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अबुल फजल का झूठ (97)

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अबुल फजल का झूठ - www.bharatkaitihas.com
अबुल फजल का झूठ

अबुल फजल ने झूठा इतिहास लिखने की प्रेरणा बाबर से पाई थी। अबुल फजल का झूठ उसके ग्रंथ में हर ओर बिखरा पड़ा है। बाबर ने हर स्थान पर अपनी सेना की संख्या बहुत कम तथा शत्रु के सैनिकों की संख्या बहुत अधिक बताई है। अबुल फजल ने भी मुगलों का इतिहास लिखते समय ही नीति अपनाई है।

मुगलों एवं अफगानों के बीच सरहिंद की लड़ाई चालीस दिन तक चलती रही। हालांकि सरहिंद की लड़ाई में अफगान सेना का नेतृत्व नसीब खाँ और तातार खाँ कर रहे थे किंतु अबुल फजल ने लिखा है कि इस लड़ाई में सिकंदरशाह की तरफ से काला पहाड़ नामक योद्धा ने अतुल शौर्य का प्रदर्शन किया।

इस युद्ध में काला पहाड़ के नाम से लड़ने वाला योद्धा वास्तव में कौन था, इसके बारे में अधिक जानकारी नहीं मिलती है किंतु उस काल में बंगाल एवं उड़ीसा में कालाचंद राय नामक एक ब्राह्मण युवक ने इस्लाम ग्रहण करके अपना नाम काला पहाड़ रख लिया था। उसने पूर्वी भारत केे बहुत सारे मंदिरों को क्षति पहुंचाई थी।

काला पहाड़ अफगान सेना में उच्च पद पा गया था। संभवतः यही काला पहाड़ सरहिंद के युद्ध में मौजूद था और उसने अफगानों की तरफ से हुमायूँ के विरुद्ध युद्ध लड़ा था। इस कारण हुमायूँ के सेनापतियों को यह लड़ाई जीतने में चालीस दिन लग गए। सरहिंद की लड़ाई के कई साल बाद ई.1583 में हुमायूँ के पुत्र अकबर ने काला पहाड़ को एक युद्ध में मरवाया था।

इस युद्ध की समाप्ति के बाद हुमायूँ के सेनापति शाह अबुल मआली तथा बैराम खाँ बेग में विजय के श्रेय को लेकर होड़ हो गई। दोनों ही शाही फरमान में इस विजय का श्रेय अपने नाम लिखवाना चाहते थे किंतु हुमायूँ ने उन दोनों को ही इस विजय का श्रेय न देकर अपने पुत्र अकबर को इस विजय का श्रेय दिया जिससे यह होड़ समाप्त हो गई।

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सरहिंद के युद्ध में हुमायूँ को विजय भले ही प्राप्त हो गई थी किंतु सिकंदरशाह सूरी अभी जीवित था और कभी भी वापस लौट सकता था। अतः हुमायूँ ने अपनी एक सेना सरहिंद दुर्ग की रक्षा पर नियुक्त की तथा शेष सम्पूर्ण सेना एवं अपने अमीरों तथा बेगों के साथ समाना के लिए चल दिया। समाना पहुंच कर हुमायूँ ने शाह अबुल मआली, मुहम्मद कुली खाँ बरलास, इस्माइल बेग दुलदाई तथा कुछ अन्य अमीरों को उनकी सेनाओं के साथ लाहौर भेज दिया। उन्हें आदेश दिया गया कि वे सिकंदरशाह सूरी की तरफ से सावधान रहें, वह कभी भी सरहिंद अथवा लाहौर पहुंचकर गड़बड़ी कर सकता है। हुमायूँ ने शाह अबुल मआली की सेवाओं का सम्मान करते हुए उसे पंजाब का सूबेदार बना दिया। इन दिनों बरसात जोरों से हो रही थी, इसलिए हुमायूँ को समाना में एक दिन और विश्राम करना पड़ा। अगले दिन वह दिल्ली के लिए रवाना हुआ। 20 जुलाई 1555 को हुमायूँ दिल्ली पहुंच गया। हुमायूँ ने दिल्ली के उत्तरी भाग में यमुनाजी के तट पर स्थित सलीमगढ़ दुर्ग में डेरा जमाया।

जब हुमायूँ भारत का बादशाह था तब उसने दिल्ली में एक प्राचीन हिन्दू किले के चारों ओर एक परकोटा बनवाया था जिसे हुमायूँ दीनपनाह कहा करता था। शेरशाह के पुत्र इस्लामशाह अथवा सलीमशाह ने इसी दीनपनाह का जीर्णोद्धार करके उसे सलीमगढ़ नाम दिया था।

जब हुमायूँ दुबारा लौट कर आया तो उसने फिर से इसी दीनपनाह में डेरा जमाया। हुुमायूँ ने इस दीनपनाह के भीतर एक पुस्तकालय का भी निर्माण करवाया था जिसका बाद में शेरशाह ने जीर्णोद्धार करके शेरमण्डल नाम रखा था। हुमायूँ इस पुस्तकालय से बहुत प्रेम करता था। इस पुस्तकालय के फिर से हाथ आ जाने से हुमायूँ बड़ा प्रसन्न हुआ। आज भी इस पुस्तकालय को दिल्ली के पुराने किले में घुसते ही देखा जा सकता है और दूर से पहचाना जा सकता है। आगे चलकर हुमायूँ की मृत्यु भी इसी पुस्तकालय की सीढ़ियों से फिसल जाने से हुई थी।

कुछ दिन बाद हुमायूँ ने दिल्ली नगर में प्रवेश किया तथा दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। जिस दिन हुमायूँ तख्तासीन हुआ, उसी दिन उसने अपने अधिकारियों में हिंदुस्तान के वे क्षेत्र वितरित किए जो अब तक हुमायूँ द्वारा अपने अधीन कर लिए गए थे। हिसार तथा उसका निकटवर्ती परगना अकबर को दिया गया।

हुमायूँ ने बैराम खाँ को सरहिंद तथा अन्य परगने दिए गए। तार्दी खाँ बेग को मेवात, इस्कंदर खाँ उजबेग को आगरा, अली कुली खाँ को सम्भल और हैदर मुहम्मद खाँ अखता बेगी को बयाना दिए गए। बादशाह दिल्ली के सलीमगढ़ में रहने लगा। कुछ दिनों बाद शाह वली अतका काबुल से दिल्ली आया। उसने हुमायूँ के हरम की औरतों की कुशलता का समाचार सुनाया। उसने हुमायूँ को सूचित किया कि चूचक बेगम ने एक और पुत्र को जन्म दिया है। हुमायूँ ने उस पुत्र का नाम फर्रूख फाल रखा। इस शुभ समाचार को लाने वाले शाह वली अतका को हुमायूँ ने सुल्तान की उपाधि से सम्मानित किया।

हुमायूँ को सूचना मिली कि कुछ अफगान सरदार हिसार में एकत्रित हो रहे हैं। इस पर हुमायूँ ने अतका खाँ को एक सेना देकर हिसार की तरफ भेजा। जब अतका खाँ हिसार से केवल दो कोस की दूरी पर रह गया तब हिसार की तरफ से रुस्तम खाँ और तातार खाँ आदि अफगान अमीर अपनी सेनाएं लेकर आए।

अबुल फजल ने लिखा है कि अफगानों की संख्या 2 हजार तथा मुगलों की संख्या केवल 400 थी परन्तु जब लड़ाई आरम्भ हुई तो मुगलों की जीत हुई। शत्रु के सत्तर आदमी मारे गए। रुस्तम खाँ भागकर हिसार के दुर्ग में चला गया। इस कारण मुगलों ने हिसार का दुर्ग घेर लिया। 23 दिन की घेरेबंदी के बाद रुस्तम खाँ ने समर्पण कर दिया। 700 अफगानों को उनके नेताओं सहित बंदी बनाकर बादशाह के पास भेज दिया गया।

यह विवरण अबुल फजल का झूठ के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इस युद्ध में मुगलों को विजय मिली थी किंतु अफगानों की संख्या 2000 तथा मुगलों की संख्या केवल 400 नहीं थी।

बादशाह ने रुस्तम खाँ के समक्ष प्रस्ताव रखा कि यदि वह हुमायूँ की सेवा में आए तो उसे एक जागीर दे दी जाएगी किंतु उसके पुत्रों को पेशावर के किले में शाही निगरानी में रखा जाएगा। रुस्तम खाँ ने बादशाह का यह प्रस्ताव मानने से मना कर दिया। इस पर हुमायूँ ने रुस्तम खाँ को बंदी बना लिया।

अबुल फजल का झूठ यहाँ भी दिखाई देता है कि अफगानों की संख्या 2 हजार थी जिन्हें केवल 400 मुगल सैनिकों ने परास्त कर दिया तथा 700 अफगान सैनिकों को बंदी बनाकर बादशाह के पास भेज दिया। यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि मुगल सैनिकों की संख्या अफगान सैनिकों की संख्या के आसपास अथवा उनसे अधिक रही होगी।

संभवतः अबुल फजल को झूठा इतिहास लिखने की प्रेरणा बाबरनामा से मिली होगी। बाबर ने भी हर स्थान पर अपनी सेना की संख्या बहुत कम तथा शत्रु के सैनिकों की संख्या बहुत अधिक बताई है। बाबर का झूठ और अबुल फजल का झूठ आगे चलकर साम्यवादी इतिहासकारों के लिए खुराक बन गए। आजादी के बाद भारत की जनता को यही झूठा इतिहास परोसा गया।

संभवतः ऐसा करके बाबर यह सिद्ध करना चाहता था कि बाबर को युद्ध में विजय सैनिकों के बल पर नहीं मिली थी अपितु अपनी स्वयं की चमत्कारी शक्ति के बल पर मिली थी। यही प्रवृत्ति अबुल फजल में भी प्रवेश कर गई थी जो कि पूरे मुगल इतिहास लेखन के दौरान अन्य लेखकों में भी विद्यमान रही।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हुमायूँ अपने हरम को काबुल से दिल्ली लाने के लिए बेचैन हो गया (98)

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हुमायूँ अपने हरम को - www.bharatkaitihas.com
हुमायूँ अपने हरम को काबुल से दिल्ली लाने के लिए बेचैन हो गया

हुमायूँ दिल्ली पर अधिकार कर चुका था किंतु उसका हरम अभी तक काबुल में था। इसलिए हुमायूँ अपने हरम को काबुल से दिल्ली लाने के लिए बेचैन हो गया!

जब हुमायूँ काबुल से भारत आया था तब उसकी सेना में कम्बर दीवाना नामक एक सेनापति भी शामिल था। जब हुमायूँ सरहिंद की विजय प्राप्त करके दिल्ली की तरफ बढ़ा, तब कम्बर दीवाना के मन में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित करने की इच्छा उत्पन्न हुई और वह हुमायूँ की सेना से अलग होकर सम्भल की ओर चला गया। उसने सम्भल, बदायूं तथा गोला आदि स्थानों पर अधिकार कर लिया तथा सम्भल को राजधानी बनाकर शासन करने लगा। उसने अपने अमीरों को सुल्तान तथा खान की उपाधियां प्रदान कीं।

हुमायूँ ने अली कुली खाँ शैबानी को आदेश दिया कि वह कम्बर को पकड़कर लाए। जब अली कुली खाँ शैबानी कम्बर दीवाना के पास पहुंचा तो कम्बर ने बादशाह को संदेश भिजवाया कि मैं आपका आज्ञाकारी गुलाम हूँ किंतु यह राज्य मैंने अपनी तलवार से जीता है। अतः मुझे दण्डित न किया जाए तथा मुझे सम्भल पर शासन करने दिया जाए।

जब कम्बर ने बादशाह के दरबार में उपस्थित होने से मना कर दिया तो अली कुली खाँ शैबानी ने कम्बर को मार डाला और उसका सिर काटकर हुमायूँ को भेज दिया। जब हुमायूँ ने अपने ही अमीर का कटा हुआ सिर देखा तो उसे बड़ा दुःख हुआ तथा उसने अली कुली खाँ को पत्र लिखकर लताड़ा कि बादशाह की इच्छा के बिना कम्बर दीवाना का सिर क्यों काटा गया?

पाठकों को स्मरण होगा कि हुमायूँ का चचेरा भाई मिर्जा सुलेमान तथा सुलेमान का पुत्र मिर्जा इब्राहीम हुमायूँ के वफादार अमीर थे। उन दोनों ने हुमायूँ को कई बार संकटों से बचाया था। जब हुमायूँ काबुल से भारत आया था तब वह मिर्जा सुलेमान तथा उसके पुत्र को अपने साथ नहीं लाया था क्योंकि वे हुमायूँ के विश्वसनीय थे तथा हुमायूँ को अफगानिस्तान में भी अपने विश्वसनीय लोगों की आवश्यकता थी किंतु जैसे ही हुमायूँ ने अफगानिस्तान की धरती छोड़ी, मिर्जा सुलेमान के मन में बेईमानी आ गई। उसने अंदराब और ईश्कमिश पर कब्जा करने का विचार किया।

हुमायूँ ने अंदराब और ईश्कमिश की जागीरें तर्दी बेग खाँ को दे रखी थीं। जब तर्दी बेग खाँ हुमायूँ के साथ भारत अभियान पर आया तो उसने मुकीम खाँ को अपनी जागीरों के प्रबंधन के लिए नियुक्त किया था। मिर्जा सुलेमान ने मुकीम खाँ के समक्ष प्रस्ताव भिजवाया कि वह तर्दी बेग खाँ की नौकरी छोड़कर मेरी नौकरी स्वीकार कर ले किंतु मुकीम खाँ ने मिर्जा सुलेमान की बात मानने से मना कर दिया।

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इस पर मिर्जा सुलेमान ने अंदराब को घेर लिया। मुकीम खाँ अंदराब की रक्षा नहीं कर सका और मिर्जा सुलेमान से लड़ता हुआ वहाँ से भाग निकला और दिल्ली आकर बादशाह हुमायूँ की सेवा में उपस्थित हुआ। जब हुमायूँ को मिर्जा सुलेमान की गद्दारी के बारे में पता लगा तो हुमायूँ ने माथा पीट लिया। अब हुमायूँ के गद्दार भाई हुमायूँ को परेशान करने के लिए जीवित नहीं थे किंतु जीवन भर विश्वसनीय रहा चचेरा भाई सुलेमान ही गद्दारी करने पर उतर आया था। हुमायूँ ने इसे भाग्य की विडम्बना मानकर स्वीकार कर लिया। वैसे भी हुमायूँ काबुल से 1200 किलोमीटर की दूरी पर था। इस समय वह भारत के अफगानों से लड़ने में व्यस्त था, अतः काबुल की समस्याओं पर ध्यान नहीं देना चाहता था। इन्हीं दिनों हुमायूँ को शिकायतें मिलने लगीं कि शाह अबुल मआली पंजाब के लोगों को दुःख देता है तथा बादशाह के आदेशों के प्रतिकूल कार्य करता है। इन शिकायतों से हुमायूँ का माथा ठनका क्योंकि इस समय हुमायूँ अपने हरम की औरतों को काबुल से दिल्ली बुलवाने की योजना बना रहा था। हुमायूँ की चिंता का कारण यह था कि काबुल से दिल्ली आने के लिए उसके हरम को पंजाब में लम्बा रास्ता तय करना था। यदि शाह मआली ने गड़बड़ की तो हरम की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।

वैसे भी हुमायूँ के हरम को काबुल से दिल्ली लाने में खतरों की कमी नहीं थी। मिर्जा सुलेमान द्वारा की जा रही गड़बड़ी के कारण हुमायूँ के हरम का काबुल से निकलकर सिंधु नदी तक पहुंचना भी कठिन था। सिंधु नदी पार करने से पहले तथा सिंधु को पार करने के बाद अफगानों के सैंकड़ों गांव थे जिनके बीच में से हुमायूँ के हरम को निकलना था। ये लोग कभी भी शाही हरम को लूट सकते थे और औरतों को उठाकर ले जा सकते थे।

अफगानों के गांवों से निकलने के बाद गक्खर प्रदेश से गुजरना होता था जहाँ का शासक सुल्तान आदम भी हुमायूँ से विमुख होकर सिकंदरशाह की तरफ हो गया था। वह भी हुमायूँ के हरम को नुक्सान पहुंचा सकता था। उसके बाद पंजाब के विशाल मैदान थे जिनमें शाह अबुल मआली गड़बड़ कर सकता था।

स्थितियां ऐसी नहीं थीं कि हुमायूँ एक बड़ी सेना भेजकर अपने हरम को बुलवा लेता क्योंकि ऐसी स्थिति में अफगानों द्वारा दिल्ली और आगरा पर हमला कर दिया जाता। अतः हुमायूँ अपने हरम को काबुल से दिल्ली लाने के लिए बेचैन हो गया और इस कार्य को निर्विघ्न सम्पन्न करने के लिए योजना बनाने लगा। उसने शाह अबुल मआली को पंजाब से हटाने तथा अपने बड़े पुत्र जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर को पंजाब का शासक नियुक्त करने का निश्चय किया ताकि अकबर की सेनाएं हरम की औरतों को काबुल से लेकर सुरक्षित रूप से दिल्ली पहुंचा सकें।

हुमायूँ ने बैराम खाँ से सलाह करके शाह अबुल मआली को हिसार तथा उसके निकटवर्ती परगनों का शासक नियुक्त किया तथा अकबर को पंजाब का शासक बना दिया। इस समय अकबर 14 साल का बालक था। अतः बैराम खाँ को उसका संरक्षक नियुक्त किया गया।

नवम्बर 1555 में बैराम खाँ अकबर को लेकर पंजाब के लिए रवाना हो गया। जब बैराम खाँ और अकबर सरहिंद पहुंचे तो उस्ताद अजीज सीस्तानी जिसे रूमी खाँ की उपाधि प्राप्त थी, अकबर की सेवा में आ गया। रूमी खाँ तोपें चलाने में बड़ा नियुक्त था। उसके आ जाने से अकबर और बैराम खाँ की शक्ति काफी बढ़ गई।

उन्हीं दिनों हिसार फिरोजा से अतका खाँ तथा कुछ अन्य अमीर भी अकबर की सेवा में उपस्थित हुए। जब अकबर का सामान सरहिंद पहुंचा तो वे समस्त शाही सेवक जो शाह अबुल मआली के साथ थे तथा उसके व्यवहार से नाराज थे, शाह अबुल से आज्ञा प्राप्त किए बिना ही अकबर की सेवा में चले आए। इन लोगों में मुहम्मद कुली खाँ बरलास, मुसाहिब बेग तथा अन्य अमीर शामिल थे।

अकबर के आदेश से इन अमीरों का स्वागत किया गया तथा उन्हें अकबर के दरबार में उचित सम्मान दिया गया।

  – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नकली हुमायूँ शाही महल की छत पर घूमता रहा (99)

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नकली हुमायूँ शाही महल की छत पर घूमता रहा

हुमायूँ दिल्ली के लाल किले में पुस्तकालय की सीढ़ियों से फिसल कर मर गया। कहीं दुश्मन इस खबर को सुनकर हमला न कर दें, इसलिए नकली हुमायूँ सत्रह दिन तक शाही महल की छत पर घूमता रहा!

जब शाह अबुल मआली ने सुना कि बैराम खाँ हुमायूँ के बेटे जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर को लेकर सरहिंद आ पहुंचा है तो शाह अबुल का माथा ठनका। हालांकि हुमायूँ ने शाह अबुल को हिसार तथा उसके निकटवर्ती परगनों का शासक नियुक्त किया था और शाह अबुल बिना किसी कठिनाई के हिसार जा सकता था किंतु इस कार्य में उसे अपना अपमान अनुभव हुआ था।

शाह अबुल चाहता था कि वह पंजाब का शासक बना रहे। पंजाब के शासक के रूप में वह अफगानिस्तान और दिल्ली के बीच के मार्ग पर कब्जा बनाए रख सकता था और हिंदुस्तान के साथ-साथ अफगानिस्तान के अमीरों से भी सम्पर्क बनाए रख सकता था किंतु हिसार चले जाने पर ऐसा होना संभव नहीं था। अपने स्थानांतरण से क्षुब्ध शाह अबुल मआली ने अकबर से विद्रोह करने का मन बनाया तथा अकबर से मिलने के लिए उसकी सेवा में उपस्थित नहीं हुआ।

अकबर ने शीघ्र ही अनुभव कर लिया कि उसके पिता हुमायूँ को शाह अबुल मआली के सम्बन्ध में मिल रही शिकायतें बिल्कुल सही हैं तथा वह शाही आदेशों की अवहेलना करके स्वच्छंद व्यवहार कर रहा है। जब अकबर का काफिला सुल्तानपुर नदी के पास पहुंचा तब शाह अबुल मआली के कई अमीर शाह अबुल मआली का शिविर छोड़कर अकबर की तरफ चले आए। इस पर विवश होकर शाह अबुल मआली को भी अकबर के स्वागत के लिए सुल्तानपुर नदी के तट पर उपस्थित होना पड़ा।

जब शाह अबुल मआली अकबर के शिविर में पहुंचा तो शाह अबुल को अपेक्षा थी कि उसे अकबर के कालीन पर बैठाया जाएगा किंतु उसने देखा कि दरबारियों के बैठने के लिए अलग-अलग कालीन बिछाए गए हैं तथा शाह अबुल मआली को अकबर से बहुत दूर की पंक्ति में स्थान दिया गया है। इस व्यवस्था को देखकर शाह अबुल मआली और अधिक नाराज हो गया तथा दरबार की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद अपनी तबियत खराब होने का बहाना करके अकबर से छुट्टी लेकर अपने डेरे पर चला गया।

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अपने डेरे पर पहुंच कर शाह अबुल मआली ने अकबर को पत्र भिजवाया कि सारा संसार जानता है कि आपके पिता बादशाह हुमायूँ के दरबार में मेरा क्या स्थान है! आपको भी याद होगा कि जूईशाही में शिकार के समय मैंने बादशाह के साथ एक ही स्थान पर बैठकर एक ही थाली में भोजन किया था। जबकि आपको अलग थाल दिया गया था और आपको बादशाह से दूर बैठाया गया था। मेरे इस सम्मान का विचार न करके आपने न जाने क्यों मुझे अलग कालीन पर बैठाया और मेरे लिए अलग दस्तरखान लगवाया। शाह अबुल मआली ने यह संदेश हाजी सीस्तानी के हाथों अकबर को भिजवाया। मआली का पत्र पढ़कर अकबर मुस्कुराया और उसने हाजी सीस्तानी से कहा कि सल्तनत के नियम एक बात हैं और स्नेह के नियम दूसरी बात हैं। मेरे पास तुम्हारा वह स्थान नहीं है जो बादशाह के पास है। यह आश्चर्य की बात है कि तुम इन दोनों स्थितियों को अलग-अलग नहीं मानते! जब हाजी सीस्तानी अकबर का प्रत्युत्तर लेकर लौटा तो शाह अबुल मआली बड़ा लज्जित हुआ और चुपचाप हिसार चला गया। इसके बाद अकबर ने सिकंदरशाह सूरी पर अभियान आरम्भ किया।

इस समय सिकंदरशाह सूरी मानकोट के पास की पहाड़ियों में शरण लिए हुए था। जब सिकंदरशाह सूरी ने सुना कि अकबर तथा बैराम खाँ मानकोट की तरफ आ रहे हैं तो सिकंदरशाह सूरी फिर से पहाड़ियों में भाग गया।

अकबर तथा बैराम खाँ अपनी सेना लेकर सिकंदरशाह की तरफ रवाना हुए किंतु जब उनका डेरा कालानूर में लगा हुआ था तब उन्हें एक ऐसा समाचार मिला जिसे सुनकर अकबर तथा बैराम खाँ के पैरों के नीचे की धरती खिसक गई। यह समाचार बादशाह हुमायूँ की आकस्मिक मृत्यु के सम्बन्ध में था जिसे सुनकर एकाएक विश्वास करना कठिन था।

अबुल फजल ने अकबरनामा में लिखा है कि एक दिन हुमायूँ सायंकाल में पुस्तकालय की छत पर चढ़ा। उस समय बादशाह से मिलने के लिए बहुत से लोग पुस्तकालय के निकट स्थित मस्जिद के बाहर एकत्रित थे। इनमें से कुछ लोग मक्का, काबुल एवं गुजरात से आए थे। हुमायूँ बहुत देर तक इन लोगों से बात करता रहा।

इसके बाद हुमायूँ ने नक्षत्रों की गणना करने वालों को बुलाया। हुमायूँ का विचार था कि कुछ ही दिनों में शुक्र तारा उदय होने वाला है। अतः हुमायू उनसे गणना करवाना चाहता था कि शुक्र तारा किस दिन उदय होगा ताकि उस दिन वह एक बड़ा दरबार आयोजित करके अमीरों की वेतन-वृद्धि करे।

नजूमियों से विचार-विमर्श करने के बाद हुमायूँ पुस्तकालय से नीचे उतरने लगा। जब हुमायूँ दूसरी सीढ़ी पर था, तब उसने मिस्कीन नामक एक मुकरी की अजान सुनी। अबुल फजल के अनुसार अभी अजान का वक्त नहीं हुआ था किंतु फिर भी अजान को आदर देने के लिए बादशाह ने वहीं पर बैठ जाने का प्रयास किया।

जनवरी का महीना होने से शाम जल्दी हो गई थी तथा कुछ अंधेरा भी हो गया था। जीने की सीढ़ियां खड़ी थीं और पत्थर चिकने थे। इसलिए हुमायूँ का पैर जामे में फंस गया और वह अपने पैर सीढ़ियों पर नहीं जमा सका। संतुलन बिगड़ने से हुमायूँ की छड़ी फिसल गई और हुमायूँ सिर के बल नीचे गिर पड़ा। उसकी दायीं कनपटी में बड़ी चोट आई और उसके दाएं कान से खून की कुछ बूंदें गिरीं।

हुमायूँ ने तत्काल ही अकबर के नाम एक पत्र लिखा और नजरी शेख कुली के हाथ अकबर को भिजवा दिया। अली कुली खाँ ने उसी दिन दिल्ली की सुरक्षा कड़ी कर दी किंतु कुछ इस तरह कि किसी को कानों-कान खबर न हो कि हुआ क्या है!

हुमायूँ की मृत्यु के पीछे एक दृष्टिकोण और भी है, वह है अफीम की पिनक। हुमायूँ चौबीसों घण्टे अफीम की पिनक में रहता था। पर्याप्त संभव है कि अफीम के नशे के कारण ही हुमायूँ का पैर सीढ़ियों पर लड़खड़ा गया और हुमायूँ गिर कर मर गया। पी. एन. ओक ने इसके सम्बन्ध में लिखा भी है। 

किसी भी स्रोत से यह विश्वनीय जानकारी नहीं मिलती कि हुमायूँ सीढ़ियों से किस दिन गिरा तथा उसकी मृत्यु किस दिन हुई। क्योंकि कई दिनों तक इस दुर्घटना को छिपाया गया। अबुल फजल ने लिखा है कि 17 दिन तक इस दुर्घटना को छिपाया गया तथा इस दौरान मुल्ला बेकसी नामक एक अमीर को हुमायूँ के कपड़े पहनाकर महल की छत पर बिठाया जाता रहा ताकि लोग नकली हुमायूँ को देखकर विश्वास करते रहें कि बादशाह अपने महल में मौजूद है। मुल्ला बेकसी की कद-काठी एवं चेहरा-मोहरा हुमायूं से मेल खाते थे।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर के बेटे अदृश्य हो गए (100)

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बाबर के बेटे अदृश्य हो गए

हुमायूँ की मृत्यु के साथ ही बाबर के बेटे अदृश्य हो गए। बाबर के चौथे बेटे हिन्दाल को बाबर के दूसरे बेटे कामरान ने मार डाला था। बाबर के दूसरे बेटे कामरान को हुमायूँ ने आंखें फोड़कर मक्का भेज दिया था। बाबर के तीसरे बेटे मिर्जा अस्करी को भी भीख मांगने के लिए मक्का भेजा जा चुका था। बाबर का चौथा बेटा हुमायूँ शाही महल के पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरकर स्वयं ही मर गया था। हालांकि बाबर के बेटे अदृश्य हो गए तथापि बाबर की कई पीढ़ियां आगे भी लगभग 300 साल तक भारत की बादशाह बनी रहने वाली थीं।

जनवरी 1556 के अंतिम दिनों में हुमायूँ दिल्ली की दीनपनाह किले के पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरकर असमय ही मृत्यु को प्राप्त हो गया। उसकी मृत्यु की सूचना कई दिनों तक दिल्ली की जनता से छिपाई गई तथा एक संदेशवाहक को जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर के पास भेजकर उसे हुमायूँ की मृत्यु की सूचना पहुंचाई गई। एक नकली हुमायूँ सत्रह दिन तक शाही महल की छत पर घुमाया जाता रहा।

हुमायूँ का 14 वर्षीय पुत्र जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर उस समय बैराम खाँ बेग के संरक्षण में पंजाब के कालानूर नामक पर स्थित युद्ध-शिविर में था। 11 फरवरी 1556 को गुलबदन बेगम के पति खिज्र ख्वाजा खाँ तथा दिल्ली के कोतवाल अली कुली खाँ शैबानी आदि ने मिलकर अकबर के नाम का खुतबा पढ़ा। उस दिन लोगों को ज्ञात हुआ कि बादहशाह हुमायूँ का इंतकाल हो गया है।

हुमायूँ का शव दीनपनाह के बाहर एक भवन के तहखाने में दफना दिया गया। वहाँ यह शव लगभग साढ़े तेरह वर्ष तक रखा रहा। कहा जाता है कि ई.1569 में हमीदा बानू बेगम ने हुमायूँ का मकबरा नाम से एक नया भवन बनवाया। जब यह भवन बनकर पूरा हो गया तब हुमायूँ का शव इस भवन के तहखाने में लाकर दफनाया गया।

पी. एन. ओक आदि कुछ लेखकों का मानना है कि हुमायूँ का मकबरा एक प्राचीन अष्टकोणीय हिन्दू भवन था जिसे हुमायूँ की विधवा हमीदा बानू बेगम ने अफगानिस्तान के हेरात शहर में रहने वाले एक वास्तुकार मीरक मिर्जा घियास की सहायता से मुगल शैली की इमारत की आकृति प्रदान करवाई।

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हुमायूँ के निधन के साथ ही बाबर का सबसे बड़ा बेटा भी भारत के राजनीतिक परिदृश्य से विलुप्त हो गया और बाबर के बेटों की पूरी पीढ़ी भारतीय राजनीतिक परिदृश्य के नेतृत्व में चली गई। पाठकों को स्मरण होगा कि बाबर तथा गुलरुख बेगम का पुत्र मिर्जा कामरान अंधा करके मक्का भेजा जा चुका था। बाबर तथा गुलरुख बेगम का दूसरा पुत्र मिर्जा अस्करी भी कई साल पहले ही अफगानिस्तान से निष्कासित करके मक्का भेजा जा चुका था। बाबर के इन दोनों बेटों का मक्का में क्या हुआ, इसके बारे में विश्वसनीय विवरण उपलब्ध नहीं है। अलग-अलग लोगों ने उनके निधन की अलग-अलग तिथियां दी हैं। बाबर का चौथे नम्बर का जीवित पुत्र मिर्जा हिंदाल ई.1551 में कामरान की सेना द्वारा मारा जा चुका था। वह दिलदार बेगम का पुत्र था किंतु उसका तथा दिलदार बेगम की पुत्री गुलबदन बेगम का पालन पोषण हुमायूँ की माता माहम सुल्ताना बेगम ने किया था। इस समय केवल गुलबदन बेगम ही बाबर की इकलौती संतान थी जो बाबर के कुनबे के साथ मौजूद थी। तुर्की भाषा में हुमायूँ शब्द का अर्थ सौभाग्यशाली होता है किंतु कुदरत ने हुमायूँ के भाग्य में सौभाग्य के दिन बहुत कम अंकित किए थे।

कहा जाता है कि बाबर ने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया था किंतु हुमायूँ का संघर्ष बाबर से कम नहीं था!

हुमायूँ ई.1530 में 22 वर्ष की आयु में बादशाह बना था तथा ई.1556 में 48 वर्ष की आयु में मृत्यु को प्राप्त हुआ था। इन 26 सालों में से 15 साल तक वह भारत से निर्वासित रहा। अतः भारतीय क्षेत्रों पर उसे केवल 11 साल शासन करने का अवसर मिला। इस अवधि में से भी उसे अधिकांश समय गुजरात के शासक बहादुरशाह और बिहार के शासक शेरशाह सूरी से लड़ने में लगाना पड़ा। फिर भी कुछ इतिहासकारों ने उसे महान् भवन निर्माता बताया है।

इन इतिहासकारों के अनुसार हुमायूँ ने दिल्ली में दीनपनाह नामक दुर्ग, दीनपनाह के भीतर शेरमण्डल नामक पुस्तकालय तथा आगरा एवं फतेहाबाद में एक-एक मस्जिद बनवाई। ये कोई बड़ी उपलब्धियां नहीं हैं। जिसे दीनपनाह दुर्ग बताया जा रहा है, वह एक पुराना हिन्दू किला है।

यह उस स्थान पर बना हुआ है जहाँ हुमायूं के समय से लगभग पांच हजार साल पहले पाण्डवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ स्थित थी। दीनपनाह के परिसर से मौर्य एवं गुप्त कालीन मुद्राएं, मूर्तियां एवं बर्तन आदि मिले हैं तथा भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर भी मिला है जिसे कुंती मंदिर कहते हैं।

अतः प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि दीनपनाह दुर्ग हुमायूँ ने नहीं बनवाया था। उसने तो पहले से ही बने प्राचीन दुर्ग में कुछ महलों का निर्माण करवाकर उसका नाम दीनपनाह रखा था। जब ई.1540 में शेरशाह सूरी ने हुमायूँ का राज्य भंग कर दिया तब शेरशाह के पुत्र ने दीनपनाह के परकोटे का निर्माण करवाकर उसे सलीमगढ़ नाम दिया। 

इसी प्रकार दीनपनाह में स्थित शेरमण्डल एक अष्टकोणीय दो-मंजिला लघु भवन है जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे हुमायूँ ने बनवाया। इस भवन की अष्टकोणीय आकृति ही बताती है कि यह किसी हिन्दू राजा द्वारा बनाया गया था। हुमायूँ ने तो उसमें अपना पुस्तकालय स्थापित किया था। कुछ इतिहासकार कहते हैं कि इसे बाबर ने बनवाना आरम्भ किया था और शेरशाह सूरी दावा करता था कि इसका निर्माण शेरशाह सूरी ने करवाया तथा इसका नाम शेरमण्डल रखा।

इसी शेरमण्डल के पास एक स्नानागार स्थित है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह एक वेधाशाला का बचा हुआ हिस्सा है जिसका निर्माण हुमायूँ द्वारा करवाना आरम्भ किया गया था। उनके अनुसार हुमायूँ को गणित तथा नक्षत्रविद्या का अच्छा ज्ञान था। इस ज्ञान का उपयोग करने के लिए उसने दीनपनाह दुर्ग में एक वेधशाला का निर्माण करवाने का निश्चय किया। इसके लिए उसने समरकंद आदि स्थानों से अनेक प्रकार के यंत्र मंगवाए किंतु शेरशाह सूरी द्वारा अचानक ही उसका राज्य भंग कर दिए जाने के कारण वह वेधाशाला का निर्माण पूरा नहीं करवा सका।

अबुल फजल ने अकबरनामा में लिखा है कि वेधशाला के लिए कई स्थानों का चुनाव किया गया। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वह भारत में एक नहीं अपितु कई वेधशालाएं बनवाना चाहता था। कहा नहीं जा सकता कि अबुल फजल की इस बात में कितनी सच्चाई है।

हुमायूँ ने आगरा में एक मस्जिद बनवाई थी जिसके भग्नावशेष ही शेष हैं। इसी प्रकार हिसार के फतेहाबाद कस्बे में हुमायूँ ने एक मस्जिद का निर्माण करवाया था, इसे हुमायूँ मस्जिद कहा जाता है। हुमायूँ ने यह मस्जिद दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगक द्वारा निर्मित लाट के निकट बनवाई।

इस मस्जिद में एक लम्बा चौक है। इस मस्जिद के पश्चिम में लाखौरी ईंटों से बना हुआ एक पर्दा है जिस पर एक मेहराब बनी हुई है। इस पर एक शिलालेख लगा हुआ है जिसमें बादशाह हूमायूं की प्रशंसा की गई है। यह मस्जिद ई.1529 में बननी आरम्भ हुई थी किंतु हुमायूँ के भारत से चले जाने के कारण अधूरी छूट गई थी। ई.1555 में जब हुमायूँ लौट कर आया तब उसने इस मस्जिद का निर्माण पूरा करवाया।

इन तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि हुमायूँ ने भारत में दो-चार मस्जिदों के अतिरिक्त ऐसा कुछ नहीं बनवाया था जिसे हुमायूँ द्वारा निर्मित मौलिक निर्माण कहा जा सके। जैसे ही बाबर के बेटे अदृश्य हुए, वैसे ही भारत में मुगल सल्तनत एक बार फिर से हिचकोले खाने लगी।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शत्रुओं और समस्याओं की लम्बी सूची छोड़ गया बाबर का बेटा (101)

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शत्रुओं और समस्याओं - www.bharatkaitihas.com
शत्रुओं और समस्याओं की लम्बी सूची छोड़ गया बाबर का बेटा

बाबर का बेटा हुमायूँ तो अचानक ही इस असार संसार से चला गया किंतु वह अपने के पुत्र जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर के लिए शत्रुओं और समस्याओं की लम्बी सूची छोड़ गया।

हुमायूँ तो अचानक ही इस असार संसार से चला गया था किंतु अपने वंशजों के लिए शत्रुओं एवं समस्याओं की लम्बी सूची छोड़ गया था, जिनसे भाग्य और पुरुषार्थ के बल पर ही पार पाया जा सकता था। हुमायूँ की मृत्यु के समय साढ़े तेरह साल का अकबर दिल्ली से दूर था किंतु मिर्जा कामरान का एक पुत्र अबुल कासिम दिल्ली में मौजूद था।

हुमायूँ के विश्वस्त अमीरों को संदेह हुआ कि कहीं गद्दार किस्म के अमीर कामरान के पुत्र को बादशाह घोषित करने का षड़यंत्र न रचें। इसलिए कामरान के पुत्र को तत्काल अकबर के पास स्वामिभक्ति प्रकट करने के बहाने दिल्ली से दूर भेज दिया गया।

बाबर ने अत्यंत विषम परिस्थितियों में अफगानिस्तान से आकर भारत में मुगलिया सल्तनत की नींव डाली थी किंतु हुमायूँ ने अपने भाइयों की गद्दारी के कारण उस सल्तनत को शेरशाह सूरी के हाथों खो दिया था। हुमायूँ के माथे पर लगभग 15 साल तक उस सल्तनत को गंवा देने का कलंक लगा रहा किंतु अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले हुमायूँ ने उस कलंक को धो दिया।

फिर भी हुमायूँ द्वारा भारत में फिर से खड़ी की गई मुगलिया सल्तनत कागज के महल से अधिक मजबूत नहीं थी। शेरशाह सूरी का भतीजा सिकंदरशाह सूरी शिवालिक की पहाड़ियों में तलवारें लहरा रहा था और हिसार के गवर्नर शाह अबुल मआली के बगावती तेवर किसी से छिपे नहीं थे।

बाबर का भतीजा मिर्जा सुलेमान जिसे हुमायूँ ने बदख्शां का शासक बनाया था, हुमायूँ की राजधानी काबुल और कांधार को हथियाने की योजना पर काम कर रहा था। 14 साल का अकबर इस समय पूरी तरह से बैराम खाँ बेग की दया पर निर्भर था और मुगलिया हरम भारत की भूमि से 1200 किलोमीटर दूर काबुल के किले में बंद रहककर भारत बुलाए जाने की प्रतीक्षा कर रहा था।

अकबर के सौभाग्य से हुमायूँ ने भारत-अभियान पर आने से पहले काबुल, कांधार और गजनी की सुरक्षा का बहुत मजबूत प्रबंध किया था। राजधानी काबुल तथा हुमायूँ का हरम मुनीम खाँ के संरक्षण में थे जो कि हुमायूँ का सर्वाधिक विश्वस्त अमीर था। हुमायूँ ने उसे काबुल के साथ-साथ गजनी और हिंदूकुश पर्वत से लेकर सिंधु नदी तक का क्षेत्र सौंप रखा था। ताकि किसी भी हालत में अफगानिस्तान तथा हिंदुस्तान के बीच का सम्पर्क न टूट सके।

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हुमायूँ ने अफगानिस्तान में मुगलों की दूसरी राजधानी कहे जाने वाले कांधार की जागीर बैराम खाँ बेग को दे रखी थी किंतु बैराम खाँ बेग हुमायूँ के साथ भारत चला आया था, इसलिए बैराम खाँ ने शाह मुहम्मद नामक एक विश्वस्त अमीर को कांधार का प्रबंध सौंप रखा था। शाह मुहम्मद एक योग्य सेनापति था, इसलिए यह विश्वास किया जा सकता था कि उसके जीवित रहते कोई भी मुगल, उज्बेक अथवा अफगान; कांधार के किले पर अधिकार नहीं कर सकता था। हुमायूँ के मरते ही भारत में हुमायूँ की वर्तमान राजधानी दिल्ली को अली कुली खाँ शैबानी ने अपनी सुरक्षा में ले लिया था। संभल का शासन भी उसी के पास था। हुमायूँ की पूर्व राजधानी आगरा को इसकन्दर खाँ उजबेक ने अपनी सुरक्षा में कस रखा था। इसी प्रकार हुमायूँ ने कालपी में अब्दुल्ला खाँ उज्बेग को, मेवात में तर्दी खाँ बेग को, अलीगढ़ में किया खाँ को और बयाना में हैदर मुहम्मद खाँ को नियुक्त कर रखा था। हालांकि हुमायूँ के जीते जी इनमें से किसी ने भी शाही इच्छा के विपरीत काम नहीं किया था किंतु बदली हुई परिस्थिति में कौन सा बेग अथवा अमीर किस दिन बागी हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता था।

शाह अबुल मआली के बगावती तेवरों से इन अमीरों के शत्रु खेमे में जाने की आशंकाएं बढ़ गई थीं।

हुमायूँ ने अकबर के लिए काबुल में दो बड़ी चुनौतियां छोड़ी थी। ये चुनौतियां थीं चूचक बेगम के दो पुत्र जो इस समय काबुल के किले में पल रहे थे। कहने को ये अकबर के सौतेले भाई थे किंतु ये दोनों भी अकबर के लिए उतने ही खतरनाक सिद्ध हो सकते थे जितने कि बाबर के भाई बाबर के लिए तथा हुमायूँ के भाई हुमायूँ के लिए खतरनाक सिद्ध हुए थे। बाबर के वंशजों के लिए भारत में शत्रुओं और समस्याओं की कभी कमी नहीं रही।

हुमायूँ को मरे हुए आज 465 वर्ष बीत चुके हैं, इस बीच भारतीय इतिहास की धारा ने कई विकट मोड़ देखे हैं किंतु भारत के अधिकांश लोग आज भी हुमायूँ को नरम-दिल बादशाह के रूप में याद करते हैं। वैसे भी हुमायूँ ने भारत का राज्य अफगानों से छीना था न कि हिंदुओं से।

भारत के लोगों के लिए अफगानियों के राज्य से मुगलों का राज्य कई अर्थों में अच्छा था। भारत के हिंदुओं पर हुमायूँ ने उसी प्रकार कोई अत्याचार नहीं किया जिस प्रकार उसने अफगानिस्तान अथवा भारत के मुसलमानों पर कोई अत्याचार नहीं किया।

हुमायूँ का स्वयं का जीवन अपने शत्रुओं, अपने भाइयों एवं मुगल अमीरों के षड़यंत्रों तथा विद्रोहों से इतना संत्रस्त था कि उसे भारत की प्रजा पर वास्तविक शासन करने का समय ही नहीं मिला था, इसलिए अत्याचार करने की तो संभावना ही नहीं थी।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अमेजन पर उपलब्ध पुस्तकें

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अमेजन पर उपलब्ध पुस्तकें

इस पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित एवं अमेजन पर उपलब्ध पुस्तकें लिंक सहित दी गई हैं। इन पुस्तकों के शीर्षक पर क्लिक करके अमेजन डॉट इन के स्टोर तक पहुंचा जा सकता है।

विश्व इतिहास

  1. हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया Hard Cover
  2. पोप के देश में ग्यारह दिन Hard Cover
  3. कैसे बना था पाकिस्तान Hard Cover
    इतिहास पुरुष/ जीवनियाँ
  4. सरदार वल्लभ भाई पटेल: प्रेरक एवं रोचक प्रसंग Paper back
  5. हल्दीघाटी का युद्ध और महाराणा प्रताप Paper back
  6. अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान Paper back
  7. छत्रपति शिवाजी संघर्ष एवं उपलब्धियाँ Paper back
  8. छत्रपति शिवाजी संघर्ष एवं उपलब्धियाँ Hard Cover
  9. महाराजा सूरजमल का युग एवं प्रवृत्तियाँ Paper back
  10. युग निर्माता राव जोधा Paper back
  11. युग निर्माता राव जोधा Hard Cover
  12. युग निर्माता सवाई जयसिंह Paper back
    सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास
  13. भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास
  14. भारतीय ज्योतिष एवं कालगणना का इतिहास Paper back
  15. भारतीय ज्योतिष एवं कालगणना का इतिहास Hard Cover
  16. भारत की लुप्त सभ्यताएँ Paper back
  17. क्वाण्टम ब्रह्माण्ड और वेदान्त Paper back
    मध्यकालीन भारत का इतिहास
  18. लाल किले की दर्द भरी दास्तान Paper back
  19. लाल किले की दर्दभरी दास्तान Hard Cover
  20. तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर Hard Cover
  21. बाबर के बेटों की दर्दभरी दास्तान Paper back
  22. दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान Hard Cover
  23. भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या और हिन्दू प्रतिरोध का इतिहास Hard back
  24. विजयनगर साम्राज्य का इतिहास Paper back
  25. भारत के मुगलकालीन प्रमुख भवन Paper back
    राजस्थान का इतिहास
  26. ब्रिटिश शासन में राजपूताने की रोचक एवं ऐतिहासिक घटनाएँ Paper back
  27. ब्रिटिश शासन में राजपूताने की रोचक एवं ऐतिहासिक घटनाएँ Hard Cover
  28. राजपूताने के सक्षम राज्यों का भारत संघ में विलय एवं राजस्थान में एकीकरण Hard Cover
  29. राजशाही का अंत Hard Cover
  30. राजस्थान में राजशाही का अंत (राजशाही का अंत का पुनर्मुद्रण) Hard Cover
  31. जालोर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास Hard Cover
  32. जालोर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास Paper back
  33. नागौर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास Hard Cover
  34. किशनगढ़ राज्य का इतिहास Hard Cover
  35. बीकानेर का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास, Paper back
  36. राष्ट्रीय राजनीति में मेवाड़ का प्रभाव, Paper back
  37. अजमेर का वृहत् इतिहास Paper back
  38. Agrarian Discontentment In Bikaner Riyasat Paper back
    राजस्थान की संस्कृति, पर्यटन एवं विविध
  39. राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय Paper back
  40. राजस्थान के प्रमुख अभिलेखागार Paper back
  41. राजस्थान में वन एवं वन्यजीवन Paper back
  42. राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति Paper back
  43. राजस्थान में पर्यटन स्थलों का प्रबंधन तथा लोककलाओं का संरक्षण Hard Cover
  44. राजस्थान के तीज, त्यौहार एवं व्रत Paper back
  45. कर्मयोगी राजस्थानी Hard Cover
  46. राजस्थान लेखक परिचय कोश Hard Cover
  47. Cultural Tourism in Marwar Region of Thar Desert Hard Cover
    हिन्दी साहित्य
  48. चाणक्य की शपथ (हिन्दी नाटक) Paper back
  49. उर्दू बीबी की मौत Paper back
  50. सब काहू से बैर (हिन्दी व्यंग्य संग्रह) Paper back
  51. संघर्ष (ऐतिहासिक उपन्यास) Hard Cover
  52. मोहनजोदरो की नृत्यांगना (संघर्ष उपन्यास का पुनर्मुद्रण) Paper back
  53. डॉ. मोहनलाल गुप्ताजी के उपन्यासों में सौन्दर्य दृष्टि Hard Cover
  54. पासवान गुलाबराय (हिन्दी ऐतिहासिक उपन्यास) Paper back
  55. चित्रकूट का चातक (ऐतिहासिक उपन्यास) Paper back
  56. चित्रकूट का चातक (ऐतिहासिक उपन्यास) Hard Cover
  57. भगवान कल्याणराय के आंसू और महाराजा रूपसिंह राठौड़ (ऐतिहासिक उपन्यास) Hard Cover
  58. सपनों का राजकुमार और अन्य नाटक Paper back
  59. एकलगिढ दाढाळै री वा़त, (डिंगल भाषा के 400 वर्ष पुराने व्यंग्य का हिन्दी सारांश) Paper back
  60. घर चलो माँ (हिन्दी कहानी संग्रह) Paper back
  61. घर चलो माँ (हिन्दी कहानी संग्रह) Hard Cover
    पुराणों की कथाएँ
  62. पुराणोंकी कथाएँ-1: सृष्टि निर्माण की कथाएँ Paper back
  63. पुराणों की कथाएँ-2: इक्ष्वाकु राजाओं की कथाएँ Paper back
  64. पुराणों की कथाएँ-3: चन्द्रवंशी राजाओं की कथाएँ Paper back
  65. हिन्दुओं के त्यौहार एवं व्रत Paperback

अनुक्रमणिका – रोमन साम्राज्य का इतिहास एवं इटली का एकीकरण

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अनुक्रमणिका - रोमन साम्राज्य का इतिहास एवं इटली का एकीकरण

अनुक्रमणिका – रोमन साम्राज्य का इतिहास एवं इटली का एकीकरण पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक ‘पोप के देश में ग्यारह दिन’ के रोमन इतिहास सम्बन्धित अध्यायों के शीर्षक उपलब्ध कराए गए हैं। इन शीर्षकों पर क्लिक करके उन अध्यायों को पढ़ा जा सकता है।

लेखकीय 

1. यूरोप का भारत इटली

2. रिपब्बलिका इटेलियाना

3. रोमन् सभ्यता की स्थापना एवं विस्तार

4. रोम का प्राचीन धर्म

5. इटली में पाइथोगोरियन ब्रदरहुड की स्थापना

6. महान् रोमन गणराज्य

7. रोमन गणराज्य का नैतिक पतन

8. जूलियस सीजर एवं क्लियोपैट्रा

9. महान् रोमन साम्राज्य का उदय

10. ईसा मसीह को सूली

11. महान् रोमन साम्राज्य के शासक

12. दो ऑगस्टस तथा दो सीजर

13. रोमन साम्राज्य में ईसाइयों को प्राणदण्ड

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14. महान् रोमन साम्राज्य का विभाजन

15. पश्चिमी रोमन साम्राज्य

16. पूर्वी रोमन साम्राज्य

17. ईसाई धर्म का अंतर्द्वन्द्व

18. पोप का प्राकट्य एवं उसका शक्ति विस्तार

19. महान् रोमन साम्राज्य का दुःखद अंत

20. महान् रोमन साम्राज्य का द्वितीय संस्करण

21. पवित्र रोमन साम्राज्य का प्रथम संस्करण

22. पवित्र रोमन साम्राज्य का द्वितीय संस्करण

23. गिरजाघरों की गॉथिक शैली का विकास

24. वेनिस शहर की दुविधा

25. हिलाल के खिलाफ क्रॉस का क्रूसेड

26. पोप एवं पवित्र रोमन सम्राट में टकराव का चरम

27. ईसाई संघ द्वारा इनक्विजिशन की स्थापना

28. पोप की प्रतिष्ठा को धक्का

29. पूर्वी रोमन साम्राज्य का अंत

30. इटली में रिनेंसाँ नामक युग का प्रारम्भ

31. धर्म एवं विज्ञान के बीच संघर्ष

32. कैथोलिक धर्म से अलग सम्प्रदायों का उदय

33. यूरोपीय समाज में भेदभाव एवं शोषण

34. यूरोप में लोकतांत्रिक विचारों का उदय

35. यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय

36. पवित्र रोमन साम्राज्य के द्वितीय संस्करण का अन्त

37. इटली का एकीकरण

38. फासिज्म का नायक बैनितो मुसोलिनी

39. फासी-नाजी भाई-भाई

40. इटली में आधुनिक गणराज्य की स्थापना

41. रोमन कैथोलिक चर्च का इतिहास

42. रोमन कैथोलिक चर्च के प्रमुख सिद्धांत एवं शिक्षाएं

43. पोप

पोप के देश में ग्यारह दिन – अनुक्रमणिका

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पोप के देश में ग्यारह दिन – अनुक्रमणिका पृष्ठ पर उन अध्यायों के लिंक दिए गए हैं जिनमें लेखक द्वारा इटली के विभिन्न शहरों में अपने परिवार के साथ किए गए भ्रमण एवं अवलोकन का वर्णन किया गया है।

लेखकीय

1. दुनिया की नाभि की ओर

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पोप के देश में ग्यारह दिन – पुस्तक क्रय करने के लिए कृपया इमेज पर क्लिक करें।

2. रोम में पहला दिन – 17 मई 2019

3. रोम में दूसरा दिन – 18 मई 2019

4. रोम में तीसरा दिन – 19 मई 2019

5. रोम में चौथा दिन – 20 मई 2019

6. रोम में पांचवा दिन – 21 मई 2019

7. फ्लोरेंस में पहला दिन – 22 मई 2019

8. फ्लोरेंस में दूसरा दिन – 23 मई 2019

9. पीसा में एक दिन

10. फ्लोरेंस में तीसरा दिन – 24 मई 2019

11. वेनेजिया में पहला दिन – 25 मई 2019

12. वेनेजिया में दूसरा दिन – 26 मई 2019

13. वेनेजिया में तीसरा दिन – 27 मई 2019

14. इटली की धरती पर अंतिम दिन – 28 मई 2019

पोप के देश में ग्यारह दिन – अनुक्रमणिका में कुल चौदह लिंक दिए गए हैं। लिंक से जुड़े हुए पृष्ठों पर रोम, वेटिकन सिटी, पीसा, फ्लोरेंस एवं वेनिसिया आदि नगरों के भूगोल, इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व आदि का आंखों देखा विवरण लिखा गया है। इस पुस्तक का मुद्रित संस्करण भी उपलब्ध है जिसे इस पृष्ठ पर दिए गए चित्र पर क्लिक करके अमेजन डॉट इन से क्रय किया जा सकता है।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

छत्रपति शिवाजी संघर्ष एवं उपलब्धियाँ अनुक्रमणिका

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छत्रपति शिवाजी

छत्रपति शिवाजी भारत के इतिहास का चमकता हुआ ऐसा सितारा हैं जिनके प्रकाश से भारतीय गौरव सम्पूर्ण विश्व में प्रतिष्ठित है। इस आलेख शृंखला में छत्रपति शिवाजी के जीवन संघर्ष एवं उपलब्धियों के बारे में ऐतिहासिक जानकारियां दी गई हैं। पाठक नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करके सम्बन्धित अध्यायों को पढ़ सकते हैं।

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1.विषय प्रवेश     

2.शिवाजी के पूर्वज

3. शिवाजी का बाल्यकाल 

4. शिवाजी का सक्रिय राजनीति में प्रवेश  

5. अफजल खाँ का वध 

6. शाइस्ता खाँ को शिकस्त

7. सूरत की लूट 

8. मिर्जा राजा जयसिंह का अभियान

9. शिवाजी की आगरा यात्रा 

10. शिवाजी द्वारा औरंगजेब का विरोध

11. साल्हेर-मुल्हेर का युद्ध

12. सेनापति प्रताप राव का बलिदान  

13. शिवाजी का राज्याभिषेक 

14. शिवाजी के राज्य की शासन व्यवस्था 

15. मुगलों पर पुनः आक्रमण

16. शिवाजी का कर्नाटक अभियान 

17. सम्भाजी का दुराचरण 

 18. शिवाजी द्वारा जजिया का विरोध  

19. शिवाजी का निधन

20. शिवाजी के अभ्युदय का भारतीय राजनीति पर प्रभाव   

21. महाकवि भूषण की कविता में शिवाजी

यह सामग्री मुद्रित पुस्तक के रूप में भी उपलब्ध है जिसे अमेजन डॉट इन से क्रय किया जा सकता है। पुस्तक क्रय करने के लिए कृपया इमेज पर क्लिक करें।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

सरदार वल्लभ भाई पटेल : प्रेरक एवं रोचक प्रसंग – अनुक्रमणिका

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सरदार वल्लभ भाई पटेल प्रेरक एवं रोचक प्रसंग

इस पृष्ठ पर सरदार वल्लभ भाई पटेल : प्रेरक एवं रोचक प्रसंग पुस्तक की अनुक्रमणिका लिखी गई है। नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करके पाठक पूरा प्रसंग पढ़ सकते हैं। प्रत्येक प्रसंग के साथ इस पुस्तक का चित्र भी दिया गया है जिस पर क्लिक करके आप यह पुस्तक अमेजन से खरीद सकते हैं।

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प्राक्कथन – सरदार वल्लभ भाई पटेल

1. भगवान श्रीराम के वंशज थे सरदार वल्लभ भाई पटेल

2. मिठाई के लिये सबसे अंत में याद किये जाते थे वल्लभभाई और विट्ठलभाई

3. जलती हुई सलाख से अपना शरीर दाग लिया वल्लभभाई ने  

4. हँसने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देते थे वल्लभभाई 

5. किसी से भी विरोध हो जाने की चिंता नहीं करते थे वल्लभभाई

6. दो दंगाई पाड़ों ने सबको भगा दिया 

7. वल्लभभाई इंग्लैण्ड जाकर देखना चाहते थे कि उस देश में ऐसी क्या विशेषता है   ?

8. मुख्तारी की परीक्षा उत्तीर्ण करके स्वतंत्र वकील बन गये वल्लभभाई

9. बड़े भाई की सहायता के लिये गोधरा से बोरसद चले आये वल्लभभाई

10. मुकदमेबाजों के हथकण्डों का सूक्ष्मता से अध्ययन किया वल्लभभाई ने

11. निर्दोष रेलवे इंस्पेक्टर को जेल जाने से बचा लिया वल्लभभाई ने

12. नशेड़ी अंग्रेज मजिस्ट्रेट से निर्दोष सुनार के पक्ष में फैसला लिखवाया वल्लभभाई ने

13. वल्लभभाई के आगे सनकी अंग्रेज मजिस्ट्रेट को अपनी जिद्द छोड़नी पड़ी

14. अपनी जगह विट्ठलभाई को बैरिस्ट्री पढ़ने लंदन भेज दिया वल्लभभाई ने

15. अपनी चीज दूसरों को दे-देते थे वल्लभभाई  सरदार वल्लभ भाई पटेल

16. पत्नी की मृत्यु का तार मिलने पर भी कोर्ट में बहस करते रहे वल्लभभाई

17. पत्नी की मृत्यु भी बैरिस्टर बनने का संकल्प नहीं छुड़ा सकी  

18. यात्रा में ही रोमन कानून याद कर लिया वल्लभभाई ने 

19. सारे दिन या तो पैदल चलते या फिर पुस्तकें पढ़ते वल्लभभाई 

20. करमसद गांव के लड़के ने लंदन में धूम मचा दी

21. व्यावसायिक सफलता के समस्त गुर सीख लिये वल्लभभाई ने 

22. हाईकोर्ट में जज बनने की बजाय अहमदाबाद में प्रैक्टिस करने का निर्णय लिया वल्लभभाई ने 

23. फॉक्स के छक्के छुड़ा दिये वल्लभभाई ने  सरदार वल्लभ भाई पटेल

24. कानून की दुनिया में अजेय हो गये वल्लभभाई 

25. वल्लभभाई के दो प्रश्नों पर ही मजिस्ट्रेट ने उनके मुवक्किल को जमानत दे दी

26. श्रीमती वाडिया के कहने पर पटेल ने उसके पति को शर्त से मुक्त कर दिया

27. गांधी दीवान के पुत्र थे किंतु वल्लभभाई किसान की गुदड़ी में पले थे

28. प्लेग रोगियों की सेवा करते-करते स्वयं भी प्लेग की चपेट में आ गये पटेल

29. चम्पारन आंदोलन के बाद गांधी की ओर ध्यान गया पटेल का 

30. गोधरा में पहली बार मिले वल्लभभाई पटेल और मोहनदास गांधी

31. वल्लभभाई के प्रयासों से गुजरात में बेगार बंद हो गई 

32. खेड़ा आंदोलन में अंग्रेजी वेशभूषा त्याग दी वल्लभभाई ने 

33. सरदार पटेल ने सिद्ध कर दिया कि सत्याग्रह का मार्ग प्रभावकारी है

34. वल्लभभाई की बात मानकर भारतीय युवक अंग्रेजी सेना में सम्मिलित हो गए

35. गांधीजी ने बीमार होने के कारण असहयोग आंदोलन की बागडोर सरदार को सौंपी

36. असहयोग आंदोलन को सफल बनाने के लिये सरदार तथा उनके भाई ने वकालात छोड़ दी

37. पटेल के समर्थन के बाद ही देश ने सत्याग्रह आंदोलन बंद करने का निर्णय स्वीकार किया

48. वल्लभभाई के विरोध पर नागपुर कलक्टर ने झण्डा जुलूस पर से पाबंदी हटा ली

39. सरदार पटेल ने बोरसद में सरकारी मनमानी के विरुद्ध अभूतपूर्व आंदोलन चलाया

40. अहमदाबाद में 43 स्कूल खोलकर गोरी सरकार को करारा जवाब दिया वल्लभभाई ने

41. गुजरात की जनता ने पटेल को गरीब नवाज तथा अपना मसीहा कहा

42. सरदार पटेल ने गोरी सरकार से कहा, बारदोली में बाहरी मैं नहीं, आप हैं!

43. गोरी सरकार पागल हाथी है, इम इसके कान में मच्छर बनकर घुसेंगे

44. गोले-गोलियों वाली गोरी सरकार ढोल नगाड़ों की आवाज से डर गई

45. फटे चीथड़ों वाली ग्रामीण महिलाएं पटेल के भाल पर तिलक लगाती थीं 

46. गांधीजी ने जिस मंत्र को अपनाया, उसका प्रथम सफल परीक्षण सरदार पटेल ने किया

47. राजनैतिक मंच से चिल्लाने से क्रांति नहीं होती 

48. सरदार पटेल की वाणी में बाल गंगाधर तिलक की अनुगूंज सुनाई देती थी

49. बिहार के किसानों की दुर्दशा देखकर सरदार पटेल का हृदय रो उठा

50. गांधीजी की इच्छा देखकर पटेल ने कांग्रेस का अध्यक्ष बनने से मना कर दिया  

51. पटेल ने कहा, जब तोपों से गोले बरसते हैं, तभी इतिहास बनता है!

52. गांधीजी की दाण्डी यात्रा को सफल बनाने के लिये पटेल गांव-गांव घूमे

53. अंग्रेज कमिश्नर के स्वागत में खड़े होने से मना कर दिया सरदार पटेल ने

54. सिंह जेल में था और गीदड़ उसका घर खराब कर रहे थे

55. सरदार पटेल की सिंह-गर्जना से गोरी सरकार कांप उठी 

56. गांधी-इरविन पैक्ट से देश में उत्तेजना फैल गई   

57. सरदार को कराची सम्मेलन की अध्यक्षता का कांटों भरा ताज मिला

58. गोरों को पता नहीं था कि सरदार, हाड़-मांस से नहीं, लोहे से बने हैं!

59. निःस्वार्थ सेवा से लोहे का सरदार, सोने का सरदार हो गया

60. पटेल ने चुनावी टिकटों के बंटवारे के लिये मार्गदर्शी सिद्धांतों का निर्माण किया

61. नरीमन ने सरदार पटेल पर साम्प्रदायिक होने का आरोप लगाया

62. संकट की घड़ी में एक बार फिर सरदार पटेल ने गांधीजी का साथ दिया

63. वास्तविकता से आंखें मूंदकर गांधीजी का अंधानुकरण करते थे पटेल

64. भारत छोड़ो आंदोलन में जनता की प्रतिक्रिया पर सरदार पटेल को गर्व था

65. शिमला सम्मेलन में भाग लेने के लिये पटेल को जेल से रिहा किय गया

66. सरदार ने भारतीय सैनिकों और गोरी सरकार के बीच समझौता करवाया

67. प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गये सरदार पटेल  

68. सरदार पटेल का जवाब सुनकर विंस्टन चर्चिल को होश आया 

69. मुस्लिम लीग को गृह-मंत्रालय न देने पर अड़ गये सरदार पटेल

70. सरदार पटेल का मानना था कि वैवेल, भारत को और दस वर्ष तक गुलाम रखेगा

71. सरदार पटेल ने मुस्लिम लीग के मंत्री द्वारा प्रस्तुत बजट का विरोध किया

72. पटेल और नेहरू ने गांधीजी का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया  

73. सरदार मानते थे कि देश का विभाजन नहीं होता तो हमारे हाथ से सब कुछ चला जाता

75. पटेल ने शरणार्थियों के पुनर्वास के लिये दिन-रात एक कर दिये

76. सरदार पटेल पर आजादी की नाव को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी आने वाली थी

77. पटेल ने माउण्टबेटन से कहा, वे सारे रजवाड़े भारत की झोली में डाल दें

78. सरदार के लिये बड़ी चुनौती तैयार हो चुकी थी

79. कांग्रेस जानती थी कि लौह-पुरुष अपनी धोती समेट कर राजाओं के पीछे पड़ जायेगा

80. सरदार पटेल ने कोरफील्ड को इंग्लैण्ड के लिये डिस्पैच करवाया

81. सरदार पटेल ने बड़ौदा के राजा को गद्दी से उतार दिया

83. पटेल के मखमली दस्ताने युक्त हाथ राजाओं की भुजाओं पर कसने लगे

84. सरदार पटेल ने 551 रियासतों को आजादी से पहले ही भारत में मिला लिया

85. सरदार पटेल ने लक्षद्वीप को भारत में सम्मिलित कर लिया  

86. जूनागढ़ के नवाब ने पाकिस्तान में मिलने की घोषणा करके पटेल को चुनौती दी!

87. सरदार पटेल ने माउण्टबेटन का सुझाव मानने से मना कर दिया!

88. सरदार मानते थे कि हैदराबाद राज्य, भारत के पेट में नासूर की तरह था !

89. पटेल ने हैदराबाद रियासत में कांग्रेस को सत्याग्रह आंदोलन चलाने का निर्देश दिया!

90. पटेल ने कहा, माउण्टबेटन योजना तो घर चली गई है! 

91. काश्मीर की समस्या को यू.एन.ओ. में ले जाये जाने पर पटेल, जवाहरलाल से नाराज हो गये !

92. पटेल ने भोपाल नवाब को घुटने टेकने पर विवश कर दिया!

93. सरदार ने आईसीएस अधिकारियों को बनाये रखने का निर्णय लिया !

94. पटेल नहीं चाहते थे कि राजाओं के पास प्रजा को फांसी चढ़ाने का अधिकार हो!

95. पटेल ने देशी राज्यों को गठरी में बांध लिया !

96. सरदार पटेल ने राजाओं के साथ अत्यंत व्यावहारिक रुख अपनाया!

97. पटेल को राजाओं का धन नहीं, उनके राज्य चाहिये थे!

98. सरदार पटेल ने अलवर नरेश तेजसिंह को नजरबंद कर लिया !

99. सरदार पटेल ने भरतपुर महाराजा के भाग्य की रक्षा की!

100. पटेल ने वह कर दिखाया जो जर्मनी में बिस्मार्क ने तथा इटली में काबूर ने किया था!

101. अजमेर दंगों पर सरदार पटेल का जवाहरलाल नेहरू से विवाद हो गया!

102. पटेल ने नेहरू के प्रुमख निजी सचिव को पत्र लिखकर फटकार लगाई!

103. सरदार पटेल ने नेहरू को भी पत्र लिखकर नाराजगी व्यक्त की !

104. नेहरू ने सरदार पटेल को पत्र लिखकर अपना पद छोड़ने की पेशकश की !

105. गांधी की मृत्यु के साथ ही पटेल-नेहरू विवाद काल के गर्त में समा गया!  

106. डॉ. अम्बेडकर की नियुक्ति में पटेल की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी!

107. पटेल ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दिये जाने का विरोध किया!

108. पटेल ने अल्पसंख्यक आयोग स्थापित करने के निर्णय का विरोध किया!

109. पटेल ने नेहरू की व्यक्तिगत इच्छाओं को कांग्रेस पर हावी नहीं होने दिया!

110. सरदार पटेल ने प्राचीन सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया! 

111. पटेल ने शेख अब्दुल्ला की बोलती बंद कर दी!

112. काश्मीर, गोआ, चीन, तिब्बत और नेपाल को लेकर नेहरू से असंतुष्ट थे पटेल!

113. भविष्य के चीनी आक्रमण का पूर्वाभास था सरदार पटेल को!

114. वायुयान दुर्घटना ने देश को चिंता में डाल दिया !

115. आम आदमी की तरह पटेल का अंतिम संस्कार किया गया!

116. विष्णुगुप्त चाणक्य तथा समुद्रगुप्त की तरह राष्ट्र के निर्माता थे सरदार पटेल!

117. सोने का दिल लोहे के हाथ!

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