भारतीय चिकित्सा में शल्य चिकित्सा के पितामह और सुश्रुत संहिता के प्रणेता आचार्य सुश्रुत का जन्म ई.पू. छठी शताब्दी में काशी में हुआ था।
भारतीय संस्कृति को आधुनिक विज्ञान ने अत्यधिक प्रभावित किया है। वैज्ञानिक आविष्कारों ने एक ओर मानव जीवन को सुखी बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है तो दूसरी ओर विश्व के विनाश का खतरा भी पैदा कर दिया है।
भारतीय संस्कृति के केन्द्र में प्राचीन काल में धर्म की बहुलता थी, मध्य-काल में विदेशी संस्कृतियों से संघर्ष की बहुलता रही तथा आधुनिक काल में वैज्ञानिक चिंतन की बहुलता है। फिर भी यह कदापि नहीं कहा जा सकता कि भारतीयों के पास वैज्ञानिक चिंतन आधुनिक काल में ही आया। जब दुनिया के अधिकांश देश जंगलों में निवास करने वाली आदिवासी व्यवस्था से बाहर भी नहीं निकल पाए थे तब भी भारतीयों के पास उन्नत विज्ञान था।
भारत के महान् वैज्ञानिक
वेदों में विज्ञान सम्बन्धी बहुत सी बातें हैं। भारतीय ऋषियों को खगोल विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, सौर विज्ञान, ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद एवं रसायन विज्ञान का भी अच्छा ज्ञान था। प्राचीन काल के वैज्ञानिकों में महर्षि कणाद, वराह मिहिर, ब्रह्मगुप्त, आर्यभट्ट, चरक, सुश्रुत, बोधायन, भास्कराचार्य आदि के नाम श्रद्धा से लिए जाते हैं। आधुनिक काल के वैज्ञानिकों में जगदीश चन्द्र बोस, सी. वी. रमन, विक्रम साराभाई, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम आदि के निाम लिए जा सकते हैं।
आचार्य सुश्रुत
भारतीय चिकित्सा में शल्य चिकित्सा के पितामह और सुश्रुत संहिता के प्रणेता आचार्य सुश्रुत का जन्म ई.पू. छठी शताब्दी में काशी में हुआ था। इन्होंने धन्वन्तरि से शिक्षा प्राप्त की। सुश्रुत संहिता को भारतीय चिकित्सा विज्ञान में विशेष स्थान प्राप्त है। सुश्रुत संहिता में सुश्रुत को विश्वामित्र का पुत्र कहा है। यहाँ किस विश्वामित्र से आशय है, यह स्पष्ट नहीं है। आचार्य सुश्रुत ने काशीपति दिवोदास से शल्यतंत्र का उपदेश प्राप्त किया था।
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काशीपति दिवोदास का समय ईसा पूर्व की दूसरी या तीसरी शती संभावित है। औपधेनव तथा वैतरणी आदि सुश्रुत के सहपाठी थे। सुश्रुत का नाम नावनीतक में भी मिलता है। अष्टांगसंग्रह में सुश्रुत का जो मत उद्धृत किया गया है; वह मत सुश्रुत संहिता में नहीं मिलता; इससे अनुमान होता है कि सुश्रुत संहिता के अतिरिक्त दूसरी भी कोई संहिता सुश्रुत के नाम से प्रसिद्ध थी। कुछ विद्वान सुश्रुत के उत्तरतंत्र को किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा बनाया गया मानते हैं। सुश्रुत संहिता में शल्य चिकित्सा के विभिन्न पक्षों को विस्तार से समझाया गया है। सुश्रुत शल्य क्रिया के लिए 125 तरह के उपकरणों का प्रयोग करते थे। ये उपकरण शल्य क्रिया की जटिलता को देखते हुए ही बनाए गए थे। इन उपकरणों में विशेष प्रकार के चाकू, सुइयां, चिमटियां आदि सम्मिलित हैं। सुश्रुत ने 300 प्रकार की शल्य-प्रक्रियाओं की खोज की। सुश्रुत ने कॉस्मेटिक सर्जरी में विशेष निपुणता प्राप्त की। सुश्रुत नेत्रों की शल्य चिकित्सा भी करते थे। सुश्रुत संहिता में मोतियाबिंद के ऑपरेशन करने की विधि को विस्तार से बताया गया है। उन्हें शल्य क्रिया द्वारा प्रसव कराने का भी ज्ञान था। सुश्रुत को टूटी हुई हड्डियों का पता लगाने और उनको जोड़ने में विशेषज्ञता प्राप्त थी। शल्य क्रिया के दौरान होने वाले दर्द को कम करने के लिए वे मद्य या अन्य औषधियां देते थे।
मद्य संज्ञाहरण का कार्य करता था। इसलिए सुश्रुत को संज्ञाहरण का पितामह भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त सुश्रुत को मधुमेह व मोटापे के रोग की भी विशेष जानकारी थी। सुश्रुत श्रेष्ठ शल्य चिकित्सक होने के साथ-साथ श्रेष्ठ शिक्षक भी थे। उन्होंने अपने शिष्यों को शल्य चिकित्सा के सिद्धांत बताये और शल्य क्रिया का अभ्यास कराया। प्रारंभिक अवस्था में शल्य क्रिया के अभ्यास के लिए फलों, सब्जियों और मोम के पुतलों का उपयोग करते थे।
मानव शारीर की भीतरी रचना को समझाने के लिए सुश्रुत शव के ऊपर शल्य क्रिया करके अपने शिष्यों को समझाते थे। सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा में अद्भुत कौशल अर्जित किया तथा इसका ज्ञान अन्य लोगों को कराया। उन्होंने शल्य चिकित्सा के साथ-साथ आयुर्वेद के अन्य पक्षों जैसे शरीर सरंचना, काय-चिकित्सा, बाल-रोग, स्त्री-रोग, मनोरोग आदि की जानकारी भी दी।
महर्षि चरक को प्राचीन भारत के आयुर्वेद के महान ज्ञाता के रूप में ख्याति प्राप्त है। कुछ विद्वानों का मत है कि चरक कनिष्क के राजवैद्य थे अर्थात् वे ईसा की प्रथम शताब्दी में हुए परन्तु कुछ लोग उन्हें बौद्ध-काल से भी पहले का मानते हैं अर्थात् वे ई.पू. 600 से भी पूर्व हुए।
त्रिपिटक के चीनी अनुवाद में कनिष्क के राजवैद्य के रूप में चरक का उल्लेख है। चूंकि कनिष्क और उसका कवि अश्वघोष, बौद्ध थे और चरक संहिता में बौद्ध-मत का प्रबल विरोध किया गया है, इसलिए चरक और कनिष्क का साथ होना असंभव जान पड़ता है।
चरक ने प्रसिद्ध आयुर्वेद ग्रन्थ ‘चरक संहिता’ की रचना की। इस ग्रन्थ में रोगनाशक एवं रोगनिरोधक औषधियों का उल्लेख है तथा सोना, चाँदी, लोहा, पारा आदि धातुओं के भस्म एवं उनके उपयोग का वर्णन मिलता है। इस ग्रंथ के उपदेशक अत्रिपुत्र पुनर्वसु थे, इस ग्रन्थ के मूल ग्रंथकर्ता अग्निवेश थे और इस ग्रंथ के प्रति-संस्कारक चरक थे।
अर्थात् आचार्य चरक ने आचार्य अग्निवेश के ग्रंथ अग्निवेश-तन्त्र में संशोधन एवं परिवर्द्धन करके उसे नया रूप दिया जिसे आज चरक संहिता कहा जाता है। महर्षि चरक की गणना भारतीय औषधि विज्ञान के मूल प्रवर्तकों में होती है। चरक की शिक्षा तक्षशिला में हुई।
चरक संहिता में व्याधियों के उपचार तो बताए ही गए हैं, साथ ही दर्शन और अर्थशास्त्र के विषयों का भी उल्लेख है। उन्होंने आयुर्वेद के प्रमुख ग्रन्थों और उसके ज्ञान को इकट्ठा करके उसका संकलन किया। चरक ने बहुत से स्थानों का भ्रमण करके, उस काल के चिकित्सकों के साथ विचार-विमर्श किया तथा उनके विचार एकत्र करके और अपने अनुभव तथा शोधों के आधार पर आयुर्वेद के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया।
प्राचीन वाङ्मय के परिशीलन से ज्ञात होता है कि उन दिनों ग्रंथ या तंत्र की रचना शाखा के नाम से होती थी, जैसे कठ शाखा में कठोपनिषद् बनी। शाखाएँ या चरण उन दिनों के विद्यापीठ थे, जहाँ अनेक विषयों का अध्ययन होता था। अतः संभव है कि चरक संहिता का प्रतिसंस्कार चरक शाखा में हुआ हो।
चरक संहिता में पालि-साहित्य के कुछ शब्द मिलते हैं, जैसे अवक्रांति, जेंताक (जंताक-विनय-पिटक), भंगोदन, खुड्डाक, भूतधात्री (निद्रा) आदि। इससे चरक संहिता का उपदेश काल उपनिषदों के बाद का और बुद्ध से पहले का निश्चित होता है। इसका प्रति-संस्कार कनिष्क के समय ई.78 के लगभग हुआ होगा। आठवीं शताब्दी ईस्वी में इस ग्रंथ का अरबी भाषा में अनुवाद हुआ और यह ग्रन्थ पश्चिमी देशों तक जा पहुँचा। इस ग्रंथ को आज भी आयुर्वेद में बहुत आदर की दृष्टि से देखा जाता है।
आर्यभट्ट (ई.476-550) प्राचीन भारत के एक महान ज्योतिषविद् और गणितज्ञ थे। इन्होंने आर्यभट्टीय नामक ग्रंथ की रचना की जिसमें ज्योतिषशास्त्र के अनेक सिद्धांतों का प्रतिपादन है। इस ग्रंथ में इन्होंने अपना जन्म-स्थान कुसुमपुर और जन्मकाल शक संवत् 398 लिखा है। आर्यभट्ट का जन्म-स्थल कुसुमपुर दक्षिण भारत में था।
एक अन्य मान्यता के अनुसार उनका जन्म महाराष्ट्र के अश्मक देश में हुआ था। उनके वैज्ञानिक कार्यों का आदर तत्कालीन गुप्त सम्राट की राजधानी में ही हो सकता था। अतः उन्होंने पाटलिपुत्र के समीप कुसुमपुर में रहकर अपनी रचनाएँ पूर्ण की। गुप्तकाल में मगध के नालन्दा विश्वविद्यालय में खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए अलग विभाग था। आर्यभट्ट नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति थे।
आर्यभट्ट का भारत और विश्व के ज्योतिष विज्ञान पर बहुत प्रभाव पड़ा। केरल की ज्योतिष परम्परा पर आर्यभट्ट का विशेष प्रभाव रहा। वे भारतीय गणितज्ञों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उन्होंने आर्यभट्टीय नामक ग्रंथ में 120 आर्याछंदों में ज्योतिष शास्त्र के सिद्धांत और उससे सम्बन्धित गणित को सूत्ररूप में लिखा।
उन्होंने एक ओर तो गणित में ‘पाई’ के मान को अपने पूर्ववर्ती आर्किमिडीज़ से भी अधिक सही निरूपित किया तो दूसरी ओर खगोलविज्ञान में पहली बार उदाहरण के साथ घोषित किया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। आर्यभट्ट ने ज्योतिषशास्त्र के उन्नत साधनों के बिना महत्वपूर्ण खोजें कीं।
कोपरनिकस (ई.1473 से 1543) ने जिस सिद्धांत की खोज की थी उसकी खोज आर्यभट्ट एक हजार वर्ष पहले कर चुके थे। गोलपाद में आर्यभट्ट ने लिखा है नाव में बैठा हुआ मनुष्य जब प्रवाह के साथ आगे बढ़ता है, तब वह समझता है कि अचर वृक्ष, पाषाण, पर्वत आदि पदार्थ उल्टी गति से जा रहे हैं।
उसी प्रकार गतिमान पृथ्वी पर से स्थिर नक्षत्र भी उलटी गति से जाते हुए दिखाई देते हैं। इस प्रकार आर्यभट्ट ने सर्वप्रथम यह सिद्ध किया कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है।
आर्यभट्ट ने सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग को एक-समान माना है। उनके अनुसार एक कल्प में 14 मन्वंतर और एक मन्वंतर में 72 महायुग (चतुर्युग) तथा एक चतुर्युग में सतयुग, द्वापर, त्रेता और कलियुग को समान माना है। आर्यभट्ट के अनुसार किसी वृत्त की परिधि और व्यास का अनुपात 62,832: 20,000 आता है जो चार दशमलव स्थान तक शुद्ध है।
आर्यभट्ट ने बड़ी-बड़ी संख्याओं को अक्षरों के समूह से निरूपित करने की अत्यन्त वैज्ञानिक विधि का प्रयोग किया।
आर्यभट्ट के ग्रंथ
आर्यभट्ट द्वारा रचित चार ग्रंथों की जानकारी उपलब्ध होती है- (1.) दशगीतिका, (2.) आर्यभट्टीय, (3.) तंत्र तथा (4.) आर्यभट्ट सिद्धांत।
आर्यभट्टीय
आर्यभट्ट ने आर्यभट्टीय नामक ज्योतिष ग्रन्थ लिखा जिसमें वर्गमूल, घनमूल, समान्तर श्रेणी तथा विभिन्न प्रकार के समीकरणों का उल्लेख है। उन्होंने आर्यभट्टीय नामक ग्रन्थ में कुल 3 पृष्ठों में समा सकने वाले 33 श्लोकों में गणितविषयक सिद्धान्त तथा 5 पृष्ठों में 75 श्लोकों में खगोल-विज्ञान विषयक सिद्धान्त तथा इसके लिये यन्त्रों का भी निरूपण किया।
आर्यभट्ट ने अपने इस छोटे से ग्रन्थ में अनेक क्रान्तिकारी अवधारणाएँ प्रस्तुत कीं। आर्यभट्टीय, गणित और खगोल विज्ञान का ग्रंथ है जिसके सिद्धांतों को भारतीय गणित में बड़े स्तर पर उद्धृत किया गया है और जो आधुनिक समय में भी अस्तित्व में है। आर्यभट्टीय के गणितीय भाग में अंकगणित, बीजगणित, सरल त्रिकोणमिति और गोलीय त्रिकोणमिति सम्मिलित हैं।
इसमें सतत भिन्न (कँटीन्यूड फ्रेक्शन्स), द्विघात समीकरण (क्वाड्रेटिक ईक्वेशंस), घात शृंखला के योग (सम्स ऑफ पावर सीरीज) और ज्याओं की एक तालिका (ज्ंइसम व िैपदमे) शामिल हैं।
आर्यभट्ट के शिष्य भास्कर (प्रथम) द्वारा अश्मकतंत्र या अश्माका में किए गए उल्लेख के अनुसार इस ग्रंथ को आर्यभट्टीय नाम बाद के टिप्पणीकारों द्वारा दिया गया है, आर्यभट्ट ने स्वयं इसे कोई नाम नहीं दिया। चूंकि इस ग्रंथ में 108 छंद हैं इसलिए इसे आर्य-शत-अष्ट (अर्थात् आर्यभट्ट के 108) भी कहा जाता है। यह ग्रंथ सूत्र साहित्य के समान बहुत ही संक्षिप्त शैली में लिखा गया है।
प्रत्येक पंक्ति एक जटिल प्रणाली को याद करने में सहायता करती है। ग्रंथ में 108 छंदों के साथ 13 परिचयात्मक श्लोक अलग से दिए गए हैं। सम्पूर्ण ग्रंथ को चार अध्यायों में विभाजित किया गया है-
(1.) गीतिकपाद (13 छंद)
इसमें समय की बड़ी इकाइयाँ, यथा- कल्प, मन्वन्तर, युग, जो प्रारंभिक ग्रंथों से अलग, ब्रह्माण्ड-विज्ञान प्रस्तुत करते हैं, यथा- लगध का वेदांग ज्योतिष, (पहली सदी ईस्वी पूर्व, इसमें जीवाओं (साइन) की तालिका ज्या भी शामिल है जो एक एकल छंद में प्रस्तुत है। एक महायुग के दौरान, ग्रहों के परिभ्रमण के लिए 4.32 मिलियन वर्षों की संख्या दी गयी है।
(2.) गणितपाद (33 छंद)
इसमें क्षेत्रमिति (क्षेत्र व्यवहार), गणित और ज्यामितिक प्रगति, शंकु छायाएँ, सरल, द्विघात, युगपत और अनिश्चित समीकरण (कुट्टक) का समावेश है।
(3.) कालक्रियापाद (25 छंद)
इसमें समय की विभिन्न इकाइयाँ और किसी दिए गए दिन के लिए ग्रहों की स्थिति का निर्धारण करने की विधि दी गई है। अधिक मास की गणना के विषय में (अधिकमास), क्षय-तिथियां। सप्ताह के दिनों के नामों के साथ, सात दिन का सप्ताह प्रस्तुत करते हैं।
(4.) गोलपाद: (50 छंद)
इसमें आकाशीय क्षेत्र के ज्यामितिक एवं त्रिकोणमितीय पहलू, क्रांतिवृत्त, आकाशीय भूमध्य रेखा, आसंथि, पृथ्वी के आकार, दिन और रात के कारण, क्षितिज पर राशि-चक्रीय संकेतों का बढ़ना आदि की विशेषताएं दी गई हैं। कुछ संस्करणों के अंत में कृति की प्रशंसा में कुछ पुष्पिकाएं भी जोड़ी गई हैं।
आर्यभट्टीय ने गणित और खगोल विज्ञान में पद्य रूप में कुछ नवीन प्रस्तुतियां दीं जो कई सदियों तक प्रभावशाली रहीं। ग्रंथ की संक्षिप्तता की चरम सीमा का वर्णन उनके शिष्य भास्कर (प्रथम) द्वारा किया गया है। ई.1465 में नीलकंठ सोमयाजी द्वारा आर्यभट्टीय भाष्य लिखा गया।
(5.) आर्य-सिद्धांत
आर्य-सिद्धांत, खगोलीय गणनाओं पर एक कार्य है जो अब लुप्त हो चुका है, इसकी जानकारी हमें आर्यभट्ट के समकालीन वराहमिहिर की रचनाओं एवं बाद के गणितज्ञों और टिप्पणीकारों- ब्रह्मगुप्त और भास्कर के ग्रंथों में मिलती है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह कार्य पुराने सूर्य सिद्धांत पर आधारित है और आर्यभट्टीय में सूर्योदय की अपेक्षा मध्यरात्रि-दिवस गणना का उपयोग किया गया है।
इस ग्रंथ में नोमोन (शंकु-यन्त्र), परछाई यन्त्र (छाया-यन्त्र), संभवतः कोण मापी उपकरण, अर्धवृत्ताकार और वृत्ताकार (धनुर-यन्त्र, चक्र-यन्त्र), एक बेलनाकार छड़ी यस्ती-यन्त्र, छत्र-यंत्र, धनुषाकार जल घड़ी और बेलनाकार जल घड़ी आदि अनेक खगोलीय उपकरणों का वर्णन किया गया है।
(6.) अल न्त्फ या अल नन्फ़
आर्यभट्ट का यह ग्रन्थ अरबी अनुवाद के रूप में मिलता है, इसे ‘अल न्त्फ़’ या ‘अल नन्फ़’ कहा गया है। इसका संस्कृत नाम अज्ञात है। 10-11वीं सदी के फारसी विद्वान अबू रेहान अल्बरूनी ने इसका उल्लेख किया गया है।
(7.) आर्यभट्ट सिद्धांत
7वीं शताब्दी ईस्वी में यह ग्रंथ अत्यन्त लोकप्रिय था किंतु अब इस ग्रंथ के केवल 34 श्लोक उपलब्ध होते हैं।
गणित
स्थानीय मान प्रणाली और शून्य: स्थान-मूल्य अंक प्रणाली, जिसे सर्वप्रथम तीसरी सदी की बख्शाली पाण्डुलिपि में देखा गया, आर्यभट्ट के कार्यों में स्पष्ट रूप से विद्यमान थी। उन्होंने निश्चित रूप से प्रतीक का उपयोग नहीं किया परन्तु फ्रांसीसी गणितज्ञ जार्ज इफ्रह के मतानुसार- रिक्त गुणांक के साथ, दस की घात के लिए एक स्थान धारक के रूप में शून्य का ज्ञान आर्यभट्ट के स्थान-मूल्य अंक प्रणाली में निहित था।
आर्यभट्ट ने ब्राह्मी अंकों का प्रयोग नहीं किया था; वैदिक-काल से चली आ रही संस्कृत परंपरा को निरंतर रखते हुए उन्होंने संख्या को निरूपित करने के लिए वर्णमाला के अक्षरों का उपयोग किया, यथा- मात्राओं (जैसे ज्याओं की तालिका) को स्मरक के रूप में व्यक्त करना।
अपरिमेय (इर्रेशनल) के रूप में π
आर्यभट्ट ने पाई के सन्निकटन पर कार्य किया और संभवतः उन्हें इस बात का ज्ञान हो गया था कि पाई इर्रेशनल है। आर्यभट्टीयम् (गणितपाद) के दूसरे भाग में वे लिखते हैं-
चतुराधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्।
अयुतद्वयस्य विष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः।।
100 में चार जोड़ें, आठ से गुणा करें और फिर 62000 जोड़ें। इस नियम से 20000 परिधि के एक वृत्त का व्यास ज्ञात किया जा सकता है-
(100 + 4) X 8 + 62000/20000 = 3.1416
इसके अनुसार व्यास और परिधि का अनुपात 3.1416 है, जो पाँच महत्वपूर्ण आंकड़ों तक बिलकुल सटीक है।
आर्यभट्ट ने आसन्न (निकट पहुँचना), पिछले शब्द के ठीक पहले आने वाला, शब्द की व्याख्या करते हुए कहा है कि यह न केवल एक सन्निकटन है, वरन यह कि मूल्य अतुलनीय (या इर्रेशनल) है। यूरोप में पाइ की तर्कहीनता का सिद्धांत लैम्बर्ट द्वारा केवल ई.1761 में सिद्ध हो पाया था। आर्यभट्टीय के अरबी में अनुवाद के पश्चात् ई.820 में बीजगणित पर मुहम्मद इब्न मूसा अल-ख्वारिज्मी की पुस्तक में इस सन्निकटन का उल्लेख किया गया।
क्षेत्रमिति और त्रिकोणमिति
गणितपाद 6 में, आर्यभट्ट ने त्रिकोण के क्षेत्रफल को इस प्रकार बताया है- त्रिभुजस्य फलशरीरं समदलकोटि भुजार्धसंवर्गः। अर्थात् किसी त्रिभुज का क्षेत्रफल, लम्ब के साथ भुजा के आधे के (गुणनफल के) परिणाम के बराबर होता है। आर्यभट्ट ने द्विज्या (साइन) के विषय में चर्चा की है और उसे अर्ध-ज्या कहा है। लोगों ने इसे ज्या कहना शुरू कर दिया।
जब अरबी लेखकों द्वारा आर्यभट्ट के काम का संस्कृत से अरबी में अनुवाद किया गया, तो उन्होंने इसको जिबा कहा और बाद में वे इसे ज्ब कहने लगे। बाद में लेखकों को समझ में आया कि ‘ज्ब’ जिबा का ही संक्षिप्त रूप है। जिबा का अर्थ है खोह या खाई।
बारहवीं सदी में, जब क्रीमोना के घेरार्दो ने इस ग्रंथ का अरबी से लैटिन भाषा में अनुवाद किया, तब उन्होंने अरबी जिबा की जगह उसे साइनस कहा जिसका लैटिन भाषा में अर्थ खोह या खाई ही है। यही साइनस अंग्रेजी में साइन बन गया।
अनिश्चित समीकरण: प्राचीन कल से भारतीय गणितज्ञों की रुचि उन समीकरणों के पूर्णांक हल ज्ञात करने में रही है जो ax + b = cy के स्वरूप में होती है। इस विषय को वर्तमान समय में डायोफैंटाइन समीकरण कहा जाता है। आर्यभट्टीय पर भास्कर द्वारा की गई व्याख्या में एक उदाहरण इस प्रकार दिया गया है-
वह संख्या ज्ञात करो जिसे 8 से विभाजित करने पर शेषफल के रूप में 5 बचता है, 9 से विभाजित करने पर शेषफल के रूप में 4 बचता है, 7 से विभाजित करने पर शेषफल के रूप में 1 बचता है। अर्थात, बताएं N = 8x+ 5 = 9y +4 = 7z +1. इससे N के लिए सबसे छोटा मान 85 निकलता है। सामान्य तौर पर, डायोफैंटाइन समीकरण कठिनता के लिए बदनाम थे।
इस तरह के समीकरणों की व्यापक रूप से चर्चा प्राचीन वैदिक ग्रन्थ सुल्व सूत्र में है, जिसके अधिक प्राचीन भाग ई.पू.800 तक पुराने हो सकते हैं। ऐसी समस्याओं के हल के लिए आर्यभट्ट की विधि को कुट्टक विधि कहा गया है। कुट्टक का अर्थ है पीसना, अर्थात छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ना और इस विधि में छोटी संख्याओं के रूप में मूल खंडों को लिखने के लिए एक पुनरावर्ती कलनविधि का समावेश था।
आज यह कलनविधि, ई.621 में भास्कर की व्याख्या के अनुसार, पहले क्रम के डायोफैंटाइन समीकरणों को हल करने के लिए मानक पद्धति है, और इसे प्रायः आर्यभट्ट एल्गोरिद्म कहा जाता है। डायोफैंटाइन समीकरणों का उपयोग क्रिप्टोलौजी में होता है। आरएसए सम्मलेन-2006 ने अपना ध्यान कुट्टक विधि और सुल्वसूत्र के पर केन्द्रित किया।
बीजगणित
आर्यभट्टीय में वर्गों और घनों की श्रेणी के रोचक परिणाम दिए हैं।
खगोल विज्ञान
आर्यभट्ट की खगोल विज्ञान प्रणाली औदायक प्रणाली कहलाती थी, श्रीलंका, भूमध्य रेखा पर स्थित है, वहाँ भोर होने से दिन की शुरुआत होती थी। खगोल विज्ञान पर आर्यभट्ट के कुछ लेख, जो द्वितीय मॉडल (अर्ध-रात्रिका, मध्यरात्रि), प्रस्तावित करते हैं, खो गए हैं, परन्तु इन्हें आंशिक रूप से ब्रह्मगुप्त के खण्डखाद्यक में हुई चर्चाओं से पुनः निर्मित किया जा सकता है। कुछ ग्रंथों में वे पृथ्वी के घूर्णन को आकाश की आभासी गति का कारण बताते हैं।
सौर प्रणाली की गतियाँ
आर्यभट्ट मानते थे कि पृथ्वी अपनी धुरी की परिक्रमा करती है। यह श्रीलंका को सन्दर्भित एक कथन से ज्ञात होता है, जो तारों की गति का पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न आपेक्षिक गति के रूप में वर्णन करता है-
अर्थात्- जैसे एक नाव में बैठा आदमी आगे बढ़ते हुए स्थिर वस्तुओं को पीछे की दिशा में जाते देखता है, बिल्कुल उसी तरह श्रीलंका में (अर्थात भूमध्य रेखा पर) लोगों द्वारा स्थिर तारों को ठीक पश्चिम में जाते हुए देखा जाता है।
अगला छंद तारों और ग्रहों की गति को वास्तविक गति के रूप में वर्णित करता है-
उनके उदय और अस्त होने का कारण इस तथ्य की वजह से है कि प्रोवेक्टर हवा द्वारा संचालित गृह और एस्टेरिस्म्स चक्र श्रीलंका में निरंतर पश्चिम की तरफ चलायमान रहते हैं। लंका का नाम भूमध्य रेखा पर एक सन्दर्भ बिन्दु के रूप में लिया गया है, जिसे खगोलीय गणना के लिए मध्याह्न रेखा के सन्दर्भ में समान मान के रूप में ले लिया गया था।
आर्यभट्ट ने सौर मंडल के एक भूकेंद्रीय मॉडल का वर्णन किया है जिसमें सूर्य और चन्द्रमा गृहचक्र द्वारा गति करते हैं, जो पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इस मॉडल में पितामह-सिद्धान्त पाया जाता है। इसमें प्रत्येक ग्रहों की गति दो ग्रहचक्रों द्वारा नियंत्रित है, एक छोटा मंद (धीमा) ग्रहचक्र और एक बड़ा शीघ्र (तेज) ग्रहचक्र।
पृथ्वी से दूरी के अनुसार ग्रहों का क्रम इस प्रकार है- चंद्रमा, बुध, शुक्र, सूरज, मंगल, बृहस्पति, शनि और नक्षत्र। ग्रहों की स्थिति और अवधि की गणना समान रूप से गति करते हुए बिन्दुओं से सापेक्ष के रूप में की गयी थी, जो बुध और शुक्र के मामले में, जो पृथ्वी के चारों ओर औसत सूर्य के समान गति से घूमते हैं और मंगल, बृहस्पति और शनि के मामले में, जो राशिचक्र में पृथ्वी के चारों ओर अपनी विशिष्ट गति से गति करते हैं।
खगोल विज्ञान के अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार यह द्वि-ग्रहचक्र वाला मॉडल टॉलेमी के पहले के ग्रीक खगोल विज्ञान के तत्वों को प्रदर्शित करता है। आर्यभट्ट के मॉडल के एक अन्य तत्व सिघ्रोका, सूर्य के सम्बन्ध में बुनियादी ग्रहों की अवधि, को कुछ इतिहासकारों द्वारा एक अंतर्निहित सूर्य केन्द्रित मॉडल के चिन्ह के रूप में देखा जाता है।
ग्रहण
आर्यभट्ट ने कहा कि चंद्रमा और ग्रह सूर्य के परावर्तित प्रकाश से चमकते हैं। तत्कालीन मान्यताओं से अलग, जिसमें ग्रहणों का कारक छद्म ग्रह निस्पंद बिन्दु राहू और केतु थे, उन्होंने ग्रहणों को पृथ्वी द्वारा डाली जाने वाली और इस पर गिरने वाली छाया से सम्बद्ध बताया।
इस प्रकार चंद्र-ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी की छाया में प्रवेश करता है (छंद गोला 37) और पृथ्वी की इस छाया के आकार और विस्तार की विस्तार से चर्चा की (छंद गोला 38-48) और फिर ग्रहण के दौरान ग्रहण वाले भाग का आकार और इसकी गणना की।
बाद के भारतीय खगोलविदों ने इन गणनाओं में सुधार किया, लेकिन आर्यभट्ट की विधियों ने प्रमुख सार प्रदान किया था। यह गणनात्मक मिसाल इतनी सटीक थी कि 18वीं सदी के वैज्ञानिक गुइलौम ले जेंटिल ने, पांडिचेरी की अपनी यात्रा के दौरान पाया कि भारतीयों की गणना के अनुसार 30 अगस्त 1765 के चंद्रग्रहण की अवधि 41 सेकंड कम थी, जबकि उसके चार्ट द्वारा (टोबिअस मेयर, ई.1752) 68 सेकंड अधिक दर्शाते थे।
आर्यभट्ट के अनुसार पृथ्वी की परिधि 39,968.0582 किलोमीटर है, जो इसके वास्तविक मान 40,075.0167 किलोमीटर से केवल 0.2 प्रतिशत कम है। आर्यभट्ट द्वारा प्रस्तुत यह सन्निकटन ई.200 के यूनानी गणितज्ञ एराटोसथेंनस की संगणना में उल्लेखनीय सुधार था।
नक्षत्रों के आवर्तकाल
समय की आधुनिक अंग्रेजी इकाइयों में जोड़ा जाये तो, आर्यभट्ट की गणना के अनुसार पृथ्वी का आवर्तकाल (स्थिर तारों के सन्दर्भ में पृथ्वी की अवधि) 23 घंटे 56 मिनट और 4.1 सैकंड थी; आधुनिक समय 23 : 56 : 4.091 है। इसी प्रकार, उनके हिसाब से पृथ्वी के वर्ष की अवधि 365 दिन 6 घंटे 12 मिनट 30 सेकंड, आधुनिक समय की गणना के अनुसार इसमें 3 मिनट 20 सेकंड की त्रुटि है। नक्षत्र समय की धारणा उस समय की अधिकतर खगोलीय प्रणालियों में ज्ञात थी, परन्तु संभवतः यह संगणना उस समय के हिसाब से सर्वाधिक शुद्ध थी।
सूर्य केंद्रीयता
आर्यभट्ट का कहना था कि पृथ्वी अपनी ही धुरी पर घूमती है और उनके ग्रह सम्बन्धी ग्रहचक्र मॉडलों के कुछ तत्व उसी गति से घूमते हैं जिस गति से सूर्य के चारों ओर ग्रह घूमते हैं। इस प्रकार ऐसा सुझाव दिया जाता है कि आर्यभट्ट की संगणनाएँ अन्तर्निहित सूर्य केन्द्रित मॉडल पर आधारित थीं, जिसमें ग्रह सूर्य का चक्कर लगाते हैं। एक समीक्षा में इस सूर्य केन्द्रित व्याख्या का विस्तृत खंडन है।
यह समीक्षा बी. एल. वान डर वार्डेन की एक किताब का वर्णन इस प्रकार करती है- ‘यह किताब भारतीय गृह सिद्धांत के विषय में अज्ञात है और यह आर्यभट्ट के प्रत्येक शब्द का सीधे तौर पर विरोध करता है।’
हालाँकि कुछ लोग यह स्वीकार करते हैं कि आर्यभट्ट की प्रणाली पूर्व के एक सूर्य केन्द्रित मॉडल से उपजी थी जिसका ज्ञान उनको नहीं था। यह भी दावा किया गया है कि वे ग्रहों के मार्ग को अंडाकार मानते थे, हालाँकि इसके लिए कोई भी प्राथमिक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है।
हालाँकि सामोस के एरिस्तार्चुस (तीसरी शताब्दी ई.पू.) और कभी कभार पोन्टस के हेराक्लिड्स (चैथी शताब्दी ई.पू.) को सूर्य केन्द्रित सिद्धांत की जानकारी होने का श्रेय दिया जाता है, प्राचीन भारत में ज्ञात ग्रीक खगोल शास्त्र (पौलिसा सिद्धांत- संभवतः अलेक्जेण्ड्रिया वासी) सूर्य केन्द्रित सिद्धांत के विषय में कोई चर्चा नहीं करता है।
विश्व-विज्ञान पर आर्यभट्ट का प्रभाव
भारतीय खगोलीय परंपरा में आर्यभट्ट के कार्य का बड़ा प्रभाव था और इनके अनुवादों ने विश्व की कई संस्कृतियों के ज्ञान को प्रभावित किया। ई.820 के दौरान इसका अरबी अनुवाद विशेष प्रभावशाली था। उनके कुछ परिणामों को अल-ख्वारिज्मी द्वारा उद्धृत किया गया है और 10वीं सदी के अरबी विद्वान अल्बरूनी द्वारा उनका संदर्भ दिया गया है।
उसने लिखा है कि आर्यभट्ट के अनुयायी मानते थे कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। साइन (ज्या), कोसाइन (कोज्या) के साथ ही, वरसाइन (उक्रमाज्या) की उनकी परिभाषा, और विलोम साइन (उत्क्रम ज्या), ने त्रिकोणमिति की उत्पत्ति को प्रभावित किया। वे पहले व्यक्ति भी थे जिन्होंने साइन और वरसाइन (कोसएक्स) तालिकाओं को, 0 डिग्री से 90 डिग्री तक 3.75 डिग्री अंतरालों में, 4 दशमलव स्थानों की सूक्ष्मता तक तैयार किया।
आर्यभट्ट की खगोलीय-गणन विधियाँ बहुत प्रभावशाली थीं। त्रिकोणमितिक तालिकाओं के साथ, वे अरब देशों में प्रचलित खगोलीय तालिकाओं (जिज) की गणना के लिए प्रयुक्त की जाती थीं । विशेष रूप से, अरबी स्पेन वैज्ञानिक अल-झर्काली (11वीं सदी) के कार्यों में पाई जाने वाली खगोलीय तालिकाओं का लैटिन में तोलेडो की तालिकाओं (12वीं सदी) के रूप में अनुवाद किया गया और ये यूरोप में सदियों तक सर्वाधिक सूक्ष्म पंचांग के रूप में इस्तेमाल में रही।
आर्यभट्ट और उनके शिष्यों द्वारा की गयी तिथिगणना पंचांग के रूप में भारत में निरंतर व्यवहार में रही है। मुसलमान विद्वानों ने इससे जलाली तिथिपत्र तैयार किया जिसे ई.1073 में उमर खय्याम सहित कुछ खगोलविदों ने प्रस्तुत किया। इसे ई.1925 में संशोधित किया गया जो वर्तमान में ईरान और अफगानिस्तान में राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में प्रचलित है।
जलाली तिथिपत्र अपनी तिथियों का आकलन वास्तविक सौर पारगमन के आधार पर करता है, जैसा आर्यभट्ट ने किया है और उससे पहले के सिद्धांत कैलेंडर में भी प्रयुक्त होता था। इस प्रकार के तिथि पत्र में तिथियों की गणना के लिए एक पंचांग की आवश्यकता होती है। यद्यपि तिथियों की गणना करना कठिन था, पर जलाली तिथिपत्र में ग्रेगोरी तिथिपत्र से कम मौसमी त्रुटियां थीं।
भारत द्वारा कृतज्ञता प्रदर्शन
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब भारत ने अपना पहला उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा तब महान खगोलज्ञ एवं गणितज्ञ आर्यभट्ट के सम्मान में उसका नाम भी आर्यभट्ट रखा गया। खगोल विज्ञान, खगोल भौतिकी और वायुमंडलीय विज्ञान में अनुसंधान के लिए भारत में नैनीताल के निकट एक संस्थान का नाम आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान संस्थान (एआरआईएस) रखा गया है।
आर्यभट्ट के नाम पर अंतर्विद्यालयीय आर्यभट्ट गणित प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। इसरो के वैज्ञानिकों द्वारा ई.2009 में खोजी गयी बैक्टीरिया एक प्रजाति का नाम बैसीलस आर्यभट्ट रखा गया है। स्वतंत्र भारत में आर्यभट्ट के सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया गया।
वराहमिहिर अथवा वरःमिहिर ईसा की पाँचवीं-छठी शताब्दी के भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ थे। उन्होंने अपने ग्रंथ पंचसिद्धान्तिका में सबसे पहले बताया कि अयनांश का मान 50.32 सेकेण्ड के बराबर है। कापित्थक (उज्जैन) में उनके द्वारा विकसित गणितीय विज्ञान का गुरुकुल सात सौ वर्षों तक अद्वितीय रहा। वे बचपन से मेधावी थे।
अपने पिता आदित्य दास से परम्परागत गणित एवं ज्योतिष सीखकर उन्होंने इन्हीं विषयों में व्यापक शोध किया। समय-मापक घट यन्त्र, इन्द्रप्रस्थ में लौहस्तम्भ के निर्माण और ईरान के शहंशाह नौशेरवाँ के आमन्त्रण पर जुन्दीशापुर नामक स्थान पर वेधशाला की स्थापना उनके द्वारा किए गए कार्यों में सम्मिलित माने जाते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य गणित एवं विज्ञान को जनसामान्य के लिए उपयोगी बनाना था।
वराहमिहिर की जीवनी
वराहमिहिर का जन्म ई.499 में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। यह परिवार उज्जैन के निकट कपित्थक (कायथा) नामक गांव का निवासी था। उनके पिता आदित्य दास सूर्य-भगवान के भक्त थे। उन्होंने ही वराहमिहिर को ज्योतिष विद्या सिखाई। कुसुमपुर (पटना) जाने पर वराहमिहिर अपने काल के महान खगोलज्ञ और गणितज्ञ आर्यभट्ट से मिले।
आर्यभट्ट से मिली प्रेरणा से वराहमिहिर ने ज्योतिष विद्या और खगोल ज्ञान को ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया और वे उज्जैन आ गए जो उस समय शिक्षा का बड़ा केंद्र था। गुप्त शासन के अन्तर्गत वहाँ कला, विज्ञान और संस्कृति के अनेक गुरुकुल फलफूल रहे थे। इस कारण देश भर से विद्यार्थी एवं विद्वान उज्जैन आते थे।
वराहमिहिर के ज्योतिषज्ञान से प्रभावित होकर गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त (द्वितीय) ने उन्हें अपने दरबार के नवरत्नों में सम्मिलित किया। वराहमिहिर ने ईरान एवं यूनान आदि देशों की यात्रा की। ई.587 में उनकी मृत्यु हुई।
वराहमिहिर के ग्रन्थ
वराहमिहिर ने ई.550 के आसपास कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं जिनमें पंचसिद्धांतिका, लघुजातक, बृहज्जातक, बृहत्संहिता, टिकनिकयात्रा, बृहद्यात्रा या महायात्रा, योगयात्रा या स्वल्पयात्रा, वृहत् विवाहपटल, लघु विवाहपटल, कुतूहलमंजरी, दैवज्ञवल्लभ, लग्नवाराहि आदि प्रमुख हैं। इन पुस्तकों में त्रिकोणमिति के महत्वपूर्ण सूत्र दिए गए हैं, जो वराहमिहिर के उच्च-स्तरीय त्रिकोणमिति ज्ञान के परिचायक हैं।
पंचसिद्धांतिका में वराहमिहिर से पूर्व प्रचलित पाँच सिद्धांतों का वर्णन है। ये सिद्धांत हैं- (1.) पोलिश सिद्धांत, (2.) रोमक सिद्धांत, (3.) वसिष्ठ सिद्धांत, (4.) सूर्य सिद्धांत तथा (5.) पितामह सिद्धांत। वराह मिहिर ने इन पूर्व-प्रचलित सिद्धांतों की महत्वपूर्ण बातें लिखकर अपनी ओर से ‘बीज’ नामक संस्कार का भी निर्देश किया है, जिससे इन सिद्धांतों द्वारा परिगणित ग्रह दृश्य हो सकें। उन्होंने फलित ज्योतिष के लघुजातक, बृहज्जातक तथा बृहत्संहिता नामक तीन ग्रंथ लिखे।
ज्योतिष सम्बन्धी अपनी पुस्तकों के बारे में वराह मिहिर ने लिखा है- ‘ज्योतिष विद्या एक अथाह सागर है और हर कोई इसे आसानी से पार नहीं कर सकता। मेरी पुस्तक एक सुरक्षित नाव है, जो इसे पढ़ेगा वह उसे पार ले जायेगी।’ इस पुस्तक को अब भी ज्योतिष विद्या के ग्रन्थों में ग्रन्थरत्न माना जाता है। बृहत्संहिता में वास्तुविद्या, भवन-निर्माण-कला, वायुमंडल की प्रकृति, वृक्षायुर्वेद आदि विषय सम्मिलित हैं।
वराहमिहिर के वैज्ञानिक विचार
वराहमिहिर वेदों के ज्ञाता थे किंतु वह अलौकिक में आंखे बंद करके विश्वास नहीं करते थे। उनकी चिंतन-पद्धति वैज्ञानिक जैसी थी जो अंध-विश्वास करने की बजाय शोधपरक ज्ञान में विश्वास करता है। अपने पूर्ववर्ती वैज्ञानिक आर्यभट्ट की तरह उन्होंने भी कहा कि पृथ्वी गोल है। वे विश्व के पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने कहा कि कोई ऐसी शक्ति है जो चीजों को जमीन के साथ चिपकाये रखती है।
आज इसी शक्ति को गुरुत्वाकर्षण कहते हैं। वराहमिहिर का मानना था कि पृथ्वी गतिमान नहीं है। उनका कहना था कि यदि पृथ्वी घूम रही होती तो आकाश में उड़ते हुए पक्षी पृथ्वी की गति की विपरीत दिशा में (पश्चिम की ओर) अपने घोंसले में उसी समय वापस पहुँच जाते।
उन्होंने पर्यावरण विज्ञान (इकोलोजी), जल विज्ञान (हाइड्रोलोजी), भूविज्ञान (जिआलोजी) के सम्बन्ध में कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियां की। उनका कहना था कि पौधे और दीमक जमीन के नीचे के पानी को इंगित करते हैं। संस्कृत व्याकरण में दक्षता और छंद पर अधिकार के कारण उन्होंने स्वयं को एक अनोखी शैली में व्यक्त किया।
अपने विशद ज्ञान और सरस प्रस्तुति के कारण उन्होंने खगोल जैसे शुष्क विषयों को भी रोचक बना दिया जिससे उन्हें बहुत ख्याति मिली। उनकी पुस्तक पंचसिद्धान्तिका (पांच सिद्धांत), बृहत्संहिता, बृहज्जात्क (ज्योतिष) ने उन्हें फलित ज्योतिष में वही स्थान दिलाया है जो राजनीति दर्शन में कौटिल्य का तथा व्याकरण में पाणिनि का है।
वराहमिहिर का योगदान
त्रिकोणमिति
निम्ननिखित त्रिकोणमितीय सूत्र वराहमिहिर ने प्रतिपादित किये हैं-
sin2 x + cos2 x = 1
sinx = cos(π /2) – x
(1 – cos 2x)/2 = sin2 x
वराहमिहिर ने आर्यभट्ट (प्रथम) द्वारा प्रतिपादित ‘ज्या सारणी’ को और अधिक शुद्ध बनाया।
अंकगणित
वराहमिहिर ने शून्य एवं ऋणात्मक संख्याओं के बीजगणितीय गुणों को परिभाषित किया।
संख्या सिद्धान्त
वराहमिहिर ने ‘संख्या-सिद्धान्त’ नामक एक गणित ग्रन्थ भी लिखा जिसके बारे में बहुत कम ज्ञात है। इस ग्रन्थ का एक छोटा अंश ही प्राप्त हुआ है। इसमें उन्नत अंकगणित, त्रिकोणमिति के साथ-साथ कुछ अपेक्षाकृत सरल संकल्पनाओं का भी समावेश है।
क्रमचय-संचय
वराहमिहिर ने वर्तमान समय में पास्कल त्रिकोण (Pascal’s triangle) के नाम से प्रसिद्ध संख्याओं की खोज की। इनका उपयोग वे द्विपद गुणाकों (Binomial Coefficients) की गणना के लिये करते थे।
प्रकाशिकी
वराहमिहिर का प्रकाशिकी में भी योगदान है। उन्होंने कहा है कि परावर्तन कणों के प्रति-प्रकीर्णन (Back & Scattering) से होता है। उन्होंने अपवर्तन की भी व्याख्या की है।
डॉ. (सर) जगदीश चन्द्र बसु भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे जिन्हें भौतिकी, जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान तथा पुरातत्व का गहरा ज्ञान था। वे पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने रेडियो और सूक्ष्म तरंगों की प्रकाशिकी पर कार्य किया। वनस्पति विज्ञान में उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण खोजें कीं। वे भारत के पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने एक अमरीकन पेटेंट प्राप्त किया।
उन्हें रेडियो विज्ञान का पिता माना जाता है। वे विज्ञान कथाएँ भी लिखते थे और उन्हें बंगाली विज्ञान कथा-साहित्य का पिता माना जाता है। उन्होंने बेतार के संकेत भेजने में असाधारण प्रगति की और सबसे पहले रेडियो संदेशों को पकड़ने के लिए अर्धचालकों का प्रयोग करना शुरु किया किंतु अपनी खोजों से व्यावसायिक लाभ उठाने की बजाय उन्होंने इन्हें सार्वजनिक रूप से प्रकाशित कर दिया ताकि अन्य शोधकत्र्ता इन पर आगे काम कर सकें।
इसके बाद उन्होंने वनस्पति एवं जीव विज्ञान में अनेक खोजें कीं। उन्होंने क्रेस्कोग्राफ़ नामक यन्त्र का आविष्कार किया और इससे विभिन्न उत्तेजकों के प्रति पौधों की प्रतिक्रिया का अध्ययन किया। इस तरह उन्होंने सिद्ध किया कि वनस्पतियों और पशुओं के ऊतकों में काफी समानता है। मित्रों के कहने पर उन्होंने केवल एक पेटेंट के लिए आवेदन किया और उसे प्राप्त किया।
जगदीश चन्द्र बसु का प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा
बसु का जन्म 30 नवम्बर 1858 को ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रान्त के ढाका जिले में फरीदपुर के मेमनसिंह (अब बांग्लादेश) में हुआ था। उनके पिता भगवान चन्द्र बसु ब्रह्म समाज में सक्रिय थे और फरीदपुर, बर्धमान एवं अन्य स्थानों पर उप-मजिस्ट्रेट एवं सहायक कमिश्नर आदि पदों पर रहे।
उनका परिवार रारीखाल गांव, बिक्रमपुर से आया था, जो आजकल बांग्लादेश के मुन्शीगंज जिले में है। ग्यारह वर्ष की आयु तक उन्होंने गांव के ही बांग्ला विद्यालय में शिक्षा ग्रहण की। उनके पिता मानते थे कि अंग्रेजी सीखने से पहले अपनी मातृभाषा अच्छी तरह सीखनी चाहिए।
ई.1915 में विक्रमपुर में आयोजित एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए बसु ने कहा- ‘उस समय बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में भेजना हैसियत की निशानी माना जाता था। मैं जिस बांग्ला स्कूल में भेजा गया वहाँ पर मेरे दायीं तरफ मेरे पिता के मुस्लिम परिचारक का बेटा बैठा करता था और मेरी बाईं ओर एक मछुआरे का बेटा। ये ही मेरे खेल के साथी भी थे। उनकी पक्षियों, जानवरों और जलजीवों की कहानियों को मैं कान लगा कर सुनता था। शायद इन्हीं कहानियों ने मेरे मस्तिष्क में प्रकृति की संरचना पर अनुसंधान करने की गहरी रुचि जगाई।’
विद्यालयी शिक्षा के बाद वे कलकत्ता आ गये और सेंट जेवियर स्कूल में प्रवेश लिया। जगदीश चंद्र की जीव विज्ञान में बहुत रुचि थी। स्नातक की उपाधि प्राप्त करने बाद 22 वर्ष की आयु में वे चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई करने के लिए लंदन चले गए किंतु स्वास्थ खराब हो जाने के कारण वे डॉक्टर बनने का विचार त्यागकर कैम्ब्रिज के क्राइस्ट महाविद्यालय चले गये। भौतिकी के विख्यात प्रोफेसर फादर लाफोण्ट ने बोस को भौतिकशास्त्र के अध्ययन के लिए प्रेरित किया।
ई.1885 में वे स्वदेश लौटे तथा ई.1915 तक भौतिकी के सहायक प्राध्यापक के रूप में प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढ़ाते रहे। उस समय भारतीय शिक्षकों को अंग्रेज शिक्षकों की तुलना में एक तिहाई वेतन दिया जाता था। जगदीश चन्द्र बसु ने इस भेदभाव का विरोध किया और तीन वर्षों तक बिना वेतन के काम करते रहे, जिसकी वजह से उनकी आर्थिक स्थिति खराब हो गई और उन पर काफी कर्जा हो गया।
इस कर्ज को चुकाने के लिये उन्हें अपनी पैतृक-भूमि बेचनी पड़ी। चैथे वर्ष जगदीश चंद्र बोस की जीत हुई और उन्हें पूरा वेतन दिया गया। उनका विवाह कलकता के विख्यात एडवोकेट एवं ब्रह्मसमाजी दुर्गामोहन दास की पुत्री अबाला से हुआ। अबाला देशबन्धु चितरंजन दास की चचेरी बहिन थी।
अबाला अपने पति के लिए सदैव पे्ररणा स्रोत रही। बोस एक अच्छे शिक्षक थे, जो कक्षा में पढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक प्रदर्शनों का उपयोग करते थे। बोस के छात्र सतेन्द्र नाथ बोस आगे चलकर प्रसिद्ध भौतिकशास्त्री बने।
रेडियो की खोज
ब्रिटिश सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी जेम्स क्लर्क मैक्सवेल ने गणितीय रूप से विविध तरंग दैध्र्य की विद्युत चुम्बकीय तरंगों के अस्तित्व की भविष्यवाणी की थी, पर उनकी भविष्यवाणी के सत्यापन से पहले ई.1879 में उनका निधन हो गया। ब्रिटिश भौतिकविद ओलिवर लॉज मैक्सवेल ने ई.1887-88 में तरंगों के अस्तित्व का प्रदर्शन कर उन्हें तारों को प्रेषित किया।
जर्मन भौतिकशास्त्री हेनरिक हट्र्ज ने ई.1888 में मुक्त अंतरिक्ष में विद्युत चुम्बकीय तरंगों के अस्तित्व को प्रयोग करके दिखाया। इसके बाद लॉज ने हट्र्ज का काम जारी रखा और जून 1894 में एक स्मरणीय व्याख्यान दिया। हट्र्ज की मृत्यु के बाद उसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया। लॉज के काम ने जगदीश चन्द्र बसु सहित विभिन्न देशों के वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा।
बोस के माइक्रोवेव अनुसंधान का उल्लेखनीय पहलू यह था कि उन्होंने तरंग-दैध्र्य को लगभग 5 मिलीमीटर तरंग दैध्र्य स्तर पर ला दिया। वे प्रकाश के गुणों के अध्ययन के लिए लंबी तरंग दैध्र्य की प्रकाश तरंगों के नुकसान को समझ गए थे।
ई.1895 में जगदीश चन्द्र बसु ने कलकत्ता के टाउन हॉल में बंगाल के गवर्नर विलियम मैकेंजी की उपस्थिति में अपने आविष्कार का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। उनके रेडिएटर से निकली तंरगें 75 फुट की दूरी पर तीन दीवारों को पार करके रिसीवर तक जा पहुंचीं जिससे पिस्तौल दागी गई और घण्टी बज उठी। अपने रेडिएटर से यह प्रयोग करने के लिए बोस ने आधुनिक वायरलैस टैलीग्राफी के एण्टीना की रूपरेखा तैयार कर दी।
यह 20 फुट लम्बे खम्भे के ऊपर एक गोलाकार धातु की तश्तरी थी जिसको रेडिएटर के साथ जोड़ा गया और इसी प्रकार की एक तश्तरी रिसीवर से जोड़ी गयी थी। अब वे अधिक दूरी तक संदेश भेजने का प्रयास करने लगे। इस अनुसन्धान से गवर्नर विलियम मैकेन्जी बहुत प्रभावित हुआ और उसने बोस को अपने शोध को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया।
उनके शोध-निबन्ध विज्ञान की अग्रणी शोध-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे जिन्होंने समस्त वैज्ञानिक संसार को आश्चर्यचकित कर दिया।
जगदीश चन्द्र बसु ने एक बंगाली निबंध, ‘अदृश्य आलोक’ में लिखा- ‘अदृश्य प्रकाश आसानी से ईंट की दीवारों, भवनों आदि को पार कर सकता है, इसलिए तार के बिना भी प्रकाश के माध्यम से संदेश संचारित हो सकता है।’ रूस में पोपोव ने ऐसा ही एक प्रयोग किया।
जगदीश चन्द्र बसु का ‘डबल अपवर्तक क्रिस्टल द्वारा बिजली की किरणों के ध्रुवीकरण’ पर पहला वैज्ञानिक लेख, लॉज के लेख के एक साल के भीतर मई 1895 में बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी को भेजा गया। उनका दूसरा लेख अक्टूबर 1895 में लंदन की रॉयल सोसाइटी को लार्ड रेले द्वारा भेजा गया। दिसम्बर 1895 में लंदन पत्रिका इलेक्ट्रीशियन ने अपने छत्तीसवें अंक में जगदीश चंद्र बोस का लेख ‘नए इलेक्ट्रो-पोलेरीस्कोप’ पर प्रकाशित किया।
उस समय लॉज द्वारा गढ़े गए शब्द ‘कोहिरर’ का प्रयोग हट्र्ज़ के तरंग रिसीवर या डिटेक्टर के लिए किया जाता था। इलेक्ट्रीशियन ने तत्काल बोस के ‘कोहिरर’ पर टिप्पणी की- ‘यदि प्रोफेसर बोस अपने कोहिरर को बेहतरीन बनाने में और पेटेंट पाने में सफल होते हैं तो हम शीघ्र ही एक बंगाली वैज्ञानिक के प्रेसीडेंसी कॉलेज प्रयोगशाला में अकेले शोध के कारण नौ-परिवहन की तट प्रकाश व्यवस्था में नई क्रांति देखेंगे।’
बोस ने अपने कोहिरर को बेहतर करने की योजना बनाई लेकिन उसे पेटेंट कराने के बारे में कभी नहीं सोचा।
जगदीश चन्द्र बसु का रेडियो डेवलपमेंट में स्थान
जगदीश चन्द्र बसु ने अपने प्रयोग उस समय किये थे जब रेडियो एक संपर्क माध्यम के तौर पर विकसित हो रहा था। रेडियो माइक्रोवेव ऑप्टिक्स पर बोस ने जो काम किया था वह रेडियो कम्युनिकेशन से जुड़ा हुआ नहीं था, लेकिन उनके द्वारा किये हुए सुधार एवं उनके द्वारा इस विषय में लिखे हुए तथ्यों ने दूसरे रेडियो आविष्कारकों को प्रभावित किया।
ई.1894 के अंत में गुगलिएल्मो मारकोनी एक रेडियो सिस्टम पर काम कर रहे थे जो वायरलेस टेलीग्राफी के लिए विशिष्ठ रूप में डिज़ाइन किया जा रहा था। ई.1896 के आरंभ तक यह प्रणाली फिजिक्स द्वारा बताये गए रेंज से अधिक दूरी में रेडियो संकेत प्रसारित कर रही थी।
जगदीश चन्द्र बसु पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने रेडियो तरंगें पहचानने के लिए सेमीकंडक्टर जंक्शन का प्रयोग किया और इस पद्धति में कई माइक्रोवेव अवयवों की खोज की। इसके बाद अगले 50 साल तक मिलीमीटर लम्बाई की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों पर कोई शोध कार्य नहीं हुआ। ई.1897 में जगदीश चंद्र बोस ने लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूशन में मिलीमीटर तरंगो पर किए हुए शोध का प्रदर्शन किया।
उन्होंने अपने शोध में वेवगाइड्स, हॉर्न ऐन्टेना, डाई-इलेक्ट्रिक लेंस, विभिन्न पोलराइज़र और 60 गीगा हट्र्ज तक के सेमीकंडक्टर का इस्तेमाल किया। ये समस्त उपकरण आज भी कोलकाता के बोस इंस्टिट्यूट में रखे हैं। एक 1.3 एमएम मल्टीबीम रिसीवर जो की एरिज़ोना के छत्।व् 12 मीटर टेलिस्कोप में हैं, आचार्य बोस द्वारा 1897 में लिखे हुए शोध पत्र के सिद्धांतों पर बनाया गया है।
सर नेविल्ले मोट्ट को ई.1977 में सॉलिड स्टेट इलेक्ट्रोनिक्स में किए गए शोधकार्य के लिए नोबल पुरस्कार मिला। उन्होंने आचार्य जगदीश चन्द्र बोस पर टिप्पणी करते कहा था कि बोस अपने समय से 60 साल आगे थे। बोस ने ही च् टाइप और छ टाइप सेमीकंडक्टर के अस्तित्व का पूर्वानुमान किया था।
जगदीश चन्द्र बसु का वनस्पति पर अनुसंधान
जगदीश चन्द्र बसु ने सिद्ध किया कि पौधों में उत्तेजना का संचार वैद्युतिक (इलेक्ट्रिकल) माध्यम से होता है न कि केमिकल माध्यम से। उन्होंने सबसे पहले माइक्रोवेव के वनस्पति के उतकों पर होने वाले प्रभाव का अध्ययन किया। उन्होंने पौधों पर बदलते हुए मौसम से होने वाले असर का भी अध्ययन किया।
उन्होंने ‘कैमिकल इन्हिबिटर्स’ का पौधों पर असर और बदलते हुए तापमान से पौधों पर असर का भी अध्ययन किया था। अलग-अलग परिस्थितियों में सेल मेम्ब्रेन पोटेंशियल के बदलाव का विश्लेषण करके वे इस नतीजे पर पहुँचे कि पौधे संवेदनशील होते हैं वे ‘दर्द एवं स्नेह’ अनुभव कर सकते हैं।
मेटल फटीग और कोशिकाओं की प्रतिक्रिया का अध्ययन
जगदीश चन्द्र बसु ने अलग-अलग धातु और पौधों के उतकों पर फटीग रिस्पांस का तुलनात्मक अध्ययन किया। उन्होंने अलग-अलग धातुओं को इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल, रासायनिक और थर्मल तरीकों के मिश्रण से उत्तेजित किया और कोशिकाओं तथा धातुओं की प्रतिक्रिया की समानताओं को चिह्ति किया। बोस के प्रयोगों ने नकली कोशिकाओं और धातु में चक्रीय (ब्लबसपबंस) फटीग प्रतिक्रिया दिखाई।
इसके साथ ही उन्होंने जीवित कोशिकाओं और धातुओं में अलग अलग तरह के उत्तेजनाओं के लिए विशेष चक्रीय फटीग और रिकवरी रिस्पांस का भी अध्ययन किया। आचार्य बोस ने बदलते हुए इलेक्ट्रिकल स्टिमुली के साथ पौधों की बदलते हुई इलेक्ट्रिकल प्रतिक्रिया का एक ग्राफ बनाया और यह भी दिखाया कि जब पौधों को ज़हर या एनेस्थेटिक (बेहोशी की दवा) दी जाती है तब उनकी प्रतिक्रिया कम होने लगती है और आगे चलकर शून्य हो जाती है किंतु जब जिंक धातु को ऑक्जिलिक एसिड के साथ उपचारित किया गया तब यह प्रतिक्रिया दिखाई नहीं दी।
नाइट की उपाधि
ई.1917 में जगदीश चन्द्र बसु को ‘नाइट’ (ज्ञदपहीज) की उपाधि प्रदान की गई तथा वे भौतिक एवं जीव विज्ञान के लिए रॉयल सोसायटी लंदन के फैलो चुने गए। बोस ने अपना पूरा शोधकार्य साधारण उपकरणों और साधारण प्रयोगशाला में किया था। इसलिए वे भारत में अच्छी प्रयोगशाला बनाना चाहते थे। उनके विचार को मूर्तरूप देते हुए उनके नाम से ‘बोस इंस्टीट्यूट’ स्थापित की गई जो वर्तमान समय में वैज्ञानिक शोधकार्य के लिए राष्ट्र का एक प्रसिद्ध केन्द्र है।
ई.1902 में निर्मित जगदीश चन्द्र बसु का घर (आचार्य भवन) अब संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया है। जगदीश चंद्र बोस सेवानिवृत्ति के बाद अपनी निजी प्रयोगशाला में प्रयोग एवं अनुसंघान करते रहे। कठोर परिश्रम के कारण उनका स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन गिरता गया। ई.1933 में वे गम्भीर रूप से बीमार हो गए। डॉक्टरों की सलाह पर वे जलवायु परिवर्तन के लिए बिहार के गिरीडीह चले गए किंतु उनके स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ और 23 नवम्बर 1937 को उनका देहान्त हो गया।
भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. चन्द्रशेखर वेंकटरमन विश्व भर के भौतिक-विज्ञानियों में विशेष स्थान रखते हैं। वे प्रथम भारतीय वैज्ञानिक थे जिन्हें विश्व के सर्वोच्च ‘नोबल पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।
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चन्द्रशेखर वेंकटरमन का जन्म 7 नवम्बर 1888 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली नगर के पास तिरूवालेक्कावाल गांव में में हुआ। उनके पिता चन्द्रशेखर अय्यर भौतिकी के प्राध्यापक थे तथा माता पार्वती अम्मल सुसंस्कृत परिवार की महिला थीं। चन्द्रशेखर वेंकटरमन की प्रारम्भिक शिक्षा विशाखापत्तनम में हुई। वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य और विद्वानों की संगति ने चन्द्रशेखर वेंकटरमन को बहुत प्रभावित किया। चन्द्रशेखर वेंकटरमन ने बारह वर्ष की आयु में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। उन्हीं दिनों चन्द्रशेखर वेंकटरमन को श्रीमती एनी बेसेंट के भाषण सुनने और लेख पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। चन्द्रशेखर वेंकटरमन ने रामायण, महाभारत आदि धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया। इससे उनके हृदय में भारत के गौरवशाली अतीत के बारे में चेतना उत्पन्न हुई। ई.1903 में उन्होंने चेन्नई के प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया। वेंकटरमन शरीर से बहुत दुबले-पतले थे किंतु उनका मस्तिष्क अत्यंत प्रतिभा-सम्पन्न था। उनके अध्यापक उनकी योग्यता से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें कक्षाओं में उपस्थित होने से छूट मिल गई। इस समय का उपयोग वे प्रयोगशाला एवं पुस्तकालय में करते थे। वे बी. ए. की परीक्षा में विश्वविद्यालय में अकेले ही प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। उन्हें भौतिकी में स्वर्णपदक मिला तथा अंग्रेजी निबंध पर भी पुरस्कृत किया गया।
ई.1907 में उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से गणित में प्रथम श्रेणी में एम. ए. की डिग्री विशेष योग्यता के साथ प्राप्त की। उन्होंने इस विषय में इतने अंक प्राप्त किए जितने पहले किसी विद्यार्थी ने नहीं लिए थे।
स्नातकोत्तर परीक्षा उतीर्ण करने के बाद वे उच्च-शिक्षा प्राप्त करने के लिए इंग्लैण्ड जाना चाहते थे। भौतिक विज्ञान के प्राध्यापकों की अनुशंसा पर भारत सरकार ने उन्हें छात्रवृत्ति देकर इंग्लैण्ड भेजना स्वीकार कर लिया किन्तु यूरोपीय डॉक्टरों ने शारीरिक दृष्टि से कमजोर होने के कारण उन्हें इंग्लैण्ड जाने से रोक दिया।
शोध कार्य
ई.1906 में 18 वर्ष की अल्पायु में उनका प्रकाश विवर्तन पर पहला शोधपत्र- ‘आयताकृत छिद्र के कारण उत्पन्न असीमित विवर्तन पट्टियाँ’ लंदन की फिलॉसोफिकल पत्रिका में प्रकाशित हुआ। यह शोध-पत्र ध्वनि-विज्ञान के क्षेत्र में उनकी मौलिक खोज पर था। जब प्रकाश की किरणें किसी छिद्र में से अथवा किसी अपारदर्शी वस्तु के किनारे पर से गुजरती हैं तथा किसी पर्दे पर पड़ती हैं, तो किरणों के किनारे पर मंद-तीव्र अथवा रंगीन प्रकाश की पट्टियां दिखाई देती हैं।
यह घटना ‘विवर्तन’ कहलाती है। विवर्तन प्रकाश का सामान्य लक्षण है। इससे पता चलता है कि प्रकाश तरगों में निर्मित है। इसके दूसरे वर्ष उनका एक और शोधपत्र ‘नेचर’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ, जो ‘प्रकाश-विज्ञान’ से सम्बन्धित था। इस अन्तराल में उन्होंने भौतिक विज्ञान पर कई ग्रन्थ लिखे।
चन्द्रशेखर वेंकटरमन की पारिवारिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इसलिए उन्होंने नौकरी पाने के लिए भारत सरकार के वित्त विभाग की प्रतियोगिता परीक्षा दी जिसमें वे प्रथम आए और जून 1907 में वे असिस्टेंट एकाउटेंट जनरल बनकर कलकत्ता चले गए। उन्हीं दिनों उनका विवाह कृष्णस्वामी की पुत्री त्रिलोक सुन्दरी से हुआ।
एक दिन जब वे कार्यालय से लौट रहे थे, उन्होंने एक साइन बोर्ड देखा जिस पर लिखा था ‘वैज्ञानिक अध्ययन के लिए भारतीय परिषद (इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन आफ़ साईंस)’। वे उसी समय ट्राम से उतरकर परिषद् कार्यालय में पहुँच गए और परिषद् की प्रयोगशाला में प्रयोग करने की अनुमति प्राप्त की।
कुछ समय बाद उनका स्थानांतरण पहले रंगून और फिर नागपुर हुआ। उन्होंने अपने घर में ही प्रयोगशाला बना ली और समय मिलने पर उसी में प्रयोग करने लगे। ई.1911 में उनका स्थानांतरण पुनः कलकत्ता हो गया। वे फिर से परिषद् की प्रयोगशाला में प्रयोग करने लगे।
ई.1917 तक वे प्रयोग करते रहे। इस अवधि में उन्होंने ‘ध्वनि के कम्पन और कार्य का सिद्धान्त’ विषय पर कार्य किया। ई.1917 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्राध्यापक का पद स्वीकृत हुआ, कुलपति आशुतोष मुखर्जी ने चन्द्रशेखर वेंकटरमन को यह पद स्वीकार करने के लिए आमंत्रित किया। चन्द्रशेखर वेंकटरमन ने सरकारी नौकरी से त्यागपत्र देकर यह पद स्वीकार कर लिया।
चन्द्रशेखर वेंकटरमन ने कुछ वर्षों तक कलकत्ता विश्वविद्यालय में ‘वस्तुओं में प्रकाश के चलने’ का अध्ययन किया। इनमें किरणों का पूर्ण समूह बिल्कुल सीधा नहीं चलता है। उसका कुछ भाग अपनी राह बदलकर बिखर जाता है।
आशुतोष मुकर्जी ने उन्हें विदेश जाकर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने का सुझाव दिया किंतु उन्होंने विदेश जाने से यह कहकर मना कर दिया कि- ‘ज्ञान का समस्त भण्डार तो भारत ही है, इसलिए पश्चिम में ज्ञान प्राप्त करने की कोई बात नहीं है। भारत विश्व को ज्ञान देता आया है और आज भी वह विश्व को ज्ञान प्रदान करने की क्षमता रखता है।’
ई.1919 तक वेंकटरमन भारतीय वैज्ञानिक अनुसंघान परिषद के उप-सभापति थे किंतु संस्था के प्रधान डॉ. अृतलाल सरकार की मृत्यु हो जाने के कारण वेंकटरमन को संस्था का अवैतनिक प्रधान बनाया गया। ई.1921 में ब्रिटिश साम्राज्य के विश्वविद्यालयों का लन्दन में एक सम्मेलन आयोजित किया गया, उसमें उन्हें कलकता विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करने भेजा गया।
वहाँ जब अन्य प्रतिनिधि लंदन में दर्शनीय स्थलों को देखकर अपना मनोरंजन कर रहे थे, तब चन्द्रशेखर वेंकटरमन सेंट पॉल गिरजाघर में उसके फुसफुसाते गलियारों का रहस्य समझने में लगे हुए थे। ई.1924 में उन्हें रॉयल सोसायटी लंदन का फैलो बनाया गया।
रमन प्रभाव
प्रो. रमन की रुचि ध्वनि-विज्ञान के साथ-साथ प्रकाश-विज्ञान में भी थी। वे प्राकृतिक रंगों से अत्यधिक आकर्षित होते थे। इंग्लैण्ड की यात्रा करते समय समुद्र की अद्भुत नीलिमा एवं दूधियापन ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। ब्रिटिश वैज्ञानिक लॉर्ड रैले ने समुद्र के नीला दिखने का कारण एक प्रकार का प्रकीर्णन बताया था जिससे प्रोफेसर वेंकटरमन सन्तुष्ट नहीं थे।
कलकत्ता लौटने पर उन्होंने इस पर शोध आरम्भ किया। चन्द्रशेखर वेंकटरमन लगभग सात वर्ष तक प्रकाश तरंगों का अध्ययन करते रहे। ई.1927 में उनका ध्यान इस बात पर गया कि जब एक्स किरणें प्रकीर्णित होती हैं तो उनकी तरंग लम्बाइयाँ बदल जाती हैं। उन्होंने विचार किया कि साधारण प्रकाश में भी ऐसा क्यों नहीं होना चाहिए? उन्होंने स्पेक्ट्रोस्कोप में पारद आर्क के प्रकाश का स्पेक्ट्रम बनाया।
वेंकटरमन ने इन दोनों के मध्य विभिन्न प्रकार के रासायनिक पदार्थ रखे तथा पारद आर्क के प्रकाश को उनमें से गुजार कर अलग-अलग स्पेक्ट्रम बनाए। उन्होंने देखा कि प्रत्येक स्पेक्ट्रम में अन्तर पड़ता है और प्रत्येक पदार्थ अपनी-अपनी प्रकार का अन्तर डालता है। स्पेक्ट्रम चित्रों को मापकर उनकी सैद्धान्तिक व्याख्या की गई तथा यह प्रमाणित किया गया कि यह अन्तर पारद-प्रकाश की तरंग-लम्बाइयों में परिवर्तित होने के कारण पड़ता है।
चन्द्रशेखर वेंकटरमन ने यह प्रमाणित किया कि समुद्र का पानी सूर्य के प्रकाश के कारण नीला दिखाई देता है। केवल पारदर्शक द्रव्यों में ही नहीं अपितु बर्फ और स्फटिक जैसे ठोस पारदर्शक पदार्थो में भी अणुओं की गति के कारण प्रकाश का परिपेक्षण होता है। इसी सिद्धांत को ‘रमन प्रभाव’ के नाम से जाना गया।
29 फरवरी 1928 को चन्द्रशेखर वेंकटरमन ने अपनी इस खोज को सार्वजनिक कर दिया। 31 मार्च 1928 को ‘नेचर’ पत्रिका में उनकी शोध पर आधारित एक शोध-पत्र- ‘ए न्यू टाइप ऑफ ए सैकण्डरी रेडिएशन’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। चन्द्रशेखर वेंकट रमन ने 28 फरवरी को रमन प्रभाव की खोज की थी, इसकी स्मृति में भारत में इस दिन को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है।
वाद्य-यन्त्रों की ध्वनियों का अध्ययन
चन्द्रशेखर वेंकटरमन वीणा वादन में अत्यंत निपुण थे। उन्होंने ‘कम्पन्न’ विषय पर अनुसंधान के दौरान विभिन्न वाद्य-यंत्रों की ध्वनियों का अध्ययन किया तथा संगीत और वाद्य-यंत्रों के सम्बन्ध में अनेक ग्रन्थों की रचना की। उन्होंने वाद्ययंत्रों की विभिन्न प्रकार की संगीत-ध्वनियों के अध्ययन हेतु अनेक नवीन यंत्रों का आविष्कार भी किया।
वाद्यों की भौतिकी का उन्हें इतना गहरा ज्ञान था कि ई.1927 में जर्मनी में प्रकाशित बीस खण्डों वाले भौतिकी विश्वकोश के आठवें खण्ड के लिए वाद्ययंत्रों की भौतिकी का आलेख चन्द्रशेखर वेंकटरमन ने ही तैयार किया था। इस कोश में वे अकेले गैर-जर्मन वैज्ञानिक थे।
पुरस्कार एवं उपाधियां
चन्द्रशेखर वेंकटरमन को ई.1930 में रमन प्रभाव की खोज के लिए भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया। इससे रमन प्रभाव के अनुसंधान के लिए नया क्षेत्र खुल गया। ब्रिटिश सरकार ने चन्द्रशेखर वेंकटरमन को ‘नाइट’ की उपाधि से अलंकृत किया जिसे उन्होंने गुलामी का प्रतीक कहकर अस्वीकार कर दिया। उन्हें इटालियन साइन्स कौंसिल द्वारा मटुची पदक, ह्यूज पदक एवं विश्व के विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा मानद उपाधियों से सम्मानित किया गया।
ई.1948 में सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने रमन शोध संस्थान बैंगलोर की स्थापना की और इसी संस्थान में शोध करने लगे। स्वाधीन भारत की सरकार ने ई.1949 में उन्हें सर्वप्रथम ‘राष्ट्रीय प्रोफेसर’ बनाया और ई.1954 में उन्हें ‘भारत रत्न’ से विभूषित किया। ई.1957 में उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय लेनिन पुरस्कार प्राप्त हुआ।
ऑपथैलोमोस्कोप का आविष्कार
ई.1960 में चन्द्रशेखर वेंकटरमन ने आंख के रेटिना को देखने के लिए ‘ऑपथैलोमोस्कोप’ यंत्र का आविष्कार किया जिससे आंख के अन्दर की रचना और क्रियाएं आसानी से देखी जा सकती हैं। इतना ही नहीं आपने रेटिना में तीन रंगों की भी खोज की तथा इन रंगों के कार्य और प्रभाव का भी पता लगाया।
प्रो. रमन अत्यन्त ही शान्त प्रकृति के व्यक्ति थे तथा अपने कार्य में आने वाली बाधाओं से विचलित नहीं होते थे। व कहते थे- ‘हम उस समय तक के लिए प्रयत्नशील हैं जब तक कि हम पूर्व के ज्ञान की ज्योति से पश्चिमी जगत् को प्रकाशित न कर दें।’ 2 अक्टूबर 1970 को उन्होंने विज्ञान अकादमी के तत्त्वावधान में गांधी स्मारक व्याख्यान दिया जो उनका अन्तिम व्याख्यान था। 21 नवम्बर 1970 को उनका निधन हो गया।
प्रस्तावना – हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया पृष्ठ पर पुस्तक की विषय वस्तु को स्पष्ट किया गया है। इस पुस्तक के लेखक डॉ. मोहनलाल गुप्ता हैं।
अत्यंत प्राचीन काल से भारतीय ऋषि-मुनि मानव मात्र को सुखी बनाने के उद्देश्य से धरती के विभिन्न द्वीपों और दूरस्थ देशों की यात्रा करके अहिंसा, प्रेम, सद्भाव एवं शांति का संदेश देते आए हैं जिसे भारतीय संस्कृति कहा जाता है। यह भारतीय संस्कृति ईसाई रिलीजन तथा इस्लाम के प्रादुर्भाव से सैंकड़ों साल पूर्व ही, विश्व के अनेक द्वीपों, प्रायद्वीपों एवं महाद्वीपों में फैल गई थी।
भारतीय संस्कृति को दूसरे देशों में ले जाने वाले उपदेशक हिन्दू धर्म तथा बौद्ध धर्म के प्रचारकों के रूप में नहीं गए थे। वे धरती पर ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करने तथा मुनष्यों को हिंसा का मार्ग त्यागकर प्रेम से रहने का उपदेश देने के उद्देश्य से गए थे, बाद में इन्हें हिन्दू धर्म तथा बौद्ध धर्म का प्रचारक कहकर उनके योगदान को कम करके आंकने का प्रयास किया गया। आज से लगभग 2000 साल पहले ईसाई धर्म तथा 1400 साल पहले इस्लाम के प्रादुर्भाव के पश्चात्, पूरी धरती से हिन्दू धर्म तेजी से समाप्त हुआ है।
चीन, जापान, वियतनाम, थाइलैण्ड तथा बर्मा आदि अनेकानेक एशियाई देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार हो जाने से बौद्ध धर्म का उतना ह्रास नहीं हुआ जबकि हिन्दू धर्म सैंकड़ों द्वीपों और देशों में दम तोड़ चुका है। भारत के अतिरिक्त केवल नेपाल देश तथा इण्डोनेशिया के बाली द्वीप में ही हिन्दुओं का बड़ी संख्या में अधिवास है। भारत को आपातकाल में ई.1976 में 42वें संविधान संशोधन से धर्म-निरपेक्ष देश घोषित किया गया। धर्म-निरपेक्ष बनने वाला यह संसार का पहला देश था।
हाल ही के दशकों में नेपाल में चीन ने जिस प्रबलता के साथ साम्यवाद का आक्रमण किया, उसके प्रभाव में आकर नेपाल धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित हो गया। संसार में इन दो देशों के अतिरिक्त और कहीं भी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय व्यवस्था नहीं पाई जाती। बाली के हिन्दू जिस देश के निवासी हैं, उस देश में 90 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या रहती है।
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विश्व के मानचित्र पर हिन्दू हर तरह से नष्ट हो रहे हैं, जनसंख्या से लेकर संस्कृति तक सब कुछ समाप्त हो रहा है किंतु हिन्दू जाति मदांध होकर सोई हुई है। ई.1947 में पाकिस्तान में 20 प्रतिशत हिन्दू थे जो आज केवल 2-3 प्रतिशत रह गए हैं। बांगलादेश में भी हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया है, उनकी लड़कियों से बलपूर्वक विवाह किया जा रहा है, उनके घरों को जलाया जा रहा है। यहाँ तक कि पश्चिमी बंगाल में भी ऐसी घटनाएं पिछले कुछ वर्षों में देखने का मिली हैं। केरल, काश्मीर, आसाम में भी हिन्दू जाति का अस्तित्व मिट रहा है। वोटों की राजनीति के समक्ष सब-कुछ समर्पित किया जा रहा है। भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में हिन्दुओं की क्या स्थिति है, इसे देखा और समझा जाना आवश्यक है। अप्रेल 2017 के तीसरे एवं चौथे सप्ताह में प्राचीन हिन्दू मंदिरों के दर्शनों की लालसा में, हमारे परिवार ने इण्डोनेशिया गणराज्य के दो द्वीपों- बाली तथा जावा की यात्रा की। इस दौरान हमें देनपासार, उबुद, मेंगवी, कुता, जोग्यकार्ता तथा जकार्ता आदि नगरों का भ्रमण करने का अवसर मिला।
हमने सुन रखा था कि बाली और जावा द्वीपों पर सैंकड़ों साल पुराने कुछ ऐसे हिन्दू तथा बौद्ध मंदिर स्थित हैं जिनका निर्माण देवताओं द्वारा किया गया। ये देवता किसी अन्य ग्रह से आए हुए परग्रही जीव रहे होंगे जिनकी तकनीक तथा शिल्प उस काल के इंसानों की तकनीक तथा शिल्प की तुलना में अत्यंत उच्च कोटि की रही होगी। तभी वे सैंकड़ों की संख्या वाले हिन्दू मंदिरों के समूह तथा विश्व के सबसे बड़े पिरामिडीय रचना वाले बौद्ध मंदिरों का निर्माण कर पाये। हमने इन मंदिरों को देखने की लालसा में इण्डोनेशिया भ्रमण का कार्यक्रम बनाया था।
इण्डोनेशिया निश्चित ही एक सुंदर देश है जो भारतीयों को अपनी वैविध्यपूर्ण हिन्दू संस्कृति तथा सुन्दर समुद्री तटों के कारण आकर्षित करता है। हमने इसे एक धार्मिक यात्रा की तरह आरम्भ किया किंतु शीघ्र ही हमारी यह यात्रा ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक तथ्यों की खोजपूर्ण यात्रा में बदल गई तथा एक-एक करके बहुत से रहस्यों पर से आवरण हटाने वाली सिद्ध हुई। जैसे-जैसे हम अपनी यात्रा पर आगे बढ़ते गये, नए-नए रहस्यों पर से पर्दा उठता गया।
कुछ ही दिनों में हमने समझ लिया कि हमने प्राचीन हिन्दू मंदिरों के दर्शनों की लालसा में, अनजाने में ही बाली द्वीप के रूप में सात समुद्रों के बीच एक रहस्यमय किंतु निर्धन भारत के अवशेषों को खोज निकाला है। एक ऐसा निर्धन भारत जहाँ गाय नहीं है, गंगाजी नहीं हैं, गेहूं नहीं है। दूध, घी, दही, छाछ, रोटी, सोगरा, ढोकला, दाल-बाटी कुछ भी नहीं है। स्वाभाविक है कि ऐसा देश नितांत निर्धन ही हो सकता है।
यह सचमुच एक रहस्यमय निर्धन भारत है जो अपने समस्त प्राचीन वैभव को खोकर और अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर सांस्कृतिक प्रदूषण की आंधी के झौंकों में संघर्ष कर रहा है। बाली द्वीप पर भले ही आज भी 85-90 प्रतिशत हिन्दू रहते हैं किंतु जावा द्वीप पर 90 प्रतिशत लोग इस्लाम स्वीकार कर चुके हैं।
इण्डोनेशिया के सबसे बड़े द्वीप सुमात्रा में भी मुसलमानों की जनसंख्या की यही स्थिति है जिसका परिणाम यह है कि आज इण्डोनेशिया संसार का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है तथा इस देश की 90 प्रतिशत जनसंख्या मुसलमान है। हिन्दुओं का छोटा सा दीपक बाली देश के रूप में टिमटिमा रहा है। इस सच्चाई के बीच बाली और जावा द्वीपों के हिन्दू और बौद्ध धर्मस्थलों को देखना कम रोमांचक नहीं है।
इण्डोनेशिया के मुसलमानों और भारत के मुसलमानों में भी सांस्कृतिक भिन्नता है। इस भिन्नता को देखना और समझना काफी रोचक है। इण्डोनेशिया के मुसलमानों ने यूनेस्को की सहायता से हिन्दू और बौद्ध मंदिरों को धरती में से खोज निकाला है और फिर से खड़ा करके पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है।
इण्डोनेशिया के नगरों एवं द्वीपों में मुख्य चौराहों पर भवनों के सामने, हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों को बड़ी शान से दिखाया जाता है। इण्डोनेशियाई समाज हजारों साल से स्त्री प्रधान रहा है। आज भी इण्डोनेशियाई समाज इस विशेषता से सम्पन्न है। यही कारण है कि वहाँ की औरतें बुरका, हिजाब आदि नहीं पहनतीं। वे आधुनिक संसार का प्रतिनिधित्व करती हैं और अपनी हजारों साल पुरानी संस्कृति पर गौरव करती हैं। एक ऐसी संस्कृति जो इस्लाम का हिस्सा नहीं है, अपितु इण्डोनेशियाई समाज के इतिहास और गौवमयी अतीत का हिस्सा है।
हमारे अनुभव, नितान्त हमारे अपने हैं किंतु अपने इन अनुभवों को सार्वजनिक करना इसलिए आवश्यक हो गया ताकि भारत के लोग भी समुद्रों के बीच बसने वाले एक और निर्धन भारत की सच्चाई एवं त्रासदी को जान सकें। इस निर्धन भारत की यात्रा से पहले हमें इसके भौगोलिक एवं ऐतिहासिक तथ्यों को संक्षेप में जान लेना आवश्यक है। इसलिए पुस्तक के आरम्भ में उन्हें भी समुचित स्थान दिय गया है। आशा है, पाठकों को यह पुस्तक पसंद आएगी। शुभम्।
अनुक्रमणिका – हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया पृष्ठ पर इस पुस्तक के अध्यायों का क्रम दिया गया है। इस पृष्ठ पर दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करके अध्यायों तक सीधे ही पहुंचा जा सकता है।
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इण्डोनेशियाई द्वीपों के पौराणिक संदर्भ कई पुराणों में मिलते हैं जिनसे ज्ञात होता है कि इन समस्त द्वीपों पर भारतीय ऋषियों का आवागमन होता रहता था।
इण्डोनेशिया गणराज्य, दीपान्तर अर्थात् पार-महा-द्वीपीय (ट्रांसकॉन्टीनेन्टल) देश है जो दक्षिण-पूर्व एशिया और ओशिनिया (उष्णकटिबन्धीय प्रशान्त महासागर के द्वीप) क्षेत्रों में स्थित है। भारतीय पुराणों में इसे ”द्वीपान्तर भारत” अर्थात् समुद्र-पार-भारत कहा गया है। इसी कारण यूरोपीय इतिहासकारों एवं यात्रियों ने इसे इण्डोनेशिया कहा जो ”इण्डिया इन एशिया” की ध्वनि देता है। इण्डोनेशिया के निवासियों ने बाद में यही नाम अपना लिया।
डचों द्वारा शासित औपनिवेशिक काल में इस द्वीप समूह को ईस्ट-इण्डीज कहा जाता था। वर्तमान में इण्डोनेशिया गणराज्य, दक्षिण-पूर्व एशिया का सबसे बड़ा देश है। इसकी स्थलीय सीमाएं पापुआ न्यू गिनी, पूर्वी तिमोर और मलेशिया (पुराना नाम मलाया) के साथ मिलती हैं, जबकि इसकी जलीय सीमाओं पर सिंगापुर, फिलीपींस, ऑस्ट्रेलिया तथा भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की जलीय सीमाएं स्थित हैं।
यह संसार का एकमात्र देश है जो 17,508 द्वीपों में विस्तृत है। इनमें से बहुत से द्वीपों के नाम तक नहीं रखे गए हैं। हाल ही में यूएनओ ने इण्डोनेशिया से उसके द्वीपों की सूची, उनके नाम सहित मांगी थी। इण्डोनेशिया गणराज्य की जनसंख्या लगभग 23 करोड़ है।
यह विश्व का चौथा सर्वाधिक जनसंख्या वाला एवं विश्व का सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या वाला देश है। इंडोनेशिया में 2 हजार से अधिक सांस्कृतिक समूहों के लोग निवास करते हैं। इन द्वीपों के अति प्राचीन इतिहास के कुछ साक्ष्य चीन देश के साहित्यिक संदर्भो में मिलते हैं।
भूगोलविदों, इतिहासकारों, वैज्ञानिकों एवं प्राचीन भारतीय साहित्य के अनुसार ईस्ट-इण्डीज द्वीप किसी समय एशिया से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक जुड़े हुए थे। बाद में भूगर्भीय हलचलों के कारण टूट-टूट कर अर्द्धचंद्राकार आकृति में बिखर गए। इनमें से जावा, सुमात्रा, बाली तथा बोर्नियो बड़े द्वीप हैं, इनकी तुलना में अन्य द्वीप काफी छोटे हैं।
इण्डोनेशियाई द्वीपों के पौराणिक संदर्भ
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इण्डोनेशियाई द्वीपों के पौराणिक संदर्भ इण्डोनेशियाई द्वीपों से भारत का सम्बन्ध रामकथा के काल से भी पहले ले जाते हैं। उस काल में भारत की भौगोलिक सीमाएं जम्बूद्वीप (भारत) से लेकर सिंहल द्वीप (श्रीलंका), स्याम (थाइलैण्ड), यवद्वीप (जावा), स्वर्णद्वीप (सुमात्रा), मलय द्वीप (मलेशिया), शंखद्वीप (बोर्नियो), बाली तथा आंध्रालय (ऑस्ट्रेलिया) तक थीं। मलय द्वीप अथवा मलाया को अब मलेशिया कहते हैं, काम्बोज, कम्बोडिया (कम्पूचिया) के नाम से अलग देश है। उस काल के चम्पा राज्य के द्वीप वर्तमान में वियेतनाम और कम्बोडिया (कम्पूचिया) में बंट गए हैं। यहाँ आज भी संस्कृत भाषा व्यवहार में लाई जाती है। उस काल में भारत के राजा दूर-दूर के समुद्री द्वीपों पर अधिकार कर लेते थे। इनमें कुशद्वीप (अफ्रीका) तथा वाराहद्वीप (मेडागास्कर) प्रमुख हैं। रामकथा से पहले से लेकर सातवीं शताब्दी ईस्वी में इस्लाम का उदय होने तक इनमें से अधिकांश द्वीप भारत का हिस्सा थे तथा यहाँ की जनता हिन्दू थी। मेडागास्कर अब अफ्रीका महाद्वीप के दक्षिण-पूर्व में समुद्र के बीच स्थित एक विशाल द्वीप है तथा अलग राष्ट्र है।
वाल्मीकि रामायण में सप्तद्वीपों का वर्णन
वाल्मीकि रामायण में लिखा है- ‘यत्रवन्तो यवद्वीपः सप्तराज्योपशोभितः।।’ अर्थात् यवद्वीप में सात राज्य हैं। निश्चित रूप से उस काल में यवद्वीप (जावा), भारत की मुख्य भूमि के पर्याप्त निकट रहा होगा। इसके निकटवर्ती समुद्री क्षेत्र में अन्य द्वीप होंगे जिनमें से छः-सात द्वीप मानव-बस्तियों की उपस्थिति की दृष्टि से प्रमुख रहे होंगे।
वायुपुराण के छः द्वीप
इण्डोनेशियाई द्वीपों के पौराणिक संदर्भ वायुपुराण में भी देखे जा सकते हैं। वायुपुराण के एक श्लोक में कहा गया है- ‘अंगद्वीपं, यवद्वीपं, मलयद्वीपं, शंखद्वीपं, कुशद्वीपं वराहद्वीपमेव च।। एवं षडेषे कथिता अनुद्वीपाः समन्ततः। भारतं द्वीपदेशो वै दक्षिणे बहुविस्तरः।।’
अर्थात्- अंग द्वीप, यव द्वीप, मलय द्वीप, शंख द्वीप, कुश द्वीप तथा वराह द्वीप आदि, भारतवर्ष के अनुद्वीप हैं जो दक्षिण की ओर दूर तक फैले हुए हैं। इस काल में बाली द्वीप भी इन्हीं द्वीपों की शृंखला में गिना जाता था जहाँ भारतीय आर्यों की बस्तियां थीं और जहाँ मनुस्मृति के आधार पर सामाजिक एवं न्याय व्यवस्था स्थापित थी।
लंका के सम्बन्ध में पौराणिक मान्यताएं
लंका को आजकल सीलोन कहा जाता है जो कि सिंहल का अपभ्रंश है। पौराणिक काल में लंका को सिंहल द्वीप भी कहा जाता था। पौराणिक काल में लंका का आशय जिस द्वीप से होता था, उसमें मलय एवं सुमात्रा की भूमि भी सम्मिलित थी। ब्रह्माण्ड पुराण कहता है– ‘तथैव मलयद्वीपमेवमेव सुसंवृतम्। नित्यप्रमुदिता स्फीता लंकानाम महापुरी।’
इस श्लोक से ज्ञात होता है कि ब्रह्माण्ड पुराण के रचना काल में मलयद्वीप लंका के ठीक निकट उसी प्रकार स्थित रहा होगा जिस प्रकार आज लंका, भारत के निकट है। सुमात्रा द्वीप पर आज भी सोनी-लंका नामक एक स्थान है जो सुमात्रा के उत्तर-पूर्व वाले पर्वत के निकट समुद्र तट पर स्थित है। इस स्थान पर अत्धिक मात्रा में सुवर्ण उपलब्ध था। इस स्वर्ण की प्राप्ति पहले यक्षों ने और बाद में राक्षसों द्वारा की गई।
नारद खण्ड में लिखा है– ‘भविष्यन्ति काले कालि दरिद्राः नृपमानवः तेऽत्र स्वर्णस्य लोभेन देवतादर्शनाय च।। नित्यं चैवागमिष्यन्ति त्यक्त्वा रक्षः कृत भयम्।’ अर्थात् कलियुग में राजा-प्रजा दरिद्री हो जाएंगे, इसलिए यहां लोभ के कारण नित्य ही आया करेंगे।
लंका के राजा रावण का नाना सुमाली, अपने राक्षसों को भगवान विष्णु के संहार से बचाने के लिए, लंका छोड़कर पाताल में जाकर रहने लगा। यह पाताल जावा-सुमात्रा-बाली आदि द्वीप समूह का कोई द्वीप होना अनुमानित किया जाता है। इस घटना के सही समय के बारे में यद्यपि अलग-अलग मान्यताएं हैं।
आचार्य चतुरसेन ने इण्डोनेशियाई द्वीपों के पौराणिक संदर्भ विषय पर श्रमसाध्य शोध किया था। उनके अनुसार यह घटना आज से लगभग सात हजार साल पहले हुई। इन द्वीपों पर रामकथा के प्रसंगों वाली हजारों साल पुरानी प्रतिमाएं मिलती हैं। सुमात्रा द्वीप को भारतीय पौराणिक साहित्य में सुवर्ण द्वीप तथा अंगद्वीप कहा गया है जहाँ स्वर्ण के विशाल भण्डार उपलब्ध थे। यक्ष जाति के लोगों ने अपना स्वर्ण, स्वर्णद्वीप (इसे अंगद्वीप भी कहते थे) से लाकर सिंहल द्वीप (लंका) में रखा था। यक्षों का राजा कुबेर इस धन की रक्षा करता था।
राक्षसों के राजा रावण का बचपन ऑस्टेलिया में व्यतीत हुआ था जो तब आंध्रालय कहलाता था। रावण ने आन्ध्रालय से आकर लंका पर चढ़ाई की तथा लंका के राजा कुबेर को परास्त करके सोने की लंका पर अधिकार कर लिया तथा उसका पुष्पक विमान भी छीन लिया। इसके बाद राक्षस पुनः लंका में रहने लगे। कुबेर और रावण, दोनों ही विश्रवा के पुत्र थे।
बाली एवं जावा द्वीपों पर आज भी राक्षसों की तरह दिखाई देने वाली मूर्तियां यत्र-तत्र दिखाई देती हैं। बाली द्वीप पर राक्षस जैसी दिखने वाली विशालाकाय मूर्तियों का बड़ा संग्रहालय है। इन मूर्तियों की उपस्थिति भारतीय पौराणिक साहित्य में वर्णित राक्षसों के इन द्वीपों से सम्बन्ध की पुष्टि करती हैं।
बोर्नियो में हिन्दू संस्कृति
शंखद्वीप (बोर्नियो) में हिन्दू संस्कृति का प्रसार पहली शताब्दी इस्वी में आरम्भ हुआ। चौथी शताब्दी ईस्वी में हिन्दू राजाओं ने बोर्नियो में अपनी सत्ता स्थापित की। बोर्नियो से चौथी शताब्दी ईस्वी के शिलालेख प्राप्त हुए हैं जिनसे बोर्नियो में उस काल में वैदिक धर्म के अस्तित्व में होने के साक्ष्य मिलते हैं।
पांचवी शताब्दी ईस्वी में बोर्नियो एवं सुमात्रा द्वीपों पर जावा के शैलेन्द्र राजवंश का अधिकार हो गया। बोर्नियो में प्राप्त होने वाले खण्डहरों से भगवान शिव एवं बुद्ध की मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। लकड़ी का एक मंदिर भी प्राप्त हुआ है। बोर्नियो के स्थापत्य एवं कला पर भारतीय प्रभाव आज भी देखा जा सकता है।
जावा द्वीप का प्रारम्भिक इतिहास यवद्वीप के नाम से मिलता है। भारतीय संस्कृत साहित्य में इस द्वीप का उल्लेख यवद्वीप के नाम से हुआ है जहाँ चावल एवं स्वर्ण प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था।
चीनी संदर्भों में भी जावाद्वीप का इतिहास मिलता है। चीनी पुराणों के अनुसार जावा में लगभग 2 शताब्दी ईस्वी पूर्व में भारतीय लोग पहुंच चुके थे। ये लोग भारत के कलिंग राज्य से आए थे।
डॉ. क्रोम नामक डच पुरातत्ववेत्ता के अनुसार हिन्दुओं के जावा पहुचंने से पहले ही जावा के लोग चावल की खेती करते थे। वे मछली पकड़ने, कपड़ा बुनने, वाद्ययंत्र बजाने, ज्योतिष जानने आदि कलाओं को जानते थे। जब भारतीय हिन्दू यहाँ पहुंचे तो यहाँ के लोगों ने हिन्दू विश्वासों एवं संस्कृति को अपना लिया और जावा की पुरानी संस्कृति भी उसमें घुल-मिल गई।
दूसरी शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में हिन्दू राजा देववर्मन ने जावा द्वीप पर प्रबल हिन्दू राज्य की स्थापना की जो चौथी-पांचवी शताब्दी ईस्वी तक फलता-फूलता रहा। चीनी यात्री फाह्यान 400 शताब्दी ईस्वी में भारत आया था। जब वह ई. 412 में श्रीलंका होता हुआ समुद्र के रास्ते से चीन लौट रहा था, तब उसका जहाज समुद्रों में भटक गया तथा लगभग 100 दिनों तक समुद्री लहरों पर हिचकोले खाता हुआ जावा द्वीप पर पहुंचा। इस द्वीप पर उसने वैदिक एवं शैव धर्र्मों को मानने वाले लोगों को निवास करते हुए पाया।
गुप्तकाल में जावा द्वीप का इतिहास
जावा एवं अन्य ईस्ट-इण्डीज द्वीपों पर भारतीय राजाओं का प्रसार अत्यंत प्राचीन काल से है। उसका कोई लेखा-जोखा प्राप्त नहीं होता। फिर भी गुप्त काल से जावा के हिन्दू राजाओं के लिखित संदर्भ मिलने लगते हैं।
भारत में ई. 320 से 495 तक गुप्तवंश के राजाओं का शासन रहा जिसे भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल कहा जाता है। उस काल में बौद्ध धर्म की जगह वैष्णव धर्म का उन्नयन किया गया। उस काल में सुमात्रा, जावा, बाली, बोर्नियो, चम्पा, कम्बोडिया, मलाया तथा मलक्का आदि द्वीपों में भारतीय भाषा, साहित्य तथा शिक्षा का खूब प्रचार हुआ। इन द्वीपों में नए सिरे से हिन्दू राज्यों की स्थापना हुई। जावा की एक अनुश्रुति के अनुसार इस काल में गुजरात के एक राजकुमार ने कई हजार मनुष्यों के साथ समुद्र पार कर जावा में उपनिवेश की स्थापना की।
गुप्त काल में ताम्रलिप्ति बंगाल का प्रसिद्ध बन्दरगाह था। उत्तरी भारत का सारा व्यापार इसी बन्दरगाह द्वारा चीन, बर्मा तथा पूर्वी-द्वीप-समूह से होता था। इन देशों के साथ दक्षिण-भारत के राज्यों से भी व्यापार होता था। यह व्यापार गोदावरी तथा कृष्णा नदियों के मुहानों पर स्थित बन्दरगाहों के द्वारा होता था। इस प्रकार गुप्तकाल में पूर्वी द्वीप समूहों के साथ भारत के घनिष्ठ राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हुए।
इन द्वीपों में भारतीय सामाजिक प्रथाओं, धर्म, कला तथा शासन पद्धति का अनुसरण होने लगा। डॉ. अल्तेकर ने लिखा है- ‘यदि एक ओर भारत और दूसरी ओर चीन के बीच कोई सांस्कृतिक एकता विद्यमान है और यदि मूल्यवान स्मारक, जो भारत की संस्कृति के गौरव के मूक साक्षी हैं, समस्त इंडोचीन (विएतनाम), जावा, सुमात्रा तथा बोर्निया में विकीर्ण परिलक्षित होते हैं तो इसका श्रेय गुप्तकाल को ही प्राप्त है, जिसने भारतीय संस्कृति को बाहर विस्तारित करने की प्रेरणा प्रदान की।’
जावा में शैलेन्द्र राजवंश का उदय (मेदांग राज्य)
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चौथी शताब्दी ईस्वी में जब भारत में गुप्त राजाओं का राज्य विस्तार पा रहा था, जावा द्वीप पर शैलेन्द्र राजवंश की स्थापना हुई। यह राज्य मलाया (मलेशिया), सुमात्रा, जावा, बाली तथा बोर्नियो द्वीपों पर विस्तृत था। मलाया में उससे पहले भी हिन्दू बस्तियां थीं किंतु उनके राजनीतिक स्वरूप की जानकारी नहीं मिलती है। शैलेन्द्र साम्राज्य 11वीं शताब्दी ईस्वी तक चलता रहा। दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य के राजा राजेन्द्र चोल ने 11वीं शताब्दी ईस्वी में इण्डोनेशिया के शैलेन्द्र राजवंश का अंत कर दिया। चोल राजा दक्षिण भारत से हजारों किलोमीटर दूर के क्षेत्र पर मजबूती से नियंत्रण स्थापित नहीं कर पाए। इसलिए 12वीं शताब्दी में एक बार पुनः शैलेन्द्र राजवंश ने अपनी सत्ता विस्तृत कर ली। शैलेन्द्र राजवंश के राजा बौद्ध धर्म के अनुयायी हो गए थे। इसलिए उन्होंने जावा में कई बौद्ध मंदिरों एवं विहारों का निर्माण करवाया। उनके द्वारा निर्मित सर्वाधिक महत्वपूर्ण बौद्ध मठ नालंदा कहलाता था तथा सर्वाधिक महत्वपूर्ण विहार नागपट्टनम कहलाता था। ये दोनों स्थान जावा द्वीप में थे। शैलेन्द्र राजवंश ने चंडी कालासन (कालासन मंदिर) तथा बोरोबुदुर बौद्ध विहार का भी निर्माण करवाया।
कुछ शिलालेखों से प्रमाणित हुआ है कि जावा का शैलेन्द्र राज-परिवार प्राचीन मलाया भाषा का प्रयोग करता था। यह भाषा इस बात का प्रमाण है कि शैलेन्द्र राज-परिवार जावा में आने से पहले सुमात्रा द्वीप पर शासन करता था तथा यह श्रीविजय राजवंश से सम्बन्धित था। उसने मध्य जावा के स्थानीय शासकों को परास्त करके जावा द्वीप पर अधिकार किया। उन्होंने माताराम राज्य के संजय राजवंश को अपना जागीरदार बना लिया। शैलेन्द्रों की सत्ता का केन्द्र दक्षिण केडू था जो मगेलांग के निकट स्थित था। वर्तमान में यह योग्यकार्ता के उत्तर में स्थित है।
शैलेन्द्र राजवंश आरम्भ में शैव मत का अनुयायी था किंतु बाद में राजा संखरा (राकाई पनरबन अथवा पनंगकरन) द्वारा महायान बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिए जाने के बाद बौद्ध हो गया था। राजा संखरा के शिलालेख, सोजोमेर्तो शिलालेख एवं चरित परह्यंगान ग्रंथ के के अनुसार परवर्ती काल के शैलेन्द्र राजा पनंगकरन के वंशज, बौद्ध धर्म की महायान शाखा के अनुयायी बने रहे। वे समरतुंग के शासन के अंत तक बौद्ध धर्म को राजकीय प्रश्रय देते रहे। सोजोमेर्तो शिलालेख अब उपलब्ध नहीं है।
सुंदा राज्य (पश्चिमी जावा)
सुंदा राज्य, पश्चिम जावा में स्थित हिन्दू राज्य था जिसकी स्थापना ई.669 में हुई। वर्तमान जकार्ता, पश्चिमी जावा, मध्य जावा का पश्चिमी भाग तथा बान्टेन इसी सुंदा राज्य में स्थित थे। ”बुजंग्गा माकिन” पाण्डुलिपि के अनुसार सुंदा राज्य की पूर्वी सीमा का निर्माण पामाली नदी नामक नदी करती थी जिसे अब ब्रेब्स नदी कहा जाता है। मध्य जावा में इसकी सीमा में सारायू नामक नदी बहती थी। ई.1579 में इस राज्य को मध्य जावा के मुस्लिम शासकों ने नष्ट कर दिया।
संजय राजवंश (माताराम राज्य)
संजय राजवंश एक प्राचीन जावाई राजवंश था। इस वंश के राजाओं ने जिस राज्य की स्थापना की, वह माताराम राज्य कहलाया। संभवतः जावा द्वीप की मातृ-सत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था के कारण इस राज्य को माताराम कहा गया। माताराम राज्य की स्थापना ब्रांटाज नदी की घाटी में हुई थी। यहाँ की भूमि उपजाऊ थी और खेती प्रचुरता से होती थी।
कंग्गल लेख के अनुसार इस राजवंश की स्थापना ई.732 में संजय नामक राजा ने की। यह शिलालेख मागेलांग नामक नगर के दक्षिण-पश्चिम में मिला है। इसकी लिपि दक्षिण भारत के तत्कालीन पल्लव शासकों द्वारा प्रयुक्त होने वाली लिपि है तथा इसकी भाषा संस्कृत है। इस शिलालेख में कुंजरकुंजा क्षेत्र की पहाड़ी पर शिवलिंग स्थापित किए जाने के बारे में जानकारी दी गई है।
इस शिलालेख में कहा गया है कि राजा सन्न ने इस द्वीप पर फिर से अधिकार किया तथा उसने लम्बे समय तक बुद्धिमत्ता पूर्वक एवं कौशल पूर्वक राज्य किया। राजा सन्न की मृत्यु के बाद राजवंश की एकता भंग हो गई जिससे राज्य खण्डित होने लगा किंतु स्वर्गीय राजा सन्न की बहिन सन्नह के पुत्र संजय ने सत्ता संभाली। उसने राज्य में धर्म, साहित्य तथा विविध कलाओं का प्रचार किया तथा सैन्य शक्ति में वृद्धि की। उसने आसपास के क्षेत्रों को अपने राज्य में मिला लिया तथा जनता को सुखी एवं समृद्ध बनाने का प्रयास किया। राजा सन्न एवं संजय को ”चरित परहयंगान” भी कहा जाता है।
पश्चवर्ती काल की एक पुस्तक के अनुसार राजा सुन्न को गलुह के राजा पुरबासोरा ने परास्त कर दिया। इसलिए उसे मेरापी के पर्वत में शरण लेनी पड़ी। संजय ने उसके खोए हुए राज्य को फिर से जीता तथा पश्चिमी जावा, मध्य जावा, पूर्वी जावा एवं बाली तक अपना राज्य फैला लिया। संजय ने मलयु तथा केलिंग परह्यंगान के राजा ”संग श्रीविजय” से भी युद्ध किया।
इसके बाद की अवधि में शैलेन्द्र राज्य द्वारा संजय राज्य को उत्तरी जावा में धकेल दिया गया। कालासन शिलालेख के अनुसार शैलेन्द्र राज्य का उत्थान ई.778 के लगभग हुआ था। इस काल में संजय राज्य एवं शैलेन्द्र राज्य एक दूसरे के पड़ौस में स्थित थे और यह काल शांति, सहयोग एवं सहअस्तित्व से युक्त था।
कुछ इतिहासकारों का मानना है कि संजय राजवंश नामक कोई वंश नहीं था, केवल शैलेन्द्र राजवंश था जो मध्य जावा में शासन करता था। इस राज्य को मेदांग कहा जाता था। इसकी राजधानी माताराम क्षेत्र में थी तथा इसके शासक शैलेन्द्र वंश के थे। संजय वंश के राजा भी इसी शैलेन्द्र राजवंश से निकले थे।
संजय राजवंश के राजा राकाई पिकातान का विवाह शैलेन्द्र वंश के राजा समरतुंग की पुत्री प्रमोदवर्द्धिनी (ई.833-56) से हुआ। समय के साथ संजय राजवंश का प्रभाव माताराम राज्य में बढ़ता गया तथा वे बौद्ध धर्म मानने वाले शैलेन्द्र राज्य को प्रतिस्थापित करते रहे। राकाई पिकातान ने शैलेन्द्र वंश के राजा समरतुंग के पुत्र बालापुत्र को उसके राज्य से निकाल दिया जो कि राकाई पिकातान की रानी प्रमोदवर्द्धिनी का भाई था।
जब मध्य जावा से शैलेंद्र वंश के राजा बालापुत्र का राज्य समाप्त हो गया तो वह भाग कर सुमात्रा चला गया। सुमात्रा में श्री विजय वंश के राजा राज्य करते थे। बालापुत्र ने श्री विजय साम्राज्य के तत्कालीन राजा को परास्त करके अपने अधीन कर लिया और स्वयं सुमात्रा का परमोच्च शासक बन गया। राजा पिकातान के काल में जावा में शैव धर्म को पुनः राजकीय प्रश्रय प्राप्त हुआ तथा यह संरक्षण मेदांग राज्य के अंत होने तक जारी रहा।
संजय वंश के हिन्दू राजाओं ने मध्य जावा में विश्वविख्यात शिव मंदिर बनवाया तथा जावा द्वीप पर हिन्दू संस्कृति का प्रसार किया। राकाई पिकातान की रानी प्रमोदवर्द्धिनी ने 9वीं शताब्दी ईस्वी में विश्व प्रसिद्ध बोरोबुदुर बौद्ध विहार बनवाया। योग्यकार्ता, सुराकार्ता तथा मध्य जावा, माताराम राज्य के प्रमुख केन्द्र थे। यह अत्यंत ऊर्वर क्षेत्र में स्थित था इसलिए इस राज्य में परमबनन तथा बोरोबुदुर जैसे विशाल मंदिरों का निर्माण संभव हो सका। ई.850 तक संजय राजवंश, सम्पूर्ण माताराम राज्य का शासक बन गया।
ई.907 के बालितुंग शिलालेख से भी संजय राजवंश की जानकारी मिलती है। इसके अनुसार जब संजय वंश का कोई राजा मर जाता था तो वह दिव्य रूप धारण कर लेता था। इसी शिलालेख के आधार पर संजय राजवंश के राजाओं की सूची तैयार की गई है। ई.929 में संजय वंश का राजा मपु सिंदोक, माताराम राज्य की राजधानी को मध्य जावा से पूर्व जावा में ले गया।
इसका कारण स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है किंतु अनुमान किया जाता है कि मेरापी ज्वालामुखी के फट पड़ने के कारण ऐसा किया गया होगा। यह भी अनुमान लगाया जाता है कि सुमात्रा के श्री विजय राज्य द्वारा मध्य जावा पर आक्रमण कर देने के कारण राजधानी को मध्य जावा से पूर्वी जावा में ले जाना पड़ा होगा। इसके साथ ही मध्य जावा से संजय राजवंश का शासन समाप्त हो गया तथा पूर्वी जावा में इस्याना नामक नवीन राजवंश का उदय हुआ।
चम्पा से सम्बन्ध
जावा राज्य का चम्पा राज्य से निकट का सम्बन्ध था जो कि दक्षिण-पूर्वी एशिया की मुख्य भूमि पर स्थित था। यह सम्बन्ध संजय राजवंश के उदय होने तक बना रहा। चम्पा के लोग चम कहलाते थे और उन्हें भारतीयकृत ऑस्ट्रोनेशियाई माना जाता है। मध्य जावा के द्वीप पर संजय राजवंश के काल में निर्मित मंदिरों की अनेक स्थापत्य विशेषताओं को चम मंदिरों में देखा जा सकता है।
इस्याना राजवंश
जावा द्वीप के माताराम हिन्दू राज्य के नए शासक वंश को इस्याना राजवंश कहा जाता है जिन्होंने संजय राजवंश के बाद सत्ता संभाली। इसकी स्थापना मपु सिंदोक ने की जो माताराम राज्य की राजधानी को मध्य जावा से पूर्वी जावा में ले गया। चोइदेस नामक लेखक ने लिखा है कि सिंदोक ने श्री इस्याना (विक्रमाधर्मोत्तुंगदेव) के नाम से पूर्वी जावा में नए राजवंश की स्थापना की। उसकी पुत्री इस्याना तुंगविजय, मपु सिंदोक की उत्तराधिकारी हुई।
इस्याना तुंगविजय के बाद इस्याना तुंगविजय का पुत्र मकुतावंशवर्द्धन पूर्वी जावा का राजा हुआ। उसके बाद धर्मवंग्सा उसका उत्तराधिकारी हुआ। इस्याना राजवंश के काल में ई.996 में भारत-युद्ध गाथा का जावाई भाषा में अनुवाद किया गया। ई.1016-17 में सुमात्रा द्वीप के श्री विजय साम्राज्य के राजा ने जावा द्वीप पर आक्रमण किया तथा राजा धर्मवंग्स की राजधानी को नष्ट कर दिया। इस युद्ध में इस्याना राजवंश समाप्त हो गया।
केदिरी वंश (काहुरिपन राज्य)
ई.1019 में ऐरलंग्गा ने मेदांग राज्य को फिर से इकट्ठा किया तथा काहुरिपन नामक नया राज्य अस्तित्व में आया। ऐरलंग्गा ई.1042 तक शासन करता रहा। ऐरलिंग्गा के वंशज केदिरी कहलाए। माना जाता है कि काहुरिपन नामक राज्य, इस्याना राज्य की ही निरंतरता में था। केदिरी राजवंश ई.1222 तक शासन करता रहा।
सिंघसरी वंश
ई.1222 में जावा के केदिरी राजा नष्ट हो गए तथा सिंघसरी राजवंश अस्तित्व में आया। वे ई.1292 तक शासन करते रहे। इस क्षेत्र को वर्तमान में मलांग कहते है।
मजापहित साम्राज्य
ई.1294 में जावा में विजय नामक राजा ने मजापहित साम्राज्य की स्थापना की। यह इण्डोनेशिया का सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य था। इसकी राजधानी त्रोवुलान थी जो सुराबाया के निकट स्थित थी। ई.1350 में इस वंश में हायम वुरुक नामक राजा हुआ जो इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा था।
हायम वुरुक का मंत्री ‘गजह मद’ वीर एवं बुद्धिमान व्यक्ति था। उसने शपथ ग्रहण की कि जब तक वह सम्पूर्ण इण्डोनेशिया द्वीप समूह को मजापहित साम्राज्य के अधीन नहीं लाएगा, तब तक वह अपने भोजन में पलापा (मसाले) का उपयोग नहीं करेगा।
निश्चत ही उसने अपनी शपथ पूरी की जिसके कारण मजापहित साम्राज्य में वह सम्पूर्ण क्षेत्र सम्मिलित हो गया जो वर्तमान में इण्डोनेशिया गणतंत्र में सम्मिलित है। हालांकि उसका प्रत्यक्ष नियंत्रण केवल जावा, बाली एवं मदुरा पर था। हायम वुरुक ई.1389 तक शासन करता रहा। जब बीसवीं सदी में इण्डोनेशिया ने अपना पहला सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजा तो उसका नाम गजह मद के सम्मान में पलापा रखा गया। यह राजवंश ई.1478 तक हिन्दू राजवंश के रूप में शासन करता रहा।
देमक राज्य (मध्य जावा)
ई.1478 के पश्चात् जावा में इस्लाम की आंधी चलने लगी जिसके क्रूर झौंकों से मजापहित साम्राज्य के हिन्दू राजाओं ने इस्लाम स्वीकार कर लिया और सत्ता का केन्द्र मध्य जावा के सेमारांग से 30 किलोमीटर पूर्व में चला गया। यह जावा की हजारों साल पुरानी संस्कृति के लिए बहुत बड़ा आघात था। हजारों हिन्दू परिवार जावा द्वीप छोड़कर भाग गए और उन्होंने बाली द्वीप में ब्रोमो पर्वत (टेंगेर) के निकट जाकर शरण ली।
पंद्रहवीं शताब्दी में जावा के लोगों ने जब इस्लाम स्वीकार किया तो एक बार पुनः जावा की संस्कृति में बदलाव आया और हिन्दू-जावाई संस्कृति में इस्लाम ने प्रवेश करके जावा की वर्तमान संस्कृति को जन्म दिया। देमक राज्य का पहला राजा रादेन पाताह था। उसका पिता मजापहित वंश का अंतिम राजा था तथा माता जेआम्पा, एक मुस्लिम स्त्री थी। दूसरा राजा पातिउनूस और तीसरा राजा ट्रेंग्गोनो हुआ।
हिन्दू राज्य केलापा का पतन
देमक राज्य में नौ ”वली सोंगो” नामक इस्लामिक नेता हुए जिन्होंने जावा द्वीप पर इस्लाम को फैलाया। ई.1527 में देमक सुल्तानों ने जावा द्वीप के अंतिम हिन्दू राज्य ”केलापा” को भी जीत लिया और उसका नाम ”जयकार्ता” रखा जो अब ”जकार्ता” कहलाता है। उन्हीं दिनों उत्तर भारत का सर्वाधिक प्रबल-प्रतापी हिन्दू शासक महाराणा सांगा, बर्बर मुस्लिम आक्रांता बाबर के हाथों पराजित हुआ।
पाजांग राज्य
ट्रेंग्गोनो का जामाता जोको टिंग्किर, देमक राज्य का अंतिम शासक सिद्ध हुआ। वह ई.1540 में देमक राज्य की राजधानी सोलो से 10 किलोमीटर पश्चिम में पाजांग में ले गया। वह टिंग्किर गांव का रहने वाला जोको (लड़का) था इसलिए उसे जोको टिंग्किर कहा जाता था।
मुस्लिम माताराम राज्य (द्वितीय)
माताराम राज्य (द्वितीय) में योग्यकार्ता तथा सुराकार्ता नामक क्षेत्र स्थित थे। पानेमबाहान सेनोपति माताराम (द्वितीय) राज्य का पहला राजा था। वह ई.1584 में राजा बना तथा ई.1601 तक राज्य करता रहा। उसका पिता पेमानाहान (की अगेंग माताराम) पाजांग राज्य का प्रमुख योद्धा था। उसका पड़दादा मजापहित राज्य का अंतिम राजा था।
पानेमबाहान का अर्थ होता है दोनों हाथ जोड़कर नाक से स्पर्श करते हुए आदर पूर्वक प्रणाम करना। प्राचीन जावाई संस्कृति में बड़ों को प्रणाम करने का यही तरीका रहा है। सुल्तान पानेमबाहान का जावा में बहुत सम्मान था। उसके बचपन का नाम सुतोविजोयो था।
उसकी जादुई शक्तियों और रहस्यमयी कारनामों की कहानियां कही जाती हैं। जिस महल में वह साधना करता था तथा अलौकिक शक्तियां प्राप्त करता था, वह योग्यकार्ता से 5 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। उसकी कब्र पर प्रतिवर्ष हजारों यात्री तीर्थयात्रा करते हैं तथा इसे माताराम साम्राज्य का पवित्र स्थल माना जाता है। ई.1613-45 तक इस वंश में आगुंग हान्योक्रोकुसुमो नामक शक्तिशाली राजा हुआ। उसकी मृत्यु के बाद माताराम राजवंश का ह्रास होने लगा।
जावा की प्राचीन संस्कृति पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव
जावा के प्राचीन साहित्य, कला एवं संस्कृति पर भारतीय साहित्य, कला एवं संस्कृति का प्रभाव प्रभूत मात्रा में देखा जा सकता है। जावा द्वीप पर बहुत बड़ी संख्या में हिन्दू मंदिरों के खण्डहर बिखरे पड़े हैं। मध्य जावा में स्थित लारा जोंग्गरांग का मंदिर भारतीय शैली में बना है जिसमें राम कथा और कृष्णलीला के प्रसंग उत्कीर्ण हैं।
जावा द्वीप की प्रतिमाओं में भारतीय आभूषणों की भरमार है जिनमें काल-मकर अधिक लोकप्रिय है। जावा का धार्मिक साहित्य रामायण एवं महाभारत की कथाओं पर आधारित है। भारतीय उपनिषदों का अध्यात्म एवं दर्शन तथा बाद के युगों में उत्पन्न होने वाले तांत्रिक विधानों का भी जावा की संस्कृति पर बहुतायत से प्रभाव है।
शिव एवं विष्णु की संयुक्त प्रतिमाएं भी जावा द्वीप पर मिली हैं। जावा की कविताओं एवं गीतों पर भी भारतीय प्रभाव देखा जा सकता है। जावा के राजाओं के नाम भी भारतीय राजाओं से मिलते-जुलते हैं। उनके दरबारों में भी भारतीय राजपरम्पराएं प्रचलित थीं।
वर्तमान में जावा द्वीप में 90 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या रहने के कारण हिन्दू संस्कृति के चिह्न विलुप्त प्रायः हैं किंतु हिन्दी एवं संस्कृत भाषा के कुछ शब्द जावा द्वीप पर आज भी प्रचलित हैं जो भारत से जावा के प्राचीन सम्बन्धों के मुंह बोलते प्रमाण हैं।
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