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बाबर का भारत आगमन

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बाबर का भारत आगमन

बाबर का भारत आगमन मध्यकालीन इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी। उसके आगमन के साथ ही दिल्ली में अंतिम सांस लेती हुई अफगान सत्ता दम तोड़ देती है तथा दिल्ली में नए मुस्लिम शासन की स्थापना होती है।

जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर

बाबर का वंश परिचय

 बाबर का पिता उमर शेख मिर्जा, तैमूर लंग का वंशज था। शेख मिर्जा फरगना के एक छोटे से राज्य का शासक था जो उसे अपने पूर्वजों से मिला था। बाबर की माता का नाम कूललूक निगार खानम था जो मंगोल सरदार यूनस खाँ की पुत्री थी। यूनस खाँ, चंगेज खाँ का वंशज था।

इस प्रकार बाबर, तैमूर लंग का पांचवा वंशज था तथा मातृपक्ष में चंगेज खाँ की चौदहवीं पीढ़ी में था। इस प्रकार बाबर की धमनियों में तुर्कों तथा मंगोलों का मिश्रित रक्त प्रवाहित हो रहा था। उसका परिवार चगताई शाखा में था किंतु आम तौर पर उन्हें मंगोल माना जाता था। भारत में वे मुगल कहलाये।

बाबर का प्रारम्भिक जीवन

बाबर का वास्तविक नाम जहीरूद्दीन मुहम्मद था। उसका जन्म 14 फरवरी 1483 को फरगना में हुआ। वह अत्यंत निर्भीक बालक था, इसलिये सब उसे बाबर कहने लगे। तुर्की भाषा में बाबर बाघ को कहते हैं। बाबर के आठ भाई-बहिन थे जिनमें बाबर सबसे बड़ा था। उसने बचपन में ही फारसी भाषा पर पूरा अधिकार कर लिया था। वह एक प्रतिभा सम्पन्न बालक था।

डॉ. ए. एल. श्रीवास्तव ने लिखा है कि बाबर अकाल प्रौढ़ बालक था। उसकी मानसिक शक्तियों का ऐसा सुन्दर विकास हुआ था कि वह राजनीतिक घटनाओं के महत्व को आसानी से समझ लेता था और मानव चरित्र को सरलता से परख लेता था। बाबर जब ग्यारह वर्ष का हुआ तब उसके पिता उमर शेख मिर्जा की मृत्यु हो गई।

फरगना के तख्त की प्राप्ति तथा आरंभिक कठिनाइयाँ

 उमर शेख मिर्जा की मृत्यु के बाद बाबर को फरगना का शासक बना दिया गया किंतु उसी समय उसके चाचा अहमद मिर्जा ने फरगना पर आक्रमण कर दिया। अहमद मिर्जा समरकंद का शासक था। उसने बाबर के कुछ नगरों को दबा लिया। बाबर के मामा महमूदखां ने भी बाबर के राज्य के कुछ परगने दबा लिये।

काशनगर के सुल्तान ने भी फरगना का कुछ हिस्सा दबा लिया। एक साथ आई इन मुसीबतों से भी बाबर नहीं घबराया। भाग्य से अहमद मिर्जा की सेना में रोग फैल गया और वह बाबर से संधि करके उसके क्षेत्रों को खाली करके चला गया। इसके बाद बाबर ने अपने मामा महमूद खाँ को अक्षी के कड़े युद्ध में परास्त किया।

दो शत्रुओं से निबटने के बाद बाबर ने काशनगर की सेना पर आक्रमण किया तथा उसे बुरी तरह परास्त किया। इस प्रकार बाबर को तीनों शत्रुओं से छुटकारा मिल गया तथा उसकी आरम्भिक कठिनाइयां दूर हो गईं।

फरगना और समरकंद की आवाजाही

कुछ समय बाद समरकंद के शासक और बाबर के चाचा अहमद मिर्जा की मृत्यु हो गई तथा उसका अयोग्य पुत्र अहमद मिर्जा समरकंद का शासक बना। समरकंद तुर्की सभ्यता का केन्द्र था तथा बाबर के पूर्वजों की राजधानी था। इसलिये बाबर ने समरकंद पर सैनिक अभियान करने का निर्णय लिया।

इतिहासकारों का मानना है कि अत्यंत महत्वाकांक्षी बाबर के लिये फरगना का छोटा सा राज्य पर्याप्त नहीं था। बाबर अपने पूर्वजों की तरह मध्य-एशिया के विशाल साम्राज्य का शासक बनना चाहता था। 1496 ई. में बाबर ने अपने पूर्वज तैमूर लंग की राजधानी समरकन्द पर आक्रमण किया किंतु असफल होकर लौट आया।

1497 ई. में उसने पुनः समरकंद पर आक्रमण किया। इस बार बाबर समरकंद पर अधिकार करने में सफल रहा। वह समरकंद में रहकर शासन करने लगा। इसी बीच बाबर बीमार पड़ा। इस पर कुछ अमीरों ने उसकी मृत्यु की अफवाह उड़ा दी। इसे सुनकर बाबर के छोटे भाई जहाँगीर ने फरगना पर अधिकार कर लिया।

यह सुनकर बाबर सेना सहित फरगना के लिये रवाना हुआ किंतु वह जहाँगीर से फरगना प्राप्त नहीं कर सका। निराश होकर वह समरकंद लौटा किंतु तब तक समरकंद भी उसके हाथ से निकल गया। कुछ दिनों तक इधर-उधर ठोकरें खाने के बाद बाबर ने पुनः फरगना पर आक्रमण किया तथा उसने फरगना पर अधिकार कर लिया किंतु 1500 ई. में फरगना पुनः उसके हाथ से निकल गया।

बाबर ने पुनः समरकंद पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। 1502 ई. में शैबानी ने बाबर पर आक्रमण किया। सराय-पुल नामक स्थान पर दोनों सेनाओं में घमासान हुआ जिसमें बाबर परास्त हो गया। समरकंद पर शैबानी का अधिकार हो गया। बाबर को अपनी बहिन का विवाह शैबानी के साथ कर देना पड़ा। इस प्रकार तीसरी बार समरकंद बाबर के हाथ से निकल गया।

काबुल, गजनी तथा कान्धार पर अधिकार

1505 ई. में बाबर ने काबुल तथा गजनी पर आक्रमण किये। ये दोनों शहर बड़ी सरलता से बाबर के अधिकार में आ गये। 1507 ई. में बाबर ने अपने पूर्वजों की उपाधि मिर्जा का त्याग करके बादशाह की उपाधि धारण कर ली। इसी वर्ष उसने गान्धार पर अधिकार कर लिया।

1513 ई. में शैबानी के मर जाने पर बाबर ने एक बार पुनः समरकंद पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। इस बार उजबेगों ने बाबर को समरकंद से मार भगाया। कांधार भी बाबर के हाथ से निकल गया।

युद्धों का विशद अनुभव

बाबर का अब तक का जीवन युद्धों में बीता था जिनमें से कई युद्ध उसने हारे तथा कई युद्ध जीते किंतु इन युद्धों ने उसे एक जबर्दस्त योद्धा बना दिया। उजबेगों से युद्ध करने के दौरान बाबर ने तुलगमा पद्धति सीखी। मंगोलों एवं अफगानों से युद्ध करते समय उसने अपनी सेना को शत्रु की आँखों से छिपा कर रखना सीखा।

ईरानियों से उसने बंदूक का प्रयोग करना तथा सजातीय तुर्कों से उसने गतिशील अश्वारोहिणी का संचालन करना सीखा। अपने शत्रुओं से ही उसने युद्ध क्षेत्र में योजनाबद्ध व्यूह रचना करना सीखा। इस प्रकार वह एक जबर्दस्त योद्धा एवं सेनापति बन गया। ई.1514 में बाबर को उस्ताद अली नामक एक तुर्क तोपची की सेवाएँ प्राप्त हुईं। इस तोपची की सहायता से बाबर ने एक शक्तिशाली तोपखाना तैयार किया।

बाबर का भारत आगमन

समरकंद तथा फरगना हाथ से निकल जाने के कारण वह मध्य एशिया से निराश हो चुका था। कंदहार भी उसके हाथ से निकल चुका था। काबुल तथा गजनी के अनुपजाऊ प्रदेश बाबर की महत्वाकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते थे इसलिये उसने भारत पर अपनी दृष्टि गड़ाई।

बाबर के आक्रमण के समय भारत की दशा

जिस समय बाबर ने आक्रमण करने का निर्णय लिया, उस समय भारत की राजनीतिक दशा हमेशा की तरह अत्यंत शोचनीय थी तथा अनेक परिस्थितियाँ बाबर के अनुकूल थीं। इन परिस्थितियों का वर्णन इस प्रकार से है-

(1.) दिल्ली सल्तनत का विघटन

तैमूर के आक्रमण के पश्चात् उत्तरी भारत फिर कभी नहीं संभल सका था। दिल्ली की कमजोरी का लाभ उठाकर अनेक तुर्क तथा अफगान अमीरों ने छोटे-छोटे स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिये थे। इस कारण दिल्ली सल्तनत की सीमाएं सिकुड़कर एक छोटे से प्रांत के रूप में रह गई थीं।

(2.) इब्राहीम लोदी के विरुद्ध अमीरों का षड़यंत्र

इन दिनों दिल्ली में इब्राहीम लोदी शासन कर रहा था। उसके अमीर उससे असंतुष्ट थे और उसके विरुद्ध विभिन्न प्रकार के षड्यन्त्र रच रहे थे।

(3.) जौनपुर तथा दिल्ली की प्रतिद्वंद्विता

जौनपुर में शर्की सुल्तानों ने स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया था और दिल्ली सल्तनत के प्रतिद्वन्द्वी बन गये थे। उनकी दृष्टि सदैव दिल्ली के तख्त पर लगी रहती थी और वे उसे हड़पने के लिए अनुकूल परिस्थितियों की प्रतीक्षा कर रहे थे।

(4.) बिहार में स्वतंत्र राज्य की स्थापना

बिहार में लोहानी अथवा नुहानी अफगानों ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था।

(5.) बाल में स्वतंत्र राज्य की स्थापना

हुसैनशाह तथा नसरत शाह ने बाल में स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिये थे तथा दक्षिण बिहार पर अधिकार करने के लिये लालायित थे।

(6.) नसरत शाह द्वारा तिरहुत पर अधिकार

नसरत शाह ने 1521 ई. में तिरहुत पर अधिकार करके अपने राज्य की सीमा को मुंगेर तथा हाजीपुर तक बढ़ा लिया। यदि लोहानी अमीर उसका विरोध न करते तो जौनपुर तथा चुनार दोनों ही खतरे में पड़ जाते। इसके विपरीत यदि लोहानी अमीर नसरत शाह से संधि कर लेते तो दिल्ली सल्तनत का सम्पूर्ण पूर्वी भाग खतरे में पड़ जाता।

(7.) उड़ीसा में स्वतन्त्र राज्य की स्थापना

उड़ीसा में भी एक स्वतन्त्र राज्य की स्थापना हो गई थी। इसके शासकों की रुचि उत्तरी भारत की राजनीति में उतनी नहीं थी जितनी दक्षिण भारत की राजनीति में थी।

(8.) मेवाड़ के शासक राणा सांगा का उदय

दिल्ली सल्तनत के दक्षिण तथा दक्षिण-पश्चिम में राजपूताना स्थित था जिसमें राजपूतों के छोटे-छोटे राज्य थे। इन राजपूतों ने राणा सांगा के नेतृत्व में बाबर के विरुद्ध प्रबल संघ बना लिया था। राणा सांगा वीर योद्धा था और अनेक युद्धों में सफलता प्राप्त कर चुका था।

1519 ई. में राणा सांगा ने मालवा के शासक महमूद (द्वितीय) को कैद कर लिया। 1520 ई. में सांगा ने अहमदनगर के शासक मुबारिजुल को परास्त करके अहमदनगर पर अधिकार कर लिया था। अब सांगा के लिये दिल्ली की ओर बढ़ने से पहले केवल गुजरात से निबटना ही शेष रह गया था।

(9.) गुजरात के शासक मुजफ्फरशाह का भय

मालवा तथा अहमदनगर की विजयों के फलस्वरूप राणा सांगा, गुजरात के शासक मुजफ्फर शाह से सीधा संघर्ष करने की स्थिति में आ गया था। दिल्ली सल्तनत के लिए यह स्थिति बड़ी भयावह थी। यदि राणा सांगा को मुजफ्फरशाह के विरुद्ध सफलता प्राप्त हो जाती तो उसकी विजयी सेना निश्चित रूप से राजपूताने के पूर्व में स्थित दिल्ली की ओर बढ़ती और दिल्ली सल्तनत के लिए भयानक संकट उत्पन्न कर देती और यदि राणा की पराजय हो जाती तो मुजफ्फर शाह के लिए दिल्ली तक का मार्ग साफ हो जाता।

(10.) पंजाब में दौलत खाँ लोदी का स्वतंत्र राज्य

दिल्ली सल्तनत की पश्चिमी सीमा पर स्थित पंजाब में लोदी अमीर बड़े शक्तिशाली हो गये थे। वे दौलत खाँ के नेतृत्व में संगठित थे। दौलत खाँ लोदी, तातार खाँ का पुत्र था जो दिल्ली के सुल्तान सिकन्दर लोदी का घोर विरोधी था। दौलत खाँ लगभग बीस वर्षों से पंजाब में स्वतंत्र शासक की तरह शासन कर रहा था।

वह इब्राहीम लोदी को किसी भी प्रकार की सहायता देने के लिए तैयार नहीं था। वास्तव में वह बाबर तथा इब्राहीम लोदी दोनों को ही अपना शत्रु समझता था। वह जानता था कि चक्की के इन दो पाटों के बीच में पड़कर वह कभी भी पिस सकता है।

(11.) आलम खाँ का षड़यंत्र

दौलत खाँ लोदी के साथ सुल्तान इब्राहीम लोदी का चाचा आलम खाँ लोदी भी इन दिनों पंजाब में विद्यमान था। वह बहुत दिनों से आगरा पर दृष्टि लगाये हुए था और इब्राहीम लोदी के विरुद्ध षड्यन्त्र रचा करता था।

(12.) सिंध का राज्य

मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के बाद से ही सिंध स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थित था। बाबर के आक्रमण के समय सिंध पर अरब वालों का अधिकार था।

(13.) काश्मीर का राज्य

बाबर के आक्रमण के समय काश्मीर का राज्य महत्वपूर्ण था। उस समय कश्मीर के प्रधान वजीर ने सुल्तान मुहम्मदशाह को अपदस्थ करके स्वयं सत्ता हथिया ली थी।

(14.) खानदेश

खानदेश ताप्ती नदी के किनारे स्थित एक छोटा सा किंतु समृद्ध राज्य था। बाबर के आक्रमण के समय यहाँ महमूद प्रथम का शासन था।

(15.) बहमनी राज्य

बाबर के आक्रमण के समय बहमनी राज्य अपना वैभव खोकर पांच राज्यों- बीजापुर, बरार, बीदर, अहमदनगर और गोलकुण्डा में विभक्त हो चुका था। ये राज्य आपस में लड़ते रहते थे। इस प्रकार बाबर के आक्रमण के समय दक्षिण भारत में मुस्लिम शक्ति अपनी अंतिम सांसें गिन रही थी।

(16.) विजयनगर राज्य

बाबर के आक्रमण के समय विजयनगर राज्य पर राजा कृष्णदेवराय का शासन था। वह अशोक, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, हर्ष और भोज के समान ख्याति प्राप्त श्रेष्ठ सम्राट था। उसका राज्य अपने वैभव के शिखर पर था। बाबर ने लिखा है कि सैनिक दृष्टि से काफिर राजकुमारों में विजयनगर का राजा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

(17.) पुर्तगाली राज्य

बाबर के आक्रमण के समय पुर्तगालियों की शक्ति अधिक नहीं थी फिर भी उन्होंने गोआ पर अधिकार कर लिया था। उनके कारण भारत के पश्चिमी समुद्र तट के राजनीतिक एवं व्यापारिक जीवन में अस्थिरता व्याप्त थी।

निष्कर्ष

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारत अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों का झुण्ड था जो एक ओर तो परस्पर शत्रु थे तथा दूसरी ओर किसी भी तरह दिल्ली सल्तनत को समाप्त कर देना चाहते थे। इस कारण भारत में किसी भी प्रबल आक्रमणकारी का सामना करने का बल नहीं था। इन परिस्थितियों में बाबर जैसे महत्वाकांक्षी आक्रांता का भारत पर आक्रमण करने के लिए आकृष्ट हो जाना स्वाभाविक ही था।

बाबर के भारत पर आक्रमण करने के कारण

(1.) साम्राज्य विस्तार की महत्वाकांक्षा

बाबर अत्यंत महत्त्वाकांक्षी शासक था। वह अपने पूर्वज तैमूर लंग की भाँति एक विशाल साम्राज्य खड़ा करना चाहता था। उसने पहला प्रयास मध्य-एशिया में किया। वहाँ असफल रहने के बाद उसने काबुल तथा गजनी में अपना राज्य स्थापित किया किंतु वह काबुल तथा गजनी से संतुष्ट नहीं हुआ। इसलिये वह अपना साम्राज्य भारत में फैलाना चाहता था।

(2.) भारत पर जीत का गौरव हासिल करने की आकांक्षा

उन दिनों इस्लामी जगत में काफिरों के देश भारत पर विजय प्राप्त करना किसी भी मुस्लिम शासक के लिये गौरव की बात माना जाता था। इसलिये बाबर भारतवर्ष अथवा उसके एक बहुत बड़े भाग को जीतकर भारत विजय का गौरव प्राप्त करना चाहता था।

(3.) भारत पर वंशानुगत राज्य होने का दावा

बाबर, तैमूर लंग का वंशज होने के कारण तैमूर द्वारा विजित भारतीय क्षेत्रों को अपने वंशानुगत राज्य में होने का दावा करता था। जब तैमूर ने भारत पर आक्रमण किया था तब उसने पंजाब के पश्चिमी भाग को अपने राज्य में मिला लिया था परन्तु बाद में अफगानों ने उस पर अपना अधिकार जमा लिया था। इसलिये बाबर पंजाब पर अपना वंशानुगत अधिकार समझता था और उसे फिर से पाना चाहता था।

(4.) काबुल तथा गजनी पर अधिकार

समरकंद तथा फरगना के हाथ से निकल जाने के बाद बाबर काबुल तथा गजनी पर अधिकार जमाने में सफल रहा था इस कारण उसके राज्य की सीमा भारत के काफी निकट आ गई थी।

(5.) भारत की अपार सम्पत्ति प्राप्त करने की लालसा

बाबर भारत पर आक्रमण करके अपने पूर्वजों की भांति अपार सम्पत्ति प्राप्त करना चाहता था।

(6.) काफिरों को नष्ट कर इस्लाम फैलाने की लालसा

बाबर की धमनियों में तैमूरलंग तथा चंगेज खाँ का रक्त विद्यमान था। इसलिये बाबर भी उनकी तरह भारत के काफिरों को मारकर इस्लाम फैलाने को लालायित था।

(7.) भारत की परिस्थितियाँ

भारत की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थ्तिियों ने भी बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिये उत्साहित किया। वह जानता था कि भारत का कोई भी प्रांतीय शासक तथा राणा सांगा, इब्राहीम लोदी का साथ नहीं देगा।

(8.) लाहौर के अफगान अमीरों का निमंत्रण

लाहौर के अफगान अमीरों ने बाबर को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित करने का निश्चय किया। आलम खाँ तथा दौलत खाँ के पुत्र दिलावर खाँ को बाबर के पास भेजकर आग्रह किया गया कि बाबर इब्राहीम लोदी को दिल्ली के तख्त से हटाकर, आलम खाँ को सुल्तान बनाने में सहायता करे क्योंकि इब्राहीम लोदी बड़ा ही क्रूर तथा निर्दयी शासक है। इससे बाबर ने भारत पर आक्रमण करने की तैयारियाँ आरम्भ कर दीं।

बाबर की भारत में उपलब्धियाँ

भारत में बाबर की उपलब्धियाँ तीन प्रकार की हैं- (1.) सामरिक उपलब्धियाँ, (2.) राजनीतिक उपलब्धियाँ तथा (3.) सांस्कृतिक उपलब्धियाँ। इन तीनों उपलब्धियों का आधार सामरिक उपलब्धियाँ ही हैं। अतः सबसे पहले उसकी सामरिक उपलब्धियों का अध्ययन करना उचित होगा।

भारत पर बाबर के प्रारंभिक आक्रमण

पहला आक्रमण

1519 ई. में बाबर ने भारत पर पहला आक्रमण किया। उसने बाजोर के दुर्ग को घेर लिया। दुर्ग में नियुक्त सैनिक बाबर की बंदूकों के समक्ष नहीं टिक सके। अलीकुली ने तोपों का प्रयोग किया। कुछ ही घण्टों में तीन हजार सैनिक मारे गये। बाबर ने बाजोर में रहने वाली हिन्दू जनता के साथ बड़ा कठोर व्यवहार किया।

समस्त पुरुषों को मौत के घाट उतार दिया गया तथा स्त्रियों एवं बच्चों को गुलाम बना लिया गया। इसके बाद उसने झेलम के तट पर स्थित भीरा को अपने अधिकार में ले लिया। भीरा के लोगों ने बिना लड़े ही भीरा बाबर को समर्पित कर दिया।

दूसरा आक्रमण

1519 ई. में बाबर ने भारत पर दूसरा आक्रमण किया। वह युसूफ जई अफगानों को अपने अधीन करके पेशावर पर अधिकार जमाना चाहता था किंतु उसी समय बदख्शां में उपद्रव हो गया और बाबर इस आक्रमण को अधूरा छोड़कर लौट गया।

तीसरा आक्रमण

1520 ई. में बाबर बाजोर, भीरा होता हुआ स्यालकोट तक आ पहुँचा। बाबर स्यालकोट से आगे बढ़ता इससे पहले उसे समचार मिला कि कांधार के शासक शाह बेग अर्जुन ने बगावत कर दी है। अतः बाबर स्यालकोट से वापस लौट गया। 1522 ई. में उसने कांधार पर अधिकार कर लिया तथा अपने दूसरे पुत्र कामरान को वहाँ का सूबेदार नियुक्त किया।

चौथा आक्रमण

पंजाब के सूबेदार दौलत खाँ ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी से स्वतंत्र होने के लिये बाबर को दिल्ली सल्तनत पर आक्रमण करने का निमंत्रण भिजवाया। 1524 ई. में बाबर सेना लेकर चौथी बार भारत आया। इब्राहीम लोदी पंजाब की गतिविधियों से अनजान नहीं था। उसने एक सेना पंजाब पर आक्रमण करने भेजी जिसने बड़ी सरलता से लाहौर पर अधिकार कर लिया।

इसी बीच बाबर की सेना ने लाहौर पर आक्रमण कर दिया। दिल्ली की सेना परास्त हो गई तथा बाबर ने लाहौर पर अधिकार जमा लिया। अब बाबर की सेना लाहौर से आगे बढ़ी और उसने दिपालपुर पर अधिकार कर लिया। चूँकि बाबर के साथी आगे बढ़ने के लिए तैयार नहीं थे और उसे अपने राज्य में उजबेगों का विद्रोह होने की भी सूचना मिली इसलिये बाबर दिपालपुर से काबुल लौट गया।

पाँचवां आक्रमण

बाबर के काबुल लौट जाने पर दौलत खाँ तथा दौलत खाँ के चाचा आलम खाँ ने दिल्ली पर आक्रमण किया परन्तु इब्राहीम लोदी की सेना ने उन्हें मार भगाया। इस पर आलम खाँ तथा दौलत खाँ का पुत्र दिलावर खाँ, बाबर की शरण में पहुँचे। उनके निमंत्रण पर बाबर ने पुनः दिसम्बर 1525 में विशाल सैन्य के साथ भारत के लिए प्रस्थान किया।

जब वह मार्ग में ही था तब उसे सूचना मिली कि दौलत खाँ अपनी सेना लेकर लाहौर की ओर बढ़ रहा है। इसलिये बाबर ने अपनी चाल तेज कर दी और दौलत खाँ के लाहौर पहुँचने से पहले लाहौर पर अधिकार कर लिया। इस पर दौलत खाँ के साथी घबरा उठे और वे दौलत खाँ का साथ छोड़कर बाबर से जा मिले।

दौलत खाँ ने भी विवश होकर बाबर के समक्ष समर्पण कर दिया। बाबर ने दौलत खाँ को बंदी बनाकर भेरा भेज दिया किंतु भेरा पहुँचने से पहले ही दौलत खाँ की मृत्यु हो गई। इस प्रकार पंजाब पर बाबर का अधिकार हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – मुगलों का राज्य विस्तार

बाबर का भारत आगमन

पानीपत का प्रथम युद्ध

खानवा की लड़ाई

घाघरा का युद्ध

बाबर का चरित्र तथा उसके कार्यों का मूल्यांकन

पानीपत का प्रथम युद्ध

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पानीपत का प्रथम युद्ध

पानीपत का प्रथम युद्ध दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी तथा जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर के बीच हुआ। यह भारत के इतिहास के निर्णायक युद्धों में से एक था। इस युद्ध ने भारत में एक नवीन मुस्लिम राज्य की स्थापना का मार्ग खोल दिया।

पानीपत का प्रथम युद्ध – पूर्व तैयारियाँ

बाबर की सेना

अप्रेल 1526 में बाबर अपनी सेना के साथ पानीपत के मैदान में आ डटा। वह अपने साथ 12 हजार सैनिक लाया था किंतु मार्ग में बहुत से भारतीय सैनिक भी उसके साथ हो लिये। इस प्रकार जब बाबर पानीपत के मैदान में पहुँचा तो उसके सैनिकों की संख्या 25 हजार हो चुकी थी।

बाबर की तैयारी

बाबर कुशल तथा अनुभवी सेनानायक था। वह मंगोलों, उजबेगों तथा पारसीकों की रणपद्धतियों से परिचित था। चूँकि बाबर की सेना इब्राहीम लोदी की सेना की अपेक्षा संख्या में केवल एक-चौथाई थी इसलिये बाबर ने इब्राहीम लोदी के विरुद्ध अश्वारोहियों तथा तोपखाने के संयुक्त प्रयोग का निश्चय किया।

उसने सबसे पहले अपनी सेना की चारों ओर से सुरक्षा की व्यवस्था की ताकि शत्रु अचानक उसकी सेना में न आ घुसे। बाबर ने अपनी सेना के एक पक्ष की सुरक्षा के लिये पानीपत नगर को ढाल के रूप में प्रयुक्त किया। अपनी सेना के दूसरे पक्ष की सुरक्षा के लिये खाइयां खुदवाकर उनके दोनों तरफ कटे हुए पेड़ तथा कँटीली झाड़ियां डलवा दीं।

बाबर ने सेना के सामने 700 गाड़ियाँ खड़ी करके उन्हें कच्चे चमड़े की रस्सियों द्वारा एक-दूसरे से बँधवा दिया। इन गाड़ियों के पीछे उसने अपनी सेना को सजाया।

लोदी की सेना

इब्राहीम लोदी अपनी विशाल सेना के साथ पानीपत के मैदान में आ डटा। उसके पास लगभग दो हजार हाथी थे। इन हाथियों को तोपखाने का सामना करने की शिक्षा नहीं दी गई थी। इसलिये यह सम्भावना अधिक थी कि तोपेखाने की आग तथा गोलों की आवाज से बिगड़कर हाथी उलटे लौट पड़ेंगे तथा अपने ही सैनिकों को रौंद डालेंगे किंतु इब्राहीम लोदी को, हाथियों को प्रयुक्त करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं सूझा।

लोदी की तैयारी

इब्राहीम लोदी अदूरदर्शी सुल्तान था। उसने बाबर के आक्रमण की कोई गंभीर तैयारी नहीं की। उसे अपनी सेना की विशालता पर पूरा विश्वास था। इसलिये जब बाबर ने पंजाब पर अधिकार कर लिया तब इब्राहीम लोदी अपनी विशाल सेना लेकर दिल्ली से पंजाब की ओर चल पड़ा तथा पानीपत के मैदान में आ डटा।

पानीपत का प्रथम युद्ध

बाबर की विजय

12 अप्रेल 1526 को दोनों सेनाएं एक दूसरे के समक्ष आ खड़ी हुईं। नौ दिन तक दोनों सेनाएँ एक दूसरे के समक्ष डटी रहीं। अन्त में 21 अप्रेल को इब्राहीम लोदी ने अपनी सेना को आक्रमण करने की आज्ञा दी। इब्राहीम की सेना इतनी विशाल थी कि उसका सुचारू रीति से संचालन नहीं हो सका।

बाबर की सेना ने इब्राहीम लोदी की सेना को चारों ओर से घेरकर उस पर तोपेखाने तथा बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी। यह युद्ध प्रातः 9 से 10 बजे के बीच आरम्भ हुआ तथा दोपहर बाद तक भयंकर रूप से होता रहा। अंत में इब्राहीम की सेना परास्त हो गई। उसके 15 हजार सैनिक मारे गये और शेष सेना लड़ाई के मैदान से भाग खड़ी हुई। इब्राहीम लोदी स्वयं लड़ता हुआ मारा गया। इस प्रकार बाबर को पानीपत के प्रथम युद्ध में विजय प्राप्त हो गई।

दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार

जिस दिन बाबर को पानीपत युद्ध में विजय प्राप्त हुई उसी दिन बाबर ने अपने पुत्र हुमायूँ को आगरा पर और अपने दामाद मेंहदी ख्वाजा को दिल्ली पर अधिकार करने के लिए भेज दिया। इन दोनों ने अपना कार्य सरलता से सम्पन्न कर लिया। इस प्रकर दिल्ली और आगरा पर बाबर का अधिकार हो गया। 27 अप्रैल 1526 को शुक्रवार के दिन दिल्ली की मस्जिद में बाबर के नाम खुतबा पढ़ा गया और गरीबों को दान-दक्षिणा दी गई। इस प्रकार बाबर दिल्ली का बादशाह बन गया।

पानीपत के युद्ध में बाबर की विजय के कारण

यद्यपि इब्राहीम लोदी की सेना बाबर की सेना की तुलना में अधिक विशाल थी परन्तु बाबर ने छोटी सेना की सहायता से ही उस पर विजय प्राप्त कर ली। इस विजय के निम्नलिखित कारण थे-

(1.) बाबर का कुशल सेनापतित्त्व

बाबर कुशल तथा अनुभवी सेनापति था। उसे युद्ध लड़ने का व्यापक अनुभव था। वह मंगोलों, उजबेगों तथा पारसीकों की रणपद्धतियों से परिचित था। वह अनेक युद्धों में सेना का संचालन करके युद्ध कला की व्यवहारिक बारीकियों का ज्ञान प्राप्त कर चुका था। इसके विपरीत इब्राहीम लोदी युद्ध के अनुभव से शून्य था। उसने इससे पहले एक भी बड़े युद्ध में भाग नहीं लिया था। न ही वह विदेशी रणपद्धतियों से परिचित था। ऐसी स्थिति में वह बाबर की सेना का सामना करने की क्षमता नहीं रखता था।

(2.) बाबर को योग्य सेनापतियों की सेवाएँ

बाबर यद्यपि स्वयं प्रधान सेनापति था परन्तु अपनी सेना के विभिन्न अंगों का संचालन उसने बड़े ही योग्य तथा कुशल सेनापतियों को सौंप रखा था। उसे दो तुर्की सेनापतियों की सेवाएँ प्राप्त थीं जो नवीन रण-पद्धतियों का उपयोग करने में दक्ष थे। बाबर का पुत्र हुमायूँ भी कुशल योद्धा तथा दक्ष सेनापति था। इब्राहीम लोदी को इस प्रकार के योग्य सेनापतियों की सेवाएँ प्राप्त नहीं थीं। उसे अपने अमीरों तथा प्रांतपतियों का सहयोग प्राप्त नहीं था। दौलत खाँ तथा पंजाब के अन्य अमीर उसके विरुद्ध थे तथा बाबर का साथ दे रहे थे।

(3.) बाबर के सैनिकों में जीत के प्रति उत्साह

बाबर के सैनिक बड़े लड़का तथा रणकुशल थे। उन्हें शत्रु की धरती पर खड़े रहकर युद्ध करने का व्यापक अनुभव था। वे कई तरह की पेंतरेबाजी में कुशल थे और स्वयं को परिस्थितियों के अनुकूल ढालने और उसमें लड़ने की क्षमता रखते थे। अफगानिस्तान जैसे निर्धन देश से होने के कारण वे धन प्राप्ति के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा देते थे। उनमें जीत के प्रति अदम्य उत्साह था जबकि इब्राहीम लोदी के सैनिक उतने रणकुशल नहीं थे, जितने बाबर के। उन्हें न तो युद्धों का उतना अनुभव था और न उनमें उतना उत्साह तथा साहस ही था जितना बाबर के सैनिकों में था।

(4.) बाबर की कुशल व्यूह-रचना

बाबर शत्रु सैन्य के बल के अनुसार सैन्य-व्यूह रचने में दक्ष था। उसने पानीपत के मैदान में पहुंॅचते ही सैन्य-व्यूह की रचना का कार्य आरम्भ कर दिया था। उसने अपनी सेना की चारों ओर से सुरक्षा का प्रबंध किया और फिर केन्द्र में तोपों और दोनों पक्षों में तेजी से आक्रमण करने वाले अश्वारोहियों की व्यवस्था की।

ये अश्वारोही, मुख्य सेना की गति भंग हो जाने पर उसे चारों ओर से सहायता पहुँचा सकते थे। यह बड़ी ही वैज्ञानिक व्यूह-रचना थी जिसमें रक्षात्मक तथा आक्रमणात्मक दोनों प्रकार की व्यवस्था थी। इसके विपरीत इब्राहीम लोदी की व्यूह-रचना परिस्थितियों के अनुकूल नहीं थी। उसने अपनी सेना की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं की।

उसने हाथियों को अपनी सेना के हरावल में रखकर अपनी पराजय का प्रबंध स्वयं ही कर लिया था। जब तोपों से गोले बरसने आरम्भ हुए तो हाथी पीलवानों के नियंत्रण से बाहर हो गये और उन्होंने अपने ही सैनिकों को रौंद डाला। इससे उनमें भगदड़ मच गयी।

(5.) बाबर का कुशल सैन्य संचालन

बाबर ने अपनी सेना का संचालन कुशलता से किया था। छोटी होने के कारण उसकी सेना में गति थी। वह तेजी से आक्रमण कर सकती थी और संकट आने पर भाग सकती थी। उसकी सेना के बाईं तथा दाहिनी ओर के सैनिक बड़ी तेजी से शत्रु पर आक्रमण करते थे और उसे चारों ओर से घेर लेने का प्रयत्न करते थे।

वह अपने तोपखाने तथा अपने अश्वारोहियों द्वारा ऐसा संयुक्त आक्रमण करता था कि शत्रु को उसके सामने ठहरना कठिन हो जाता था। इसके विपरीत इब्राहीम लोदी में सैन्य संचालन की कुशलता नहीं थी। उसकी सेना इतनी विशाल थी कि उसका सुचारू रीति से संचालन करना कठिन था। उसमें न गति थी और न पैंतरेबाजी।

बाबर की तोप गाड़ियों के कारण इब्राहीम की सेना के अग्रिम भाग का आगे बढ़ना रुक गया किंतु पीछे की सेना इस बात को नहीं जान सकी और वह निरंतर आगे बढ़ने का प्रयत्न करती रही इससे सेना में धकापेल आरम्भ हो गई। वह मनुष्यों का एक ढेर बन गई और बाबर की सेना ने भीषण नरसंहार आरम्भ कर दिया।

(6.) बाबर द्वारा तोपखाने का प्रयोग

अभी तक उत्तर-पश्चिम के मार्ग से भारत पर जितने आक्रमण हुए थे उनमें से किसी ने भी तोपेखने का प्रयोग नहीं किया था। इसलिये भारत के सैनिक इस तोपखाने के समक्ष युद्ध करने के अभ्यस्त नहीं थे। परिणाम यह हुआ कि जब तोपों ने गोले और आग बरसाना आरम्भ किया तब उसी समय बाबर के अश्वारोहियों ने भी पार्श्वों से निकलकर इब्राहीम की सेना पर तेजी से आक्रमण किया।

इससे इब्राहीम लोदी की सेना में अफरा-तफरी मच गई। तोपखाने के साथ-साथ बाबर के सैनिक इब्राहीम लोदी के सैनिकों से अधिक अच्छे अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थे। इससे वे अधिक सफलतापूर्वक प्रहार कर सकते थे।

पानीपत के प्रथम युद्ध के परिणाम

पानीपत का प्रथम युद्ध भारत के निर्णयात्मक युद्धों में से है। इसने भारत की राजनीति से एक युग का अंत करके दूसरे युग का आरम्भ कर दिया। उत्तर भारत की राजनीति में इस युद्ध ने भारी फेर बदल कर दिया।

(1.) लोदी वंश का अंत

इस युद्ध ने लोदी वंश के भाग्य का उसी प्रकार निर्णय कर दिया जिस प्रकार तैमूर के आक्रमण ने तुगलक वंश के भाग्य का निर्णय कर दिया था। लोदी वंश सदा के लिये अस्ताचल में चला गया।

(2.) दिल्ली सल्तनत का अंत

लोदी वंश के पराभव के साथ ही दिल्ली सल्तनत का युग भी समाप्त हो गया। उत्तर भारत में एक नया वंश शासन करने के लिये आ गया।

(3.) भारत में मुगल सम्राज्य की स्थापना

पानीपत की पहली लड़ाई का सबसे बड़ा परिणाम यह हुआ कि भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना हो गई जो अपनी शान-शौकत, सैनिक शक्ति तथा अपनी सभ्यता एवं संस्कृति में मुस्लिम जगत् के राज्यों में सबसे अधिक महान् था और जो रोमन साम्राज्य की बराबरी का दावा कर सकता था।

(4.) राजधानी दिल्ली के स्थान पर आगरा स्थानांतरित

बाबर दिल्ली में कुछ ही दिन रहा। वह दिल्ली से आगरा चला गया और वहीं पर सुल्तान इब्राहीम लोदी के महल में रहने लगा। अब आगरा ही उसकी राजधानी बन गया।

(5.) अफगानों के संगठन पर बुरा प्रभाव

लोदी वंश के उदय के साथ ही दिल्ली सल्तनत तथा उत्तरी पंजाब में अफगान अमीरों का दबदबा स्थापित हो गया था किंतु इस युद्ध ने अफगानों के संगठन को छिन्न-भिन्न कर दिया और उनका नैतिक बल कमजोर हो गया।

(6.) जन साधारण में भय

पानीपत की पराजय के बाद न केवल लोदी सेना के सैनिक वरन् जन साधारण भी आक्रमणकारियों से भयभीत होकर इधर-उधर भाग खड़ा हुआ। किलेबंदी वाले नगरों के फाटक बन्द कर दिये और लोग अपनी सुरक्षा का प्रबंध करने लगे।

(7.) बाबर के गौरव में वृद्धि

पानीपत की विजय से बाबर के गौरव तथा प्रतिष्ठा में बड़ी वृद्धि हुई और उसकी गणना एशिया के महान् विजेताओं में होने लगी।

(8.) बाबर को अपार धन की प्राप्ति

बाबर को दिल्ली तथा आगरा से अपार धन की प्राप्ति हुई। इससे पहले उसकी आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब थी। भारत से मिले धन को बाबर ने मुक्त हस्त से अपने सैनिकों में बंटवाया। उसने समरकंद, ईराक, खुरासान व काशनगर में स्थित अपने सम्बन्धियों को भी उपहार भेजे। मक्का एवं मदीना में पवित्र आदमियों को भी उसने भेंट भिजवाई। उसकी इस उदारता के लिये उसे कलंदर नाम दिया गया।

(9.) राजपूतों में निराशा

इस युद्ध से राजपूतों की बड़ी निराशा हुई क्योंकि लोदी साम्राज्य के बाद दिल्ली में राजपूत राज्य स्थापित करने का उनका स्वप्न समाप्त हो गया ।

पानीपत के युद्ध के उपरान्त बाबर की समस्याएँ

पानीपत की लड़ाई में विजय प्राप्त करने के उपरान्त बाबर ने दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार स्थापित कर लिया परन्तु उसे अनेक समस्याओं का सामना करना था। उसकी प्रमुख समस्याएँ इस प्रकार से थीं-

(1.) जन साधारण में अविश्वास की समस्या

बाबर की पहली समस्या जन साधारण में विश्वास उत्पन्न करने की थी जो या तो अपने नगरों को छोड़कर भागे जा रहे थे या नगरों के फाटकों को बन्द करके अपनी सुरक्षा करने में लगे हुए थे। लोग तैमूर लंग के आक्रमण को भूले नहीं थे इसलिये मंगोल भारत में घृणा की दृष्टि से देखे जाते थे।

(2.) अराजकता की समस्या

शासन के प्रति जन साधारण में अविश्वास के कारण सरकारी कर्मचारी भी अपना काम छोड़कर बैठ गये। इस कारण चारों ओर अराजकता फैल गई। बाजारों में खाद्य सामग्री की कमी हो गई। अवसर पाकर चोर तथा डकैत जन साधारण को लूटने लगे।

(3.) अफगान सरदारों की समस्या

पानीपत के युद्ध में इब्राहीम लोदी की मृत्यु हो जाने से अफगानों का संगठन बिखर गया। इस कारण अफगान सरदार अपनी सेनाओं के साथ इधर-उधर घूम रहे थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। इनमें से अनेक सरदार छोटे-छोटे भू-भागों पर स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने के लिये अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने का प्रयास करने लगे।

(4.) बाबर के सैनिकों में घर लौटने की इच्छा

दिल्ली तथा आगरा विजय करने के पश्चात् बाबर के सैनिक तथा सरदार अपने घरों को लौट जाने के लिए आतुर हो रहे थे। यद्यपि बाबर ने दिल्ली तथा आगरा से प्राप्त विपुल धन अपने सैनिकों तथा सरदारों में मुक्त हस्त से बाँट दिया था परन्तु अब वे भारत में ठहरने के लिए तैयार नहीं थे।

ये सैनिक पहाड़ियों तथा घाटियों के निवासी होने के कारण भारत की गर्मी को सहन नहीं कर पा रहे थे। चूंकि अधिकतर किसान अपनी खेतीबाड़ी छोड़कर भाग खड़े हुए थे इसलिये उत्तर भारत में खाने-पीने की सामग्री का बड़ा अभाव हो गया था।

जब इन सैनिकों एवं सरदारों को यह ज्ञात हुआ कि बाबर ने भारत में रहने का निश्चय कर लिया है तब वे समझ गये कि उन्हें भी बहुत दिनों तक भारत में रहना पडे़गा और निरन्तर युद्ध तथा संघर्ष करना पडे़गा। चूंकि अब उनके पास पर्याप्त धन था इसलिये वे अपना शेष जीवन युद्धों में बिताने की बजाय आराम से अपने घरों में बिताना चाहते थे।

(5.) राणा सांगा की समस्या

इन दिनों राजपूतों का नेता मेवाड़ का शासक राणा संग्रामसिंह था जिसे राणा सांगा भी कहते हैं। वह अट्ठारह युद्धों में विजय प्राप्त कर चुका। युद्धों में ही उसने अपनी एक आँख, एक भुजा तथा एक पैर खो दिये थे। उसके शरीर पर अस्सी घावों के चिह्न थे।

वह अत्यंत महत्त्वाकांक्षी शासक था और लोदी साम्राज्य के ध्वंसावशेष पर अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था। पानीपत के युद्ध में वह भाग नहीं ले सका था क्योंकि उसे गुजरात के शासक मुजफ्फरशाह की ओर से आक्रमण की आशंका थी परन्तु अब मुजफ्फरशाह की मृत्यु हो चुकी थी और राणा का ध्यान दिल्ली तथा आगरा पर केन्द्रित था जहाँ पर बाबर ने अधिकार कर लिया था।

राणा सांगा का अनुमान था कि बाबर अपने पूर्वज तैमूर की भांति दिल्ली को लूट-पाट कर काबुल लौट जाएगा परन्तु बाबर ने भारत में रहने का निश्चय कर लिया था। ऐसी स्थिति में राणा तथा बाबर में संघर्ष होना अनिवार्य था क्योंकि बाबर के निश्चय ने राणा सांगा की कामनाओं पर पानी फेर दिया था।

समस्याओं का समाधान

बाबर ने उपरोक्त समस्याओं का बड़ी सावधानी तथा चतुराई के साथ सामना किया।

(1.) जन साधारण में विश्वास की उत्पत्ति

बाबर ने जन साधारण में मंगोलों के शासन के प्रति विश्वास जागृत करने के लिये उदारता तथा सहानुभूति की नीति का अनुसरण किया और अपने व्यवहार से स्पष्ट कर दिया कि जो लोग उसकी शरण में आकर उसकी अधीनता स्वीकार कर लेंगे, उनके साथ अच्छा व्यवहार किया जायेगा तथा उन्हें नौकरी में समुचित पद भी दिये जायेंगे।

(3.) अफगान सरदारों को जागीरें

बाबर ने अफगान सरदारों को शांत करने तथा अपने पक्ष में करने के लिये उन्हें वचन दिया कि जो अफगान सरदार उसके स्वामित्व को स्वीकार कर लेंगे उनकी रक्षा की जायेगी और उन्हें बड़ी-बड़ी जागीरें दी जायेंगी। इस घोषणा का अफगान सरदारों पर अच्छा असर हुआ।

बहुत से अफगान सरदार बाबर के समक्ष उपस्थित हो गये। बाबर ने उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें बड़ी-बड़ी जागीरें दे दीं। शेष अफगान सरदारों की समस्या को सुलझाने के लिए उसने अविजित भू-भागों को अपने सरदारों में बाँट दिया और उन्हें आदेश दिया कि वे विद्रोही अफगानों पर विजय प्राप्त करें और राज्य में शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित करें।

जो अफगान सरदार बड़े ही शक्तिशाली थे और सरलता से नियन्त्रण में नहीं लाये जा सकते थे उनका दमन बाद में करने का निर्णय लिया गया।

(4.) बाबर के सैनिकों में घर लौटने की इच्छा

बाबर ने अपने सैनिकों को अपने घरों को लौटने से रोकने के लिये अपने सैनिकों की एक सभा आयोजित की और उसमें ओजपूर्ण भाषण दिया। उसने अपने सैनिकों को समझाया कि अनेक वर्षों के परिश्रम से, कठिनाइयों का सामना करके, लम्बी यात्रा करके, अपनी सेना को युद्धों में झौंककर और भीषण हत्याएं करके हमने अल्लाह की कृपा से शत्रुओं के झुण्ड को परास्त किया है जिससे हम उनकी विशाल भूमि को प्राप्त कर सकें।

अब वह कौनसी शक्ति है जो हमें विवश कर रही है, कौनसी ऐसी आवश्यकता उत्पन्न हो गई है कि हम ‘अकारण ही उन प्रदेशों को छोड़ दें जिन्हें हमने अपने जीवन को संकट में डालकर प्राप्त किया है!’ बाबर के इस ओजपूर्ण भाषण का उसके सैनिकों एवं सेनापतियों पर इतना प्रभाव पड़ा कि कुछ को छोड़कर शेष ने भारत में रहने और बाबर के उद्देश्य को पूरा करने का निश्चय कर लिया।

(5.) राणा सांगा से युद्ध का निश्चय

महत्वाकांक्षी राणा सांगा रूपी समस्या का समाधान एक ही तरह से हो सकता था कि बाबर सांगा को युद्ध में परास्त करे। अतः बाबर ने राणा सांगा पर आक्रमण करने का निश्चय किया। राणा सांगा से लोहा लेने के पूर्व बाबर ने उसके मार्ग में आने वाले धौलपुर, बयाना तथा ग्वालियर के छोटे-छोटे अफगान शासकों को भी नतमस्तक करने का निश्चय किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – मुगलों का राज्य विस्तार

बाबर का भारत आगमन

पानीपत का प्रथम युद्ध

खानवा की लड़ाई

घाघरा का युद्ध

बाबर का चरित्र तथा उसके कार्यों का मूल्यांकन

खानवा की लड़ाई

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खानवा की लड़ाई

खानवा की लड़ाई समरकंद से आए मुगल आक्रांता जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर तथा राजपूताना के लगभग समस्त हिन्दू राजाओं के बीच लड़ी गई। हिन्दुओं की ओर से खानवा की लड़ाई का नेतृत्व महाराणा सांगा द्वारा किया गया।

पानीपत का प्रथम युद्ध बाबर के लिये भारत में पैर टिकाने के लिये पर्याप्त था किंतु साम्राज्य की स्थापना एवं विस्तार के लिये बाबर को कई लड़ाइयाँ ल़ड़नी पड़ीं जिनमें खानवा की लड़ाई प्रमुख थी। वह कभी भी भारत में शांति से शासन नहीं कर सका। बाबर का पूरा जीवन युद्धों की एक लम्बी शृंखला है। इन्हीं युद्धों को लड़ते हुए उसकी मृत्यु हुई।

बाबर पानीपत का प्रथम युद्ध जीत चुका था तथा अब खनवा की लड़ाई उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। यह युद्ध भी पानीपत के प्रथम युद्ध की भांति बाबर के जीवन के निर्णायक युद्धों में से एक है। खनवा युद्ध का प्रमुख कारण बाबर द्वारा भारत में ही रहने का निर्णय लेना था। इस कारण सांगा उसे भारत से बाहर निकालने के लिये उद्धत हो उठा।

बाबर का बयाना के दुर्ग पर अधिकार

बयाना मेवाड़ की सीमा पर स्थित था। इसे राजपूताने का फाटक कहा जाता था। इन दिनों बयाना पर आलम खाँ के छोटे भाई निजाम खाँ का अधिकार था। बयाना दुर्ग का सामरिक दृष्टि से बड़ा महत्त्व था। बयाना पर अधिकार कर लेने पर बाबर को अपने साम्राज्य की रक्षा करने में भी सुविधा होती और इसे आधार बनाकर वह राजपूताने में प्रवेश भी कर सकता था।

इसलिये बाबर ने तार्दी बेग को बयाना पर आक्रमण करने के लिए भेजा परन्तु निजाम खाँ ने उसे मार भगाया। विवश होकर बाबर ने निजाम खाँ के साथ मैत्री करने का प्रयत्न किया। अंत में निजाम खाँ ने इस्लाम की रक्षा तथा काफिर राणा सांगा के विनाश के लिये बाबर से मैत्री कर ली।

बाबर का धौलपुर तथा ग्वालियर के दुर्गों पर अधिकार

बयाना में घट रही घटनाओं ने राणा की चिंताएं बढ़ा दीं। इसलिये वह भी अपनी सेनाओं के साथ आगे बढ़ा और रणथंभौर से थोड़ी दूरी पर स्थित कन्दर दुर्ग पर अधिकार करके बैठ गया। बाबर ने राणा की गतिविधियों को देखकर अनुमान लगा लिया कि राणा से अकेले पार पाना असंभव है।

इसलिये उसने अफगान सरदारों को अपनी ओर मिलाने के लिये नया पासा फैंका। बाबर ने अपने युद्ध को ‘जेहाद’ या धर्मयुद्ध के नाम से पुकारा और अफगान सरदारों से अनुरोध किया कि वे इस्लाम की रक्षा के लिये अपनी जागीर छोड़कर सुरक्षित प्रान्तों में चले जायें जहाँ उन्हें उतनी ही बड़ी जागीर मिल जाएगी।

प्रायः समस्त अफगान सरदारों ने बाबर के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार ग्वालियर, बयाना, धौलपुर तथा अन्य दुर्ग बाबर के अधिकार में आ गये जिनमें उसने मुगल सेनाएँ रख दीं।

राणा सांगा द्वारा बयाना पर अधिकार

अफगान सरदार हसन खाँ मेवाती ने बाबर के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। उसने इब्राहीम लोदी के भाई महमूद लोदी को इब्राहीम लोदी का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया और उसे दिल्ली के तख्त पर बैठाने के लिए राणा सांगा से सहायता मांगी। राणा सांगा ने हसन खाँ मेवाती का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। अब हसन खाँ मेवाती तथा राणा सांगा की संयुक्त सेनाएँ आगे बढ़ीं और उन्होंने बयाना पर अधिकार कर लिया।

सीकरी की पराजय

11 फरवरी 1527 को बाबर ने आगरा से प्रस्थान किया। उसने सीकरी के निकट स्थित बड़ी झील के किनारे अपना खेमा लगाया और युद्ध की तैयारी करने लगा। राणा भी अपनी सेना लेकर सीकरी के पास आ गया। सांगा की सेना ने बाबर की सेना के एक अंग पर धावा बोलकर उसे छिन्न-भिन्न कर दिया।

इससे बाबर के सैनिकों में निराशा फैल गई और उनका उत्साह भ¦ होने लगा। इसी समय कुछ अफगान सरदारों ने उपद्रव किया और वे बाबर का साथ छोड़कर चले गये। इससे बाबर की चिन्ता और बढ़ गई। उसने फिर से अपने सैनिकों की सभा बुलाई और उनके सामने पहले की ही तरह ओजपूर्ण भाषण देकर उनसे यह शपथ करवा ली कि मरते दम तक लड़ेंगे।

बाबर ने सैनिकों के समक्ष, शराब नहीं पीने की शपथ ली तथा शराब पीने के सोने-चांदी के बर्तन तोड़कर गरीबों तथा फकीरों में बंटवा दिये। इससे बाबर के सैनिकों का उत्साह बढ़ गया और वे फिर से शत्रु का सामना करने के लिए कटिबद्ध हो गये।

खानवा की लड़ाई

युद्ध का आरम्भ

सीकरी से दस मील की दूरी पर कनवाह अथवा खानवा की लड़ाई नामक स्थान है। इस स्थान पर 27 मार्च 1527 ई. को प्रातः साढ़े नौ बजे बाबर तथा राणा सांगा की सेनाओं में भीषण संघर्ष आरम्भ हुआ। बाबर ने खानवा की लड़ाई के युद्ध में उसी प्रकार की व्यूह रचना की जिस प्रकार की व्यूह रचना उसने पानीपत के मैदान में की थी।

उसने अपनी सेना के सामने गाड़ियों की कतार लगवाकर उन्हें लोहे की जंजीरों से बँधवा दिया। इन गाड़ियों की आड़ में उसने तोपें तथा बंदूक चलाने वालों को रखा जो शत्रु सैन्य पर गोलों तथा जलते हुए बारूद की वर्षा करते थे। उसने अपनी सेना को तीन भागों में विभक्त किया- दाहिना पक्ष, बांया पक्ष तथा मध्यभाग।

दाहिने पक्ष का संचालन हुमायूँ, बायें का मेंहदी ख्वाजा और मध्य भाग का संचालन स्वयं बाबर के नेतृत्व में रखा गया। तोपों तथा बन्दूकों के संचालन का कार्य उस्ताद अली को सौंपा गया। सेना के दोनों सिरों पर बाबर ने तुलगम सैनिक रखे जिनका कार्य युद्ध के जम जाने पर दोनों ओर से घूम कर, शत्रु सैन्य पर पीछे से आक्रमण करना था।

राणा सांगा की पराजय

खानवा की लड़ाई का आरम्भ राजपूतों ने किया। उन्होंने बाबर की सेना के दाहिने पक्ष पर धावा बोलकर उसे अस्त-व्यस्त कर दिया। यह देखकर बाबर ने राजपूतों के बायें पक्ष पर अपने चुने हुए सैनिकों को लगा दिया। इससे युद्ध ने विकराल रूप ले लिया। थोड़ी ही देर में राजपूतों की सेना में घुसने के लिये वामपक्ष तथा मध्यभाग का मार्ग खुल गया।

मुस्तफा रूमी ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए अपने तोपखाने को आगे बढ़ाया और राजपूत सेना पर गोलों तथा जलते हुए बारूद की वर्षा आरम्भ कर दी। मुगलों के बायें पक्ष पर भी भयानक युद्ध हो रहा था। इसी समय तुलगम सेना ने राजपूतों पर पीछे से आक्रमण किया।

राजपूत सेना चारों ओर से घेर ली गई। राजपूतों के लिये तोपों की मार के समक्ष ठहरना असम्भव हो गया। वे तेजी से घटने लगे। राणा सांगा युद्ध में बुरी तरह घायल हो गया। राजपूत सेनापति राणा को रणक्षेत्र से निकाल कर ले गये। सांगा की सेना बुरी तरह परास्त हो गई।

राणा सांगा का निधन

राणा सांगा खानवा की लड़ाई के आरंभिक भाग में ही किसी हथियार की चपेट में आ जाने से बेहोश हो गया था। इसलिये उसके सरदार उसे रणक्षेत्र से निकालकर सुरक्षित स्थान पर ले गये। होश में आने पर सांगा को अपने सरदारों का यह कार्य उचित नहीं लगा।

उसने फिर से युद्ध क्षेत्र में जाने की इच्छा प्रकट की इससे रुष्ट होकर कुछ सरदारों ने सांगा को जहर दे दिया जिससे कालपी में सांगा की मृत्यु हो गई। राणा का शव भरतपुर के निकट बसवा ले जाया गया और वहीं पर उसका अंतिम संस्कार किया गया।

खानवा की लड़ाई में राजपूतों की पराजय के कारण

(1.) बाबर की तुलगम रणनीति

खानवा की लड़ाई के मैदान में राजपूतों की पराजय का सबसे बड़ा कारण बाबर द्वारा अपनाई गई तुलगम रणनीति थी। उसने तुलगम सैनिकों के माध्यम से राजपूतों की सेना को चारों ओर से घेर लिया तथा राजपूत सेना के मध्य में घुसने का भी मार्ग बना लिया। इससे राजपूत सैनिक, आग बरसाती तोपों की मार के सामने ही रहे। उन्हें पीछे हटने का अवसर ही नहीं मिला। तुलगम सेना रक्षा के दृष्टिकोण से निर्बल होती है परन्तु तीव्र आक्रमण के लिये बड़ी उपयोगी होती है। जब बाबर की तुलगम सेना ने राजपूतों को पीछे से घेर लिया तब राजपूतों का भीषण संहार आरम्भ हो गया और वे परास्त हो गए।

(2.) तोपखाने का प्रयोग

बाबर की विजय का दूसरा कारण बाबर द्वारा प्रयुक्त तोपखाना था। राजपूत सैनिक तोपों के सामने लड़ने के अभ्यस्त नहीं थे। तोपों के सामने राजपूतों की प्रत्येक रणनीति एवं वीरता विफल हो गई। उनका अब तक का युद्ध अनुभव भी काम नहीं आया।

(3.) राणा सांगा की सेना की विशालता

बाबर की सेना से युद्ध करते समय जो गलती इब्राहीम लोदी ने की, लगभग वही गलती राणा सांगा ने भी की। वह बाबर की छोटी सेना से लड़ने के लिये विशाल सेना लेकर आ गया। बाबर की छोटी सेना बड़ी ही सुव्यस्थित थी। इससे उसका संचालन सुचारू रीति से हो सकता था। इसके विपरीत राणा सांगा की सेना अत्यन्त विशाल थी जिसका त्वरित संचालन करना अत्यंत कठिन था। जब सांगा की बड़ी सेना आगे से तोपखाने और पीछे से तुलगम सैनिकों के बीच में फंस गई तब वह चाह कर भी युद्ध क्षेत्र से नहीं हट सकी।

(4.) राणा सांगा की रणनीतिक भूल

राणा सांगा ने एक बहुत बड़ी रणनीतिक भूल यह की कि बयाना पर अधिकार कर लेने के उपरान्त उसने तुरन्त बाबर पर आक्रमण नहीं किया। इससे बाबर को सेना की व्यूहरचना के लिए काफी समय मिल गया। यदि राणा ने तुरन्त आक्रमण कर दिया होता तो बाबर को संभलने का अवसर ही नहीं मिलता। न वह अपना तोपखाना सजा पाता और न तुलगम सैनिकों को यथा स्थान नियुक्त कर पाता। ऐसी स्थिति में युद्ध का परिणाम कुछ और ही हो सकता था।

(5.) राणा सांगा का बेहोश हो जाना

खानवा की लड़ाई में बाबर की विजय का बहुत बड़ा कारण युद्ध की प्रारम्भिक अवस्था में ही राणा सांगा का घायल होकर बेहोश हो जाना तथा रण-क्षेत्र से हटा लिया जाना था। सेना के मनोबल को बनाए रखने के लिए झाला नामक सरदार को राणा के वस्त्र पहनाकर उसे हाथी पर बिठा कर युद्ध का संचालन होता रहा। ऐसी स्थिति में राजपूत लोग राणा की योग्यता, उसके रण-कौशल, उसके अनुभव तथा उसके नेतृत्व से वंचित रहे।

खानवा की लड़ाई के परिणाम

भारतीय इतिहास पर खनवा के युद्ध के दूरगामी प्रभाव हुए। इससे भारत के भविष्य का राजनीतिक परिदृश्य बदल गया।

(1.) राणा सांगा के प्रभाव को क्षति

इस युद्ध से पहले राणा सांगा लगातार मालवा, दिल्ली तथा गुजरात के राज्यों को परास्त करता हुआ अपना प्रभाव बढ़ा रहा था। उसने सीकरी के पास बाबर की सेना को भी मार कर भगा दिया था। इस कारण सांगा का प्रभाव बहुत बढ़-चढ़ गया था किंतु खनवा के युद्ध में मिली पराजय से राणा सांगा के प्रभाव को बड़ी क्षति पहुँची। वह युद्ध क्षेत्र में घायल हो गया। उसके असंतुष्ट सरदारों ने उसे विष देकर उसका अंत कर दिया।

(2.) राजपूतों के संघ का बिखराव

खनवा युद्ध में मिली पराजय के बाद राजपूतों का संघ बिखर गया। सांगा की पराजय के बाद राजपूतों का नेतृत्व करने वाला कोई प्रभावशाही हिन्दू नरेश नहीं रहा। इस कारण हिन्दुओं के प्रभाव को बड़ा धक्का लगा और पास-पड़ौस के मुसलमान राज्यों में राजपूतों का भय समाप्त हो गया।

(3.) हिन्दुओं की आशा पर तुषारापात

लोदी सल्तनत के कमजोर पड़ जाने पर हिन्दू शासक उत्तरी भारत में अपनी शक्ति बढ़ाने का जो स्वप्न देख रहे थे वह स्वप्न बिखर गया।

(4.) राजपूताना असुरक्षित

खनवा युद्ध की पराजय के बाद राजपूताना एक बार फिर असुरक्षित हो गया और उस पर पास-पड़ोस के राज्यों के आक्रमण आरम्भ हो गये। राजपूताना की स्वतन्त्रता फिर से खतरे में पड़ गई।

(5.) मुगल साम्राज्य की स्थापना की राह आसान

खनवा युद्ध ने मुगल साम्राज्य की स्थापना का मार्ग खोल दिया। अब बाबर की रुचि अफगानिस्तान से समाप्त होकर पूरी तरह भारत में हो गई। इस युद्ध के बाद बाबर ने गाजी की उपाधि धारण की। गाज का अर्थ होता है बिजली तथा गाजी का अर्थ होता है वह योद्धा जो काफिरों पर बिजली बन कर गिरे।

`मेवात पर अधिकार

बाबर खनवा विजय के उपरान्त बयाना चला गया। यहाँ से वह राजपूताना के भीतर घुसना चाहता था परन्तु भीषण गर्मी के कारण वह मेवात (अलवर) से आगे नहीं बढ़ सका। बाबर ने थोड़े से ही प्रयास से मेवात पर अधिकार कर लिया। मेवात से बाबर सम्भल गया और वहाँ से चन्देरी पर आक्रमण करने की योजनाएँ बनाने लगा।

चन्देरी पर विजय

चन्देरी दुर्ग पर इन दिनों राणा सांगा के दुर्गपति मेदिनी राय का अधिकार था। चन्देरी उन दिनों सम्पन्न नगर था। चन्देरी के सामने 230 फुट ऊँची चट्टान पर चन्देरी का दुर्ग था। यह दुर्ग मालवा तथा बुन्देलखण्ड की सीमाओं पर स्थित था और मालवा से राजपूताना जाने वाली सड़क पर बना हुआ था।

इस कारण चंदेरी व्यापारिक तथा सामरिक दोनों ही दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण था। राणा की पराजय के बाद भी मेदिनी राय ने बाबर के प्रभुत्व को स्वीकार नहीं किया। 29 जनवरी 1528 को बाबर अपनी सेना के साथ चन्देरी पहुँचा। बाबर ने अपने सैनिकों को युद्ध के लिये प्रेरित करने हेतु इस युद्ध को भी ‘जेहाद’ का स्वरूप दिया।

दूसरे दिन बाबर ने चन्देरी के दुर्ग पर आक्रमण कर दिया। राजपूतों ने अपनी पराजय निश्चित जानकर अपनी स्त्रियों को मौत के घाट उतार दिया तथा मरते दम तक मुगलों का सामना करते हुए रणखेत रहे।  भीषण युद्ध के उपरान्त बाबर ने दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इस युद्ध में भी राजपूतों का भीषण संहार हुआ।

अहमदशाह को चन्देरी का शासक नियुक्त किया गया। मेदिनी राय की दो कन्याएँ इस युद्ध में पकड़ी गईं। जिनमें से एक कामरान को और दूसरी हुमायूँ को दे दी गई। चंदेरी विजय बाबर की बड़ी विजयों मे से एक मानी जाती है। यहाँ से भी बाबर को विपुल धन राशि प्राप्त हुई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – मुगलों का राज्य विस्तार

बाबर का भारत आगमन

पानीपत का प्रथम युद्ध

खानवा की लड़ाई

घाघरा का युद्ध

बाबर का चरित्र तथा उसके कार्यों का मूल्यांकन

घाघरा का युद्ध

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घाघरा का युद्ध

घाघरा का युद्ध बाबर एवं अफगानों के बीच लड़ा गया था। जब बाबर ने इब्राहीम लोदी को मारकर अफगानों से दिल्ली एवं आगरा सहित अन्य क्षेत्र छीन लिए तो अफगानों ने महमूद लोदी के नेतृत्व में संगठित होकर बाबर से अंतिम युद्ध लड़ने का निर्णय लिया।

बाबर अब तक पंजाब, दिल्ली, खनवा तथा चन्देरी के युद्ध जीत चुका था। अब वह रायसेन, भिलसा, सारंगपुर तथा चित्तौड़ पर आक्रमण करना चाहता था परन्तु इसी समय उसे अफगानों के उपद्रव की सूचना मिली। इसलिये वह अपनी योजना बदल कर अफगानों के दमन के लिए चल पड़ा।

अफगान लोग भयभीत होकर बिहार तथा बंगाल की ओर भाग गये और महमूद लोदी की अध्यक्षता में संगठित होने लगे। महमूद लोदी, सुल्तान सिकन्दर लोदी का पुत्र और इब्राहीम लोदी का भाई था। पानीपत के युद्ध के उपरान्त हसन खाँ मेवाती तथा राणा सांगा ने उसे इब्राहीम लोदी का उत्तराधिकारी स्वीकार कर लिया था।

खानवा की लड़ाई में वह बाबर के विरुद्ध लड़ा भी था और परास्त होकर कुछ दिनों के लिये मेवाड़ चला गया जहाँ से वह बिहार पहुँचा और अफगानों को मुगलों के विरुद्ध संगठित करने लगा। अफगानों को दण्डित करने के लिये बाबर ने 20 जनवरी 1529 को आगरा से बिहार के लिये कूच किया।

महमूद लोदी भी अपनी सेना के साथ गंगा नदी के किनारे-किनारे चुनार की ओर बढ़ा। 31 मार्च 1529 को बाबर चुनार पहुँच गया। बहुत से अफगान डरकर बाबर की शरण में आ गये और बहुत से अफगान बंगाल की ओर भाग गये। बाबर निरंतर आगे बढ़ता हुआ गंगा तथा कर्मनाशा नदी के संगम पर पहुँच गया।

घाघरा का युद्ध

बाबर ने अफगानों से अन्तिम संघर्ष करने का निश्चय कर लिया। एक मई 1529 को उसने गंगा नदी को पार कर लिया। तीन दिन बाद उसकी सेना ने घाघरा नदी को पार करने का प्रयत्न किया। अफगानों ने उसे रोकने का भरसक प्रयास किया परन्तु बाबर की सेना नदी पार करने में सफल हो गई।

6 मई को घाघरा के तट पर अफगानों तथा मुगलों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में अफगान परास्त हो गये। बहुत से अफगान भयभीत होकर मैदान से भाग खड़े हुए। बाबर ने नसरतशाह को संधि करने के लिये विवश किया। नसरतशाह ने बाबर की अधीनता स्वीकार कर ली तथा भविष्य में विद्रोह नहीं करने का वचन दिया। यह बाबर की भारत में चौथी तथा अन्तिम विजय थी जिसके द्वारा बाबर सम्पूर्ण उत्तरी भारत का स्वामी बन गया।

घाघरा का युद्ध भले ही बाबर एवं अफगानों के बीच लड़ा गया अंतिम निर्णायक युद्ध था किंतु इससे अफगानों की कमर पूरी तरह नहीं टूट सकी। अफगान योद्धा अब भी भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित क्षेत्रों के स्वामी बने रहे। उनमें से बहुत से अफगानों ने हिन्दू राजाओं के यहाँ शरण लेकर अपनी शक्ति के पुनरुद्धार का प्रयास किया और अंत में वे शेरशाह सूरी के नेतृत्व में संगठित होने लगे।

बाबर के युद्धों एवं उपलब्धियों का निष्कर्ष

भारत में बाबर की उपलब्धियाँ तीन भागों में विभक्त की जा सकती हैं- सामरिक उपलब्धियाँ, राजनीतिक उपलब्धियाँ तथा सांस्कृतिक उपलब्धियाँ। बाबर ने पंजाब पर कम से कम पांच बार आक्रमण करके उसे अपने नियंत्रण में किया। उसने पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहीम लोदी को परास्त किया।

खानवा की लड़ाई में सांगा को परास्त किया। चंदेरी के युद्ध में मेदिनी राय को परास्त किया। घाघरा के युद्ध में अफगानों को परास्त किया। ये बाबर की शानदार सामरिक उपलब्धियाँ थीं। बाबर की राजनीतिक उपलब्धियाँ भी अत्यंत महत्वपूर्ण थीं। उसने दिल्ली सल्तनत को सदा के लिये समाप्त कर दिया।

उसने भारत में मंगोलों के राज्य की स्थापना की जो अगले 200 वर्षों तक भारत पर शासन करते रहे। उसने हिन्दुओं को सदा के लिये राजनीतिक शक्ति बनने से वंचित कर दिया। उसने अफगानों को नष्ट प्रायः कर दिया किंतु वे पूरी तरह नष्ट नहीं हुए। उनमें अफगान राज्य के पुनरुत्थान की आशा अब भी जीवित बची थी।

बाबर की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ रचनात्मक नहीं थीं किंतु विध्वंसात्मक अवश्य थीं। इस्लाम के सिपाही के रूप में उसने भारत में काफिर हिन्दुओं का बड़े पैमाने पर विनाश किया। उसने शियाओं का भी दमन किया। उसने भारत के कई महत्वपूर्ण मंदिरों को तोड़कर भारत को शानदार भवनों एवं स्थापत्य के नमूनों से वंचित कर दिया।

जिस कार्य को 125 वर्ष पहले तैमूर लंग ने आरम्भ किया था, उस कार्य को बाबर ने पूरा किया। भारत में विशाल मुगल साम्राज्य के संस्थापक के रूप में वह विश्व इतिहास में अमर हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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पानीपत का प्रथम युद्ध

खानवा की लड़ाई

घाघरा का युद्ध

बाबर का चरित्र तथा उसके कार्यों का मूल्यांकन

बाबर का चरित्र तथा उसके कार्यों का मूल्यांकन

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बाबर का चरित्र

बाबर का चरित्र इतिहासकारों में विवाद का विषय रहा है। कुछ विद्वानों के अनुसार बाबर महान साम्राज्य निर्माता था जबकि अन्य विद्वानों के अनुसार बाबर असमय प्रौढ़ बालक था जिसके कारण उसका व्यक्तित्व विकृतियों का शिकार हो गया थ और वह क्रूर हत्यारा एवं आक्रांता था।

बाबर में मंगोलों की क्रूरता, तुर्कों का साहस एवं ईरानियों की शिष्टता एक साथ मौजूद थे। इस कारण बाबर में अच्छे और बुरे कई विरोधी गुण एक साथ विद्यमान थे।

बाबर का चरित्र

उसके चरित्र तथा कार्यों का मूल्यांकन इस प्रकार से किया जा सकता है-

(1.) व्यक्ति के रूप में

बाबर अत्यंत महत्वाकांक्षी व्यक्ति था। वह अपने  माता-पिता का आज्ञाकारी पुत्र था किंतु अपने पिता के छोटे से राज्य से संतुष्ट नहीं था। उसने हुमायूँ के लिये अपने प्राणों की आहुति देकर पिता-पुत्र के प्रेम की मिसाल कायम की किंतु अपने चाचा अहमद मिर्जा से वह ईर्ष्या करता था तथा उसके राज्य को हड़पने के लिये उसने समरकंद पर कई बार आक्रमण किये।

बाबर अपने मित्रों तथा साथियों को खुले हाथों से उपहार देता था किंतु अपने मामा महमूद खाँ से उसकी बिल्कुल नहीं बनती थी। वह दीन-दुखियों पर दया करता था और उन्हें दान देता था किंतु उसने हिन्दुओं पर कतई दया नहीं दिखाई। उसमें उच्चकोटि का पारिवारिक प्रेम था किंतु उसने निरीह हिन्दुओं के सिर कटवाकर उनके कटे हुए सिरों की मीनारें चिनवाईं।

(2.) पिता के रूप में

बाबर के मन में अपनी पत्नी तथा सन्तान के प्रति प्रगाढ़ स्नेह था। उसके चार पुत्र थे- हुमायूँ, कामरान, अस्करी तथा हिन्दाल। तीन पुत्रियां- गुलबदन बेगम, मासूमा बेगम तथा एक अन्य पुत्री भी थी। बाबर अपने समस्त परिवार से प्रेम करता था किंतु बड़े पुत्र हुमायूँ से विशेष प्रेम करता था। उसने हुमायूँ को सलाह दी थी कि संसार उसका है जो परिश्रम करता है। किसी भी आपत्ति का सामना करने से मत चूकना। परिश्रमहीनता तथा आराम बादशाह के लिये हानिकारक है।

(3.) साहित्य प्रेमी के रूप में

बाबर की साहित्य पढ़ने एवं लिखने में बड़ी रुचि थी। वह फारसी, अरबी तथा तुर्की भाषाओं का ज्ञाता था। वह तुर्की तथा फारसी भाषा में सुन्दर शैली में साहित्यिक रचनाएँ कर सकता था। बाबर ने कई पद्य ग्रन्थ लिखे। उसने एक नयी लेखन शैली को जन्म दिया जिसे ‘खते बाबरी’ कहा जाता है।

तुर्की के सबसे बड़े कवि मीर अली शेर बेग के बाद बाबर को ही स्थान दिया जाता है। उसने गद्य शैली में अपनी आत्मकथा लिखी जिसे बाबरनामा अथवा तुजुक-ए-बाबरी कहा जाता है। इस ग्रंथ को विश्व के महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक माना जाता है। उसमें मनुष्य को परखने की अद्भुत क्षमता थी।

अपने सैनिक अभियानों के दौरान उसने जिन देशों तथा जातियों को देखा, उनका सुन्दर तथा सजीव वर्णन किया। इस प्रकार फारसी, अरबी तथा तुर्की साहित्य के साथ-साथ विश्व के इतिहास लेखन में भी बाबर ने बहुमूल्य योगदान दिया।

(4.) प्रकृति प्रेमी के रूप में

बाबर कवितायें लिखता था इसलिये उसे प्रकृति से विशेष प्रेम था। उपवनों में अत्यन्त रुचि होने के कारण उसे ‘उपवनों का राजकुमार’ कहा गया है। वह उपवन लगाने की नई-नई योजनाएँ बनाता था तथा स्वयं भी उपवनों में अपने हाथ से काम करता था।

(5.) कला प्रेमी के रूप में

बाबर की काव्य कला के साथ-साथ संगीत कला में भी बड़ी रुचि थी। वह अच्छा कवि था तथा स्वयं भी अच्छी तरह गा सकता था। संगीत सुनने में भी उसकी रुचि थी।

(6.) भवन-निर्माता के रूप में

मस्जिदों तथा उपवनों के निर्माण में बाबर की बड़ी रुचि थी। उसने अयोध्या में रामजन्म भूमि पर बाबरी मस्जिद बनवाई। आगरा के लोदी किले में जामा मस्जिद बनवाई। पानीपत में काबुली बाग मस्जिद बनवाई। कश्मीर में निशात बाग बनवाया। लाहौर में शालीमार बाग बनवाया। पंजाब में पिंजोर बाग बनवाया।

वह राजपूताने की सीमा पर ऐसे भवन बनवाना चाहता था जो ठण्डे हों। उसके आदेश से आगरा, सीकरी, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर तथा अन्य नगरों में अनेक भव्य भवनों का निर्माण किया गया।

(7.) सैनिक तथा सेनापति के रूप में

एक सेनापति के रूप में बाबर की सफलताएं उल्लेखनीय हैं। फरगना का शासक रहते हुए उसने समरकंद जीतने के लिये युद्धों की शुरुआत की। इसके बाद वह जीवन भर लड़ता रहा। अपनी आत्मकथा में उसने लिखा है कि उसने अपने जीवन में रमजान का त्यौहार दो बार एक ही जगह पर नहीं बनवाया।

वह एक दुःसाहसी योद्धा था। वह कुशल तीरन्दाज तथा दक्ष घुड़सवार था। वह पराजय से कभी हतोत्साहित नहीं होता था और अपने लक्ष्य की पूर्ति में निरंतर संलग्न रहता था। उसमें सैन्य संचालन की अद्भुत क्षमता थी। युद्ध क्षेत्र में उसकी व्यूह रचना बड़ी अद्भुत होती थी और शत्रु को अस्त-व्यस्त कर देती थी।

रणक्षेत्र में अपने को परिस्थितियों के अनुकूल बना लेने की उसमें अदभुत क्षमता थी। सैनिकों के हतोत्साहित हो जाने पर अपने ओजपूर्ण वक्तव्य द्वारा उनको उत्साहित करने की उसमें विलक्षण प्रतिभा थी।

(8.) शासक के रूप में

कहा जाता है कि बाबर में सामरिक तथा साहित्य प्रतिभा तो थी परन्तु प्रशासकीय प्रतिभा नहीं थी। उसने अफगानिस्तान अथवा भारत में किसी भी ऐसी शासकीय संस्था का निर्माण नहीं किया जिस पर उसके अपने व्यक्तित्त्व की छाप हो। वह जीवन भर युद्धों में इतना व्यस्त रहा कि वह शासकीय संस्थाओं के निर्माण के लिये समय नहीं निकाल सका।

इतना होने पर भी यह कहना सही नहीं है कि एक शासक के रूप में बाबर असफल रहा। उसने शासकीय संस्थाओं का निर्माण भले ही नहीं किया हो किंतु उसने फरगना, समरकंद, काबुल, कन्दहार, गजनी तथा आगरा आदि जिन राज्यों पर भी शासन किया, दृढ़ता पूर्वक शासन किया।

भारत में बाबर ने केवल चार वर्ष तक शासन किया। ये चार वर्ष निरंतर युद्धों में व्यतीत हुए। फिर भी बाबर ने आगरा से काबुल के बीच की सड़कों को सुरक्षित बनाया और प्रत्येक पन्द्रह मील की दूरी पर सरायों का निर्माण करवाया। इन चौकियों पर छः घुड़सवार नियुक्त किये गये जो यात्रियों की सुरक्षा का प्रबंध करते थे।

बाबर ने डाक वितरण की व्यवस्था सुधारने का भी प्रयत्न किया। बाबर अपने मंत्रियों पर पूरा विश्वास रखता था और उन्हें कार्य करने की स्वतन्त्रता देता था। मंत्रियों को अपना कार्य ईमानदारी तथा जिम्मेदारी से करना पड़ता था।

(9.) इस्लाम के अनुयायी के रूप में

बाबर इस्लाम के सिद्धांतों में पूर्ण विश्वास रखता था। इस कारण उसमें मुस्लिम उलेमाओं तथा लेखकों के प्रति बड़ी श्रद्धा थी परन्तु राजनीतिक मामलों में वह उनके प्रभाव से मुक्त रहा। वह सुन्नी मुसलमान था इसलिये शियाओं को भी हिन्दुओं की तरह काफिर कहता था। हिन्दुओं के प्रति उसका दृष्टिकोण अत्यंत कठोर था।

उसने हिन्दुओं के विरुद्ध अपने युद्धों को ‘जेहाद’ कहकर धार्मिक संकीर्णता एवं कट्टरता का परिचय दिया। उसने राजपूतों के सिर कटवाकर उनकी मीनारें खड़ी कीं और उन्हें अपनी ठोकरों से लुढ़काया। उसने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की जन्मभूमि पर बने मंदिर को तोड़कर वहाँ मस्जिद खड़ी करवाई। उसने मुसलमानों को तमगा नामक कर से मुक्त किया।

(10.) साम्राज्य निर्माता के रूप में

साम्राज्य निर्माता के रूप में बाबर का विश्व इतिहास में बड़ा स्थान है। उसने अफगानों तथा राजपूतों की शक्ति को छिन्न-भिन्न करके भारत में विशाल मुगल सल्तनत की स्थापना की जो आगे चलकर अकबर के समय में चरम पर पहुँची। बाबर के द्वारा स्थापित साम्राज्य लगभग 200 साल तक अस्तित्त्व में रहा।

बाबर द्वारा स्थापित साम्राज्य यूरोप के रोमन साम्राज्य की प्रतिस्पर्धा कर सकता था। यद्यपि मुगल साम्राज्य का वास्तविक निर्माता बाबर का पौत्र अकबर था क्योंकि बाबर की मृत्यु के समय उसका राज्य असंगठित, प्रशासन अस्त-व्यस्त और राजकोष रिक्त था। बाबर के खड़े किये हुए राज्य को हुमायूँ ने खो दिया और ईरान के शाह की सहायता से उसे फिर से खड़ा किया।

(11.) कूटनीतिज्ञ के रूप में

बाबर बहुत बड़ा कूटनीतिक था। वह बल का तभी प्रयोग करता था जब कूटनीति से काम नहीं चलता था। भारत के अफगान अमीरों में से अनेक को उसने कूटनीति से अपनी ओर मिला लिया था और उन्हें जागीरें दे दी थीं। अपने अमीरों को भी वह कूटनीति द्वारा अपने नियन्त्रण में रखता था।

यदि बाबर में उच्चकोटि का धैर्य, सहनशीलता और व्यवहारकुशलता न होती तो वह मुगल, चगताई तथा अफगान अमीरों को संतुष्ट नहीं कर सकता था। उसके कूटनीतिज्ञ होने के समर्थन में डैनीसन रीस ने लिखा है- जिस नीति से उसने सुल्तान इब्राहीम के विद्रोही सामन्तों को आपस में एक दूसरे से भिड़ाया, वह मैकियावेली की योग्यता से कम नहीं थी।

बाबर की दुर्बलताएँ

बाबर में अनेक गुणों के साथ-साथ दुर्बलताएँ भी विद्यमान थीं। वह आवश्यकता से अधिक महत्वाकांक्षी था। इस कारण मध्य एशिया से चलता हुआ भारत में आकर शासन करने लगा। उसकी इस महत्वाकांक्षा के चलते लाखों मनुष्यों को मौत के मुँह में समा जाना पड़ा। बाबर आवश्यकता से अधिक मद्यपान करता था।

इस कारण सेना में उसकी विश्वसनीयता के प्रति संदेह बना रहता था। इसलिये उसे सेना के सामने शराब के बर्तनों को तोड़कर तथा कुरान पर हाथ रखकर शराब न पीने की सौगंध खानी पड़ी। युद्ध क्षेत्र में बाबर प्रायः अत्यंत क्रूर होकर शत्रुओं का नाश करता था। बाबर ने अन्य मुसलमान आक्रांताओं की भाँति हिन्दुओं के विरुद्ध जेहाद का नारा बुलंद किया।

अर्सकिन ने बाबर का बचाव करते हुए लिखा है- ‘उसकी क्रूरताएं उस युग की द्योतक थीं न कि व्यक्ति की।’

निष्कर्ष

बाबर की नसों में तैमूरलंग तथा चंगेजखां जैसे क्रूर आक्रांताओं का रक्त बह रहा था। वह अपने युग के बड़े विजेताओं में से था। बाबर जिन्हें पसंद करता था, उनके साथ अच्छा व्यवहार करता था किंतु अपने शत्रुओं का सामूहिक नरसंहार करने में संकोच नहीं करता था।

उसने मध्य एशिया से आकर भारत में अफगानों और राजपूतों को परास्त करके ऐसे साम्राज्य की स्थापना की जिस पर उसके वंशज अगले दो सौ वर्षों तक शासन कर सके। वह दुःसाहसी योद्धा, कुशल घुड़सवार, दक्ष तलवारबाज, प्रतिभावान कवि, प्रकृति से प्रेम करने वाला, अप्रतिम विजेता तथा मुगल साम्राज्य का संस्थापक होने के साथ-साथ क्रूर, अत्याचारी, धर्मांध तथा कट्टर सुन्नी शासक था। हैवेल ने लिखा है कि बाबर इस्लाम के इतिहास का सबसे आकर्षक व्यक्ति था।

बाबर के अन्तिम दिन

बाबर की अस्वस्थता

24 जून 1529 को बाबर घाघरा से आगरा लौट आया। अफगानों के दमन के लिए प्रस्थान करने के पूर्व ही बाबर ने अपने पुत्र हुमायूँ को काबुल तथा बदख्शाँ की देखभाल करने के लिए भेज दिया था। आगरा लौटने पर उसने स्वयं भी काबुल की ओर प्रस्थान किया परन्तु वह केवल लाहौर तक ही जा पाया तथा गंभीर रूप से बीमार पड़ गया।

इतिहासकारों का मानना है कि शराब के अत्यधिक सेवन से बाबर का शरीर दुर्बल एवं बीमार हो गया था। इसलिये वह लाहौर से वापस आगरा लौट आया। इसी समय हुमायूँ को सूचना मिली कि प्रधानमन्त्री ख्वाजा निजामुद्दीन खलीफा, बाबर के बहनोई मीर मुहम्मद मेंहदी ख्वाजा को हुमायूँ के स्थान पर बाबर का उत्तराधिकारी बनाने का षड्यन्त्र रच रहा है।

इसलिये हुमायूँ काबुल से चलकर आगरा आ गया। इस कारण प्रधानमन्त्री ख्वाजा निजामुद्दीन खलीफा का षड्यन्त्र सफल नहीं हुआ। कुछ समय बाद बाबर ने हुमायूँ को संभल का शासक बनाकर भेज दिया।

बाबर की मृत्यु

बाबर की मृत्यु के पीछे मुस्लिम इतिहासकारों ने एक मिथक गढ़ा है जिसके अनुसार 1530 ई. के प्रारम्भ में हुमायूं सम्भल में बीमार पड़ा और उसकी दशा चिंताजनक हो गई। हुमायूँ को आगरा लाया गया परन्तु हकीमों की समस्त औषधियाँ निष्फल सिद्ध हुईं। तब ज्योतिषियों ने बाबर को परामर्श दिया कि ऐसे अवसर पर किसी मूल्यवान वस्तु का त्याग करना चाहिए।

बाबर ने अपने जीवन से अधिक मूल्यवान कोई दूसरी वस्तु नहीं समझी। उसने अपने पुत्र के पलंग की परिक्रमा की और उसके स्वस्थ हो जाने के लिए अल्लाह से दुआ मांगी। उसी दिन से हुमायूं का स्वास्थ्य सुधरने लगा और बाबर का स्वास्थ्य गिरने लगा। 26 दिसम्बर 1530 को आगरा में बाबर की मृत्यु हो गई।

आधुनिक इतिहासकार इस मिथक पर विश्वास नहीं करते। डॉ. एस. आर. शर्मा की खोज ने यह सिद्ध कर दिया है कि हुमायूँ की बीमारी ठीक हो जाने के छः माह बाद बाबर बीमार हुआ। बाबर की बीमारी का हुमायूँ की बीमारी से कोई सम्बन्ध नहीं था। बाबर के शव को पहले आगरा में दफनाया गया किंतु बाद में उसे काबुल ले जाया गया जहाँ उसे बाबर द्वारा पहले से ही नियत स्थान पर दफनाया गया।

हुमायूँ की उत्तराधिकारी के रूप में नियुक्ति

अपनी आँखें बन्द करने से पहले बाबर ने हुमायूँ को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया तथा उसे आदेश दिया कि वह अपने भाइयों के साथ सदैव सद्व्यवहार करे चाहे वे उसके साथ दुर्व्यवहार ही क्यों न करें। हुमायूँ ने अपने पिता की इस आज्ञा का आजन्म पालन किया। यद्यपि इस आज्ञा के कारण उसे बड़े कष्ट उठाने पड़े।

बाबर का भारतीय इतिहास पर प्रभाव

बाबर ने भारतीय इतिहास को कई प्रकार से प्रभावित किया-

(1.) अफगानों एवं राजपूतों की शक्ति का विनाश

बाबर ने अफगानों तथा राजपूतों की शक्ति को छिन्न-भिन्न करके उत्तरी भारत के राजनीतिक शक्ति संतुलन को बदल दिया।

(2.) भारत तथा मध्य एशिया के बीच सम्पर्क की स्थापना

बाबर ने एक बार पुनः भारत तथा पश्चिमी मध्य एशिया के बीच घनिष्ठ सम्पर्क स्थापित कर दिया जिसका राजनीतिक, व्यापारिक तथा सांस्कतिक दृष्टिकोण से बड़ा महत्त्व है।

(3.) भारत में नई रण पद्धतियों का प्रचलन

बाबर ने भारत में नई रण पद्धतियों का प्रचलन आरम्भ किया। उसने तुगलमा पद्धति की प्रभावी भूमिका को रणक्षेत्र में सिद्ध करके दिखा दिया जो आगे चलकर कई शासकों द्वारा अपनाई गई।

(4.) भारत में तोपों तथा तोपखानों का प्रचलन

बाबर ने पानीपत तथा खनवा के युद्धों में बड़ी तोपों का प्रयोग करके तोपखाने की उपयोगिता को सिद्ध किया जिससे भारतीय शासक समझ गये कि तोपखाने तथा अश्वारोहियों के संयुक्त मोर्चे के समक्ष बड़ी से बड़ी सेना का ठहरना कठिन है।

(5.) दुर्गों की अजेयता समाप्त

तोपखाने के प्रयोग ने भारत में दुर्गों की अजेयता को समाप्त कर दिया। तोपखाने के प्रयोग का न केवल सामरिक वरन् सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टिकोण से भी बहुत बड़ा महत्त्व है।

(6.) भारत में मंगालों के शासन की स्थापना

बाबर ने भारत में जिस वंश की स्थापना की, उसके वंशज अगले दो सौ वर्ष तक भारत पर शासन करते रहे।

(7.) हिन्दू राजकन्याओं से बलपूर्वक विवाह करने की परम्परा

बाबर ने चंदेरी के शासक मेदिनी राय की दो पुत्रियों को जबर्दस्ती अपने पुत्रों हुमायूँ तथा कामरान से ब्याह दिया था। बाबर के बाद भी मुगल बादशाहों तथा शहजादों में हिन्दू राजकुमारियों से जबर्दस्ती विवाह करने की परम्परा चलती रही।

(8.) मंगोलों के आक्रमण की समाप्ति

बाबर के भारत पर शासन स्थापित करने से पश्चिम दिशा से होने वाले मंगोलों के आक्रमण समाप्त हो गये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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हुमायूँ और उसकी समस्याएँ

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हुमायूँ और उसकी समस्याएँ

हुमायूँ का पूरा नाम नासिरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ था। बाबर दिल्ली सल्तनत पर अधिकार करने के बाद केवल तीन साल बाद अचानक ही मर गया था, इसलिए हुमायूँ को चारों ओर से समस्याओं ने घेर लिया।

हुमायूँ का प्रारम्भिक जीवन

बाबर के चार पुत्र और तीन पुत्रियाँ थीं जिनमें हुमायूँ सबसे बड़ा था। हुमायूँ का जन्म 6 मार्च 1508 को काबुल में हुआ था। उसकी माँ माहम सुल्ताना हिरात के शिया मुसलमान हुसैन बैकरा के खानदान से थी, उसे माहिज बेगम भी कहते थे। हुमायूँ को तुर्की, अरबी, फारसी भाषओं के साथ-साथ युद्ध करने की शिक्षा भी दी गई थी।

हुमायूँ अपने पिता के जीवन काल में ही अनेक युद्धों में भाग लेने तथा प्रशासकीय कार्य करने अनुभव प्राप्त कर चुका था। उसने पानीपत तथा खनवा के युद्धों में भाग लेकर अपनी सैनिक प्रतिभा का परिचय दिया था। बाबर ने उसे बंगाल तथा बिहार के अफगान अमीरों के विद्रोह का दमन करने की जिम्मेदारी दी थी।

हुमायूँ ने इस कार्य में पूरी सफलता प्राप्त की। हुमायूँ की सफलताओं से प्रसन्न होकर बाबर ने उसे दो बार बदख्शाँ का शासन प्रबन्ध सौंपा। बदख्शाँ पर उजबेग लोग बार-बार आक्रमण करते थे परन्तु हुमायूूॅँ ने उजबेगों को दबाकर वहाँ पर शान्ति तथा व्यवस्था स्थापित की। बाबर ने हुमायूँ को हिसार-फिरोजा तथा सम्भल का शासन सौंपा।

हुमायूँ को आगरा के तख्त की प्राप्ति

बाबर की मृत्यु के चार दिन बाद 30 दिसम्बर 1530 को हुमायूँ आगरा के तख्त पर बैठा। इस विलम्ब का कारण यह था कि बाबर के प्रधानमंत्री निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा ने हुमायूँ के बहनोई मेंहदी ख्वाजा को तख्त पर बैठाने का प्रयत्न किया किंतु बाद में प्रधानमंत्री को यह अनुभव हो गया कि यदि उसने ऐसा किया तो उसका अपना जीवन खतरे में पड़ जायेगा इसलिये उसने हुमायूँ का समर्थन कर दिया।

उस समय हुमायूँ 23 वर्ष का था। उसके बादशाह बनने पर राज्य में खुशियाँ मनायी गईं और दान-दक्षिणा दी गई। राज्य के अफसरों तथा अमीरों ने उसका स्वागत किया और उसकी बादशाहत को सहर्ष स्वीकार किया। इस प्रकार हुमायूँ को तख्त प्राप्त करने में कोई कठिनाई नहीं हुई।

हुमायूँ की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ

यद्यपि हुमायूँ को तख्त प्राप्त करने में विशेष कठिनाई नहीं हुई परन्तु उसका मार्ग बिल्कुल निष्कंटक नहीं था। उसके सामने अनेक कठिनाइयाँ थीं जिनका निराकरण करना आवयक था-

(1.) साम्राज्य की विशालता

बाबर ने थोड़े ही दिनों में अपने सैन्यबल से एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी। यह साम्राज्य पश्चिम में आमू नदी से लेकर पूर्व में बिहार तक फैला था। दक्षिण में मालवा तथा राजपूताना के राज्य उसके साम्राज्य की सीमा पर स्थित थे। इस साम्राज्य को कुछ समय के लिये तो संभाला जा सकता था परन्तु दीर्घकालीन शासन के लिये नवीन शासन व्यवस्थायें करनी आवश्यक थीं। बाबर द्वारा स्थापित साम्राज्य की कोई शासकीय आधारशिला नहीं रखी गई थी।

(2.) साम्राज्य की दुर्बलता

हुमायूँ को अपने पिता से एक अव्यवस्थित राज्य मिला था। बाबर ने अपना राज्य अमीरों तथा सरदारों में बाँट दिया था जो अपने-अपने क्षेत्र में शान्ति तथा व्यवस्था बनाये रखने के लिए उत्तरदायी थे। ये सरदार प्रति वर्ष एक निश्चित राशि सरकारी खजाने में भेजते थे तथा आवश्यकता पड़ने पर बादशाह को सैनिक सहायता उपलब्ध करवाते थे। यह सामन्तीय प्रथा हुमायूँ के लिए खतरे से खाली नहीं थी। अमीर तथा सरदार कभी भी धोखा दे सकते थे और बादशाह तथा सल्तनत के लिए खतरा उत्पन्न कर सकते थे।

(3.) शासन की व्यवस्था

अभी भारत को जीतने के लिये आवश्यक युद्ध पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुए थे कि बाबर की मृत्यु हो गई थी इसलिये हुमायूँ जिस समय तख्त पर बैठा, वह समय युद्ध कालीन परिस्थितियों का था। अभी मुगल तथा अफगान एक दूसरे को उन्मूलित करने में संलग्न थे और उनकी सेनाओं का संचालन निरन्तर होता रहता था। ऐसी स्थिति में हुमायूँ के राज्य में बड़ी राजनीतिक तथा आर्थिक गड़बड़ी फैली हुई थी तथा शासन अस्त-व्यस्त था।

(4.) सेना का असन्तोषजनक संगठन

मुगल सेना का संगठन भी संतोषजनक नहीं था। उसमें मंगोल, उजबेग, तुर्क, चगताई, फारसी, अफगानी तथा भारतीय मुसलमान भर्ती थे। प्रत्येक सेना प्रायः अपने कबीले के नेता की अध्यक्षता में युद्ध करती थी। विभिन्न कबीलों से सम्बन्ध रखने वाली इन सेनाओं में ईर्ष्या-द्वेष व्याप्त था। इस प्रकार मुगल सेना में एकता की भावना नहीं थी। इसलिये युद्ध के समय इस सेना पर बहुत अधिक भरोसा नहीं किया जा सकता था। कई बार सैनिक टुकड़ियां परस्पर संघर्ष करने लगती थीं। यह स्थिति राज्य के लिये अत्यंत घातक थी।

(5.) हुमायूँ के भाइयों के कुचक्र

हुमायूँ को अपने भाइयों की ओर से भी बड़ा खतरा था। हुमायूँॅ के तीन भाई थे- कामरान, अस्करी तथा हिन्दाल। इनमें से कामरान अत्यंत महत्त्वाकांक्षी था। उसमें सामरिक तथा प्रशासकीय प्रतिभा भी थी। इसलिये संभव था कि वह हुमायूँ का प्रतिद्वन्द्वी बनकर स्वयं हिन्दुस्तान का बादशाह बनने का प्रयास करे। अन्य भाई भी हुमायूँ के मार्ग में बाधाएँ उत्पन्न करते थे। इसलिये हुमायूँ को मंगोल शहजादों के कुचक्रों का भी सामना करना था।

(6.) अमीरों के षड्यन्त्र

अनेक मंगोल एवं चगताई अमीर शासन में अपना-अपना प्रभाव बढ़ाने के लिये अलग-अलग शहजादों के समर्थक बन गये। वे इन शहजादों को हुमायूँ के विरुद्ध भड़काकर अपने स्वार्थ की सिद्धि करने लगे। इससे दूर-दूर तक विस्तृत शासन को संभालना और भी कठिन हो गया।

(7.) मिर्जाओं के षड्यन्त्र

मिर्जा उन कुलीन लोगों को कहते थे जो राजवंश से सम्बन्धित होने के कारण स्वयं को तख्त का अधिकारी समझते थे। हुमायूँ को इन मिर्जाओं से उतना ही बड़ा खतरा था जितना अपने भाइयों की ओर से। राज्य में कुछ बड़े ही प्रभावशाली तथा शक्तिशाली मिर्जा विद्यमान थे जो तैमूर के वंशज थे और बाबर के तख्त के उसी प्रकार दावेदार थे जिस प्रकार बाबर के पुत्र।

इनमें सबसे अधिक प्रभावशाली मुहम्मद जमाँ मिर्जा था जिसका विवाह बाबर की पुत्री मासूमा बेगम से हुआ था। पहले वह बिहार का शासक बनाया गया परन्तु बाद में उसे जौनपुर का शासक बनाया गया जो मुगल साम्राज्य की सीमा पर स्थित था। अपने प्रभाव तथा अपनी स्थिति के कारण वह कभी भी हुमायूँ के लिए संकट उत्पन्न कर सकता था।

दूसरा प्रभावशाली मिर्जा मुहम्मद सुल्तान मिर्जा था जो सुल्तान हुसैन की लड़की का पुत्र था। हुमायूँ को इन मिर्जाओं से सतर्क रहना था क्योंकि ये लोग किसी भी संकटापन्न स्थिति में हुमायूँ के राज्य की बन्दरबांट कर सकते थे।

(8.) अफगानों की समस्या

बाबर ने पानीपत तथा घाघरा के युद्धों में अफगानों पर विजय प्राप्त कर ली थी परन्तु वह उनकी शक्ति को पूर्ण रूप से उन्मूलित नहीं कर सका था। बाबर के भय से अफगान छिन्न-भिन्न हो गये थे और उनका नैतिक बल समाप्त प्रायः था परन्तु उनमें से कई अफगान अब भी मंगोलों के आधिपत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे।

उन्होंने बाबर के मरते ही फिर से महमूद लोदी को अपना सुल्तान घोषित कर दिया और उसके झण्डे के नीचे संगठित होने लगे। बिबन, बयाजीद, मारूफ, फार्मूली आदि शक्तिशाली अफगान नेताओं ने अपनी सेनाओं के साथ विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। वे अपनी खोई हुई शक्ति को पुनः स्थापित करने की ताक में थे।

वे बंगाल तथा गुजरात के शासकों से मिलकर मुगलों को भारत से मार भगाने की योजनाएँ बना रहे थे। यदि हुमायूँ इन अफगानों का दमन करने का प्रयत्न करता तो उन्हें बिहार, बंगाल तथा गुजरात के शासकों से सहायता मिल सकती थी।

(9.) गुजरात के शासक बहादुरशाह की समस्या

हुमायूँ को जितना बड़ा खतरा बिहार तथा बंगाल के अफगानों से था उससे कहीं अधिक बड़ा खतरा गुजरात के शासक बहादुरशाह से था। बहादुरशाह बड़ा ही महत्त्वाकांक्षी नवयुवक था। अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने के लिए उसके पास साधन भी थे। उसका राज्य बड़ा सम्पन्न था।

उस के पास हिन्दुस्तान का सबसे अच्छा तोपखाना था और उसे अत्यंत योग्य अफसरों की सेवाएँ प्राप्त थीं। उसके पड़ौसी राज्य उसकी शक्ति से आतंकित रहते थे। राजपूताना, मालवा तथा दक्षिण भारत के राज्यों में बहादुरशाह का विरोध करने की क्षमता नहीं थी।

ऐसे शक्तिशाली अफगान शासक की ओर अन्य अफगान सरदारों का आकृष्ट हो जाना स्वाभाविक ही था। फतेह खाँ, कुतुब खाँ, आलम खाँ आदि कई अफगान सरदार, मुगल दरबार के कोप का भाजन बनने पर गुजरात चले गये। बहादुरशाह ने उनका स्वागत किया और उन्हें जागीरों तथा पदों से पुरस्कृत किया।

इस प्रकार बहादुरशाह हुमायूँ का बड़ा प्रतिद्वन्द्वी बन गया। उत्तर भारत में उसका प्रभाव बढ़ता जा रहा था और उसकी दृष्टि दिल्ली के तख्त पर थी। इसलिये हुमायूँ को उससे भी सतर्क रहना आवश्यक था।

(10.) राजपूतों की ओर से खतरा

यद्यपि बाबर ने खनवा के युद्ध में राणा सांगा को परास्त कर दिया था जिसका राजपूत संघ पर घातक प्रभाव पड़ा था परन्तु राणा सांगा का पुत्र रत्नसिंह फिर से अपनी शक्ति बढ़ाने में लग गया था। अन्य राजपूत राज्य भी स्वयं को संगठित करने तथा अपनी शक्ति बढ़़ाने का प्रयत्न कर रहे थे।

राजपूत शासक मुगलों को घृणा की दृष्टि से देखते थे तथा वे मुगलों को भारत से बाहर निकालने के लिये अफगानों से गठबन्धन कर सकते थे। इसलिये हुमायूँ को उनकी ओर से भी पूरा खतरा था।

(11.) साम्राज्य विभाजन की समस्या

तुर्कों तथा मंगोलों की प्राचीन परंपरा के अनुसार बाबर की मृत्यु के उपरान्त उसका साम्राज्य उसके पुत्रों में विभक्त हो जाना चाहिए था। यदि हुमायूँ इस परम्परा की उपेक्षा करके सारा राज्य अपने अधिकार में रखने का प्रयत्न करता तो सम्भव था कि उसके भाई उनके विरुद्ध विद्रोह कर देते और अमीर लोग उनके साथ एकत्रित होकर उनका समर्थन करते।

अतः हुमायूँ ने अपनी इच्छा के विरुद्ध अपने पिता का साम्राज्य अपने भाइयों में बांट दिया। उसने कामरान को पंजाब, काबुल, तथा बदख्शाँ, अस्करी को सम्भल तथा हिन्दाल को अलवर का राज्य दे दिया। साम्राज्य का शेष भाग हुमायूँ ने अपने पास रखा।

इस प्रकार हुमायूँ ने अपने पिता के साम्राज्य को अपने भाइयों में बाँट दिया परन्तु सिद्धान्तः वह अपने पिता के तख्त का उत्तराधिकारी बना रहा और उसकी प्रभुत्व शक्ति अविभक्त बनी रही। कामरान इस व्यवस्था से सन्तुष्ट नहीं हुआ और अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए योजनाएँ बनाने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – मुगल सल्तनत की अस्थिरता का युग

हुमायूँ और उसकी समस्याएँ

हुमायूँ की सामरिक उपलब्धियाँ

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष

हुमायूँ का पलायन एवं भारत वापसी

हुमायूँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

हुमायूँ की सामरिक उपलब्धियाँ

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हुमायूँ की सामरिक उपलब्धियाँ

हुमायूँ की सामरिक उपलब्धियाँ भारत के मध्यकालीन इतिहास पर गहा प्रभाव डालने वाली सिद्ध हुईं। उसने अपने शत्रुओं का धैर्य पूर्वक मुकाबला किया तथा उन्हें एक-एक करके परास्त करता चला गया। इस कारण भारत में मुगल सल्तनत की फिर से स्थापना संभव हो सकी।

हुमायूँ की सामरिक उपलब्धियाँ

कालिंजर पर आक्रमण

कालिंजर का दुर्ग उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में स्थित था। वह विन्ध्याचल पर्वत पर कई सौ फुट ऊँची चट्टान पर बना हुआ होने के कारण सुरक्षित तथा अभेद्य समझा जाता था। तुर्कों ने कई बार इस पर अधिकार करने का प्रयास किया था। बाबर ने भी हुमायूँ को इस दुर्ग को जीतने के लिए भेजा था परन्तु हुमायूँ को कालिंजर के शासक राजा प्रताप रुद्र से समझौता करके दुर्ग का घेरा उठाना पड़ा था।

बाबर की मृत्यु के बाद राजा प्रताप रुद्र कालपी पर अधिकार जमाने का प्रयत्न करने लगा। इन दिनों कालपी का महत्त्व बहुत अधिक बढ़ गया था क्योंकि गुजरात के शासक बहादुरशाह ने मार्च 1531 में मालवा पर अधिकार कर लिया था जिससे कालपी उसके लिए उत्तरी हिन्दुस्तान में आने के लिए प्रवेश द्वार बन गया था। इसलिये हुमायूँ ने कालिंजर पर फिर से अधिकार करने का निर्णय लिया तथा कालिंजर दुर्ग पर घेरा डाल दिया।

हुमायूँ की सेना एक महीने तक कालिंजर दुर्ग पर गोलाबारी करती रही परन्तु दुर्ग को अधिकार में नहीं किया जा सका। हुमायूँ को कालिंजर में व्यस्त देखकर इब्राहीम लोदी के भाई महमूद लोदी ने जौनपुर पर अधिकार कर लिया और वहाँ से मुगल अफसरों को मार भगाया। इसलिये हुमायूं को एक बार फिर कालिंजर के राजा से समझौता करना पड़ा।

महमूद लोदी से संघर्ष

महमूद लोदी तथा उसके समर्थकों ने सबसे पहले बिहार को अपने अधिकार में कर लिया और वहीं पर एक बहुत बड़ी सेना एकत्रित कर ली। इसके बाद इन लोगों ने मुगल क्षेत्रों पर आक्रमण करने आरम्भ किये। इन लोगों ने जौनपुर से मुगलों को मार भगाया और अवध में भी अपनी सत्ता स्थापित कर ली। इस समय हुमायूँ कालिंजर में था। वह चुनार होता हुआ जौनपुर की ओर बढ़ा परन्तु वर्षा ऋतु आरम्भ हो जाने के कारण वह अफगानों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर सका। इसी समय उसे अपने भाई कामरान के विद्रोह की सूचना मिली। अतः वह आगरा चला गया।

कामरान का विद्रोह

जब कामरान ने देखा कि हुमायूँ अपने शत्रुओं से संघर्ष करने में व्यस्त है तो उसने अफगानिस्तान का प्रबन्ध अपने छोटे भाई अस्करी को सौंप दिया और स्वयं अपनी सेना के साथ पंजाब में घुस आया। कामरान ने मुल्तान तथा लाहौर पर अधिकार करके वहाँ पर अपने अधिकारी नियुक्त कर दिये।

इसके बाद कामरान ने हुमायूँ को चालाकी भरे विनम्र पत्र लिखे कि वह मुल्तान तथा पंजाब के प्रान्त उसे दे दे। चूँकि हुमायूँ के पास अपने साम्राज्य के पश्चिमी भाग में शान्ति बनाये रखने का अन्य कोई उपाय नहीं था। इसलिये उसने कामरान की प्रार्थना स्वीकार कर ली।

महमूद लोदी की पराजय

कामरान को सन्तुष्ट करने के बाद हुमायूँ ने पुनः विद्रोही अफगानों की ओर ध्यान दिया। उसने लखनऊ से थोड़ी दूर पर स्थित दौरान नामक स्थान पर अफगानों के साथ लोहा लिया। अफगानों ने अपने खोये हुए राज्य की प्राप्ति के लिये बड़ी वीरता से युद्ध किया परन्तु वे परास्त हो गये। महमूद लोदी बिहार की ओर भाग गया। उसने फिर कभी युद्ध करने का साहस नहीं किया। जौनपुर पर हुमायूँ का अधिकार हो गया।

बहादुरशाह से संघर्ष

बहादुरशाह की गतिविधियाँ

गुजरात का शासक बहादुरशाह अत्यंत महत्त्वाकांक्षी सुल्तान था। वह निरन्तर अपनी शक्ति में वृद्धि कर रहा था और मुगल साम्राज्य के लिए खतरा उत्पन्न कर रहा था। उसकी दृष्टि दिल्ली के तख्त पर थी। मार्च 1531 में उसने मालवा पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया। मेवाड़ का राज्य, दिल्ली तथा मालवा के बीच स्थित था।

यदि बहादुरशाह मेवाड़ पर अधिकार स्थापित कर लेता तो वह मुगल सम्राज्य की सीमा पर पहुँच जाता और सीधे मुगल साम्राज्य पर आक्रमण कर सकता था। बहादुरशाह ने हुमायूँ केे शत्रु शेरखाँ के साथ गठजोड़ कर लिया था और हुमायूँ के विरुद्ध उसकी सहायता कर रहा था।

बहादुरशाह ने बंगाल के शासक के साथ भी सम्पर्क स्थापित कर लिया था जो हुमायूँ के विरुद्ध षड्यन्त्र रच रहा था। वास्तव में बहादुरशाह का दरबार हुमायूँ के शत्रुओं की शरण स्थली बन गया था। बहुत से विद्रोही अफगान तथा असंतुष्ट मुगल अमीर बहादुरशाह के दरबार में चले गये थे।

इनमें हुमायूँ का बहनोई मुहम्मद जमाँ मिर्जा भी था जिसने हुमायूूूँ के विरुद्ध विद्रोह कर रखा था और वह बयाना के कारागार से भागकर बहादुरशाह के पास पहुँचा था। इन अमीरों ने बहादुरशाह को समझाया कि हुमायूँ एक निकम्मा शासक है और उसकी सेना में कोई दम नहीं है। इसलिये उससे दिल्ली का तख्त प्राप्त करना कठिन नहीं है।

बहादुरशाह ने हुमायूँ के विरुद्ध हाथ आजमाने का निर्णय कर लिया। बहादुरशाह को पुर्तगालियों से भी सैनिक सहायता का आश्वासन मिल गया। बहादुरशाह की गतिविधियां देखकर हुमायूँ भी समझ गया था कि उससे युद्ध होना अनिवार्य है। उसने बहादुरशाह को पत्र लिखा कि वह उसके शत्रुओं को, विशेषकर मुहम्मद जमाँ मिर्जा को अपने यहाँ शरण नहीं दे। बहाुदरशाह ने हुमायूँ को संतोषजनक उत्तर नहीं दिया। इस पर हुमायूँ ने उससे युद्ध करने का निश्चय किया।

हुमायूँ का प्रस्थान

1535 ई. में हुमायूं अपनी सेना के साथ आगरा से प्रस्थान करके ग्वालियर पहुँच गया और वहीं से बहादुरशाह की गतिविधियों पर दृष्टि रखने लगा। थोड़े दिनों बाद हुमायूँ और आगे बढ़ा तथा उज्जैन पहुँच गया। इन दिनों बहादुरशाह चित्तौड़ का घेरा डाले हुए था।

कहा जाता है कि चित्तौड़ के राणा विक्रमादित्य की माता, रानी कर्णवती ने हुमायूं को राखी भेजकर उससे सहायता मांगी। यह हुमायूँ के लिए स्वर्णिम अवसर था परन्तु हुमायूं ने इससे कोई लाभ नहीं उठाया। उसने यह सोचकर कि बहादुरशाह काफिरों से युद्ध कर रहा है और यदि हुमायूँ ने काफिरों की सहायता की तो उसे कयामत के समय उत्तरदायी होना पड़ेगा, राजपूतों की कोई सहायता नहीं की।

इसका परिणाम यह हुआ कि चित्तौड़ पर बहादुरशाह का अधिकार स्थापित हो गया और उसकी शक्ति में बड़ी वृद्धि हो गई। उसने चित्तौड़ को खूब लूटा तथा अपार धन सम्पत्ति प्राप्त की।

बहादुरशाह पर आक्रमण

अब हुमायूँ की भी आँखें खुलीं और वह बहादुरशाह पर आक्रमण करने के लिए वह आगे बढ़ा। बहादुरशाह ने हुमायूँ का मार्ग रोकने के लिये मन्दसौर में चारों ओर से खाइयाँ खुदवा कर मोर्चा बांधा। उसने अपने तोपखाने को सामने करके अपनी सेना उसके पीछे छिपा दी। हुमायूँ को इसका पता लग गया।

इसलिये हुमायूँ के अश्वारोहियों ने दूर से ही बहादुरशाह की सेना पर बाण वर्षा आरम्भ की तथा बहादुरशाह के तोपखाने को बेकार कर दिया। हुमायूँ ने उसके रसद मार्ग को भी काट दिया। इस पर बहादुरशाह मन्दसौर से भाग कर माण्डू चला गया। मुगल सेना ने तेजी से बहादुरशाह का पीछा किया।

बहादुरशाह केवल पाँच स्वामिभक्त अनुयायियों के साथ चम्पानेर भाग गया। माण्डू के दुर्ग पर मुगलों का अधिकार हो गया। चम्पानेर पहुँचने पर बहादुरशाह ने अपने हरम की स्त्रियों तथा अपने खजाने को ड्यू भेज दिया जो पुर्तगालियों के अधिकार में था। इसके बाद बहादुरशाह ने चम्पानेर में आग लगवा दी जिससे शत्रु कोई लाभ नहीं उठा सके।

इसके बाद बहादुरशाह खम्भात भाग गया। हुमायूँ ने एक हजार अश्वारोहियों के साथ उसका पीछा किया। बहादुरशाह भयभीत होकर ड्यू भाग गया और उसने पुर्तगालियों के यहाँ शरण ली। हुमायूँ भी खम्भात पहुँच गया तथा उसे लूटकर जलवा दिया। हुमायूँ ने खम्भात में रहकर पुर्तगालियों के साथ मैत्री स्थापित करने का प्रयत्न किया परन्तु वह सफल नहीं हो सका। पुर्तगालियों ने बहादुरशाह के साथ गठबन्धन कर लिया और उसकी सहायता करने का वचन दिया।

हुमायूँ का गुजरात पर अधिकार

हुमायूं खम्भात से चम्पानेर लौट आया। उसने चम्पानेर दुर्ग पर अधिकार कर लिया जहाँ से उसे अपार सम्पत्ति प्राप्त हुई। हुमायूँ ने इस सम्पत्ति को भोग-विलास में व्यय कर दिया। थोड़े ही दिनों बाद हुमायूँ चम्पानेर से अहमदाबाद की ओर बढ़ा और गुजरात पर अधिकार कर लिया। हुमायूँ ने अस्करी मिर्जा को गुजरात का शासक नियुक्त किया। गुजरात की व्यवस्था करने के उपरान्त हुमायूँ ड्यू की ओर बढ़ा परन्तु इसी समय उसे उत्तरी भारत में विद्रोह होने की सूचना मिली। इसलिये उसने आगरा के लिए प्रस्थान किया।

बहादुरशाह की मृत्यु

हुमायूँ के लौटते ही बहादुरशाह तथा उसके समर्थकों ने मुगलों को गुजरात से खदेड़ना आरम्भ कर दिया। अस्करी ने चम्पानेर के शासक तार्दी बेग से सहायता मांगी किंतु तार्दीबेग ने अस्करी की सहायता करने से मना कर दिया। हुमायूँ भी अस्करी की सहायता के लिये सेना नहीं भेज सका।

इसलिये बहादुरशाह ने गुजरात तथा मालवा पर फिर से अधिकार कर लिया किंतु वह इस विजय का बहुत दिनों तक उपभोग नहीं कर सका। फरवरी 1537 में जब वह ड्यू के पुर्तगाली गवर्नर से मिलने गया, तब समुद्र में डूब कर मर गया।

इस प्रकार हम देखते हैं कि हुमायूँ की सामरिक उपलब्धियाँ मध्यकालीन इतिहास में प्रमुख स्थान रखती हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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हुमायूँ और उसकी समस्याएँ

हुमायूँ की सामरिक उपलब्धियाँ

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष

हुमायूँ का पलायन एवं भारत वापसी

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हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष

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हुमायूँ - शेर खाँ संघर्ष

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष हुमायूँ के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी थी। इस संघर्ष के कारण हूमायूँ को न केवल अपना राज्य छोड़कर अपितु भारत छोड़कर भी भाग जाना पड़ा।

शेर खाँ हुमायूँ का सबसे भयंकर शत्रु सिद्ध हुआ। वह अफगानों का नेता था। उसने दक्षिण बिहार पर अधिकार स्थापित करके चुनार का दुर्ग भी जीत लिया। यह दुर्ग आगरा से पूर्व की ओर जाने वाले स्थलों तथा नदियों के मार्ग में पड़ता था। इस कारण उसे पूर्वी भारत का फाटक कहा जाता था तथा सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। हुमायूँ तथा शेर खाँ दोनों ही उसे अपने अधिकार में रखना चाहते थे।

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष – चुनार के लिए संघर्ष

1531 ई. में जब हुमायूँ कालिंजर के दुर्ग का घेरा डाले हुए था तब उसे पूर्व में अफगानों के उपद्रव की सूचना मिली। अतः हुमायूँ कालिंजर का घेरा उठाकर चुनार के लिए चल दिया। चुनार पहुँचते ही उसने दुर्ग का घेरा डाला परन्तु वह दुर्ग को प्राप्त नहीं कर सका।

चूँकि महमूद लोदी ने जौनपुर पर अधिकार कर लिया था, इसलिये हुमायूँ ने चुनार का घेरा उठा लिया और महमूद लोदी का सामना करने के लिए आगे बढ़ा। महमूद लोदी से छुटकारा पाने के बाद हुमायूँ ने फिर चुनार की ओर ध्यान दिया। उसने शेर खाँ से कहा कि चुनार का दुर्ग वह उसे लौटा दे।

हुमायूँ ने चुनार के दुर्ग पर अधिकार करने के लिए हिन्दू बेग को चुनार भेज दिया। शेर खाँ ने दुर्ग देने से मना कर दिया। इस पर हुमायूँ भी सेना लेकर चुनार पहुँच गया। चार महीने घेरा चलता रहा परन्तु अफगानों ने मुगलों को दुर्ग नहीं दिया।

शेर खाँ से संधि

इसी बीच परिस्थितियों ने पलटा खाया और दोनों ही पक्ष समझौता करने के लिए तैयार हो गये। शेर खाँ अपनी शक्ति बंगाल की ओर बढ़ाना चाहता था। इसलिये वह मुगलों के साथ संघर्ष नहीं चाहता था। बंगाल का शासक नसरत शाह, शेर खाँ जैसे महत्त्वाकांक्षी सेनापति की बढ़ती हुई शक्ति से चिन्तित था और शेर खाँ से समझौता करने के लिए प्रस्तुत था।

शेर खाँ ने इस अनुकूल परिस्थिति से लाभ उठाने का प्रयत्न किया। उसने हुमायूँ के साथ सन्धि की बातचीत आरम्भ की तथा हुमायूँ से प्रार्थना की कि वह चुनार का दुर्ग शेर खाँ के अधिकार में छोड़ दे। इसके बदले में शेर खाँ ने अपने तीसरे पुत्र कुत्ब खाँ को एक सेना के साथ हुमायूँ की सेवा में भेजना स्वीकार कर लिया।

हुमायूँ ने शेर खाँ की प्रार्थना स्वीकार कर ली और आगरा लौट गया। इस समझौते से हुमायूं की प्रतिष्ठा को धक्का लगा तथा शेर खाँ को अपनी योजनाएँ पूर्ण करने का अवसर मिल गया।

शेर खाँ की तैयारियाँ

शेर खाँ से समझौता करने के बाद हुमायूँ, बहादुरशाह की गतिविधि जानने के लिए ग्वालियर की ओर चला गया। इधर शेर खाँ अपनी योजनाओं को कार्यान्वित करने में लग गया। थोड़े ही समय में उसने बिहार में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली और वह पूर्व के समस्त अफगानों का नेता बन गया।

उसने उन्हें यह आश्वासन दिया कि यदि वे संगठित होकर मुगलों का सामना करेंगे तो वह मुगलों को भारत से निकाल बाहर करेगा तथा भारत में पुनः अफगानों की सत्ता स्थापित कर देगा। इसका परिणाम यह हुआ कि दूर-दूर से अफगान सरदार उसके झंडे के नीचे आकर एकत्रित होने लगे।

उसने गुजरात के शासक बहादुरशाह के साथ भी सम्पर्क स्थापित किया जिसने धन से उसकी बड़ी सहायता की। शेर खाँ ने एक व्यवस्थित आर्थिक नीति का अनुसरण करके बहुत सा धन इकट्ठा कर लिया। इस धन की सहायता से उसने एक विशाल सेना तैयार की।

यद्यपि शेर खाँ ने अपने पुत्र कुत्ब खाँ को कुछ सैनिकों के साथ हुमायूँ की सेवा में भेजने का वचन दिया था परन्तु उसने इस वादे को पूरा नहीं किया और अपनी सेना बढ़ाने में लगा रहा। उसने गंगा के किनारे-किनारे अपनी शक्ति का विस्तार करना आरम्भ किया और चुनार तक के सम्पूर्ण प्रदेश पर अधिकार कर लिया।

शेर खाँ ने बंगाल पर आक्रमण कर दिया जिसकी स्थिति उन दिनों बड़ी डाँवाडोल थी। शेर खाँ अपनी विशाल सेना के साथ गौड़ के द्वार पर आ डटा। बंगाल के शासक महमूदशाह ने शेर खाँ से संधि कर ली और उसे तेरह लाख दीनार देकर अपना पीछा छुड़ाया परन्तु शेर खाँ ने इसका यह अर्थ निकाला कि महमूदशाह ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली है और वह उसे आर्थिक कर दिया करेगा।

जब हुमायूँ आगरा लौटकर आया तब उसे शेर खाँ की गतिविधियों की जानकारी मिली किन्तु हुमायूँ तुरन्त शेर खाँ के विरुद्ध कोई कार्यवाही करने की स्थिति में नहीं था। इसी बीच हुमायूँ ने हिन्दू बेग को जौनपुर का गवर्नर बना कर भेजा और उसे यह आदेश दिया कि वह पूर्व की स्थिति से उसे अवगत कराये।

शेर खाँ ने कूटनीति से काम लेते हुए चुनार तथा बनारस को छोड़कर, पूर्व के समस्त जिलों से नियंत्रण हटा लिया। उसने हिन्दू बेग के पास बहुमूल्य भेंटें भेजीं और हुमायूँ के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट की। हिन्दू बेग को संतोष हो गया और वह शेर खाँ की ओर से निश्चिन्त हो गया। उसने हुमायूँ को संदेश भेजा कि पूर्व की स्थिति बिल्कुल चिन्ताजनक नहीं है।

हुमायूँ भी निश्चिन्त हो गया। कठिनाई से एक-दो माह बीते थे कि हुमायूँ को सूचना मिली की शेर खाँ ने बंगाल पर फिर आक्रमण कर दिया है क्योंकि महमूदशाह ने उसे आर्थिक भेंट नहीं भेज थी। इससे हुमायूँ का सतर्क हो जाना स्वाभाविक ही था। शेर खाँ ने एक विशाल सेना खड़ी कर ली थी।

शेर खाँ के साधनों में भी बड़ी वृद्धि हो चुकी थी। उसने चुनार से गौड़ तक के सम्पूर्ण प्रदेश पर अपनी धाक जमा ली थी। वह भारत में एक बार फिर से अफगान राज्य स्थापित करने का स्वप्न देख रहा था। इन  कारणों से हुमायूँ, शेर खाँ के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए बाध्य हो गया।

हुमायूँ का प्रस्थान

जुलाई 1537 में वर्षा ऋतु आरम्भ हो जाने पर भी हुमायूँ ने आगरा से प्रस्थान किया। उसने कई महीने तक कड़ा मानिकपुर में पड़ाव डाले रखा तथा वहाँ से चलकर नवम्बर 1537 में चुनार से कुछ मील दूर पड़ाव डाला। अफगान सरदारों ने हुमायूँ को परामर्श दिया कि वह सीधा गौड़ जाये और शेर खाँ की बंगाल विजय की योजना को विफल कर दे परन्तु मुगल सरदारों ने परामर्श दिया कि चुनार जैसे महत्त्वपूर्ण दुर्ग को, जो बंगाल के मार्ग में पड़ता था, शेर खाँ के हाथ में छोड़ना ठीक नहीं है।

चुनार जीत लेने से हुमायूँ के साधनों में भी वृद्धि हो जायेगी, आगरा का मार्ग सुरक्षित बना रहेगा और चुनार को आधार बनाकर पूर्व के अफगानों के साथ युद्ध किया जा सकेगा। हुमायूँ को शेर खाँ की शक्ति का सही अनुमान नहीं था इस कारण हुमायूँ को लगा कि बंगाल का शासक कुछ दिनों तक अपने राज्य की रक्षा कर सकेगा।

इसलिये हुमायूँ ने मुगल सरदारों के परामर्श को स्वीकार करके चुनार पर आक्रमण कर दिया। मुस्तफा रूमी खाँ ने बादशाह को यह आश्वासन दिया कि तोपखाने की सहायता से दुर्ग पर शीघ्र ही अधिकार स्थािपत हो जाएगा परन्तु ऐसा नहीं हो सका। दुर्ग को जीतने में लगभग 6 माह लग गये। इस विलम्ब के परिणाम बड़े भयानक हुए।

कुछ विद्वानों की धारणा है कि इस भयंकर भूल के कारण ‘हुमायूँ को अपना साम्राज्य खो देना पड़ा।’ हुमायूँ ने इस अवसर पर एक और भूल की। जब उसने चुनार के दुर्ग पर अधिकार किया तब उसे या तो इस दुर्ग को नष्ट कर देना चाहिए था या उसकी सुरक्षा का प्रबंध करना चाहिए था परन्तु हुमायूँ ने इन दोनों में से एक भी काम नहीं किया। शेर खाँ को चुनार खो देने का कोई दुःख नहीं हुआ क्योंकि उसने राजा चिन्तामणि से विश्वासघात करके रोहतास के सुदृढ़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया था।

हुमायूं का गौड़ पर अधिकार

चुनार जीतने के बाद हुमायूँ बनारस चला गया जहाँ उसे सूचना मिली कि शेर खाँ ने गौड़ पर अधिकार जमा लिया है। चूँकि वर्षा ऋतु आरम्भ हो गई थी इसलिये हुमायूँ ने शेर खाँ से युद्ध करने के स्थान पर समझौता करना चाहा परन्तु समझौते की वार्ता सफल नहीं हुई और विवश होकर हुमायूँ को शेर खाँ से युद्ध करने का निश्चय करना पड़ा।

इसी समय बंगाल के शासक महमूदशाह ने भी शेर खाँ के विरुद्ध हुमायूँ से सहायता की याचना की। हुमायूँ ने उसकी सहायता करने तथा उसे फिर से बंगाल की गद्दी पर बैठाने का वचन दिया परन्तु बंगाल में कदम रखने के पहले ही हुमायूँ को सूचना मिली की महमूदशाह की मृत्यु हो गई है और उसके दोनों पुत्रों की हत्या हो गई है। इस प्रकार हुसैनी राजवंश के समाप्त हो जाने पर हुमायूँ के लिए बंगाल पर अधिकार करना और शेर खाँ के साथ लोहा लेना अनिवार्य हो गया। इसलिये हुमायूँ ने सितम्बर 1538 में गौड़ पर अधिकार कर लिया।

हिन्दाल का विद्रोह

हुसैनी वंश का पतन हो जाने के बाद बंगाल में बड़ी गड़बड़ी फैल गई। इसलिये वहाँ पर शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित करने एवं अपनी थकी हुई सेना को विश्राम देने के लिये हुमायूँ तीन-चार माह तक बंगाल में ही ठहर गया। हुमायूँ ने हिन्दाल मिर्जा को उसकी जागीर तिरहुत तथा पुनिया में भेज दिया ताकि वहा से रसद लाई जा सके किंतु हिन्दाल हुमायूँ की आज्ञा का पालन न करके आगरा चला गया।

इस प्रकार हुमायूँ का उसके साथ सम्पर्क समाप्त हो गया। हिन्दाल के इस व्यवहार से हुमायूँ को बड़ी चिन्ता हुई। उसने वास्तविकता का पता लगाने के लिय शेख बहलोल को आगरा भेजा। हिन्दाल के कर्त्तव्य भ्रष्ट हो जाने के कारण हुमायूँ की सेना में रसद की कमी हो गई। इधर शेर खाँ ने आगरा जाने वाले मार्गों पर नियन्त्रण कर लिया।

इन परिस्थितियों में बंगाल में रुकने और वहीं से वापसी यात्रा की तैयारी करने के अतिरिक्त हुमायूं के पास कोई चारा नहीं बचा। थोड़े ही दिनों में हुमायूँ को सूचना मिली कि हिन्दाल ने प्रभुत्व शक्ति अपने हाथ में ले ली है तथा शेख बहलोल की हत्या कर दी गयी है। इस कारण पश्चिम की ओर से शेर खाँ पर किसी भी प्रकार से दबाव पड़ने की आशा नहीं है और शेर खाँ ने बनारस से कन्नौज तक के सम्पूर्ण प्रदेश पर अधिकार जमा लिया है। इस सूचना के बाद हुमायूँ ने बंगाल से शीघ्र ही प्रस्थान करने का निश्चय किया।

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष – चौसा का युद्ध

हुमायूँ बंगाल का प्रबन्ध जहाँगीर कुली खाँ को सौंपकर आगरा के लिए चल दिया। पहले वह उत्तर के मार्ग से चला परन्तु उसे मिर्जा अस्करी ने सूचना दी कि अफगानों ने विरोध करने की पूरी तैयारी कर ली है। इसलिये हुमायूँ ने अपना मार्ग बदल दिया। मुंगेर के निकट उसने गंगा नदी को पार किया तथा दक्षिण की ओर चलता हुआ चौसा पहुँच गया।

मार्च 1539 में उसने कर्मनाशा नदी को पार करके उसके पश्चिमी तट पर पड़ाव डाला। शेर खाँ ने हुमायूँ के साथ सन्धि की भी वार्ता आरम्भ की और चुपके से उस पर आक्रमण करने की भी तैयारियाँ करता रहा। शेर खाँ के कहने से हुमायूँ नदी के दूसरे तट पर आ गया।

जब शेर खाँ को पता लगा कि हुमायूँ के पास रसद की बड़ी कमी है और उसे अपने भाइयों से सहायता मिलने की सम्भावना नहीं है। तब एक दिन प्रातःकाल में वह मुगल सेना पर टूट पड़ा और उसे तीन ओर से घेर लिया। मुगल सेना में भगदड़ मच गई और वह कर्मनाशा के तट की ओर भाग खड़ी हुई।

चूँकि अफगानों द्वारा नदी का पुल नष्ट कर दिया गया था इसलिये मुगलों ने तैरकर नदी पार करने का प्रयत्न किया। अफगानों ने बड़ी क्रूरता से मुगलों का वध किया। लगभग सात हजार मुगलों के प्राण गये जिनमें से कई  बड़े अधिकारी भी थे। हुमायूँ स्वयं अपने घोड़े के साथ नदी में कूद पड़ा। घोड़ा नदी में डूब गया।

हुमायूँ स्वयं भी डूबने ही वाला था कि एक भिश्ती ने अपनी मशक की सहायता से उसके प्राण बचाये। अफगानों ने मुगलों का पीछा किया। हुमायूँ मिर्जा अस्करी के साथ कड़ा मानिकपुर पहुँचा और वहाँ से कालपी होता हुआ जुलाई 1539 में आगरा पहुँच गया। आगरा पहुँचकर हुमायूँ ने एक दरबार किया जिसमें उसने आधे दिन के लिए उस भिश्ती को तख्त पर बिठा कर उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट की जिसने कर्मनाशा नदी में हुमायूँ की जान बचाई थी।

कामरान के मन में संदेह

हुमायूँ के आगरा पहुँचने के पहले ही हिन्दाल के विद्रोह को दबाने के लिये कामरान लाहौर से आगरा चला आया था। हिन्दाल डरकर अलवर भाग गया परन्तु कामरान ने उसे वहाँ से बुला लिया। अब चारों भाई आगरा में एकत्रित हुए और शेर खाँ का सामना करने के लिए योजनाएँ बनाने लगे।

चौसा के युद्ध में परास्त हो जाने पर भी अमीरों ने हुमायूँ का साथ नहीं छोड़ा परन्तु हुमायूँ की सेना छिन्न-भिन्न हो गई थी। कामरान के पास अब भी एक सुशिक्षित तथा सुदृढ़ सेना उपलब्ध थी जिसका प्रयोग अफगानों के विरुद्ध किया जा सकता था परन्तु इसी बीच कामरान बीमार पड़ गया और लगभग तीन माह तक बिस्तर पर पड़ा रहा।

चारों तरफ अफवाह फैल गई कि हुमायूँ ने उसे विष दिलवाया है। कामरान के मन में भी हुमायूँ के प्रति संदेह उत्पन्न हो गया। कामरान को पंजाब छोड़े लगभग एक वर्ष हो गया था और उत्तर-पश्चिम की राजनीति में इतने बड़े परिवर्तन हो रहे थे कि कामरान को पंजाब तथा कन्दहार की रक्षा की चिन्ता हो रही थी।

इसलिये कामरान ने आगरा से तुरन्त चले जाने का निश्चय कर लिया। हुमायूँ चाहता था कि कामरान अपनी पूरी सेना आगरा में छोड़ दे परन्तु कामरान ने ऐसा नहीं किया। वह केवल तीन हजार सैनिकों को हुमायूँ की सेवा में छोड़कर लाहौर चला गया।

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष कन्नौज अथवा बिलग्राम का युद्ध

चौसा की विजय के उपरान्त शेर खाँ ने स्वयं को बनारस में स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और सुल्तान-ए-आदिल की उपाधि धारण की। अफगान सेना ने बंगाल को फिर से जीत लिया और वहाँ के मुगल गवर्नर की हत्या कर दी। अब शेर खाँ ने भारत विजय की योजना बनाई।

उसने अपने पुत्र कुत्ब खाँ को यमुना नदी के किनारे-किनारे आगरा की ओर बढ़ने का आदेश दिया और स्वयं एक सेना के साथ कन्नौज के लिए चल पड़ा। कुत्ब खाँ का कालपी के निकट मुगल सेना से भीषण संघर्ष हुआ जिसमें कुत्ब खाँ परास्त हुआ और मारा गया। 13 मार्च 1540 को हुमायूँ ने शेरशाह का सामना करने के लिए आगरा से प्रस्थान किया।

हुमायूँ ने गंगा नदी को पार करके उसके किनारे पड़ाव डाला। अब वह शेरशाह की गतिविधि को देखता रहा। शेरशाह भी खवास खाँ की प्रतीक्षा कर रहा था। जब खवास खाँ पूर्व से कन्नौज आ गया तब शेरशाह युद्ध करने के लिए तैयार हो गया। मुगलों की सेना, अफगान सेना की अपेक्षा कुछ निचले स्थान में थी।

हुमायूँ जिस स्थान पर वह पड़ाव डाले हुए था, वह स्थान वर्षा के कारण पानी से भर गया। हुमायूँ ने अपनी सेना को ऊंचे स्थान पर ले जाने का प्रयत्न किया। ठीक इसी समय शेरशाह मुगल सेना के दोनों पक्षों पर टूट पड़ा। मुगल सेना में भगदड़ मच गई। हुमायूँ ने हिन्दाल तथा अस्करी के साथ गंगा नदी को पार कर लिया और भाग कर आगरा पहुँच गया।

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष – हुमायूँ का पलायन

शेरशाह ने मुगलों का पीछा नहीं छोड़ा। उसने एक सेना सम्भल की ओर तथा दूसरी सेना आगरा की ओर भेजी। हुमायूँ अत्यन्त भयभीत हो गया। वह केवल एक रात आगरा में रहा तथा दूसरे दिन अपने परिवार और कुछ खजाने के साथ दिल्ली के लिए प्रस्थान कर दिया। रोहतास में हिन्दाल भी उससे आ मिला। अब दोनों भाइयों ने लाहौर के लिए प्रस्थान किया।

लाहौर में मिर्जा अस्करी भी उनसे आ मिला। अब चारों भाइयों ने मिलकर संकटापन्न स्थिति पर विचार करना आरम्भ किया परन्तु उन्हें शेरशाह से लोहा लेना असम्भव प्रतीत हुआ। कामरान ने पंजाब को भी सुरक्षित रखने की आशा छोड़ दी। इसलिये उसने अफगानिस्तान जाने तथा काबुल एवं कन्दहार को सुरक्षित रखने का निश्चय किया।

कामरान तथा मिर्जा अस्करी अफगानिस्तान चले गये। हुमायूँ ने हिन्दाल के साथ सिन्ध के लिए प्रस्थान किया। अब शेरशाह के लिए रास्ता साफ था। वह तेजी से आगे बढ़ा और उसने सम्पूर्ण पंजाब पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार उसने मुगलों को सिन्ध नदी के उस पार खदेड़ दिया और बाबर के पुत्रों को भारत से निष्कासित कर दिया।

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष – हुमायूँ की विफलता के कारण

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि जिस साम्राज्य की स्थापना बाबर ने पानीपत तथा घाघरा के युद्धों में अफगानों को परास्त करके की थी, उसे हुमायूँ ने चौसा तथा कन्नौज के युद्धों में शेरशाह से पराजित होकर खो दिया। हुमायूँ अनुभवी सेनानायक था, फिर भी वह शेरशाह के समक्ष असफल हो गया। हुमायूँ की विफलता के कई कारण थे-

(1.) मिर्जाओं का असहयोग

मुहम्मद जमान मिर्जा, मुहम्मद सुल्तान मिर्जा, मेंहदी ख्वाजा आदि तैमूरवंशीय मिर्जा वर्ग के अमीर, बाबर के सहयोगी रहे थे तथा स्वयं को बाबर के समान ही मंगोलों के तख्त का अधिकारी समझते थे। उनमें से अधिकतर मिर्जाओं ने हुमायूँ का साथ नहीं दिया तथा हुमायूँ के विरोधियों के साथ मिल गये। इस कारण हुमायूँ की सैनिक शक्ति क्षीण हो गई और वह लम्बे समय तक अपने शत्रुओं का सामना नहीं कर सका।

(2.) भाइयों का असहयोग

इतिहासकारों ने हुमायूँ की विफलता का सबसे बड़ा कारण उसके भाइयों का असहयोग करना बताया है। हुमायूँ ने अपने राज्य का बहुत बड़ा हिस्सा अपने भाइयों को दे दिया था किंतु भाइयों ने समय पर हुमायूँ की सहायता नहीं की। परन्तु इतिहासकारों की यह धारणा सही नहीं है क्योंकि हुमायूँ के शासन के प्रथम दस वर्षों में कामरान ने उसके साथ किसी प्रकार की शत्रुता नहीं रखी वरन् वह उसका सम्मान करता रहा और उसके प्रति निष्ठावान बना रहा।

जब मिर्जा हिन्दाल ने विद्रोह किया था तब कामरान लाहौर से आगरा चला आया था और हिन्दाल को सही रास्ते पर लाने में हुमायूँ की सहायता की थी। कन्नौज के युद्ध के बाद, कामरान का हुमायूँ में विश्वास नहीं रह गया और उसका साथ छोड़ दिया। जब हुमायूँ ने अपने साम्राज्य को खो दिया तब कामरान का अपने साम्राज्य की सुरक्षा का प्रयत्न करना स्वाभाविक था।

अन्य भाइयों का भी हुमायूँ की विफलता के लिए बहुत कम उत्तरदायित्त्व है। मिर्जा अस्करी ने हुमायूँ के विरुद्ध कभी विद्रोह नहीं किया और वह समस्त बड़े युद्धों में हुमायूँ के साथ रहा। कन्नौज के युद्ध के बाद वह भी कामरान के साथ चला गया था। हिन्दाल ने हुमायूँ के विरुद्ध अवश्य विद्रोह किया था परन्तु ऐसा केवल एक बार हुआ था।

इसमें संदेह नहीं है कि चौसा के युद्ध में हुमायूँ की पराजय का एक बहुत बड़ा कारण हिन्दाल का बिहार से आगरा भाग जाना था। हिन्दाल ने न कभी इसके पहले और न कभी इसके बाद ही हुमायूँ के साथ किसी प्रकार का विश्वासघात किया वरन् उसन उसकी सहायता ही की और उसी के लिये अपने प्राण भी दिये।

(3.) रिक्त राजकोष

इतिहासकारों ने हुमायूँ के रिक्त राजकोष को भी हुमायूँ की असफलताओं के लिये जिम्मेदार माना है। बाबर ने दिल्ली एवं आगरा से प्राप्त बहुत सारा धन समरकंद, बुखारा एवं फरगना में अपने रिश्तेदारों एवं मित्रों को भिजवा दिया। जिससे सेना के लिये धन की कमी हो गई। जब हुमायूँ को शेर खाँ से लड़ने के लिये सेना के रसद एवं आयुध की आवश्यकता थी, तब हुमायूँ को कहीं से आर्थिक सहयोग नहीं मिला। स्वयं हुमायूँ को चम्पानेर से जो धन मिला था, वह धन उसने आमोद-प्रमोद में लुटा दिया।

(4.) हुमायूँ की चारित्रिक दुर्बलताएँ

इतिहासकारों ने हुमायूँ की चारित्रिक दुर्बलताओं को उसकी विफलता का कारण बताया है। उनके अनुसार हुमायूँ अफीमची, कोमल स्वभाव का तथा काहिल था परन्तु यह धारण ठीक नहीं है। हुमायूँ वीर, साहसी तथा शान्त स्वभाव का व्यक्ति था। उसमें उच्चकोटि की कार्य क्षमता तथा क्रियाशीलता थी।

वह दयालु, सहृदय, बुद्धिमान, सभ्य एवं शिष्ट था। वह अनुभवी सेना-नायक था। उसमें सफल तथा लोकप्रिय शासक बनने के समस्त गुण विद्यमान थे। जहाँ तक अफीम के व्यसन का आरोप है वह किसी भी नशे का इतना व्यसनी न था कि उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाये। उसका पिता बाबर उससे कहीं अधिक मादक द्रव्यों का सेवन करता था। इसलिये हुमायूँ की चारित्रिक दुर्बलताओं को उसकी विफलताओं के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।

(5.) विजय के उपरान्त आमोद-प्रमोद

हुमायूँ पर यह आरोप लगाया जाता है कि विजय प्राप्त करने के उपरान्त वह आमोद-प्रमोद में लग जाता था और अपने मूल्यवान समय को खो देता था। गौड़ पर विजय प्राप्त करने के बाद उसने अमूल्य समय को इसी प्रकार नष्ट किया था परन्तु वास्तविकता यह है कि हुमायूँ बंगाल में परिस्थितियों से बाध्य होकर रुका था न कि भोग-विलास के लिए। इसलिये उसके आमोद-प्रमोद को हम उसकी विफलताओं का कारण नहीं मान सकते।

(6.) हुमायूँ की धर्मान्धता

हुमायूँ ने उस काल के मुस्लिम शासकों की तरह धार्मिक कट्टरता का परिचय दिया तथा राजपूतों के साथ मित्रता करने का प्रयास नहीं किया। जब मेवाड़ की राजमाता कर्णावती ने राखी भिजवाकर हुमायूँ की सहायता मांगी तो हुमायूँ के लिये बड़ा अच्छा अवसर था कि वह मेवाड़ की सहायता करके राजपूतों का विश्वास जीत लेता किंतु उसने काफिरों की मदद करना उचित नहीं समझा। यदि उसने राजपूतों को मित्र बनाया होता तो इन राजपूतों ने न केवल गुजरात के बादशाह बहादुरशाह के विरुद्ध अपितु अफगानों एवं शेर खाँ के विरुद्ध भी हुमायूँ की बहुत सहायता की होती।

(7.) शेर खाँ तथा बहादुरशाह का एक साथ सामना

हुमायूँ की विफलता का सबसे बड़ा कारण यह था कि उसे शेरशाह तथा बहादुरशाह के विरुद्ध एक साथ संघर्ष करना पड़ा था। हुमायूँ में दोनों के विरुद्ध एक साथ लोहा लेने की क्षमता नहीं थी। बहादुरशाह ने धन से शेरशाह की सहायता की थी जिससे उसकी शक्ति बहुत बढ़ गई थी।

(8.) शेरशाह की योजना

यदि बहादुरशाह की सहायता न भी मिली होती तो भी शेरशाह अकेले ही हुमायूँ को विफल बनाने के लिए पर्याप्त था। वह हुमायूँ से अधिक अनुभवी, कूटनीतिज्ञ तथा कुशल राजनीतिज्ञ था। वह हुमायूँ से अधिक चालाक तथा अवसरवादी था। संगठन करने की शक्ति भी शेरशाह में हुमायूँ से अधिक थी। इसलिये शेरशाह के विरुद्ध हुमायूँ का विफल हो जाना स्वाभाविक था।

(9.) अफगानों द्वारा अफगान अस्मिता का युद्ध

शेरशाह के नेतृत्व में अफगानों ने जो युद्ध आरम्भ किया उसने अफगानों की अस्मिता के युद्ध का रूप ले लिया। यह युद्ध अफगानों के उन्मूलित राज्य की पुनर्स्थापना का युद्ध था। इसलिये अफगान सेना अंतिम सांस तक मरने-मारने को तैयार थी। उन्होंने अत्यन्त संगठित होेकर मुगलों से युद्ध किया जबकि हुमायूँ की सेना वेतन के लिये लड़ रही थी और उसमें अपने बादशाह के प्रति अधिक निष्ठा नहीं थी। इसी कारण अफगान मुगलों को परास्त करके अफगान साम्राज्य को पुनर्स्थापित करने में सफल हुए।

(10.) तोपखाने के कुशल प्रयोग का अभाव

हुमायूँ की विफलता का एक यह भी कारण था कि वह अपने पिता बाबर की भाँति तोपखाने का कुशल प्रयोग नहीं कर सका क्योंकि अफगानों के पास भी तोपखाना था और वह मुगलों के तोपखाने से कहीं अधिक अच्छा हो गया था। इसीलिये लाख प्रयत्न करने पर भी हुमायूँ का तोपची मुस्तफा रूमी खाँ पाँच महिने तक चुनार के दुर्ग को नहीं भेद सका। शेर खाँ को अपनी स्थिति दृढ़ करने के लिये समय मिल गया तथा परिस्थितियाँ हुमायूँ के हाथ से निकल गईं।

(11.) अफगानों को तुलगमा का ज्ञान

भारत में बाबर की विजय का एक बहुत बड़ा कारण उसके द्वारा अपनाई गई तुलगमा रणपद्धति थी। बाबर अपनी सेना के दोनों किनारों पर तुलगमा सैनिक रखता था जो उस समय शत्रु को पीछे से घेर लेते थे जब शत्रु पूरी तरह से सामने वाली सेना से युद्ध करने में संलग्न होता था। हुमायूँ तुलगमा रणपद्धति का लाभ नहीं उठा सका क्योंकि अफगान लोग भी इस रणपद्धति को समझ गये थे और पहले से ही अपनी सेना की सुरक्षा की व्यवस्था कर लेते थे।

(12.) हुमायूँ की विफल आर्थिक नीति

हुमायूँ की विफलता का एक बहुत बड़ा कारण उसकी विफल आर्थिक नीति थी। उसने राजकोष में निरंतर धन आने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं की थी तथा बहादुरशाह एवं शेर खाँ जैसे बड़े शत्रुओं के विरुद्ध मोर्चा खोल लिया था। हुमायूँ जब बंगाल में था तब उसे किसी भी तरफ से आर्थिक सहायता नहीं मिली। इस कारण सेना को युद्ध एवं रसद सामग्री की कमी का सामना करना पड़ा। धनाभाव के कारण हुमायूँ के सहायकों का उत्साह भंग हो गया।

(13.) चुनार पर अधिकार करने में विलम्ब

अनेक इतिहासकारों के अनुसार चुनार जीतने में विलम्ब हो जाने के कारण ही हुमायूँ को अपना साम्राज्य खो देना पड़ा। चुनार पर विजय प्राप्त करने में हुमायूँ को 6 माह से अधिक समय लग गया और उसकी सारी सेना चुनार में फँसी रही। इस बीच शेर खाँ ने अपनी शक्ति बढ़ा ली और बंगाल को रौंदकर अपने साधनों में वृद्धि कर ली।

(14.) बंगाल से प्रस्थान करने में विलम्ब

बंगाल में शान्ति तथा व्यवस्था स्थापित करने, सेना को विश्राम देने तथा युद्ध सामग्री एकत्रित करने के लिये हुमायूँ को लगभग चार माह तक बंगाल में रुकना पड़ा। इस विलम्ब के परिणाम बड़े घातक हुए। इस समय में शेर खाँ ने बंगाल से आगरा जाने वाले मार्ग पर अधिकार कर लिया और हुमायूँ के रसद प्राप्ति के मार्ग को काट दिया। इसी समय हिन्दाल भी आगरा भाग गया। चौसा युद्ध में हुमायूँ की पराजय का यही सबसे बड़ा कारण था।

(15.) हुमायूँ का विश्वासी स्वभाव

हुमायूँ सबका विश्वास कर लेता था। इससे उसे अनेक बार धोखा खाना पड़ा। यदि वह शेर खाँ से हुई संधियों के समय सावधानी से काम लेता तो संभवतः उसे चौसा युद्ध में विकट पराजय का सामना नहीं करना पड़ता। लेनपूल ने लिखा है कि हुमायूँ की असफलता का मुख्य कारण उसकी सुंदर परन्तु विवेकहीन दयालुता थी।

(16.) हुमायूँ का दुर्भाग्य

अनेक स्थलों पर भाग्य ने हुमायूँ का साथ नहीं दिया। यदि बंगाल का शासक महमूदशाह थोड़े समय तक शेर खाँ से अपने राज्य की रक्षा कर सका होता तो पूर्व की स्थिति हुमायूँ के पक्ष में हो गयी होती परन्तु महमूदशाह की विफलता ने हुमायूँ को कठिनाई में डाल दिया। इसी प्रकार कन्नौज के युद्ध के समय मई महीने के मध्य में अचानक अत्यधिक वर्षा हुई जिससे हुमायूँ का खेमा पानी से भर गया। जब उसने अपनी सेना को ऊँचे स्थान पर ले जाने का प्रयास किया तभी शेर खाँ ने उस पर आक्रमण कर दिया।

(17.) हुमायूँ की कमजोरी

हुमायूँ को जिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था उनमें सफलता प्राप्त करने के लिए कुछ विशिष्ट गुणों की आवश्यकता थी परन्तु हुमायूं में उन गुणों का अभाव था। इसके विपरीत शेरशाह में वे गुण विद्यमान थे। हुमायूँ एक समय में केवल एक ही योजना बनाकर उस पर अमल करता था किंतु जब मूल योजना विफल हो जाती थी और नई परिस्थिति उत्पन्न हो जाती थी तब वह तेजी से नये निर्णय नहीं कर पाता था।

हुमायूँ बिना सोचे-समझे स्वयं को नई समस्याओं में उलझा लेता था और उनका सामना करने के लिए अपनी क्षमता का सही मूल्यांकन नहीं कर पाता था। उसे गुजरात तथा बंगाल जैसे दूरस्थ प्रदेशों में जाकर युद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। मालवा तथा बिहार में अपनी स्थिति सुदृढ़ बना लेने के उपरान्त वह इन सुदूरस्थ प्रान्तों का अभियान कर सकता था।

हुमायूँ को मनुष्य तथा उसकी नीयत की बहुत कम परख थी। इसलिये वह प्रायः धोखा खा जाता था। उसमें राजनीतिक चालाकी तथा कूटनीति का अभाव था। इस कारण वह उलझी हुई समस्याओं के सुलझाने की क्षमता नहीं रखता था। इन दुर्बलताओं के कारण हुमायूँ को विफलता का सामना करना पड़ा।

हुमायूँ की दुर्बलताओं पर प्रकाश डालते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘उसकी सामान्य काहिली तथा उसकी अपार उदारता प्रायः उसकी विजय के फलों को नष्ट कर देती थी।’

लेनपूल ने लिखा है- ‘उसमें चरित्र तथा दृढ़ता का अभाव था। वह निरन्तर प्रयास करने में असमर्थ था और प्रायः विजय के अवसर पर अपने हरम में व्यसन में मग्न हो जाता था और अफीम के स्वर्गलोक में अपने मूल्यवान समय को व्यतीत कर देता था।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – मुगल सल्तनत की अस्थिरता का युग

हुमायूँ और उसकी समस्याएँ

हुमायूँ की सामरिक उपलब्धियाँ

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष

हुमायूँ का पलायन एवं भारत वापसी

हुमायूँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

हुमायूँ का पलायन एवं भारत वापसी

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शेर खाँ से मिली पराजय के बाद भारत से हुमायूँ का पलायन मुगलों के इतिहास की सबसे बड़ी शर्मनाक घटना है। हुमायूँ का पलायन उसकी स्वयं की विफलता तो थी ही, उससे भी अधिक वह उसके भाइयों की गद्दारी थी

हुमायूँ का पलायन

सिंध प्रवास

हुमायूँ ने हिन्दाल के साथ लाहौर से प्रस्थान कर सिन्ध में प्रवेश किया परन्तु दोनों भाई वहाँ अधिक दिनों तक एक साथ नहीं रह सके। हुमायूँ का हिन्दाल के धर्मगुरु की कन्या हमीदा बानू के साथ प्रेम हो गया जिसके साथ उसने 31 अगस्त 1541 को विवाह कर लिया। इससे हिन्दाल हुमायूं से अप्रसन्न हो गया और उसका साथ छोड़कर कन्दहार चला गया।

हुमायूँ के साथियों की संख्या धीरे-धीरे घटने लगी। इसलिये हुमायूँ का सिन्ध में रहना खतरे से खाली नहीं रहा। हुमायूँ ने मारवाड़ के शासक राजा मालदेव के यहाँ जाने का निश्चय किया परन्तु जब वह जोधपुर के निकट पहुँचा तब उसे यह ज्ञात हुआ कि मालदेव शेरशाह से मिल गया है और हुमायूँ को कैद कर लेने का वचन दे चुका है। इस सूचना से हुमायूं आतंकित हो उठा और वहाँ से जैसलमेर होता हुआ अमरकोट की तरफ भाग खड़ा हुआ।

अमरकोट प्रवास

22 अगस्त 1542 को हुमायूँ अत्यंत दयनीय दशा में अमरकोट पहुँचा। अमरकोट के राणा ने हुमायूँ का स्वागत किया और उसे हर प्रकार से सहायता देने का वचन दिया। हुमायूूँँ लगभग डेढ़ महीने तक अमरकोट में रहा। यहीं पर 14 अक्टूबर 1542 को हमीदा बानू की कोख से अकबर का जन्म हुआ। कई महीने तक सिन्ध में भटकने के बाद हुमायूँ ने जुलाई 1543 में कन्दहार के लिए प्रस्थान किया।

भारत से निष्कासन

हुमायूँ अभी कन्दहार के मार्ग में था कि उसे सूचना मिली की मिर्जा अस्करी, कामरान की आज्ञा से उसे कैद करने आ रहा है। इस पर हुमायूँ ने अपने नवजात शिशु को अपने विश्वसनीय आदमियों के संरक्षण में छोड़कर अपनी पत्नी तथा बाईस स्वामिभक्त अनुचरों के साथ दिसम्बर 1543 में गजनी के मार्ग से फारस के लिए प्रस्थान कर दिया। इन स्वामिभक्त सेवकों में बैरमखाँ भी था। अस्करी ने हुमायूँ को चुपचाप चले जाने दिया तथा उसका पीछा नहीं किया। इस प्रकार हुमायूँ भारत की सीमाओं से बाहर चला गया।

फारस प्रवास

हुमायूँ ने मार्ग में ही एक पत्र फारस के शाह तहमास्प को भिजवाकर अपने फारस आने की सूचना भिजवाई। इस पर तहमास्प ने अपने अफसरों तथा सूबेदारों को आदेश भिजवाया कि हुमायूं का फारस राज्य में हर स्थान पर राजसी स्वागत किया जाय। फलतः जब हुमायूँ सीस्तान पहुँचा तब वहाँ के गवर्नर ने हुमायूँ का बड़ा स्वागत किया।

हुमायूँ सीस्तान से हिरात तथा नशसीमा होता हुआ फारस पहुँचा। जुलाई 1544 में हुमायूँ फारस के शाह तहमास्प से मिला। फारस में हुमायूँ अधिक प्रसन्न नहीं रहता था। हुमायूँ एक सुन्नी मुसलमान था परन्तु फारस का शाह शिया था। इसलिये एक शिया की शरण में रहना हुमायूँ के लिए पीड़ाजनक था।

हुमायूँ को पारसीकों जैसे कपड़े पहनने पड़ते थे तथा उन्हीं की तरह व्यवहार करना पड़ता था। शाह का भाई भी हुमायूँ से वैमनस्य रखने लगा। कुछ लोगों ने हुमायूँ के विरुद्ध तहमास्प के कान भरने आरम्भ किये इससे वह हुमायूं से अप्रसन्न हो गया। यहाँ तक कि हुमायूँ की जान खतरे में पड़ गई। इस स्थिति में शाह की एक बहिन ने हुमायूँ की बड़ी सहायता की।

शाह द्वारा सैनिक सहायता

तहमास्प की बहिन ने तहमास्प को हुमायूँ की सहायता करने के लिये तैयार किया ताकि हुमायूँ फिर से अपने खोये हुए राज्य को प्राप्त कर सके। शाह ने हुमायूँ को शाहजादे मुराद की अध्यक्षता में 13 हजार अश्वारोही दिये ताकि हुमायूँ कन्दहार पर आक्रमण कर सके।

इस सहायता के बदले में हुमायूँ से यह वचन लिया गया कि वह शाह की बहिन की लड़की से विवाह करेगा और जब फारस की सेना कन्दहार, गजनी तथा काबुल जीत कर हुमायूं को सौंप देगी, तब हुमायूँ कन्दहार फारस के शाह को लौटा देगा। इसके अतिरिक्त अन्य कोई धार्मिक, साम्प्रदायिक अथवा राजनीतिक शर्त नहीं रखी गई।

हुमायूँ की भारत वापसी

कंदहार पर अधिकार

हुमायूँ ने फारस के शाह की सेना के साथ भारत के लिए प्रस्थान किया। उसने सबसे पहले कन्दहार पर आक्रमण किया। कंदहार की सुरक्षा कामरान ने मिर्जा अस्करी को सौंप रखी थी। कन्दहार का घेरा लगभग पाँच माह तक चला। 3 सितम्बर 1545 को अस्करी ने कन्दहार का दुर्ग हुमायूँ को समर्पित कर दिया।

फारस के शहजादे ने हुमायूँ से यह माँग की कि वह कन्दहार को, कन्दहार से प्राप्त कोष तथा अपने भाई अस्करी के साथ फारस के शाह को समर्पित कर दे। वे लोग मिर्जा अस्करी को कैद करके शाह के पास भेजना चाहते थे। हुमायूँ ने फारस के शहजादे की प्रथम दो मांगें तो स्वीकार कर लीं परन्तु तीसरी माँग अस्वीकार कर दी क्योंकि इससे बाबर के परिवार की प्रतिष्ठा पर बहुत बड़ा धक्का लगता।

इस पर हुमायूँ का फारस वालों से झगड़ा हो गया। हुमायूं ने फारस वालों को वहाँ से मार भगाया और कन्दहार पर अधिकार स्थापित कर लिया। हुमायूँ ने फारस के शाह को प्रसन्न करने के लिए शिया मुसलमान बैरमखाँ को कन्दहार का गवर्नर बना दिया।

फारस वालों से झगड़ा

कुछ इतिहासकारों ने कन्दहार प्रकरण में हुमायूँ पर विश्वासघात करने का आरोप लगाया है परन्तु यह आरोप उचित नहीं हैं। हुमायूँ ने शाह को इस शर्त पर कन्दहार देने का वचन दिया था कि शाह हुमायूँ को काबुल, गजनी तथा बदख्शाँ जीतने में सहायता करेगा। इसलिये जब तक इन तीनों स्थानों पर हुमायूँ का अधिकार नहीं होता तब तक फारस के द्वारा हुमायूँ से कन्दहार माँगना उचित नहीं था।

फारस के शासक शिया थे जबकि कन्दहार की जनता सुन्नी थी। इस कारण फारस के शिया मुसलमान कन्दहार के सुन्नी मुसलमानों पर अत्याचार करते थे। इसलिये कन्दहार की जनता उन्हें घोर घृणा की दृष्टि से देखती थी। ऐसी स्थिति में कन्दहार फारस वालों को सौंपना उचित नहीं था। इतना ही नहीं, जब तक हुमायूँ अफगानिस्तान की विजय में संलग्न था तब तक के लिए फारस के शाह द्वारा हुमायूँ के परिवार को दुर्ग में रहने की अनुमति नहीं दी गई।

इससे हुमायूँ को बड़ी पीड़ा हुई। हुमायूँ को एक सुरक्षित आधार की आवश्यकता थी जहाँ से वह अपने युद्धों का संचालन कर सकता। उसकी इस आवश्यकता की पूर्ति कन्दहार ही कर सकता था। अतः हुमायूँ का फारस के शाह को कन्दहार नहीं देना सर्वथा उचित था।

काबुल तथा बदख्शाँ पर अधिकार

हुमायूँ ने कन्दहार को आधार बनाकर काबुल की ओर ध्यान दिया। उन दिनों हिन्दाल काबुल में था। वह कामरान का साथ छोड़कर हुमायूँ से आ मिला। कामरान के अन्य साथी भी कामरान का साथ छोड़कर हुमायूँ की तरफ आ गये। इससे कामरान भयभीत हो गया और काबुल से सिन्ध भाग गया।

नवम्बर 1545 में हुमायूँ ने काबुल में प्रवेश किया जहाँ पर वह अपने तीन वर्षीय बालक अकबर से मिला। हुमायूँ ने बदख्शाँ पर भी अधिकार कर लिया। यहाँ पर हुमायूँ बीमार हो गया। कुछ लोगों ने उसकी मृत्यु की अफवाह उड़ा दी। जब कामरान को यह सूचना मिली तो वह सिन्ध से चला आया और उसने फिर से काबुल पर अधिकार कर लिया।

स्वस्थ हो जाने पर हुमायूँ ने बदख्शाँ छोड़ दिया और काबुल का घेरा डाल दिया। कामरान ने हुमायूं तथा उसके अनुयायियों के परिवारों पर घोर अत्याचार किया तथा उन्हें तोप से उड़ाने के लिये दीवार पर लटका दिया गया। हुमायूँ के पुत्र अकबर को भी दीवार से लटका दिया गया परन्तु उसे समय पर पहचान लिया गया और तोप का मुँह फेर कर उसकी जान बचाई गई।

अप्रैल 1547 में हुमायूँ ने पुनः काबुल पर अधिकार कर लिया परन्तु कामरान ने संघर्ष जारी रखा। इन्हीं संघर्ष के दौरान एक रात को मिर्जा हिन्दाल को मार डाला गया। अन्त में कामरान घक्कर प्रदेश को भाग गया। वहाँ के शासक ने कामरान को पकड़कर हुमायूँ को समर्पित कर दिया। समस्त अमीरों की राय थी कि कामरान की हत्या करवा दी जाय परन्तु हुमायूँ इसके लिए तैयार नहीं हुआ।

इसलिये उसे अन्धा कर देने का निश्चय किया गया। दिसम्बर 1551 में कामरान को अन्धा कर दिया गया। इसके बाद उसे अपनी पत्नी तथा नौकर के साथ मक्का जाने की आज्ञा दे दी गई जहाँ 5 अक्टूबर 1557 को कामरान की मृत्यु हो गई। मिर्जा अस्करी को भी मक्का जाने की अनुमति दे दी गई।

भारत पर पुनर्विजय

अब बाबर के चार पुत्रों में से एक, हिन्दाल मारा जा चुका था, दो पुत्र  कामरान तथा अस्करी मक्का जा चुके थे। इस कारण भारत में अब बाबर के पुत्रों में से अकेला हुमायूँ बचा था। उसे अपने भाइयों के विरोध से पूरी तरह छुटकारा मिल चुका था। उसके पास एक सुसज्जित तथा सुदृढ़ सेना थी।

हुमायूँ के अमीर भी उसके आज्ञाकारी बन गये थे। इसलिये उसने भारत को फिर से जीतने का निश्चय किया। भारत की परिस्थितियाँ अब हुमायूं के अनुकूल हो गई थीं क्योंकि शेर खाँ की मृत्यु हो चुकी थी तथा उसके निर्बल उत्तराधिकारियों के शासन में अफगान राज्य पतनोन्मुख हो चला था।

12 नवम्बर 1554 को हुमायूँ ने काबुल से प्रस्थान किया। 31 दिसम्बर को वह सिन्धु नदी के तट पर पहुँचा जहाँ बैरमखाँ भी उससे आ मिला। हुमायूँ ने सिन्धु नदी को पार करके बिना किसी कठिनाई के रोहतास दुर्ग पर अधिकार कर लिया। 24 फरवरी 1555 को हुमायूँ लाहौर पहुँच गया और आसानी से उस पर अधिकार कर लिया। लाहौर से हुमायूं की सेनाएँ आगे बढ़ीं। 15 मई 1555 को मच्छीवारा नामक स्थान पर अफगानों एवं मंगोलों में बड़ा युद्ध हुआ जिसमें हुमायूँ विजयी रहा।

23 जून 1555 को सरहिन्द के मैदान में मुगल तथा अफगान सेनाओं में भीषण संग्राम हुआ। इस युद्ध में भी अफगान सेना परास्त हो गई और हुमायूँ को पूर्ण विजय प्राप्त हो गई। सरहिन्द की विजय ने हुमायूँ के लिये दिल्ली का द्वार खोल दिया। वह समाना के मार्ग से दिल्ली की ओर बढ़ा। 20 जुलाई 1555 को हुमायूँ ने सलीमगढ़ दुर्ग में प्रवेश किया जो हुमायूँ के ‘दीनपनाह’ के चारों ओर बनाया गया था। इस प्रकार हुमायूँ ने अपने पूर्वजों के खोये हुए साम्राज्य को पुनः प्राप्त कर लिया।

हुमायूँ के अन्तिम दिवस

 यद्यपि हुमायूँ ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया था परन्तु अभी उसका कार्य पूरा नहीं हुआ था। पंजाब की जनता उससे सन्तुष्ट नहीं थी। सिकन्दर सूरी परास्त होकर शिवालिक की पहाड़ियों में चला गया था और अपनी शक्ति को पुनः संगठित करने में लगा हुआ था। अन्य प्रान्तों में भी अफगान सरदार बड़े शक्तिशाली थे और बिना संघर्ष किये हुमायूँ की अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।

इसलिये भारत विजय का कार्य अभी अपूर्ण ही था किंतु अब उसके सामने उस प्रकार की कठिनाइयाँ नहीं थी जिस प्रकार की उसके प्रारम्भिक जीवन में थीं। अब उसे बहाहुरशाह अथवा शेरशाह जैसे प्रबल शत्रुओं एवं अपने इर्ष्यालु भाइयों का सामना नहीं करना था। उसके अमीर भी उसके प्रति स्वामिभक्त बन गये थे और विश्वासघात की अधिक सम्भावना नहीं थी।

भंयकर मुसीबतों का सामना करने से हुमायूँ में दृढ़ता आ गई थी और उसका अनुभव भी बढ़ गया था। प्रशासकीय क्षेत्र में उसे किसी नई रचना की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि शेरशाह ने बड़ी ही व्यवस्थित शासन व्यवस्था की स्थापना कर दी थी। इसलिये भारत विजय के कार्य को पूरा करना हुमायूँ के लिए असाध्य कार्य नहीं था।

हुमायूं की मृत्यु

24 जनवरी 1556 को हुमायूँ शीतल वायु का आनन्द लेने के लिए अपने दिल्ली  स्थित पुस्तकालय की छत पर गया। शाम को जब वह नीचे उतर रहा था और सीढ़ी के दूसरे डण्डे पर था कि उसे अजान की आवाज सुनायी दी। वह जहाँ था वहीं पर बैठ गया परन्तु उसका पैर फिसल गया और वह सिर के बल गिर पड़ा। उसके सिर में गम्भीर चोट लगी जिसके कारण रविवार 26 जनवरी 1556 को हुमायूँ की मृत्यु हो गई। उसकी इच्छा के अनुसार उसे काबुल में दफनाया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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हुमायूँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

हुमायूँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

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हुमायूँ का चरित्र उसकी अच्छाइयों एवं कमजोरियों का सम्मिश्रण था। मूलतः वह एक अच्छा इंसान था किंतु साथ ही प्रमादी अर्थात् आलसी प्रवृत्ति का भी था।

हुमायूँ की अच्छाइयाँ

(1.) सुशिक्षित एवं सभ्य

व्यक्ति के रूप में हुमायूँ सरल हृदय, सहज विश्वासी, परिवार से प्रेम करने वाला, सुशिक्षित तथा सभ्य व्यक्ति था। वह उच्च कोटि का साहित्यानुरागी था और साहित्यकारों को आदर की दृष्टि से देखता था। उसकी बहिन गुलबदन बेगम ने हुमायूँनामा लिखा तथा उसके समकालीन मिर्जा हैदर ने तारीखे रशीदी नामक ग्रंथ लिखा।

हुमायूँ को भूगोल, गणित, ज्योतिष तथा मुस्लिम धर्मशास्त्र में अच्छी रुचि थी। हुमायूँ ने दिल्ली में एक सुन्दर पुस्तकालय का निर्माण करवाया था जिसे दीनपनाह कहते थे। वह उच्च कोटि का दानशील था। उसकी उदारता से उसके शत्रु भी लाभान्वित हो जाते थे। इन सब गुणों से स्पष्ट होता है कि हुमायूँ का चरित्र उच्च था।

(2.) उपकार मानने वाला

बादशाहों में उपकार मानने और कृतज्ञता अनुभव करने की भावना प्रायः कम ही होती है किंतु हुमायूँ ने अपना उपकार करने वालों के प्रति कृतज्ञता का प्रदर्शन किया। जिस भिश्ती ने कर्मनाशा नदी में हुमायूँ को डूबने से बचाया, उसके प्रति कृतज्ञता प्रदर्शित करने के लिये हुमायूँ ने उसे आधे दिन के लिये आगरा के तख्त पर बैठाया। उसने बैरमखाँ की सेवाओं का सम्मान करते हुए उसके शिया होते हुए भी उसे कन्दहार का शासक नियुक्त किया।

(3.) वचन का पक्का

हुमायूँ ने अपने पिता को दिये हुए वचन की पालना करने के लिये सदैव अपने विद्रोही भाइयों को क्षमा किया। हुमायूँ ने विद्रोही हिन्दाल को क्षमा करके अपने साथ मिला लिया। हुमायूँ ने फारस वालों को मिर्जा अस्करी सौंपने से मना कर दिया। जब हुमायूँ के अमीर कामरान के प्राण लेने की सलाह दे रहे थे, हुमायूँ ने उसे अंधा करके हज पर जाने की अनुमति दे दी। उसने अस्करी को भी मक्का चले जाने की अनुमति दे दी।

(4.) विलासी व्यक्ति

हुमायूँ विलासी प्रवृत्ति का शासक था। वह जीत के मैदान में ही जश्न मनाने लग जाता था। अफीम का शौकीन था। स्त्रियों के प्रति अनुरक्त रहता था। उसने कई विवाह किये। उसने हिन्दाल के विरोध के बावजूद हिन्दाल के धर्मगुरु की पुत्री हमीदा बानू से विवाह किया जो उम्र में बहुत छोटी थी तथा उसके कंधों तक भी मुश्किल से पहुँचती थी। हुमायूँ ने फारस के शाह की बहिन की पुत्री से भी विवाह किया जो शिया मुसलमान थी। इससे स्पष्ट होता है कि हुमायूँ का चरित्र प्रमाद एवं विलास से ग्रस्त था।

(5.) उत्साही योद्धा

अपनी परिस्थतियों एवं दुर्भाग्य के बावजूद हुमायूँ में सैनिक प्रतिभा विद्यमान थी। पानीपत के प्रथम युद्ध में वह सेना के एक पक्ष का सेनापति था और उसने सफलतापूर्वक युद्ध किया था। वह भारत के अन्य युद्धों में भी अपने पिता की तरफ से लड़ा। बाबर की मृत्यु के उपरान्त भी उसने राजपूतों तथा अफगानों से बड़ी सफलतापूर्वक युद्ध किये।

वह मालवा तथा गुजरात के प्रचुर साधन सम्पन्न प्रान्तों के शासक बहादुरशाह को खदेड़ता ही चला गया था और उसके सम्पूर्ण राज्य पर अधिकार कर लिया था। उसने पूर्व के अफगानों को भी नतमस्तक कर दिया था। प्रारम्भ में शेर खाँ को भी हुमायूूूँ से लड़ने का साहस नहीं हुआ था और हुमायूँ तेजी से विजय करता हुआ गौड़ तक पहुँच गया किंतु चुनार को जीतने में विलम्ब तथा हिन्दाल के विद्रोह के कारण हुमायूँ को चौसा के युद्ध में हार का सामना करना पड़ा।

(6.) हारी हुई बाजी जीतने वाला

फारस पहुँचकर भी हुमायूँ चुप नहीं बैठा। उसने फिर से भारत विजय की योजना बनाई तथा फारस के शाह की बहिन की सहायता से फारस से सैन्य सहायता प्राप्त की। जब हुमायूँ को फारस के शाह से सैन्य सहायता प्राप्त हो गई तब उसे कन्दहार जीतने में कोई कठिनाई नहीं हुई।

उसने फारस वालों की अनुचित मांगें अस्वीकार करके अपने बल पर काबुल तथा बदख्शाँ को जीतते हुए भारत में प्रवेश किया। अफगास्तिान से दिल्ली तक के मार्ग में उसने स्थान-स्थान पर अफगान सेनाओं से युद्ध किये। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि हुमायूँ में सैनिक गुणों का अभाव नहीं था और वह हारी हुई बाजी को फिर से जीतने का हौंसला रखता था।

हुमायूँ की भूलें

हुमायूँ जीवन भर एक के बाद एक भूल करता रहा जिनके गंभीर परिणाम निकले।

(1.) साम्राज्य का बंटवारा

हुमायूँ ने सबसे बड़ी भूल अपने भाइयों में साम्राज्य का बंटवारा करके की। इससे आर्थिक आय का आधार समाप्त हो गया। सैनिक शक्ति कमजोर हो गई तथा भाई स्वतंत्र शासक की तरह व्यवहार करने लगे।

(2.) साम्राज्य का असमान बंटवारा

हुमायूँ ने दूसरी भूल राज्य का असमान बंटवारा करके की। कामरान को उसने पंजाब, काबुल तथा कांधार जैसे विस्तृत प्रदेश दे दिये जबकि उसने अस्करी को सम्भल एवं हिन्दाल को अलवर का राज्य दिया। इस असमान वितरण से कामरान अत्यधिक शक्तिशाली हो गया और वह हुमायूँ से प्रतिस्पर्धा करने लगा। दूसरी ओर अस्करी एवं हिन्दाल छोटी जागीरें मिलने से असंतुष्ट हो गये।

(3.) मिर्जाओं को भाग जाने का अवसर देना

हुमायूँ ने असंतुष्ट एवं विद्रोही मिर्जाओं को भागकर गुजरात के बादशाह से मिल जाने का अवसर दिया। इससे बहादुरशाह की ताकत बहुत बढ़ गई। हुमायूँ ने यदि विद्रोही मिर्जाओं पर समय रहते नियंत्रण पा लिया होता तो उसे आगे चलकर इतने बुरे दिन नहीं देखने पड़ते।

(4.) कालिंजर अभियान

हुमायूँ का कालिंजर अभियान उसकी असफलताओं की शुरुआत कहा जा सकता है। इस अभियान से कोई परिणाम नहीं निकला। राज्य की सामरिक शक्ति क्षीण हुई, बादशाह की प्रतिष्ठा को धक्का लगा। कालिंजर के राजा को अधीन नहीं किया जा सका। यहाँ तक कि उसे मित्र भी नहीं बनाया जा सका।

(5.) चुनार का दुर्ग शेर खाँ को सौंपना

हुमायूँ ने ही शेर खाँ को पनपने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई तथा उसकी बातों में आकर चुनार का दुर्ग उसी को सौंप दिया। इससे शेर खाँ एक सामान्य जागीरदार से विशेष सेनानायक बन गया।

(6.) चित्तौड़ की सहायता नहीं करना

गुजरात के शासक बहादुरशाह के विरुद्ध चित्तौड़ की सहायता का प्रस्ताव स्वीकार नहीं करना, हुमायूँ की बड़ी भूल थी। इससे उसने राजपूतों को मित्र बनाने का अवसर खो दिया।

(7.) चम्पानेर का धन बर्बाद करना

चम्पानेर से हुमायूँ को पर्याप्त धन मिला था किंतु हुमायूँ ने उस धन को दावतें देने तथा आमोद-प्रमोद में नष्ट कर दिया।

(8.) सैनिक शिविर निचले स्थान पर लगाना

हुमायूँ ने कन्नौज में अपना सैनिक शिविर निचले स्थान पर लगाया। उसके दुर्भाग्य से मई के महीने में भी तेज बारिश हो गई और उसका सैनिक शिविर पानी से भर गया।

(9.) हमीदा बानू से विवाह

हमीदा बानू, हिन्दाल के धर्मगुरु की पुत्री थी। इसलिये हिन्दाल नहीं चाहता था कि हुमायूँ उससे विवाह करे किंतु हुमायूँ ने उसकी बात नहीं मानी और हिन्दाल नाराज होकर हुमायूँ का साथ छोड़ गया। हुमायूँ की लम्पटता देखकर अन्य साथी भी हुमायूँ का साथ छोड़ गये। इसका परिणाम यह हुआ कि हुमायूँ को उसके ही भाइयों ने भारत से बाहर भाग जाने पर विवश कर दिया।

(10.) कमजोर प्रशासक

हुमायूँ अपने शासन के आरम्भिक दस वर्षों में युद्धों में इतना व्यस्त रहा कि उसने प्रजा को अच्छा शासन देकर अपने अधिकारियों एवं जन सामान्य का विश्वास जीतने का प्रयास ही नहीं किया। जब वह दुबारा भारत का बादशाह बना तब तक शेरशाह ने ऐसे संगठित तथा व्यवस्थित शासन की स्थापना कर दी थी कि हुमायूं को प्रशासकीय प्रतिभा दिखाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। उसकी अकाल मृत्यु ने भी उसे इससे वंचित कर दिया।

इस प्रकार हुमायूँ एक कमजोर प्रशासक सिद्ध हुआ। अतः स्पष्ट होता है कि हुमायूँ का चरित्र अच्छाइयों एवं दुर्बलताओं का सम्मिश्रण था।

हुमायूँ का दुर्भाग्य

हुमायूँ का शाब्दिक अर्थ होता है सौभाग्यशाली परन्तु वास्तव में वह सौभाग्यशाली नहीं था। उसके भाग्य ने बहुत कम अवसरों पर उसका साथ दिया।

लेनपूल ने लिखा है- ‘एक बादशाह के रूप में वह असफल रहा। उसके नाम का अर्थ है सौभाग्यशाली परन्तु कोई भी दुर्भाग्यशाली व्यक्ति इतने गलत नाम से नहीं पुकारा गया है।’

भारत में उसके पिता ने जिस नये साम्राज्य की स्थापना की थी उसे खो देने का अपयश हुमायूँ को ही मिला। यद्यपि बाबर से हुमायूँ को एक सुसंगठित साम्राज्य प्राप्त नहीं हुआ था परन्तु उसे अपने पिता से मुगलों की विशाल एवं कुशल सेना अवश्य प्राप्त थी जिसकी सहायता से वह अपने पिता से प्राप्त साम्राज्य को न केवल सुरक्षित रख सकता था अपितु उसमें वृद्धि भी कर सकता था।

बाबर ने अफगानों तथा राजपूतों की शक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया था परन्तु हुमायूँ अपने पिता के साम्राज्य को सुरक्षित नहीं रख सका और अफगानों ने उसे परास्त करके एक बार फिर से भारत में अफगान राज्य की स्थापना कर दी थी।

निष्कर्ष

हुमायूँ के सम्पूर्ण जीवन वृत्त को देखने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हुमायूँ की विफलता का कारण उसकी प्रतिकूल परिस्थियतियाँ ही थीं जिनको वह अपने अनुकूल नहीं बना सका। यह उसका बहुत बड़ा दुर्भाग्य था।

फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी और परिस्थितियाँ अनुकूल होते ही अपने खोये हुए राज्य को फिर से प्राप्त कर लिया किंतु दुर्भाग्य ने अंत तक उसका पीछा नहीं छोड़ा और दिल्ली पर अधिकार करने के छः माह पश्चात् ही वह सीढ़ियों से गिरकर बुरी तरह घायल हो गया और मर गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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