना न हो सका। पृथ्वीराज का मंत्री सोमेश्वर जो युद्ध के पक्ष में न था तथा पृथ्वीराज के द्वारा दण्डित किया गया था, वह अजमेर से रवाना होकर शत्रु से जाकर मिल गया। जब पृथ्वीराज की सेना तराइन के मैदान में पहुँची तो संधि वार्ता के भ्रम में आनंद में मग्न हो गई तथा रात भर उत्सव मनाती रही। इसके विपरीत गौरी ने शत्रुओं को भ्रम में डाले रखने के लिये अपने शिविर में भी रात भर आग जलाये रखी और अपने सैनिकों को शत्रुदल के चारों ओर घेरा डालने के लिये रवाना कर दिया। ज्योंही प्रभात हुआ, राजपूत सैनिक शौचादि के लिये बिखर गये। ठीक इसी समय तुर्कों ने अजमेर की सेना पर आक्रमण कर दिया। चारों ओर भगदड़ मच गई। पृथ्वीराज जो हाथी पर चढ़कर युद्ध में लड़ने चला था, अपने घोड़े पर बैठकर शत्रु दल से लड़ता हुआ मैदान से भाग निकला। वह सिरसा के आसपास गौरी के सैनिकों के हाथ लग गया और मारा गया। गोविंदराय और अनेक सामंत वीर योद्धाओं की भांति लड़ते हुए काम आये।

सम्राट पृथ्वीराज चौहान की हत्या

तराइन की पहली लड़ाई का अमर विजेता दिल्ली का राजा तोमर गोविन्दराज तथा चितौड़ का राजा समरसिंह भी तराइन की दूसरी लड़ाई में मारे गये। तुर्कों ने भागती हुई हिन्दू सेना का पीछा किया तथा उन्हें बिखेर दिया। पृथ्वीराज के अंत के सम्बन्ध में अलग-अलग विवरण मिलते हैं।

पृथ्वीराज रासो में पृथ्वीराज का अंत गजनी में दिखाया गया है। इस विवरण के अनुसार पृथ्वीराज पकड़ लिया गया और गजनी ले जाया गया जहॉं उसकी आंखें फोड़ दी गईं। पृथ्वीराज का बाल सखा और दरबारी कवि चन्द बरदाई भी उसके साथ था। उसने पृथ्वीराज की मृत्यु निश्चित जानकर शत्रु के विनाश का कार्यक्रम बनाया। कवि चन्द बरदाई ने गौरी से निवेदन किया कि आंखें फूट जाने पर भी राजा पृथ्वीराज शब्द भेदी निशाना साध कर लक्ष्य वेध सकता है। इस मनोरंजक दृश्य को देखने के लिये गौरी ने एक विशाल आयोजन किया। एक ऊँचे मंच पर बैठकर उसने अंधे राजा पृथ्वीराज को लक्ष्य वेधने का संकेत दिया। जैसे ही गौरी के अनुचर ने लक्ष्य पर शब्द उत्पन्न किया, कवि चन्द बरदाई ने यह दोहा पढ़ा-

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण

ता उपर सुल्तान है मत चूके चौहान।

गौरी की स्थिति का आकलन करके पृथ्वीराज ने तीर छोड़ा जो गौरी के कण्ठ में जाकर लगा और उसी क्षण उसके प्राण पंखेरू उड़ गये। शत्रु का विनाश हुआ जानकर और उसके सैनिकों के हाथों में पड़कर अपमानजनक मृत्यु से बचने के लिए कवि चन्द बरदाई ने राजा पृथ्वीराज के पेट में अपनी कटार भौंक दी और अगले ही क्षण उसने वह कटार अपने पेट में भौंक ली। इस प्रकार दोनों अनन्य मित्र वीर लोक को गमन कर गये। उस समय पृथ्वीराज की आयु मात्र 26 वर्ष थी। इतिहासकारों ने चंद बरदाई के इस विवरण को सत्य नहीं माना है क्योंकि इस ग्रंथ के अतिरिक्त इस विवरण की और किसी समकालीन स्रोत से पुष्टि नहीं होती।

हम्मीर महाकाव्य में पृथ्वीराज को कैद करना और अंत में उसको मरवा देने का उल्लेख है। विरुद्धविधिविध्वंस में पृथ्वीराज का युद्ध स्थल में काम आना लिखा है। पृथ्वीराज प्रबन्ध का लेखक लिखता है कि विजयी शत्रु पृथ्वीराज को अजमेर ले आये और वहाँ उसे एक महल में बंदी के रूप में रखा गया। इसी महल के सामने मुहम्मद गौरी अपना दरबार लगाता था जिसको देखकर पृथ्वीराज को बड़ा दुःख होता था। एक दिन उसने मंत्री प्रतापसिंह से धनुष-बाण लाने को कहा ताकि वह अपने शत्रु का अंत कर दे। मंत्री प्रतापसिंह ने उसे धनुष-बाण लाकर दे दिये तथा उसकी सूचना गौरी को दे दी। पृथ्वीराज की परीक्षा लेने के लिये गौरी की मूर्ति एक स्थान पर रख दी गई जिसको पृथ्वीराज ने अपने बाण से तोड़ दिया। अंत में गौरी ने पृथ्वीराज को गड्ढे में फिंकवा दिया जहाँ पत्थरों की चोटों से उसका अंत कर दिया गया।

दो समसामयिक लेखक यूफी तथा हसन निजामी पृथ्वीराज को कैद किया जाना तो लिखते हैं किंतु निजामी यह भी लिखता है कि जब बंदी पृथ्वीराज जो इस्लाम का शत्रु था, सुल्तान के विरुद्ध षड़यंत्र करता हुआ पाया गया तो उसकी हत्या कर दी गई। मिनहाज उस सिराज उसके भागने पर पकड़ा जाना और फिर मरवाया जाना लिखता है। फरिश्ता भी इसी कथन का अनुमोदन करता है। अबुल फजल लिखता है कि पृथ्वीराज को सुलतान गजनी ले गया जहाँ पृथ्वीराज की मृत्यु हो गई।

उपरोक्त सारे विवरणों में से केवल यूफी और निजामी समसामयिक हैं, शेष लेखक बाद में हुए हैं किंतु यूफी और निजामी पृथ्वीराज के अंत के बारे में अधिक जानकारी नहीं देते। निजामी लिखता है कि पृथ्वीराज को कैद किया गया तथा किसी षड़यंत्र में भाग लेने का दोषी पाये जाने पर मरवा दिया गया। यह विवरण पृथ्वीराज प्रबन्ध के विवरण से मेल खाता है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि पृथ्वीराज को युद्ध क्षेत्र से पकड़कर अजमेर लाया गया तथा कुछ दिनों तक बंदी बनाकर रखने के बाद अजमेर में ही उसकी हत्या की गई।

मुहम्मद गौरी की सेनाओं द्वारा अजमेर का विध्वंस

ई.1192 में शहाबुद्दीन गौरी के समकालीन लेखक हसन निजामी ने अपनी पुस्तक ताजुल मासिर में अजमेर नगर का वर्णन करते हुए इसकी मिट्टी, हवा, पानी, जंगल तथा पहाड़ों की तुलना स्वर्ग से की है। शहाबुद्दीन गौरी ने इस स्वर्ग को तोड़ दिया। शहाबुद्दीन की सेनाओं ने अजमेर नगर में विध्वंसकारी ताण्डव किया। नगर में स्थित अनेक मन्दिर नष्ट कर दिये। बहुत से देव मंदिरों के खम्भों एवं मूर्तियों को तोड़ डाला। वीसलदेव द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला एवं सरस्वती मंदिर को तोेड़ कर उसके एक हिस्से को मस्जिद में बदल दिया। यह भवन उस समय धरती पर स्थित सुंदरतम भवनों में से एक था किंतु इस विंध्वस के बाद यह विस्मृति के गर्त में चला गया तथा छः सौ साल तक किसी ने इसकी सुधि नहीं ली। उन दिनों अजमेर में इन्द्रसेन जैनी का मंदिर हुआ करता था। गौरी की सेनाओं ने उसे नष्ट कर दिया। शहाबुद्दीन गौरी ने अजमेर के प्रमुख व्यक्तियों को पकड़कर उनकी हत्या कर दी।

भारत के इतिहास का प्राचीन काल समाप्त

ई.1192 में चौहान पृथ्वीराज (तृतीय) की मृत्यु के साथ ही भारत का इतिहास मध्यकाल में प्रवेश कर जाता है। इस समय भारत में दिल्ली, अजमेर तथा लाहौर प्रमुख राजनीतिक केन्द्र थे। ये तीनों ही मुहम्मद गौरी और उसके गवर्नरों के अधीन जा चुके थे।

गोविंदराज चौहान

पृथ्वीराज को मारने के बाद शहाबुद्दीन गौरी ने पृथ्वीराज चौहान के अवयस्क पुत्र गोविन्दराज से विपुल कर राशि लेकर गोविंदराज को अजमेर की गद्दी पर बैठाया। गोविंदराज को अजमेर का राज्य सौंपने के बाद शहाबुद्दीन गौरी कुछ समय तक अजमेर में रहकर दिल्ली को लौट गया।

मुहम्मद गौरी द्वारा कन्नौज पर आक्रमण

पृथ्वीराज को परास्त करने के बाद मुहम्मद गौरी ने 1194 ई. में कन्नौज के गहड़वाल शासक जयचंद्र पर आक्रमण किया। चंदावर के मैदान में दोनों पक्षों में युद्ध हुआ। गौरी की पराजय होने ही वाली थी कि जयचंद्र को अचानक कुतुबुद्दीन का एक तीर लगा जिससे जयचंद्र की मृत्यु हो गई। उसके मरते ही हिन्दू सेना भाग खड़ी हुई। इस युद्ध से गौरी को अपार धनराशि प्राप्त हुई। कन्नौज पर अधिकार करने के बाद गौरी ने बनारस पर भी अधिकार कर लिया। उसने कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत में अपने द्वारा विजित क्षेत्रों का गवर्नर नियुक्त किया। इसके पश्चात वह गजनी को लौट गया।

राजपूतों की पराजय के कारण

राजपूत जाति भारत की सबसे वीर तथा साहसी जाति थी जो रणप्रिय तथा युद्धकुशल भी थी परन्तु जब भारत पर मुसलमानों के आक्रमण आरम्भ हुए तब वह उन्हें रोक न सकी और देश की राजनीतिक स्वतन्त्रता की रक्षा न कर सकी। आठवीं शताब्दी ईस्वी में मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के समय राजपूतों की विफलता का जो सिलसिला आरंभ हुआ वह ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ में महमूद गजनवी के 17 आक्रमणों तथा बारहवीं शताब्दी के अंतिम चतुर्थांश में आरंभ हुए मुहम्मद गौरी के आक्रमणों में लगातार जारी रहा। राजपूतों की पराज के कई कारण थे-

(1) राजनीतिक एकता का अभाव: जिन दिनों भारत पर मुसलमानों के आक्रमण आरम्भ हुए उन दिनों भारत में राजनीतिक एकता का सर्वथा अभाव था। देश के विभिन्न भागों में छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना हो गई थी और देश में कोई ऐसी प्रबल केन्द्रीय शक्ति न थी, जो विदेशी आक्रमणकारियों का सफलतापूर्वक सामना कर सकती। डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने तत्कालीन राजनीतिक स्थिति पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- ‘सम्पूर्ण देश अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों में विभक्त था जो सदैव एक दूसरे से लड़ा करते थे, उनमें एकता और संगठन की कमी थी।’

(2) पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष: छोटे-छोटे राजपूत राज्यों में परस्पर सद्भावना तथा सहयोग का सर्वथा अभाव था। वे एक दूसरे से ईर्ष्या-द्वेष रखते थे और एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए उद्यत रहते थे। इनमें निरन्तर संघर्ष चलता रहता था, जिससे उनकी श्क्ति क्षीण होती जा रही थी। आन्तरिक कलह के कारण वे आपत्ति काल में भी शत्रु के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा उपस्थित न कर सके और एक-एक करके शत्रु के समक्ष धराशायी हो गये। डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘हिन्दुओं की राजनीतिक व्यवस्था प्राचीन आदर्शों से गिर चुकी थी और पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष तथा झगड़ों से उनकी शक्ति क्षीण हो गई थी। गर्व तथा विद्वेष के कारण वे एक नेता की आज्ञा का पालन नहीं कर पाते थे और संकट काल में भी जब विजय प्राप्त करने के लिए संयुक्त मोर्चे की आवश्यकता पड़ती थी, वे अपनी व्यक्तिगत योजनाओं को कार्यान्वित करते रहते थे। शत्रु के विरुद्ध जो सुविधाएँ उन्हें प्राप्त रहती थीं उनसे कोई लाभ नहीं उठा पाते थे।’

(3) सीमा नीति का अभाव: राजपूतों ने देश की सीमा की सुरक्षा के लिये कोई व्यवस्था नहीं की। इससे शत्रु को भारत में प्रवेश करने में कोई कठिनाई नहीं होती थी। उत्तर-पश्चिमी सीमा की न तो कोई किलेबन्दी की गई और न वहाँ पर कोई सेना रखी गई। सीमान्त प्रदेश के छोटे-छोटे राज्य मुस्लिम आक्रमणकारियों का सामना नहीं कर सके। राजपूतों की इस उदासीनता पर प्रकाश डालते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय राज्यों का कोई सतर्क विदेशी कार्यालय न था और न उन्होंने सीमा की सुरक्षा की कोई व्यवस्था ही की और न हिन्दूकुश के उस पार जो राज्य थे उनकी शक्ति, साधन अथवा राज्य विस्तार को जानने का प्रयत्न ही किया गया।’

(4) राजपूतों का रक्षात्मक युद्ध: सीमा की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था न होने के कारण शत्रु सरलता से देश में प्रवेश कर जाते थे, इस कारण राजपूतों को रक्षात्मक युद्ध करना पड़ता था और समस्त युद्ध भारत भूमि पर ही होते थे। इसका परिणाम यह होता था कि विजय चाहे जिस दल की हो, क्षति भारतीयों को ही उठानी पड़ती थी। उनकी कृषि तथा सम्पत्ति नष्ट-भ्रष्ट हो जाती थी।

(5) राजपूतों की सैनिक दुर्बलताएँ: राजपूतों में अनेक सैनिक दुर्बलताएँ थीं, जिससे वे मुसलमानों के विरुद्ध सफल नहीं हो सके। राजपूतों की सैनिक दुर्बलताओं पर प्रकाश डालते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘राजपूतों की सैनिक व्यवस्था पुराने ढंग की थी। जब उन्हें भयानक तथा सुशिक्षित घुुड़सवारों के नताओं से लड़ना पड़ा तब उनका हाथियों पर निर्भर रहना उनके लिए बड़ा घातक सिद्ध हुआ। यद्यपि हिन्दुओं को उनके अनुभव ने अनेक बार चेतावनी दी परन्तु हिन्दू सैनिकों ने निरन्तर इसकी उपेक्षा की और पुराने ढंग से ही युद्ध करते रहे।’

उनकी पहली दुर्बलता यह थी कि उनकी सेना में पैदल सैनिकों की संख्या अत्यधिक होती थी, जिससे उसका तीव्र गति से संचालन करना कठिन हो जाता था और वह मुस्लिम अश्वारोहियों के सामने ठहर नहीं पाती थी। राजपूत लोग तलवार, भाले आदि से लड़ते थे, जो मुस्लिम तीरन्दाजों के सामने ठहर नहीं पाते थे। राजपूत योद्धा अपने हाथियों को प्रायः अपनी सेना के आगे रखते थे। यदि ये हाथी बिगड़ कर घूम पड़ते थे, तो अपनी ही सेना को रौंद डालते थे। विदेशों के साथ कोई सम्बन्ध न रखने के कारण राजपूत नवीन रण-पद्धतियों से भी अनभिज्ञ थे। राजपूत सेनापति केवल सेना का संचालन हीं नहीं करते थे वरन् स्वयं लड़ते भी थे और अपनी रक्षा की चिन्ता नहीं करते थे। इस कारण सेनापति के घायल हो जाने पर सारी सेना भाग खड़ी होती थी। राजपूत अपनी सारी सेना को एक साथ जमा करते थे। इससे सुरक्षा की कोई दूसरी पंक्ति नहीं रह जाती थी।

(6) कूटनीति का अभाव: राजपूतों में कूटनीतिज्ञता भी नहीं थी। वे सदैव धर्मयुद्ध करने के लिए उद्यत रहते थे और छल-बल का प्रयोग नहीं करते थे। उनके युद्ध आदर्श उनके लिए बड़े घातक सिद्ध हुए। वे संकट में पड़ने पर पीठ नहीं दिखाते थे और युद्ध करके मर जाते थे। इससे राजपूतों को बड़ी क्षति उठानी पड़ती थी। चूंकि राजपूत योद्धा छल-कपट में विश्वास नहीं करते थे, इसलिये वे प्रायः अपने शत्रुओं के जाल में फँस जाते थे।

(7) गुप्तचर व्यवस्था का अभाव: भारत के राजपूत शासकों ने चाणक्य द्वारा स्थापित गुप्तचर व्यवस्था की उपेक्षा की। उन्होंने अपने सीमावर्ती क्षेत्रों में गुप्तचरों की नियुक्ति नहीं की। इसके कारण उन्हें शत्रुओं की गतिविधियों की पहले से जानकारी नहीं हो पाती थी। न ही उन्हें शत्रु की शक्ति का वास्तविक ज्ञान होता था। न वे शत्रुओं द्वारा रचे जा रहे षड़यंत्रों का अनुमान लगा पाते थे। इस कारण राजपूत सदैव पराजित होते रहे।

(8) सैनिकों का सीमित निर्वाचन क्षेत्र: भारत में केवल राजपूत ही सैनिकवृत्ति धारण करते थे। अन्य जातियाँ इससे वंचित थीं। राजपूतों की युद्ध में निरन्तर क्षति होने से उनकी संख्या में उत्तरोत्तर कमी होती गई। राजपूत नवयुकों के विनाश की पूर्ति अन्य जातियों के नवयुवकों से नहीं की जा सकी और राजपूत सेना दुर्बल हो गई। इस सम्बन्ध में डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘हिन्दुओं की राजनीतिक व्यवस्था में सैनिक सेवा एक ही वर्ग तक सीमित थी, जिसके फलस्वरूप साधारण जनता या तो सैनिक सेवा के अयोग्य हो गयी या उन राजनीतिक क्रान्तियों की ओर से उदासीन हो गई, जिन्होंने भारतीय समाज की जड़ों को हिला दिया।’

(9) मुसलमानों की सैनिक सबलता: कई दृष्टिकोणों से मुसलमानों में भारतीयों से अधिक सैनिक गुण थे। मुसलमानों की सेना में अश्वारोहियों की अधिकता रहती थी, जो बड़ी तीव्र गति से आक्रमण करते थे। ये अश्वारोही कुशल तीरंदाज होते थे। और अपनी बाण-वर्षा से भारतीय हाथियों की सेना को खदेड़ देते थे। मुसलमानों की व्यूहरचना भी अधिक उत्तम होती थी। उनमें नेतृत्व की कमी नहीं थी। उनके सेनापति रण कुशल थे और प्रायः छल-बल का प्रयोग करते थे। मुसलमान इस्लाम के प्रचार तथा लूट के लिए लड़ते थे इसलिये उनमें उत्साह भी अधिक रहता था।

(10) पृथ्वीराज चौहान की अदूरदर्शिता: पृथ्वीराज चौहान ने तराइन के पहले युद्ध में गौरी को पकड़ कर जीवित ही छोड़ दिया। इसे वह अपनी राजपूती शान समझता था किंतु वास्तविकता यह थी कि उसने मुहम्मद गौरी के खतरे को ठीक से समझा ही नहीं। उसने गौरी के प्रति उदासीन रहकर चौलुक्यों एवं गहड़वालों को अपना शत्रु बना लिया जिन्होंने षड़यंत्र करके मुहम्मद गौरी को भारत आक्रमण के लिये आमंत्रित किया। तराइन के दूसरे युद्ध से पहले पृथ्वीराज चौहान ने अपने सेनापतियों को भी अपना शत्रु बना लिया था। उसकी सेना का एक बड़ा भाग सेनापति स्कंद के साथ था, वह युद्ध के मैदान में पहुंचा ही नहीं। पृथ्वीराज का दूसरा सेनाध्यक्ष उदयराज भी समय पर अजमेर से रवाना नहीं हुआ। पृथ्वीराज का मंत्री सोमेश्वर युद्ध के पक्ष में नहीं था। उसे पृथ्वीराज के द्वारा दण्डित किया गया था, इसलिये वह अजमेर से रवाना होकर शत्रु से जा मिला।

(11) मुस्लिम आक्रांताओं के दोहरे उद्देश्य: मुहम्मद बिन कासिम से लेकर महमूद गजनवी तथा मुहम्मद गौरी के भारत आक्रमण के दोहरे उद्देश्यों ने उन्हें मजबूती प्रदान की तथा सफलता दिलवाई। उनका पहला उद्देश्य भारत की अपार सम्पदा को लूटना था जिसमें से सैनिकों को भी हिस्सा मिलता था। इस कारण अफगानिस्तान, गजनी तथा गौर आदि अनुपजाऊ प्रदेशों के सैनिक भारत पर आक्रमण करने के लिये लालयित रहते थे। मुस्लिम आक्रांताओं का दूसरा उद्देश्य भारत में मूर्ति पूजा को नष्ट करके इस्लाम का प्रचार करना था। मुस्लिम सैनिक भी इस कार्य को अपना धार्मिक कर्तव्य समझते थे इसलिये वे प्राण-पण से अपने सेनापति अथवा सुल्तान का साथ देते थे।

मुहम्मद गौरी के भारत आक्रमणों के परिणाम

मुहम्मद गौरी द्वारा 1175 ई. से 1194 ई. तक की अवधि में भारत पर कई आक्रमण किये गये। इन आक्रमणों के गहरे परिणाम सामने आये जिनमें से प्रमुख इस प्रकार से हैं-

1. मुहम्मद गौरी द्वारा 1175 ई. से 1182 ई. की अवधि में भारत पर किये गये विभिन्न आक्रमणों में पंजाब तथा सिंध के विभिन्न क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया गया।

2. 1192 ई. में हुई तराइन की दूसरी लड़ाई में मुहम्मद गौरी को भारी विजय प्राप्त हुई। इससे अजमेर, दिल्ली, हांसी, सिरसा, समाना तथा कोहराम के क्षेत्र मुहम्मद गौरी के अधीन हो गये।

3. तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज की हार से हिन्दू धर्म की बहुत हानि हुई। मन्दिर एवम् पाठशालायें ध्वस्त कर अग्नि को समर्पित कर दी गईं। हजारों-लाखों ब्राह्मण मौत के घाट उतार दिये गये। स्त्रियों का सतीत्व भंग किया गया।

4. इस युद्ध में हजारों हिन्दू योद्धा मारे गये। इससे चौहानों की शक्ति नष्ट हो गईं। हिन्दू राजाओं का मनोबल टूट गया।

5. जैन साधु उत्तरी भारत छोड़कर नेपाल तथा तिब्बत आदि देशों को भाग गये।

6. देश की अपार सम्पति म्लेच्छों के हाथ लगी। उन्हांेने पूरे देश में भय और आतंक का वातावरण बना दिया जिससे पूरे देश में हाहाकार मच गया।

7. भारत में दिल्ली, अजमेर तथा लाहौर प्रमुख राजनीतिक केन्द्र थे और ये तीनों ही मुहम्मद गौरी और उसके गवर्नरों के अधीन जा चले गये।

8. मुहम्मद गौरी ने अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का गवर्नर नियुक्त किया। जिससे दिल्ली में पहली बार मुस्लिम सत्ता की स्थापना हुई। भारत की हिन्दू प्रजा मुस्लिम सत्ता की गुलाम बनकर रहने लगी।

9. 1194 ई. में मुहम्मद गौरी ने कन्नौज पर आक्रमण किया। इस आक्रमण के बाद कन्नौज से गहरवारों की सत्ता सदा के लिये समाप्त हो गई और इस वंश के शासक कन्नौज छोड़कर मरुभूमि में चले गये।

10. कुछ समय बाद मुहम्मद गौरी ने बनारस पर भी अधिकार करके वहां अपना गवर्नर नियुक्त कर दिया।

मुहम्मद गौरी के अंतिम दिन

मुहम्मद शहाबुद्दीन गौरी अब तक अपने बड़े भाई गयासुद्दीन गौरी के अधीन शासन कर रहा था। 1203 ई. में गयासुद्दीन गौरी की मृत्यु हो गई तथा मुहम्मद गौरी स्वतंत्र शासक बन गया। 1205 ई. में मुहम्मद गौरी को ख्वारिज्म के बादशाह के हाथों अपमानजनक पराजय का सामना करना पड़ा। 1206 ई. में मुहम्मद गौरी पंजाब में हुए खोखर विद्रोह को दबाने के लिये भारत आया। जब इस विद्रोह का दमन करके वह वापस गौर को लौट रहा था, मार्ग में झेलम के किनारे एक खोखर सैनिक ने उसकी हत्या कर दी। इस समय तक मुहम्मद गौरी निःसंतान था। इसलिये उसके गुलामों एवं उसके रक्त सम्बन्धियों में उसके साम्राज्य पर अधिकार करने को लेकर झगड़ा हुआ। अंत में उसके गुलाम ताजुद्दीन याल्दुज ने गजनी पर कब्जा कर लिया जबकि भारत के क्षेत्रों को कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपने अधिकार में ले लिया।

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