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लाल किले पर गोलीबारी

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लाल किले पर गोलीबारी

जिस लाल किले की सत्ता के नाम पर अंग्रेजों ने दिल्ली में अपना शासन आरम्भ किया था, अब उसी लाल किले पर गोलीबारी करने में अंग्रेजों को बिल्कुल भी संकोच नहीं हुआ। बहुत से अंग्रेजों का मानना था कि जब तक लाल किले को मिट्टी में नहीं मिलाया जाएगा, तब तक बहादुरशाह जफर से लिया जाने वाला बदला पूरा नहीं हो सकता!

दिल्ली के उत्तर-पश्चिम में स्थित रिज से दिल्ली नगर पर 10 जून 1857 को गोलीबारी आरम्भ हुई। इस समय तक अंग्रेजों के पास बहुत कम तोपें थीं। घेराव करने वाली बड़ी तोपें तो थी ही नहीं। इसलिए इस गोलीबारी से दिल्ली नगर को बहुत कम नुक्सान हुआ और दिल्ली के जनसाधारण के लिए यह तोपबाजी एक तमाशा बन कर रह गई। जन साधारण को यह देखकर प्रसन्नता होती थी कि दिल्ली के परकोटे की बुर्जों पर पर लगी बागियों की बड़ी तोपों की कतार की तुलना में अंग्रेजों की तोपों की संख्या बहुत कम थी।

क्रांतिकारी सिपाहियों में बंगाल आर्मी के अनुभवी तोप अधिकारी शामिल थे इसलिए उनका निशाना अचूक था। अंग्रेज इन बागी तोपचियों से बहुत डरते थे। विलियम हॉडसन ने घेराबंदी के पहले ही दिन अनुमान लगा लिया था कि बागियों के पास जबरदस्त निशानेबाज हैं और वे सटीक निशाने लगाने में अंग्रेजों को मात देते हैं।

जब जनसाधारण ने देखा कि अंग्रेजों की तोपें अधिक नुक्सान नहीं पहुंचा सकतीं तो वे अपनी छतों पर उमड़ आए। बादशाह और शाही खानदान के लोग लाल किले की छत पर बैठ गए। सलातीन भी लाल किले की दीवारों के बुर्जों से इस गोली-बारी को देखते रहते।

यह कैसा तमाशा था! लाल किले पर गोलीबारी हो रही थी और लाल किले का बादशाह किले की छत पर बैठकर उसका आनंद ले रहा था।

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सरवरुल मुल्क ने अपनी डायरी में लिखा है- ‘उस वक्त खूब गर्मी थी और हर रात हम अपने सिरों के ऊपर से निकलते तोप के गोलों की चमक देखा करते। हम उन्हें आतिशबाजी मानते थे लेकिन अगर उनमें से कोई गोला किसी के घर पर गिर जाता जैसा कि एक महीने बाद हमारी हवेली में हुआ तो फिर यह सारा मजा खत्म हो जाता।

एक तोप के गोले ने हमारी हवेली के ऊपर की मंजिल की छत उड़ा दी और फिर बरामदे में आ गिरा जहाँ बैठे हम खाना खा रहे थे। मेरे चाचा ने जल्दी से दौड़ कर उस पर बाल्टियों से पानी डाला। लाल किले के भीतर स्थित शाही महल अंग्रेजों के लिए आसान निशाना बन गया और जल्दी ही एक अंग्रेजी तोप ऐसी जगह रख दी गई जहाँ से वह लगातार शाहजहाँ के लाल किले की लाल पत्थर की दीवारों के अंदर गोले फैंकती रहती थी।’

जहीर देहलवी ने लिखा है- ‘अंग्रेज विशेषकर सुंदर सफेद संगमरमर के शाही निवासों को निशाना बना रहे थे ……. अंग्रेजों के कब्जा किए हुए रिज से गोलीबारी होती रही और जैसे-जैसे उनका निशाना बेहतर होता गया वैसे-वैसे गोले फटने पर खूब तबाही मचती।

यदि कोई तोप का गोला किसी बहुमंजिला इमारत पर गिरता तो उसमें नीचे तक पहुंच जाता और यदि धरती पर गिरता तो वहीं पर कम से कम 10 गज अंदर घुस जाता तथा आसपास सब कुछ नष्ट कर देता। बम तो और भी खतरनाक थे। वे यदि किले के पुराने शाहजहानी घरों पर गिरते तो वे बिल्कुल ढह जाते थे। घेराबंदी के बाद के दौर में कभी-कभी रातों में ऐसा लगता था मानो धरती पर नर्क उतर आया हो। एक साथ 10 गोले फेंके जाते और वे एक के बाद एक फटते।’

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13 जून 1857 को जब रिज से तोपें छोड़ी गईं तो हिन्दू राव हाउस उनकी चपेट में आया और उसे बहुत क्षति पहुंची। बैंक ऑफ देहली का भवन भी अंग्रेजों की बमबारी में बर्बाद हो गया।

एक गोले ने यमुना किनारे बने हुए शाहबुर्ज को बहुत नुकसान पहुंचाया। दूसरा गोला लाल पर्दे के करीब आकर गिरा। इसकी वजह से अस्तबल का एक नौकर और एक एलची मारा गया। एक और गोला महल के दक्षिण में स्थित जनान खाने पर गिरा जिससे जीनत महल की एक खास दासी चमेली कुचल गई।

उसके बाद जीनत महल लाल किला छोड़ कर लालकुआं की अपनी हवेली में चली गई जिसे वह कम असुरक्षित मानती थी और शायद उन सिपाहियों की मौजूदगी से आजाद भी जो किले में हर जगह मौजूद थे। इससे वह अपने लाड़ले इकलौते पुत्र जवान बक्श और बागियों के बीच कुछ दूरी बनाने में भी कामयाब रही।

इसके कुछ समय बाद फिर से लाल किले पर गोलीबारी हुई तथा गोलों की एक बौछार में बादशाह सलामत खुद बाल-बाल बचे। ईद मुबारक शाह जिसे हाल ही में मुइनुद्दीन की जगह कोतवाल बनाया गया था, उस वक्त महल में ही मौजूद था। उसने लिखा है-

‘एक सुबह करीब आठ बजे बादशाह अपने कक्ष से बाहर आए। वहाँ 30-40 अमीर पहले से ही बैठे बादशाह का इंतजार कर रहे थे। जैसे ही बादशाह सलामत अपने निजी कक्ष से बाहर निकले, तीन गोले उनके बिल्कुल सामने और पीछे आकर गिरे और फट गए लेकिन हैरत अंगेज ढंग से किसी को चोट नहीं आई।

बादशाह फौरन वापस चले गए और बाकी लोग भी जो जहाँ बैठे थे उठकर चले गए। उसी शाम को बादशाह ने क्रांतिकारी सैनिकों के बड़े अधिकारियों को बुलवाया और उनसे कहा- मेरे भाइयो! अब तुम्हारे लिए या दिल्ली के बाकी नागरिकों के लिए या खुद मेरे बैठने के लिए भी कोई स्थान सुरक्षित नहीं रह गया है।

इस लगातार होती गोलीबारी ने उसको भी खत्म कर दिया जैसा कि तुम देख रहे हो। जिस हौज पर मैं रोजाना आकर बैठता था उस पर भी गोला बारूद बरस रहा है। तुम कहते हो कि तुम यहाँ लड़ने और ईसाईयों को भगाने के लिए आए हो, क्या तुम इतना भी नहीं कर सकते कि मेरे महल पर हो रही इस गोले बारूद की बारिश को रोक दो।’

बहादुरशाह जफर के लिए इस सप्ताह में यह दूसरा बड़ा झटका था। 14 जून को उनके खास खिदमतगार ख्वाजासरा महबूब अली खाँ की अचानक मौत हो गई। वह काफी दिन से बीमार था किंतु किले में अफवाह उड़ी कि उसे जहर दिया गया है। शहर में हर तरफ मायूसी छा रही थी।

सईद मुबारक शाह का कहना था कि बागी सिपाहियों की लूटमार और अंग्रेजों की गोलाबारी के बीच दिल्ली के लोगों को चाहे वे बुरे हों या अच्छे अंग्रेजों के पक्ष में हो या विरोध में, सबको अब लग रहा था कि वह चूहों की तरह पिंजरे में कैद हैं जहाँ से भागने का कोई रास्ता नहीं है।

उर्दू के सुप्रसिद्ध कवि मिर्जा गालिब ने लिखा है-

‘उनके मित्रों की परेशानी और वजन बढ़ाने के लिए रिज से खूब गोलाबारी हो रही थी। आग बरसाने वाली बंदूकों और बिजली गिराने वाली तोपों से उठता गहरा काला धुआं आसमान पर गिरे काले बादलों की तरह है और उनकी आवाज ऐसी है जैसे ओलों की बारिश हो रही हो।

दिन भर तोप चलने की आवाज सुनाई देती है, जैसे आसमान से पत्थर गिर रहे हों। उमरा के घरों में चिराग जलाने को तेल नहीं है। वह घुप अंधेरे में बिजली चमकने का इंतजार करते हैं ताकि अपना गिलास और सुराही ढूंढ सकें और अपनी प्यास बुझा सकें। बहादुर लोग भी अपने साए से डर रहे हैं और बागी सिपाही दरवेश और बादशाह दोनों पर हुकूमत कर रहे हैं।’

हालांकि जून, जुलाई एवं अगस्त के तीन महीनों में अंग्रेजी सेना छोटी तोपों से गोले चला रही थी और वह इन तोपों की सीमा को समझती थी फिर भी उसने तोपों से गोले दागना जारी रखा। वे यह नहीं देख रहे थे कि कौनसा गोला कहाँ गिर रहा है! उनके लिए यही पर्याप्त था कि तोप का गोला दिल्ली शहर में कहीं पर गिर रहा है! लाल किले पर गोलीबारी होती रही!

14 जुलाई 1857 को अंग्रेजी सेना का तेजतर्रार युवा ब्रिगेडियर नेविली चेम्बरलेन क्रांतिकारी सैनिकों द्वारा किए गए हमले में बुरी तरह घायल हो गया। इससे अंग्रेज सेना का मनोबल टूटने लगा किंतु इसी बीच लाल किले में कुछ अप्रिय घटनाएं घट गईं जिनसके अंग्रेजों को बड़ा सम्बल मिला।

बहादुरशाह जफर का पुत्र मिर्जा मुगल तथा बहादुरशाह जफर का एक पोता मिर्जा अबू बकर क्रांतिकारी सैनिकों द्वारा पूरी तरह नकार दिए गए। क्रांतिकारी सैनिकों ने इन अयोग्य शहजादों के आदेश मानने से मना कर दिया। इससे क्रांतिकारी सेनाएं नेतृत्व विहीन हो गईं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन

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ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन
ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन

ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन एक क्रूर आयरिश सेनापति था। वह किसी भी कीमत पर दिल्ली पर फिर से अधिकार करना चाहता था। जब दिल्ली में क्रांतिकारियों की सेना अंग्रेजी सेना पर भारी पड़ने लगी, तभी ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन भारतीय सिपाहियों का काल बनकर आ गया!

जिस समय मेरठ एवं दिल्ली में गदर आरम्भ हुआ था उस समय ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन अपने मित्र हर्बर्ट एड्वर्ड्स के साथ पेशावर में नियुक्त था। उसे भी दिल्ली के लिए रवाना कर दिया गया किंतु वह पेशावर से रवाना भी नहीं हुआ था कि पंजाब के नौशेरा में विद्रोह हो गया।

ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन ने नौशेरा के विद्रोह को बड़ी कठोरता से दबाया और दिल्ली के लिए रवाना हो गया। विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि जॉन निकल्सन प्रोटेस्टेण्ट ईसाई था किंतु चापलूस हिन्दुस्तानियों का एक समूह उसे निकल सेन कहता था और उसे विष्णु का अवतार बताता था। निकल्सन इन चापलूसों को जब-तब कोड़ों से पिटवाता था क्योंकि वे लोग उसके सामने जमीन तक झुकते थे और उसके नाम का जाप करते थे।

जॉन निकल्सन के बारे में कहा जाता था कि जब वह रावलपिंडी में था तब उसने अपने हाथों से एक कबीले के सरदार का सिर काटा था। निकल्सन उस सिर को यादगार के रूप में अपनी मेज पर रखता था। भारतीय मुसलमानों के बारे में जॉन निकल्सन की राय अच्छी नहीं थी।

उसका कहना था कि हिंदुस्तानियों से बदतर सिर्फ अफगानी ही हो सकते हैं। विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि अफगानियों के बारे में उसकी यह राय इसलिए बनी थी क्योंकि अफगानियों ने ई.1842 के आंग्ल-अफगान युद्ध में जॉन निकल्सन के भाई का बेरहमी से कत्ल कर दिया तथा उसका गुप्तांग काटकर उसके मुंह में ठूंस दिया था।

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जब निकल्सन अपनी सेना लेकर अफगानिस्तान से दिल्ली आ रहा था तो मार्ग में एक दिन भारतीय बावर्चियों ने निकल्सन और उसके साथी अंग्रेज अधिकारियों का डिनर बनाने में कुछ देरी कर दी। इस पर निकल्सन ने उन्हें पास के ही एक पेड़ पर फांसी से लटका दिया और अपनी सेना को बताया कि उसे अपने जासूसों से सूचना मिली थी कि ये हिन्दुस्तानी बावर्ची अंग्रेज अधिकारियों के खाने में जहर मिलाने वाले हैं। निकल्सन तो अब दुनिया में नहीं है किंतु उसने अपनी डायरी में लिखा है कि जब उसने इन भारतीय खानसामाओं द्वारा बनाया गया सूप एक बंदर को पिलाया तो वह बंदर ऐड़ियां रगड़ते हुए मर गया।

जॉन निकल्सन ने अपने साथी सैन्य अधिकारी हर्बर्ट एड्वर्ड्स को सुझाव दिया कि निकल्सन और एड्वर्ड्स मिलकर कम्पनी सरकार के समक्ष एक बिल पेश करें जिससे दिल्ली की अंग्रेज औरतों और बच्चों के हत्यारों के शरीरों से उनकी जिंदा खाल खींच ली जाए या उन्हें जीवित ही जला दिया जाए या उनकी देह में कीलें ठोकी जाएं। जिन भारतीयों ने अंग्रेज स्त्री एवं बच्चों की हत्या की है, उन्हें केवल साधारण फांसी देकर मारना उनके लिए पर्याप्त दण्ड नहीं है।

जब हर्बर्ट एड्वर्ड्स ने निकल्सन के सुझाव को मानने से मना कर दिया तो निकल्सन ने कहा कि वह अकेले ही इस प्रस्ताव को पेश करेगा तथा भारतीय लोगों से अंग्रेजों की हत्या का बदला लेगा। निकल्सन की ही तरह जॉन लॉरेंस भी भारतीय लोगों को कड़ी सजा देने के पक्ष में था।

14 अगस्त 1857 को ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन अपने 4 हजार 200 सैनिकों के साथ दिल्ली पहुंचा। उसकी सेना को फ्लाइंग कॉलम कहा जाता था तथा यह किसी भी नगर का घेरा डालने में अनुभवी थी। जैसे ही क्रांतिकारियों को इस अंग्रेजी सेना के आने की सूचना मिली, क्रांतिकारी सैनिकों ने इस सेना पर हमला करके उसे तितर-बितर करने का प्रयास किया किंतु क्रांतिकारी सैनिकों को सफलता नहीं मिली।

25 अगस्त 1857 को ब्रिगेडियर निकल्सन ने नजफगढ़ पर आक्रमण किया जहाँ क्रांतिकारी सैनिक मोर्चा बांधकर बैठे हुए थे। यद्यपि इस समय तक मानसून की वर्षा आरम्भ हो चुकी थी तथा रास्तों में स्थान-स्थान पर पानी भरा हुआ था, तथापि निकल्सन की सेना ने नजफगढ़ पहुंचकर क्रांतिकारी सैनिकों को नजफगढ़ से भगा दिया। क्रांतिकारी सैनिकों के लिए यह पराजय बहुत बड़ा झटका थी।

जॉन निकल्सन ने दिल्ली में पड़े भारतीय क्रांतिकारी सैनिकों के हथियार छीनकर उन्हें सूली पर चढ़ाना श्ुरु कर दिया। अंग्रेज सेनापति प्रायः बागियों को तोपों के सामने बांधकर उन्हें उड़ाते थे किंतु निकल्सन ने बागियों के लिए बारूद खर्च करना उचित नहीं समझा। उसे लगता था कि अंग्रेजी बारूद का उपयोग किसी बेहतर काम के लिए करना उचित होगा।

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निकल्सन ने दिल्ली के क्रांतिकारी सैनिकों पर इतने अत्याचार किए कि उसके किस्से विक्टोरियन युग की दास्तानें बन गए। उसके लिए कहा जाता है कि वह कभी सोता नहीं था और उसे किसी भी चीज का खौफ नहीं था। वह आदमी को तलवार के एक ही वार से दो हिस्सों में काट देता था और कत्ल करने के बाद कहता था कि तलवार की धार बुरी नहीं है।

निकल्सन न तो किसी को गिरफ्तार करता था और न किसी का कोर्ट मार्शल करता था। वह तो क्रांतिकारी सैनिकों को बैलगाड़ी में पटककर बांध लेता था और यूनियन जैक के नीचे एक साथ छः-छः क्रांतिकारियों को सूली पर चढ़ा देता था, यही उसका न्याय था।

विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है- ‘हो सकता है कि निकल्सन हिंसा का अवतार हो लेकिन उसका पागलपन इन मौजूदा हालात के लिए बहुत उपयुक्त था।’

जब सर जॉन लॉरेंस ने निकल्सन को लिखा कि- ‘देसी बागियों के कोर्ट मार्शल बहाल होने चाहिए तथा दी गई सजाओं की फेहरिस्त बननी चाहिए।’

इस पर संगदिल निकल्सन ने उस आदेशपत्र के पीछे एक लाइन लिखकर उसे वापस भेज दिया कि- ‘बगावत की सजा केवल मौत है।’

अंग्रेज अधिकारियों ने कई सौ भारतीय सिपाहियों को बिना कोर्ट मार्शल किए ही फांसी पर लटका दिया, गोलियों से उड़ा दिया और पेड़ों से बांधकर तोपों से उड़ा दिया था। कम्पनी सरकार के इन हैवानों से कोई कुछ कहने या पूछने वाला नहीं था। इस काम में अकेला निकल्सन ही जोर-शोर से भाग नहीं ले रहा था अपितु दो अंग्रेज और भी थे।

इनमें से पहला अंग्रेज था लोअर कोर्ट का मजिस्ट्रेट थियोफिलिस मेटकाफ जिसके कपड़े तिलंगों ने उतार लिए थे और दूसरा था विलियम हॉडसन जिसके जासूस दिल्ली में चप्पे-चप्पे पर मौजूद थे!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मेजर जनरल आर्कडेल विल्सन

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मेजर जनरल आर्कडेल विल्सन

मेजर जनरल आर्कडेल विल्सन के नेतृत्व में जॉन निकल्सन, हेनरी बर्नार्ड, थियोफिलस मेटकाफ, विलियम हॉडसन, बेयर्ड स्मिथ तथा नेविली चेम्बरलेन आदि अनुभवी अंग्रेज अधिकारी दिल्ली को जीतने के लिए जी-जान से जूझ रहे थे किंतु बड़ी तोपों के अभाव में वे दिल्ली में घुसने का मार्ग नहीं बना पा रहे थे।

अंततः सितम्बर 1857 में पंजाब से छः 24 पाउण्डर लॉंग गन तथा 8 अठारह पाण्डर लॉंग गन, 6 आठ इंच होविट्जर्स, 10 दस इंच मोर्टार्स और गोला-बारूद एवं कारतूसों से भरे 600 बक्से दिल्ली की अंग्रेज सेना के पास सफलता पूर्वक पहुँच गए। लगभग इतना ही असला अंग्रेजी सेनाओं के पास पहले से ही था। इस प्रकार अंग्रेजों के पास गोला-बारूद की कमी नहीं रही।

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इन बड़ी तोपों को शक्तिशाली हाथियों द्वारा घसीट कर लाया गया था और बड़ी कठिनाई से रिज पर चढ़ाया गया था। इन तोपों का रिज तक पहुंच जाना क्रांतिकारी सैनिकों की भारी रणनीतिक विफलता थी। उन्होंने अंग्रेजी सेनाओं की रसद एवं गोला-बारूद की आपूर्ति रेखा को काटने की कोई योजना नहीं बनाई थी। 6 सितम्बर को अंग्रेजों ने रिज के दक्षिणी छोर पर 24 पाउण्डर तथा 9 पाउण्डर तोपों को स्थापित किया और दिल्ली के परकोटे को तोड़ने के लिए गोले दागने आरम्भ कर दिए।

7 सितम्बर 1857 को अंग्रेजों ने मोरी बुर्ज से केवल 700 गज की दूरी पर एक भारी तोप स्थापित की। आठ सितम्बर को चार बड़ी तोपें और मिल गईं। उसी दिन कश्मीरी बुर्ज पर गोलाबारी आरम्भ की गई। ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन की इस रणनीति से क्रांतिकारी सैनिकों के पैर उखड़ने लगे। अंग्रेज अपनी तोपों को रिज से उतार कर सिविल लाइंस में बने लुडलो कैसल तक ले आए। अब वे नगर प्राचीर से केवल 180 मीटर दूर रह गए। कहने को तो दिल्ली में क्रांतिकारियों का नायक स्वयं बादशाह था किंतु क्रांतिकारियों ने बादशाह द्वारा नियुक्त दोनों शहजादों को सेनापति के रूप में स्वीकार नहीं किया। इसलिए क्रांतिकारी सेनाओं में तालमेल का अभाव था किंतु बादशाह के सौभाग्य से उन्हीं दिनों बरेली से कम्पनी सरकार की एक सेना बागी होकर दिल्ली पहुंची।

इस सेना का नेतृत्व बख्त खाँ नामक एक तोपखाना अधिकारी कर रहा था। बादशाह ने बख्त खाँ को दिल्ली में स्थित समस्त क्रांतिकारी सेनाओं का सेनापति नियुक्त कर दिया। बख्त खाँ को इस तरह के युद्धों में भाग लेने का अच्छा अनुभव था।

मेजर जनरल आर्कडेल विल्सन ने हेनरी बरनार्ड को एक बड़ी सेना देकर दिल्ली नगर में प्रवेश करने के लिए भेजा किंतु क्रांतिकारी सैनिकों ने अँग्रेजी सेना को पीछे धकेल दिया। अंग्रेज समझ गए कि अभी आमने-सामने की लड़ाई का समय नहीं आया है। इसलिए वे फिर से तोपों से गोले दागने लगे।

अब अंग्रेजों की 50 तोपें दिन और रात गोले छोड़ने लगीं जिससे नगर परकोटा ध्वस्त होने लगा तथा लगभग 300 क्रांतिकारी सैनिक मारे गए। आठ दिन की भीषण गोलाबारी के बाद 14 सितम्बर 1857 को प्रातः तीन बजे अंधेरे में अंग्रेजों ने क्रांतिकारी सैनिकों पर बड़ा धावा बोला जिसका नेतृत्व ब्रिगेडियर निकल्सन ने किया।

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ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन ने तीन कॉलम्स को खुदीसा बाग के पीछे जमा किया जहाँ मुगल बादशाह गर्मियों में निवास करते थे। चौथे कॉलम को काबुल गेट को खोलने की जिम्मेदारी दी गई। पांचवे कॉलम को रिजर्व में रखा गया। अब अंग्रेजी सेनाएं दिल्ली शहर के परकोट में बनी दरारों से होकर दिल्ली शहर में घुसने लगीं।

सार्जेंट कारमाइकल ने कश्मीरी गेट को बारूद से उड़ा दिया। क्रांतिकारी सैनिकों ने काबुल गेट के बाहर किशनगंज में अंग्रेजों से भयानक युद्ध किया। दोनों पक्षों ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना आत्मघाती युद्ध किया जिसके कारण दोनों ओर के सैनिकों को बड़ी संख्या में प्राण गंवाने पड़े। मेजर रीड बुरी तरह घायल हो गया और उसका पूरा कॉलम बिखर गया।

जब अंग्रेजों ने सेंट जेम्स चर्च पर अधिकार करना चाहा तो अंग्रेजी सेनाओं के 1170 सिपाही मारे गए। यह अंग्रेजों के लिए बहुत बड़ा धक्का था। कहा जाता है कि सेंट जेम्स चर्च पर क्रांतिकारी सैनिकों के दबाव को देखते हुए आर्कडेल विल्सन ने अपनी सेनाओं को चर्च से पीछे हटने के आदेश दिए।

उस समय तक ब्रिगेडियर निकल्सन भी बुरी तरह घायल हो चुका था तथा किसी भी समय उसकी मृत्यु हो सकती थी किंतु जब निकल्सन ने सुना कि मेजर जनरल विल्सन आर्कडेल ने अंग्रेजी सेना को पीछे हटने के आदेश दिए हैं तो ब्रिगेडियर निकल्सन ने मेजर जनरल आर्कडेल को धमकी दी कि या तो वह अपना आदेश वापस ले नहीं तो वह आर्कडेल को गोली मार देगा। इस पर बेयर्ड स्मिथ तथा चेम्बरलेन आदि अधिकारियों ने बीच-बचाव करके आर्कडेल को इस बात पर सहमत किया कि वह अपना आदेश वापस ले ले।

इस समय तक अंग्रेजी सेनाओं के इतने अधिकारी मारे जा चुके थे कि अंग्रेजी सेनाओं में यह भ्रम उत्पन्न होने लगा कि उनका वास्तविक अधिकारी कौन है। इसी दौरान उन्हें दिल्ली में एक शराब का स्टोर दिख गया। अंग्रेजी सेना के सैनिकों ने शराब के इस स्टोर को लूट लिया और वे अपने मन में बैठ गए भय को दूर करने के लिए बेतहाशा शराब पीने लगे। इस प्रकार दो दिन बीत गए।

16 सितम्बर 1857 को अंग्रेजी सेना ने मैगजीन पर फिर से अधिकार स्थापित कर लिया। पाठकों को स्मरण होगा कि मेरठ से आए तिलंगों ने 11 मई 1857 को इस मैगजीन पर अधिकार कर लिया था तथा अंग्रेजों ने स्वयं ही इसके गोला-बारूद में आग लगाकर उसे नष्ट कर दिया था। पूरे तीन महीने बाद अंग्रेज फिर से उसी मैगजीन में लौट आए थे किंतु इन तीन महीनों में दिल्ली में बहुत कुछ बदल चुका था, अब वह पहले वाली दिल्ली नहीं रही थी।

भारतीयों के सौभाग्य से विशेषकर दिल्ली वालों के भाग्य से 23 सितम्बर 1857 को ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन की मौत हो गई। अंग्रेजों के लिए यह एक बड़ा सदमा था। युद्ध की समाप्ति पर अंग्रेजों ने जॉन निकल्सन की एक बड़ी प्रतिमा बनवाकर दिल्ली में लगवाई जो ई.1947 में उसकी जन्मभूमि उत्तरी आयरलैण्ड को भेज दी गई।

यह प्रतिमा आज भी आयरलैण्ड के डुंगनन कस्बे के रॉयल स्कूल में लगी हुई है। भारत के लोग उसे इंग्लैण्ड का निवासी समझते थे किंतु वह आयरलैण्ड का रहने वाला था। आयरलैण्डवासी आज भी जॉन निकल्सन को बड़े गर्व के साथ याद करते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली में दहशत

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दिल्ली में दहशत

पिछले कुछ समय से दिल्ली की जनता ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन के बारे में डरावने किस्से सुन रही थी। निकल्सन के बारे में कहा जा रहा था कि अफगानिस्तान से आया ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन दिल्ली वालों को कठोर दण्ड देगा। इस कारण दिल्ली में दहशत फैल गई। अंग्रेजी सेनाओं और गुण्डों के डर से दिल्ली खाली हो गई!

जब दिल्ली वालों ने सुना कि निकल्सन भारतीयों द्वारा मेरठ, कानुपर एवं दिल्ली आदि स्थानों में किए गए अंग्रेजों के खून का बदला भारतीयों के खून से लेगा तो दिल्ली में दहशत फैल जाना स्वाभाविक ही था। बदले की आग में जल रहे इस अंग्रेज अधिकारी के मस्तिष्क में भारतीयों का रक्त पी जाने के बहुत से तरीके मौजूद थे। इसलिए दिल्ली के नागरिकों ने दिल्ली से बाहर भाग आना आरम्भ कर दिया।

दिल्ली वालों के लिए अंग्रेजी सेनाओं से भयभीत होकर दिल्ली से भाग जाने का निर्णय पूरी तरह गलत भी नहीं था। यद्यपि ईस्वी 1803 से 1857 तक की अवधि में दिल्ली के अंग्रेज अधिकाारियों ने स्वयं को निष्पक्ष एवं न्यायप्रिय दिखाया था तथापि अनुशासन के नाम पर उन्होंने दिल्ली के लोगों पर जो अत्याचार किए थे, उन्हें दिल्ली की जनता कैसे भूल सकती थी!

किसी भी भारतीय के घर में आग लगा देना, सरे आम कोड़ों से पिटवाना और किसी भी भारतीय को फांसी के फंदे से लटका देना अंग्रेजों के लिए आम बात थी।

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एक ओर तो दिल्ली में दहशत फैली हुई थी और दूसरी ओर अंग्रेजी सेना दो दिन से शराब के नशे में धुत्त होकर पड़ी थी, उस समय क्रांतिकारी सैनिक चाहते तो अंग्रेजों के चरण चूम रही विजयश्री को फिर से अपने पक्ष में कर सकते थे किंतु इस समय तक क्रांतिकारी सैनिकों की हालत भी बहुत बुरी हो चुकी थी। उनके बहुत से साथी या तो मारे जा चुके थे या बुरी तरह घायल होकर मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्हें भोजन, पानी और दवा देने का कोई प्रबंध नहीं था।

ऐसी स्थिति में उन मुजाहिदों ने मोर्चा संभाला जो भूखे-प्यासे रहकर भी अपनी अंतिम सांस तक लड़ते हुए बहादुरशाह जफर को फिर से हिन्दुस्तान का बादशाह बनाने आए थे किंतु उन्हें युद्ध करने का न तो कोई प्रशिक्षण था और न कोई अनुभव!

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जब आर्कडेल विल्सन ने देखा कि उसकी सेना केवल शराब पीने में व्यस्त हैं तो विल्सन ने समस्त शराब को नष्ट करने के आदेश दिए। इससे अंग्रेजी सेना में फिर से अनुशासन स्थापित हो गया। अंग्रेजी सेना ने फिर से क्रांतिकारी सैनिकों पर धावा बोला। क्रांतिकारी सैनिकों ने मोर्चे छोड़ दिए, अब या तो सड़कों पर उनके शव पड़े हुए दिखाई दे रहे थे, या फिर उन्होंने अंग्रेजों की संगीनों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था। बहुत से क्रांतिकारी सैनिक दिल्ली छोड़कर भाग गए। अब तो दिल्ली में दहशत का कोई अंत नहीं रहा।

जब अंग्रेजों की सेना दिल्ली में घुसी तब दिल्ली के हजारों नागरिक दिल्ली खाली करके अपने सम्बन्धियों के पास निकटवर्ती गांवों और कस्बों में भाग गए। दिल्ली में जनजीवन अस्त-व्यस्त हो चुका था और अनाज, दूध एवं सब्जियां मिलना बिल्कुल असंभव हो गया था। हालांकि दिल्ली में अधिकांश लोगों के घरों में लूटे जाने के लिए कुछ नहीं बचा था किंतु जब अंग्रेजों ने क्रांतिकारी सैनिकों का बिल्कुल सफाया कर दिया तब गुण्डे और लुटेरे फिर से अपने घरों से निकल आए और उन्होंने दिल्ली के बंद घरों को तोड़कर उनमें से सामान निकालना आरम्भ कर दिया।

अंग्रेज सेनाएं जीत की खुशी में पेट भरकर शराब पी रही थीं। इस कारण पूरे चार दिनों तक दिल्ली पर गुण्डों और बदमाशों का कब्जा रहा। इन गुण्डों के भय से भी बहुत से लोग दिल्ली खाली करके चले गए क्योंकि जब गुण्डे लूटपाट करने के लिए घरों में घुसते थे तो औरतों के साथ गुण्डागर्दी करने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने देते थे। गुण्डों के कारण दिल्ली में जो दहशत थी, उसका कुछ वर्णन उर्दू के प्रसिद्ध कवि मिर्जा गालिब ने लिखा है।

मिर्जा गालिब इन घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी थे। गालिब के लिए यह बगावत अंग्रेजों से इंतकाम लेने से अधिक निचले वर्ग के लोगों की सरकशी का संकेत था। इससे भी अधिक खतरनाक बात यह थी कि उनके अपने मुल्क के लोग उन जाहिल और बदनसीब गुण्डों के सामने बेबस थे।

गालिब ने लिखा है- ‘जो गुमनाम लोग जिनका कोई नामो-नसब था न कोई मालो-जर! अब वे बेहिसाब दौलत और इज्जत के हकदार हो गए हैं। वह जो सड़कों पर धूलो-खाक से भरे फिरते थे जैसे हवा का कोई आवारा झौंका उन्हें यहाँ फैंक गया हो, अपनी आस्ताना में हवा रखने का दावा करते हैं।

यह आवारागर्द बेशर्मी से तलवारें हाथ में लिए एक गिराहे से दूसरे में मिलते चले गए। सारे दिन इन बलवाइयों ने शहर को लूटा और शाम को मखमली बिस्तरों में जाकर सो गए। दिल्ली का पूरा शहर अपने हाकिमों से खाली हो गया और उसकी जगह खुदा के ऐसे बंदे यहां बस गए जो किसी खुदा को भी नहीं मानते।

जैसे यह कोई माल का बाग हो जो फूलों के दरख्तों से भरा हो। बादशाह उनको रोकने से बेबस थे। उनकी फौजें बादशाह के गिर्द जमा हो गईं और वह उनके दबाव में ऐसे ढक गए जैसे चांद ग्रहण लगने से ढक जाता है।’

बहुत से लोग अंग्रेजी सेना में दूसरे प्रांतों से आए अंग्रेज, सिक्ख, पख्तून एवं गोरखा सैनिकों से डरकर दिल्ली से बाहर चले गए क्योंकि ये लोग दिल्ली के नागरिकों के साथ बहुत कठोर व्यवहार कर रहे थे। हालांकि ऐसा कतई नहीं था कि अंग्रेजी सेना में शामिल समस्त भारतीय सैनिक एक तरह का व्यवहार कर रहे थे। बहुत से सिपाहियों ने भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति को इन परिस्थितियों में भुलाया नहीं था।

एक अंग्रेज अधिकारी की डायरी के संदर्भ से विलियम डैलरिम्पल ने लिखा है- ‘बहुत से भारतीय सिपाहियों ने अपने अधिकारियों का अपमान किए बिना, खामोशी से लेकिन दृढ़तापूर्वक घोषणा कर दी कि उन्होंने स्वयं को कम्पनी की नौकरी से स्वतंत्र कर लिया है और अब वे दिल्ली के बादशाह की प्रजा बनने और उनकी सेवा करने जा रहे हैं।

बहुत से सिपाहियों ने अपनी अधिकारियों को सलाम किया और बहुत इज्जत और तमीज से अपने मुंह बगावत के केन्द्र अर्थात् दिल्ली की तरफ फेर लिए ताकि उन लोगों में सम्मिलित हो सकें और उनकी संख्या बढ़ा सकें जो कि हिन्दुस्तान की मुसलमान राजधानी में हमसे लड़ने वाले थे।’

इस अंग्रेज अधिकारी की डायरी के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सभी भारतीय सैनिक अनपढ़ एवं असभ्य नहीं थे।

जब कम्पनी सरकार से विद्रोह करने वाले बहुत से भारतीय सिपाही अपने पुराने स्वामियों अर्थात् अंग्रेजों के विरुद्ध तमीज से पेश आए थे तो निश्चित ही उन सिपाहियों की संख्या भी कम नहीं रही होगी जो अब भी कम्पनी सरकार की तरफ से लड़ रहे थे और उन्होंने अब भी भारतीय सभ्यता और संस्कृति का पल्लू थाम रखा था किंतु दिल्ली वालों के मन में अंग्रेजी सेनाओं का भय घर कर चुका था। वे दूध से जले हुए थे और अब छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीना चाहते थे।

तिलंगों के साथ दिल्ली वासियों का अब तक का अनुभव बहुत बुरा था इसलिए अब वे फिर दिल्ली में घुस रही अंग्रेजी सेनाओं के हाथों और जलील नहीं होना चाहते थे। यही कारण था कि दिल्ली के बहुत से संभ्रांत लोगों ने अंग्रेजी सेनाओं के भय से दिल्ली खाली करके भाग जाना ही उचित समझा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली की औरतें

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दिल्ली की औरतें

दिल्ली की औरतें के जिहादी चाहते थे कि बादशाह बहादुरशाह जफर स्वयं घोड़े पर सवार होकर अंग्रेजों की सेना से लड़ें किंतु जब लोगों ने देखा कि बादशाह कायरता दिखा रहा है तो दिल्ली की औरतें जिहादियों की भीड़ में शामिल होकर अंग्रेजों को मारने के लिए निकल पड़ीं।

16 सितम्बर 1857 को जिस दिन अंग्रेजों ने मैगजीन पर फिर से अधिकार किया, उसी दिन क्रांतिकारी सेना का प्रधान सेनापति बख्त खाँ बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ। वीर सावरकर ने अपनी पुस्तक ‘1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर’ में लिखा है-

‘बख्त खाँ ने बादशाह से कहा, दिल्ली अब आपके हाथों से निकलती जा रही है। फिर भी मैं यह नहीं कह सकता कि अब हमें विजय की कोई आशा ही नहीं रह गई है। मैं यह समझता हूँ कि अब एक ही स्थान पर एकत्रित होकर युद्ध करने के स्थान पर यदि हम बाहर निकलकर खुले प्रदेशों में शत्रु को थकाने में जुट जाएंगे तो अंतिम विजय हमें ही प्राप्त होगी।

जो वीर इस स्वाधीनता संग्राम में अंत तक अपनी तलवारें संभाल कर युद्ध करने के लिए कृत संकल्प होंगे, उन्हें अपने साथ लेकर मैं दिल्ली से बाहर निकलूंगा और शत्रुओं से लोहा लूंगा। शत्रु के समक्ष आत्मसमर्पण करने के स्थान पर मैं उससे युद्ध करते हुए दिल्ली से बाहर निकलना बेहतर समझता हूँ।

अतः जहांपनाह भी हमारे साथ दिल्ली से बाहर निकल चलें जिससे आपकी पताका के नीचे ही हम स्वराज्य की स्थापना का यह पावन संघर्ष जीवन की अंतिम घड़ी तक जारी रखें।’

वीर सावरकर ने लिखा है- ‘यदि इस वृद्ध मुगल बादशाह में बाबर, हुमायूँ अथवा अकबर की वीरता का सौवां हिस्सा भी होता तो वह इस निमंत्रण को स्वीकार कर लेता तथा बख्त खाँ के साथ दिल्ली से बाहर निकल पड़ता किंतु वार्धक्य से हताश, राजविलास से मतिमंद और पराजय से भयभीत हुआ बहादुरशाह जफर अंत तक कोई भी निश्चय नहीं कर पाया।’

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16 सितम्बर को दिल्ली के बहुत से जिहादी लाल किले के सामने आकर एकत्रित होने लगे जिनके लीडर मौलवी सरफराज अली थे और बागी फौज के कई प्रमुख अफसर भी थे।

जिहादी वे लोग थे जो सैनिक नहीं थे किंतु बादशाह को फिर से हिन्दुस्तान का राजमुकुट दिलवाने के लिए अपने प्राण हथेली पर लड़कर अंग्रेजों से मुकाबला कर रहे थे। इन जिहादियों में मुसलमानों के साथ-साथ हिन्दू भी बड़ी संख्या में थे। यहाँ तक कि हिन्दुओं एवं मुसलमानों की औरतें भी इन जिहादी जत्थों में शामिल हो गई थीं।

ये लोग लाल किले के अंदर गए और बहादुरशाह जफर की मिन्नत करने लगे कि वह लड़ाई में उनका नेतृत्व करे। सईद मुबारक शाह ने बादशाह को विश्वास दिलाया कि दिल्ली के समस्त शहरी, पूरी सेना और आसपास के समस्त लोग उनके साथ होंगे और उनके लिए लड़ेंगे और मरेंगे। हम अंग्रेजों को निकाल बाहर करेंगे।

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जैसे जैसे और जिहादी और शहरी लोग डण्डे लिए, तलवारें उठाए और पुरानी बंदूकें संभाले किले के बाहर जमा होते गए तो ऐसा लगने लगा कि पासा पलटने का वक्त आ गया है। किले के अंदर हालात और भी ज्यादा गंभीर हाते जा रहे थे। शहजादे मिर्जा मुगल ने बादशाह से कुछ रुपए मांगे ताकि वह अपनी सेना को वेतन दे सके और सेना उस वेतन से कुछ खाना खरीद कर खा सके। इस पर जफर ने शहजादे के संदेशवाहक को जवाब दिया कि घोड़ों का सारा साजो सामान, हमारा चांदी का हौदा और कुर्सी मिर्जा मुगल को भिजवा दी जाए ताकि वह उसे बेचकर सिपाहियों को पैसा दे सके।

इस समय किले में चारों तरफ गोले गिर रहे थे। शहर में सामान मिलना बंद हो गया था इसलिए किले में सलातीन और शहजादे सभी भूखे मरने लगे थे। सईद मुबारक शाह ने लिखा है कि जब बादशाह को अंग्रेजों से बचने का कोई रास्ता नहीं दिखा तो दोपहर बारह बजे बादशाह की पालकी लाल किले से बाहर निकली। पूरी दिल्ली में यह समाचार आग की तरफ फैल गया कि बादशाह सलामत स्वयं अंग्रेजों से लड़ाई करने निकले हैं।

हड्डियों के ढांचे की तरह दिखाई दे रहे बूढ़े बादशाह को पालकी में बैठकर युद्ध के मोर्चे पर आया देखकर न केवल दिल्ली के जिहादी प्रसन्न हुए अपितु दिल्ली की औरतें भी जोश से भर गईं। हाथों में तलवार लेकर सड़कों पर लड़ने के लिए आईं दिल्ली की औरतें लड़ना नहीं जानती थीं किंतु उन्हें समझा दिया गया था कि यह जिहाद है, जिहाद के लिए लड़ना और लड़ते हुए जान गंवाना हर मुसलमान का फर्ज है।

जिहाद करने एवं बादशाह के लिए जान देने के लिए घर से निकलीं दिल्ली की औरतें केवल मुसलमान घरों से आई थीं। हिन्दू घरों की औरतों को न तो लड़ाई करना आता था और न वे यह समझ पा रही थीं कि दिल्ली पर किसका शासन होना चाहिए, ईसाइयों का या मुसलमानों का? हिन्दू औरतों के लिए तो दोनों ही एक जैसे थे! किस के लिए लड़तीं और किसके लिए जान गंवातीं? इस लड़ाई में जो भी पक्ष जीतता, सबसे पहले हिन्दू औरतों की देह नौंचता!

इसी समय दिल्ली तथा आसपास के गांवों के लोग भी अपनी लाठियां, तलवारें और बंदूकें लेकर आ गए। लाल किले के सामने लगभग 70 हजार लोगों की भीड़ जमा हो गई। सारे शहरियों ने एक साथ आगे बढ़ना शुरु किया किंतु उन्हें अंग्रेजी तोपखाने से 200 गज पहले रुकना पड़ा क्योंकि जो भी आगे बढ़ा, गोली खाकर गिरा। अंग्रेजी सेना की बंदूकों से निकली गोलियां सड़क पर बारिश की तरह गिर रही थीं।

हकीम अहसान उल्लाह खाँ ने बादशाह के पास पहुंचकर कहा- ‘यदि एक कदम भी आगे बढ़े तो जरूर गोली खा जाएंगे क्योंकि अंग्रेज बंदूकें लेकर चारों तरफ के घरों में छिपे हुए हैं। आपको यहाँ इस तरह नहीं आना चाहिए था।’

सईद मुबारक शाह ने लिखा है- ‘यह सुनते ही बादशाह जुलूस छोड़कर शाम की नमाज पढ़ने का बहाना बनाकर वापस चले गए। यह देखकर दिल्ली के गाजियों और बागियों की भीड़ हैरान रह गई और आखिर वह बिखर गई।’

इस प्रकार बाबर का आखिरी वंशज अपने जीवन में पहली बार युद्ध करने के लिए लाल किले से बाहर आया किंतु बिना कोई लड़ाई किए फिर से लाल किले में भाग गया। बागियों का हौंसला जफर के खौफजदा होकर पीछे हटने से टूट गया।

अब दिल्ली की जनता को न केवल बादशाह का अपितु अपना और समूची दिल्ली का भविष्य साफ-साफ दिखाई देने लगा था। इसलिए तमाम गाजी और बागी दिल्ली से भाग छूटे। दिल्ली के बचे-खुचे लोग भी अपने जानवरों को लेकर अजमेरी दरवाजे से होकर दिल्ली से बाहर भागने लगे।

दिल्ली की औरतें यह दृश्य देखकर हैरान थीं। यह कैसा जिहाद थे, लोग जिहाद के लिए लड़ते हुए जान नहीं दे रहे थे अपितु कायरों की तरह चिल्लाते हुए भाग रहे थे!

हिन्दू राव भवन की छत पर बंदूकें लेकर खड़े अंग्रेज सिपाही भी यह दृश्य देखकर हैरान रह गए। थोड़ी ही देर में उन्हें समझ में आ गया कि समूची दिल्ली ने हार मान ली है। हॉडसन ने देखा कि बरेली की तरफ जाने वाले बागी सैनिकों के दस्ते दिल्ली से रवाना होने से पहले अपने गोला-बारूद में आग लगा रहे थे।

हॉडसन के जासूसों ने सूचना दी कि नीमच और बरेली के सिपाहियों ने अपना सामान पहले ही सड़क के रास्ते मथुरा भिजवा दिया है और खुद भी मोर्चा छोड़कर भागने को तैयार हैं।

16 सितम्बर 1857 की रात मुगल बादशाहों की परम्परा में वह अंतिम रात थी जब किसी मुगल बादशाह ने बादशाह की हैसियत से लाल किले में रात गुजारी थी। उसके बाद कोई बादशाह फिर कभी बादशाह की हैसियत से लाल किले में रात बिताने नहीं आया।

रात को लगभग 11 बजे बादशाह ने एक ख्वाजासरा को, अपनी सबसे प्यारी बेटी कुलसूम जमानी बेगम को बुलाने के लिए भेजा। बादशाह ने अपनी पुत्री को बहुत से जेवर और रुपए देकर कहा-

‘मैंने तुम्हें अल्लाह को सौंपा! मैं तुमसे जुदा नहीं होना चाहता किंतु तुम्हारी सलामती के लिए जरूरी है कि तुम मुझसे दूर रहो। तुम फौरन अपने शौहर मिर्जा जियाउद्दीन के साथ लाल किला छोड़ दो।’

कुलसूम जमानी बेगम उन जेवरों और अपने परिवार को लेकर फौरन ही लाल किले से बाहर निकल गई और मेरठ की तरफ रवाना हो गई। स्वयं कुलसूम जमानी ने लिखा है कि मार्ग में हमें गूजरों के एक गिरोह ने लूट लिया तथा हमें लगभग नंगा करके छोड़ा!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर का आखिरी वंशज

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बाबर का अखिरी वंशज

बहादुरशाह जफर बाबर का आखिरी वंशज था जो लाल किले में रहता था। जब अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को परास्त कर दिया तथा वे दिल्ली में घुसने लगे तो बहादुरशाह को अपने प्राणों की चिंता हुई। वह जानता था कि अंग्रेज उसके प्राण लिए बिना नहीं छोड़ेंगे। इस कारण बाबर का आखिरी वंशज रात के अंधेरे में लाल किला छोड़कर निकल गया।

17 सितम्बर 1857 का सूरज निकलने से पहले ही बादशाह बहादुरशाह जफर लाल किले के पानी वाले दरवाजे से होकर यमुनाजी की तरफ निकल गया। उसने वजीरे आजम और बेगम जीनत महल को भी अपने जाने के बारे में सूचना नहीं दी। बादशाह के साथ कुछ विश्वसनीय सेवक थे जो बादशाह का खजाना अपने कंधों पर उठाए हुए थे। कोई नहीं जानता था कि बाबर का आखिरी वंशज कहाँ जा रहा है!

बादशाह ने खानदानी खजाने की कुछ चुनी हुई चीजें अपने साथ ली थीं जिनमें कुछ बहुमूल्य शाही जेवरात, व्यक्तिगत स्वामित्व के कागज, उनकी पूरी सूची और एक पालकी थी। जब सूरज निकला तो बादशाह एक कश्ती में बैठकर अपनी मंजिल की ओर रवाना हो गया। कुछ देर बाद बाबर का आखिरी वंशज यमुना नदी के पुराने किले के घाट की तरफ उतरा।

बादशाह समझ रहा था कि उसे किले से निकलते हुए कोई नहीं देख रहा है किंतु वह गलत था। हॉडसन के कुछ जासूस चौबीसों घण्टे बादशाह पर दृष्टि रखते थे और पल-पल की खबर हॉडसन तक भिजवाते थे। कहने की आवश्यकता नहीं कि इन जासूसों ने इस सूचना को हॉडसन तक पहुंचाने में कितनी शीघ्रता की होगी!

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बादशाह शाहजहानाबाद से तीन मील दूर दक्षिण में ख्वाजा निजामुद्दीन की दरगाह पर पहुंचा। उसने अपना सारा खजाना निजामी खानदान के वारिसों के पास अमानत के तौर पर रख दिया जिसमें एक संदूक उन पवित्र चीजों का था जिनके बारे में दुनिया के बहुत कम लोग जानते थे।

इस सामग्री में पैगम्बर की दाढ़ी के तीन पवित्र बाल भी थे जो तैमूरी खानदान में चौदहवीं सदी से बाप से बेटे को पवित्र विरासत के रूप में मिलते रहे थे और जफर को उनसे बेहद लगाव था। महल की डायरी और दूसरे संदर्भों से पता चलता है कि विशेष अवसरों पर बहादुरशाह जफर स्वयं अपने हाथों से उन पवित्र बालों को गुलाबजल से धोता था।

यह समस्त सामग्री निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर सुरक्षित रख देने के बाद बादशाह ने दरगाह में अपनी और अपने परिवार की सलामती के लिए दुआ मांगी। दरगाह के पीरजादे ने बादशाह को बहुत साधारण नाश्ता करवाया।

नाश्ता करने के बाद बादशाह फूट-फूट कर रोने लगा तथा पीरजादा से कहने लगा-

‘मैं हमेशा से जानता था कि ये बागी हमारे सिर पर मुसीबत लाएंगे। मुझे शुरू से ही बहुत से अंदेशे थे और अब वे सब सच साबित हो रहे हैं। ये सिपाही अंग्रेजों के सामने भाग खड़े हुए। हालांकि मैं एक दरवेश हूँ और मेरा मिजाज सूफियाना और फकीराना है लेकिन मेरी रगों में जो अजीम खून दौड़ रहा है, वह मुझे खून की आखिरी बूंद तक लड़ने के लिए तैयार रखेगा। मेरे बुजुर्गों ने इससे भी ज्यादा बुरे दिन देखे थे लेकिन वे कभी हिम्मत नहीं हारे। लेकिन मैंने किस्मत का लिखा पढ़ लिया है।

मुझे अपनी नजरों के सामने यह मुसीबत नजर आ रही है जो मेरी नस्ल की शान को खत्म कर देगी और अब कोई शक नहीं रहा कि मैं तैमूर घराने का आखिरी हूँ जो हिंदुस्तान के तख्त पर बैठा। मुगल हुकूमत का चिराग भड़क रहा है तथा सिर्फ चंद घंटे और रौशन रहेगा।

जब मुझे यह मालूम है तो मैं क्यों बेकार का और खून बहने की वजह बनूं! इसलिए मैंने किला छोड़ दिया। अब यह मुल्क खुदा के हवाले है और यह उसकी मिल्कियत है। वह जिसे चाहे सौंपे।’

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इसके बाद बाबर का आखिरी वंशज अपनी पालकी में बैठकर अपने गर्मियों के महल को चल दिया जो महरौली में कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह के पास स्थित था। वहीं पर उसे प्रधान सेनापति बख्त खाँ मिलने वाला था। बादशाह अभी थोड़ी दूर ही गया था कि इलाही बख्श घोड़ा दौड़ाता हुआ बादशाह के पास आया और बादशाह से कहने लगा कि गूजरों का एक गिरोह रास्ते में हर एक को लूट रहा है जैसा उन्होंने पहले अंग्रेजों के साथ किया था। विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि इलाही बख्श ने जो कहा था, वह सच था किंतु जफर को मालूम नहीं था कि इलाही बख्श हॉडसन का वेतनभोगी कर्मचारी था और वह हॉडसन के कहने पर ही बाहदशाह को ढूंढता हुआ वहाँ आया था।

बादशाह अंग्रेजों के हाथों में पड़ने से बचता फिर रहा था और हॉडसन अपना खेल खेल रहा था। वह भी नहीं चाहता था कि बादशाह अंग्रेजों के हाथों में पड़ जाए। वह बादशाह को एक सुरक्षित स्थान में जाकर छिप जाने देना चाहता था ताकि समय आने पर वह बादशाह को गिरफ्तार करके कम्पनी सरकार के सामने स्वयं को अत्यंत योग्य अधिकारी सिद्ध कर सके।

विलियम हॉडसन ने बेगम जीनत महल से एक गुप्त समझौता समय रहते ही कर लिया था कि जब भी बागियों का अंत हो जाएगा तो बादशाह तथा बेगम को विलियम हॉडसन के समक्ष आत्मसमर्पण करना पड़ेगा। इसके बदले में विलियम हॉडसन कम्पनी सरकार से यह वचन लेगा कि कम्पनी सरकार बादशाह बहादुरशाह जफर, बेगम जीनत महल, शहजादे जवांबख्त और जीनत के पिता मिर्जा कुली खाँ की जान नहीं लेगी।

इस समझौते में बहादुरशाह जफर की अन्य बेगमों एवं उनके पुत्रों का कोई उल्लेख नहीं था किंतु यह बात न तो बादशाह को पता थी और न कम्पनी सरकार के किसी अन्य अधिकारी को। इसलिए बादशाह विचार कर रहा था कि वह अपने प्रधान सेनापति बख्त खाँ से मिलकर उसकी सहायता से दिल्ली से बाहर चला जाए।

यही कारण था कि बादशाह ने इलाही बख्श की बात नहीं मानी और कुतुब साहब की दरगाह की तरफ बढ़ना जारी रखा किंतु जब इलाही बक्श ने कहा कि बेगम जीनत महल ने हॉडसन से सारी बातें तय कर ली हैं तथा बेगम जीनत महल भी निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर पहुंचने वाली हैं तो बादशाह वापस निजामुद्दीन की दरगाह की तरफ मुड़ गया। कुछ देर बाद बेगम जीनत महल निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर आई तथा बादशाह को लेकर हुमायूँ के मकबरे पर चली गई जो निजामुद्दीन की दरगाह से अधिक दूर नहीं था।

पाठकों की सुविधा के लिए यह बता देना समीचीन होगा कि हुमायूँ का मकबरा एक विशाल भवन है जिसमें मुगल बादशाहों, बेगमों, शहजादियों की कब्रें बनी हुई हैं। इनकी संख्या इतनी अधिक है कि इसे मुगलों का कब्रिस्तान भी कहा जाता है। इस मकबरे का निर्माण सोलहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में अकबर के शासन काल में हुआ था। बहादुरशाह जफर के समय की दिल्ली में इससे बड़ा और इससे शानदार भवन और कोई नहीं था।

बादशाह ने हुमायूँ के मकबरे पर पहुंचकर लाल किले में स्थित अपने विश्वसनीय अधिकारी के नाम गुप्त संदेश भेजा कि वह बादशाह के हाथी, हकीम अहसनुल्लाह की हवेली पर भेज दे तथा हकीम अहसनुल्लाह से कहे कि वह शाही खानदान के पास मकबरे पर आ जाए। इसके बाद बादशाह अपने पूर्वजों के मकबरे के अंदर के तहखाने में इंतजार और दुआ करने चला गया।

इधर तो यह सब घटनाएं हो ही रही थीं और उधर पूरी दिल्ली में यह सूचना आग की तरह फैल गई कि बहादुरशाह जफर ने आखिर वही कर दिखाया जिसे करने की धमकी वह लम्बे समय से दे रहा था। अर्थात् बाबर का आखिरी वंशज किला छोड़कर ख्वाजा कुतुब की दरगाह पर चला गया। जनता यही समझती थी कि बादशाह कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह पर गया है क्योंकि बादशाह कहाँ है, इस सूचना को बहुत सावधानी के साथ गुप्त रखा गया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लाल किले में हत्याकाण्ड

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लाल किले में हत्याकाण्ड

अंग्रेज अधिकारियों को जब ज्ञात हुआ कि शाही परिवार लाल किला छोड़कर भाग गया है तब उन्होंने लाल किले में हत्याकाण्ड करने का निश्चय किया। अंग्रेजों ने लाल किले में रहने वालों को तीतरों की तरह मार डाला!

ऐसा करके वे दिल्ली की जनता को संदेश देना चाहते थे कि कोई भी हिन्दुस्तानी अंग्रेजों का सामना करने का साहस न कर अन्यथा वह भी उसी तरह मारा जाएगा जिस तरह लाल किले के भीतर रहने वाले शाही खानदान के लोग मार दिए गए हैं।

अब बहादुरशाह जफर और उसका परिवार पूरी तरह से हॉडसन के जाल में फंस चुका था। बादशाह यह समझ रहा था कि वह अंग्रेजों को चकमा देकर लाल किले से निकलने में सफल रहा है किंतु वास्तविकता यह थी कि वह हॉडसन का बंदी हो गया था। एक मासूम परिंदा बहेलिये के जाल में बंद था और मासूमियत की इन्तिहां यह थी कि परिंदा समझ रहा था कि बहेलिया कभी भी उस तक नहीं पहुंच सकता।

विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि बहादुरशाह जफर की क्रांतिकारी सेनाओं के मुख्य सेनापति बख्त खान तथा अन्य क्रांतिकारियों ने बादशाह से अनुरोध किया कि वे भी बादशाह के साथ हुमायूँ के मकबरे में रहेंगे ताकि बादशाह की रक्षा की जा सके किंतु बादशाह का विचार था कि ऐसा करना अधिक खतरनाक होगा क्योंकि अंग्रेज अधिकारी तो क्रांतिकारी सैनिकों से बदला लेने के लिए उन्हें खोज रहे हैं, इसलिए अंग्रेज अधिकारी बादशाह तथा उसके परिवार को नहीं मारेंगे। इस प्रकार हुमायूँ के मकबरे में बादशाह और उसका परिवार बिना किसी सिपाही के अकेले ही रह गए।

वीर सावरकर ने लिखा है कि सेनापति बख्त खाँ ने बादशाह को सुझाव दिया था कि वह क्रांतिकारियों के साथ दिल्ली से बाहर निकल जाए क्योंकि आत्मसमर्पण करने से बेहतर होगा कि हम लड़ते हुए मरें किंतु बादशाह ने बख्त खाँ का यह निमंत्रण अस्वीकार कर दिया और हुमायूँ के मकबरे में जाकर छिप गया तथा मिर्जा इलाही बख्श का परामर्श मानकर अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण करने पर विचार करने लगा।

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जब दिल्ली की बची खुची जनता को यह ज्ञात हुआ कि बादशाह और बेगमें भी लाल किला छोड़कर भाग गए तो दिल्ली से जन साधारण के पलायन की गति और तेज हो गई। विलियम डेलरिम्पल ने लिखा है कि दिल्ली की जनता में यह सूचना फैल गई कि दिल्ली से बाहर निकलने वालों को गूजर और मेवाती मार रहे हैं तो दिल्ली के लोग अजमेरी दरवाजे से निकलने की बजाय कश्मीरी दरवाजे की तरफ बढ़े क्योंकि बहुत से लोगों को लगता था कि उन्हें अंग्रेजों की बजाय गूजरों और मेवातियों से अधिक खतरा है।

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जब कश्मीरी दरवाजे पर नियुक्त अंग्रेज सिपाहियों ने देखा कि दिल्ली की जनता उनकी तरफ भागी आ रही है तो अंग्रेजों ने उन पर गोलियों की ताबड़तोड़ बौछार कर दी। इससे बहुत से निरपराध लोग मारे गए। अंग्रेज सिपाहियों द्वारा इन लोगों की तलाशी ली गई तथा उनके समस्त जेवर एवं रुपए छीन लिए गए। बहुत से दिल्ली वासियों ने दिल्ली से बाहर निकलकर प्रायः वही रास्ते पकड़े जिन पर चार महीने पहले अंग्रेज भागे थे। अर्थात् करनाल एवं मेरठ की ओर जाने वाले रास्ते।

हैरियट टाइटलर नामक एक अंग्रेज औरत जो 11 मई को स्वयं दिल्ली से जीवित बचकर करनाल भागी थी और अब दिल्ली लौट आई थी, उसने लिखा है- ‘कितना दर्दनाक दृश्य था जब औरतों और बच्चों की भीड़ कश्मीरी और मोरी दरवाजे से बाहर आ रही थी। इनमें वे औरतें भी थीं जो कभी अपने घरों से बाहर नहीं निकली थीं। जो अपने सहन में भी बस कुछ कदम ही चलती थीं और वे भी अपने नौकरों या घरवालों के साथ। अब उन्हें न केवल यूरोपियन सिपाहियों अपितु अपने लोगों के भी घूरने का सामना करना पड़ रहा था। मुझे उन पर बहुत तरस आ रहा था विशेषकर ऊंची जाति की उन हिन्दू औरतों पर जिनके लिए निचली जाति की औरतों के साथ चलना बहुत तकलीफदेह था।’

18 सितम्बर 1857 को अंग्रेजों ने जामा मस्जिद पर अधिकार कर लिया। अब वे लाल किले से अधिक दूर नहीं रह गए थे। 19 सितम्बर की रात में अंग्रेजों ने लाल किले के सामने मोर्चा बना लिया। इसके लिए दिल्ली बैंक के ध्वस्त भवन के मलबे का उपयोग किया गया।

तोपें जमा दी गईं और उनके पीछे गोला-बारूद रख दिया गया। आसपास के भवनों पर अंग्रेज सिपाहियों को बंदूकों के साथ तैनात कर दिया गया ताकि यदि कोई आदमी किले से बाहर निकलकर आए तो उसे उसी क्षण भून दिया जाए।

सर थॉमस मेटकाफ के जंवाई सर एडवर्ड कैंपबैल ने स्वयं अपनी निगरानी में यह तैयारी करवाई। वह भारत के इतिहास का एक पुराना पन्ना हमेशा के लिए फाड़कर नष्ट करने जा रहा था और एक नया पन्ना लिखने जा रहा था। उसने 20 सितम्बर की सुबह लगभग 10 बजे अपने सिपाहियों को बारूद के कुछ थैले लाल किले के मुख्य दरवाजों के नीचे रखने के लिए दौड़ाया, इन सिपाहियों पर लाल किले से हमला न हो, इसके लिए अंग्रेजों ने किले की तरफ खूब गोलियां बरसाईं।

विलियम हॉडसन को मालूम था कि इस समय किले में अंग्रेजों का सामना करने वाला कोई नहीं है किंतु उसने यह सूचना जानबूझ कर अपने जनरल को नहीं दी। हॉडसन चाहता था कि जनरल कैंपबैल को लगे कि उसने लाल किले को बड़ी मुश्किल से जीता है तथा बादशाह मौके का लाभ उठाकर कहीं फरार हो गया है और बाद में हॉडसन बहादुरशाह को बंदी बनाकर जीत का सारा श्रेय स्वयं ले ले।

हॉडसन ने बड़े आश्चर्य के साथ देखा कि भले ही बहादुरशाह जफर का कोई सिपाही या बख्त खाँ की सेना का कोई सिपाही इस समय लाल किले की रक्षा के लिए आगे नहीं आया किंतु दिल्ली के कुछ सिरफिरे लोग अब भी बंदूकें लेकर लाल किले की रक्षा के लिए खड़े थे जो स्वयं को गाजी कहते थे और इसलिए मृत्यु का वरण करने आए थे कि उन्हें कभी भी वह दिन न देखना पड़े जब अंग्रेज बहादुरशाह को बंदी बनाएं या उसे मार डालें। बादशाह से पहले वे स्वयं मर जाना चाहते थे!

लेफ्टिनेंट फ्रेड मेसी इस आक्रमण में शामिल था। उसने इस आक्रमण का वर्णन अपनी माँ एवं बहनों को लिखे पत्रों में किया है। वह लिखता है कि जैसे ही लाल किले के दरवाजे के पास रखे बारूद के थैलों में विस्फोट हुआ, वैसे ही उस विशालाकाय दरवाजे का एक हिस्सा तेज आवाज के साथ धरती पर गिर पड़ा और हम लोग नारे लगाते हुए किले में घुस गए। हमने लाल किले में दिखाई देने वाले इक्का दुक्का आदमियों को तीतरों की तरह गोलियों से उड़ा दिया।

सदियों से इस धरती पर यही परम्परा रही है, कमजोर को देखकर ताकतवर का गुस्सा और ज्यादा खतरनाक हो जाता है, लाल किले में घुसे अंग्रेज भी इस समय जबर्दस्त गुस्से में थे।

लाल किले में हत्याकाण्ड में ऐसे लोग भी मारे गए जो सैनिक नहीं थे, जिहादी नहीं थे, बादशाह के परिवार के नहीं थे, अपितु तांगा एवं बैलगाड़ी चलाकर रोजी-रोटी कमाने वाले थे। वे लाल किले के महलों में बर्तन मांजते थे, कपड़े धोते थे या फिर झाड़ू-बुहारी करते थे, अंग्रेज सिपाहियों ने अप्रतिम शौर्य का प्रदर्शन करते हुए इन निर्धन और निर्दोष लोगों को मार डाला। मानो लाल किले में हत्याकाण्ड से प्रसन्न होकर लंदन में बैठी महारानी विक्टोरिया उन्हें विक्ट्री क्रॉस से सम्मानित करेगी और उन्हें अंग्रेजी पलटन का मेजर जनरल बना देगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाही बेगमों के कपड़े

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शाही बेगमों के कपड़े

जब अंग्रेज अधिकारियों ने लाल किले में हत्याकाण्ड करने की नीयत से प्रवेश किया तब दिल्ली के सैंकडों गुण्डे भी लाल किले में घुस गए। उन लोगों ने शाही असबाब लूटना आरम्भ किया तो अंग्रेज सिपाही भी इसी काम में लग गए। अधिकतर लोग शाही बेगमों के कपड़े लूटना चाहते थे।

शाही बेगमों के कपड़े इतिहास का विषय तो नहीं हो सकते किंतु यह जानकार कितनी हैरानी होता है कि अंग्रेजों ने लाल किले में घुसकर शाही बेगमों के कपड़े लूट लिए!

20 सितम्बर 1857 की दोपहर होने से पहले ही अंग्रेजी सेना लाल किले में घुस चुकी थी और अंग्रेज सिपाही पागल कुत्तों की तरह भारत के निर्दोष एवं निरीह लोगों को अपनी गोलियों से छलनी करते हुए बादशाह बहादुरशाह जफर और उसके परिवार को ढूंढ रहे थे। विलियम हॉडसन भी चुपचाप अपनी बंदूक ताने हुए उन सिपाहियों के साथ चल रहा था। केवल वही जानता था कि बादशाह और उसका परिवार कहाँ है, किंतु वह बड़ी चालाकी से बादशाह को लाल किले में ढूंढता रहा।

लेफ्टिनेंट फ्रेड मेसी ने लिखा है- ‘लाल किले के भीतर पतली गलियों वाला एक पूरा शहर बसा हुआ था। हम लोग बादशाह को ढूंढने लगे। हमने धरती पर घायल पड़े हुए एक मुस्लिम युवक से पूछा कि बादशाह और उसका परिवार कहाँ है तो उसने कहा कि बादशाह का पूरा परिवार इस महल के सबसे भीतरी कमरे में है।

वह लड़का जानबूझ कर झूठ बोल रहा था क्योंकि उसे पता था कि बादशाह अपने परिवार के साथ कई दिन पहले ही लाल किला छोड़कर जा चुका है। हमने लाल पर्दा हटाकर महल के अंतःपुर में प्रवेश किया। अंतःपुर के सारे कमरों, भण्डारों, रसोईघरों, गुसलखानों, अलमारियों और बक्सों को देख मारा किंतु हमें बादशाह या उसके परिवार का एक भी सदस्य नहीं मिला।’

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

जब बादशाह और उसका परिवार नहीं मिला तो हमारे सैनिक, अंग्रेज अधिकारियों की परवाह करना छोड़कर लाल किले के महलों को लूटने में व्यस्त हो गए। न जाने कहाँ से शहर से बदमाशों की टोलियां भी आ गईं। उन्होंने महलों के पर्दे, चद्दरें, बर्तन-भाण्डे, घोड़ों का सजावटी सामान, औरतों और मर्दों के लिबास झाड़-फानूस, किताबें, पिस्तौलें, मिठाइयां, शर्बत और शराब की बोतलें लूट लिए।

जो दुपट्टे, कमीजें, सलवारें, घाघरे और गरारे कल तक मुगल बेगमें और शहजादियां पहनती थीं, उन दुपट्टों, कमीजों सलवारों, घाघरों और गरारों को अंग्रेज और अंग्रेजी सेना के भारतीय सिपाही अपनी बीवियों के लिए ले जा रहे थे। देखते ही देखते शाही बेगमों के कपड़े लूटने की होड़ मच गई।

लेफ्टिनेंट फ्रेड मेसी ने लिखा है कि यह सारा सामान किसी काम का नहीं था किंतु मैंने भी एक नया हवाई गद्दा उठा लिया जो बाद में मैंने जनरल कैम्पबैल से अनुमति लेकर अपनी पत्नी मैसी को दे दिया। मैसी ने वह हवाई गद्दा अपनी पहाड़ी पालकी में बिछा लिया।

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जब बादशाह लाल किले में नहीं मिला तो अंग्रेज सिपाहियों ने यमुना नदी पर नावों को जोड़कर बनाए गए पुल के पास स्थित सलीमगढ़ पर भी हमला किया। बादशाह और उसके परिवार को वहाँ भी पूरी सावधानी से ढूंढा गया किंतु वे लोग वहाँ भी नहीं मिले, कहीं भी नहीं मिले! अंग्रेज अधिकारियों का अनुमान था कि बागी सिपाही बूढ़े और बेदम बादशाह को लेकर दिल्ली से अधिक दूर नहीं गए होंगे। इसलिए उन्होंने बादशाह के भाग जाने की अधिक चिंता नहीं की और वे दिल्ली की जीत का जश्न मनाने की तैयारियों करने लगे।

उसी शाम अंग्रेजों ने जामा मस्जिद के अंदर नाचना शुरु किया। जनरल कैम्पबैल ने मलिका विक्टोरिया के नाम पर जाम पेश किया- ‘फॉर सक्सेस ऑफ हर हाईनेस, मे द क्वीन लॉंग लिव।’ पंजाब से आई सिक्ख सेना ने मस्जिद के पवित्र मेहराब के सामने फतह की खुशी में आग जलाई अर्थात् कैम्प फायर का आयोजन किया। मेजर जनरल आर्कडेल विल्सन और उसका हैडक्वार्टर सेंट जेम्स चर्च को छोड़कर किले के दीवाने खास में रहने के लिए आ गए। जहाँ उनके सामने ‘हैम’ अर्थात् सूअर के मांस और अण्डों का डिनर परोसा गया।

दिल्ली के ब्रिटिश अधिकारियों ने लाहौर तार भेजकर सूचित किया कि दिल्ली की समस्त कठिनाइयां समाप्त हो गई हैं। बंगाल इन्फैण्ट्री की बगावत को कुचल दिया गया है और लॉर्ड क्लाइव तथा जनरल लेक के दिन लौट आए हैं।

जिस दिन विजेता अंग्रेज जामा मस्जिद में विजय का जश्न मना रहे थे, उस दिन ब्रिगेडियर जॉन निकल्सन रिज पर स्थित एक सैनिक तम्बू में पड़ा हुआ अपनी आखिरी सांसें गिन रहा था। उसका दोस्त नेविली चैम्बरलेन उसके पास यह सूचना लेकर गया कि लाल किला फतह कर लिया गया है तथा बादशाह और उसका परिवार किला छोड़कर भाग चुके हैं तो निकल्सन ने कहा कि मेरी अंतिम इच्छा पूरी हुई।

इसके तीन दिन बाद से 23 सितम्बर 1857 को वह मर गया। बहादुरशाह जफर के प्रिय महताब बाग में लगी एक संगमरमर की चौकी को उखाड़कर उसके नीचे निकल्सन के शव को गाढ़ दिया गया।

जिस समय अंग्रेजों ने लाहौर को यह तार भिजवाया था कि दिल्ली की कठिनाइयां समाप्त हो गई हैं, वस्तुतः उस समय दिल्ली में कठिनाइयों का एक नया युग आरम्भ हो रहा था। बहुत से अंग्रेज सिपाहियों को लग रहा था कि हमारे कुछ साथी लाल किले से मिले लूट के माल से मालामाल हो गए हैं किंतु हमें कुछ भी नहीं मिला। इसलिए वे दिल्ली के उन मौहल्लों में निकल गए जहाँ कभी दिल्ली के धनी-मानी लोग रहते थे।

अंग्रेज सिपाही इन धनी-मानी लोगों को लूटना चाहते थे किंतु अब वहाँ सन्नाटा था और लूटे जाने के लिए कपड़े और बर्तनों के अतिरिक्त शायद ही कुछ बचा था। कुछ स्थानों पर क्रांतिकारी सिपाहियों के तम्बू लगे हुए मिले जो अधिकतर खाली थे किंतु कुछ तम्बुओं में अब भी घायल और बीमार सिपाही पड़े हुए थे जिन्हें अंग्रेज सिपाहियों ने तुरंत गोलियां मार दीं।

शहर में स्थान-स्थान पर उन कपड़ों और बर्तनों का ढेर लगा हुआ था जिन्हें दिल्ली के गुण्डों ने धनी-मानी लोगों के घरों से लूटा था किंतु जब वे गुण्डे भी अंग्रेज सिपाहियों द्वारा मार दिए गए या अंग्रेजों के भय से दिल्ली खाली करके भाग गए तो यह सामान किसी के काम का नहीं रहा। अब वह सामान कचरे के ढेर के रूप में स्थान-स्थान पर पड़ा हुआ था। अंग्रेज सिपाहियों ने बागी सिपाहियों के शव उठाकर उन्हीं ढेरों पर फैंक दिए और उनमें आग लगा दी।

इसके बाद अंग्रेज सिपाहियों को आदेश दिए गए कि वे दिल्ली की सफाई कर दें। इस सफाई का अर्थ यह था कि दिल्ली में एक भी आदमी जीवित नहीं बचे। उन्हें गोलियों से उड़ा दिया जाए। दिल्ली वासियों को यह सजा इसलिए दी जा रही थी कि उन्होंने 11 मई 1857 को दिल्ली की सड़कों पर गिरते हुए अंग्रेजों के शव अपनी आंखों से देखे थे।

यद्यपि इस समय तक दिल्ली में बहुत अधिक लोग नहीं रह गए थे किंतु बूढ़े, बीमार, विकलांग, लाचार, विक्षिप्त, गर्भवती महिलाएं जिनके प्रसव निकट थे, अब भी दिल्ली की गलियों और घरों के तहखानों में छिपे हुए थे, इन्हें ढूंढ-ढूंढ कर निकाला गया और गोलियों से भूनकर अंग्रेज शक्ति का विकराल परिचय दिया गया। मरने वालों में अब इतनी शक्ति नहीं रह गई थी कि वे मरते समय आर्त्तनाद करें, वे चुपचाप गोलियां खाते थे और निर्जीव कुंदे की तरह धरती पर गिर जाते थे।

देखा जाए तो विजेता का परिचय उसके द्वारा की गई हिंसा ही होती है। यदि प्राचीन भारतीय नरेशों की सेनाओं को अपवाद मानकर अलग कर दिया जाए तो धरती के प्रत्येक स्थान पर और मानव सभ्यता के प्रत्येक युग में विजेताओं ने पराजितों को अपना परिचय इसी प्रकार मौत और खून से दिया है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि अंग्रेज फिर से दिल्ली के स्वामी हो गए थे किंतु यह वह दिल्ली नहीं थी जिसे वे चार महीने पहले छोड़कर गए थे। यह तो एक विशाल शमशान था जिसमें चारों ओर कुछ आधे जले हुए और कुछ बिना जले हुए शव बिखरे हुए थे।

शाही बेगमों के कपड़े लूटने के बाद जब कुछ अंग्रेज अधिकारियों को अपने पुराने भारतीय मित्रों और उनके साथ बिताए हुए अच्छे दिनों की याद आई तो वे उन्हें ढूंढते हुए उनकी हवेलियों और कोठियों पर गए किंतु वहाँ सड़ती हुई लाशों के अतिक्ति कुछ नहीं देख सके। लेफ्टिनेंट एडवर्ड ओमैनी ने लिखा है- ‘दिल्ली के डेढ़ लाख शहरियों में से लगभग सब जा चुके थे।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बहादुरशाह जफर की गिरफ्तारी

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बहादुरशाह जफर की गिरफ्तारी

बहादुरशाह जफर की गिरफ्तारी लाल किले में घटने वाली कोई अनोखी घटना नहीं थी। लाल किले ने तो अपने बादशाहों को जूतितयों से पिटते हुए, शहजादियों के बलात्कार होते हुए, बादशाहों की आंखें फोड़े जाते हुए और जिल्लइलाहियों के सिर काटे जाते हुए देखे थे। हॉडसन बादशाह को बंदी बनाकर लाल किले में ले आया!

20 सितम्बर 1857 की रात को बादशाह बहादुरशाह जफर की क्रांतिकारी सेना के प्रधान सेनापति बख्त खाँ ने हुमायूँ के मकबरे पर पहुंचकर एक बार पुनः बादशाह से अनुरोध किया कि बादशाह उसके साथ लखनऊ चलें किंतु बादशाह से गद्दारी करके हॉडसन के लिए काम कर रहे इलाही बख्श ने एक बार फिर बादशाह को यह कहकर बख्त खाँ के साथ जाने से रोक दिया कि अंग्रेज कभी भी बादशाह सलामत को कुछ नहीं कहेंगे, आप किसी भी हालत में दिल्ली मत छोड़िए।

बेगम जीनत महल भी नहीं चाहती थी कि बादशाह दिल्ली छोड़कर भागे क्योंकि उसे पूरा विश्वास था कि हॉडसन अपने वायदे पर स्थिर रहेगा और पहले से तय शर्तों के अनुसार बादशाह बहादुरशाह जफर, बेगम जीनत महल, शहजादे जवां बख्त तथ जीनत महल के पिता मिर्जा कुली खाँ को सुरक्षा देगा।

जीनत महल को यह भी विश्वास था कि वह हॉडसन को प्रसन्न करके अपने बेटे जवां बख्त को बादशाह का उत्तराधिकारी घोषित करवा लेगी और उसके बाद सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा।

बादशाह तथा बेगम का यह रुख देखकर सेनापति बख्त खाँ निराश होकर चला गया किंतु इलाही बख्श सतर्क हो गया। उसे लगा कि बादशाह कभी भी अपना निश्चय बदल सकता है तथा दिल्ली से भाग सकता है। इसलिए उसी रात वह विलियम हॉडसन से मिला। संभवतः जीनत महल एवं अहसन उल्लाह खाँ भी चाहते थे कि अब हॉडसन हुमायूँ के मकबरे में आकर शाही परिवार को वहाँ से निकाल ले।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

इलाही बख्श ने विलियम हॉडसन को बताया कि बादशाह के पास शाही आभूषण, कीमती हीरे एवं सम्पत्ति की एक सूची है। यदि हॉडसन ने आज ही रात बहादुरशाह जफर की गिरफ्तारी नहीं की तो बादशाह कहीं भी जा सकता है।

हॉडसन किसी भी कीमत पर बादशाह को हाथ से नहीं निकलने देना चाहता था। इसलिए वह तुरंत मेजर जनरल विल्सन के पास गया तथा उससे कहा कि जासूसों से मिली सूचना के अनुसार बादशाह और उसका परिवार हुमायूँ के मकबरे में छिपा हुआ है तथा वहाँ से कहीं भी भाग सकता है। इसलिए उचित यही होगा कि बादशाह तथा उसके परिवार को तुरंत बंदी बना लिया जाए।

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हॉडसन का यह प्रस्ताव सुनकर विल्सन भयभीत हो गया। उसने कहा कि ऐसा करने से अंग्रेजों की कठिनाइयां बढ़ जाएंगी किंतु हॉडसन तथा नेविल चैम्बरलेन अपनी बात पर अड़े रहे। इस पर विल्सन ने उनसे कहा कि वे स्वयं इस विषय को देखें तथा कम से कम सिपाही लेकर हुमायूँ के मकबरे पर जाएं ताकि किसी को यह संदेह नहीं हो कि अंग्रेज सिपाही बहादुरशाह जफर की गिरफ्तारी करने जा रहे हैं। विलियम हॉडसन ने विल्सन की अनुमति मिल जाने के बाद मिर्जा इलाही बख्श तथा मौलवी रजब अली को हॉडसन्स हॉर्स के एक दस्ते के साथ हुमायूँ के मकबरे के लिए रवाना कर दिया तथा कुछ समय बाद स्वयं भी लगभग पचास घुड़सवारों के एक दस्ते के साथ मकबरे के लिए चल पड़ा।

बहादुरशाह जफर की गिरफ्तारी की सारी तैयारियां हो चुकी थीं और वह समय आ चुका था जब वह उस व्यक्ति को बंदी बना लिया जाए जिसके बारे में बहुत से अंग्रेजों का विश्वास था कि वह समस्त विद्रोह के केन्द्र में इस तरह था जैसे कि जाले के बीच मकड़ी! अलग-अलग लेखकों ने इन घटनाओं का वर्णन थोड़े बहुत अंतर के साथ किया है। 1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर लिखने वाले वीर विनायक दामोदर सावरकर ने लिखा है-

‘हॉडसन ने गद्दार इलाही बख्श की सूचना पर बहादुरशाह के तीन पुत्रों को हूमायूं के मकबरे से गिरफ्तार किया। वस्तुतः इलाही बख्श एक निकृष्टतम व्यक्ति था। इसी ने क्रांतिकारियों और राजमहल की प्रत्येक घटना से अंग्रेजों को सूचित किया था। उसके संकेत पर ही हॉडसन हुमायूँ के मकबरे में आ खड़ा हुआ।’

हुमायूँ के मकबरे पर चल रही गतिविधियों से जिहादियों की एक टोली को यह ज्ञात हो गया था कि बादशाह एवं उसका परिवार हुमायूँ के मकबरे में छिपा हुआ है। इसलिए कुछ जिहादी भी मकबरे के सामने आकर खड़े हो गए ताकि वे बादशाह की रक्षा कर सकें। जब इन जिहादियों ने मौलवी रजब अली तथा मिर्जा इलाही बख्श को हॉडसन्स हॉर्स के सिक्ख घुड़सवारों के साथ आते हुए देखा तो वे क्रोध से पागल हो गए।

जिहादियों को लगा कि रजब अली तथा इलाही बख्श ने बादशाह से गद्दारी की है तथा वे बादशाह को पकड़ने के लिए आए हैं। इसलिए जिहादियों ने मौलवी रजब अली तथा मिर्जा इलाही बख्श पर हमला कर दिया किंतु ये लोग किसी तरह जान बचाकर भागने में सफल रहे।

यद्यपि पूरी दिल्ली सुनसान और वीरान दिखाई देती थी किंतु इस समय आश्चर्यजनक रूप से हुमायूँ के मकबरे में बड़ी संख्या में शहजादे, दरबारी एवं जिहादी मौजूद थे और वे अपने बादशाह के लिए जान देने पर आमदा थे।

हुमायूँ के मकबरे से जान बचाकर भागते हुए मौलवी रजब अली तथा मिर्जा इलाही बख्श को सामने से आता हुआ हॉडसन मिल गया। उसने अपने इन जासूसों को फटकारा और कहा कि वे रिसालदार मानसिंह के साथ वापस मकबरे के भीतर जाएं तथा बादशाह से कहें कि यदि वह मकबरे से बाहर आकर समर्पण कर देगा तो उसके प्राण नहीं लिए जाएंगे और यदि बादशाह बाहर नहीं आएगा तो अंग्रेजी सेना मकबरे में घुसकर बादशाह सहित सभी लोगों को गोली मार देगी।

हॉडसन यह देखकर हैरान था कि बादशाह की गिरफ्तारी के मामले में सब कुछ वैसा नहीं हो रहा था, जैसा हॉडसन ने सोचा था। मौलवी रजब अली तथा मिर्जा इलाही बख्श को मकबरे के भीतर गए हुए दो घण्टे हो गए तो हॉडसन को लगा कि मौलवी रजब अली तथा मिर्जा इलाही बख्श तथा रिसालदार मानसिंह का कत्ल कर दिया गया है।

वह मकबरे के मुख्य दरवाजे पर डटा हुआ था और उसके घुड़सवारों ने मकबरे को चारों ओर से घेर रखा था। उसने थोड़ी प्रतीक्षा और की। अंत में रिसालदार मानसिंह मकबरे से बाहर आया और उसने हॉडसन को सूचित किया कि बादशाह सलामत बाहर आ रहे हैं।

थोड़ी ही देर में बादशाह की पालकी मकबरे से बाहर निकली। उसके पीछे बेगम जीनत महल, शहजादा जवां बख्त तथा जीनत का पिता मिर्जा कुली खाँ भय से कांपते हुए चल रहे थे। उनके पीछे बादशाह के दूसरे शहजादे और शाही परिवार के बहुत से लोग थे। उनके बाहर निकलते ही उन्हें चारों तरफ से जिहादियों ने घेर लिया।

हॉडसन ने जिहादियों से कहा कि वे दूर हट जाएं। इस पर बादशाह ने हॉडसन से पूछा कि क्या बादशाह की जान बख्श दी जाएगी? हॉडसन ने कहा कि यदि बागियों द्वारा बादशाह को छुड़ाने की कोशिश नहीं की गई तो उसकी जान अवश्य बख्श दी जाएगी! वीर सावरकर ने लिखा है- ‘प्राणरक्षा का आश्वासन पाकर बहादुरशाह ने अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।’

जब हॉडसन ने बादशाह बहादुरशाह जफर को आश्वासन दिया कि यदि बादशाह को छुड़ाने का प्रयास नहीं किया गया तो हॉडसन बादशाह के प्राण बख्श देगा तो बादशाह हॉडसन के साथ चलने को तैयार हो गया। उसकी पालकी को हॉडसन के सिक्ख घुड़सवारों ने घेर लिया। वहाँ उपस्थित जिहादी एवं शाही परिवार के लोग इन घुड़सवारों के पीछे चलने लगे। यहाँ से लाल किला लगभग 8 किलोमीटर दूर था।

जब बादशाह का काफिला दिल्ली शहर के परकोटे के पास पहुंचा तो जिहादी स्वतः ही गायब हो गए। केवल शाही परिवार के लोग पालकी के पीछे चलते रहे।

जब ये लोग लाहौरी दरवाजे के अंदर घुसने लगे तो दरवाजे पर नियुक्त दरबानों ने पूछा- ‘पालकी में किसे बिठाया हुआ है?’

हॉडसन ने जवाब दिया- ‘कोई नहीं, दिल्ली के बादशाह।’ इस पर दरबानों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

इसके बाद ये लोग चांदनी चौक से गुजरते हुए लाल किले में आ गए। बादशाह को जीनत बेगम के महल में बंदी बना लिया गया।

केंडल कॉगहिल नामक अंग्रेज अधिकारी ने लिखा है- ‘मुझे हिंदुस्तान के बादशाह का कैदी की हैसियत से स्वागत करने की संतुष्टि मिली। मैंने फौरन उसे बंद करके उस पर दो संतरी लगा दिए। मैंने बादशाह को सूअर और बहुत से ऐसे मुनासिब नामों से पुकारा और उससे हमारे खानदानों के बारे में पूछा। अगर वह सिर उठाकर भी देखता तो मैं उसे गोली मार देता और मैंने पहरेदारों को आदेश दिया कि यदि वह वहशी जरा भी हिले तो उसे फौरन मार गिराया जाए।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुगल शहजादों की हत्या

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मुगल शहजादों की हत्या

विलियम हडसन ने महंगे रत्न हड़पने के लिए मुगल शहजादों की हत्या कर दी। उसने दिल्ली के जिहादी नौजवानों के सामने ही बहादुरशाह के पुत्रों को नंगा किया और उन्हें गोली मार दी। जिहादी कुछ भी नहीं कर सके।

20 सितम्बर 1857 की रात्रि में विलियम हॉडसन बादशाह बहादुरशाह जफर, बेगम जीनत महल एवं शहजादे जवांबख्त को बंदी लेकर हुमायूँ के मकबरे से लाल किले में ले आया किंतु बादशाह के दो शहजादे मिर्जा मुगल और खिजर सुल्तान तथा बादशाह का पोता अबू बकर अभी भी विलियम हॉडसन की पकड़ से दूर थे।

इलाही बख्श जानता था कि ये तीनों शहजादे कहाँ हैं किंतु उसने जानबूझ कर यह सूचना विलियम हॉडसन से छिपाई थी। इसके दो कारण थे। पहला कारण तो यह था कि इलाही बख्श यह देखना चाहता था कि विलियम हॉडसन अपने उस वचन पर स्थिर रहता है या नहीं कि यदि बादशाह आत्म समर्पण कर देगा तो हॉडसन बहादुरशाह जफर, बेगम जीनत महल, उसके पिता मिर्जा कुली खाँ और शहजादे जवांबख्त को जान से नहीं मारेगा।

दूसरा कारण यह था कि बादशाह का पोता मिर्जा अबू बकर इलाही बख्श की बेटी का पुत्र था। इलाही बख्श नहीं चाहता था कि अबू बकर हॉडसन के हाथ लगे किंतु जब इलाही बख्श ने देखा कि हॉडसन ने शाही परिवार के किसी भी व्यक्ति को जान से नहीं मारा तो 21 सितम्बर 1857 की प्रातः दुष्ट इलाही बख्श ने हॉडसन को यह सूचना दे दी कि शहजादे मिर्जा मुगल और खिजर सुल्तान तथा बादशाह का पोता अबू बकर भी हुमायूँ के मकबरे में छिपे हुए हैं।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

यह सूचना पाते ही विलियम हॉडसन की बांछें खिल गईं। संभवतः इलाही बख्श यह सोचता था कि वह अपने दौहित्र को मरने से बचा लेगा इसलिए उसने शहजादों के प्राण बख्शने की प्रार्थना की किंतु विलियम हॉडसन ने इलाही बख्श की एक भी दलील नहीं सुनी और वह सीधा मेजर जनरल विल्सन के पास पहुंचा।

हॉडसन ने जब विल्सन को बताया कि तीन शहजादे अब भी मकबरे में छिपे बैठे हैं और मुझे उन्हें पकड़ने की अनुमति चाहिए तो विल्सन भड़क गया। वह इस बात से चिढ़ा हुआ बैठा था कि हॉडसन बड़ी चालाकी से जीत का सेहरा अपने सिर पर बांधता जा रहा है। इसलिए विल्सन ने विगत रात्रि की ही भांति जवाब दिया कि जो करना है, अपने बलबूते पर करो। यह सुनते ही हॉडसन अपने एक सौ घुड़सवारों को लेकर हुमायूँ के मकबरे की तरफ चल दिया। इस समय सुबह के आठ बजे थे। मौलवी रजब अली तथा इलाही बख्श आज भी हॉडसन के साथ थे।

हुमायूँ के मकबरे का दृश्य एक ही रात में बदल चुका था। आज वहाँ कल की तरह मुट्ठी भर जिहादी नहीं थे। केवल एक रात में शहजादों ने पूरी तैयारी कर ली थी। आज हुमायूँ के मकबरे में तीन हजार सशस्त्र मुसलमान मौजूद थे जो शहजादों को अंग्रेजों द्वारा बंदी बनाए जाने से रोकने के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने को आए थे।

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हॉडसन ने मौलवी रजब अली तथा इलाही बख्श से कहा कि कि वे मकबरे के भीतर जाएं तथा शहजादों से बात करके उन्हें आत्मसमर्पण के लिए तैयार करें। मौलवी रजब अली तथा इलाही बख्श को जिहादियों के विरोध का सामना करना पड़ा। जिहादी हर हाल में लड़ते हुए मरना चाहते थे किंतु शहजादों ने उन्हें शांत किया तथा अपनी ओर से प्रस्ताव भिजवाया कि यदि उनकी जान बख्शने का वचन दिया जाए तो वे आत्मसमर्पण करने को तैयार हैं।

इस पर हॉडसन ने जवाब भिजवाया कि समर्पण बिना शर्त होगा। मेजर मॉकडॉवेल भी इस अवसर पर हुमायूँ के मकबरे पर मौजूद था। उसने लिखा है कि हम केवल एक सौ घुड़सवारों को लेकर आए थे तथा दिल्ली यहाँ से 6 मील दूर था जबकि मकबरे में इस समय लगभग तीन हजार सशस्त्र जिहादी मौजूद थे। मकबरे के निकट निजामुद्दीन की बस्ती में भी हथियारों से लैस तीन हजार मुसलामन तैयार थे जो किसी भी समय मकबरे में पहुंच सकते थे। जब हॉडसन ने शहजादों के बिना शर्त आत्मसमर्पण की बात कही तो जिहादियों में उत्तेजना बढ़ गई किंतु अंत में शहजादों ने आत्मसमर्पण करने का ही निर्णय लिया। संभवतः उन्हें लगता था कि शाही परिवार के सदस्यों को जान से नहीं मारा जाएगा।

वीर सावरकर ने लिखा है- ‘उसी समय विश्वासघाती इलाही बख्श और मुंशी रजबअली ने अंग्रेज अधिकारियों के चरणों में उपस्थित होकर उन्हें यह सूचना दी कि शहजादे तो अभी भी हुमायूँ के मकबरे में छिपे बैठे हैं। यह सूचना मिलने पर कैप्टन हडसन ने तुरंत ही प्रस्थान कर दिया तथा शहजादों को बंदी बनाकर एक गाड़ी में बैठा दिया।’

शहजादों को बंदी बनाते ही हॉडसन ने जिहादियों को आदेश दिया कि यदि वे शहजादों की सलामती चाहते हैं तो अपने हथियार धरती पर रख दें। हॉडसन को भय था कि यदि वह इन लोगों को निशस्त्र किए बिना ही यहाँ से निकल गया तो ये लोग पीछे से आकर हॉडसन एवं उसके साथियों पर हमला बोल देंगे। शहजादे अब हॉडसन्स हॉर्स के सिक्ख सिपाहियों के नियंत्रण में थे। इसलिए जिहादियों ने अपने हथियार धरती पर रख दिए।

हॉडसन ने अपने सिपाहियों को आदेश दिया कि वे इन हथियारों को गाड़ी में रख लें। हथियार एकत्रित करने में दो घण्टे का समय लग गया। इसके बाद हॉडसन अपने बंदियों को लेकर दिल्ली के लिए रवाना हुआ।

जब विलियम हॉडसन एवं उसके घुड़सवार, शहजादों को लेकर दिल्ली शहर के परकोटे तक पहुंचे तो जिहादियों की एक भीड़ ने उन लोगों का रास्ता रोका। हॉडसन ने लिखा है कि शहजादों के चारों ओर एक खतरनाक मजमा जमा हो गया। ऐसा लगता था कि वह उनको छुड़ाने ही वाले हैं। कुछ लोगों के अनुसार मजमा बहुत छोटा था तथा उसका कोई खतरनाक इरादा नहीं था।

अपने आप को जिहादियों की भीड़ से घिरा हुआ देखकर हडसन ने मुगल शहजादों की हत्या करने का निश्चय किया। किंतु हॉडसन ने तीनों शहजादों को गाड़ी से उतरने को कहा। फिर नंगा होने को कहा। फिर एक कॉल्ट रिवॉल्वर निकालकर उसने तीनों को गोली मार दी। फिर उसने लाशों की मुहर वाली अंगूठियां और फीरोजे के बाजूबंद उतारे और अपनी जेब में रख लिए। उनकी जड़ाऊ तलवारों पर भी कब्जा कर लिया।

वीर सावरकर ने लिखा है- ‘जब इन शहजादों को लेकर यह गाड़ी नगर में पहुंची तो हडसन ने गाड़ी के पास पहुंचकर चिल्लाना आरम्भ किया, अंग्रेज महिलाओं और बालकों का वध करने वालों के प्राण लेना ही उचित है। उसी समय अंग्रेज सैनिकों ने इन शहजादों के शरीर पर से सभी आभूषण उतार लिए तथा उन्हें गाड़ी से खींचकर नीचे पटक दिया। तत्काल ही हडसन ने इन तीनों शहजादों पर अपनी बंदूक से निशाने साधे, गोलियां दागीं और उनके प्राण पंखेरू उड़ गए।’

इस प्रकार तैमूर वंश के वृक्ष की अंतिम लताएं भी हडसन की गोलियों ने नष्ट कर दी। हडसन ने तीनों शहजादों के शव थाने के समक्ष फेंक देने के आदेश दिए। कुछ समय तक तो चील और गिद्ध इन निर्जीव देहों से अपनी भूख बुझाते रहे और उसके उपरांत ये क्षत-विक्षत शव घसीटकर यमुना के तट पर फेंक दिए गए।

जिस स्थान पर मुगल शहजादों की हत्या की गई थी, उसके निकट ही दिल्ली के परकोटे में बना एक दरवाजा था जिसे लाल दरवाजा कहते थे किंतु उस दिन से इस दरवाजे को खूनी दरवाजा कहा जाने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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