Friday, April 3, 2026
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जल-प्लावन से जुड़ी हैं मत्स्यावतार, कूर्मावतार एवं वराह अवतार की कथाएं (3)

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जल-प्लावन - bharatkaitihas.com
जल-प्लावन से जुड़ी हैं मत्स्यावतार, कूर्मावतार एवं वराह अवतार की कथाएं

अत्यंत प्राचीन काल में धरती पर आए जल-प्लावन की कथाएं विश्व के प्रत्येक भूभाग की प्राचीन संस्कृतियों में मिलती हैं। इन कथाओं के अनुसार पृथ्वी का अधिकांश भूभाग इस जल-प्लावन में डूब गया था जिसके कारण प्राणियों की सृष्टि बड़ी कठिनाई से जीवित बची थी।

भगवान श्री हरि विष्णु के तीन प्रथम अवतारों मत्स्यावतार, कूर्मअवतार एवं वराहअवतार की कथाएं अग्नि पुराण, मत्स्य पुराण, हरिवंश पुराण, भविष्य पुराण नारद पुराण, पद्म पुराण, ब्रह्मवैवर्त्त पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, भागवत पुराण, वायु पुराण, वाल्मीकि रामायण, महाभारत, गणेश पुराण, गरुड़ पुराण, गर्ग संहिता, कथासरित्सागर, अमरकोश आदि अत्यंत प्राचीन ग्रंथों में मिलती हैं।

ये कथाएं प्रकृति में दो हिमकालों के बीच होने वाले जलप्लावन एवं तत्पश्चात् ऊष्णकाल के आगमन की घटनाओं को दर्शाती हैं तथा भगवान द्वारा धरती को जल में बाहर निकालने, मानव सृष्टि एवं ज्ञान की रक्षा करने, सृष्टि को उसका खोया हुआ वैभव लौटाने आदि उद्देश्यों के लिए अवतार लेने की संकल्पना को व्याख्यायित करती है।

पिछली कहानी में हमने देखा कि किस प्रकार हमारे सौर मण्डल के समस्त ग्रह सूर्य से टूटकर अलग हुए जिनमें से पृथ्वी भी एक है। कूर्मअवतार एवं वराह अवतार की कथाओं के पौराणिक संदर्भों के परिप्रेक्ष्य में उनके वैज्ञानिक पक्ष को भी समझना चाहिए। यह न केवल पृथ्वी पर आने वाले हिम युगों, गर्म युगों एवं जल प्लावन की घटनाओं को समझाने में सहायता देता है अपितु डार्विन के विकासवाद को भी किसी सीमा तक समर्थन देता हुआ प्रतीत होता है। वैज्ञानिकों द्वारा हिमयुगों एवं उनके बीच आने वाले गर्म युगों का वैज्ञानिक इतिहास इस प्रकार बताया जाता है-

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

आज से लगभग 457 करोड़ वर्ष पूर्व जब पृथ्वी सूर्य से अलग हुई, उस समय यह आग का गोला थी। यह धीरे-धीरे ठण्डी हुई। इस प्रक्रिया में करोड़ों वर्ष लगे। धीरे-धीरे यह इतनी ठण्डी हो गई कि पूरी तरह बर्फ की मोटी पर्त से ढक गई। इसे धरती का पहला हिमयुग कहते हैं। यह घटना आज से लगभग 240 करोड़ वर्ष पहले हुई। कई करोड़ वर्ष तक पृथ्वी इसी स्थिति में रही। इसके बाद सूर्य के प्रभाव से धरती की बर्फ पिघलने लगी और धीरे-धीरे धरती पर समुद्रों, झीलों एवं नदियों का विकास हुआ। इस काल को गर्मयुग कहते हैं।

वैज्ञानिकों ने पानी के चिह्नों के आधार पर धरती पर अब तक हुए पाँच बड़े हिमयुगों तथा उनके बाद आने वाले गर्मयुगों का पता लगाया है। सबसे अंतिम हिमयुग आज से 26 लाख साल पहले आरम्भ हुआ जो आज से लगभग 20 हजार साल पहले समाप्त होना आरम्भ हुआ तथा आज से लगभग 11,700 वर्ष पहले समाप्त हो गया।

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जब भी धरती पर हिमयुग समाप्त होता और गर्मयुग आता तो धरती पर जल-प्लावन की स्थिति बन जाती। जब यह जल मानसून के चक्र के कारण धरती के वायुमण्डल में चला जाता तो धरती जल से बाहर निकलती थी और वनस्पतियों एवं जीव-जंतुओं का विकास होने लगता था। इसके विपरीत जब हिमयुग आता तो जीव-जंतु एवं वनस्पतियाँ नष्ट होने लगते, केवल कुछ स्थानों पर ही उनका अस्तित्व बचा रहता। ऐसे ही एक गर्मयुग के आगमन पर आज से लगभग 6 करोड़ वर्ष पूर्व धरती पर मानव जाति का विकास होना आरम्भ हुआ। ये मानव आधुनिक मानवों एवं वानरों के बीच की जातियाँ थीं। आज से लगभग तीन लाख साल पहले इन्हीं वानरों में से मानव की आधुनिक जाति का विकास हुआ जिसे हम ‘होमोसेपियन’ कहते हैं। यही होमोसेपियन जाति आज से लगभग 10 हजार साल पहले ‘क्रोमैगनन मैन’ नामक आधुनिकतम जाति में बदल गई जिसने मानव सभ्यता का बहुत तेजी से विकास किया। मानव की इस प्रजाति को अपना पिछला इतिहास धुंधले रूपों में याद है। ‘होमोसेपियन’ मानव ने पिछले 25 हजार सालों में धरती पर छोटे-छोटे हिमकाल देखे थे तथा इन हिमकालों के बाद ग्लेशियरों का जल पिघल कर समुद्रों में आते हुए तथा धरती को उस जल में समाते हुए एवं पुनः हिमकाल के आरम्भ होने पर धरती को जल से बाहर निकलते हुए देखा था।

मत्स्यावतार, कूर्मावतार एवं वराह अवतार की कथाएं इसी प्रकार की प्राकृतिक घटनाओं से जुड़ी हुई हैं। 

भू वैज्ञानिक खोजों से ज्ञात हुआ है कि राजस्थान का दक्षिण-पूर्वी भाग संसार का प्राचीनतम क्षेत्र है जबकि पश्चिमी एवं उत्तरी भाग इसके बाद का है। जालोर-भीनमाल-जसवंतपुरा का धन्व क्षेत्र तो उत्तरी भागों से भी बाद का है। यह अंशतः समुद्र के गर्भ में स्थित था। इस काल में मध्यप्रदेश से पंजाब जाने के लिए समुद्री मार्ग नर्मदा घाटी तथा कच्छ से होकर था।

यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि पश्चिमी राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र से समुद्र कब हटा किंतु यह निश्चित है कि इसको हटने में हजारों वर्ष लगे होंगे। यह भी निश्चित है कि समुद्र के इस क्षेत्र से हटने की घटना ऋग्वैदिक मानव ने अपनी आंखों से देखी। ऋग्वेद के 10वें मण्डल के 136वें सूक्त के 5वें मंत्र में पूर्व तथा पश्चिम के दो समुद्रों का स्पष्ट उल्लेख है जिनका विवरण शतपथ ब्राह्मण भी देता है।

पुराणों में वर्णित जल प्लावन की घटना भी इस ओर संकेत करती दिखाई देती है। काठक संहिता, तैत्तरीय संहिता, तैत्तरीय ब्राह्मण तथा शतपथ ब्राह्मण में प्रजापति के वराह बनकर पृथ्वी प्राप्ति का विवरण मिलता है।

पण्डित भगवद्दत्त बी.ए. लिखते हैं- ‘भारतीय ऋषियों के अनुसार एक बार सारी पृथ्वी का संवर्तक अग्नि से भंयकर दाह हुआ। तदनु एक वर्ष की अतिवृष्टि से महान् जल-प्लावन आया। सारी पृथ्वी जल-निमग्न हो गई। वृष्टि की समाप्ति पर, जल के शनै-शनैः नीचे होने से, कमलाकार पृथ्वी प्रकट होनी लगी। उस समय उन जलों में श्री ब्रह्माजी ने योगज शरीर धारण किया। उनके साथ योगज शरीर-धारी सप्तर्षि और कई अन्य ऋषि-मुनि भी प्रकट हुए। सृष्टि वृद्धि को प्राप्त हुई। तब बहुत काल के पश्चात समुद्रों के जलों के ऊंचा हो जाने के कारण एक दूसरा जल प्लावन वैवस्वत मनु और यम के समय में आया। मनु ने एक नौका में अनेक प्राणियों की रक्षा की। लिंग पुराण में इस घटना का उल्लेख हुआ है।’

समुद्र के हट जाने पर प्रकट हुई धरती अर्थात् थार के रेगिस्तान में आज भी नमक, फ्लोराइड, संगमरमर, चूना पत्थर एवं खड्डी आदि खनिज बहुतायत से उपस्थित हैं तथा रेतीले धोरों में शंख, सीपी एवं घोंघे प्राप्त होते हैं। राजस्थान एवं गुजरात का वह हिस्सा जो समुद्र से लगता हुआ है, आज भी इस प्रक्रिया से होकर निकल रहा है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मत्स्यावतार की कथा महा जल-प्लावन एवं जीवों के क्रमिक विकास से जुड़ी है (4)

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मत्स्यावतार की कथा - bharatkaitihas.com
मत्स्यावतार की कथा महा जल-प्लावन एवं जीवों के क्रमिक विकास से जुड़ी है

भगवान श्री हरि विष्णु के मत्स्यावतार की कथा वाल्मीकि रामायण, महाभारत, मत्स्य पुराण, हरिवंश पुराण आदि विविध ग्रंथों में मिलती है। यह कथा प्रकृति में दो हिमकालों के बीच होने वाले जलप्लावन एवं तत्पश्चात् आने वाले ऊष्णकाल के आगमन की घटना को दर्शाती है तथा भगवान द्वारा सृष्टि एवं ज्ञान की रक्षा के लिए अवतार लेने की संकल्पना को व्याख्यायित करती है।

मत्स्यावतार की कथा के माध्यम से उस संघर्ष को भी दर्शाया गया है जो बुरे मनुष्यों द्वारा ज्ञान का विनाश करके अज्ञान फैलाने वालों और अच्छे मनुष्यों द्वारा ज्ञान की रक्षा करने वालों के बीच में अनंतकाल से चल रहा है।

हिन्दू धर्म की अटल मान्यता है किये वेद समस्त सत्य-ज्ञान का भण्डार हैं तथा वे मानव मात्र को ईश्वर तक पहुंचाने का मार्ग प्रदान करते हैं। हिन्दू धर्मावलम्बी आदि-काल से यह भी मानते आए हैं कि वेद अपौरुषेय हैं तथा ब्रह्मााजी के मुख से प्रकट हुए हैं।

दुष्ट राक्षस नहीं चाहते कि मानव जाति ज्ञान प्राप्त करके उन्नति करे तथा ईश्वरत्व को प्राप्त करे। इसलिए दुष्ट राक्षसों की यह प्रवृत्ति रहती है कि वे वेदों अर्थात् सत्य ज्ञान को छिपा दें अथवा उन्हें नष्ट कर दें। जबकि श्री हरि भगवान विष्णु चाहते हैं कि वेद मनुष्य जाति के पास उपलब्ध रहें। भगवान श्रीहरि का यह संकल्प है कि धरती पर जब भी धर्म की हानि होगी अथवा साधुओं को सताया जाएगा, तब वे स्वयं धरती पर आकर धर्म एवं संतों की रक्षा करेंगे।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

पुराणों में आई कथाओं के अनुसार दुष्ट-राक्षस नहीं चाहते कि मानव जाति ज्ञान प्राप्त करके उन्नति करे तथा ईश्वरत्व को प्राप्त करे। इसलिए दुष्ट-राक्षसों की यह प्रवृत्ति रहती है कि वे वेदों अर्थात् सत्य ज्ञान को छिपा दें अथवा उन्हें नष्ट कर दें। जबकि श्रीहरि भगवान विष्णु चाहते हैं कि वेद मनुष्य जाति के पास उपलब्ध रहें। इसलिए एक बार जब हयग्रीव नामक राक्षस ने वेदों को चुरा कर छिपा दिया तब भगवान श्रीहरि विष्णु ने भी हयग्रीव का अवतार धारण करके वेदों को राक्षस से मुक्त करवाया तथा पुनः ब्रह्माजी को प्रदान किया।

भगवान श्रीहरि का यह संकल्प है कि धरती पर जब भी धर्म की हानि होगी अथवा साधुओं को सताया जाएगा, तब वे स्वयं धरती पर आकर धर्म एवं संतों की रक्षा करेंगे। इसी संकल्प के कारण एक बार भगवान को मत्स्यावतार लेना पड़ा। मत्स्यावतार की कथा इस प्रकार से है-

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एक बार जब सृष्टि का कल्पांत हुआ और सृष्टि का विघटन होकर प्रलय होने लगा तो, उसके ठीक पहले, प्रजापति ब्रह्मा के मुख से वेदों का ज्ञान प्रकट हुआ किंतु उसी समय ब्रह्माजी को नींद आ जाने के कारण हयग्रीव नामक एक दैत्य ने वेदों को चुराकर निगल लिया। इससे संसार में अज्ञान का अंधकार व्याप्त हो गया। तब भगवान श्रीहरि विष्णु ने मत्स्यावतार के रूप में धरती पर प्रकट होने का निश्चय किया। उस समय धरती पर सत्यव्रत नामक एक पुण्यात्मा राजा तप कर रहा था। इस राजा को मनु भी कहा जाता है। यह मनु कल्पांत के पूर्व का राजा था अर्थात् उसका जन्म वर्तमान सृष्टि से पहले जो सृष्टि चल रही थी, उसमें हुआ था। वह बड़ा पुण्यात्मा एवं अत्यंत उदार हृदय का राजा था। भगवान श्रीहरि ने उसी राजा के समक्ष प्रकट होने का निश्चय किया। एक दिन जब प्रातःकाल में राजा मनु ने कृतमाला नामक नदी में स्नान करके तर्पण के लिए अंजलि में जल भरा, तो अंजलि में जल के साथ एक छोटी-सी मछली भी आ गई। राजा मनु ने मछली को नदी के जल में छोड़ दिया। इस पर वह मछली बोली- ‘हे राजन! जल के बड़े-बड़े जीव छोटे-छोटे जीवों को मारकर खा जाते हैं। अवश्य ही कोई बड़ा जीव मुझे भी मारकर खा जाएगा। अतः कृपा करके मेरे प्राणों की रक्षा कीजिए।’

यह सुनकर राजा मनु के हृदय में दया उत्पन्न हो गई। उसने मछली को नदी से निकालकर जल से भरे हुए अपने कमण्डल में रख लिया। राजा ने वह कमण्डल अपने महल में लाकर रख दिया। जब रात्रि हुई तो राजा को एक आवाज सुनाई दी। राजा ने देखा कि कमण्डल में तैर रही मछली का शरीर इतना बढ़ गया है कि कमंडल उसके रहने के लिए छोटा पड़ने लगा है।

इसलिए मछली ने राजा मनु से कहा- ‘राजन्! मेरे रहने के लिए कोई दूसरा स्थान ढूंढ़िए, क्योंकि मेरा शरीर बढ़ गया है। मुझे घूमने-फिरने में बड़ा कष्ट होता है।’

 इस पर राजा मनु ने मछली को कमंडल से निकालकर पानी से भरे हुए एक घड़े में रख दिया। पुनः अगली रात में मछली का शरीर इतना बढ़ गया कि मटका भी उसके रहने कि लिए छोटा पड़ गया।

दूसरे दिन मछली पुनः मनु से बोली- ‘राजन्! मेरे रहने के लिए कहीं और प्रबंध कीजिए, क्योंकि मटका भी मेरे रहने के लिए छोटा पड़ रहा है।’

तब राजा मनु ने मछली को निकालकर अपने महल के सरोवर में रख दिया। जब सरोवर भी मछली के लिए छोटा पड़ गया तो राजा मनु ने मछली को पहले नदी में और फिर उसके बाद समुद्र में डाल दिया। राजा ने देखा कि मछली का शरीर इतना अधिक बढ़ गया है कि समुद्र भी उसके रहने के लिए छोटा पड़ने लगा है।

अतः मछली पुनः मनु से बोली- ‘राजन! यह समुद्र भी मेरे रहने के लिए उपयुक्त नहीं है। मेरे रहने की व्यवस्था कहीं और कीजिए।’

मछली का आकार देखकर राजा विस्मित हो उठा। उसने इतनी विशाल मछली पहले कभी नहीं देखी थी। वह विस्मय-भरे स्वर में बोला- ‘मेरी बुद्धि को विस्मय के सागर में डुबो देने वाले आप कौन हैं? आपका शरीर जिस गति से प्रतिदिन बढ़ता है, उससे लगता है कि आप अवश्य परमात्मा हैं। यदि यह बात सत्य है, तो कृपा करके बताइए कि आपने मत्स्य रूप क्यों धारण किया है?’

तब मत्स्यावतार रूपधारी श्रीहरि ने उत्तर दिया- ‘राजन! हयग्रीव नामक दैत्य ने वेदों को चुरा लिया है। इससे जगत में चारों ओर अज्ञान और अधर्म का अंधकार फैला हुआ है। मैंने हयग्रीव को मारने के लिए ही मत्स्य का रूप धारण किया है। आज से सातवें दिन पृथ्वी प्रलय-चक्र में जाएगी और धरती पर समुद्र उमड़ कर आ जाएगा। चारों ओर भयानक वृष्टि होगी। सारी पृथ्वी पानी में डूब जाएगी। जल के अतिरिक्त कहीं कुछ भी दिखाई नहीं देगा। तुम्हारे पास एक नाव पहुँचेगी। तुम समस्त अनाजों और औषधियों के बीजों, पशु-पक्षियों एवं विभिन्न प्राणियों तथा सप्त-ऋषियों को अपने साथ लेकर उस नाव में बैठ जाना तथा वासुकि नाग से उस नाव को मेरे सींग से बांध लेना। जब तक ब्रह्मा की रात रहेगी, मैं नाव समुद्र में खींचता रहूंगा। उस समय तुम जो भी प्रश्न करोगे मैं उनके उत्तर दूंगा।’

इतना कहकर भगवान अदृश्य हो गए।

राजा मनु उसी दिन से हरि-स्मरण करते हुए प्रलय होने की प्रतीक्षा करने लगे। सातवें दिन धरती पर प्रलय का दृश्य उपस्थित हो गया। समुद्र उमड़कर अपनी सीमाओं से बाहर बहने लगा। भयानक वृष्टि होने लगी। थोड़ी ही देर में पृथ्वी पर जल ही जल हो गया और सम्पूर्ण पृथ्वी जल में समा गई।

उसी समय राजा मनु को एक नाव दिखाई पड़ी। राजा ने समस्त अनाजों और औषधियों के बीज, पशु-पक्षी एवं विविध प्रकार के प्राणी उस नाव में भर लिए तथा सप्त-ऋषियों को अपने साथ लेकर उस नाव में बैठ गए। अचानक राजा मनु को मत्स्यावतार रूपी भगवान, प्रलय के सागर में दिखाई पड़े।

तब राजा मनु ने सर्पराज वासुकि को रस्सी बनाकर अपनी नाव को मत्स्यावतार रूपी भगवान श्रीहरि के सींग से बाँध लिया। भगवान उस नाव को लेकर सुमेरु पर्वत की ओर चल दिए। इस प्रकार यह नाव प्रलय के सागर में तैरने लगी। इस समय पूरी धरती पर केवल समुद्र लहरा रहा था जिसमें उस नाव के अतिरिक्त और कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।

जब समुद्री ज्वार समस्त ब्रह्माण्ड को निगलने लगा तब राजा मनु एवं सप्त-ऋषि, मत्स्य रूपी भगवान श्रीहरि की स्तुति करने लगे- ‘हे प्रभो! आप ही सृष्टि के आदि हैं, आप ही पालक हैं और आप ही रक्षक हैं। दया करके हमें अपनी शरण में लीजिए, हमारी रक्षा कीजिए।’

राजा मनु और सप्त-ऋषियों की प्रार्थना से मत्स्यावतार रूपी भगवान श्रीहरि विष्णु प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा मनु को मत्स्य पुराण सुनाया तथा राजा मनु को आत्मज्ञान प्रदान किया। भगवान ने कहा- ‘मैं ही समस्त प्राणियों में निवास करता हूँ। मेरी बनाई हुई नश्वर सृष्टि में मेरे अतिरिक्त कहीं कुछ भी नहीं है। जो प्राणी मुझे सबमें देखता हुआ जीवन व्यतीत करता है, वह अंत में मुझमें ही मिल जाता है।’

यह आत्मज्ञान प्राप्त करके राजा मनु शरीर में ही जीवन-मुक्त हो गए। मत्स्य रूपी भगवान श्रीहरि ने नौका को हिमालय पर्वत की चोटी से बांध दिया। इसके बाद श्रीहरि विष्णु ने हयग्रीव नामक दैत्य को मारने के लिए स्वयं भी हयग्रीव का अवतार लिया तथा उससे वेद छीन लिए। जब ब्रह्मरात्रि समाप्त हुई तो ब्रह्माजी अपनी नींद से उठे। इसी समय धरती पर प्रलय की स्थिति समाप्त हो गई। भगवान ने वेद पुनः ब्रह्माजी को सौंप दिए। पुराणों में ब्रह्मरात्रि की अवधि 432 करोड़ मानव-वर्ष बताई गई है। 

पूर्व-कल्पांत के राजा मनु अथवा राजा सत्यव्रत ही वर्तमान महाकल्प में ‘वैवस्वत मनु’ के नाम से जाने गए। ‘विवस्वान’ का अर्थ होता है ‘सूर्य’ और ‘वैवस्वत’ का अर्थ होता है- ‘सूर्य का पुत्र।’ माना जाता है कि धरती पर स्थित समस्त मानव इन्हीं राजा मनु की संतान हैं। इसीलिए भारत में उन्हें मानव, मनुपुत्र, मनुष्य तथा मनुज कहा जाता है। यूरोप में ‘मैन’ कहा जाता है।

हैनीमैन तथा सोलोमन आदि ईसाई नामों में ‘मैन’ एवं ‘मन’ आदि शब्द प्रयुक्त होते हैं जबकि मुसलमान, सलमान, सुलेमान आदि आदि नामों में भी ‘मान’ अर्थात् ‘मैन’ शब्द लगा हुआ है। इस प्रकार वर्तमान समय में धरती पर निवास कर रहे समस्त मानव एक ही पिता ‘मनु’ की संतान हैं किंतु भारतीय पुराण आदि विविध धार्मिक ग्रंथों का मानना है कि इनकी माताएं अलग-अलग होने के कारण इनमें देव, दानव, राक्षस आदि विभिन्न प्रकार की प्रवृत्तियां पाई जाती हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कूर्मावतार की कथा मानव सृष्टि को वैभव प्रदान करने से जुड़ी है (5)

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कूर्मावतार की कथा मानव सृष्टि को वैभव प्रदान करने से जुड़ी है

कूर्मावतार की कथा सृष्टि का आरम्भ होने की घटना से जुड़ी हुई है। पुराणों के अनुसार प्रजापति ने सन्तति प्रजनन के अभिप्राय से कूर्म का रूप धारण किया।

शतपथ ब्राह्मण, महाभारत के आदि पर्व तथा पद्मपुराण के उत्तरखंड में उल्लेख है कि संतति प्रजनन हेतु प्रजापति, कच्छप का रूप धारण करके पानी में संचरण करता है।

कूर्मावतार को कच्छप अवतार भी कहते हैं। कूर्म अथवा कच्छप का अर्थ कछुआ होता है। भगवान श्री हरि विष्णु का पहला अवतार मछली के रूप में तथा दूसरा अवतार कछुए के रूप में हुआ जो कि डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत के क्रम से मेल खाता है। मछली केवल जल में रहती है जबकि कछुआ उभयचर है जो कि जल एवं थल दोनों में रह सकता है। इस प्रकार कछुआ उत्पत्ति-विकास के क्रम में मछली के बाद आता है।

नरसिंह पुराण के अनुसार कूर्मावतार भगवान श्री हरि विष्णु का द्वितीय अवतार है जबकि भागवत पुराण के अनुसार कूर्मअवतार भगवान का ग्यारहवाँ अवतार है। लिंगपुराण के अनुसार जब पृथ्वी रसातल को जा रही थी, तब विष्णु ने कच्छप-रूप में अवतार लेकर पृथ्वी को रसातल में जाने से रोका। इस विशाल कच्छप की पीठ का घेरा एक लाख योजन था।

पद्मपुराण के ब्रह्मखण्ड में वर्णन है कि जब देवराज इन्द्र ने दुर्वासा द्वारा प्रदत्त पारिजात पुष्पों की माला का अपमान किया तो महर्षि दुर्वासा ने कुपित होकर इन्द्र को शाप दिया कि- ‘तुम्हारा वैभव नष्ट होगा।’

इस श्राप के प्रभाव से विश्व की लक्ष्मी समुद्र में लुप्त हो गई। इस कारण भगवान विष्णु के आदेश पर देवताओं तथा दैत्यों ने लक्ष्मी को पुनः प्राप्त करने के लिए मंदराचल पर्वत की मथानी तथा वासुकि सर्प की डोरी बनाकर क्षीरसागर का मंथन किया।

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समुद्र-मंथन के दौरान जब मंदराचल पर्वत रसातल में समाने लगा तो भगवान विष्णु ने कूर्मावतार रूप में प्रकट होकर मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण किया और देवताओं एवं दानवों ने समुद्र से 14 रत्नों की प्राप्ति करके सृष्टि में पहले की तरह वैभव स्थापित किया। भगवान विष्णु के कूर्म अवतार की कथा इस प्रकार है-

एक बार की बात है। देवताओं के राजा इन्द्र, ऐरावत हाथी पर आरूढ़ होकर कहीं जाने के लिए तैयार थे। उसी समय महर्षि दुर्वासा वहाँ आए। उन्होंने अत्यंत विनीत भाव से देवराज को पारिजात-पुष्पों की एक माला भेंट की। देवराज ने ऋषि के हाथों से माला लेकर ऐरावत के मस्तक पर डाल दी और स्वयं चलने को उद्यत हुए। हाथी मद से उन्मत्त हो रहा था। उसने सुगन्धित तथा कभी म्लान न होने वाली उस माला को सूंड से खींच कर नीचे गिरा दिया और अपने पैरों से कुचल दिया।

यह देखकर ऋषि दुर्वासा अत्यंत क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने देवराज इन्द्र को शाप देते हुए कहा- ‘रे मूढ़! तुमने मेरी दी हुई माला का कुछ भी आदर नहीं किया। तुम त्रिभुवन की राजलक्ष्मी से संपन्न होने के कारण मेरा अपमान करते हो, इसलिए जाओ आज से तीनों लोकों की लक्ष्मी नष्ट हो जायेगी और तुम्हारा यह वैभव भी श्रीहीन हो जाएगा।’

ऋषि के श्राप से संसार की लक्ष्मी लुप्त हो गई तथा देवताओं ने अपनी शक्ति खो दी। देवता अत्यंत निराश होकर ब्रह्माजी के लोक में पहुँचे। ब्रह्माजी देवताओं को अपने साथ लेकर वैकुण्ठ में श्रीहरि नारायण के पास पहुंचे और भगवान श्री नारायण की स्तुति करके उन्हें बताया कि- ‘प्रभु हमें दैत्यों के द्वारा अत्यंत कष्ट दिया जा रहा है और इधर महर्षि के शाप से श्रीहीन भी हो गए हैं। आप शरणागतों के रक्षक हैं, इस महान कष्ट से हमारी रक्षा कीजिये।’

भगवान श्रीहरि विष्णु ने देवताओं को सलाह दी कि- ‘आप क्षीर समुद्र का मंथन करें जिससे अमृत की प्राप्ति होगी। इस अमृत को पीने से देवों की शक्ति वापस लौट आएगी और देवता सदा के लिए अमर हो जाएँगे।’

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समुद्र-मंथन के महान् कार्य को मन्दर पर्वत और सर्पराज वासुकि की सहायता से ही सम्पन्न किया जा सकता था। मंदर पर्वत को मथानी और वासुकि को रस्सी बनाया गया किंतु निर्बल देवता अकेले ही इस कार्य को नहीं कर सकते थे। इसलिए देवताओं ने भगवान विष्णु के परामर्श पर असुरों से सहायता मांगी। असुरों ने अमृत के लालच में समुद्र-मंथन में देवताओं की सहायता करना स्वीकार कर लिया। भगवान विष्णु की प्रेरणा से सर्पराज वासुकि, मन्दर पर्वत के चारों ओर लिपट गया। उसे एक ओर से देवताओं ने तथा दूसरी ओर से राक्षसों ने पकड़ लिया। कुछ देर तक समुद्र-मंथन करने से एक घातक विष निकलने लगा जिससे सारा संसार झुलसने लगा। तब भगवान श्रीहरि विष्णु की प्रेरणा से भगवान शिव ने इस विष को पीकर अपने कण्ठ में धारण कर लिया। विष के प्रभाव से भगवान शिव का कण्ठ नीला पड़ गया तथा तभी से वे ‘नीलकंठ’ कहलाने लगे। विष से छुटकारा मिल जाने के बाद समुद्र-मंथन का कार्य पुनः आरम्भ हुआ किंतु थोड़ी ही देर में मंदर पर्वत रसातल में धंसने लगा। यह देखकर अचिन्त्य शक्ति संपन्न लीलावतारी भगवान श्रीहरि विष्णु ने कूर्म रूप धारण किया। इस विशाल कछुए की पीठ का व्यास एक लाख योजन था। भगवान ने मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण कर लिया। भगवान कूर्म की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से घूमने लगा।

कूर्मावतार एकादशी के दिन हुआ था। इसलिए संसार में एकादशी का उपवास प्रचलित हुआ। कूर्म पुराण में लिखा है कि भगवान विष्णु ने अपने कूर्मावतार के समय ऋषियों को मनुष्य जीवन के चार लक्ष्यों अर्थात्- धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष का वर्णन किया।

समुद्र-मंथन से कुल चौदह रत्न प्रकट हुए जिनमें देवी लक्ष्मी, कौस्तुभ मणि आदि रत्न, रम्भा आदि दिव्य अप्सराएँ, वारूणी, शंख, ऐरावत हाथी, कल्पवृक्ष, चन्द्रमा, कामधेनु आदि गौएं, धनुष, धन्वतरि, विष एवं अमृत सम्मिलित थे।

जब देवी लक्ष्मी प्रकट र्हुईं तो समस्त देवताओं ने उनके दर्शन किए। इससे समस्त देवता लक्ष्मीवान हो गए। देवी लक्ष्मी को भगवान श्रीहरि विष्णु ने धारण कर लिया। ऐरावत हाथी पुनः इन्द्र को दे दिया गया। कौस्तुभ आदि मणियां, रम्भा आदि अप्सराएं, कल्पवृक्ष तथा कामधेनु स्वर्ग में स्थापित कर दिए गए।

सबसे अंत में भगवान विष्णु के अंशभूत धन्वन्तरी प्रकट हुए जिन्होंने धरती पर आयुर्वेद का प्रवर्तन किया। उनके हाथ में अमृत से भरा हुआ कलश था। दैत्यों ने अमृत का कलश धन्वन्तरि के हाथ से छीन लिया और वहाँ से दूर भाग गए।

समुद्र-मंथन के आरम्भ में निश्चित की गई शर्तों के अनुसार अमृत का बंटवारा देवताओं एवं राक्षसों में होना था किंतु अब राक्षस इसे अकेले ही पीना चाहते थे। इस कारण देवताओं एवं राक्षसों में युद्ध आरम्भ हो गया। अतः भगवान को उसी क्षण एक और अवतार लेना पड़ा जिसे मोहिनी अवतार कहते हैं। भगवान श्री हरि विष्णु के इस अवतार की चर्चा हम अगली कथा में करेंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मोहिनी अवतार की कथा सृष्टि को पुनः वैभव प्रदान करने से जुड़ी है (6)

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मोहिनी अवतार - bharatkaitihas.com
मोहिनी अवतार की कथा सृष्टि को पुनः वैभव प्रदान करने से जुड़ी है

मोहिनी अवतार धारी भगवान श्रीहरि ने देवताओं को अमृत तथा राक्षसों को वारुणि पिलाना आरम्भ कर दिया। राक्षस उस वारुणि को पीकर मदमत्त होने लगे। ‘राहू’ नामक एक राक्षस को भगवान के मोहिनी अवतार की इस चालाकी का पता चल गया।

हमने पिछली कड़ी में समुद्र मंथन के दौरान हुए भगवान श्री हरि विष्णु के कूर्म अवतार की चर्चा की थी। समुद्र मंथन से जो चौदह रत्न प्राप्त हुए थे, उनमें से अमृत भी एक था। जब भगवान श्री हरि विष्णु के अंशभूत धन्वन्तरी अपने हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए तो जम्भ आदि दैत्य अमृत कलश धन्वन्तरि के हाथ से छीन कर भाग गए।

समुद्र मंथन के आरम्भ में निश्चित की गई शर्तों के अनुसार अमृत का बंटवारा देवताओं एवं राक्षसों में होना था किंतु अब देवता और राक्षस दोनों अकेले ही इसका पान करना चाहते थे। न तो राक्षस चाहते थे कि इसे देवता पिएं और न देवता चाहते थे कि इसे राक्षस पिएं। इस कारण देवताओं एवं राक्षसों में युद्ध आरम्भ हो गया।

राक्षसों को अमृत का कलश ले जाते देखकर भगवान विष्णु का चिंता हुई। वे जानते थे कि यदि दुष्ट राक्षसों ने अमृत का पान कर लिया तो वे सृष्टि को बहुत दुख देंगे। इसलिए भगवान श्री हरि विष्णु ने राक्षसों से अमृत छीनकर देवताओं तक पहुंचाने का निश्चय किया।

भगवान श्री हरि विष्णु एक सुंदर स्त्री का रूप धारण करके दैत्यों के मार्ग में जाकर खड़े हो गए। इस घटना को मोहिनी अवतार कहा जाता है। भगवान के मोहिनी अवतार के रूप में खड़ी उस मायावी एवं अत्यंत रूपवती स्त्री को देखकर समसत दैत्य मोहित हो गए ओर बोले- ‘सुमुखी! तुम हमारी भार्या हो जाओ और यह अमृत लेकर हमें पिलाओ।’

मोहिनी अवतार धारी भगवान श्रीहरि ने राक्षसों की यह बात स्वीकार कर ली तथा अमृत का कलश राक्षसों के हाथों से ले लिया। मोहिनी ने राक्षसों एवं देवताओं से कहा- ‘राक्षस और देवता अलग-अलग कतार बनाकर बैठ जाएं।’ भगवान ने अपनी माया से अमृत-कलश में एक तरफ ‘अमृत’ तथा दूसरी तरफ ‘वारुणि’ अर्थात् मदिरा भर दिया।

मोहिनी अवतार धारी भगवान श्रीहरि ने देवताओं को अमृत तथा राक्षसों को वारुणि पिलाना आरम्भ कर दिया। राक्षस उस वारुणि को पीकर मदमत्त होने लगे। ‘राहू’ नामक एक राक्षस को भगवान के मोहिनी अवतार की इस चालाकी का पता चल गया। वह देवताओं का रूप धारण करके देवताओं की पंक्ति में जाकर बैठ गया।

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जैसे ही राहू ने अमृत पान किया, वैसे ही सूर्य एवं चंद्र नामक देवताओं को ज्ञात हो गया कि यह तो कोई राक्षस है। उन्होंने जोर से चिल्लाकर भगवान विष्णु को यह बात बता दी। भगवान श्रीहरि विष्णु ने उसी समय सुदर्शन चक्र से राहू का मस्तक काट डाला। उस समय तक राहू अमृत का पान कर चुका था। इसलिए उसका सिर और धड़ दोनों ही जीवित रहे। उसके सिर को ‘राहू’ तथा ‘धड़’ को केतु कहा जाता है।

राहू ने भगवान श्रीहरि से कहा- ‘सूर्य और चंद्र ने मेरा मस्तक कटवाया है इसलिए मैं भी बार-बार इन्हें ग्रहण करके कष्ट दूंगा। यदि उस समय संसार के लोग दान देंगे तो इनका कष्ट कम होगा।’

इस कारण तब से ही सूर्य और चन्द्रमा बार-बार राहू द्वारा पकड़ लिए जाते हैं तथा उन पर ग्रहण लगता है। मोहिनी ने राक्षसों को वारुणि तथा देवताओं को अमृत पिलाकर अपना रूप त्याग दिया। अमृत का पान करके देवता पुनः शक्तिशाली हो गए तथा उन्होंने राक्षसों को स्वर्ग से मार भगाया। देवता स्वर्ग में विराजमान हुए और दैत्य पाताल में जाकर छिप गए। जो मनुष्य देवताओं की इस विजयगाथा का पाठ करता है, वह मृत्यु के पश्चात् स्वर्गलोक में जाता है।

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 देवों एवं दैत्यों के मध्य हुए अमृत-विभाजन के दौरान अचानक हुए मोहिनी अवतार की कथा यहाँ पूरी हो जाती है किंतु अग्नि पुराण, महाभारत, गणेश पुराण, गरुड़ पुराण, गर्ग संहिता, नारद पुराण, पद्म पुराण, ब्रह्मवैवर्त्त पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, भविष्य पुराण, भागवत पुराण, वायु पुराण, मत्स्य पुराण, रुक्मांगद-मोहिनी आख्यान, व्याघ्रानल असुर वध, कथासरित्सागर आदि ग्रंथों में मोहिनी अवतार की कथा कई रूपों में, कई कारणों सहित तथा कई प्रकार से मिलती है। बहुत से ग्रंथों में विष्णु के 21 अवतारों में मोहिनी को भी एक अवतार माना जाता है। यह भगवान श्रीहरि विष्णु का एकमात्र स्त्री-रूप-अवतार है। कुछ ग्रंथों में मोहिनी अवतार की कथा आगे तक चलती है। इसके अनुसार जब भगवान श्रीहरि विष्णु का मोहिनी रूप विलुप्त हो गया तो भगवान शिव को मोहिनी रूप का पुनःदर्शन करने की इच्छा हुई। अतः उन्होंने श्रीहरि से अनुरोध किया- ‘भगवन्! आप अपने स्त्री रूप का मुझे पुनः दर्शन करावें।’ देवाधिदेव भोलेनाथ की प्रार्थना पर भगवान् श्रीहरि ने उन्हें अपने मोहिनी रूप का पुनः दर्शन करवाया। मोहिनी को देखते ही भगवान शिव, श्रीहरि की माया के वशीभूत होकर मोहिनी को पकड़ने के लिए दौड़े। उन्होंने नग्न और उन्मत्त होकर मोहिनी के केश पकड़ लिए।

मोहिनी अपने केशों को छुड़ाकर वहाँ से चल दी। उसे जाती देखकर महादेव भी उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगे। इस दौरान भगवान का वीर्य स्खलित होकर पृथ्वी पर गिरने लगा। जहाँ-जहाँ भगवान् शंकर का वीर्य गिरा, वहाँ-वहाँ शिवलिंगों के क्षेत्र एवं सुवर्ण भण्डार बन गए। तत्पश्चात ‘यह माया है’ ऐसा जान कर भगवान् शंकर अपने स्वरूप में स्थित हुए।

तब भगवान श्रीहरि ने प्रकट होकर शिवजी से कहा- ‘रूद्र! तुमने मेरी माया को जीत लिया है। पृथ्वी पर तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कोई ऐसा नहीं है, जो मेरी इस माया को जीत सके।’

शिव पुराण सहित अनेक पुराणों में भगवान श्रीहरि विष्णु के मोहिनी रूप धारण करने की कथा भस्मासुर राक्षस के संदर्भ में भी मिलती है। इस कथा के अनुसार एक राक्षस भगवान भोलेनाथ की सेवा किया करता था। वह नित्य ही भगवान भोलेनाथ को देह पर रमाने के लिए भस्म लेकर आया करता था। एक बार भोलेनाथ उससे प्रसन्न हो गए तथा उन्होंने राक्षस से कहा कि वह कोई वरदान मांग ले।

राक्षस ने विनीत् भाव से कहा- ‘मुझे आपके लिए भस्म का प्रबंध करने के लिए दूर-दूर तक भटकना पड़ता है। इसलिए आप मुझे वरदान दें कि मैं जिस वस्तु पर हाथ रखूं वह भस्म बन जाए।’

भोलेनाथ ने उस राक्षस को यह वरदान दे दिया। इसके बाद राक्षस जिस भी वस्तु पर हाथ रखता, वह भस्म बन जाती। इससे उस राक्षस का नाम भस्मासुर पड़ गया।

यह वरदान पाकर भस्मासुर को घमण्ड आ गया और वह पार्वतीजी को प्राप्त करने के उद्देश्य से भोलेनाथ को ही भस्म करने के लिए दौड़ा। भोलेनाथ भस्मासुर से बचने के लिए दौड़े तथा उन्होंने भगवान श्रीहरि विष्णु का स्मरण किया। भगवान श्रीहरि विष्णु पुनः मोहिनी रूप धारण करके भस्मासुर के मार्ग में आकर खड़े हो गए।

राक्षस भोलेनाथ के पीछे भागना छोड़कर मोहिनी के पीछे भागा। मोहिनी-रूप-धारी श्रीहरि ने भस्मासुर से कहा कि- ‘यदि तू मेरी तरह नृत्य करके दिखाए तो मैं तुझे प्राप्त हो जाउंगी।’

अब भस्मासुर भगवान की माया के वशीभूत होकर मोहिनी के साथ उसी की तरह नृत्य करने लगा। नृत्य के बीच में भगवान विष्णु ने अपने सिर पर हाथ रखा, भस्मासुर ने भी वरदान की बात भूलकर अपने सिर पर हाथ रख लिया और उसी क्षण जलकर भस्म हो गया। कई कथाओं में मोहिनी अवतार के विवाह का प्रसंग भी आया है, जिसमें मोहिनी द्वारा भगवान शिव से विवाह करके विहार करने का उल्लेख किया गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नील वाराह की अवतार कथा किसी प्राचीन हिमयुग की समाप्ति से जुड़ी है (07)

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नील वाराह - bharatkaitihas.com
नील वाराह की अवतार कथा किसी प्राचीन हिमयुग की समाप्ति से जुड़ी है

ब्रह्माजी ने चिंतित होकर, जल में निवास करने वाले श्रीहरि विष्णु का स्मरण किया और फिर भगवान श्रीहरि विष्णु ने नील वाराह के रूप में प्रकट होकर धरती के कुछ भागों को जल से मुक्त किया।

हमारे सौर मण्डल के समस्त ग्रह सूर्य से टूटकर अलग हुए हैं जिनमें से पृथ्वी भी एक है। आज से लगभग 457 करोड़ वर्ष पूर्व जब पृथ्वी सूर्य से अलग हुई, उस समय यह आग का गोला थी। यह धीरे-धीरे ठण्डी हुई। इस प्रक्रिया में करोड़ों वर्ष लगे। धीरे-धीरे यह इतनी ठण्डी हो गई कि पूरी तरह बर्फ की मोटी पर्त से ढक गई। इसे धरती का पहला हिमयुग कहते हैं। यह घटना आज से लगभग 240 करोड़ वर्ष पहले हुई।

कई करोड़ वर्ष तक पृथ्वी इसी स्थिति में रही। इसके बाद सूर्य के प्रभाव से धरती की बर्फ पिघलने लगी और धीरे-धीरे धरती पर समुद्रों, झीलों एवं नदियों का विकास हुआ। इस काल को गर्म युग कहते हैं।

वैज्ञानिकों ने पानी के चिह्नों के आधार पर धरती पर अब तक हुए पाँच बड़े हिमयुगों का पता लगाया है। सबसे अंतिम हिमयुग आज से 26 लाख साल पहले आरम्भ हुआ जो आज से लगभग 20 हजार साल पहले अपने चरम पर पहुंचा तथा आज से लगभग 11,700 वर्ष पहले समाप्त हो गया।

जब भी धरती पर हिमयुग समाप्त होता और गर्म युग आता तो धरती पर वनस्पतियों एवं जीव-जंतुओं का विकास होने लगता था, प्रत्येक हिम युग के साथ पुरानी वनस्पतियों तथा पुराने जीवों का नाश हो जाता था तथा प्रत्येक गर्मयुग में नई प्रकार की वनस्पतियां एवं नए प्रकार के जीव-जंतु विकसित होते थे।

ऐसे ही हिम-युगों एवं गर्म-युगों में आज से लगभग 6 करोड़ वर्ष पूर्व मानव जाति का विकास होना आरम्भ हुआ। धरती के प्रारम्भिक मानव, आधुनिक मानवों से इतने भिन्न थे के उन्हें मानव कहने की बजाय विकसित वानर कहा जाना अधिक उचित होगा।

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वैज्ञानिकों के अनुसार आज से लगभग 3 लाख साल पहले ‘होमोसेपियन’ नामक मानव प्रजाति विकसित हुई। आज से लगभग 1 लाख 20 हजार साल पहले ‘होमोसेपियन’ प्रजाति से एक अन्य परिष्कृत मानव जाति ने जन्म लिया जिन्हें वैज्ञानिक ‘होमोसेपियन सेपियन’ कहते हैं।

यही होमो सेपियन मनुष्य विकसित होता हुआ आज से लगभग चालीस हजार साल पहले आधुनिक मानव बना जिसे वैज्ञानिक ‘क्रो-मैग्नन मैन’ कहते हैं। मानव जाति के विकास क्रम में हिमयुगों के आने-जाने की घटना ने बड़ी भूमिका निभाई है।

विभिन्न हिन्दू धर्म ग्रंथों में आई भगवान श्रीहरि विष्णु के वराह अवतार की कथाएं कम से कम दो हिमयुगों के समाप्त होने के बाद धरती के जल में समाने और धरती पर नया जीवन आरम्भ होने की घटना से जुड़ी हुई प्रतीत होती है। भारतीय धर्म साहित्य में तीन वराह अवतारों की धारणा प्रस्तुत की गई है- ‘नील-वराह, आदि-वराह एवं श्वेत वराह’। इन तीनों अवतारों की संकल्पना वस्तुतः हिमयुगों एवं गर्मयुगों के आने-जाने की घटनाओं से जुड़ी हुई हैं।

प्राचीन हिन्दू ग्रन्थों में मानव इतिहास को पाँच कल्पों में बाँटा गया है। इनमें से पहला है- ‘महत्-कल्प’ जिसका अर्थ होता है अंधकार युग। पुराणों के अनुसार इस कल्प की अवधि 1 लाख 9 हजार 800 विक्रम संवत् पूर्व से लेकर 85 हजार 800 विक्रम संवत् पूर्व तक थी।

इस काल का इतिहास नहीं मिलता किंतु माना जाता है कि महत्-कल्प में विचित्र प्रकार के प्राणी और मनुष्य थे। शिवजी की बरात में विचित्र प्रकार के भूत-प्रेतों के सम्मिलित होने का प्रसंग मिलता है। संभवतः वे भूत-प्रेत महत्-कल्प के मनुष्य थे। गोस्वामी तुलसीदासजी ने इनके बारे में लिखा है-

कोउ मुख हीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू।

बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना।

अर्थात्- किसी प्राणी के तो मुख ही नहीं है और किसी के बहुत सारे मुख हैं। किसी प्राणी के कोई हाथ या पैर नहीं है जबकि कुछ प्राणियों के बहुत से हाथ-पैर हैं। किसी के बहुत सी आंखें हैं तथा कोई नेत्र-विहीन है। कोई प्राणी बहुत हृष्ट-पुष्ट है और कोई अत्यंत पतला है। जब धरती पर महत्-कल्प बीत गया तो ‘महाप्रलय’ हुई जिसमें महत्-कल्प के समस्त प्राणी नष्ट हो गए।

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हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार महाप्रलय के समाप्त होने पर दूसरा कल्प अर्थात् ‘हिरण्यगर्भ-कल्प’ आरम्भ हुआ। इसकी अवधि 85 हजार 800 विक्रम संवत् पूर्व से लेकर 61 हजार 800 विक्रम संवत् पूर्व तक थी। हिरण्यगर्भ-कल्प में धरती पीले रंग की थी इसीलिए इसे हिरण्यगर्भ-कल्प कहते हैं। इस काल में धरती पर स्वर्ण के भंडार बिखरे पड़े थे तथा हिरण्यवर्णा लक्ष्मी, हिरण्यानी रैंडी अर्थात् अरंडी, पीले वृक्ष एवं वनस्पति तथा हिरण आदि पशु अधिक थे। हिन्दू धर्म-ग्रंथों के अनुसार हिरण्यगर्भ कल्प के बाद धरती पर तीसरा कल्प अर्थात् ‘ब्रह्म-कल्प’ आरम्भ हुआ। इस कल्प की अवधि 60 हजार 800 विक्रम संवत् पूर्व से लेेकर 37 हजार 800 विक्रम संवत् पूर्व तक थी। इस कल्प में मनुष्य जाति केवल ‘ब्रह्म’ अर्थात् ईश्वर की उपासक थी। प्राणियों में विचित्रताएं और सुंदरताएं थी। इस काल में धरती पर ब्रह्मर्षि देश, ब्रह्मावर्त, ब्रह्मलोक, ब्रह्मपुर, ब्राह्मी लिपि, ब्राह्मी प्रजाएं, परब्रह्म और ब्रह्मवाद के उपासकों का बाहुल्य था। ब्रह्मपुराण, ब्रह्माण्ड पुराण तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में इस कल्प का ऐतिहासिक विवरण दिया गया है। जब ब्रह्मकल्प बीत गया तो धरती पर चौथा कल्प अर्थात् ‘पद्म-कल्प’ आरम्भ हुआ। इस कल्प की अवधि 37 हजार 800 विक्रम संवत् पूर्व से लेकर 13 हजार 800 विक्रम संवत् पूर्व तक थी। इस कल्प का विवरण पद्मपुराण में मिलता है।

इस कल्प में धरती पर 16 समुद्र विद्यमान थे। यह कल्प नागवंशियों का था। इस काल में नाग, कोल, कमठ, बानर एवं किरात जातियों का बाहुल्य था और कमल-पत्र एवं कमल-पुष्पों का बहुविधि प्रयोग होता था। इस कल्प में सिंहल द्वीप पर पद्मिनी-प्रजा निवास करती थी।

इन चारों कल्पों के बीत जाने के बाद धरती पर पांचवा एवं वर्तमान कल्प आरम्भ हुआ जिसे ‘वराह-कल्प’ कहते हैं। इस कल्प के आरम्भ होने का विवरण वराह पुराण में मिलता है। इस कल्प में भगवान श्रीहरि विष्णु के वराह अवतार का वर्णन है। इसी कल्प में भगवान विष्णु के 12 अवतार हुए और इस कल्प में वर्तमान समय में वैवस्वत मनु का वंश चल रहा है। इसी कल्प में भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने नई सृष्टि की। वराह के तीन अवतारों में पहली कथा नील-वराह के अवतार की है। यह कथा इस प्रकार है-

पद्म-कल्प का अंत हो जाने के बाद धरती पर महाप्रलय हुई। सूर्य के भीषण ताप से धरती के समस्त वन सूख गए। समुद्र का जल भी जल गया। ज्वालामुखी फूट पड़े। सूखा हुआ जल वाष्प बनकर आकाश में मेघों के रूप में स्थिर हो गया। इसके बाद अंत में, न रुकने वाले जल-प्रलय का क्रम आरम्भ हुआ। चक्रवात उठने लगे और देखते ही देखते समस्त धरती जल में डूब गई।  यह देखकर ब्रह्माजी ने चिंतित होकर, जल में निवास करने वाले श्रीहरि विष्णु का स्मरण किया और फिर भगवान श्रीहरि विष्णु ने नील वाराह के रूप में प्रकट होकर धरती के कुछ भागों को जल से मुक्त किया।

पुराणों के अनुसार नील वाराह ने अपनी पत्नी नयना देवी के साथ अपनी सम्पूर्ण वाराही-सेना को भी प्रकट किया और धरती को जल से बचाने के लिए तीक्ष्ण दरातों, पाद प्रहारों, फावड़ों, कुदालियों और गेंतियों द्वारा धरती को समतल करके उसे रहने योग्य बनाया। भगवान नील-वराह ने पर्वतों तथा रेत के टीलों को तोड़कर गड्ढों में भर दिया ताकि धरती को समतल किया जा सके।

 यह एक प्रकार का यज्ञ था, इसलिए नील वाराह को यज्ञ-वराह भी कहा गया। नील वाराह के इस कार्य को आकाश से देवतागण देख रहे थे। प्रलयकाल का जल उतर जाने के बाद भगवान के प्रयत्नों से अनेक प्रकार के सुगंधित वन, तालाब, झील, सरोवर आदि निर्मित हुए। वृक्ष एवं लताएं उग आईं और धरती पर फिर से हरियाली छा गई। संभवतः इसी काल में मधु और कैटभ का वध किया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हिरण्याक्ष की कथा धरती के समुद्र में डूब जाने की द्योतक है (8)

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हिरण्याक्ष की कथा धरती के समुद्र में डूब जाने की द्योतक है

जय और विजय बैकुण्ठ से गिर कर दिति के गर्भ में आ गए। कुछ काल के पश्चात् दिति के गर्भ से दो पुत्र उत्पन्न हुये जिनके नाम प्रजापति कश्यप ने हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यपु रखे।

पिछली कड़ी में हमने भगवान श्री हरि विष्णु के नील वाराह के अवतार की चर्चा की थी। इस कड़ी में हम भगवान श्री हरि विष्णु के आदि वाराह के रूप में अवतार लेने की कथा की चर्चा करेंगे। यह कथा इस प्रकार से है- एक बार ब्रह्माजी के मानस पुत्र सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार भगवान श्री हरि विष्णु के दर्शन करने के लिए वैकुंठ धाम पहुंचे।

ये चारों सनकादि ऋषि कहलाते हैं। उस समय विष्णु धाम के द्वार पर भगवान के दो पार्षद जय एवं विजय द्वारपाल के रूप में बैठे थे। जय एवं विजय दिगम्बर साधुओं को देखकर हंसते हुए बोले- ‘आप लोग कौन हैं और इस प्रकार नंग-धड़ंग होकर यहाँ क्यों चले आ रहे हैं?

सनकादि ऋषियों ने जय-विजय से कहा-‘हम सनत कुमार हैं तथा सदा इसी रूप में रहते हैं, हम भगवान विष्णु के दर्शन करना चाहते हैं। इसलिए हमें अंदर जाने दो।’

ऋषियों के बार-बार आग्रह करने पर भी जय एवं विजय नामक उन द्वारपालों ने सनकादि ऋषियों को वैकुण्ठ धाम के भीतर नहीं जाने दिया। इससे ऋषियों को क्रोध आ गया और उन्होंने शाप देते हुए कहा- ‘तुम दोनों ने देवों के साथ रहकर भी दैत्यों जैसा व्यवहार किया है, इसलिए धरती पर जाकर दैत्य कुल में जन्म लो।’

द्वार पर हो रहे विवाद को सुनकर भगवान श्री हरि विष्णु लक्ष्मीजी सहित द्वार पर आए और सनकादि ऋषियों से भीतर आने के लिए आदर-पूर्वक अनुरोध किया तथा जय-विजय द्वारा किए गए व्यवहार के लिए क्षमा मांगते हुए कहा कि सेवकों द्वारा की गई गलती, स्वामी की ही गलती मानी जाता है। इसलिए आप इसे मेरी गलती मानते हुए मुझे क्षमा कर दें। सनकादि ऋषि भगवान श्री हरि के दर्शन करके चले गए।

भगवान विष्णु ने जय-विजय को दुःखी देखकर उनके दुःख का कारण पूछा तो उन्होंने सनकादि ऋषियों द्वारा दिए गए शाप की बात बताई। भगवान श्रीहरि विष्णु ने जय-विजय से कहा- ‘उद्दंडता का फल तो तुम्हें भोगना ही पड़ेगा। तुम्हारा अगला जन्म दैत्य-कुल में अवश्य होगा किंतु तुम मेरे पार्षद हो, इसलिए मैं तुम्हारा उद्धार करूंगा। मेरे द्वारा मृत्यु प्रदान करने पर ही तुम्हें दैत्य-योनि से मुक्ति मिलेगी।’

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कुछ समय बाद जय-विजय स्वर्ग से निकलकर धरती पर स्थित कश्यप ऋषि की पत्नी दिति के गर्भ में आ गए। दिति दैत्य-कुल की माता थी। जय-विजय के नाम इस जन्म में क्रमशः ‘हिरण्याक्ष’ और ‘हिरण्यकश्यप’ हुए। हिरण्याक्ष का अर्थ होता है- ‘सोने की आंख वाला’ तथा हिरण्यकश्यप का अर्थ होता है- ‘सोने का कछुआ।’ उन दानों दैत्यों के जन्म की कथा इस प्रकार है-

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एक बार मरीचि-नन्दन महर्षि कश्यप ने भगवान श्रीहरि विष्णु को प्रसन्न करने के लिए खीर की आहुति दी और उनकी आराधना करके सन्ध्या-काल के समय अग्निशाला में ध्यानस्थ होकर बैठे गए। उसी समय दक्ष प्रजापति की पुत्री दिति, कामातुर होकर पुत्र प्राप्ति की लालसा से अपने पति कश्यप के निकट आई। दिति ने अत्यंत मधुर शब्दों में महर्षि कश्यप से अपने साथ रमण करने के लिए प्रार्थना की ताकि उसे एक पुत्र की प्राप्ति हो सके। इस पर महर्षि कश्यप ने कहा- ‘प्रिये! मैं तुम्हारी इच्छानुसार तुम्हें तेजस्वी पुत्र अवश्य दूँगा किन्तु तुम्हें एक प्रहर के लिए प्रतीक्षा करनी होगी। सन्ध्या-काल में सूर्यास्त के पश्चात् भूतनाथ भगवान शंकर अपने भूत, प्रेत तथा यक्षों को लेकर बैल पर चढ़ कर विचरते हैं। इस समय तुम्हें काम-क्रीड़ा में रत देख कर वे अप्रसन्न हो जावेंगे। अतः यह समय सन्तानोत्पत्ति के लिए उचित नहीं है। सारा संसार मेरी निन्दा करेगा। यह समय तो सन्ध्या-वन्दन और भगवत्-पूजन आदि के लिए ही है। इस समय जो पिशाचों जैसा आचरण करते हैं वे नरकगामी होते हैं।’ पति के इस प्रकार समझाने पर भी दिति को कुछ भी समझ में नहीं आया और उस कामातुर दिति ने निर्लज्ज भाव से कश्यप के वस्त्र पकड़ लिए। इस पर कश्यप ने दैव-इच्छा को प्रबल समझ कर दैव को नमस्कार किया और दिति की इच्छा पूर्ण की।

इसके पश्चात् ऋषि कश्यप शुद्ध जल से स्नान करके सनातन ब्रह्मरूप गायत्री का जप करने लगे। ऋषि-पत्नी दिति ने गर्भ धारण करके कश्यप से प्रार्थना की- ‘हे आर्यपुत्र! भगवान भूतनाथ मेरे अपराध को क्षमा करें और मेरा यह गर्भ नष्ट न करें। उनका स्वभाव बड़ा उग्र है किन्तु वे अपने भक्तों की सदा रक्षा करते हैं। वे मेरे बहनोई हैं, मैं उन्हें नमस्कार करती हूँ।’

कश्यप जब सन्ध्यावन्दन आदि से निवृत्त हुए तो उन्होंने अपनी पत्नी को अपनी सन्तान के हित के लिए प्रार्थना करते हुए और थर-थर काँपते हुए देखा तो वे बोले- ‘हे दिति! तुमने मेरी बात नहीं मानी क्योंकि तुम्हारा चित्त काम-वासना में लिप्त था। तुमने असमय में भोग किया है। इसलिए तुम्हारी कोख से महा-भयंकर अमंगलकारी दो अधम पुत्र उत्पन्न होंगे। वे सम्पूर्ण लोकों के निरपराध प्राणियों को अपने अत्याचारों से कष्ट देंगे और धर्म का नाश करेंगे। तुम्हारे पुत्र साधु और स्त्रियों को सतायेंगे किंतु जब उनके पापों का घड़ा भर जाएगा तब भगवान श्रीहरि विष्णु कुपित होकर उनका वध करेंगे।’

दिति ने कहा- ‘हे भगवन्! मेरी भी यही इच्छा है कि मेरे पुत्रों का वध भगवान के ही हाथों से हो। तब कश्यप बोले, हे देवि! तुम्हें अपने कर्म का अति पश्चाताप है इसलिए तुम्हारा पौत्र भगवान का बहुत बड़ा भक्त होगा और तुम्हारे यश को उज्वल करेगा। वह बालक साधुओं की सेवा करेगा और काल को जीत कर भगवान का पार्षद बनेगा।’

कश्यप के मुख से भगवद्भक्त पौत्र के उत्पन्न होने की बात सुनकर दिति को अत्यंत प्रसन्नता हुई और अपने पुत्रों का वध साक्षात् भगवान के हाथों से होना सुनकर उसका समस्त खेद समाप्त हो गया। इसके बाद जय और विजय बैकुण्ठ से गिर कर दिति के गर्भ में आ गए। कुछ काल के पश्चात् दिति के गर्भ से दो पुत्र उत्पन्न हुये जिनके नाम प्रजापति कश्यप ने हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यपु (हिरण्यकश्यप) रखे।

इन दोनों दैत्यों के उत्पन्न होने के समय तीनों लोकों में अनेक प्रकार के भयंकर उत्पात होने लगे। स्वर्ग, पृथ्वी, आकाश सभी काँपने लगे और भयंकर आँधियाँ चलने लगीं। सूर्य और चन्द्र पर केतु और राहु बार-बार बैठने लगे। उल्कापात होने लगे। बिजलियाँ गिरने लगीं। नदियों तथा जलशयों के जल सूख गए। गायों के स्तनों से रक्त बहने लगा। उल्लू एवं सियार आदि रोने लगे।

हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप ने दिति के गर्भ से जुड़वां रूप में जन्म लिया, उनके जन्म लेते ही पृथ्वी कांप उठी। आकाश में नक्षत्र और दूसरे लोक इधर से उधर दौड़ने लगे, समुद्र में बड़ी-बड़ी लहरें पैदा हो उठीं और प्रलयंकारी हवा चलने लगी। ऐसा ज्ञात हुआ, मानो प्रलय आ गई हो। हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप दोनों पैदा होते ही बड़े हो गए। वे दोनों ही अत्यंत बलवान थे। उन्होंने अमर एवं अजेय होने का वरदान पाने के लिए ब्रह्माजी को प्रसन्न करने का निश्चय किया तथा घनघोर तपस्या की। उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी प्रकट हुए। उन्होंने कहा- ‘मैं तुम्हारे तप से अत्यंत प्रसन्न हूँ। वरदान मांगो, क्या चाहते हो?’

हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप ने उत्तर दिया- ‘प्रभो! हमें ऐसा वरदान दीजिए, जिससे हमें देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच न मार सकें। हम अस्त्र-शस्त्र, पर्वत या वृृक्ष से न मरें। हम न जल में मरें, न आकाश पर और न पृथ्वी पर मरें। हम न रात में मरें न दिन में, न बाहर मरें न भीतर। किसी मृग, पक्षी अथवा सरीसृप से भी हमारी मृत्यु न हो।’

ब्रह्माजी ‘तथास्तु’ कहकर अपने लोक में चले गए। ब्रह्माजी से वरदान पाकर हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप उद्दंड और स्वेच्छाचारी बन गए। वे तीनों लोकों में स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानने लगे। दूसरों की तो बात ही क्या, स्वयं भगवान श्रीहरि विष्णु को भी अपने समक्ष तुच्छ मानने लगे।

हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप ने घोषणा की कि धरती पर समस्त यज्ञ हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के ही नाम पर होंगे। देवों को कोई यज्ञ भाग नहीं मिलेगा। किसी भी देवी-देवता या ईश्वर की पूजा के स्थान पर हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप की ही पूजा होगी।

इसके बाद हिरण्याक्ष ने सोचा कि देवगण कभी धरती पर पहुंच कर यज्ञ-भाग प्राप्त न कर सकें, इसलिए मैं पृथ्वी को ही पाताल में पहुंचा देता हूँ। यह निश्चय करके हिरण्याक्ष आसुरी शक्ति के बल पर पृथ्वी को रसातल में ले गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

आदिवाराह अवतार की कथा

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आदिवाराह अवतार की कथा

भगवान श्रीहरि ने आदिवाराह अवतार लेकर धरती का उद्धार किया!

दक्ष पुत्री दिति और मरीचि के पुत्र कश्यप से उत्पन्न के दैत्य हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को पाताल में छिपा दिया ताकि देवगण कभी धरती पर पहुंच कर यज्ञ-भाग प्राप्त न कर सकें। धरती के रसातल में चले जाने से समस्त ब्रह्मांड में उथल-पुथल मच गई। सृष्टि के नियम भंग होने लगे और चतुर्दिक हा-हा-कार मच गया।

ऋषियों-मुनियों तथा देवताओं ने मिलकर भगवान श्री हरि विष्णु से प्रार्थना की- ‘भगवन्! इन महापराक्रमी असुरों ने देवताओं का यज्ञ भाग छीन लिया है, पूजा-पाठ, धार्मिक कर्मकांड समाप्त कर दिए हैं और समस्त भूमण्डल को रसातल में ले गए हैं। इस कारण ब्रह्माजी की बनाई सृष्टि में बड़ा व्यवधान उत्पन्न हो गया है। पृथ्वी जल में डूब रही है, इसलिए आप कृपा करके ऋषियों-मुनियों तथा मानवों के रहने के लिए स्थान बनाएं।

भगवान विष्णु ने देवताओं तथा ऋषियों को अभयदान देते हुए कहा- ‘आप लोग निश्चिन्त होकर जाइये। मैं मेदिनी का उद्धार करता हूँ।’

पृथ्वी को समुद्र में छिपा देने के बाद हिरण्याक्ष ने गर्वित होकर तीनों लोकों को जीतने का विचार किया। वह हाथ में गदा लेकर इन्द्रलोक में जा पहुंचा। देवताओं को जब उसके आने की सूचना मिली, तो वे भयभीत होकर इन्द्रलोक से भाग गए। देखते ही देखते समस्त इन्द्रलोक पर हिरण्याक्ष का अधिकार स्थापित हो गया। जब इन्द्रलोक में युद्ध करने के लिए कोई नहीं मिला, तो हिरण्याक्ष ‘वरुण देव’ की राजधानी ‘विभावरी नगरी’ में जा पहुंचा।

हिरण्याक्ष ने वरुण देव से कहा- ‘वरुण देव! आपने दैत्यों को पराजित करके राजसूय यज्ञ किया था। आज आपको मुझसे युद्ध करना पड़ेगा। कमर कसकर तैयार हो जाइए, मेरी युद्ध-पिपासा को शांत कीजिए।’

हिरण्याक्ष का कथन सुनकर वरुण देव के मन में रोष उत्पन्न हुआ किंतु उन्होंने बड़े शांत भाव से कहा- ‘हिरण्याक्ष! तुम महान् योद्धा हो। तुमसे युद्ध करने के लिए मेरे पास शौर्य कहाँ? तीनों लोकों में भगवान यज्ञ-पुरुष-विष्णु को छोड़कर कोई भी ऐसा नहीं है, जो तुमसे युद्ध कर सके। अतः तुम उन्हीं के पास जाओ। वे ही तुम्हारी युद्ध पिपासा शांत करेंगे।’

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हिरण्याक्ष ने वरुण देव से पूछा- ‘विष्णु कहाँ है?’

वरुण देव ने कहा- ‘वे धरती का उद्धार करने के लिए पाताल लोक गए हैं।’ इतना सुनते ही हिरण्याक्ष क्रोध में भरकर पाताल लोक के लिए रवाना हो गया।

उधर जब हिरण्याक्ष वरुण देव से भगवान श्रीहरि विष्णु के बारे में पूछताछ कर रहा था, इधर भगवान श्रीहरि विष्णु आदिवाराह अवतार धरकर धरती को ढूंढ रहे थे। उन्होंने देखा कि पृथ्वी का कहीं पता नहीं है, सर्वत्र जल ही जल दिखाई दे रहा है। इस पर भगवान श्रीहरि विष्णु वराह के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने समुद्र में घुसकर पृथ्वी को ढूंढ लिया।

आदिवाराह अवतार धारी श्रीहरि विष्णु ने पृथ्वी को अपने विशाल दांत पर धारण किया तथा भयंकर गर्जना करते हुए पृथ्वी को अथाह जल राशि में से निकाल लाए। इस घटना को भारतीय ग्रंथों में ‘मेदिनी-उद्धार’ के नाम से जाना जाता है। पृथ्वी को समुद्र से ऊपर आते हुए देखकर तथा वराह का भयंकर शब्द सुनकर हिरण्याक्ष क्रोध में भरकर दौड़ा।

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हिरण्याक्ष ने देखा कि आदिवाराह अवतार धारी श्रीहरि विष्णु पृथ्वी को अपनी दाढ़ पर रखकर पाताल लोक से ऊपर की ओर बढ़ रहे हैं। उस महाबली दैत्य ने अत्यंत क्रोध में भरकर आदिवाराह अवतार धारी श्रीहरि विष्णु से कहा- ‘अरे जंगली पशु! तू जल में कहाँ से आ गया है? मूर्ख पशु! तू इस पृथ्वी को कहाँ लिए जा रहा है? इसे तो ब्रह्माजी ने हमें दे दिया है। तू मेरे रहते इस पृथ्वी को रसातल से निकालकर नहीं ले जा सकता। तू दैत्य और दानवों का शत्रु है इसलिए आज मैं तेरा वध करूंगा!’ हिरण्याक्ष के कठोर वचनों को सुन कर भी आदिवाराह अवतार धारी श्रीहरि विष्णु शांत बने रहे। वे पृथ्वी को बीच में छोड़ कर हिरण्याक्ष से युद्ध नहीं करना चाहते थे इसलिए हिरण्याक्ष के कटु वचनों को सहन करते हुए वे आगे बढ़ते रहे और जल से बाहर आ गए। भगवान वराह का पीछा करते हुए दुष्ट हिरण्याक्ष भी जल से बाहर आ गया और कहने लगा- ‘हे कायर! तुझे भागने में लज्जा नहीं आती? आ, मुझसे युद्ध कर।’ दैत्य से भयभीत पृथ्वी को अभयदान देकर भगवान ने उसे जल के ऊपर स्थापित कर दिया और उसे उचित आधार प्रदान करके महादैत्य की ओर मुड़े।

भगवान ने कहा- ‘अरे ग्राम-सिंह हम तो जंगली-पशु हैं और तुझ जैसे ग्राम-सिंहों को ही ढूँढते रहते हैं। अब तेरी मृत्यु सिर पर नाच रही है।’ ज्ञातव्य है कि संस्कृत साहित्य में ‘श्वान’ को व्यंग्य से ‘ग्राम-सिंह’ कहते हैं।

आदिवाराह अवतार धारी भगवान श्रीहरि विष्णु ने आधा शरीर समुद्र के भीतर तथा आधा शरीर समुद्र से बाहर रखकर हिरण्याक्ष को अपनी दाढ़ पर उठाकर आकाश में दूर फेंक दिया। आकाश में चक्कर काटता हुआ विशाल दैत्य भयानक शब्द करते हुए पृथ्वी पर गिर पड़ा।

दैत्यराज हिरण्याक्ष तथा उसके भाई हिरण्यकश्यप ने ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त कर रखा था। इस कारण वे देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच द्वारा मारे जाने पर नहीं मर सकते थे। उन्हें किसी अस्त्र-शस्त्र, पर्वत या वृृक्ष से भी नहीं मारा जा सकता था। वे न जल में मारे जा सकते थे, न आकाश में और न पृथ्वी पर। उन्हें न दिन में मारा जा सकता था, न रात में। उन्हें न बाहर मारा जा सकता था न भीतर। उनकी मृत्यु किसी पशु, पक्षी अथवा सरीसृप द्वारा भी नहीं हो सकती थी।

हिरण्याक्ष ने देखा कि उसे एक मायावी वराह ने मारा है जो देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच नहीं है। वराह ने आधा शरीर जल में एवं आधा शरीर आकाश में रखकर बिना किसी शस्त्र के ही, ऐसे समय मारा है जब न दिन है न रात, आधा पानी में डूबे हुए होने के कारण वह न भीतर है न बाहर, न धरती पर है न आकाश में और न समुद्र में।

मरणासन्न हिरण्याक्ष ने देखा कि वराह के स्थान पर स्वयं भगवान श्रीहरि विष्णु सुशोभित हैं। हिरण्याक्ष को अपने पूर्व-जन्म का स्मरण हो आया। उसने भगवान के चरण पकड़ लिए और कहा-‘भगवन्! आपने मुझ पापी के शाप का अंत कर दिया और अपने ही हाथों से मुझे इस जन्म से मुक्ति दिलाई। कृपा करके मेरे भाई हिरण्यकश्यप को भी मुक्ति दीजिये।’

भगवान विष्णु हंसकर बोले- ‘समय से पूर्व किसी के पाप का अंत नहीं होता। तुम्हारे भाई हिरण्यकश्यप के पाप का अभी अंत नहीं है। उसका अंत करने के लिए मुझे एक और अवतार लेना पड़ेगा। तुम्हारे लिए वराह बनना पड़ा, उसके लिए नृसिंह बनना पड़ेगा।’

आदिवाराह अवतार धारी श्रीहरि विष्णु के विजय प्राप्त करते ही ब्रह्माजी सहित समस्त देवतागण भगवान श्रीहरि विष्णु पर आकाश से पुष्प-वर्षा एवं स्तुति-गायन करने लगे।

विभिन्न पुराणों में भगवान वराह द्वारा मेदिनी-उद्धार की कथा अलग-अलग प्रकार से मिलती है। भागवत पुराण के अनुसार ब्रह्मा ने मनु और सतरूपा नामक पुरुष एवं स्त्री का निर्माण किया और उन्हें सृष्टि आरम्भ करने की आज्ञा दी। सृष्टि आरम्भ करने के लिए भूमि की आवश्यकता थी किंतु इस समय हिरण्याक्ष नामक दैत्य धरती को सागर के भीतर ले जाकर भू-देवी को अपना तकिया बना कर सोया हुआ था। हिरण्याक्ष ने अपने चारों ओर विष्ठा का घेरा बना रखा था ताकि देवता हिरण्याक्ष के निकट नहीं आएं।

जब मनु और सतरूपा को चारों ओर जल ही जल दिखाई दिया तो उन्होंने ब्रह्माजी को बताया कि धरती दिखाई नहीं दे रही। उसे तो हिरण्याक्ष रसातल में ले गया है। तब ब्रह्माजी ने विचार किया कि देव विष्ठा के पास तक नहीं जाते, एक शूकर ही है जो विष्ठा के समीप जा सकता है।

इसलिए ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु का ध्यान किया और अपनी नासिका से वराह नारायण को जन्म दिया। ब्रह्माजी ने वराह को आज्ञा दी कि वह पृथ्वी को रसातल से ऊपर ले आए। इस पर वराह भगवान समुद्र में उतरे और हिरण्याक्ष का संहार करके भू-देवी को मुक्त करा लिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वाराह अवतार से जुड़ी हुई है दक्षिण भारत की वराह जाति (10)

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वाराह अवतार से जुड़ी हुई है दक्षिण भारत की वराह जाति

पिछली कुछ कड़ियों में हमने भगवान श्री हरि विष्णु के नील वाराह एवं आदि वाराह के अवतारों की चर्चा की थी। इस कड़ी में हम नील वाराह वाराह अवतार, आदि वाराह अवतार तथा श्वेत वाराह वाराह अवतार के दक्षिण भारत की कुछ वनवासी जातियों से सम्बन्ध की चर्चा करेंगे।

वाराह कल्प के 3 खण्ड हैं- 1. नील वराह काल, 2. आदि वराह काल और 3. श्वेत वराह काल। इन तीनों खण्डों में भगवान श्री हरि विष्णु ने अलग-अलग अवतार लिए हैं। हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार वाराह कल्प का आरम्भ भगवान श्री हरि विष्णु द्वारा नील वाराह के रूप में प्रकट होकर भूमि को रहने योग्य बनाने से होता है।

हिन्दू धर्मग्रंथों की मान्यता है कि इस काल में ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित समस्त देवी-देवता धरती पर निवास करते थे। भगवान शिव का स्थान कैलाश पर्वत था। श्री हरि विष्णु हिंद महासागर में रहते थे। धरती के जिस स्थान पर देव-जाति निवास करती थी उसे स्वर्ग एवं देवलोक कहा जाता था। ब्रह्माजी एवं उनके पुत्रों ने मध्य एशिया से लेकर काश्मीर तक के क्षेत्र में कुछ बस्तियां बसा ली थीं। हालांकि उस काल में धरती पर रहने योग्य स्थान बहुत कम था।

अधिकांश भूमि जल में डूबी हुई थी।

हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार आज से लगभग 16 हजार वर्ष पूर्व भगवान ने नील-वराह के रूप में अवतार लिया था। नील-वराह काल में भगवान नील-वराह ने धरती पर से जल हटाया और उसे प्राणियों के रहने योग्य बनाया। उसके बाद ब्रह्माजी ने मनुष्य जाति का विस्तार किया और भगवान शिव ने संपूर्ण धरती पर धर्म और न्याय का राज्य प्रतिष्ठित किया।

यद्यपि मानवों की कई प्राचीन जातियाँ तब भी धरती पर निवास करती थीं तथापि आधुनिक मानव की सभ्यता का प्रारम्भ यहीं से, अर्थात् आज से 16 हजार साल पहले हुआ माना जाता है। हिन्दू धर्म की यह कहानी वराह-कल्प से ही आरम्भ होती है किंतु पुराणों में इससे पहले का इतिहास भी मिलता है जिसे पांच मुख्य कल्पों में विभक्त किया गया है।

नील-वराह काल के बाद आदि-वराह काल और फिर श्वेत वराह काल हुए। वराह-कल्प के छः मन्वन्तर अपनी संध्याओं सहित बीत चुके हैं तथा वर्तमान समय में सातवां मन्वन्तर चल रहा है। इसे वैवस्वत मनु की संतानों का काल माना जाता है। जम्बूद्वीप के पहले राजा स्वायम्भू-मनु थे। वही स्वायमभु-मनु जिनका उल्लेख हम ‘मत्स्यावतार’ की कथा में कर चुके हैं।

हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार वराह-कल्प के सातवें मन्वन्तर में 27वीं चतुर्युगी भी बीत चुकी है अर्थात चार युगों के 27 चक्र बीत चुके हैं और वर्तमान में वराह काल की 28वीं चतुर्युगी के कृतयुग, त्रेता और द्वापर बीत चुके हैं और कलियुग चल रहा है। यह कलियुग ब्रह्मा के द्वितीय परार्ध में वराह-कल्प के श्वेत-वराह नामक काल में और वैवस्वत मनु के मन्वन्तर में चल रहा है।

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इस प्रकार हिन्दू धर्म ग्रंथों में सृष्टि के इतिहास के साथ काल-गणना की पूरी संकल्पना विद्यमान है किंतु यह पश्चिमी देशों के ‘एंथ्रोपोलॉजी साइंटिस्ट’ अर्थात् नृवंशीय वैज्ञानिकों द्वारा बताई गई काल गणना से कहीं पर मेल खाती हुई तो कहीं पर बिल्कुल अलग प्रतीत होती है।

नील-वराह-काल के बाद आदि-वराह-काल शुरू हुआ। इसमें हिरण्याक्ष द्वारा धरती को चुराकर समुद्र में छिपा दिया गया तथा भगवान श्रीहरि विष्णु द्वारा धरती का उद्धार करके हिरण्याक्ष का वध किया गया। कुछ विद्वानों के अनुसार नील वाराह अवतार के काम को आदि वराह ने आगे बढ़ाया। आदि-वराह को कपिल वराह भी कहा गया है।

आधुनिक काल के कुछ विद्वानों का मानना है कि भगवान के इन अवतारों को वराह इसलिए कहा गया क्योंकि उन्होंने धरती पर रहने वाली वराह जाति में जन्म लिया था। उस काल में वराह एक वनवासी जाति थी जो समुद्र के निकट स्थित वनों में निवास करती थी।

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इन विद्वानों के अनुसार दक्षिण भारत में वराह देव नामक एक राजा हुआ। उसने महाप्रबल वराह सेना लेकर हिरण्याक्ष के राज्य पर चढ़ाई कर दी और विन्ध्यगिरि के पाद-प्रसूत जल-समुद्र को पार करके हिरण्याक्ष के नगर को घेर लिया। वराह देव तथा हिरण्याक्ष के बीच संगमनेर नामक स्थान में महासंग्राम हुआ और अंततः हिरण्याक्ष का अंत हुआ। वराह देव ने महाराष्ट्र में अपने नाम से एक पुरी भी बसाई जिसमें हिरण्याक्ष के बचे-खुचे दुष्ट असुरों को नियंत्रित रखने के लिए अपनी सेना का एक अंग भी यहाँ छोड़ दिया। यह पुरी ‘बारामती कराड़’ के नाम से प्रसिद्ध है। आज भी दक्षिण भारत में हिंगोली, हिंगनघाट, हींगना नदी, हिरण्याक्षगण एवं हैंगड़े आदि नामों से कई स्थान मिलते हैं। वराह अवतार की कथा के अनुकरण पर कुछ धर्म-ग्रंथों में वाराही देवी की भी कल्पना कर ली गई। कुछ ग्रंथों के अनुसार भगवती दुर्गा रण-संग्राम में अपनी विशाल देव-सेनाओं अर्थात् वाराही सेना और नारसिंही सेना को लेकर उनका संचालन करते हुए विजयश्री से विभूषित हुई थीं। दुर्गा के रण प्रसंग में ‘वाराही नारसिंही च भीम भैरव नादिनी’ कहकर वाराही देवी को याद किया जाता है। श्वेत वराह-कल्प का आरम्भ आज से लगभग 10 हजार साल पहले हुआ था।

कुछ परवर्ती ग्रंथों में भगवान श्वेत वराह का राजा विमति से युद्ध होने की कथा मिलती है। इस कथा के अनुसार द्रविड़ देश में सुमति नामक राजा राज्य करता था। वह अपने पुत्रों को राज्य देकर तीर्थयात्रा को निकला। तीर्थयात्रा के मार्ग में ही कहीं उसकी मृत्यु हो गई। सुमति का पुत्र विमति बहुत दुष्ट-बुद्धि राजा था। वह विष्णु-भक्त प्रजा को सताया करता था। इसलिए देवर्षि नारदजी ने भगवान श्रीहरि विष्णु के हाथों उसका नाश करवाने का विचार किया। महर्षि नारद विमति के पास पहुंचे तथा उससे कहा- ‘जो पिता का ऋण उतारे वही पुत्र है।’

विमति ने अपने मंत्रियों से पूछा- ‘पिता का ऋण कैसे उतरे?’

मंत्रियों ने कहा- ‘राजन् आपके पिताजी को तीर्थों ने मारा है, इसलिए तीर्थों को मारकर उनसे बदला लें।’

राजा विमति ने कहा- ‘तीर्थ तो अगणित हैं!’

एक मंत्री ने सुझाव दिया- ‘मथुरा सब तीर्थों की प्रमुख नगरी है, उसी को नष्ट कर दिया जाए।’

विमति ने मंत्रियों की यह सलाह स्वीकार कर ली तथा एक विशाल सेना लेकर मथुरा नगरी पर आक्रमण किया। इससे मथुरा के लोगों में भय व्याप्त हो गया और वे उत्तरी ध्रुव के बर्फीले क्षेत्र में स्थित श्वेत-द्वीप की ओर चले गए जहाँ स्वर्ग अर्थात् देवलोक स्थित था। श्वेत-द्वीप में उन्हें श्वेत-वराह के दर्शन हुए। श्वेत-वराह ने विष्णु-भक्त-प्रजा को अभयदान दिया और विमति से युद्ध करके सैन्य सहित राजा विमति को मार डाला।

पुराणों की वंशावली के अनुसार सुमति जैन संप्रदाय के सुमतिनाथ तीर्थंकर हैं और वे योगेश्वर ऋषभदेव के पौत्र तथा भरत के पुत्र हैं। उनका समय आज से लगभग 8000 वर्ष पहले का माना जाता है। वायु पुराण, वराह पुराण और माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मणों का इतिहास आदि ग्रंथों में आए प्रसंगों के अनुसार भगवान श्रीहरि नारायण ने अपने भक्त ध्रुव को उत्तर ध्रुव का एक क्षेत्र प्रदान किया था। यहीं पर भगवान शिव के पुत्र स्कंद का एक देश था और यहीं पर नारद मुनि भी निवास करते थे। उत्तर ध्रुव में कुछ आर्य भी निवास करते थे और यहीं पर श्वेतवराह नामक जाति भी रहती थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नृसिंह अवतार की कथा (11)

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नृसिंह अवतार की कथा

पिछली कड़ियों में चर्चा की थी कि सनकादि ऋषि के श्राप से भगवान विष्णु के जय एवं विजय नामक दो गण, दैत्य बनकर कश्यप ऋषि की पत्नी दिति के गर्भ से धरती पर आए। इनमें से दैत्यों के राजा हिरण्याक्ष के वध हेतु भगवान श्री हरि विष्णु के वाराह अवतार की कथा हम बता चुके हैं। इस कथा में हम दैत्यराज हिरण्यकश्यप के वध के लिए भगवान श्री हरि विष्णु के नृसिंह अवतार की कथा की चर्चा करेंगे।

नृसिंह अवतार को पुराणों में भगवान विष्णु का चौथा अवतार कहा गया है जो आधे मानव एवं आधे सिंह के रूप में प्रकट होते हैं, जिनका चेहरा तथा पंजे सिंह के तथा सिर एवं धड़ मानव का है। वे सम्पूर्ण भारत में वैष्णव भक्तों द्वारा पूजे जाते हैं किंतु दक्षिण भारत में उनकी पूजा अधिक लोकप्रिय है। महाभारत के सभा पर्व के ‘अर्घाभिहरण पर्व’ सहित अनेक पुराणों में नृसिंह अवतार की कथा किंचिंत् अंतरों के साथ मिलती है।

हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिप ने घनघोर तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया तथा उनसे वरदान मांगा कि उन्हें देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच न मार सकें। हम अस्त्र-शस्त्र, पर्वत या वृृक्ष से मरें। हम न जल में मरें, न आकाश पर और न पृथ्वी पर मरें। हम न रात में मरें न दिन में, न बाहर मरें न भीतर। किसी मृग, पक्षी अथवा सरीसृप से भी हमारी मृत्यु न हो। जब ब्रह्माजी ने उन्हें यह वरदान दे दिया तो वे दोनों महादैत्य ब्रह्माजी की बनाई सृष्टि को अत्यंत कष्ट देने लगे।

इसलिए भगवान श्रीहरि विष्णु ने वराह का रूप धारण करके संध्या काल में आधे समुद्र के भीतर और आधे समुद्र से बाहर खड़े होकर अपने दांत से हिरण्याक्ष का वध किया था।

जब भगवान श्रीहरि विष्णु ने हिरण्याक्ष का वध किया तो उसका भाई हिरण्यकश्यप दैत्यों का राजा बन गया तथा भगवान श्रीहरि का शत्रु हो गया। हिरण्यकश्यप और उसके दैत्य, भगवान के भक्तों को कष्ट देने लगे। उसने अपने राज्य में भगवान विष्णु की भक्ति करने तथा पूजा करने पर प्रतिबंध लगा दिया।

दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने तीनों लोकों को जीत लिया और देवताओं को स्वर्ग से निकालकर स्वयं अपने दैत्यों सहित स्वर्ग में रहने लगा। नर्क में पड़े हुए सब जीवों को वहाँ से निकालकर उसने स्वर्ग का निवासी बना दिया। हिरण्यकश्यप ने देवताओं को दिए जाने वाले यज्ञ-भाग पर रोक लगा दी और स्वयं ही यज्ञ-भाग का अधिकारी बन बैठा।

वह मुनियों के आश्रमों पर आक्रमण करके कठोर व्रत पालन करने वाले, सत्यधर्म परायण एवं जितेन्द्रिय महाभाग मुनियों को सताने लगा। उसने दैत्यों को यज्ञभाग का अधिकारी बनाया और देवताओं को यज्ञभाग के अधिकार से वंचित कर दिया। वह देवताओं के पीछे पड़ गया। जहाँ-जहाँ देवता जाते थे, वह वहाँ-वहाँ उनका पीछा करता था। इस प्रकार उस दुरात्मा को राज्य करते हुए पाँच करोड़ इकसठ लाख साठ हजार वर्ष बीत गए।

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महाबली हिरण्यकश्यप से पीड़ित होकर इन्द्र आदि देवता ब्रह्मलोक में गए और ब्रह्माजी के समक्ष हाथ जोड़कर बोले- ‘आप हमारी रक्षा कीजिये। हमें उस दैत्य से छुटकारा दिलाइये। आपसे मिले वरदान के बल पर वह त्रिलोकी को सता रहा है।’

ब्रह्माजी ने कहा कि अन्तर्यामी भगवान श्रीनारायण ही हमारी सहायता कर सकते हैं। हिरण्यकश्यप दैत्य का वे ही संहार करेंगे। इस पर देवगण ब्रह्माजी के साथ क्षीरसागर में शयन कर रहे भगवान नारायण की शरण में गए। भगवान श्रीहरि विष्णु ने देवताओं को अभयदान देते हुए कहा- ‘मैं इस दुष्ट दानव का नाश अवश्य करूंगा।’

हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु को अपना परम शत्रु समझता था परंतु उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था और दिन-रात भगवान हरि की भक्ति किया करता था। कुछ ग्रंथों के अनुसार जब हिरण्यकश्यप ब्रह्माजी की तपस्या कर रहा था, तब देवताओं ने हिरण्यकश्यप की पत्नी कयाधु को पकड़ लिया। इस पर देवर्षि नारद ने कयाधु को छुड़ाया और उसे भगवद्-भक्ति का उपदेश दिया। उस समय भक्त प्रह्लाद अपनी माता के गर्भ में थे। इसलिए गर्भस्थ शिशु ने भी उन उपदेशों को सुना और वह भगवान का भक्त हो गया।

जब प्रह्लाद का जन्म हुआ तो हिरयण्कश्प ने उसे शिक्षा प्राप्त करने के लिए दैत्यगुरु शुक्राचार्य के पुत्रों षण्ड तथा अमर्क के पास भेजा। गुरुओं ने बालक प्रह्लाद को अर्थ, धर्म और काम की शिक्षा प्रदान की। जब प्रह्लाद घर लौटा तो हिरण्यकश्यप ने पूछा- ‘संसार में किसकी भक्ति श्रेष्ठ है!’

इस पर भक्त प्रह्लाद ने उत्तर दिया- ‘श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन नामक नौ भक्तियों से प्राप्त किए जाने वाले भगवान श्री हरि विष्णु की भक्ति ही श्रेष्ठ है।’

अपने पुत्र के मुंह से अपने शत्रु का नाम सुनकर हिरण्यकश्यप बड़ा क्रोधित हुआ। उसने बालक प्रह्लाद से कहा- ‘तू भगवान विष्णु की भक्ति छोड़कर मेरी अर्थात् हिरणकश्यप की भक्ति कर!’

प्रह्लाद ने अपने पिता के आदेश को स्वीकार नहीं किया तथा वह ईश्भक्ति पर ही अडिग रहा। बहुत समझाने पर भी जब बालक प्रह्लाद न माना तो हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को मारने का निश्चय किया तथा अपने सैनिकों को आदेश दिया- ‘इसे मार डालो। यह मेरे शत्रु का पक्षपाती हो गया है।’

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जब असुरों ने बालक प्रह्लाद पर आघात किया तो उनके खड्ग टूट गए तथा त्रिशूल टेढ़े हो गए किंतु बालक के शरीर पर खरोंच तक नहीं आई। इस पर बालक प्रह्लाद को विष दिया गया किंतु बालक पर उसका भी प्रभाव नहीं हुआ। बालक पर सर्प छोड़े गए किंतु वे भी भक्त प्रह्लाद के निकट जाकर शांत हो गए। इस पर उन्हें मत्त गजराज के समक्ष फैंका गया। गजराज ने भक्त प्रह्लाद को उठाकर अपने मस्तक पर रख लिया। पर्वत से नीचे फेंके जाने पर प्रह्लाद ऐसे उठ खड़े हुए, जैसे शय्या से उठे हों। समुद्र में पाषाण बाँधकर डुबाने पर वे पुनः जल के ऊपर आ गए। गुरु-पुत्रों ने मन्त्रबल से कृत्या नामक राक्षसी को बुलाया किंतु कृत्या ने भक्त प्रह्लाद की जगह दैत्यगुरु शुक्राचार्य के पुत्रों को ही मार डाला। भक्त प्रह्लाद ने प्रभु से प्रार्थना करके अपने गुरुओं को जीवित करवाया। हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलाया। होलिका के पास एक ऐसी मायावी चद्दर थी जिसे ओढ़ने पर अग्नि का प्रभाव नहीं होता था। हिरण्यकश्यप ने होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को लेकर चिता में बैठ जाये। होलिका ने वह मायावी चद्दर ओढ़ ली तथा प्रह्लाद को लेकर चिता पर बैठ गई। जब चिता में आग लगाई गई तो वह मायावी चद्दर होलिका के शरीर से हटकर भक्त प्रह्लाद के शरीर पर चली गई जिससे होलिका तो जल गई किंतु भक्त प्रह्लाद पूरी तरह सुरक्षित रहे।

होलिका के जल जाने के बाद हिरण्यकश्यप ने स्वयं ही प्रह्लाद को मारने का निश्चय किया तथा क्रोध में भरकर बोला- ‘मैं तुझे मार रहा हूँ, तेरा भगवान कहाँ है, उसे बुला ले!’

इस पर भक्त प्रह्लाद ने कहा- ‘भगवान तो कण कण में हैं। वे तो मुझ में, आप में और इस खड्ग में भी हैं।’

इस पर हिरण्यकश्यप एक स्तंभ की तरफ संकेत करके बोला- ‘क्या इसमें भी तेरा भगवान है?’

भक्त प्रह्लाद ने कहा- ‘हाँ इस स्तम्भ में भी भगवान हैं।’

जब हिरण्यकश्यप ने भक्त प्रह्लाद पर अपनी गदा से प्रहार किया तो उसी समय भगवान श्रीहरि विष्णु स्तम्भ को फाड़कर नृसिंह अवतार के रूप में प्रगट हो गए। भगवान का आधा शरीर सिंह का तथा आधा शरीर मानव का था। अपने भक्त को सताए जाने के कारण भगवान अत्यंत क्रोध में थे। भगवान श्रीनृसिंह ने भयंकर सिंह-गर्जना करते हुए हिरण्यकश्यप को पकड़ लिया और उसे घसीटते हुए हिरण्यकश्यप के महल की चौखट तक ले गए।

भगवान इस समय न नर के वेश में थे, न मृग के। वे न घर के अंदर थे, न बाहर। उस समय संध्या हो रही थी, अर्थात् तब न दिन थी, न रात। नृसिंह अवतारधारी भगवान श्रीहरि विष्णु ने हिरण्यकश्यप को उठाकर अपनी जंघाओं पर लिटा लिया। इस प्रकार हिरण्कश्यप न भीतर था न बाहर, न न धरती पर था, न आकाश में। भगवान ने अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का पेट फाड़ डाला जो न अस्त्र थे, न शस्त्र!

महाभारत में लिखा है कि भगवान विष्णु ने नृसिंह रूप धरकर हिरण्यकश्यप पर आक्रमण किया। दैत्यों ने कुपित होकर नृसिंह पर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा कर दी। भगवान उन सभी शस्त्रों को खा गए तथा कई हजार दैत्यों का संहार कर दिया। इस पर हिरण्यकश्यप ने अत्यंत क्रोध में भरकर भगवान पर आक्रमण किया।

दैत्य को सामने आया देख महातेजस्वी भगवान नृसिंह ने नखों के तीखे अग्र-भागों के द्वारा उस दैत्य के साथ घनघोर युद्ध किया। फिर संध्याकाल आने पर भगवान उसे पकड़कर महल की देहरी पर बैठ गए और उसे अपनी जाँघों पर रखकर अपने नखों से उसका वक्षस्थल विदीर्ण कर डाला।

हिरण्यकश्यप के मर जाने के बाद भी भगवान क्रोध में भरकर भयंकर गर्जना करते रहे। उनका यह उग्र रूप देखकर देवता डर गए, ब्रह्माजी भी अवसन्न हो गए, लक्ष्मीजी भगवान को शांत करने के लिए गईं किंतु दूर से लौट आयीं। इस पर भक्त प्रह्लाद ने भगवान की स्तुति की। भगवान नृसिंह ने शांत होकर अपने भक्त को गोद में बैठा लिया और उसे स्नेह से दुलारने लगे।

बिहार के लोगों का मानना है कि भगवान नृसिंह का अवतार पूर्णिया जिला के ‘बनमनखी’ क्षेत्र के सिकलीगढ़ धरहरा गांव में हुआ था। इसी गांव में होलिका भक्त प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठी थी। इस गांव में 12 फुट मोटा एवं 65 डिग्री पर झुका हुआ एक खम्भा है जिसे माणिक्य स्तम्भ कहते हैं।

मान्यता है कि इसी खंभे को फाड़कर भगवान श्रीहरि विष्णु नृसिंह के रूप में प्रकट हुए थे। गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण के 31वें साल के तीर्थांक विशेषांक में सिकलीगढ़ धरहरा का उल्लेख किया गया है। मान्यता है कि नृसिंह अवतार वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को हुआ था।

वामन अवतार की कथा (12)

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वामन अवतार - bharatkaitihas.com
वामन अवतार की कथा

इस धारावाहिक की पिछली कड़ियों में हमने भगवान श्री हरि विष्णु के चार अवतारों- मत्स्यावतार, कूर्मावतार, वाराह अवतार एवं नृसिंह अवतार की चर्चा की है। ये सभी अवतार मनुष्येतर रूप में अर्थात् जलचर, उभयचर एवं थलचर जीवों के रूप में थे जबकि इस कड़ी में हम भगवान श्री हरि के वामन अवतार की चर्चा कर रहे हैं, वह पूर्णतः मानव रूप का अवतार है किंतु यह अवतार भी मनुष्य के सामान्य आकार में न होकर वामन रूप में हुआ। वामन अवतार मानव प्रजाति के उस क्रमिक विकास की ओर संकेत करता है कि धरती के प्रारम्भिक मनुष्य छोटे कद के थे।

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हिन्दू ग्रंथों के अनुसार वामन भगवान श्री हरि विष्णु के पाँचवे तथा त्रेता युग के पहले अवतार थे। दक्षिण भारत में वामन को उपेन्द्र कहा जाता है। वामन ऋषि कश्यप तथा उनकी पत्नी अदिति के पुत्र थे। अदिति के पुत्र आदित्य कहलाते हैं। इन्द्र, सूर्य तथा समस्त देवता अदिति के ही पुत्र हैं। वामन बारहवें आदित्य माने जाते हैं। कहीं-कहीं ऐसी भी मान्यता मिलती है कि वामन, हनुमान के छोटे भाई थे। कहीं-कहीं पर वामन को तीन पैरों वाला दर्शाया गया है। भगवान के इस रूप को त्रिविक्रम भी कहा जाता है। इस रूप में भगवान का एक पैर धरती पर, दूसरा आकाश अर्थात् देवलोक पर तथा तीसरा दैत्यराज बलि के सिर पर दर्शाया जाता है। भागवत कथा के अनुसार दैत्यराज बली भक्तराज प्रह्लाद का पौत्र तथा दैत्यराज विरोचन का पुत्र था। दैत्यराज बली अत्यंत बलशाली था। उसने देवताओं को देवलोक से निकाल कर देवलोक में अपना निवास बना लिया था। कुछ ग्रंथों में यह भी मान्यता है कि दैत्यराज बली ने अपनी तपस्या से त्रिलोकी पर आधिपत्य प्राप्त किया था। जब देवताओं से स्वर्ग छिन गया तब उनकी माता अदिति ने बारह वर्ष तक घनघोर तपस्या करके भगवान श्रीहरि विष्णु को प्रसन्न किया। भगवान श्रीहरि विष्णु ने ऋषि-पत्नी अदिति के समक्ष प्रकट होकर कहा- ‘हे देवी! तुम्हारे पुत्रों अर्थात् देवताओं के उद्धार के लिए मैं स्वयं तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लूंगा।’

श्रवण मास की द्वादशी को अभिजीत नक्षत्र में भगवान श्रीहरि विष्णु ने अदिति के गर्भ से वामन के रूप में अवतार लिया। उनके ब्रह्मचारी रूप को देखकर सभी देवता और ऋषि-मुनि आनंदित हो उठे। महर्षि कश्यप ने ऋषियों के साथ मिलकर उनका उपनयन संस्कार किया। महर्षि पुलह ने बटुक रूपी वामन को यज्ञोपवीत दिया।

महर्षि अगस्त्य ने मृगचर्म, मरीचि ने पलाश दण्ड, आंगिरस ने वस्त्र, सूर्य ने छत्र, भृगु ने खड़ाऊं, गुरु बृहस्पति ने जनेऊ तथा कमण्डल, माता अदिति ने कोपीन, देवी सरस्वती ने रुद्राक्ष माला तथा यक्षराज कुबेर ने बटुक रूपी भगवान वामन को भिक्षा-पात्र प्रदान किया। जब राजा बली ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया तो वामन रूपधारी विष्णु भी वहाँ पहुंच गए। वामन के तेज से यज्ञशाला प्रकाशित हो उठी। दैत्यराज बली ने वामन भगवान को एक उत्तम आसन पर बिठाकर उनका सत्कार किया और उनसे दक्षिणा मांगने के लिए आग्रह किया।

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तभी दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने वामन रूपधारी श्रीहरि विष्णु को पहचान लिया और उसने दैत्यराज को सावधान किया- ‘ये स्वयं भगवान विष्णु हैं, इनके छल में मत आओ।’

बली ने यह कहकर गुरु की अवहेलना की- ‘मैं याचक को खाली हाथ नहीं भेज सकता!’

इस पर वामन रूपी भगवान ने बली से कहा- ‘मुझे स्वयं के रहने के लिए तीन पग भूमि चाहिए।’

इस पर दैत्यराज बली को बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने वामन से अनुरोध किया- ‘आप अपने लिए कुछ और बड़ी वस्तु मांगें!’

दैत्यराज के बार-बार अनुरोध करने पर भी वामन भगवान अपनी बात पर अडिग रहे तथा उससे अपने लिए तीन पग भूमि मांगते रहे। इस पर बली ने वामन का अनुरोध स्वीकार कर लिया।

जब दैत्यराज ने भूमिदान हेतु संकल्पबद्ध होने के लिए अपने कमण्डल से जल लेना चाहा तो देवगुरु शुक्राचार्य अपने शिष्य बली को संकट से बचाने के लिए लघु रूप धारण करके कमण्डल की टोंटी में बैठ गए और कमण्डल में से जल निकलने से रोक दिया। इस पर बली ने एक तिनका कमण्डल की टोंटी में घुसाया। यह तिनका दैत्यगुरु शुक्राचार्य की आंख में जाकर घुस गया जिससे शुक्राचार्य की एक आंख फूट गई।

दैत्यराज बली ने हाथ में जल लेकर वामन को तीन पग भूमि देने का संकल्प लिया। संकल्प पूरा होते ही वामन का आकार बढ़ने लगा और वे वामन से विराट हो गए। उन्होंने एक पग से पृथ्वी नाप ली, दूसरे पग से स्वर्ग नाप लिया तथा दैत्यराज से पूछा- ‘तीसरा पग कहाँ रखूं?’

इस पर बली ने अपना मस्तक आगे कर दिया और बोला- ‘प्रभु, सम्पत्ति का स्वामी सम्पत्ति से बड़ा होता है। तीसरा पग मेरे मस्तक पर रख दें।’ इस पर भगवान ने तीसरा पग उसके सिर पर रखकर उसे भी नाप लिया।

इस प्रकार भगवान श्रीहरि विष्णु ने दैत्यराज बली से स्वर्ग और धरती का राज्य छीन लिया। भगवान ने स्वर्ग अदिति के पुत्रों अर्थात् देवताओं को लौटा दिया तथा इन्द्र को फिर से स्वर्ग का अधिपति बना दिया। इसके बाद भगवान ने दैत्यराज बली से कहा- ‘अगले मन्वन्तर में तू ही स्वर्ग का अधिपति इन्द्र होगा। तब तक तू अपने दैत्यों को लेकर सुतल पाताल में चला जा और वहीं पर निवास कर। मैं स्वयं तेरा द्वारपाल बनकर तेरी रक्षा करूंगा।’

बली ने भगवान के आदेश का पालन किया और वह दैत्यों को लेकर स्वर्ग छोड़कर पाताल चला गया। आधुनिक काल में इस पाताल का आशय भारत के दक्षिण-पूर्व में स्थित बाली द्वीप से लिया जाता है। बाली द्वीप पर आज भी राक्षसों की हजारों छोटी-बड़ी एवं विशालाकाय मूर्तियां मंदिरों के बाहर लगी हुई हैं। 

कुछ अन्य पुराणों में आई कथा के अनुसार भगवान श्रीहरि विष्णु वामन का रूप धारण करके राजा बली के द्वार पर जाकर खड़े हो गए। वे चार महीने तक दैत्यराज बली के द्वार पर खड़े रहे। इस पर दैत्यराज बली को आश्चर्य हुआ और उन्होंने उस बालक को बुलाकर पूछा- ‘तुम कौन हो?’

वामन ने उत्तर दिया- ‘मैं अपूर्वाली हूँ, क्या तुम मुझे नहीं जानते?’

बली ने पूछा- ‘तुम कहां से हो?’

इस पर वामन ने कहा- ‘सारी सृष्टि मुझसे है।’

राजा बली ने पूछा- ‘तुम्हारे माँ बाप कौन हैं?’

इस पर भगवान वामन ने कहा- ‘मेरा कोई माँ, बाप नहीं है।’

बली ने पूछा- ‘मुझसे क्या चाहते हो?’

तब वामन ने कहा कि मुझे अपने रहने के लिए तीन पग भूमि चाहिए। इसके बाद की कथा एक जैसी ही है जिसका उल्लेख हमने ऊपर की पंक्तियों में किया है। कुछ ग्रंथों के अनुसार तब से बली पाताल लोक में रहता है। वह केवल चार महीने के लिए अपने राज्य अर्थात् दक्षिण भारत में आता है। उस समय भगवान विष्णु पाताल में चले जाते हैं। भगवान के पाताल में जाने पर धरती पर ‘देव-शयनी’ पर्व मनाया जाता है। इन चार महीनों में धरती पर विवाह आदि मंगल कार्य नहीं होते हैं। भगवान के पुनः धरती पर आने पर ‘देव-उठानी एकादशी’ मनाई जाती है। इसे देव-झूलनी एकादशी भी कहते हैं।

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को वामन द्वादशी या वामन जयंती का आयोजन किया जाता है। इसी दिन भगवान का वामन अवतार हुआ था। धार्मिक पुराणों तथा मान्यताओं के अनुसार भक्तों को इस दिन व्रत-उपवास करके भगवान वामन की स्वर्ण प्रतिमा बनवा कर पंचोपचार सहित पूजा करनी चाहिए। जो लोग इस दिन श्रद्धा एवं भक्ति पूर्वक भगवान वामन की पूजा करते हैं, उनके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

कुछ ग्रंथों में आई कथा के अनुसार वामन ने राजा बली के सिर पर अपना पैर रखकर उसे अमरत्व प्रदान कर दिया। इस कारण राजा बली को भारतीय संस्कृति में महान आदर दिया गया है। आज भी सम्पूर्ण भारत में जब ब्राह्मण-पुरोहित किसी यजमान को रक्षासूत्र बांधते हैं तो यह मंत्र उच्चारित करते हैं-

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामनु बध्नामि रक्षे मा चल मा चल।

इसका अर्थ है कि जिस प्रकार दानवों के राजा बली वचन से बांधे गए थे, मैं भी तुम्हें उसी से बांधता हूँ। हे रक्षासूत्र! तुम कभी भी चलायमान न होओ, चलायमान न होओ। अर्थात्- हे रक्षासूत्र! तुम मेरे यजमान की रक्षा करो, कभी भी इस वचन से नहीं फिरो। इसे ‘रक्षासूत्र-मंत्र’ भी कहते हैं। महर्षि वेदव्यासजी द्वारा रचित अध्यात्म रामायण के अनुसार वामन भगवान, राजा बली के सुतल लोक में द्वारपाल बन गए और सदैव बने रहेंगे। गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित रामचरितमानस में भी इस घटना का उल्लेख किया है।

बली की कथा में आए संदर्भों को लौकिक दृष्टि से देखने पर यह अनुमान लगाया जाता है कि दक्षिण भारत में रहने वाले दैत्यों ने हिमालय पर्वत के क्षेत्र में रहने वाले देवताओं के राज्य पर अधिकार कर लिया था जिसे स्वर्ग कहते थे। भगवान ने राजा बली से यह समस्त भूमि लेकर उसे पाताल लोक अर्थात् दक्षिण-पूर्व एशियाई द्वीपों में जाकर रहने का आदेश दिया जिन्हें अब जावा, सुमात्रा, बाली, मलाया आदि द्वीपों के रूप में देखा जा सकता है। बाली द्वीप का नामकरण दैत्यराज ‘बली’ के नाम माना जाता है।

इन्हीं दैत्यों में आगे चलकर सुमाली नामक दैत्य हुआ जो रावण का नाना था। माना जाता है कि रावण का जन्म इन्हीं द्वीपों में हुआ था। कुछ लोग रावण का जन्म आंध्रालय अर्थात् ऑस्ट्रेलिया में होना मानते हैं। यक्षराज कुबेर के पास इतना सोना था कि उन्होंने सोने की लंका बनाई थी।

कुबेर को यह सोना संभवतः सुमात्रा नामक द्वीप से मिला था। इसे संस्कृत साहित्य में ‘स्वर्णद्वीप’ कहा गया है। इस द्वीप पर आज भी बहुत बड़ी मात्रा में सोने का उत्पादन होता है। इन समस्त द्वीपों पर आज भी राक्षस जैसी मुखाकृतियों वाली मूर्तियां और चित्र बड़ी संख्या में मिलते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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