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हुमायूँ और उसकी समस्याएँ

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हुमायूँ और उसकी समस्याएँ

हुमायूँ का पूरा नाम नासिरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ था। बाबर दिल्ली सल्तनत पर अधिकार करने के बाद केवल तीन साल बाद अचानक ही मर गया था, इसलिए हुमायूँ को चारों ओर से समस्याओं ने घेर लिया।

हुमायूँ का प्रारम्भिक जीवन

बाबर के चार पुत्र और तीन पुत्रियाँ थीं जिनमें हुमायूँ सबसे बड़ा था। हुमायूँ का जन्म 6 मार्च 1508 को काबुल में हुआ था। उसकी माँ माहम सुल्ताना हिरात के शिया मुसलमान हुसैन बैकरा के खानदान से थी, उसे माहिज बेगम भी कहते थे। हुमायूँ को तुर्की, अरबी, फारसी भाषओं के साथ-साथ युद्ध करने की शिक्षा भी दी गई थी।

हुमायूँ अपने पिता के जीवन काल में ही अनेक युद्धों में भाग लेने तथा प्रशासकीय कार्य करने अनुभव प्राप्त कर चुका था। उसने पानीपत तथा खनवा के युद्धों में भाग लेकर अपनी सैनिक प्रतिभा का परिचय दिया था। बाबर ने उसे बंगाल तथा बिहार के अफगान अमीरों के विद्रोह का दमन करने की जिम्मेदारी दी थी।

हुमायूँ ने इस कार्य में पूरी सफलता प्राप्त की। हुमायूँ की सफलताओं से प्रसन्न होकर बाबर ने उसे दो बार बदख्शाँ का शासन प्रबन्ध सौंपा। बदख्शाँ पर उजबेग लोग बार-बार आक्रमण करते थे परन्तु हुमायूूॅँ ने उजबेगों को दबाकर वहाँ पर शान्ति तथा व्यवस्था स्थापित की। बाबर ने हुमायूँ को हिसार-फिरोजा तथा सम्भल का शासन सौंपा।

हुमायूँ को आगरा के तख्त की प्राप्ति

बाबर की मृत्यु के चार दिन बाद 30 दिसम्बर 1530 को हुमायूँ आगरा के तख्त पर बैठा। इस विलम्ब का कारण यह था कि बाबर के प्रधानमंत्री निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा ने हुमायूँ के बहनोई मेंहदी ख्वाजा को तख्त पर बैठाने का प्रयत्न किया किंतु बाद में प्रधानमंत्री को यह अनुभव हो गया कि यदि उसने ऐसा किया तो उसका अपना जीवन खतरे में पड़ जायेगा इसलिये उसने हुमायूँ का समर्थन कर दिया।

उस समय हुमायूँ 23 वर्ष का था। उसके बादशाह बनने पर राज्य में खुशियाँ मनायी गईं और दान-दक्षिणा दी गई। राज्य के अफसरों तथा अमीरों ने उसका स्वागत किया और उसकी बादशाहत को सहर्ष स्वीकार किया। इस प्रकार हुमायूँ को तख्त प्राप्त करने में कोई कठिनाई नहीं हुई।

हुमायूँ की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ

यद्यपि हुमायूँ को तख्त प्राप्त करने में विशेष कठिनाई नहीं हुई परन्तु उसका मार्ग बिल्कुल निष्कंटक नहीं था। उसके सामने अनेक कठिनाइयाँ थीं जिनका निराकरण करना आवयक था-

(1.) साम्राज्य की विशालता

बाबर ने थोड़े ही दिनों में अपने सैन्यबल से एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी। यह साम्राज्य पश्चिम में आमू नदी से लेकर पूर्व में बिहार तक फैला था। दक्षिण में मालवा तथा राजपूताना के राज्य उसके साम्राज्य की सीमा पर स्थित थे। इस साम्राज्य को कुछ समय के लिये तो संभाला जा सकता था परन्तु दीर्घकालीन शासन के लिये नवीन शासन व्यवस्थायें करनी आवश्यक थीं। बाबर द्वारा स्थापित साम्राज्य की कोई शासकीय आधारशिला नहीं रखी गई थी।

(2.) साम्राज्य की दुर्बलता

हुमायूँ को अपने पिता से एक अव्यवस्थित राज्य मिला था। बाबर ने अपना राज्य अमीरों तथा सरदारों में बाँट दिया था जो अपने-अपने क्षेत्र में शान्ति तथा व्यवस्था बनाये रखने के लिए उत्तरदायी थे। ये सरदार प्रति वर्ष एक निश्चित राशि सरकारी खजाने में भेजते थे तथा आवश्यकता पड़ने पर बादशाह को सैनिक सहायता उपलब्ध करवाते थे। यह सामन्तीय प्रथा हुमायूँ के लिए खतरे से खाली नहीं थी। अमीर तथा सरदार कभी भी धोखा दे सकते थे और बादशाह तथा सल्तनत के लिए खतरा उत्पन्न कर सकते थे।

(3.) शासन की व्यवस्था

अभी भारत को जीतने के लिये आवश्यक युद्ध पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुए थे कि बाबर की मृत्यु हो गई थी इसलिये हुमायूँ जिस समय तख्त पर बैठा, वह समय युद्ध कालीन परिस्थितियों का था। अभी मुगल तथा अफगान एक दूसरे को उन्मूलित करने में संलग्न थे और उनकी सेनाओं का संचालन निरन्तर होता रहता था। ऐसी स्थिति में हुमायूँ के राज्य में बड़ी राजनीतिक तथा आर्थिक गड़बड़ी फैली हुई थी तथा शासन अस्त-व्यस्त था।

(4.) सेना का असन्तोषजनक संगठन

मुगल सेना का संगठन भी संतोषजनक नहीं था। उसमें मंगोल, उजबेग, तुर्क, चगताई, फारसी, अफगानी तथा भारतीय मुसलमान भर्ती थे। प्रत्येक सेना प्रायः अपने कबीले के नेता की अध्यक्षता में युद्ध करती थी। विभिन्न कबीलों से सम्बन्ध रखने वाली इन सेनाओं में ईर्ष्या-द्वेष व्याप्त था। इस प्रकार मुगल सेना में एकता की भावना नहीं थी। इसलिये युद्ध के समय इस सेना पर बहुत अधिक भरोसा नहीं किया जा सकता था। कई बार सैनिक टुकड़ियां परस्पर संघर्ष करने लगती थीं। यह स्थिति राज्य के लिये अत्यंत घातक थी।

(5.) हुमायूँ के भाइयों के कुचक्र

हुमायूँ को अपने भाइयों की ओर से भी बड़ा खतरा था। हुमायूँॅ के तीन भाई थे- कामरान, अस्करी तथा हिन्दाल। इनमें से कामरान अत्यंत महत्त्वाकांक्षी था। उसमें सामरिक तथा प्रशासकीय प्रतिभा भी थी। इसलिये संभव था कि वह हुमायूँ का प्रतिद्वन्द्वी बनकर स्वयं हिन्दुस्तान का बादशाह बनने का प्रयास करे। अन्य भाई भी हुमायूँ के मार्ग में बाधाएँ उत्पन्न करते थे। इसलिये हुमायूँ को मंगोल शहजादों के कुचक्रों का भी सामना करना था।

(6.) अमीरों के षड्यन्त्र

अनेक मंगोल एवं चगताई अमीर शासन में अपना-अपना प्रभाव बढ़ाने के लिये अलग-अलग शहजादों के समर्थक बन गये। वे इन शहजादों को हुमायूँ के विरुद्ध भड़काकर अपने स्वार्थ की सिद्धि करने लगे। इससे दूर-दूर तक विस्तृत शासन को संभालना और भी कठिन हो गया।

(7.) मिर्जाओं के षड्यन्त्र

मिर्जा उन कुलीन लोगों को कहते थे जो राजवंश से सम्बन्धित होने के कारण स्वयं को तख्त का अधिकारी समझते थे। हुमायूँ को इन मिर्जाओं से उतना ही बड़ा खतरा था जितना अपने भाइयों की ओर से। राज्य में कुछ बड़े ही प्रभावशाली तथा शक्तिशाली मिर्जा विद्यमान थे जो तैमूर के वंशज थे और बाबर के तख्त के उसी प्रकार दावेदार थे जिस प्रकार बाबर के पुत्र।

इनमें सबसे अधिक प्रभावशाली मुहम्मद जमाँ मिर्जा था जिसका विवाह बाबर की पुत्री मासूमा बेगम से हुआ था। पहले वह बिहार का शासक बनाया गया परन्तु बाद में उसे जौनपुर का शासक बनाया गया जो मुगल साम्राज्य की सीमा पर स्थित था। अपने प्रभाव तथा अपनी स्थिति के कारण वह कभी भी हुमायूँ के लिए संकट उत्पन्न कर सकता था।

दूसरा प्रभावशाली मिर्जा मुहम्मद सुल्तान मिर्जा था जो सुल्तान हुसैन की लड़की का पुत्र था। हुमायूँ को इन मिर्जाओं से सतर्क रहना था क्योंकि ये लोग किसी भी संकटापन्न स्थिति में हुमायूँ के राज्य की बन्दरबांट कर सकते थे।

(8.) अफगानों की समस्या

बाबर ने पानीपत तथा घाघरा के युद्धों में अफगानों पर विजय प्राप्त कर ली थी परन्तु वह उनकी शक्ति को पूर्ण रूप से उन्मूलित नहीं कर सका था। बाबर के भय से अफगान छिन्न-भिन्न हो गये थे और उनका नैतिक बल समाप्त प्रायः था परन्तु उनमें से कई अफगान अब भी मंगोलों के आधिपत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे।

उन्होंने बाबर के मरते ही फिर से महमूद लोदी को अपना सुल्तान घोषित कर दिया और उसके झण्डे के नीचे संगठित होने लगे। बिबन, बयाजीद, मारूफ, फार्मूली आदि शक्तिशाली अफगान नेताओं ने अपनी सेनाओं के साथ विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। वे अपनी खोई हुई शक्ति को पुनः स्थापित करने की ताक में थे।

वे बंगाल तथा गुजरात के शासकों से मिलकर मुगलों को भारत से मार भगाने की योजनाएँ बना रहे थे। यदि हुमायूँ इन अफगानों का दमन करने का प्रयत्न करता तो उन्हें बिहार, बंगाल तथा गुजरात के शासकों से सहायता मिल सकती थी।

(9.) गुजरात के शासक बहादुरशाह की समस्या

हुमायूँ को जितना बड़ा खतरा बिहार तथा बंगाल के अफगानों से था उससे कहीं अधिक बड़ा खतरा गुजरात के शासक बहादुरशाह से था। बहादुरशाह बड़ा ही महत्त्वाकांक्षी नवयुवक था। अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने के लिए उसके पास साधन भी थे। उसका राज्य बड़ा सम्पन्न था।

उस के पास हिन्दुस्तान का सबसे अच्छा तोपखाना था और उसे अत्यंत योग्य अफसरों की सेवाएँ प्राप्त थीं। उसके पड़ौसी राज्य उसकी शक्ति से आतंकित रहते थे। राजपूताना, मालवा तथा दक्षिण भारत के राज्यों में बहादुरशाह का विरोध करने की क्षमता नहीं थी।

ऐसे शक्तिशाली अफगान शासक की ओर अन्य अफगान सरदारों का आकृष्ट हो जाना स्वाभाविक ही था। फतेह खाँ, कुतुब खाँ, आलम खाँ आदि कई अफगान सरदार, मुगल दरबार के कोप का भाजन बनने पर गुजरात चले गये। बहादुरशाह ने उनका स्वागत किया और उन्हें जागीरों तथा पदों से पुरस्कृत किया।

इस प्रकार बहादुरशाह हुमायूँ का बड़ा प्रतिद्वन्द्वी बन गया। उत्तर भारत में उसका प्रभाव बढ़ता जा रहा था और उसकी दृष्टि दिल्ली के तख्त पर थी। इसलिये हुमायूँ को उससे भी सतर्क रहना आवश्यक था।

(10.) राजपूतों की ओर से खतरा

यद्यपि बाबर ने खनवा के युद्ध में राणा सांगा को परास्त कर दिया था जिसका राजपूत संघ पर घातक प्रभाव पड़ा था परन्तु राणा सांगा का पुत्र रत्नसिंह फिर से अपनी शक्ति बढ़ाने में लग गया था। अन्य राजपूत राज्य भी स्वयं को संगठित करने तथा अपनी शक्ति बढ़़ाने का प्रयत्न कर रहे थे।

राजपूत शासक मुगलों को घृणा की दृष्टि से देखते थे तथा वे मुगलों को भारत से बाहर निकालने के लिये अफगानों से गठबन्धन कर सकते थे। इसलिये हुमायूँ को उनकी ओर से भी पूरा खतरा था।

(11.) साम्राज्य विभाजन की समस्या

तुर्कों तथा मंगोलों की प्राचीन परंपरा के अनुसार बाबर की मृत्यु के उपरान्त उसका साम्राज्य उसके पुत्रों में विभक्त हो जाना चाहिए था। यदि हुमायूँ इस परम्परा की उपेक्षा करके सारा राज्य अपने अधिकार में रखने का प्रयत्न करता तो सम्भव था कि उसके भाई उनके विरुद्ध विद्रोह कर देते और अमीर लोग उनके साथ एकत्रित होकर उनका समर्थन करते।

अतः हुमायूँ ने अपनी इच्छा के विरुद्ध अपने पिता का साम्राज्य अपने भाइयों में बांट दिया। उसने कामरान को पंजाब, काबुल, तथा बदख्शाँ, अस्करी को सम्भल तथा हिन्दाल को अलवर का राज्य दे दिया। साम्राज्य का शेष भाग हुमायूँ ने अपने पास रखा।

इस प्रकार हुमायूँ ने अपने पिता के साम्राज्य को अपने भाइयों में बाँट दिया परन्तु सिद्धान्तः वह अपने पिता के तख्त का उत्तराधिकारी बना रहा और उसकी प्रभुत्व शक्ति अविभक्त बनी रही। कामरान इस व्यवस्था से सन्तुष्ट नहीं हुआ और अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए योजनाएँ बनाने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – मुगल सल्तनत की अस्थिरता का युग

हुमायूँ और उसकी समस्याएँ

हुमायूँ की सामरिक उपलब्धियाँ

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष

हुमायूँ का पलायन एवं भारत वापसी

हुमायूँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

हुमायूँ की सामरिक उपलब्धियाँ

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हुमायूँ की सामरिक उपलब्धियाँ

हुमायूँ की सामरिक उपलब्धियाँ भारत के मध्यकालीन इतिहास पर गहा प्रभाव डालने वाली सिद्ध हुईं। उसने अपने शत्रुओं का धैर्य पूर्वक मुकाबला किया तथा उन्हें एक-एक करके परास्त करता चला गया। इस कारण भारत में मुगल सल्तनत की फिर से स्थापना संभव हो सकी।

हुमायूँ की सामरिक उपलब्धियाँ

कालिंजर पर आक्रमण

कालिंजर का दुर्ग उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में स्थित था। वह विन्ध्याचल पर्वत पर कई सौ फुट ऊँची चट्टान पर बना हुआ होने के कारण सुरक्षित तथा अभेद्य समझा जाता था। तुर्कों ने कई बार इस पर अधिकार करने का प्रयास किया था। बाबर ने भी हुमायूँ को इस दुर्ग को जीतने के लिए भेजा था परन्तु हुमायूँ को कालिंजर के शासक राजा प्रताप रुद्र से समझौता करके दुर्ग का घेरा उठाना पड़ा था।

बाबर की मृत्यु के बाद राजा प्रताप रुद्र कालपी पर अधिकार जमाने का प्रयत्न करने लगा। इन दिनों कालपी का महत्त्व बहुत अधिक बढ़ गया था क्योंकि गुजरात के शासक बहादुरशाह ने मार्च 1531 में मालवा पर अधिकार कर लिया था जिससे कालपी उसके लिए उत्तरी हिन्दुस्तान में आने के लिए प्रवेश द्वार बन गया था। इसलिये हुमायूँ ने कालिंजर पर फिर से अधिकार करने का निर्णय लिया तथा कालिंजर दुर्ग पर घेरा डाल दिया।

हुमायूँ की सेना एक महीने तक कालिंजर दुर्ग पर गोलाबारी करती रही परन्तु दुर्ग को अधिकार में नहीं किया जा सका। हुमायूँ को कालिंजर में व्यस्त देखकर इब्राहीम लोदी के भाई महमूद लोदी ने जौनपुर पर अधिकार कर लिया और वहाँ से मुगल अफसरों को मार भगाया। इसलिये हुमायूं को एक बार फिर कालिंजर के राजा से समझौता करना पड़ा।

महमूद लोदी से संघर्ष

महमूद लोदी तथा उसके समर्थकों ने सबसे पहले बिहार को अपने अधिकार में कर लिया और वहीं पर एक बहुत बड़ी सेना एकत्रित कर ली। इसके बाद इन लोगों ने मुगल क्षेत्रों पर आक्रमण करने आरम्भ किये। इन लोगों ने जौनपुर से मुगलों को मार भगाया और अवध में भी अपनी सत्ता स्थापित कर ली। इस समय हुमायूँ कालिंजर में था। वह चुनार होता हुआ जौनपुर की ओर बढ़ा परन्तु वर्षा ऋतु आरम्भ हो जाने के कारण वह अफगानों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर सका। इसी समय उसे अपने भाई कामरान के विद्रोह की सूचना मिली। अतः वह आगरा चला गया।

कामरान का विद्रोह

जब कामरान ने देखा कि हुमायूँ अपने शत्रुओं से संघर्ष करने में व्यस्त है तो उसने अफगानिस्तान का प्रबन्ध अपने छोटे भाई अस्करी को सौंप दिया और स्वयं अपनी सेना के साथ पंजाब में घुस आया। कामरान ने मुल्तान तथा लाहौर पर अधिकार करके वहाँ पर अपने अधिकारी नियुक्त कर दिये।

इसके बाद कामरान ने हुमायूँ को चालाकी भरे विनम्र पत्र लिखे कि वह मुल्तान तथा पंजाब के प्रान्त उसे दे दे। चूँकि हुमायूँ के पास अपने साम्राज्य के पश्चिमी भाग में शान्ति बनाये रखने का अन्य कोई उपाय नहीं था। इसलिये उसने कामरान की प्रार्थना स्वीकार कर ली।

महमूद लोदी की पराजय

कामरान को सन्तुष्ट करने के बाद हुमायूँ ने पुनः विद्रोही अफगानों की ओर ध्यान दिया। उसने लखनऊ से थोड़ी दूर पर स्थित दौरान नामक स्थान पर अफगानों के साथ लोहा लिया। अफगानों ने अपने खोये हुए राज्य की प्राप्ति के लिये बड़ी वीरता से युद्ध किया परन्तु वे परास्त हो गये। महमूद लोदी बिहार की ओर भाग गया। उसने फिर कभी युद्ध करने का साहस नहीं किया। जौनपुर पर हुमायूँ का अधिकार हो गया।

बहादुरशाह से संघर्ष

बहादुरशाह की गतिविधियाँ

गुजरात का शासक बहादुरशाह अत्यंत महत्त्वाकांक्षी सुल्तान था। वह निरन्तर अपनी शक्ति में वृद्धि कर रहा था और मुगल साम्राज्य के लिए खतरा उत्पन्न कर रहा था। उसकी दृष्टि दिल्ली के तख्त पर थी। मार्च 1531 में उसने मालवा पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया। मेवाड़ का राज्य, दिल्ली तथा मालवा के बीच स्थित था।

यदि बहादुरशाह मेवाड़ पर अधिकार स्थापित कर लेता तो वह मुगल सम्राज्य की सीमा पर पहुँच जाता और सीधे मुगल साम्राज्य पर आक्रमण कर सकता था। बहादुरशाह ने हुमायूँ केे शत्रु शेरखाँ के साथ गठजोड़ कर लिया था और हुमायूँ के विरुद्ध उसकी सहायता कर रहा था।

बहादुरशाह ने बंगाल के शासक के साथ भी सम्पर्क स्थापित कर लिया था जो हुमायूँ के विरुद्ध षड्यन्त्र रच रहा था। वास्तव में बहादुरशाह का दरबार हुमायूँ के शत्रुओं की शरण स्थली बन गया था। बहुत से विद्रोही अफगान तथा असंतुष्ट मुगल अमीर बहादुरशाह के दरबार में चले गये थे।

इनमें हुमायूँ का बहनोई मुहम्मद जमाँ मिर्जा भी था जिसने हुमायूूूँ के विरुद्ध विद्रोह कर रखा था और वह बयाना के कारागार से भागकर बहादुरशाह के पास पहुँचा था। इन अमीरों ने बहादुरशाह को समझाया कि हुमायूँ एक निकम्मा शासक है और उसकी सेना में कोई दम नहीं है। इसलिये उससे दिल्ली का तख्त प्राप्त करना कठिन नहीं है।

बहादुरशाह ने हुमायूँ के विरुद्ध हाथ आजमाने का निर्णय कर लिया। बहादुरशाह को पुर्तगालियों से भी सैनिक सहायता का आश्वासन मिल गया। बहादुरशाह की गतिविधियां देखकर हुमायूँ भी समझ गया था कि उससे युद्ध होना अनिवार्य है। उसने बहादुरशाह को पत्र लिखा कि वह उसके शत्रुओं को, विशेषकर मुहम्मद जमाँ मिर्जा को अपने यहाँ शरण नहीं दे। बहाुदरशाह ने हुमायूँ को संतोषजनक उत्तर नहीं दिया। इस पर हुमायूँ ने उससे युद्ध करने का निश्चय किया।

हुमायूँ का प्रस्थान

1535 ई. में हुमायूं अपनी सेना के साथ आगरा से प्रस्थान करके ग्वालियर पहुँच गया और वहीं से बहादुरशाह की गतिविधियों पर दृष्टि रखने लगा। थोड़े दिनों बाद हुमायूँ और आगे बढ़ा तथा उज्जैन पहुँच गया। इन दिनों बहादुरशाह चित्तौड़ का घेरा डाले हुए था।

कहा जाता है कि चित्तौड़ के राणा विक्रमादित्य की माता, रानी कर्णवती ने हुमायूं को राखी भेजकर उससे सहायता मांगी। यह हुमायूँ के लिए स्वर्णिम अवसर था परन्तु हुमायूं ने इससे कोई लाभ नहीं उठाया। उसने यह सोचकर कि बहादुरशाह काफिरों से युद्ध कर रहा है और यदि हुमायूँ ने काफिरों की सहायता की तो उसे कयामत के समय उत्तरदायी होना पड़ेगा, राजपूतों की कोई सहायता नहीं की।

इसका परिणाम यह हुआ कि चित्तौड़ पर बहादुरशाह का अधिकार स्थापित हो गया और उसकी शक्ति में बड़ी वृद्धि हो गई। उसने चित्तौड़ को खूब लूटा तथा अपार धन सम्पत्ति प्राप्त की।

बहादुरशाह पर आक्रमण

अब हुमायूँ की भी आँखें खुलीं और वह बहादुरशाह पर आक्रमण करने के लिए वह आगे बढ़ा। बहादुरशाह ने हुमायूँ का मार्ग रोकने के लिये मन्दसौर में चारों ओर से खाइयाँ खुदवा कर मोर्चा बांधा। उसने अपने तोपखाने को सामने करके अपनी सेना उसके पीछे छिपा दी। हुमायूँ को इसका पता लग गया।

इसलिये हुमायूँ के अश्वारोहियों ने दूर से ही बहादुरशाह की सेना पर बाण वर्षा आरम्भ की तथा बहादुरशाह के तोपखाने को बेकार कर दिया। हुमायूँ ने उसके रसद मार्ग को भी काट दिया। इस पर बहादुरशाह मन्दसौर से भाग कर माण्डू चला गया। मुगल सेना ने तेजी से बहादुरशाह का पीछा किया।

बहादुरशाह केवल पाँच स्वामिभक्त अनुयायियों के साथ चम्पानेर भाग गया। माण्डू के दुर्ग पर मुगलों का अधिकार हो गया। चम्पानेर पहुँचने पर बहादुरशाह ने अपने हरम की स्त्रियों तथा अपने खजाने को ड्यू भेज दिया जो पुर्तगालियों के अधिकार में था। इसके बाद बहादुरशाह ने चम्पानेर में आग लगवा दी जिससे शत्रु कोई लाभ नहीं उठा सके।

इसके बाद बहादुरशाह खम्भात भाग गया। हुमायूँ ने एक हजार अश्वारोहियों के साथ उसका पीछा किया। बहादुरशाह भयभीत होकर ड्यू भाग गया और उसने पुर्तगालियों के यहाँ शरण ली। हुमायूँ भी खम्भात पहुँच गया तथा उसे लूटकर जलवा दिया। हुमायूँ ने खम्भात में रहकर पुर्तगालियों के साथ मैत्री स्थापित करने का प्रयत्न किया परन्तु वह सफल नहीं हो सका। पुर्तगालियों ने बहादुरशाह के साथ गठबन्धन कर लिया और उसकी सहायता करने का वचन दिया।

हुमायूँ का गुजरात पर अधिकार

हुमायूं खम्भात से चम्पानेर लौट आया। उसने चम्पानेर दुर्ग पर अधिकार कर लिया जहाँ से उसे अपार सम्पत्ति प्राप्त हुई। हुमायूँ ने इस सम्पत्ति को भोग-विलास में व्यय कर दिया। थोड़े ही दिनों बाद हुमायूँ चम्पानेर से अहमदाबाद की ओर बढ़ा और गुजरात पर अधिकार कर लिया। हुमायूँ ने अस्करी मिर्जा को गुजरात का शासक नियुक्त किया। गुजरात की व्यवस्था करने के उपरान्त हुमायूँ ड्यू की ओर बढ़ा परन्तु इसी समय उसे उत्तरी भारत में विद्रोह होने की सूचना मिली। इसलिये उसने आगरा के लिए प्रस्थान किया।

बहादुरशाह की मृत्यु

हुमायूँ के लौटते ही बहादुरशाह तथा उसके समर्थकों ने मुगलों को गुजरात से खदेड़ना आरम्भ कर दिया। अस्करी ने चम्पानेर के शासक तार्दी बेग से सहायता मांगी किंतु तार्दीबेग ने अस्करी की सहायता करने से मना कर दिया। हुमायूँ भी अस्करी की सहायता के लिये सेना नहीं भेज सका।

इसलिये बहादुरशाह ने गुजरात तथा मालवा पर फिर से अधिकार कर लिया किंतु वह इस विजय का बहुत दिनों तक उपभोग नहीं कर सका। फरवरी 1537 में जब वह ड्यू के पुर्तगाली गवर्नर से मिलने गया, तब समुद्र में डूब कर मर गया।

इस प्रकार हम देखते हैं कि हुमायूँ की सामरिक उपलब्धियाँ मध्यकालीन इतिहास में प्रमुख स्थान रखती हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – मुगल सल्तनत की अस्थिरता का युग

हुमायूँ और उसकी समस्याएँ

हुमायूँ की सामरिक उपलब्धियाँ

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष

हुमायूँ का पलायन एवं भारत वापसी

हुमायूँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष

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हुमायूँ - शेर खाँ संघर्ष

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष हुमायूँ के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी थी। इस संघर्ष के कारण हूमायूँ को न केवल अपना राज्य छोड़कर अपितु भारत छोड़कर भी भाग जाना पड़ा।

शेर खाँ हुमायूँ का सबसे भयंकर शत्रु सिद्ध हुआ। वह अफगानों का नेता था। उसने दक्षिण बिहार पर अधिकार स्थापित करके चुनार का दुर्ग भी जीत लिया। यह दुर्ग आगरा से पूर्व की ओर जाने वाले स्थलों तथा नदियों के मार्ग में पड़ता था। इस कारण उसे पूर्वी भारत का फाटक कहा जाता था तथा सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। हुमायूँ तथा शेर खाँ दोनों ही उसे अपने अधिकार में रखना चाहते थे।

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष चुनार के लिए संघर्ष

1531 ई. में जब हुमायूँ कालिंजर के दुर्ग का घेरा डाले हुए था तब उसे पूर्व में अफगानों के उपद्रव की सूचना मिली। अतः हुमायूँ कालिंजर का घेरा उठाकर चुनार के लिए चल दिया। चुनार पहुँचते ही उसने दुर्ग का घेरा डाला परन्तु वह दुर्ग को प्राप्त नहीं कर सका।

चूँकि महमूद लोदी ने जौनपुर पर अधिकार कर लिया था, इसलिये हुमायूँ ने चुनार का घेरा उठा लिया और महमूद लोदी का सामना करने के लिए आगे बढ़ा। महमूद लोदी से छुटकारा पाने के बाद हुमायूँ ने फिर चुनार की ओर ध्यान दिया। उसने शेर खाँ से कहा कि चुनार का दुर्ग वह उसे लौटा दे।

हुमायूँ ने चुनार के दुर्ग पर अधिकार करने के लिए हिन्दू बेग को चुनार भेज दिया। शेर खाँ ने दुर्ग देने से मना कर दिया। इस पर हुमायूँ भी सेना लेकर चुनार पहुँच गया। चार महीने घेरा चलता रहा परन्तु अफगानों ने मुगलों को दुर्ग नहीं दिया।

शेर खाँ से संधि

इसी बीच परिस्थितियों ने पलटा खाया और दोनों ही पक्ष समझौता करने के लिए तैयार हो गये। शेर खाँ अपनी शक्ति बंगाल की ओर बढ़ाना चाहता था। इसलिये वह मुगलों के साथ संघर्ष नहीं चाहता था। बंगाल का शासक नसरत शाह, शेर खाँ जैसे महत्त्वाकांक्षी सेनापति की बढ़ती हुई शक्ति से चिन्तित था और शेर खाँ से समझौता करने के लिए प्रस्तुत था।

शेर खाँ ने इस अनुकूल परिस्थिति से लाभ उठाने का प्रयत्न किया। उसने हुमायूँ के साथ सन्धि की बातचीत आरम्भ की तथा हुमायूँ से प्रार्थना की कि वह चुनार का दुर्ग शेर खाँ के अधिकार में छोड़ दे। इसके बदले में शेर खाँ ने अपने तीसरे पुत्र कुत्ब खाँ को एक सेना के साथ हुमायूँ की सेवा में भेजना स्वीकार कर लिया।

हुमायूँ ने शेर खाँ की प्रार्थना स्वीकार कर ली और आगरा लौट गया। इस समझौते से हुमायूं की प्रतिष्ठा को धक्का लगा तथा शेर खाँ को अपनी योजनाएँ पूर्ण करने का अवसर मिल गया।

शेर खाँ की तैयारियाँ

शेर खाँ से समझौता करने के बाद हुमायूँ, बहादुरशाह की गतिविधि जानने के लिए ग्वालियर की ओर चला गया। इधर शेर खाँ अपनी योजनाओं को कार्यान्वित करने में लग गया। थोड़े ही समय में उसने बिहार में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली और वह पूर्व के समस्त अफगानों का नेता बन गया।

उसने उन्हें यह आश्वासन दिया कि यदि वे संगठित होकर मुगलों का सामना करेंगे तो वह मुगलों को भारत से निकाल बाहर करेगा तथा भारत में पुनः अफगानों की सत्ता स्थापित कर देगा। इसका परिणाम यह हुआ कि दूर-दूर से अफगान सरदार उसके झंडे के नीचे आकर एकत्रित होने लगे।

उसने गुजरात के शासक बहादुरशाह के साथ भी सम्पर्क स्थापित किया जिसने धन से उसकी बड़ी सहायता की। शेर खाँ ने एक व्यवस्थित आर्थिक नीति का अनुसरण करके बहुत सा धन इकट्ठा कर लिया। इस धन की सहायता से उसने एक विशाल सेना तैयार की।

यद्यपि शेर खाँ ने अपने पुत्र कुत्ब खाँ को कुछ सैनिकों के साथ हुमायूँ की सेवा में भेजने का वचन दिया था परन्तु उसने इस वादे को पूरा नहीं किया और अपनी सेना बढ़ाने में लगा रहा। उसने गंगा के किनारे-किनारे अपनी शक्ति का विस्तार करना आरम्भ किया और चुनार तक के सम्पूर्ण प्रदेश पर अधिकार कर लिया।

शेर खाँ ने बंगाल पर आक्रमण कर दिया जिसकी स्थिति उन दिनों बड़ी डाँवाडोल थी। शेर खाँ अपनी विशाल सेना के साथ गौड़ के द्वार पर आ डटा। बंगाल के शासक महमूदशाह ने शेर खाँ से संधि कर ली और उसे तेरह लाख दीनार देकर अपना पीछा छुड़ाया परन्तु शेर खाँ ने इसका यह अर्थ निकाला कि महमूदशाह ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली है और वह उसे आर्थिक कर दिया करेगा।

जब हुमायूँ आगरा लौटकर आया तब उसे शेर खाँ की गतिविधियों की जानकारी मिली किन्तु हुमायूँ तुरन्त शेर खाँ के विरुद्ध कोई कार्यवाही करने की स्थिति में नहीं था। इसी बीच हुमायूँ ने हिन्दू बेग को जौनपुर का गवर्नर बना कर भेजा और उसे यह आदेश दिया कि वह पूर्व की स्थिति से उसे अवगत कराये।

शेर खाँ ने कूटनीति से काम लेते हुए चुनार तथा बनारस को छोड़कर, पूर्व के समस्त जिलों से नियंत्रण हटा लिया। उसने हिन्दू बेग के पास बहुमूल्य भेंटें भेजीं और हुमायूँ के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट की। हिन्दू बेग को संतोष हो गया और वह शेर खाँ की ओर से निश्चिन्त हो गया। उसने हुमायूँ को संदेश भेजा कि पूर्व की स्थिति बिल्कुल चिन्ताजनक नहीं है।

हुमायूँ भी निश्चिन्त हो गया। कठिनाई से एक-दो माह बीते थे कि हुमायूँ को सूचना मिली की शेर खाँ ने बंगाल पर फिर आक्रमण कर दिया है क्योंकि महमूदशाह ने उसे आर्थिक भेंट नहीं भेज थी। इससे हुमायूँ का सतर्क हो जाना स्वाभाविक ही था। शेर खाँ ने एक विशाल सेना खड़ी कर ली थी।

शेर खाँ के साधनों में भी बड़ी वृद्धि हो चुकी थी। उसने चुनार से गौड़ तक के सम्पूर्ण प्रदेश पर अपनी धाक जमा ली थी। वह भारत में एक बार फिर से अफगान राज्य स्थापित करने का स्वप्न देख रहा था। इन  कारणों से हुमायूँ, शेर खाँ के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए बाध्य हो गया।

हुमायूँ का प्रस्थान

जुलाई 1537 में वर्षा ऋतु आरम्भ हो जाने पर भी हुमायूँ ने आगरा से प्रस्थान किया। उसने कई महीने तक कड़ा मानिकपुर में पड़ाव डाले रखा तथा वहाँ से चलकर नवम्बर 1537 में चुनार से कुछ मील दूर पड़ाव डाला। अफगान सरदारों ने हुमायूँ को परामर्श दिया कि वह सीधा गौड़ जाये और शेर खाँ की बंगाल विजय की योजना को विफल कर दे परन्तु मुगल सरदारों ने परामर्श दिया कि चुनार जैसे महत्त्वपूर्ण दुर्ग को, जो बंगाल के मार्ग में पड़ता था, शेर खाँ के हाथ में छोड़ना ठीक नहीं है।

चुनार जीत लेने से हुमायूँ के साधनों में भी वृद्धि हो जायेगी, आगरा का मार्ग सुरक्षित बना रहेगा और चुनार को आधार बनाकर पूर्व के अफगानों के साथ युद्ध किया जा सकेगा। हुमायूँ को शेर खाँ की शक्ति का सही अनुमान नहीं था इस कारण हुमायूँ को लगा कि बंगाल का शासक कुछ दिनों तक अपने राज्य की रक्षा कर सकेगा।

इसलिये हुमायूँ ने मुगल सरदारों के परामर्श को स्वीकार करके चुनार पर आक्रमण कर दिया। मुस्तफा रूमी खाँ ने बादशाह को यह आश्वासन दिया कि तोपखाने की सहायता से दुर्ग पर शीघ्र ही अधिकार स्थािपत हो जाएगा परन्तु ऐसा नहीं हो सका। दुर्ग को जीतने में लगभग 6 माह लग गये। इस विलम्ब के परिणाम बड़े भयानक हुए।

कुछ विद्वानों की धारणा है कि इस भयंकर भूल के कारण ‘हुमायूँ को अपना साम्राज्य खो देना पड़ा।’ हुमायूँ ने इस अवसर पर एक और भूल की। जब उसने चुनार के दुर्ग पर अधिकार किया तब उसे या तो इस दुर्ग को नष्ट कर देना चाहिए था या उसकी सुरक्षा का प्रबंध करना चाहिए था परन्तु हुमायूँ ने इन दोनों में से एक भी काम नहीं किया। शेर खाँ को चुनार खो देने का कोई दुःख नहीं हुआ क्योंकि उसने राजा चिन्तामणि से विश्वासघात करके रोहतास के सुदृढ़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया था।

हुमायूं का गौड़ पर अधिकार

चुनार जीतने के बाद हुमायूँ बनारस चला गया जहाँ उसे सूचना मिली कि शेर खाँ ने गौड़ पर अधिकार जमा लिया है। चूँकि वर्षा ऋतु आरम्भ हो गई थी इसलिये हुमायूँ ने शेर खाँ से युद्ध करने के स्थान पर समझौता करना चाहा परन्तु समझौते की वार्ता सफल नहीं हुई और विवश होकर हुमायूँ को शेर खाँ से युद्ध करने का निश्चय करना पड़ा।

इसी समय बंगाल के शासक महमूदशाह ने भी शेर खाँ के विरुद्ध हुमायूँ से सहायता की याचना की। हुमायूँ ने उसकी सहायता करने तथा उसे फिर से बंगाल की गद्दी पर बैठाने का वचन दिया परन्तु बंगाल में कदम रखने के पहले ही हुमायूँ को सूचना मिली की महमूदशाह की मृत्यु हो गई है और उसके दोनों पुत्रों की हत्या हो गई है। इस प्रकार हुसैनी राजवंश के समाप्त हो जाने पर हुमायूँ के लिए बंगाल पर अधिकार करना और शेर खाँ के साथ लोहा लेना अनिवार्य हो गया। इसलिये हुमायूँ ने सितम्बर 1538 में गौड़ पर अधिकार कर लिया।

हिन्दाल का विद्रोह

हुसैनी वंश का पतन हो जाने के बाद बंगाल में बड़ी गड़बड़ी फैल गई। इसलिये वहाँ पर शान्ति तथा सुव्यवस्था स्थापित करने एवं अपनी थकी हुई सेना को विश्राम देने के लिये हुमायूँ तीन-चार माह तक बंगाल में ही ठहर गया। हुमायूँ ने हिन्दाल मिर्जा को उसकी जागीर तिरहुत तथा पुनिया में भेज दिया ताकि वहा से रसद लाई जा सके किंतु हिन्दाल हुमायूँ की आज्ञा का पालन न करके आगरा चला गया।

इस प्रकार हुमायूँ का उसके साथ सम्पर्क समाप्त हो गया। हिन्दाल के इस व्यवहार से हुमायूँ को बड़ी चिन्ता हुई। उसने वास्तविकता का पता लगाने के लिय शेख बहलोल को आगरा भेजा। हिन्दाल के कर्त्तव्य भ्रष्ट हो जाने के कारण हुमायूँ की सेना में रसद की कमी हो गई। इधर शेर खाँ ने आगरा जाने वाले मार्गों पर नियन्त्रण कर लिया।

इन परिस्थितियों में बंगाल में रुकने और वहीं से वापसी यात्रा की तैयारी करने के अतिरिक्त हुमायूं के पास कोई चारा नहीं बचा। थोड़े ही दिनों में हुमायूँ को सूचना मिली कि हिन्दाल ने प्रभुत्व शक्ति अपने हाथ में ले ली है तथा शेख बहलोल की हत्या कर दी गयी है। इस कारण पश्चिम की ओर से शेर खाँ पर किसी भी प्रकार से दबाव पड़ने की आशा नहीं है और शेर खाँ ने बनारस से कन्नौज तक के सम्पूर्ण प्रदेश पर अधिकार जमा लिया है। इस सूचना के बाद हुमायूँ ने बंगाल से शीघ्र ही प्रस्थान करने का निश्चय किया।

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष – चौसा का युद्ध

हुमायूँ बंगाल का प्रबन्ध जहाँगीर कुली खाँ को सौंपकर आगरा के लिए चल दिया। पहले वह उत्तर के मार्ग से चला परन्तु उसे मिर्जा अस्करी ने सूचना दी कि अफगानों ने विरोध करने की पूरी तैयारी कर ली है। इसलिये हुमायूँ ने अपना मार्ग बदल दिया। मुंगेर के निकट उसने गंगा नदी को पार किया तथा दक्षिण की ओर चलता हुआ चौसा पहुँच गया।

मार्च 1539 में उसने कर्मनाशा नदी को पार करके उसके पश्चिमी तट पर पड़ाव डाला। शेर खाँ ने हुमायूँ के साथ सन्धि की भी वार्ता आरम्भ की और चुपके से उस पर आक्रमण करने की भी तैयारियाँ करता रहा। शेर खाँ के कहने से हुमायूँ नदी के दूसरे तट पर आ गया।

जब शेर खाँ को पता लगा कि हुमायूँ के पास रसद की बड़ी कमी है और उसे अपने भाइयों से सहायता मिलने की सम्भावना नहीं है। तब एक दिन प्रातःकाल में वह मुगल सेना पर टूट पड़ा और उसे तीन ओर से घेर लिया। मुगल सेना में भगदड़ मच गई और वह कर्मनाशा के तट की ओर भाग खड़ी हुई।

चूँकि अफगानों द्वारा नदी का पुल नष्ट कर दिया गया था इसलिये मुगलों ने तैरकर नदी पार करने का प्रयत्न किया। अफगानों ने बड़ी क्रूरता से मुगलों का वध किया। लगभग सात हजार मुगलों के प्राण गये जिनमें से कई  बड़े अधिकारी भी थे। हुमायूँ स्वयं अपने घोड़े के साथ नदी में कूद पड़ा। घोड़ा नदी में डूब गया।

हुमायूँ स्वयं भी डूबने ही वाला था कि एक भिश्ती ने अपनी मशक की सहायता से उसके प्राण बचाये। अफगानों ने मुगलों का पीछा किया। हुमायूँ मिर्जा अस्करी के साथ कड़ा मानिकपुर पहुँचा और वहाँ से कालपी होता हुआ जुलाई 1539 में आगरा पहुँच गया। आगरा पहुँचकर हुमायूँ ने एक दरबार किया जिसमें उसने आधे दिन के लिए उस भिश्ती को तख्त पर बिठा कर उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट की जिसने कर्मनाशा नदी में हुमायूँ की जान बचाई थी।

कामरान के मन में संदेह

हुमायूँ के आगरा पहुँचने के पहले ही हिन्दाल के विद्रोह को दबाने के लिये कामरान लाहौर से आगरा चला आया था। हिन्दाल डरकर अलवर भाग गया परन्तु कामरान ने उसे वहाँ से बुला लिया। अब चारों भाई आगरा में एकत्रित हुए और शेर खाँ का सामना करने के लिए योजनाएँ बनाने लगे।

चौसा के युद्ध में परास्त हो जाने पर भी अमीरों ने हुमायूँ का साथ नहीं छोड़ा परन्तु हुमायूँ की सेना छिन्न-भिन्न हो गई थी। कामरान के पास अब भी एक सुशिक्षित तथा सुदृढ़ सेना उपलब्ध थी जिसका प्रयोग अफगानों के विरुद्ध किया जा सकता था परन्तु इसी बीच कामरान बीमार पड़ गया और लगभग तीन माह तक बिस्तर पर पड़ा रहा।

चारों तरफ अफवाह फैल गई कि हुमायूँ ने उसे विष दिलवाया है। कामरान के मन में भी हुमायूँ के प्रति संदेह उत्पन्न हो गया। कामरान को पंजाब छोड़े लगभग एक वर्ष हो गया था और उत्तर-पश्चिम की राजनीति में इतने बड़े परिवर्तन हो रहे थे कि कामरान को पंजाब तथा कन्दहार की रक्षा की चिन्ता हो रही थी।

इसलिये कामरान ने आगरा से तुरन्त चले जाने का निश्चय कर लिया। हुमायूँ चाहता था कि कामरान अपनी पूरी सेना आगरा में छोड़ दे परन्तु कामरान ने ऐसा नहीं किया। वह केवल तीन हजार सैनिकों को हुमायूँ की सेवा में छोड़कर लाहौर चला गया।

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष कन्नौज अथवा बिलग्राम का युद्ध

चौसा की विजय के उपरान्त शेर खाँ ने स्वयं को बनारस में स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और सुल्तान-ए-आदिल की उपाधि धारण की। अफगान सेना ने बंगाल को फिर से जीत लिया और वहाँ के मुगल गवर्नर की हत्या कर दी। अब शेर खाँ ने भारत विजय की योजना बनाई।

उसने अपने पुत्र कुत्ब खाँ को यमुना नदी के किनारे-किनारे आगरा की ओर बढ़ने का आदेश दिया और स्वयं एक सेना के साथ कन्नौज के लिए चल पड़ा। कुत्ब खाँ का कालपी के निकट मुगल सेना से भीषण संघर्ष हुआ जिसमें कुत्ब खाँ परास्त हुआ और मारा गया। 13 मार्च 1540 को हुमायूँ ने शेरशाह का सामना करने के लिए आगरा से प्रस्थान किया।

हुमायूँ ने गंगा नदी को पार करके उसके किनारे पड़ाव डाला। अब वह शेरशाह की गतिविधि को देखता रहा। शेरशाह भी खवास खाँ की प्रतीक्षा कर रहा था। जब खवास खाँ पूर्व से कन्नौज आ गया तब शेरशाह युद्ध करने के लिए तैयार हो गया। मुगलों की सेना, अफगान सेना की अपेक्षा कुछ निचले स्थान में थी।

हुमायूँ जिस स्थान पर वह पड़ाव डाले हुए था, वह स्थान वर्षा के कारण पानी से भर गया। हुमायूँ ने अपनी सेना को ऊंचे स्थान पर ले जाने का प्रयत्न किया। ठीक इसी समय शेरशाह मुगल सेना के दोनों पक्षों पर टूट पड़ा। मुगल सेना में भगदड़ मच गई। हुमायूँ ने हिन्दाल तथा अस्करी के साथ गंगा नदी को पार कर लिया और भाग कर आगरा पहुँच गया।

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष – हुमायूँ का पलायन

शेरशाह ने मुगलों का पीछा नहीं छोड़ा। उसने एक सेना सम्भल की ओर तथा दूसरी सेना आगरा की ओर भेजी। हुमायूँ अत्यन्त भयभीत हो गया। वह केवल एक रात आगरा में रहा तथा दूसरे दिन अपने परिवार और कुछ खजाने के साथ दिल्ली के लिए प्रस्थान कर दिया। रोहतास में हिन्दाल भी उससे आ मिला। अब दोनों भाइयों ने लाहौर के लिए प्रस्थान किया।

लाहौर में मिर्जा अस्करी भी उनसे आ मिला। अब चारों भाइयों ने मिलकर संकटापन्न स्थिति पर विचार करना आरम्भ किया परन्तु उन्हें शेरशाह से लोहा लेना असम्भव प्रतीत हुआ। कामरान ने पंजाब को भी सुरक्षित रखने की आशा छोड़ दी। इसलिये उसने अफगानिस्तान जाने तथा काबुल एवं कन्दहार को सुरक्षित रखने का निश्चय किया।

कामरान तथा मिर्जा अस्करी अफगानिस्तान चले गये। हुमायूँ ने हिन्दाल के साथ सिन्ध के लिए प्रस्थान किया। अब शेरशाह के लिए रास्ता साफ था। वह तेजी से आगे बढ़ा और उसने सम्पूर्ण पंजाब पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार उसने मुगलों को सिन्ध नदी के उस पार खदेड़ दिया और बाबर के पुत्रों को भारत से निष्कासित कर दिया।

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष – हुमायूँ की विफलता के कारण

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि जिस साम्राज्य की स्थापना बाबर ने पानीपत तथा घाघरा के युद्धों में अफगानों को परास्त करके की थी, उसे हुमायूँ ने चौसा तथा कन्नौज के युद्धों में शेरशाह से पराजित होकर खो दिया। हुमायूँ अनुभवी सेनानायक था, फिर भी वह शेरशाह के समक्ष असफल हो गया। हुमायूँ की विफलता के कई कारण थे-

(1.) मिर्जाओं का असहयोग

मुहम्मद जमान मिर्जा, मुहम्मद सुल्तान मिर्जा, मेंहदी ख्वाजा आदि तैमूरवंशीय मिर्जा वर्ग के अमीर, बाबर के सहयोगी रहे थे तथा स्वयं को बाबर के समान ही मंगोलों के तख्त का अधिकारी समझते थे। उनमें से अधिकतर मिर्जाओं ने हुमायूँ का साथ नहीं दिया तथा हुमायूँ के विरोधियों के साथ मिल गये। इस कारण हुमायूँ की सैनिक शक्ति क्षीण हो गई और वह लम्बे समय तक अपने शत्रुओं का सामना नहीं कर सका।

(2.) भाइयों का असहयोग

इतिहासकारों ने हुमायूँ की विफलता का सबसे बड़ा कारण उसके भाइयों का असहयोग करना बताया है। हुमायूँ ने अपने राज्य का बहुत बड़ा हिस्सा अपने भाइयों को दे दिया था किंतु भाइयों ने समय पर हुमायूँ की सहायता नहीं की। परन्तु इतिहासकारों की यह धारणा सही नहीं है क्योंकि हुमायूँ के शासन के प्रथम दस वर्षों में कामरान ने उसके साथ किसी प्रकार की शत्रुता नहीं रखी वरन् वह उसका सम्मान करता रहा और उसके प्रति निष्ठावान बना रहा।

जब मिर्जा हिन्दाल ने विद्रोह किया था तब कामरान लाहौर से आगरा चला आया था और हिन्दाल को सही रास्ते पर लाने में हुमायूँ की सहायता की थी। कन्नौज के युद्ध के बाद, कामरान का हुमायूँ में विश्वास नहीं रह गया और उसका साथ छोड़ दिया। जब हुमायूँ ने अपने साम्राज्य को खो दिया तब कामरान का अपने साम्राज्य की सुरक्षा का प्रयत्न करना स्वाभाविक था।

अन्य भाइयों का भी हुमायूँ की विफलता के लिए बहुत कम उत्तरदायित्त्व है। मिर्जा अस्करी ने हुमायूँ के विरुद्ध कभी विद्रोह नहीं किया और वह समस्त बड़े युद्धों में हुमायूँ के साथ रहा। कन्नौज के युद्ध के बाद वह भी कामरान के साथ चला गया था। हिन्दाल ने हुमायूँ के विरुद्ध अवश्य विद्रोह किया था परन्तु ऐसा केवल एक बार हुआ था।

इसमें संदेह नहीं है कि चौसा के युद्ध में हुमायूँ की पराजय का एक बहुत बड़ा कारण हिन्दाल का बिहार से आगरा भाग जाना था। हिन्दाल ने न कभी इसके पहले और न कभी इसके बाद ही हुमायूँ के साथ किसी प्रकार का विश्वासघात किया वरन् उसन उसकी सहायता ही की और उसी के लिये अपने प्राण भी दिये।

(3.) रिक्त राजकोष

इतिहासकारों ने हुमायूँ के रिक्त राजकोष को भी हुमायूँ की असफलताओं के लिये जिम्मेदार माना है। बाबर ने दिल्ली एवं आगरा से प्राप्त बहुत सारा धन समरकंद, बुखारा एवं फरगना में अपने रिश्तेदारों एवं मित्रों को भिजवा दिया। जिससे सेना के लिये धन की कमी हो गई। जब हुमायूँ को शेर खाँ से लड़ने के लिये सेना के रसद एवं आयुध की आवश्यकता थी, तब हुमायूँ को कहीं से आर्थिक सहयोग नहीं मिला। स्वयं हुमायूँ को चम्पानेर से जो धन मिला था, वह धन उसने आमोद-प्रमोद में लुटा दिया।

(4.) हुमायूँ की चारित्रिक दुर्बलताएँ

इतिहासकारों ने हुमायूँ की चारित्रिक दुर्बलताओं को उसकी विफलता का कारण बताया है। उनके अनुसार हुमायूँ अफीमची, कोमल स्वभाव का तथा काहिल था परन्तु यह धारण ठीक नहीं है। हुमायूँ वीर, साहसी तथा शान्त स्वभाव का व्यक्ति था। उसमें उच्चकोटि की कार्य क्षमता तथा क्रियाशीलता थी।

वह दयालु, सहृदय, बुद्धिमान, सभ्य एवं शिष्ट था। वह अनुभवी सेना-नायक था। उसमें सफल तथा लोकप्रिय शासक बनने के समस्त गुण विद्यमान थे। जहाँ तक अफीम के व्यसन का आरोप है वह किसी भी नशे का इतना व्यसनी न था कि उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाये। उसका पिता बाबर उससे कहीं अधिक मादक द्रव्यों का सेवन करता था। इसलिये हुमायूँ की चारित्रिक दुर्बलताओं को उसकी विफलताओं के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।

(5.) विजय के उपरान्त आमोद-प्रमोद

हुमायूँ पर यह आरोप लगाया जाता है कि विजय प्राप्त करने के उपरान्त वह आमोद-प्रमोद में लग जाता था और अपने मूल्यवान समय को खो देता था। गौड़ पर विजय प्राप्त करने के बाद उसने अमूल्य समय को इसी प्रकार नष्ट किया था परन्तु वास्तविकता यह है कि हुमायूँ बंगाल में परिस्थितियों से बाध्य होकर रुका था न कि भोग-विलास के लिए। इसलिये उसके आमोद-प्रमोद को हम उसकी विफलताओं का कारण नहीं मान सकते।

(6.) हुमायूँ की धर्मान्धता

हुमायूँ ने उस काल के मुस्लिम शासकों की तरह धार्मिक कट्टरता का परिचय दिया तथा राजपूतों के साथ मित्रता करने का प्रयास नहीं किया। जब मेवाड़ की राजमाता कर्णावती ने राखी भिजवाकर हुमायूँ की सहायता मांगी तो हुमायूँ के लिये बड़ा अच्छा अवसर था कि वह मेवाड़ की सहायता करके राजपूतों का विश्वास जीत लेता किंतु उसने काफिरों की मदद करना उचित नहीं समझा। यदि उसने राजपूतों को मित्र बनाया होता तो इन राजपूतों ने न केवल गुजरात के बादशाह बहादुरशाह के विरुद्ध अपितु अफगानों एवं शेर खाँ के विरुद्ध भी हुमायूँ की बहुत सहायता की होती।

(7.) शेर खाँ तथा बहादुरशाह का एक साथ सामना

हुमायूँ की विफलता का सबसे बड़ा कारण यह था कि उसे शेरशाह तथा बहादुरशाह के विरुद्ध एक साथ संघर्ष करना पड़ा था। हुमायूँ में दोनों के विरुद्ध एक साथ लोहा लेने की क्षमता नहीं थी। बहादुरशाह ने धन से शेरशाह की सहायता की थी जिससे उसकी शक्ति बहुत बढ़ गई थी।

(8.) शेरशाह की योजना

यदि बहादुरशाह की सहायता न भी मिली होती तो भी शेरशाह अकेले ही हुमायूँ को विफल बनाने के लिए पर्याप्त था। वह हुमायूँ से अधिक अनुभवी, कूटनीतिज्ञ तथा कुशल राजनीतिज्ञ था। वह हुमायूँ से अधिक चालाक तथा अवसरवादी था। संगठन करने की शक्ति भी शेरशाह में हुमायूँ से अधिक थी। इसलिये शेरशाह के विरुद्ध हुमायूँ का विफल हो जाना स्वाभाविक था।

(9.) अफगानों द्वारा अफगान अस्मिता का युद्ध

शेरशाह के नेतृत्व में अफगानों ने जो युद्ध आरम्भ किया उसने अफगानों की अस्मिता के युद्ध का रूप ले लिया। यह युद्ध अफगानों के उन्मूलित राज्य की पुनर्स्थापना का युद्ध था। इसलिये अफगान सेना अंतिम सांस तक मरने-मारने को तैयार थी। उन्होंने अत्यन्त संगठित होेकर मुगलों से युद्ध किया जबकि हुमायूँ की सेना वेतन के लिये लड़ रही थी और उसमें अपने बादशाह के प्रति अधिक निष्ठा नहीं थी। इसी कारण अफगान मुगलों को परास्त करके अफगान साम्राज्य को पुनर्स्थापित करने में सफल हुए।

(10.) तोपखाने के कुशल प्रयोग का अभाव

हुमायूँ की विफलता का एक यह भी कारण था कि वह अपने पिता बाबर की भाँति तोपखाने का कुशल प्रयोग नहीं कर सका क्योंकि अफगानों के पास भी तोपखाना था और वह मुगलों के तोपखाने से कहीं अधिक अच्छा हो गया था। इसीलिये लाख प्रयत्न करने पर भी हुमायूँ का तोपची मुस्तफा रूमी खाँ पाँच महिने तक चुनार के दुर्ग को नहीं भेद सका। शेर खाँ को अपनी स्थिति दृढ़ करने के लिये समय मिल गया तथा परिस्थितियाँ हुमायूँ के हाथ से निकल गईं।

(11.) अफगानों को तुलगमा का ज्ञान

भारत में बाबर की विजय का एक बहुत बड़ा कारण उसके द्वारा अपनाई गई तुलगमा रणपद्धति थी। बाबर अपनी सेना के दोनों किनारों पर तुलगमा सैनिक रखता था जो उस समय शत्रु को पीछे से घेर लेते थे जब शत्रु पूरी तरह से सामने वाली सेना से युद्ध करने में संलग्न होता था। हुमायूँ तुलगमा रणपद्धति का लाभ नहीं उठा सका क्योंकि अफगान लोग भी इस रणपद्धति को समझ गये थे और पहले से ही अपनी सेना की सुरक्षा की व्यवस्था कर लेते थे।

(12.) हुमायूँ की विफल आर्थिक नीति

हुमायूँ की विफलता का एक बहुत बड़ा कारण उसकी विफल आर्थिक नीति थी। उसने राजकोष में निरंतर धन आने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं की थी तथा बहादुरशाह एवं शेर खाँ जैसे बड़े शत्रुओं के विरुद्ध मोर्चा खोल लिया था। हुमायूँ जब बंगाल में था तब उसे किसी भी तरफ से आर्थिक सहायता नहीं मिली। इस कारण सेना को युद्ध एवं रसद सामग्री की कमी का सामना करना पड़ा। धनाभाव के कारण हुमायूँ के सहायकों का उत्साह भंग हो गया।

(13.) चुनार पर अधिकार करने में विलम्ब

अनेक इतिहासकारों के अनुसार चुनार जीतने में विलम्ब हो जाने के कारण ही हुमायूँ को अपना साम्राज्य खो देना पड़ा। चुनार पर विजय प्राप्त करने में हुमायूँ को 6 माह से अधिक समय लग गया और उसकी सारी सेना चुनार में फँसी रही। इस बीच शेर खाँ ने अपनी शक्ति बढ़ा ली और बंगाल को रौंदकर अपने साधनों में वृद्धि कर ली।

(14.) बंगाल से प्रस्थान करने में विलम्ब

बंगाल में शान्ति तथा व्यवस्था स्थापित करने, सेना को विश्राम देने तथा युद्ध सामग्री एकत्रित करने के लिये हुमायूँ को लगभग चार माह तक बंगाल में रुकना पड़ा। इस विलम्ब के परिणाम बड़े घातक हुए। इस समय में शेर खाँ ने बंगाल से आगरा जाने वाले मार्ग पर अधिकार कर लिया और हुमायूँ के रसद प्राप्ति के मार्ग को काट दिया। इसी समय हिन्दाल भी आगरा भाग गया। चौसा युद्ध में हुमायूँ की पराजय का यही सबसे बड़ा कारण था।

(15.) हुमायूँ का विश्वासी स्वभाव

हुमायूँ सबका विश्वास कर लेता था। इससे उसे अनेक बार धोखा खाना पड़ा। यदि वह शेर खाँ से हुई संधियों के समय सावधानी से काम लेता तो संभवतः उसे चौसा युद्ध में विकट पराजय का सामना नहीं करना पड़ता। लेनपूल ने लिखा है कि हुमायूँ की असफलता का मुख्य कारण उसकी सुंदर परन्तु विवेकहीन दयालुता थी।

(16.) हुमायूँ का दुर्भाग्य

अनेक स्थलों पर भाग्य ने हुमायूँ का साथ नहीं दिया। यदि बंगाल का शासक महमूदशाह थोड़े समय तक शेर खाँ से अपने राज्य की रक्षा कर सका होता तो पूर्व की स्थिति हुमायूँ के पक्ष में हो गयी होती परन्तु महमूदशाह की विफलता ने हुमायूँ को कठिनाई में डाल दिया। इसी प्रकार कन्नौज के युद्ध के समय मई महीने के मध्य में अचानक अत्यधिक वर्षा हुई जिससे हुमायूँ का खेमा पानी से भर गया। जब उसने अपनी सेना को ऊँचे स्थान पर ले जाने का प्रयास किया तभी शेर खाँ ने उस पर आक्रमण कर दिया।

(17.) हुमायूँ की कमजोरी

हुमायूँ को जिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था उनमें सफलता प्राप्त करने के लिए कुछ विशिष्ट गुणों की आवश्यकता थी परन्तु हुमायूं में उन गुणों का अभाव था। इसके विपरीत शेरशाह में वे गुण विद्यमान थे। हुमायूँ एक समय में केवल एक ही योजना बनाकर उस पर अमल करता था किंतु जब मूल योजना विफल हो जाती थी और नई परिस्थिति उत्पन्न हो जाती थी तब वह तेजी से नये निर्णय नहीं कर पाता था।

हुमायूँ बिना सोचे-समझे स्वयं को नई समस्याओं में उलझा लेता था और उनका सामना करने के लिए अपनी क्षमता का सही मूल्यांकन नहीं कर पाता था। उसे गुजरात तथा बंगाल जैसे दूरस्थ प्रदेशों में जाकर युद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। मालवा तथा बिहार में अपनी स्थिति सुदृढ़ बना लेने के उपरान्त वह इन सुदूरस्थ प्रान्तों का अभियान कर सकता था।

हुमायूँ को मनुष्य तथा उसकी नीयत की बहुत कम परख थी। इसलिये वह प्रायः धोखा खा जाता था। उसमें राजनीतिक चालाकी तथा कूटनीति का अभाव था। इस कारण वह उलझी हुई समस्याओं के सुलझाने की क्षमता नहीं रखता था। इन दुर्बलताओं के कारण हुमायूँ को विफलता का सामना करना पड़ा।

हुमायूँ की दुर्बलताओं पर प्रकाश डालते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘उसकी सामान्य काहिली तथा उसकी अपार उदारता प्रायः उसकी विजय के फलों को नष्ट कर देती थी।’

लेनपूल ने लिखा है- ‘उसमें चरित्र तथा दृढ़ता का अभाव था। वह निरन्तर प्रयास करने में असमर्थ था और प्रायः विजय के अवसर पर अपने हरम में व्यसन में मग्न हो जाता था और अफीम के स्वर्गलोक में अपने मूल्यवान समय को व्यतीत कर देता था।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – मुगल सल्तनत की अस्थिरता का युग

हुमायूँ और उसकी समस्याएँ

हुमायूँ की सामरिक उपलब्धियाँ

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष

हुमायूँ का पलायन एवं भारत वापसी

हुमायूँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

हुमायूँ का पलायन एवं भारत वापसी

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शेर खाँ से मिली पराजय के बाद भारत से हुमायूँ का पलायन मुगलों के इतिहास की सबसे बड़ी शर्मनाक घटना है। हुमायूँ का पलायन उसकी स्वयं की विफलता तो थी ही, उससे भी अधिक वह उसके भाइयों की गद्दारी थी

हुमायूँ का पलायन

सिंध प्रवास

हुमायूँ ने हिन्दाल के साथ लाहौर से प्रस्थान कर सिन्ध में प्रवेश किया परन्तु दोनों भाई वहाँ अधिक दिनों तक एक साथ नहीं रह सके। हुमायूँ का हिन्दाल के धर्मगुरु की कन्या हमीदा बानू के साथ प्रेम हो गया जिसके साथ उसने 31 अगस्त 1541 को विवाह कर लिया। इससे हिन्दाल हुमायूं से अप्रसन्न हो गया और उसका साथ छोड़कर कन्दहार चला गया।

हुमायूँ के साथियों की संख्या धीरे-धीरे घटने लगी। इसलिये हुमायूँ का सिन्ध में रहना खतरे से खाली नहीं रहा। हुमायूँ ने मारवाड़ के शासक राजा मालदेव के यहाँ जाने का निश्चय किया परन्तु जब वह जोधपुर के निकट पहुँचा तब उसे यह ज्ञात हुआ कि मालदेव शेरशाह से मिल गया है और हुमायूँ को कैद कर लेने का वचन दे चुका है। इस सूचना से हुमायूं आतंकित हो उठा और वहाँ से जैसलमेर होता हुआ अमरकोट की तरफ भाग खड़ा हुआ।

अमरकोट प्रवास

22 अगस्त 1542 को हुमायूँ अत्यंत दयनीय दशा में अमरकोट पहुँचा। अमरकोट के राणा ने हुमायूँ का स्वागत किया और उसे हर प्रकार से सहायता देने का वचन दिया। हुमायूूँँ लगभग डेढ़ महीने तक अमरकोट में रहा। यहीं पर 14 अक्टूबर 1542 को हमीदा बानू की कोख से अकबर का जन्म हुआ। कई महीने तक सिन्ध में भटकने के बाद हुमायूँ ने जुलाई 1543 में कन्दहार के लिए प्रस्थान किया।

भारत से निष्कासन

हुमायूँ अभी कन्दहार के मार्ग में था कि उसे सूचना मिली की मिर्जा अस्करी, कामरान की आज्ञा से उसे कैद करने आ रहा है। इस पर हुमायूँ ने अपने नवजात शिशु को अपने विश्वसनीय आदमियों के संरक्षण में छोड़कर अपनी पत्नी तथा बाईस स्वामिभक्त अनुचरों के साथ दिसम्बर 1543 में गजनी के मार्ग से फारस के लिए प्रस्थान कर दिया। इन स्वामिभक्त सेवकों में बैरमखाँ भी था। अस्करी ने हुमायूँ को चुपचाप चले जाने दिया तथा उसका पीछा नहीं किया। इस प्रकार हुमायूँ भारत की सीमाओं से बाहर चला गया।

फारस प्रवास

हुमायूँ ने मार्ग में ही एक पत्र फारस के शाह तहमास्प को भिजवाकर अपने फारस आने की सूचना भिजवाई। इस पर तहमास्प ने अपने अफसरों तथा सूबेदारों को आदेश भिजवाया कि हुमायूं का फारस राज्य में हर स्थान पर राजसी स्वागत किया जाय। फलतः जब हुमायूँ सीस्तान पहुँचा तब वहाँ के गवर्नर ने हुमायूँ का बड़ा स्वागत किया।

हुमायूँ सीस्तान से हिरात तथा नशसीमा होता हुआ फारस पहुँचा। जुलाई 1544 में हुमायूँ फारस के शाह तहमास्प से मिला। फारस में हुमायूँ अधिक प्रसन्न नहीं रहता था। हुमायूँ एक सुन्नी मुसलमान था परन्तु फारस का शाह शिया था। इसलिये एक शिया की शरण में रहना हुमायूँ के लिए पीड़ाजनक था।

हुमायूँ को पारसीकों जैसे कपड़े पहनने पड़ते थे तथा उन्हीं की तरह व्यवहार करना पड़ता था। शाह का भाई भी हुमायूँ से वैमनस्य रखने लगा। कुछ लोगों ने हुमायूँ के विरुद्ध तहमास्प के कान भरने आरम्भ किये इससे वह हुमायूं से अप्रसन्न हो गया। यहाँ तक कि हुमायूँ की जान खतरे में पड़ गई। इस स्थिति में शाह की एक बहिन ने हुमायूँ की बड़ी सहायता की।

शाह द्वारा सैनिक सहायता

तहमास्प की बहिन ने तहमास्प को हुमायूँ की सहायता करने के लिये तैयार किया ताकि हुमायूँ फिर से अपने खोये हुए राज्य को प्राप्त कर सके। शाह ने हुमायूँ को शाहजादे मुराद की अध्यक्षता में 13 हजार अश्वारोही दिये ताकि हुमायूँ कन्दहार पर आक्रमण कर सके।

इस सहायता के बदले में हुमायूँ से यह वचन लिया गया कि वह शाह की बहिन की लड़की से विवाह करेगा और जब फारस की सेना कन्दहार, गजनी तथा काबुल जीत कर हुमायूं को सौंप देगी, तब हुमायूँ कन्दहार फारस के शाह को लौटा देगा। इसके अतिरिक्त अन्य कोई धार्मिक, साम्प्रदायिक अथवा राजनीतिक शर्त नहीं रखी गई।

हुमायूँ की भारत वापसी

कंदहार पर अधिकार

हुमायूँ ने फारस के शाह की सेना के साथ भारत के लिए प्रस्थान किया। उसने सबसे पहले कन्दहार पर आक्रमण किया। कंदहार की सुरक्षा कामरान ने मिर्जा अस्करी को सौंप रखी थी। कन्दहार का घेरा लगभग पाँच माह तक चला। 3 सितम्बर 1545 को अस्करी ने कन्दहार का दुर्ग हुमायूँ को समर्पित कर दिया।

फारस के शहजादे ने हुमायूँ से यह माँग की कि वह कन्दहार को, कन्दहार से प्राप्त कोष तथा अपने भाई अस्करी के साथ फारस के शाह को समर्पित कर दे। वे लोग मिर्जा अस्करी को कैद करके शाह के पास भेजना चाहते थे। हुमायूँ ने फारस के शहजादे की प्रथम दो मांगें तो स्वीकार कर लीं परन्तु तीसरी माँग अस्वीकार कर दी क्योंकि इससे बाबर के परिवार की प्रतिष्ठा पर बहुत बड़ा धक्का लगता।

इस पर हुमायूँ का फारस वालों से झगड़ा हो गया। हुमायूं ने फारस वालों को वहाँ से मार भगाया और कन्दहार पर अधिकार स्थापित कर लिया। हुमायूँ ने फारस के शाह को प्रसन्न करने के लिए शिया मुसलमान बैरमखाँ को कन्दहार का गवर्नर बना दिया।

फारस वालों से झगड़ा

कुछ इतिहासकारों ने कन्दहार प्रकरण में हुमायूँ पर विश्वासघात करने का आरोप लगाया है परन्तु यह आरोप उचित नहीं हैं। हुमायूँ ने शाह को इस शर्त पर कन्दहार देने का वचन दिया था कि शाह हुमायूँ को काबुल, गजनी तथा बदख्शाँ जीतने में सहायता करेगा। इसलिये जब तक इन तीनों स्थानों पर हुमायूँ का अधिकार नहीं होता तब तक फारस के द्वारा हुमायूँ से कन्दहार माँगना उचित नहीं था।

फारस के शासक शिया थे जबकि कन्दहार की जनता सुन्नी थी। इस कारण फारस के शिया मुसलमान कन्दहार के सुन्नी मुसलमानों पर अत्याचार करते थे। इसलिये कन्दहार की जनता उन्हें घोर घृणा की दृष्टि से देखती थी। ऐसी स्थिति में कन्दहार फारस वालों को सौंपना उचित नहीं था। इतना ही नहीं, जब तक हुमायूँ अफगानिस्तान की विजय में संलग्न था तब तक के लिए फारस के शाह द्वारा हुमायूँ के परिवार को दुर्ग में रहने की अनुमति नहीं दी गई।

इससे हुमायूँ को बड़ी पीड़ा हुई। हुमायूँ को एक सुरक्षित आधार की आवश्यकता थी जहाँ से वह अपने युद्धों का संचालन कर सकता। उसकी इस आवश्यकता की पूर्ति कन्दहार ही कर सकता था। अतः हुमायूँ का फारस के शाह को कन्दहार नहीं देना सर्वथा उचित था।

काबुल तथा बदख्शाँ पर अधिकार

हुमायूँ ने कन्दहार को आधार बनाकर काबुल की ओर ध्यान दिया। उन दिनों हिन्दाल काबुल में था। वह कामरान का साथ छोड़कर हुमायूँ से आ मिला। कामरान के अन्य साथी भी कामरान का साथ छोड़कर हुमायूँ की तरफ आ गये। इससे कामरान भयभीत हो गया और काबुल से सिन्ध भाग गया।

नवम्बर 1545 में हुमायूँ ने काबुल में प्रवेश किया जहाँ पर वह अपने तीन वर्षीय बालक अकबर से मिला। हुमायूँ ने बदख्शाँ पर भी अधिकार कर लिया। यहाँ पर हुमायूँ बीमार हो गया। कुछ लोगों ने उसकी मृत्यु की अफवाह उड़ा दी। जब कामरान को यह सूचना मिली तो वह सिन्ध से चला आया और उसने फिर से काबुल पर अधिकार कर लिया।

स्वस्थ हो जाने पर हुमायूँ ने बदख्शाँ छोड़ दिया और काबुल का घेरा डाल दिया। कामरान ने हुमायूं तथा उसके अनुयायियों के परिवारों पर घोर अत्याचार किया तथा उन्हें तोप से उड़ाने के लिये दीवार पर लटका दिया गया। हुमायूँ के पुत्र अकबर को भी दीवार से लटका दिया गया परन्तु उसे समय पर पहचान लिया गया और तोप का मुँह फेर कर उसकी जान बचाई गई।

अप्रैल 1547 में हुमायूँ ने पुनः काबुल पर अधिकार कर लिया परन्तु कामरान ने संघर्ष जारी रखा। इन्हीं संघर्ष के दौरान एक रात को मिर्जा हिन्दाल को मार डाला गया। अन्त में कामरान घक्कर प्रदेश को भाग गया। वहाँ के शासक ने कामरान को पकड़कर हुमायूँ को समर्पित कर दिया। समस्त अमीरों की राय थी कि कामरान की हत्या करवा दी जाय परन्तु हुमायूँ इसके लिए तैयार नहीं हुआ।

इसलिये उसे अन्धा कर देने का निश्चय किया गया। दिसम्बर 1551 में कामरान को अन्धा कर दिया गया। इसके बाद उसे अपनी पत्नी तथा नौकर के साथ मक्का जाने की आज्ञा दे दी गई जहाँ 5 अक्टूबर 1557 को कामरान की मृत्यु हो गई। मिर्जा अस्करी को भी मक्का जाने की अनुमति दे दी गई।

भारत पर पुनर्विजय

अब बाबर के चार पुत्रों में से एक, हिन्दाल मारा जा चुका था, दो पुत्र  कामरान तथा अस्करी मक्का जा चुके थे। इस कारण भारत में अब बाबर के पुत्रों में से अकेला हुमायूँ बचा था। उसे अपने भाइयों के विरोध से पूरी तरह छुटकारा मिल चुका था। उसके पास एक सुसज्जित तथा सुदृढ़ सेना थी।

हुमायूँ के अमीर भी उसके आज्ञाकारी बन गये थे। इसलिये उसने भारत को फिर से जीतने का निश्चय किया। भारत की परिस्थितियाँ अब हुमायूं के अनुकूल हो गई थीं क्योंकि शेर खाँ की मृत्यु हो चुकी थी तथा उसके निर्बल उत्तराधिकारियों के शासन में अफगान राज्य पतनोन्मुख हो चला था।

12 नवम्बर 1554 को हुमायूँ ने काबुल से प्रस्थान किया। 31 दिसम्बर को वह सिन्धु नदी के तट पर पहुँचा जहाँ बैरमखाँ भी उससे आ मिला। हुमायूँ ने सिन्धु नदी को पार करके बिना किसी कठिनाई के रोहतास दुर्ग पर अधिकार कर लिया। 24 फरवरी 1555 को हुमायूँ लाहौर पहुँच गया और आसानी से उस पर अधिकार कर लिया। लाहौर से हुमायूं की सेनाएँ आगे बढ़ीं। 15 मई 1555 को मच्छीवारा नामक स्थान पर अफगानों एवं मंगोलों में बड़ा युद्ध हुआ जिसमें हुमायूँ विजयी रहा।

23 जून 1555 को सरहिन्द के मैदान में मुगल तथा अफगान सेनाओं में भीषण संग्राम हुआ। इस युद्ध में भी अफगान सेना परास्त हो गई और हुमायूँ को पूर्ण विजय प्राप्त हो गई। सरहिन्द की विजय ने हुमायूँ के लिये दिल्ली का द्वार खोल दिया। वह समाना के मार्ग से दिल्ली की ओर बढ़ा। 20 जुलाई 1555 को हुमायूँ ने सलीमगढ़ दुर्ग में प्रवेश किया जो हुमायूँ के ‘दीनपनाह’ के चारों ओर बनाया गया था। इस प्रकार हुमायूँ ने अपने पूर्वजों के खोये हुए साम्राज्य को पुनः प्राप्त कर लिया।

हुमायूँ के अन्तिम दिवस

 यद्यपि हुमायूँ ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया था परन्तु अभी उसका कार्य पूरा नहीं हुआ था। पंजाब की जनता उससे सन्तुष्ट नहीं थी। सिकन्दर सूरी परास्त होकर शिवालिक की पहाड़ियों में चला गया था और अपनी शक्ति को पुनः संगठित करने में लगा हुआ था। अन्य प्रान्तों में भी अफगान सरदार बड़े शक्तिशाली थे और बिना संघर्ष किये हुमायूँ की अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।

इसलिये भारत विजय का कार्य अभी अपूर्ण ही था किंतु अब उसके सामने उस प्रकार की कठिनाइयाँ नहीं थी जिस प्रकार की उसके प्रारम्भिक जीवन में थीं। अब उसे बहाहुरशाह अथवा शेरशाह जैसे प्रबल शत्रुओं एवं अपने इर्ष्यालु भाइयों का सामना नहीं करना था। उसके अमीर भी उसके प्रति स्वामिभक्त बन गये थे और विश्वासघात की अधिक सम्भावना नहीं थी।

भंयकर मुसीबतों का सामना करने से हुमायूँ में दृढ़ता आ गई थी और उसका अनुभव भी बढ़ गया था। प्रशासकीय क्षेत्र में उसे किसी नई रचना की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि शेरशाह ने बड़ी ही व्यवस्थित शासन व्यवस्था की स्थापना कर दी थी। इसलिये भारत विजय के कार्य को पूरा करना हुमायूँ के लिए असाध्य कार्य नहीं था।

हुमायूं की मृत्यु

24 जनवरी 1556 को हुमायूँ शीतल वायु का आनन्द लेने के लिए अपने दिल्ली  स्थित पुस्तकालय की छत पर गया। शाम को जब वह नीचे उतर रहा था और सीढ़ी के दूसरे डण्डे पर था कि उसे अजान की आवाज सुनायी दी। वह जहाँ था वहीं पर बैठ गया परन्तु उसका पैर फिसल गया और वह सिर के बल गिर पड़ा। उसके सिर में गम्भीर चोट लगी जिसके कारण रविवार 26 जनवरी 1556 को हुमायूँ की मृत्यु हो गई। उसकी इच्छा के अनुसार उसे काबुल में दफनाया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – मुगल सल्तनत की अस्थिरता का युग

हुमायूँ और उसकी समस्याएँ

हुमायूँ की सामरिक उपलब्धियाँ

हुमायूँ – शेर खाँ संघर्ष

हुमायूँ का पलायन एवं भारत वापसी

हुमायूँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

हुमायूँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

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हुमायूँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांक - www.bharatkaitihas.com

हुमायूँ का चरित्र उसकी अच्छाइयों एवं कमजोरियों का सम्मिश्रण था। मूलतः वह एक अच्छा इंसान था किंतु साथ ही प्रमादी अर्थात् आलसी प्रवृत्ति का भी था।

हुमायूँ की अच्छाइयाँ

(1.) सुशिक्षित एवं सभ्य

व्यक्ति के रूप में हुमायूँ सरल हृदय, सहज विश्वासी, परिवार से प्रेम करने वाला, सुशिक्षित तथा सभ्य व्यक्ति था। वह उच्च कोटि का साहित्यानुरागी था और साहित्यकारों को आदर की दृष्टि से देखता था। उसकी बहिन गुलबदन बेगम ने हुमायूँनामा लिखा तथा उसके समकालीन मिर्जा हैदर ने तारीखे रशीदी नामक ग्रंथ लिखा।

हुमायूँ को भूगोल, गणित, ज्योतिष तथा मुस्लिम धर्मशास्त्र में अच्छी रुचि थी। हुमायूँ ने दिल्ली में एक सुन्दर पुस्तकालय का निर्माण करवाया था जिसे दीनपनाह कहते थे। वह उच्च कोटि का दानशील था। उसकी उदारता से उसके शत्रु भी लाभान्वित हो जाते थे। इन सब गुणों से स्पष्ट होता है कि हुमायूँ का चरित्र उच्च था।

(2.) उपकार मानने वाला

बादशाहों में उपकार मानने और कृतज्ञता अनुभव करने की भावना प्रायः कम ही होती है किंतु हुमायूँ ने अपना उपकार करने वालों के प्रति कृतज्ञता का प्रदर्शन किया। जिस भिश्ती ने कर्मनाशा नदी में हुमायूँ को डूबने से बचाया, उसके प्रति कृतज्ञता प्रदर्शित करने के लिये हुमायूँ ने उसे आधे दिन के लिये आगरा के तख्त पर बैठाया। उसने बैरमखाँ की सेवाओं का सम्मान करते हुए उसके शिया होते हुए भी उसे कन्दहार का शासक नियुक्त किया।

(3.) वचन का पक्का

हुमायूँ ने अपने पिता को दिये हुए वचन की पालना करने के लिये सदैव अपने विद्रोही भाइयों को क्षमा किया। हुमायूँ ने विद्रोही हिन्दाल को क्षमा करके अपने साथ मिला लिया। हुमायूँ ने फारस वालों को मिर्जा अस्करी सौंपने से मना कर दिया। जब हुमायूँ के अमीर कामरान के प्राण लेने की सलाह दे रहे थे, हुमायूँ ने उसे अंधा करके हज पर जाने की अनुमति दे दी। उसने अस्करी को भी मक्का चले जाने की अनुमति दे दी।

(4.) विलासी व्यक्ति

हुमायूँ विलासी प्रवृत्ति का शासक था। वह जीत के मैदान में ही जश्न मनाने लग जाता था। अफीम का शौकीन था। स्त्रियों के प्रति अनुरक्त रहता था। उसने कई विवाह किये। उसने हिन्दाल के विरोध के बावजूद हिन्दाल के धर्मगुरु की पुत्री हमीदा बानू से विवाह किया जो उम्र में बहुत छोटी थी तथा उसके कंधों तक भी मुश्किल से पहुँचती थी। हुमायूँ ने फारस के शाह की बहिन की पुत्री से भी विवाह किया जो शिया मुसलमान थी। इससे स्पष्ट होता है कि हुमायूँ का चरित्र प्रमाद एवं विलास से ग्रस्त था।

(5.) उत्साही योद्धा

अपनी परिस्थतियों एवं दुर्भाग्य के बावजूद हुमायूँ में सैनिक प्रतिभा विद्यमान थी। पानीपत के प्रथम युद्ध में वह सेना के एक पक्ष का सेनापति था और उसने सफलतापूर्वक युद्ध किया था। वह भारत के अन्य युद्धों में भी अपने पिता की तरफ से लड़ा। बाबर की मृत्यु के उपरान्त भी उसने राजपूतों तथा अफगानों से बड़ी सफलतापूर्वक युद्ध किये।

वह मालवा तथा गुजरात के प्रचुर साधन सम्पन्न प्रान्तों के शासक बहादुरशाह को खदेड़ता ही चला गया था और उसके सम्पूर्ण राज्य पर अधिकार कर लिया था। उसने पूर्व के अफगानों को भी नतमस्तक कर दिया था। प्रारम्भ में शेर खाँ को भी हुमायूूूँ से लड़ने का साहस नहीं हुआ था और हुमायूँ तेजी से विजय करता हुआ गौड़ तक पहुँच गया किंतु चुनार को जीतने में विलम्ब तथा हिन्दाल के विद्रोह के कारण हुमायूँ को चौसा के युद्ध में हार का सामना करना पड़ा।

(6.) हारी हुई बाजी जीतने वाला

फारस पहुँचकर भी हुमायूँ चुप नहीं बैठा। उसने फिर से भारत विजय की योजना बनाई तथा फारस के शाह की बहिन की सहायता से फारस से सैन्य सहायता प्राप्त की। जब हुमायूँ को फारस के शाह से सैन्य सहायता प्राप्त हो गई तब उसे कन्दहार जीतने में कोई कठिनाई नहीं हुई।

उसने फारस वालों की अनुचित मांगें अस्वीकार करके अपने बल पर काबुल तथा बदख्शाँ को जीतते हुए भारत में प्रवेश किया। अफगास्तिान से दिल्ली तक के मार्ग में उसने स्थान-स्थान पर अफगान सेनाओं से युद्ध किये। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि हुमायूँ में सैनिक गुणों का अभाव नहीं था और वह हारी हुई बाजी को फिर से जीतने का हौंसला रखता था।

हुमायूँ की भूलें

हुमायूँ जीवन भर एक के बाद एक भूल करता रहा जिनके गंभीर परिणाम निकले।

(1.) साम्राज्य का बंटवारा

हुमायूँ ने सबसे बड़ी भूल अपने भाइयों में साम्राज्य का बंटवारा करके की। इससे आर्थिक आय का आधार समाप्त हो गया। सैनिक शक्ति कमजोर हो गई तथा भाई स्वतंत्र शासक की तरह व्यवहार करने लगे।

(2.) साम्राज्य का असमान बंटवारा

हुमायूँ ने दूसरी भूल राज्य का असमान बंटवारा करके की। कामरान को उसने पंजाब, काबुल तथा कांधार जैसे विस्तृत प्रदेश दे दिये जबकि उसने अस्करी को सम्भल एवं हिन्दाल को अलवर का राज्य दिया। इस असमान वितरण से कामरान अत्यधिक शक्तिशाली हो गया और वह हुमायूँ से प्रतिस्पर्धा करने लगा। दूसरी ओर अस्करी एवं हिन्दाल छोटी जागीरें मिलने से असंतुष्ट हो गये।

(3.) मिर्जाओं को भाग जाने का अवसर देना

हुमायूँ ने असंतुष्ट एवं विद्रोही मिर्जाओं को भागकर गुजरात के बादशाह से मिल जाने का अवसर दिया। इससे बहादुरशाह की ताकत बहुत बढ़ गई। हुमायूँ ने यदि विद्रोही मिर्जाओं पर समय रहते नियंत्रण पा लिया होता तो उसे आगे चलकर इतने बुरे दिन नहीं देखने पड़ते।

(4.) कालिंजर अभियान

हुमायूँ का कालिंजर अभियान उसकी असफलताओं की शुरुआत कहा जा सकता है। इस अभियान से कोई परिणाम नहीं निकला। राज्य की सामरिक शक्ति क्षीण हुई, बादशाह की प्रतिष्ठा को धक्का लगा। कालिंजर के राजा को अधीन नहीं किया जा सका। यहाँ तक कि उसे मित्र भी नहीं बनाया जा सका।

(5.) चुनार का दुर्ग शेर खाँ को सौंपना

हुमायूँ ने ही शेर खाँ को पनपने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई तथा उसकी बातों में आकर चुनार का दुर्ग उसी को सौंप दिया। इससे शेर खाँ एक सामान्य जागीरदार से विशेष सेनानायक बन गया।

(6.) चित्तौड़ की सहायता नहीं करना

गुजरात के शासक बहादुरशाह के विरुद्ध चित्तौड़ की सहायता का प्रस्ताव स्वीकार नहीं करना, हुमायूँ की बड़ी भूल थी। इससे उसने राजपूतों को मित्र बनाने का अवसर खो दिया।

(7.) चम्पानेर का धन बर्बाद करना

चम्पानेर से हुमायूँ को पर्याप्त धन मिला था किंतु हुमायूँ ने उस धन को दावतें देने तथा आमोद-प्रमोद में नष्ट कर दिया।

(8.) सैनिक शिविर निचले स्थान पर लगाना

हुमायूँ ने कन्नौज में अपना सैनिक शिविर निचले स्थान पर लगाया। उसके दुर्भाग्य से मई के महीने में भी तेज बारिश हो गई और उसका सैनिक शिविर पानी से भर गया।

(9.) हमीदा बानू से विवाह

हमीदा बानू, हिन्दाल के धर्मगुरु की पुत्री थी। इसलिये हिन्दाल नहीं चाहता था कि हुमायूँ उससे विवाह करे किंतु हुमायूँ ने उसकी बात नहीं मानी और हिन्दाल नाराज होकर हुमायूँ का साथ छोड़ गया। हुमायूँ की लम्पटता देखकर अन्य साथी भी हुमायूँ का साथ छोड़ गये। इसका परिणाम यह हुआ कि हुमायूँ को उसके ही भाइयों ने भारत से बाहर भाग जाने पर विवश कर दिया।

(10.) कमजोर प्रशासक

हुमायूँ अपने शासन के आरम्भिक दस वर्षों में युद्धों में इतना व्यस्त रहा कि उसने प्रजा को अच्छा शासन देकर अपने अधिकारियों एवं जन सामान्य का विश्वास जीतने का प्रयास ही नहीं किया। जब वह दुबारा भारत का बादशाह बना तब तक शेरशाह ने ऐसे संगठित तथा व्यवस्थित शासन की स्थापना कर दी थी कि हुमायूं को प्रशासकीय प्रतिभा दिखाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। उसकी अकाल मृत्यु ने भी उसे इससे वंचित कर दिया।

इस प्रकार हुमायूँ एक कमजोर प्रशासक सिद्ध हुआ। अतः स्पष्ट होता है कि हुमायूँ का चरित्र अच्छाइयों एवं दुर्बलताओं का सम्मिश्रण था।

हुमायूँ का दुर्भाग्य

हुमायूँ का शाब्दिक अर्थ होता है सौभाग्यशाली परन्तु वास्तव में वह सौभाग्यशाली नहीं था। उसके भाग्य ने बहुत कम अवसरों पर उसका साथ दिया।

लेनपूल ने लिखा है- ‘एक बादशाह के रूप में वह असफल रहा। उसके नाम का अर्थ है सौभाग्यशाली परन्तु कोई भी दुर्भाग्यशाली व्यक्ति इतने गलत नाम से नहीं पुकारा गया है।’

भारत में उसके पिता ने जिस नये साम्राज्य की स्थापना की थी उसे खो देने का अपयश हुमायूँ को ही मिला। यद्यपि बाबर से हुमायूँ को एक सुसंगठित साम्राज्य प्राप्त नहीं हुआ था परन्तु उसे अपने पिता से मुगलों की विशाल एवं कुशल सेना अवश्य प्राप्त थी जिसकी सहायता से वह अपने पिता से प्राप्त साम्राज्य को न केवल सुरक्षित रख सकता था अपितु उसमें वृद्धि भी कर सकता था।

बाबर ने अफगानों तथा राजपूतों की शक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया था परन्तु हुमायूँ अपने पिता के साम्राज्य को सुरक्षित नहीं रख सका और अफगानों ने उसे परास्त करके एक बार फिर से भारत में अफगान राज्य की स्थापना कर दी थी।

निष्कर्ष

हुमायूँ के सम्पूर्ण जीवन वृत्त को देखने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हुमायूँ की विफलता का कारण उसकी प्रतिकूल परिस्थियतियाँ ही थीं जिनको वह अपने अनुकूल नहीं बना सका। यह उसका बहुत बड़ा दुर्भाग्य था।

फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी और परिस्थितियाँ अनुकूल होते ही अपने खोये हुए राज्य को फिर से प्राप्त कर लिया किंतु दुर्भाग्य ने अंत तक उसका पीछा नहीं छोड़ा और दिल्ली पर अधिकार करने के छः माह पश्चात् ही वह सीढ़ियों से गिरकर बुरी तरह घायल हो गया और मर गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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द्वितीय अफगान साम्राज्य का संस्थापक – शेरशाह सूरी

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द्वितीय अफगान साम्राज्य का संस्थापक - शेरशाह सूरी

द्वितीय अफगान साम्राज्य का संस्थापक शेरशाह सूरी ई.1540 में दिल्ली का सुल्तान बना तथा ई.1545 में एक दुर्घटना में मारा गया। इन पांच सालों में उसने अपने साम्राज्य में अनेक प्रशासनिक सुधार किए।

सूर कबीला

 सूर कबीला अफगानिस्तान में निवास करता था। ये लोग स्वयं को मुहम्म्द गौरी का वंशज मानते थे। शेरशाह के पूर्वज इसी सूर कबीले के थे। इसलिये वे सूरी कहलाते थे। जब शेरशाह ने दिल्ली में अपने नये राजवंश की स्थापना की तब वह राजवंश, सूरवंश अथवा सूरी वंश के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

सूरी परिवार का भारत में आगमन

शेरशाह के पितामह का नाम इब्राहीम सूरी और पिता का नाम हसन सूरी था। इब्राहीम सूरी, अफगानिस्तान के रौह नामक स्थान का निवासी था। वह घोड़ों का व्यापारी था। उसने सामान्य जीवन व्यतीत किया। जब बहलोल लोदी ने अफगानों को भारत में आने का निमंत्रण दिया तब इब्राहीम सूरी अपने पुत्र हसन के साथ हिन्दुस्तान चला आया।

उसने हिसार-फिरोजा में जमाल खाँ नामक एक अफगान अफसर के यहाँ नौकरी कर ली। जमाल खाँ ने उसे कुछ गाँव जागीर में दे दिये जिससे वह पचास घोड़ों का खर्च चला सके। धीर-धीरे वह उन्नति करने लगा और पाँच घोड़ों का सरदार बन गया।

द्वितीय अफगान साम्राज्य का संस्थापक शेरशाह सूरी

हसन सूरी की चार पत्नियाँ थीं। उनमें से पहली पत्नी एक अफगान महिला थी और शेष तीन हिन्दुस्तानी नौकरानियाँ थीं जिन्हें हसन ने अपनी पत्नी बना लिया था। हसन की अफगान पत्नी से दो पुत्र- फरीद तथा निजाम का जन्म हुआ। शेष तीन पत्नियों से चार पुत्र थे।

इस प्रकार फरीद अपने पिता की सबसे बड़ी संतान था। उसका जन्म हिसार-फिरोजा अथवा नारनोल में हुआ। कुछ इतिहासकार फरीद का जन्म 1472 ई. में तथा कुछ लोग 1486 ई. में होना मानते हैं। यही फरीद आगे चलकर शेर खाँ के नाम से जाना गया। यही द्वितीय अफगान साम्राज्य का संस्थापक हुआ तथा इतिहास में शेरशाह सूरी के नाम से जाना गया।

शेरशाह का प्रारम्भिक जीवन

इब्राहीम सूरी की मृत्यु के बाद हसन सूरी अपने पिता इब्राहीम की जागीर का मालिक बना। कुछ समय पश्चात् जमाल खाँ को पूर्वी प्रान्तों का सूबेदार बनाकर भेजा गया। हसन भी जमाल खाँ के साथ सपरिवार वहीं चला गया और सहसराम में बस गया। जमाल खाँ ने उसे सहसराम तथा खवासपुर टाँडा की जागीरें प्रदान कीं।

इस प्रकार हसन एक बड़ी जागीर का स्वामी बन गया परन्तु घर में चार औरतों के कारण उसका पारिवारिक जीवन अत्यंत कलहपूर्ण था। वह अपनी सबसे छोटी पत्नी से अधिक प्रेम करता था जिससे सुलेमान तथा अहमद नाम के दो पुत्र थे। हसन को उनसे भी विशेष स्नेह था।

चूँकि हसन, फरीद की उपेक्षा करता था तथा उसके सौतेले भाइयों पर विशेष कृपा रखता था, इसलिये फरीद अपने पिता से खिन्न होकर प्रान्तीय सरकार की राजधानी जौनपुर चला गया जो उन दिनों शिक्षा का बहुत बड़ा केन्द्र थी तथा उसे भारत का सीराज कहा जाता था।

जौनपुर में विद्याध्ययन

फरीद जौनपुर में कई वर्षों तक रहा। वहाँ पर उसने बड़े परिश्रम से विद्याध्ययन किया। उसने फारसी का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया और थोड़ी-बहुत अरबी भी सीख ली। उसने इतिहास, साहित्य तथा महापुरुषों की जीवन गाथाओं के अध्ययन की ओर  विशेष ध्यान दिया। फरीद ने प्रान्त के सैनिक शासन तथा प्रशासकीय शासन का भी पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कर लिया। उसने अनेक सन्तों तथा विद्वानों से भी मैत्री कर ली जिनका जनता में बहुत बड़ा प्रभाव था।

पिता-पुत्र में सुलह

फरीद जौनपुर में रहते हुए, अपने पिता के संरक्षक एवं जौनपुर के शासक जमाल खाँ के सम्पर्क में रहा। जमाल खाँ, फरीद की बुद्धिमत्ता, सद्व्यवहार, परिश्रमशीलता तथा व्यवहार कुशलता से बड़ा प्रभावित हुआ। इन गुणों के बल पर फरीद ने जौनपुर में बड़ी ख्याति प्राप्त कर ली।

एक बार जब हसन खाँ किसी काम से जौनपुर आया तो जमाल खाँ ने हसन खाँ तथा फरीद के बीच सुलह करवा दी तथा हसन खाँ से कहा कि वह अपनी जागीर का काम फरीद से करवाये। हसन खाँ ने जमाल खाँ का आदेश स्वीकार कर लिया।

इस पर फरीद ने जमाल खाँ से कहा कि ये आपके सामने तो जागीर देने की हाँ भरते हैं किंतु सहसराम जाते ही अपनी हिन्दुस्तानी बीवी की उपस्थिति में मना कर देंगे। हसन खाँ ने जमाल खाँ तथा फरीद दोनों को आश्वस्त किया कि ऐसा नहीं होगा। इस पर फरीद ने अगली शर्त रखी कि आप मेरे काम में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। हसन ने इस शर्त को भी स्वीकार कर लिया।

पिता की जागीर का प्रबंध

पिता से सुलह होने के बाद फरीद जौनपुर से सहसराम आ गया। हसन ने उसे अपनी जागीर का प्रबन्ध सौंप दिया। जागीर में चारों ओर कुप्रबंध फैला हुआ था। कई उद्दण्ड किसान लगान नहीं देते थे। फरीद ने उनके गांव लूट लिये तथा उनके स्त्री-बच्चों को बंदी बना लिया। फरीद ने किसानों को धमकी दी कि यदि वे लगान नहीं देंगे तो उनके स्त्री-बच्चे गुलाम बनाकर बेच दिये जायंगे।

किसानों ने भयभीत होकर लगान भर दिया। इसके बाद फरीद ने जागीर में चोर-डाकुओं का सफाया किया। फरीद ने प्रजा पर अत्याचार करने वाले सरकारी कर्मचारियों का भी दृढ़ता से दमन किया। कुछ ही दिनों में हसन की जागीर में शान्ति तथा सम्पन्नता दिखाई देने लगी।

फरीद द्वारा पिता की जागीर में की गई व्यवस्था की दो प्रधान विशेषताएँ थीं-

(1.) फरीद ने अपने पिता की जागीर की सम्पूर्ण भूमि की नपाई करवाकर किसानों को उसके पट्टे दे दिये।

(2.) फरीद ने जागीर की समस्त भूमि का वर्गीकरण करके पैदावार के आधार पर लगान का निर्धारण किया।

(3.) फरीद ने लगान निश्चित करते समय किसानों के प्रति उदारता दिखाई तथा उन्हें कई प्रकार की सुविधाएं दीं। लगान वसूल करते समय उसने कठोर रवैया दिखाया।

(4.) उस समय हसन की जागीर के विभिन्न भागों में लगान निर्धारित करने तथा वसूल करने की विभिन्न प्रकार की प्रथाएँ प्रचलित थीं। फरीद ने किसानों को अपनी मर्जी से लगान निर्धारित करवाने की प्रथा चुनने की स्वतन्त्रता दी।

(5.) फरीद ने किसानों से सीधे सम्पर्क में रहने की व्यवस्था की। वह हर समय उनकी फरियाद सुनने के लिये प्रस्तुत रहता था।

(6.) फरीद ने किसानों की एक स्थानीय सेना का संगठन किया और उस सेना की सहायता से अनुशासनहीन, उपद्रवी तथा अत्याचारी जमींदारों का दमन किया।

पिता की जागीर का त्याग

हसन अपने पुत्र फरीद की अद्भुत प्रशासकीय प्रतिभा को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ परन्तु फरीद की सौतेली माँ के हृदय में ईर्ष्या उत्पन्न हुई। उसने हसन से कहा कि उसके पुत्र सुलेमान को भी एक बार जागीर के प्रबन्धन का अवसर दिया जाए। हसन ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। इस पर सुलेमान की माता ने हसन से बात करना बंद कर दिया।

हारकर हसन को अपनी पत्नी की माँग स्वीकार करनी पड़ी। फरीद लगभग बीस वर्षों से जागीर का प्रबन्ध करता आ रहा था। इसलिये वह स्वयं को जागीर का एकाधिकारी समझने लगा था किंतु जैसे ही फरीद को अपने पिता द्वारा सुलेमान को जागीर का प्रबंध सौंपने के निर्णय का पता चला, वैसे ही फरीद ने स्वयं ही अपने पिता की जागीर के दोनों परगने हाजीपुर तथा ख्वासपुर टाण्डा का परित्याग कर दिया और 1519 ई. में फरीद आगरा के लिए चल दिया।

फरीद का भाग्योदय

आगरा में फरीद ने दौलत खाँ के यहाँ नौकरी कर ली। दौलत खाँ उसकी सेवाओं से इतना प्रसन्न हुआ कि उसने सुल्तान इब्राहीम लोदी से प्रार्थना की कि वह हसन की जागीर फरीद को दे दे। सुल्तान ने दौलत खाँ की प्रार्थना को इस आधार कर अस्वीकार कर दिया कि फरीद ने अपने पिता की निन्दा करके बड़ी ही नीचता का कार्य किया है।

1520 ई. में हसन की मृत्यु हो गई। इसकी सूचना पाते ही फरीद ने आगरा से सहसराम के लिए प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचते ही उसने भाइयों को अपने पिता की जागीर से मार भगाया और जागीर पर अधिकार कर लिया। फरीद के सौतले भाई चुप नहीं बैठे और उसके विरुद्ध षड़यंत्र रचने लगे।

उन्हें चौंद के जागीरदार मुहम्मद खाँ सूरी का संरक्षण तथा समर्थन प्राप्त हो गया जो एक प्रभावशाली व्यक्ति था। इससे फरीद संकट में पड़ गया। अपने भाइयों के षड़यंत्रों को रोकने के लिए फरीद ने बिहार के शासक बहादुर खाँ नूहानी के यहाँ नौकरी कर ली जिसके प्रभाव का प्रयोग कर फरीद अपने भाइयों के षड़यंत्रों को विफल कर सकता था।

अपनी योग्यता तथा परिश्रम से फरीद ने अपने नये स्वामी को भी प्रसन्न कर लिया। एक बार फरीद ने एक शेर का शिकार किया। अपने सेवक की वीरता से प्रसन्न होकर बहादुर खाँ ने उसे शेर खाँ की उपाधि दी। तब से फरीद शेर खाँ कहलाने लगा। थोड़े दिन बाद शेर खाँ को शाहजादे जलाल खाँ का नायब तथा शिक्षक नियुक्त कर दिया गया। इससे शेर खाँ के प्रभाव तथा उसकी प्रतिष्ठा में बड़ी वृद्धि हो गई।

एक बार शेर खाँ छुट्टी लेकर अपनी जागीर पर चला गया परन्तु वहाँ पर अधिक दिनों तक रुक गया। इस पर शेर खाँ के शत्रु मुहम्मद खाँ सूरी ने बिहार के सुल्तान बहादुर खाँ नूहानी को शेर खाँ के विरुद्ध भड़काया। बहादुर खाँ नूहानी, मुहम्मद खाँ की बातों में आ गया तथा शेर खाँ से अप्रसन्न हो गया।

इसके बाद मुहम्मद खाँ ने शेर खाँ से कहा कि वह जागीर में अपने भाइयों को हिस्सा दे दे। शेर खाँ ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इससे अप्रसन्न होकर मुहम्मद खाँ ने शेर खाँ की जागीर पर आक्रमण कर दिया। शेर खाँ भाग खड़ा हुआ और 1517 ई. में उसने जुनैद बर्लस के यहाँ नौकरी कर ली जो उन दिनों बाबर के पूर्वी प्रान्तों का गवर्नर था। अपने नये स्वामी की सहायता से शेर खाँ ने मुहम्मद खाँ को मार भगाया और एक बार फिर अपनी जागीर का स्वामी बन गया।

जुनैद बर्लस शेर खाँ से इतना प्रसन्न हो गया कि वह शेर खाँ को अपने भाई खलीफा के पास आगरा ले गया जो बाबर का प्रधानमन्त्री था। खलीफा ने शेर खाँ को मुगल सेना में रख लिया जिसमें वह पन्द्रह महीने तक रहा। इस प्रकार मुगलों के सैनिक संगठन, उनकी रणपद्धति तथा उनकी शासन व्यवस्था का उसने अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया।

बाबर भी शेर खाँ की प्रतिभा से बड़ा प्रसन्न हुआ और उसकी जागीर में उसकी पुनर्स्थापना कर दी। शेर खाँ फिर से अपनी जागीर में चला आया परन्तु इस बार भी वह अधिक दिनों तक वहाँ न रह सका। इसी बीच बिहार के शासक बहादुर खाँ की मृत्यु हो गयी और उसके स्थान पर उसका अल्पवयस्क बालक जलाल खाँ बिहार का सुल्तान बना।

जलाल खाँ की माँ दूदू उसकी संरक्षिका बन गई। शेर खाँ, सुल्तान जलाल खाँ का शिक्षक रह चुका था। दूदू ने शेर खाँ को बुला भेजा और उसे नायब के पद पर नियुक्त कर दिया। इस पद पर रहते हुए शेर खाँ को राजनीति, कूटनीति तथा शासन कला का ज्ञान प्राप्त हुआ।

शेर खाँ की लड़ाइयाँ

बिहार में शेर खाँ की शक्ति तथा उसका प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ता गया और वह थोड़े ही दिनों में राज्य का सर्वेसर्वा बन गया। इससे नूहानी अफगानों में बड़ी ईर्ष्या पैदा हो गई और वे उसके विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगे।

बिहार पर अधिकार

शेर खाँ के उत्कर्ष से असन्तुष्ट कुछ नूहानी अफगान बिहार से भागकर बंगाल पहुँचे और वहाँ के शासक नसरत शाह से बिहार पर आक्रमण करने के लिये उकसाया ताकि वे अपनी खोई हुई शक्ति को फिर से प्राप्त कर लें। नसरत शाह ने इस अवसर का लाभ उठाने के लिये बिहार पर आक्रमण कर दिया परन्तु शेर खाँ ने बंगाल की सेना को परास्त करके मार भगाया।

नसरत शाह के मरने के बाद उसके पुत्र महमूद ने भी बिहार पर आक्रमण किया परन्तु शेर खाँ ने उसे सूरजगढ़ के युद्ध में बुरी तरह परास्त किया। सूरजगढ़ का युद्ध मध्यकालीन इतिहास के निर्णयात्मक युद्धों में से एक है। इस युद्ध में शेर खाँ को विपुल युद्ध सामग्री प्राप्त हुई। उसने नूहानियों की शक्ति को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। इससे शेर खाँ को बंगाल के शासक की दुर्बलता का पता लग गया और शेर खाँ बिहार का स्वतन्त्र शासक बन गया।

गौड़ पर अधिकार

बिहार का स्वतंत्र शासक बनने के बाद शेर खाँ ने बंगाल पर आक्रमण करने आरम्भ किये। 1525 ई. में शेर खाँ ने बंगाल के शासक को परास्त कर उससे 13 लाख दीनार वसूल किये। 1537 ई. में शेर खाँ ने फिर बंगाल पर आक्रमण किया और गौड़ पर अधिकार कर लिया। महमूदशाह ने भाग कर हुमायूँ के यहाँ शरण ली।

चुनार पर अधिकार

चुनार का दुर्ग अत्यंत सुदृढ़ होने के कारण अभेद्य समझा जाता था। विशेष भौगोलिक परिस्थिति होने के कारण यह दुर्ग पूर्व का फाटक कहलाता था। यह दुर्ग इब्राहीम लोदी के सरदार ताज खाँ के अधिकार में था जो अपनी पत्नी लाद मलिका के वशीभूत था।

एक रात ताज खाँ के बड़े पुत्र ने जो एक दूसरी पत्नी से था, लाद मलिका पर आक्रमण करके उसे घायल कर दिया। उसने अपने पिता ताज खाँ की भी हत्या कर दी और चुनार से भाग खड़ा हुआ। शेर खाँ ने इस अवसर से लाभ उठाया और चुनार के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। कुछ समय बाद शेर खाँ ने लाद मलिका से विवाह कर लिया।

शेर खाँ को चुनार दुर्ग में बड़ी सम्पत्ति मिली। इससे शेर खाँ की शक्ति में बड़ी वृद्धि हो गई। 1539 ई. में जब शेर खाँ बंगाल में व्यस्त था तब हुमायूँ ने इस दुर्ग पर अधिकार जमा लिया।        

रोहतास पर अधिकार

चुनार का दुर्ग हाथ से निकल जाने पर शेर खाँ को बड़ी क्षति पहुँची। उसे हुमायूँ के विरुद्ध डटे रहने के लिये एक दुर्ग की आवश्यकता थी। इसलिये शेर खाँ ने रोहतास दुर्ग पर अधिकार करने की योजना बनाई। वहाँ का राजा चिन्तामणि शेर खाँ का मित्र था।

शेर खाँ ने थोड़े समय के लिए उससे दुर्ग माँग लिया और अपने परिवार को वहाँ भेज दिया। अब शेर खाँ ने राजा के अफसरों को हटाकर अपने अफसर नियुक्त कर दिये और दुर्ग पर स्थायी रूप से अधिकार जमा लिया। शेर खाँ का यह कार्य बड़े ही विश्वासघात का था।

मुगल साम्राज्य पर अधिकार

हुमायूँ से शेर खाँ का प्रथम संघर्ष चुनार दुर्ग के लिए आरम्भ हुआ। दुर्ग पर हुमायूँ का अधिकार स्थापित हो गया। इसके बाद जब हुमायूँ गौड़ में था तब शेर खाँ ने मुगल साम्राज्य पर आक्रमण करने आरम्भ किये। जब हुमायूं गौड़ से लौटा तब शेर खाँ ने रास्ते में चौसा के युद्ध में उसे बुरी तरह परास्त किया।

इसके बाद कन्नौज अथवा बिलग्राम के युद्ध में शेर खाँ ने पुनः हुमायूँ को परास्त किया और मुगल साम्राज्य पर अधिकार कर लिया। अब शेर खाँ ने शेरशाह की उपाधि धारण की, अपने नाम में खुतबा पढ़वाया, अपने नाम की मुद्राएँ चलवाईं और अपने साम्राज्य के संगठन तथा विस्तार के कार्य में संलग्न हो गया।

सूरी साम्राज्य की सुरक्षा

दिल्ली के तख्त पर बैठने के बाद शेरशाह के सामने दो तात्कालिक समस्याएँ थीं-

(1.) साम्राज्य की सीमाओं की सुरक्षा और

(2.) मुगलों के दुबारा आक्रमण की संभावना।

शेरशाह सूरी को अपने साम्राज्य की पश्चिमोत्तर सीमा तथा पूर्वी सीमा की सुरक्षा करना आवश्यक था क्योंकि इन दोनों ओर से ही राज्य पर आक्रमण होने की संभावना अधिक थी।

पश्चिमोत्तर सीमा की सुरक्षा

शेरशाह ने सबसे पहले पश्चिमोत्तर प्रदेश की ओर ध्यान दिया। उन दिनों राज्य की पश्चिमोत्तर सीमा पर घक्करों की लड़ाका जाति निवास करती थी जो मुगलों से सहानुभूति रखती थी। शेरशाह ने घक्करों को निर्देश भिजवाया कि वे शेरशाह के नये साम्राज्य की अधीनता स्वीकार कर लें। घक्करों ने यह निर्देश अस्वीकार कर दिया। इसलिये शेरशाह ने घक्कर प्रदेश पर आक्रमण करके उनके गाँवों को जलाकर नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।

शेरशाह ने घक्कर में स्थायी शान्ति स्थापित करने के लिए रोहतास नामक स्थान पर टोडरमल खत्री के निरीक्षण में एक सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया। यह रोहतास दुर्ग के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसमें शेरशाह ने युद्ध एवं रसद सामग्री जमा करवाई तथा कुशल सैनिकों की एक सेना नियुक्त की।

पूर्वी सीमा की सुरक्षा

1541 ई. में शेरशाह को बंगाल में गड़बड़ी फैलने की सूचना मिली। इन दिनों खिज्र खाँ बंगाल का गवर्नर था। उसने बंगाल के भूतपूर्व सुल्तान महमूदशाह की कन्या से विवाह करके स्वतन्त्र शासक की भाँति शासन करना आरम्भ कर दिया। शेरशाह ने उसे गवर्नर के पद से हटाकर कैद करवा लिया।

चूँकि बंगाल का प्रान्त बहुत बड़ा था, इसलिये शेरशाह ने उसे कई भागों में विभक्त करके प्रत्येक भाग की देख-भाल के लिए एक-एक अधिकारी नियुक्त कर दिया। इन अधिकारियों के कार्यों का निरीक्षण करने के लिए उनके ऊपर एक और अधिकारी नियुक्त किया जो अमीन-ए-बंगाल कहलाता था।

सूरी साम्राज्य का विस्तार

अपने साम्राज्य की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था करने के उपरान्त शेरशाह ने उसके विस्तार की ओर ध्यान दिया। हुमायूँ के पलायन के साथ ही मुगलों के सम्पूर्ण क्षेत्रों पर शेरशाह का अधिकार हो चुका था। इसलिये शेरशाह ने उसकी सीमाओं के परे जाकर राज्य विस्तार करने का निश्चय किया।

मालवा विजय

बहादुरशाह की मृत्यु के बाद मल्लूखाँ ने मालवा पर अधिकार कर लिया था। वह कादिर खाँ की उपाधि धारण कर मालवा पर शासन कर रहा था। शेरशाह के मालवा पर आक्रमण करने के और भी कई कारण थे। पहला कारण तो यह था कि मालवा पर हुमायूँ ने अधिकार कर लिया था। इसलिये हुमायूँ को परास्त करने के बाद शेरशाह स्वयं को मालवा का अधिकारी समझने लगा।

दूसरा कारण यह था कि शेरशाह कादिर खाँ को अपने अधीन समझता था परन्तु कादिर खाँ स्वयं को स्वतन्त्र शासक मानता था। तीसरा कारण यह था कि कादिर खाँ ने कालपी के युद्ध में शेरशाह के पुत्र कुत्ब खाँ की सहायता नहीं की थी जिससे उसकी पराजय तथा मृत्यु हो गई थी। चौथा कारण यह कि हुमायूँ अभी सिन्ध में घूम रहा था और यह सम्भव था कि मालवा जैसे दुर्बल राज्य पर वह अधिकार करने का प्रयास करे।

पाँचवा कारण यह था कि मारवाड़ का शासक मालदेव इन दिनों अपनी शक्ति बढ़ाने में लगा हुआ था और मालवा पर अधिकार करना चाहता था। यदि मालदेव इस उद्देश्य में सफल हो जाता तो शेरशाह के लिए बहुत बड़ा खतरा उत्पन्न हो जाता। इसलिये शेरशाह ने मालवा पर आक्रमण करने के उद्देश्य से एक विशाल सेना लेकर मालवा के लिए प्रस्थान कर दिया। मार्ग में उसने ग्वालियर के दुर्ग पर अधिकार किया।

इसी समय रायसेन के शासक राजा प्रतापशाह के प्रमुख सामंत पूरनमल ने शेरशाह का स्वामित्व स्वीकार कर लिया। इन गतिविधियों से कादिर खाँ का साहस भंग हो गया और वह अपने परिवार के साथ गुजरात भाग गया। इस प्रकार मालवा पर शेरशाह का अधिकार हो गया। मालवा में अपने अधिकारी नियुक्त करके शेरशाह ने रणथम्भौर के लिए प्रस्थान किया।

रणथम्भौर पर अधिकार

इन दिनों उस्मान खाँ रणथम्भौर का गवर्नर था। उसने शेरशाह का विरोध नहीं किया और उसे दुर्ग सौंप दिया। शेरशाह रणथम्भौर से आगरा लौट आया।

रायसेन विजय

बहादुरशाह की मृत्यु के उपरान्त पूरनमल, रायसेन तथा चन्देरी पर अधिकार करके अपने भतीजे राजा प्रताप के नाम से वहाँ पर शासन कर रहा था। जिस समय शेरशाह मालवा विजय के लिए जा रहा था उस समय पूरनमल उससे मिला था परन्तु शेरशाह की आँखों में राजपूतों का यह प्रबल राज्य खटक रहा था।

इसलिये शेरशाह ने पूरनमल पर आरोप लगाया कि वह मुसलमानों पर अत्याचार करता है तथा उनके परिवारों को गुलाम बनाकर उनकी लड़कियों को नर्तकियाँ बनाता है। इसके बाद 1543 ई. में शेरशाह ने रायसेन पर घेरा डाल दिया। यह घेरा 6 माह तक चला। अन्त में दोनों पक्षों में समझौता हो गया।

शेरशाह ने पूरनमल को वचन दिया कि वह अपने परिवार के साथ दुर्ग से बाहर आ जाये। उसके परिवार तथा राजपूत सैनिकों को कोई क्षति नहीं पहुँचाई जायेगी। पूरनमल अपने परिवार के साथ दुर्ग से बाहर निकल आया परन्तु शेरशाह ने रायसेन के हिन्दू राजा के साथ भी वैसा ही जघन्य विश्वासघात किया जैसा उसने रोहतास के हिन्दू राजा चिन्तामणि के साथ किया था।

उसने राजपूतों का भीषण हत्याकाण्ड करवाया। एक भी राजपूत जीवित नहीं बचा। राजपूत स्त्रियों ने ‘जौहर’ करके अपने सतीत्व की रक्षा की। कुछ बच्चे मुसलमानों के हाथ पड़े जो गुलाम बना लिये गये। पूरनमल की एक छोटी कन्या को नर्तकी बनाकर उसे बाजारों मे नचाया गया। इस प्रकार हिन्दुओं के गौरव को नष्ट करने की जो निदंनीय परम्परा मुहम्मद बिन कासिम के समय से आरम्भ हुई थी, शेरशाह सूरी ने भी उसका निर्वहन किया।

राजपूताना विजय

राजपूताना में कई स्वतन्त्र राज्य थे जिन पर प्राचीन क्षत्रियों के अलग-अलग वंश शासन करते थे। इनमें से अधिकांश राजा वीर, धर्मनिष्ठ, सत्य-प्रतिज्ञ, देश-प्रेमी एवं उच्च आदर्शों का पालन करने वाले थे किंतु दुर्भाग्यवश उन्होंने देश की परिभाषा अपने राज्य तक ही सीमित कर ली थी। इस कारण वे अकारण ही मूंछ का सवाल खड़ा करके परस्पर लड़ते-मरते थे। शेरशाह ने इन्हें अपने अधीन करने का निश्चय किया।

मारवाड़ के विरुद्ध अभियान

इन दिनों मारवाड़ का राज्य राजपूताने में सर्वाधिक शक्तिशाली था जिसकी राजधानी जोधपुर थी। 1562 ई में मालदेव जोधपुर के सिंहासन पर बैठा। वह बड़ा ही वीर तथा दुःसाहसी राजा था। उसने अपने बाहुबल से अपने राज्य की सीमाओं में अत्यधिक वृद्धि कर ली थी। उसने पुराने दुर्गों की मरम्मत करवाई और कई नये दुर्गों का निर्माण करवाया।

उसकी सेना में पचास हजार सैनिक थे। मालदेव वीर तो था किंतु अदूरदर्शी भी था। उसने अपने ही भाइयों को अपना शत्रु बना लिया। मालदेव से असन्तुष्ट बीकानेर का शासक कल्याणमल और मेड़ता का शासक वीरमदेव शेरशाह की शरण में चले गये और उसे मारवाड़ पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित किया।

1544 ई. में शेरशाह ने एक विशाल सेना लेकर मारवाड़ पर आक्रमण करने के लिये प्रस्थान किया। लगभग एक माह तक शेरशाह तथा मालदेव की सेनाएँ एक दूसरे के सामने खड़ी रहीं परन्तु किसी को भी पहले आक्रमण करने का साहस नहीं हुआ। अन्त में शेरशाह ने हिन्दू नरेशों को छल से मारने की नीति से काम लेते हुए एक जाली पत्र लिखवाया जिसमें मालदेव के सामन्तों की तरफ से शेरशाह को यह आश्वासन दिया गया कि वे मालदेव को कैद करके उसके सामने उपस्थित करेंगे।

यह पत्र मालदेव के मंत्री के शिविर के पास डाल दिया गया। जब मालदेव को इस पत्र की जानकारी मिली तो वह शंकित हो उठा। सामन्तों के लाख विश्वास दिलाने पर भी उसका संदेह दूर नहीं हुआ और वह अपनी सेना के साथ पीछे हटने लगा। इससे जैता और कूंपा आदि कुछ सामन्त बड़े दुखी हुए और अपनी स्वामिभक्ति का परिचय देने के लिए अफगान सेना पर टूट पडे़। इस युद्ध में शेरशाह की सेना विजयी रही। राजपूत बड़ी संख्या में वीरगति को प्राप्त हुए।

राजपूतों की वीरता को देखकर शेरशाह ने कहा- ‘मुट्ठी भर बाजरे के लिए मैं हिन्दुस्तान की बादशाहत खो बैठता।’ शेरशाह की सेना ने जोधपुर तथा अजमेर पर अधिकार कर लिया। मालदेव ने सिवाना में शरण ली और शेरशाह आगरा चला गया।

चित्तौड़ पर अधिकार

आगरा से लौटने के बाद शेरशाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। इन दिनों चित्तौड़ में गृहकलह चल रही थी। इसलिये उसमें शेरशाह के आक्रमण को रोकने की क्षमता नहीं थी। उदयसिंह के मन्त्रियों ने चितौड़ के दुर्ग की चाबियाँ शेरशाह को सौंप दीं।

आम्बेर पर अधिकार

शेरशाह आम्बेर की ओर गया और उसे भी उसने जीत लिया। इस प्रकार सारे राजपूताना पर उसका अधिकार स्थापित हो गया।

कालिंजर विजय

आम्बेर जीतने के बाद शेरशाह ने कालिंजर के लिए प्रस्थान किया जहाँ उन दिनों कीर्तिसिंह शासन कर रहा था। कालिंजर पर आक्रमण करने के कई कारण थे। यह यमुना घाटी का सबसे प्रबल दुर्ग था और अभेद्य समझा जाता था। इसलिये इस पर अधिकार करना आवश्यक था। मालवा तथा राजपूताना को जीतने के बाद सैनिक तथा प्रशासकीय दोनों ही दृष्टि से इस दुर्ग का महत्त्व बढ़ गया था और इसे जीतना आवश्यक हो गया था।

इसे जीत लेने पर दिल्ली तथा मालवा से पूर्वी प्रान्तों तक दुर्गों  की पंक्ति पूरी हो जाती है। जब शेरशाह सेहोंदा नामक स्थान पर गया था, जो कालिंजर से थोड़ी ही दूर था, तब कीर्तिसिंह उसे प्रणाम करने नहीं आया। चूँकि कीर्तिसिंह हुमायूँ की अधीनता स्वीकार कर चुका था, इसलिये सेहोंदा में उसके न आने से शेरशाह का संदेह बढ़ने लगा और उसे अधीन करने का निश्चय किया। कीर्तिसिंह के पास एक नर्तकी थी जो अपने रूप-लावण्य के लिए दूर-दूर तक विख्यात थी।

शेरशाह इस नर्तकी को प्राप्त करना चाहता था। कीर्तिसिंह ने गहोरा के राजा वीरसिंह को शरण दी थी जो बाबर का मित्र था और जिसकी माँ रायसेन के शासक पूरनमल की कन्या थी। यह भी कहा जाता है कि जब हुमायूँ चौसा के युद्ध में परास्त होकर भाग रहा था तब वीरसिंह के पुत्र वीरभानु ने उसे कड़ा तक पहुँचने में सहायता की थी।

उपर्युक्त कारणों से शेरशाह ने 1545 ई. में कालिंजर पर आक्रमण कर दिया। दुर्ग को अभेद्य पाकर शेरशाह ने दुर्ग के निकट मिट्टी का ढेर बनवाया। जब यह ढेर दुर्ग की दीवारों से ऊँचा हो गया तब शेरशाह ने इस ढेर पर तोपें तैनात करके दुर्ग पर गोले बरसाये। अचानक एक गोला वहीं फट गया जहाँ शेरशाह खड़ा था।

इससे वह गम्भीर रूप से घायल हो गया। शेरशाह के प्राण पंखेरू उड़ने के पूर्व ही दुर्ग जीत लिया गया। इसकी सूचना पाकर शेरशाह बहुत प्रसन्न हुआ। उसने इस विजय के लिए ईश्वर को धन्यवाद दिया। 22 मई 1545 को उसकी मृत्यु हो गई।

शेरशाह की मृत्यु पर खेद प्रकट करते हुए प्रो. कानूनगो ने लिखा है- ‘इस प्रकार महान् सैनिक तथा राजनीतिज्ञ अपने लाभप्रद, क्रियाशील तथा विजयी जीवन के मध्य में चल बसा जिसके साथ दण्डित हिन्दुओं के लिए सहिष्णुता, न्याय तथा राजनीतिक अधिकारों की समानता का उषाकाल आरम्भ हुआ था जो अकबर के सिंहासनारोहण के समय दैदीप्यमान मध्याह्न में फैल गई।’

शेरशाह की इच्छानुसार सहसराम के मनोहर मकबरे में वह दफन कर दिया गया जिसे उसने इसी ध्येय से बनवाया था।

शेरशाह की सफलता के कारण

शेरशाह सूरी का जन्म अत्यन्त साधारण परिवार में और कलहपूर्ण परिस्थितियों में हुआ था परन्तु अपने बुद्धि कौशल एवं बाहुबल से उसने भारतवर्ष में द्वितीय अफगान साम्राज्य की स्थापना की। उसने इस साम्राज्य की स्थापना ऐसे समय में की जब भारत में अफगानों की शक्ति छिन्न-भिन्न हो चुकी थी और मुगलों की शक्ति पूर्ण रूप से स्थापित हो चुकी थी।

शेरशाह ने न केवल मुगल साम्राज्य को उन्मूलित करके उसके स्थान पर अपने साम्राज्य की स्थापना की अपितु वह नवनिर्मित साम्राज्य का मुगल साम्राज्य से भी अधिक विस्तृत क्षेत्र में प्रसार करने में सफल रहा। उसकी सफलताओं के कारण निम्नलिखित थे-

(1.) पारिवारिक परिस्थितियाँ

शेरशाह की सफलता का बीजारोपण उसकी पारिवारिक परिस्थितियों में हुआ था। उसका पारिवारिक जीवन बड़ा ही कष्टमय था। उसे सौतेली मां के कुचक्रों के कारण पितृ स्नेह से वंचित रहना पड़ा जिससे उसमें अपना अधिकार प्राप्त करने के लिये कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति आ गई तथा उसके जीवन को नई दिशा प्राप्त हो गई।

वह अपने परिवार को छोड़कर जौनपुर चला गया जहाँ उसे अपने लिये नये अवसर तलाशने का अवसर मिला। जौनपुर में उसे अच्छी शिक्षा प्राप्त हुई तथा प्रान्तीय शासन को देखने का अवसर प्राप्त हुआ। शेरशाह का जौनपुर जाना उसके व्यक्तित्त्व के निर्माण में बड़ा सहायक सिद्ध हुआ।

(2.) विभिन्न प्रकार के अनुभव

शेरशाह को युवावस्था में बीस वर्ष तक अपने पिता की जागीर का प्रबन्ध करने का अवसर प्राप्त हुआ। इससे उसे जमींदारों के उपद्रवों का दमन करने तथा भूमि सम्बन्धी सुधार करने का अनुभव मिल गया। साथ ही सैनिक तथा प्रशासकीय अनुभव भी प्राप्त हुए।

मुगलों की सेना में भर्ती होकर उसने मुगलों के सैनिक संगठन, उनकी रणपद्धति, उनके शासन प्रबंध, उनकी वास्तविक शक्ति तथा दुर्बलताओं का ज्ञान प्राप्त किया। बिहार के शासक के यहाँ नौकरी करके उसे दरबारी राजनीति एवं कूटनीति सीखने का अवसर मिला। इस कारण वह एक साधारण सिपाही से लेकर बादशाह तक के कर्त्तव्यों को जान गया। इन अनुभवों ने उसे विलक्षण व्यक्तित्त्व प्रदान किया जिसने उसकी सफलताओं का द्वार खोल दिया।

(3.) जीवन भर भाग्य का साथ

भाग्य ने शेरशाह को सदैव दूसरों से आगे रखा। जिस समय उसने पूर्व में अपनी शक्ति को बढ़ाना आरम्भ किया ठीक उसी समय हुमायूँ का गुजरात के शासक बहादुरशाह से संघर्ष आरम्भ हो गया। इससे शेरशाह को बंगाल में पैर जमाने का अवसर मिल गया। इसके बाद हुमायूँ 6 महीने तक चुनार में फंसा रहा।

इससे शेरशाह को बंगाल जीतने का अवसर प्राप्त हो गया। शेरशाह के सौभाग्य से ही हुमायूं गौड़ में कई महीने तक पड़ा रहा और मिर्जा हिन्दाल बिहार से आगरा भाग गया जिससे शेरशाह को अपनी शक्ति के बढ़ाने का अवसर मिल गया और उसने चौसा के युद्ध में हुमायूँ को मार भगाया।

शेरशाह के भाग्य से कन्नौज के युद्ध के समय अत्यधिक वर्षा हुई और हुमायूँ का खेमा पानी से भर गया। इस प्रकार भाग्य ने शेरशाह का पलड़ा सदैव ऊपर ही रखा। भाग्य के खेल से ही मालदेव अपने सरदारों का विश्वास न करके युद्ध के मैदान से भाग खड़ा हुआ। शेरशाह के भाग्य ने केवल एक बार ही उसका साथ छोड़ा जब वह कालिंजर के दुर्ग में अपनी ही तोप के फटने से घायल होकर मर गया।

(4.) विलक्षण प्रतिभा

शेरशाह प्रतिभावान व्यक्ति था। इसके कारण ही उसने जीवन के प्रारंभिक काल में जौनपुर में इतनी अधिक ख्याति प्राप्त कर ली कि उसके पिता ने उसे अपनी विशाल जागीर का प्रबन्ध सौंप दिया। अपनी प्रतिभा तथा सेवाओं के कारण ही बिहार के शासक बहादुर खाँ ने उसे आगे बढ़ने का अवसर दिया।

शेरशाह ने विकट साहस का प्रदर्शन करते हुए शेर का शिकार करके शेर खाँ की उपाधि प्राप्त की। उसने अपनी सेवाओं से जुनैद वर्लस को प्रसन्न करके अपने पिता की जागीर को पुनः प्राप्त किया। प्रतिभा के बल पर ही उसे मुगल सेना में प्रवेश मिल सका जिससे उसे मुगलों के सैनिक संगठन तथा शासन का अनुभव प्राप्त हो सका।

शेरशाह ने बाबर को अपनी प्रतिभा तथा सेवाओं से प्रभावित करके अपनी जागीर पुनः प्राप्त की। बिहार के शासक जलाल खाँ की माँ ने भी शेरशाह की प्रतिभा से प्रभावित होकर उसे अपने यहाँ बुलाकर बादशाह का नायब बनाया जिससे शेरशाह को अपनी शक्ति बादशाह के बराबर करने का अवसर मिल गया।

(5.) सैनिक गुण

शेरशाह में एक योग्य सैनिक तथा सेनापति के गुण विद्यमान थे। वह दुःसाहसी तथा धैर्यशाली योद्धा था। भयानक से भयानक आपत्ति के आ जाने और विपरीत परिस्थितियों के उत्पन्न हो जाने पर भी उसका धैर्य भंग नहीं होता था। कोई भी असफलता अथवा दुःखद घटना उसे हतोत्साहित नहीं कर पाती थी। वह सदैव आशावादी बना रहता था। संकट आ जाने पर वह अपने ऊपर नियन्त्रण रखता था तथा सदैव सावधान एवं सतर्क रहता था।

(6.) नेतृत्व शक्ति

शेरशाह में विलक्षण नेतृत्व शक्ति थी। जिन दिनों अफगान अमीर मुगलों के हाथों परास्त होकर इधर-उधर भटक रहे थे, उन दिनों में शेरशाह उन्हें नेतृत्व देने के लिये आगे आया और उसने अफगानों को संगठित करके उनमें आशा का संचार किया। उसने अफगानों की प्रबल सेना का निर्माण किया जो मुगलों का सफलतापूर्वक सामना कर सकती थी और जिसने अन्त में मुगलों को भारत से मार भगाया।

(7.) व्यवहारिक बुद्धि

शेरशाह अपनी योजनाओं को बड़ी सावधानी से बनाता था और पूरी तैयारी के साथ कार्यान्वित करता था। वह व्यावहारिक बुद्धि का धनी था और असम्भव दिखने वाले कार्यों में हाथ नहीं डालता था।

(8.) कूटनीति

शेरशाह बहुत बड़ा राजनीतिज्ञ तथा कूटनीतिज्ञ था। किस समय शत्रु के सामने झुक जाना चाहिये और किस समय शत्रु पर प्रहार करना चाहिये इस कला में वह बड़ा प्रवीण था। जब तक हुमायूँ शक्तिशाली था तब तक शेरशाह ने उसके साथ लोहा नहीं लिया वरन् उसकी अनुनय-विनय करता रहा।

चुनार के सम्बन्ध में उसने इसी नीति का अनुसरण किया परन्तु बाद में जब हुमायूँ की स्थिति ठीक नहीं रही तब वह चौसा तथा कन्नौज के युद्धों में उस पर टूट पड़ा। बहादुरशाह के साथ गठबन्धन करके उसने हुमायूँ को विपत्ति में डाल दिया। मादलेव तथा उसके मन्त्रियों के बीच उसने जाली पत्रों के माध्यम से फूट डलवा दी।

(9.) स्वार्थ सिद्धि के लिये अनैतिक साधनों का प्रयोग

शेरशाह अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिये किसी भी सीमा तक गिर सकता था। उसे अनैतिक साधनों का उपयोग करने में किंचित् भी संकोच नहीं होता था। उसने हुमायूँ के साथ किये गये वादे को कई बार तोड़ा। शेरशाह ने रोहतास के राजा चिन्तामणि से मित्रता के नाम पर दुर्ग मांगा तथा उसके साथ छल करके हमेशा के लिये दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

शेर खाँ का यह कार्य बड़े ही विश्वासघात का था। शेरशाह ने रायसेन के राजा पूरनमल से संधि करके उसे वचन दिया कि वह दुर्ग से बाहर आ जाये, उसके परिवार तथा सैनिकों को हानि नहीं पहुंचाई जायेगी किंतु शेरशाह ने न तो संधि की शर्तों का पालन किया और न अपने वचन का निर्वहन किया। शेरशाह ने बिहार के बादशाह जलाल खाँ का संरक्षक बनकर उसका राज्य हड़प लिया।

(10.) समय का सदुपयोग

शेरशाह अपने समय को नष्ट नहीं करता था और बड़े परिश्रम से उसका उपयोग करता था। वह विजयोत्सव तथा आमोद-प्रमोद में समय नष्ट नहीं करके आगामी विजय की तैयारी में संलग्न हो जाता था। उसकी दृष्टि सदैव भविष्य पर लगी रहती थी। परास्त हो जाने पर वह निराश नहीं होता था वरन् अपनी विच्छिन्न शक्ति को फिर से संगठित करने में लग जाता था। वह किसी भी कार्य को अपनी शान के खिलाफ नहीं समझता था। वह आवश्यकता पड़ने पर एक साधारण सैनिक की भाँति कार्य करने लगता था।

(11.) मितव्ययता

शेरशाह बड़ा मितव्ययी था इस कारण उसका कोष भरा रहता था। चुनार के दुर्ग में उसे बहुत सा धन मिला था। बहादुरशाह से भी उसे बड़ी आर्थिक सहायता मिली थी। बंगाल के शासक पर भी विजय प्राप्त कर उसने धन प्राप्त किया था। उसने राज्य में आर्थिक सुधार करके भी कोष में वृद्धि की।

इन सब आर्थिक योजनाओं का परिणाम यह हुआ कि शेरशाह ने कभी भी धन की कमी का अनुभव नहीं किया। इस धन से उसने प्रबल सेना का संगठन किया। शेरशाह की सेना के पास सदैव पर्याप्त मात्रा में युद्ध एवं रसद सामग्री उपलब्ध रहती थी।

(12.) प्रशासकीय गुण

शेरशाह ने अपने पिता की विशाल जागीर का बीस वर्ष तक सफलतापूर्वक संचालन करके प्रशासकीय गुण विकसित कर लिये थे। उसने इन गुणों का उपयोग बिहार के बादशाह के संरक्षक के रूप में भलीभांति किया। इस कारण उसके शासन क्षेत्र में सदैव शासन व्यवस्था कायम रहती थी तथा राजकोष में भी निरंतर धन आता था। इस कारण उसे आगे की योजनाएं बनाने और उन्हें कार्यान्वित करने में सफलता प्राप्त होती थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

द्वितीय अफगान साम्राज्य का संस्थापक – शेरशाह सूरी

शेरशाह सूरी का शासन

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शेरशाह सूरी का शासन

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शेरशाह सूरी का शासन

शेरशाह सूरी का शासन अफगान शासन पद्धति पर आधारित था। अन्य मध्यकालीन मुस्लिम शासकों की तरह शेरशाह भी केवल मुसलमानों को अपनी प्रजा मानता था और हिन्दुओं को उसके राज्य में रहने के लिए जजिया कर देना पड़ता था।

शेरशाह सूरी का शासन

शेरशाह सूरी (1540-45 ई.) के समय में भारत में दो प्रकार की शासन पद्धतियाँ प्रचलित थीं- एक अफगानों की और दूसरी मुगलों की। चूँकि मुगलों से शेरशाह को घोर घृणा थी और बाबर तथा हुमायूँ प्रशासकीय क्षेत्र में उसका पथ प्रदर्शन नहीं कर सकते थे इसलिये उसने मुगलों की शासन पद्धति को स्वीकार नहीं किया।

वह अफगानों की शासन पद्धति को भी पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं कर सकता था क्योंकि वह भारतीय परिस्थितियों को अच्छी तरह समझता था। इसलिये शेरशाह ने अपने साम्राज्य के लिये अलग शासन-व्यवस्था का निर्माण किया। यद्यपि उसने प्रशासकीय क्षेत्र में बलबन तथा अलाउद्दीन खिलजी द्वारा ग्रहण किये गये मार्ग का अनुसरण किया परन्तु उसमें कई परिवर्तन भी किये।

शेरशाह सूरी का शासन के सम्बन्ध में माउण्ट स्टुअर्ट एल्फिंस्टन ने लिखा है- ‘यह एक ऐसा योग्य शासक प्रतीत होता है जिसकी शासन सम्बन्धी योजनाएँ क्रांतिकारी और तर्कपूर्ण होने के साथ-साथ अपने उद्देश्य में अत्यन्त उदार थीं।’

शेरशाह के शासन की विशेषताएँ

शेरशाह सूरी के शासन की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार से थीं-

(1.) लोक कल्याण की प्रधानता

शेरशाह स्वयं को अपनी प्रजा का रक्षक तथा पालक समझता था। अर्सकाइन ने लिखा है- ‘शेरशाह में विधान निर्माता तथा प्रजा के संरक्षक की जैसी भावना थी, वैसी अकबर के पूर्व किसी भी शासक में नहीं थी।’ वह प्रजा के कल्याण को राज्य का कल्याण समझता था। इसी से वह दिल्ली के सुल्तानों में सर्वाधिक लोकप्रिय बन गया था।

(2.) धर्म के हस्तक्षेप से परे

शेरशाह सूरी का शासन उलेमा लोगों के प्रभाव से सर्वथा मुक्त था। यद्यपि उसने हिन्दू शासकों का उल्मूलन करने में नैतिकता का पालन नहीं किया था तथापि वह अपनी हिन्दू प्रजा के प्रति जितना उदार, दयालु तथा न्यायशील था उतना उसके पूर्व कोई मुसलमान शासक नहीं था। वह किसी वर्ग, सम्प्रदाय अथवा धर्म के साथ पक्षपात नहीं करता था। समस्त नागरिकों को अपने रीति-रिवाज, त्यौहार, व्रत आदि का पालन करने की स्वतन्त्रता थी।

(3.) स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश शासन

शेरशाह सूरी का शासन स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश था जिसमें समस्त शक्तियां सुल्तान में निहित थीं परन्तु उसकी स्वेच्छाचारिता जनता को भयभीत नहीं करती थी। क्योंकि शेरशाह ने दमनकारी नीति का अनुसरण नहीं किया था और न ही किसी प्रकार का अत्याचार ही किया। शेरशाह की उदार तथा धर्म-सहिष्णु नीति के कारण जनता उसकी आज्ञा का पालन करती थी।

(4.) केन्द्रीभूत शासन

शेरशाह सूरी का शासन अत्यंत केन्द्रीभूत था। ऐसा केन्द्रीभूत शासन, उस युग के अन्य शासकों के समय में देखने को नहीं मिलता। वह अफगानों तथा मुगलों दोनों की शासन व्यवस्थाओं में देख चुका था कि राज्य के मन्त्री एवं अधिकारी किस प्रकार कर्त्तव्यभ्रष्ट तथा विश्वासघाती होते हैं। इसलिये वह राज्य की सम्पूर्ण शक्ति को स्वयं में केन्द्रित रखता था।

शेरशाह सूरी स्वयं अपना मार्गदर्शक एवं सलाहकार था और राज्य के सारे कार्य स्वविवेक से करता था। मन्त्रियोें के शासन में उसका विश्वास नहीं था। शेरशाह ने अपना कोई मन्त्री अथवा परामर्शदाता नहीं रखा। अपने विस्तृत अनुभव तथा परिश्रम के बल पर शेरशाह ने अपने साम्राज्य का प्रबंध किया।

शेरशाह का शासन प्रबन्ध

प्रशासकीय क्षेत्र में शेरशाह को केवल पाँच वर्ष के अल्पकाल में जो महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त हुई, वह अन्य शासकों को दुर्लभ थी। शेरशाह की योग्यता तथा क्षमता की प्रशंसा करते हुए हेग ने लिखा है- ‘वास्तव में शेरशाह उन महानतम शासकों में था जो कभी भी, दिल्ली के तख्त पर बैठे थे। अकबर से लेकर औरंगजेब तक किसी भी अन्य शासक को, शासन का इतना अधिक ज्ञान नहीं था और न सार्वजनिक हित के कार्यों पर शेरशाह के अतिरिक्त और कोई शासक ऐसा नियन्त्रण रख सका था।’

(1.) शासन की इकाइयाँ

शासन की सबसे छोटी इकाई गाँव होता था। कई गाँवों को मिलाकर एक परगना बनता था और कई परगनों को मिलाकर एक शिक या सरकार बनता था। कुछ प्रान्तों में जैसे पंजाब, मालवा तथा बंगाल में कई शिकों को मिलाकर एक अफसर के अनुशासन में रख दिया था जो सूबेदार की भाँति शासन करता था।

1. गाँव

प्रत्येक गाँव के प्रबन्ध के लिए एक मुखिया या मुकद्दम होता था जो सरकार तथा गाँव के बीच योजक कड़ी का काम करता था। उसी के माध्यम से सरकार गाँव के किसानांे से सम्पर्क स्थापित करती थी। मुकद्दम या मुखिया सरकारी कर्मचारी नहीं होता था वरन् वह गाँव का प्रतिष्ठित व्यक्ति होता था। वह अवैतनिक कार्य करता था।

गाँव में शान्ति तथा सुव्यवस्था बनाये रखना उसका प्रधान कर्त्तव्य होता था। गाँव का लगान वसूलने में भी वह सरकारी कारिंदों की सहायता करता था। प्रत्येक गाँव में एक पटवारी होता था जो गांव का पूरा हिसाब-किताब रखता था। पटवारी भी सरकारी कर्मचारी नहीं होता था। उसकी नियुक्त गाँव वाले ही करते थे।

2. परगना

कई गांवों को मिलाकर एक परगना बनता था। प्रत्येक परगने के प्रबन्ध के लिए एक शिकदार या आमिल नियुक्त होता था जो परगने का प्रधान होता था। शिकदार का प्रधान कार्य मालगुजारी वसूल करना होता था। शिकदार का पद बड़ी आमदनी का होता था। इसलिये शेरशाह ने हर एक या दो वर्ष बाद उसे बदलने की व्यवस्था की थी।

परगने में शिकदार के अतिरिक्त एक मुन्सिफ या अमीन भी होता था जिसका प्रधान कार्य भूमि की नाप-जोख करना था ताकि भूमिकर निर्धारित किया जा सके। यदि भूमि के क्षेत्रफल अथवा आकार-प्रकार के विषय में कोई झगड़ा उत्पन्न हो जाता था तो उसका निर्णय भी वही करता था। मुन्सिफ या अमीन सरकारी कर्मचारी होता था।

वह सरकार द्वारा नियुक्त, स्थानान्तरित तथा अपदस्थ किया जाता था। प्रत्येक परगने में एक कानूनगो भी होता था। जिसका पद प्रायः आनुवंशिक होता था। वह परगने का हिसाब-किताब रखता था। शिकदार की सहायता के लिए प्रत्येक परगने में दो कारकून होते थे जो परगने के कागज-पत्र संभालते थे। इनके अतिरिक्त एक खजानादार या पोतदार होता था जो नगद राशि को संभालता था। कारकून हिन्दी तथा फारसी दोनों भाषाओं में हिसाब रखते थे।

3. सरकार या जिला

कई परगनों को मिलाकर सरकार या जिला बनता था। शेरशाह ने अपने साम्राज्य को इस प्रकार के 66 सरकारों अथवा जिलों में बाँटा। प्रत्येक सरकार के प्रबन्ध के लिए अलग अधिकारी नियुक्त किया गया जो शिकदार-ए-शिकदारान अर्थात् शिकदारों का शिकदार कहलाता था।

उसका प्रधान कार्य अपने अधीन शिकदारों के कार्य का निरीक्षण करना तथा उन पर नियन्त्रण रखना था। सरकार अथवा जिले में एक मुन्सिफ-ए-मुन्सिफान अर्थात् मुन्सिफों का मुन्सिफ नियुक्त किया गया था जो परगने के कार्यों की देखभाल करता था और उन पर नियन्त्रण रखता था। सरकार अथवा जिले में लगान-निर्धारण सम्बन्धी कार्य वही  करता था।

(2.) केन्द्रीभूत शासन व्यवस्था

शेरशाह का शासन अत्यन्त केन्द्रीभूत था। वह अपने राज्य के समस्त शासन पर प्रत्यक्ष नियन्त्रण रखता था। बड़े-बड़े मंत्रियों एवं सलाहकारों में उसका विश्वास नहीं था। एक इतिहासकार ने लिखा है- ‘शेरशाह ने शासन की ऐसी व्यवस्था की कि सुदूरस्थ गाँव भी केन्द्रीय शक्ति के घनिष्ठ सम्पर्क में आ गया जिससे जब वह चाहता तब उसकी नाड़ी को समझ लेता।’

वह स्वयं अपना मार्गदर्शक तथा सलाहकार था। इसलिये उसका शासन पूर्णरूपेण एकतन्त्रात्मक था। शेरशाह को अपनी कार्य क्षमता में बड़ा विश्वास था। इसमें संदेह नहीं कि अपने प्रशासकीय अनुभव तथा परिश्रम के बल पर वह शासन को सुचारू रीति से संचालित कर सका होगा।

लगान का प्रबन्ध

शेरशाह के लगान सम्बन्धी सुधारों का बहुत बड़ा महत्त्व है। उसके लगान सम्बन्धी सुधारों की तीन प्रमुख विशेषताएँ हैं-

1. भूमि का निर्धारण

शेरशाह ने अपने विश्वसनीय अधिकारी अहमद खाँ की देखरेख में राज्य की समस्त भूमि की नाप करवाई। इसके बाद उसने भूमि को बीघों में विभक्त करवाकर किसानों से कबूलियत लिखवाई। कबूलियत उस पत्र या इकरारनामे को कहते थे जिसमें किसान अपनी भूमि का पूरा विवरण लिखकर सरकारी अमीन के पास जमा करता था। इस कबूलियत के बदले सरकार की ओर से किसानों को पट्टा दिया जाता था जिसमें लगान की दर लिखी रहती थी। इसी दर के अनुसार किसान को लगान देना पड़ता था।

2. लगान का निर्धारण

लगान निश्चित करने के लिए शेरशाह ने भूमि को तीन वर्गों में विभक्त किया- उत्तम, मध्यम तथा निम्न कोटि। इसके बाद इन भूमियों की औसत उपज निकालकर प्रत्येक बीघा की औसत उपज निकाली गई और इस औसत उपज की एक-तिहाई सरकारी लगान निश्चित की गई। लगान का निर्धारण निकटतम बाजार भाव के अनुसार किया जाता था।

3. लगान की वसूली

शेरशाह लगान नकद रुपये में चाहता था। वह किसानों को यथा-सम्भव नकद रुपया देने के लिए प्रोत्साहित करता था परन्तु यदि किसान किसी विशेष कारण से नकद रुपये देने में असमर्थ हो जाते थे तो वे अनाज के रूप में भी लगान दे सकते थे। किसानों स्वयं जाकर सरकारी खजाने में रुपया जमा कर सकते थे।

इसके लिए शेरशाह अपनी प्रजा को प्रोत्साहित भी करता था क्योंकि वह चाहता था कि प्रजा के साथ उसका सीधा सम्पर्क स्थापित हो जाये। शेरशाह लगान निश्चित करते समय किसानों के साथ बड़ी उदारता दिखाता था परन्तु लगान की वसूली कठोरता से करता था। शेरशाह का मानना था कि लगान बाकी रह जाने पर किसानों तथा सरकारी कर्मचारियों के सम्बन्ध बिगड़ जाते हैं। इसलिये वह सख्ती करके समस्त लगान वसूल कर लेता था। अकाल पड़ जाने पर किसानों को तकाबी दी जाती थी और रुपये तथा चीजों से किसानों को सहायता की जाती थी।

(4.) लगान प्रबंधन के दोष

यद्यपि शेरशाह की लगान व्यवस्था से राजा तथा प्रजा दोनों ही को लाभ हुआ परन्तु यह व्यवस्था बिल्कुल दोष रहित नहीं थी। मध्यम तथा निम्न कोटि की भूमि के किसानों को उत्तम कोटि की भूमि के किसानों की अपेक्षा अधिक कर देना पड़ता था। नकद लगान का मूल्यांकन करने में भी अन्याय हो सकता था। उसने सिंचाई की  समुचित व्यवस्था नहीं की। वह घूसखोरी का भी पूर्ण रूप से उन्मूलन नहीं कर सका था। जागीरदारी की प्रथा के दोषों को जानते हुए भी वह उसे हटा नहीं सका।

(5.) सेना का प्रबन्ध

सेना की सहायता से ही शेरशाह ने साम्राज्य की स्थापना की थी। सेना के बल पर ही उस साम्राज्य को सुरक्षित रखा जा सकता था। इसलिये शेरशाह ने सेना के संगठन एवं सुधार की ओर विशेष ध्यान दिया। अफगानों में कबाइली भावना बड़ी प्रबल थी और शेरशाह उनकी भावना को कुचलना नहीं चाहता था।

इसलिये सेना का संगठन कबाइली ढंग पर ही बना रहा। प्रत्येक कबीले की अपनी अलग सेना होती थी और उस कबीले का प्रधान ही उसका संचालन करता था। शेरशाह ने इन कबीलों को अनुशासन तथा नियंत्रण में रखने की व्यवस्था की। उसने सेना को देश के विभिन्न भागों में वहाँ की आवश्यकता के अनुसार नियुक्त किया।

ऐसी सोलह छावनियों का पता लगा है परन्तु सम्भवतः इनकी संख्या अधिक रही होगी। कबाइली सेना के अतिरिक्त शेरशाह के पास अपनी भी एक विशाल सेना थी जिसमें डेढ़ लाख  घुड़सवार, पच्चीस हजार पैदल, पाँच हजार हाथी तथा एक तोपखाना था। शाही सेना के अतिरिक्त जागीरदारों की भी सेनाएँ थीं।

इस प्रकार शेरशाह की सम्पूर्ण सेना की संख्या लगभग चार लाख थी। शेरशाह अपने सैनिकों से सीधा सम्पर्क रखता था। वह उनकी भर्ती, वेतन, पदोन्नति की व्यवस्था करता था और उन्हें संतुष्ट रखने का प्रयत्न करता था। साधारण सैनिक भी सुल्तान से मिलकर अपनी समस्याएँ बता सकते थे। अलाउद्दीन खिलजी की भांति शेरशाह ने भी घोड़ों को दागने की प्रथा को जारी रखा।

(6.) सीमा की सुरक्षा की व्यवस्था

शेरशाह ने मुगलों को भारत से बाहर निकाल दिया था परन्तु उत्तर-पश्चिम की ओर से उनके पुनः भारत में घुस आने की आशंका थी। इसलिये शेरशाह ने उत्तर-पश्चिमी सीमा पर विशेष ध्यान दिया। उसने सिन्धु नदी तक अपनी सत्ता को सुदृढ़ रूप से स्थापित किया जो उसके राज्य की प्राकृतिक सीमा थी।

सीमान्त प्रदेश में जाट, बलोच, घक्कर आदि विद्रोही प्रवृत्ति की जातियाँ निवास करती थीं। शेरशाह ने उनका दमन कर उन पर नियंत्रण स्थापित किया। पश्चिमी पंजाब में शान्ति बनाये रखने और सीमान्त प्रदेश की सुरक्षा करने के लिए शेरशाह ने रोहतास के सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण किया। उसने मुल्तान तथा रोहतास में मजबूत सेनाएँ नियुक्त कीं। इस प्रकार शेरशाह ने पश्चिमोत्तर प्रदेश की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था की।

(7.) न्याय व्यवस्था

शेरशाह ने अपने राज्य में निष्पक्ष न्याय की व्यवस्था की। शेरशाह की न्याय सम्बन्धी धारणा उच्च थी। वह न्याय को धार्मिक कर्त्तव्य समझता था। उसके विचार में न्याय का तात्पर्य केवल इतना ही नहीं था कि किसी के साथ अत्याचार नहीं किया जाये वरन् इसका यह भी तात्पर्य है कि सबसे साथ अच्छा तथा ईमानदारी का व्यवहार किया जाये।

न्याय करने में शेरशाह ऊँच-नीच अथवा धनी-निर्धन में कोई भेद-भाव नहीं करता था। समस्त प्रजा को समान रूप से न्याय प्राप्त होता था। मुसलमानों के दीवानी मुकदमों का निर्णय इस्लाम के नियमों के अनुसार काजी करता था किन्तु फौजदारी के मुकदमों का निर्णय प्रधान शिकदार करता था।

दीवानी मुकदमों का फैसला करने के लिये हिन्दुओं के लिये अलग कानून थे। पूरे राज्य में फौजदारी के नियम एक जैसे और कठोर थे। अपराधी को उसके द्वारा किये गये अपराध के अनुसार कारागार में डालना, आर्थिक जुर्माना लगाना, कोड़े लगाना, अंग-भंग करना तथा प्राण-दण्ड देना आदि दण्ड दिये जाते थे। कभी-कभी चोरी तथा डकैती के लिये भी प्राण-दण्ड दिया जाता था।

(8.) शान्ति तथा व्यवस्था

अपराधियों को दण्ड देने की समुचित व्यवस्था करने के साथ-साथ शेरशाह ने अपराधों को रोकने का भी उचित प्रबन्ध किया। शिकदार तथा प्रधान शिकदार अपने कार्यक्षेत्र में शान्ति तथा व्यवस्था बनाये रखने के लिये जिम्मेदार थे। चौधरी तथा मुकद्दम को अपराधों का पता लगाना होता था। स्थानीय होने के कारण ये लोग प्रायः सरलता से अपराधी का पता लगा लेते थे।

यदि किसी गाँव में अथवा उसके निकटवर्ती क्षेत्र में चोरी, डकैती या हत्या जैसी घटना होती थी और उस गाँव का मुकद्दम अपराधी तथा चोरी के माल का पता लगाने में असमर्थ रहता था तो उसे दण्डित किया जाता था। कभी-कभी तो उसकी हत्या भी करवा दी जाती थी।

इस प्रकार अपराधों का पता लगाने का उत्तरदायित्व ग्रामवासियों तथा उनके प्रतिनिधियों का होता था। अपराध सिद्ध हो जाने पर अपराधियों को दण्ड देने का काम राज्य का होता था। बड़े नगरों में शान्ति तथा व्यवस्था बनाये रखने तथा अपराधों को रोकने और उनका पता लगाने के लिए कोतवाल नियुक्त किये गये थे।

शेरशाह की शासन व्यवस्था की प्रशंसा करते हुए इलियट ने लिखा है- ‘शेरशाह के समय में एक वृद्धा भी अपने सिर पर आभूषणों की टोकरी रखकर यात्रा कर सकती थी और कोई भी चोर या डाकू शेरशाह के दण्ड के भय से उसके निकट आने का साहस नहीं कर सकता था।’

(9.) गुप्तचर विभाग

सुल्तान के विरुद्ध होने वाले षड़यंत्रों एवं कुचक्रों तथा सल्तनत पर होने वाले आक्रमणों का समय रहते ही पता लगाने के लिये शेरशाह ने मजबूत गुप्तचर विभाग का संगठन किया। उसके विश्वस्त गुप्तचर राज्य के विभिन्न भागों में भ्रमण करते रहते थे और सुल्तान को सरकारी कर्मचारियों के कार्यों, अमीरों की गतिविधियों तथा देश की स्थिति की सूचना देते रहते थे।

(10.) यातायात

शेरशाह ने अपने राज्य में यातायात को सुचारू बनाने के लिये कई उपाय किये। उसने कई सड़कों तथा सरायों का निर्माण करवाया। राज्य के समस्त प्रमुख स्थानों को सड़कों से जोड़ा। वर्तमान ग्राण्ड ट्रंक रोड का निर्माण शेरशाह ही ने करवाया था। यह सड़क ढाका में लाहौर तक जाती थी। दूसरी सड़क आगरा से बुरहानपुर तक, तीसरी आगरा से बियाना होती हुए मारवाड़ की सीमा तक, चौथी मुल्तान से लाहौर तक और पाँचवी आगरा से जोधपुर तथा चितौड़ तक जाती थी।

अन्य कई सड़कें भी शेरशाह के समय में मौजूद थीं जो विभिन्न नगरों को जोड़ती थीं। सड़कों के किनारे छायादार पेड़ लगवाये गये और कुएँ खुदवाये गये। सड़कों के किनारे चार-चार मील की दूरी पर सरायें बनवाई गईं जिनमें हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था रहती थी।

यात्रियों के लिए गर्म तथा ठण्डे जल, बिस्तर, भोजन आदि का प्रबन्ध रहता था। घोड़ों तथा पशुओं के लिए घास-दाने का प्रबन्ध रहता था। शेरशाह ने लगभग 1700 सरायों का निर्माण तथा जीर्णोद्धार करवाया। इन सड़कों तथा सरायों से राज्य में व्यापार तथा वाणिज्य की वृद्धि में बड़ी सहायता मिली।

(11.) वाणिज्य तथा व्यापार

शेरशाह ने वाणिज्य तथा व्यापार की उन्नति के लिये कई व्यवस्थायें कीं। उसने शुद्ध सोने, चांदी तथा तांबे की मुद्राएँ चलाईं जो एक ही वजन तथा एक ही मूल्य की थीं। इससे मुद्रा की विश्वसनीयता में वृद्धि हुई तथा लोगों के साथ बेईमानी की संभावना कम हो गई। शेरशाह ने व्यापारियों तथा दूकानदारों के लिये अनिवार्य कर दिया कि वे एक ही वजन के बाट रखे, एक ही मूल्य पर सामान बेचें, शुद्ध और अच्छी चीजें रखें तथा तौलने में बेईमानी न करें।

सरकारी कर्मचारियोें को आदेश था कि बाजार से चीजें खरीदते समय वे कम दाम देने का प्रयास न करें। शेरशाह ने साम्राज्य के विभिन्न प्रान्तों में एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त को चीजंे स्वतन्त्रतापूर्वक भेजने की अनुमति दे दी। केवल दो स्थानों पर चुंगी वसूल की जाती थी- साम्राज्य में प्रवेश करते समय तथा सामग्री विक्रय वाले स्थान पर। प्रवेश स्थान पर चुंगी वसूलने के लिये पूर्व में सिकरीगली और पश्चिम में रोहतास गढ़ नियत किये गये।

(12.) डाक व्यवस्था

सड़कों के किनारे पर स्थित सरायें डाक-चौकियों का काम देती थीं। इन सरायों में डाक ले जाने वाले हरकारे विद्यमान रहते थे। डाक पैदल तथा घुड़सवारों दोनों प्रकार के डाकियों द्वारा भेजी जाती थी। ऐसा प्रतीत होता है कि निकटस्थ स्थानों की डाक पैदल हरकारों द्वारा और दूरस्थ स्थानों की डाक घुड़सवारों द्वारा भेजी जाती थी।

(13.) धार्मिक नीति

शेरशाह हिन्दुओं तथा शियाओं को घृणा की दृष्टि से देखता था। हिन्दू राज्यों को हड़पने के लिये उसने हर तरह के हथकण्डे अपनाये। वह दक्षिण के शिया राज्यों को जीतना चाहता था। उसके मन में फारस के शिया राज्य पर भी आक्रमण करने की इच्छा थी। शेरशाह ने मुसलमानों के लिये अलग इस्लाम सम्मत विधि से ही न्याय करने की व्यवस्था की। हिन्दुओं के लिये अलग कानून था। हिन्दुओं को अपने धर्म का पालन करने के लिये जजिया देना पड़ता था। हिन्दुओं को उच्च पदों पर नहीं रखा जाता था। सेना में भी प्रायः अफगान या अन्य मुसलमान ही रखे जाते थे।

(14.) दान व्यवस्था

शेरशाह धार्मिक तथा दानशील प्रवृत्ति का सुल्तान था। उसने कई मदरसे और मस्जिदें बनवाईं। उसने इन संस्थाओं की आर्थिक सहायता की भी व्यवस्था की। वह पुराने मदरसों तथा मस्जिदों को भी दान देता था। अन्धे, लूले, लँगडे़, असहाय तथा दीन-दुखी उससे सहायता पाते थे। विद्यार्थियों तथा साहित्यकारों को भी वह दान देता था। उसके राज्य में अनेक स्थानों पर दानशालाएँ खोली गईं और भोजनालय बनाये गये जहाँ निःशुल्क भोजन बँटता था।

निष्कर्ष

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि शेरशाह सूरी का शासन उस युग के सुल्तानों की अपेक्षा बहुत उन्नत था। भूमि की नपाई तथा वर्गीकरण करके लगान निर्धारण की अच्छी व्यवस्था की गई। न्याय एवं शांति व्यवस्था के लिये कई कदम उठाये गये। व्यापार की वृद्धि के लिये यातायात को सुगम बनाया गया। शेरशाह में धार्मिक कट्टरता मौजूद थी इसलिये हिन्दुओं पर जजिया लगाया गया। हिन्दुओं को शासन एवं सेना में उच्च पद नहीं दिये जाते थे।

प्रो. कानूनगो के अनुसार- ‘यदि शेरशाह एक-दो दशाब्दी और जीवित रहता तो भूमिपति एक वर्ग के रूप में समाप्त हो गये होते और हिन्दुस्तान अथक किसानों के उत्साह पूर्ण संरक्षण में कष्ट विहीन, झाड़-झंखाड़ विहीन कृषि-योग्य देश बन गया होता।’

साहित्य तथा कला की उन्नति

शेरशाह को सुल्तान के रूप में पांच वर्ष ही कार्य करने का अवसर मिला फिर भी उसके शासनकाल में साहित्य तथा कला की उन्नति हुई। उस काल में हिन्दी भाषा एवं साहित्य की विशेष उन्नति हुई। मुसलमान लेखकों ने भी हिन्दी की बड़ी सेवा की। मलिक मुहम्मद जायसी ने ‘पद्मावत’ की रचना इसी काल में की।

वैष्णव धर्म के कई बड़े प्रचारक सूरवंश के शासनकाल में हुए। उनका प्रमुख केन्द्र मथुरा था। शेरशाह कला प्रेमी सुल्तान था। उसके काल में बने भवनों में हिन्दू-मुस्लिम एकता का सम्मिश्रण है। उसने रोहताास के दुर्ग का निर्माण करवाया तथा सहसराम में एक सुन्दर मस्जिद बनवाई जिसमें उसे मरने के बाद दफनाया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

द्वितीय अफगान साम्राज्य का संस्थापक – शेरशाह सूरी

शेरशाह सूरी का शासन

शेरशाह सूरी के कार्यों का मूल्यांकन

शेरशाह के उत्तराधिकारी

सूरी साम्राज्य का पतन

भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास-अनुक्रमणिका

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भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास-अनुक्रमणिका

भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास-अनुक्रमणिका पृष्ठ पर भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास नामक पुस्तक की अनुक्रमणिका दी गई है।

इस पुस्तक का लेखन आधुनिक काल के विख्यात इतिहासकार डॉ. मोहनलाल गुप्ता ने किया है तथा इसकी पाठ्य-सामग्री का संयोजन उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों में इतिहास विषय के स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर के विद्यार्थियों के सैलेबस के अनुसार किया गया है। इस पुस्तक की लोकप्रियता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इस पुस्तक के अब तक कई संस्करण एवं पुनर्मुद्रण प्रकाशित हो चुके हैं।

मुख्य अध्याय – सभ्यता एवं संस्कृति

सभ्यता एवं संस्कृति का अर्थ

पर्यावरण सभ्यता एवं संस्कृति का सम्बन्ध

भारतीय संस्कृति का प्रसार

भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ

भारतीय संस्कृति के तत्त्व

भारतीय संस्कृति का इतिहास जानने के साहित्यिक स्रोत

भारतीय संस्कृति का इतिहास जानने के पुरातात्विक स्रोत

पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव

मुख्य अध्याय – भारत की आदिम संस्कृतियाँ

भारत की पाषाण सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ

पूर्व-पाषाण कालीन सभ्यताएं (पेलियोलीथिक पीरियड)

मध्यपाषाण कालीन सभ्यताएँ (मीजोलिथिक पीरियड)

नवपाषाण कालीन सभ्यताएँ (निओलिथिक पीरियड)

पाषाण सभ्यताओं की तुलना

भारत की आदिम जातियाँ (पाषाण युगीन जातियाँ)

भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ

मुख्य अध्याय – सैंधव सभ्यता एवं संस्कृति

सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु सभ्यता का धर्म

सिंधु सभ्यता का समाज

सिंधु सभ्यता की अर्थव्यवस्था

मुख्य अध्याय – लौह एवं महापाषाण संस्कृतियाँ

लौह युगीन संस्कृति

महापाषाण संस्कृति

मुख्य अध्याय – वैदिक सभ्यता एवं साहित्य

वैदिक सभ्यता

वेद

वेदांग

उपनिषदों का चिंतन

वैदिक साहित्य का महत्त्व

वैदिक तथा द्रविड़ सभ्यता में अन्तर

मुख्य अध्याय – ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म

ऋग्वैदिक समाज

ऋग्वैदिक धर्म की विशेषताएँ

आर्यों का आर्थिक जीवन

मुख्य अध्याय – उत्तर वैदिक सभ्यता एवं समाज

उत्तरवैदिक राजनीतिक व्यवस्था

उत्तरवैदिक समाज

उत्तरवैदिक आर्यों का धर्म

उत्तरवैदिक आर्यों की अर्थव्यवस्था

उत्तरवैदिक साहित्य

उत्तरवैदिक आश्रम व्यवस्था

मुख्य अध्याय – महाकाव्यकाल में भारतीय संस्कृति

भारतीय संस्कृति में रामायण का प्रभाव

भारतीय संस्कृति में महाभारत का प्रभाव

महाकाव्यकालीन आर्यों की दशा

मुख्य अध्याय – भगवद्गीता का दर्शन

श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म-दर्शन

गीता के अठारह अध्याय

मुख्य अध्याय – जैन धर्म

ब्राह्मण धर्म से असंतोष

पार्श्वनाथ एवं महावीर स्वामी

जैन-धर्म के सिद्धान्त

जैन धर्म

जैन धर्म का साहित्य तथा भारतीय संस्कृति को देन

मुख्य अध्याय – बौद्ध धर्म

महात्मा बुद्ध और उनका धर्म

बौद्ध धर्म के सिद्धान्त

गौतम बुद्ध के विचार

बौद्ध धर्म का भारत में प्रसार एवं उसके कारण

बौद्ध धर्म का प्रसार एवं भारत से विलोपन

बौद्ध धर्म का विदेशों में प्रसार एवं भारत से विलोपन

बौद्ध धर्म की देन

जैन और बौद्ध धर्म का तुलनात्मक अध्ययन

मुख्य अध्याय – शंकराचार्य का दर्शन

जगद्गुरु शंकराचार्य एवं उनका दर्शन

मुख्य अध्याय – पौराणिक धर्म

पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म का उदय एवं विकास

पौराणिक धर्म के मूलतत्त्व

पौराणिक धर्म में समन्वय के तत्व

मुख्य अध्याय – शैव एवं शाक्त धर्म

शैव धर्म

नाथ सिद्ध कालमुख एवं अघोरी सम्प्रदाय

शाक्त धर्म एवं उसके सम्प्रदाय

मुख्य अध्याय – संगम युग

संगम युग में समाज

संगम साहित्य

संगम युगीन अर्थव्यवस्था

मुख्य अध्याय – इस्लाम का भारत पर आक्रमण

इस्लाम का जन्म

इस्लाम के सिद्धांत

खलीफाओं का उत्कर्ष

इस्लामी साम्राज्य का प्रसार

सूफी मत

मुख्य अध्याय – सिक्ख पंथ

गुरु नानक एवं उनका धर्म

सिक्ख धर्म के ग्रंथ एवं मंदिर

सिक्ख गुरु एवं उनका इतिहास

बंदा बैरागी और सिक्ख धर्म

मुख्य अध्याय – प्राचीन भारत में शिक्षा व्यवस्था

वैदिक भारत में शिक्षा व्यवस्था

स्त्री शिक्षा एवं शूद्र शिक्षा

प्राचीन वैदिक शिक्षा केन्द्र

प्राचीन जैन शिक्षा केन्द्र

प्राचीन बौद्ध शिक्षा केन्द्र

मुख्य अध्याय – आर्यों की वर्ण व्यवस्था

वर्णों की उत्पत्ति

प्राचीन काल में शूद्र

मौर्य युग में वर्ण व्यवस्था

मौर्योत्तर वर्ण व्यवस्था

वर्ण व्यवस्था गुप्त काल से मध्यकाल तक

मुख्य अध्याय – जाति व्यवस्था

हिन्दुओं की जाति प्रथा

जाति प्रथा के गुणदोष

चाण्डाल एवं कायस्थ जातियों का जाति प्रथा में स्थान

मुख्य अध्याय – भारतीय परिवार प्रणाली

प्राचीन विवाह प्रणालियाँ

भारत में पारिवारिक जीवन

भारतीय परिवार की विशेषताएँ

भारतीय परिवार के कर्त्तव्य

संयुक्त परिवार प्रणाली

मुख्य अध्याय – भारतीय नारी की युग-युगीन स्थिति

वैदिक काल में नारी की स्थिति

महाकाव्य काल में नारी की स्थिति

स्मृति काल में नारी की स्थिति

पौराणिक काल में नारी की स्थिति

पूर्वमध्यकाल में नारी की स्थिति

मध्य काल में नारी की स्थिति

ब्रिटिश काल में नारी की स्थिति

आधुनिक काल में नारी की स्थिति

मुख्य अध्याय – ब्राह्मण धर्म में संस्कार व्यवस्था

संस्कार

मुख्य अध्याय – पुरुषार्थ चतुष्टय

पुरुषार्थ-चतुष्टय की अवधारणा

धर्म – पुरुषार्थ-चतुष्टय (1)

अर्थ – पुरुषार्थ-चतुष्टय (2)

काम – पुरुषार्थ-चतुष्टय (3)

मोक्ष – पुरुषार्थ-चतुष्टय (4)

मुख्य अध्याय – आर्यों की आश्रम व्यवस्था

आर्यों की आश्रम व्यवस्था

ब्रह्मचर्य आश्रम

गृहस्थ आश्रम

वानप्रस्थ आश्रम

संन्यास आश्रम

आश्रम व्यवस्था में स्त्री का स्थान

मुख्य अध्याय – भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

भगवद्भक्ति की अवधारणा

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार एवं उसके कारण

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

मुख्य अध्याय – मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

रामानुजाचार्य

माधवाचार्य

निम्बार्काचार्य

संत नामदेव

रामानंदाचार्य

वल्लभाचार्य

सूरदास

संत कबीर

भक्त रैदास

गुरु नानकदेव

मीरा बाई

तुलसीदास

संत तुकाराम

दादू दयाल

चैतन्य महाप्रभु

मुख्य अध्याय – मध्यकालीन भारतीय समाज

मध्यकालीन हिन्दू रीति रिवाज

मध्यकालीन मुस्लिम रीति-रिवाज

मध्यकालीन सामाजिक व्यवहार एवं शिष्टाचार

मध्यकालीन वेशभूषा एवं आभूषण

मध्यकालीन समाज का भोजन

मध्यकालीन आवास

मध्यकाल में मनोरंजन के साधन

मध्यकालीन हिन्दू त्यौहार

मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार

मुख्य अध्याय – भारतीय कलाएँ

भारतीय कला

भारतीय मूर्ति कला

मुख्य अध्याय – भारत की चित्रकला

भारत के शैलचित्र

भारत की चित्रकला

मुस्लिम चित्रकला

राजपूत चित्रकला

मुख्य अध्याय – भारतीय वास्तु एवं स्थापत्य कला

मौर्य कालीन स्थापत्य

हिन्दू स्थापत्य कला

राजपूत स्थापत्य कला

खजुराहो मंदिर शैली

कलिंग मंदिर शैली

हिन्दू दुर्ग स्थापत्य

हिन्दू जल स्थापत्य

इण्डो-सारसैनिक वास्तुकला

हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य में अंतर

मुख्य अध्याय – मुगल स्थापत्य कला

मुगल स्थापत्य कला की विशेषताएँ

बाबर कालीन स्थापत्य

हुमायूँ कालीन स्थापत्य

अकबर कालीन स्थापत्य

जहाँगीर कालीन स्थापत्य

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

ताजमहल का स्थापत्य

औरंगजेब कालीन स्थापत्य

मुख्य अध्याय – ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

ब्रिटिश कालीन स्थापत्य

मुख्य अध्याय – दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य

दक्षिण का मन्दिर स्थापत्य एवं द्रविड़ शैली

पल्लव मन्दिर स्थापत्य कला

राष्ट्रकूट मन्दिर स्थापत्य कला

चोल मन्दिर स्थापत्य कला

चालुक्य मन्दिर स्थापत्य कला

दक्षिण भारत की मूर्तिकला

मुख्य अध्याय – भारतीय साहित्यिक विरासत

कालीदास

तुलसीदास

मीराबाई

रवीन्द्र नाथ टैगोर

मुख्य अध्याय – उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज-सुधार आंदोलन

भारतीय पुनर्जागरण

राजा राममोहन राय और उनका ब्रह्मसमाज

युवा बंगाल आन्दोलन

केशवचन्द्र सेन का भारतीय ब्रह्मसमाज

आत्माराम पाण्डुरंग और प्रार्थना समाज

स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज

स्वामी श्रद्धानंद का शुद्धि आंदोलन

रामकृष्ण परमहंस

स्वामी विवेकानन्द

थियोसॉफिकल सोसायटी

विभिन्न सम्प्रदायों में सुधार आंदोलन

मुस्लिम सुधार आन्दोलन

समाजसुधार आंदोलनों का मूल्यांकन

मुख्य अध्याय – राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान

बालगंगाधर तिलक

मोहनदास कर्मचंद गांधी

सुभाष चन्द्र बोस

मुख्य अध्याय – भारत के प्रमुख वैज्ञानिक

महर्षि सुश्रुत

महर्षि चरक

आर्यभट्ट

वराहमिहिर

जगदीश चन्द्र बसु

चन्द्रशेखर वेंकट रमन

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सभ्यता एवं संस्कृति का अर्थ

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सभ्यता एवं संस्कृति का अर्थ अध्याय में सभ्यता एवं संस्कृति के अंतर को समझाया गया है। हालांकि सभ्यता एवं संस्कृति एक दूसरे के पर्याय हैं किंतु इनमें बारीक भेद मौजूद हैं।

अगर इस धरती पर कोई जगह है जहाँ सभ्यता के आरम्भिक दिनों से ही मनुष्यों के सारे सपने आश्रय पाते रहे हैं, तो वह हिन्दुस्तान है।  – रोम्या रोलां।

‘सभ्यता’ का शाब्दिक अर्थ ‘सभा में बैठने की योग्यता’ से होता है- ‘सभायाम् अर्हति इति।’ भौतिक रूप से सभ्यता, मनुष्यों की एक ऐसी बस्ती है जो प्रकृति की गोद में स्वतः जन्म लेती है। सामाजिक रूप से सभ्यता मनुष्यों की एक ऐसी बस्ती है जिसमें सामूहिक जीवन की भावना होती है।

सभ्यता

बौद्धिक रूप से सभ्यता विचारवान मनुष्यों की एक ऐसी संरचना है जिसमें समस्त मनुष्यों के विचार एक-दूसरे पर प्रभाव डालकर उस बस्ती अथवा समूह के लोगों की साझा समझ का निर्माण करते हैं। यह साझा समझ ही उस समूह के लोगों के आचरण, व्यवहार एवं आदतों का निर्माण करती है। मनुष्यों की साझा समझ के परिणाम स्वरूप उत्पन्न होने वाले आचरण, व्यवहार एवं आदतों को सम्मिलित रूप से संस्कृति कहा जाता है।

इस प्रकार प्रत्येक सभ्यता की एक विशिष्ट संस्कृति होती है जो अन्य स्थानों पर विकसित होने वाली संस्कृति से अलग होती है।

इस प्रकार प्राकृतिक परिवेश, सभ्यता, विचार एवं संस्कृति परस्पर अटूट सम्बन्ध रखते हैं। ये एक दूसरे से असंपृक्त अथवा विरक्त होकर नहीं रह सकते। इनमें मित्रता का भाव होना आवश्यक है। यही भाव मनुष्य सभ्यता को सामूहिक जीवन की ओर अग्रसर करते हैं। एकाकी जीवन जीने वाला व्यक्ति किसी सभ्यता या संस्कृति का निर्माण नहीं कर सकता।

सभ्य समाज

वर्तमान समय में ‘सभ्यता’ शब्द का प्रयोग मानव समाज के एक सकारात्मक, प्रगतिशील और समावेशी विकास को इंगित करने के लिए किया जाता है। अतः वर्तमान समय में सभ्यता का आशय ‘सभ्य समाज’ से है। यह सभ्य समाज क्या है? आधुनिक युग में यदि सभ्य समाज को समझने का प्रयास किया जाए तो ‘सभ्य समाज उन्नत कृषि, लंबी दूरी के व्यापार, व्यावसायिक विशेषज्ञता, नगरीकरण और वैज्ञानिक प्रगति आदि की उन्नत स्थितियों का द्योतक है।’

इन मूल तत्त्वों के साथ-साथ, सभ्यता कुछ माध्यमिक तत्त्वों, जैसे विकसित यातायात व्यवस्था, लेखन, मापन के मानक, संविदा एवं नुकसानी पर आधारित विधि-व्यवस्था, कला शैलियों, स्थापत्य, गणित, उन्नत धातुकर्म एवं खगोलविद्या आदि की स्थिति से भी परिभाषित होती है।

संस्कृति

संस्कृति शब्द का निर्माण मूलतः ‘कृ’ धातु से हुआ है जिसका अर्थ है- ‘करना’। इसके पूर्व ‘सम्’ उपसर्ग तथा ‘क्तिन्’ प्रत्यय लगने से लगने से ‘संस्कार’ शब्द बनता है जिसके अर्थ- पूरा करना, सुधारना, सज्जित करना, मांज कर चमकाना, शृंगार, सजावट करना आदि हैं। इसी विशेषण की संज्ञा ‘संस्कृति’ है। वाजसनेयी संहिता में ‘तैयार करना’ या ‘पूर्णता’ के अर्थ में यह शब्द आया है तथा ऐतरेय ब्राह्मण में ‘बनावट’ या ‘संरचना’ के अर्थ में इसका प्रयोग हुआ है।

महाभारत में ‘श्रीकृष्ण’ के एक नाम के रूप में इस शब्द का प्रयोग हुआ है। हिन्दी साहित्य कोश के अनुसार संस्कृति शब्द का अर्थ साफ या परिष्कृत करना है। संस्कृति क्या है? इस विषय पर विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं। वर्तमान में संस्कृति शब्द अंग्रेजी के ‘कल्चर’ शब्द का पर्याय माना जाता है।

संस्कृति की परिभाषाएं

पं. जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है- ‘संस्कृति, शारीरिक मानसिक शक्तियों के प्रशिक्षण, सुदृढ़़ीकरण या विकास परम्परा और उससे उत्पन्न अवस्था है।’

मैथ्यू आर्नोल्ड ने लिखा है- ‘संसार भर में जो भी सर्वोत्तम बातें जानी या कही गई हैं, उनसे अपने आपको परिचित करना संस्कृति है।’

 ई. वी. टॉयलर ने लिखा है- ‘संस्कृति एक जटिल सम्पूर्णता है जिसमें समस्त ज्ञान, विश्वास, कलाएँ, नीति, विधि, रीति-रिवाज तथा अन्य योग्यताएँ समाहित हैं जिन्हें मनुष्य किसी समाज का सदस्य होने के नाते अर्जित करता है।’

अमेरिका के प्रसिद्ध दार्शनिक और शिक्षा विशेषज्ञ डॉ. व्हाइटहैड के अनुसार ‘संस्कृति का अर्थ है- मानसिक प्रयास, सौन्दर्य और मानवता की अनुभूति।’

बील्स तथा हॉइजर के अनुसार ‘मानव समाज के सदस्य व्यवहार करने के जो निश्चित ढंग व तरीकों को अपनाते हैं, वे सम्पूर्ण रूप से संस्कृति का निर्माण करते है।’

प्रसिद्ध समाजशास्त्री गिलिन के अनुसार ‘प्रत्येक समूह तथा समाज में आन्तरिक व बाह्य व्यवहार के ऐसे प्रतिमान होते हैं जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित होते हैं तथा बच्चों को सिखलाए जाते हैं, जिनमें निरन्तर परिवर्तन की सम्भावना रहती है।’

ग्रीन के अनुसार ‘संस्कृति ज्ञान, व्यवहार, विश्वास की उन आदर्श पद्धतियों को तथा ज्ञान एवं व्यवहार से उत्पन्न हुए साधनों की व्यवस्था को, जो कि समय के साथ परिवर्तित होती है, कहते हैं, जो सामाजिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दी जाती है।’

एक अन्य विद्वान ने कहा है- ‘संस्कृति का उद्गम संस्कार शब्द है। संस्कार का अर्थ है वह क्रिया जिससे वस्तु के मल (दोष) दूर होकर वह शुद्ध बन जाय। मानव के मल-दोषों को दूर कर उसे निर्मल बनाने वाली प्रक्रियाओं का संग्रहीत कोष ही संस्कृति है।’

एक अन्य परिभाषा में कहा गया है कि ‘संस्कृति शारीरिक या मानसिक शक्तियों का प्रशिक्षण, दृढ़़ीकरण या विकास अथवा उससे उत्पन्न अवस्था है।’

एक विद्वान की दृष्टि में ‘संस्कृति मन, आचार अथवा रुचियों की परिष्कृति या शुद्धि है।’

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इसी प्रकार संस्कृति की एक परिभाषा यह भी है कि ‘यह सभ्यता का भीतर से प्रकाशित हो उठना है।’ इस प्रकार संस्कृति शब्द का व्यापक अर्थ, समस्त सीखे हुए व्यवहारों अथवा उस व्यवहार का नाम है जो सामाजिक परम्परा से प्राप्त होता है। इस अर्थ में संस्कृति को सामाजिक प्रथाओं का पर्याय भी कहा जा सकता है। संकीर्ण अर्थ में संस्कृति का आशय ‘सभ्य’ और ‘सुसंस्कृत’ होने से है। राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय में लिखा है- ‘संस्कृति जिंदगी का एक तरीका है और यह तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है, जिसमें हम जन्म लेते हैं।’ उपरोक्त विवेचन के आधार पर हम निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि किसी भी क्षेत्र में निवास करने वाले मनुष्यों की जीवन शैली, उस क्षेत्र की संस्कृति का निर्माण करती है। उस क्षेत्र में निवास करने वाले मनुष्यों की आदतें, विचार, स्वभाव, कार्य-कलाप, रीति-रिवाज, परम्पराएं, खान-पान, वस्त्र-विन्यास, तीज-त्यौहार, खेल-कूद, नृत्य-संगीत, चाक्षुष कलाएं, जन्म-मरण के संस्कार एवं विधान आदि विभिन्न तत्त्व उस क्षेत्र की संस्कृति को आकार देते हैं।

मानव द्वारा सीखा गया समस्त व्यवहार संस्कृति नहीं

डॉ. सम्पूर्णानंद ने समस्त सीखे हुए व्यवहार को संस्कृति का अंग नहीं माना है। उनके अनुसार- ‘मानव का प्रत्येक विचार संस्कृति नहीं है। पर जिन कामों से किसी देश विशेष के समस्त समाज पर कोई अमिट छाप पड़े, वही स्थाई प्रभाव ही संस्कृति है।’

चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य ने भी मानव जाति द्वारा समस्त सीखे हुए व्यवहार को संस्कृति नहीं माना है। उन्होंने लिखा है- ‘किसी भी जाति अथवा राष्ट्र के शिष्ट पुरुषों में विचार, वाणी एवं क्रिया का जो रूप व्याप्त रहता है, उसी का नाम संस्कृति है।’

संस्कृति का निर्माण

संस्कृति का निर्माण किसी एक कालखण्ड में अथवा कुछ विशेष लोगों द्वारा अथवा कुछ विशेष घटनाओं द्वारा नहीं होता। यह किसी भी समाज के भीतर घटने वाली बौद्धिक घटनाओं का एक चिंरतन प्रवाह है। यही कारण है कि किसी देश की संस्कृति उसकी सम्पूर्ण मानसिक निधि को सूचित करती है।

किसी देश के विभिन्न कालखण्डों में, उस देश के समस्त नागरिकों द्वारा व्यवृहत किए जाने वाले आचार-विचार से संस्कृति रूपी वृक्ष में नित्य नए पत्ते लगते हैं। बौद्धिकता केवल असाधारण प्रतिभा से सम्पन्न व्यक्तियों में ही नहीं होती अपितु समाज का साधारण से साधारण व्यक्ति और असाधारण से असाधारण व्यक्ति देश की संस्कृति के निर्माण में अपना सहयोग देता है। 

इस प्रकार एक समुदाय में रहने वाले विभिन्न मनुष्य, विभिन्न स्थानों पर रहते हुए, विशेष प्रकार के सामाजिक वातावरण, संस्थाओं, प्रथाओं, व्यवस्थाओं, धर्म, दर्शन, लिपि, भाषा तथा कलाओं का विकास करके अपनी विशिष्ट संस्कृति का निर्माण करते है। संस्कृति किसी भी समाज का समग्र व्यक्तित्त्व है, जिसका निर्माण उस समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के विचार, भावना, आचरण तथा कार्यकलाप से होता है।

एक व्यक्ति या एक युग की कृति नहीं है संस्कृति

कुछ लोग चाहे कितने ही प्रभावशाली एवं युगांतकारी व्यक्तित्त्व के स्वामी क्यों न हों, वे संस्कृति का परिष्कार तो कर सकते हैं किंतु अकेले ही किसी देश या समाज की संस्कृति का निर्माण नहीं कर सकते। क्योंकि संस्कृति कभी भी किसी एक व्यक्ति के प्रयत्न का परिणाम नहीं होती, अपितु वह ‘लोक’ अर्थात् समाज के अनगिनत व्यक्तियों के सामूहिक प्रयत्नों एवं व्यवहारों का परिणाम होती है और यह प्रयत्न अथवा व्यवहार भी ऐसा, जिसे भविष्य में आने वाली पीढ़ियां निरन्तर अपनाती रहती हैं अर्थात् व्यवहार में लाती रहती हैं और उसमें कुछ नया जोड़ती जाती हैं।

यही कारण है कि संस्कृति का विकास धीरे-धीरे होता है। वह किसी एक युग की कृति नहीं होती अपितु विभिन्न युगों के विविध मनुष्यों के सामूहिक एवं अनवरत श्रम का परिणाम होती है। वस्तुतः मनुष्य अपने मन, वचन एवं कर्म द्वारा अपने जीवन को सरस, सुन्दर और कल्याणमय बनाने के लिए जो प्रयत्न करता है, उसका सम्मिलित परिणाम ‘संस्कृति’ के रूप में प्रकट होता है।

सभ्यता एवं संस्कृति का सम्बन्ध

सभ्यता और संस्कृति का सम्बन्ध बहुत गहरा है। पहले मानव सभ्यता विकसित होती है और उसके बाद मानव सभ्यता ही संस्कृति को जन्म देती है। आकार की दृष्टि से सभ्यता, किसी भी मानव समूह का स्थूल रूप है जबकि संस्कृति, मानव समूह का सूक्ष्म रूप है। हमारे प्राचीन साहित्य में सभ्यता का अन्तर्भाव ‘अर्थ’ से लिया गया है जबकि संस्कृति का आशय ‘धर्म’ से लिया गया है। सभ्यता के बिना कोई संस्कृति जन्म नहीं ले सकती और संस्कृति के बिना कोई सभ्यता जीवित नहीं रह सकती।

सभ्यता एवं संस्कृति में भेद

आजकल बहुत से लोग सभ्यता और संस्कृति को पर्याय के रूप में प्रयुक्त करते हैं जबकि इनमें अंतर है। सभ्यता, मानव समाज की बाह्य उन्नति का बोध कराती है जबकि संस्कृति, मानव समाज की आंतरिक उन्नति को इंगित करती है। सभ्यता से मनुष्य के भौतिक क्षेत्र की और संस्कृति से मानसिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है। हमने किसी विशेष प्रकार के वस्त्र क्यों धारण किए हैं तो इसका आधा जवाब हमारी सभ्यता से और आधा जवाब हमारी संस्कृति से मिलेगा।

हमारे कपड़े सस्ते हैं या महंगे, इसे हमारी सभ्यता तय करेगी जबकि हमारे कपड़ों के रंग भड़कीले हैं या शांत, अथवा हमारे कपड़े हमारा कितना शरीर ढकते हैं, इन बातों को हमारी संस्कृति तय करेगी। एक समाज के द्वारा दूसरे समाज की सभ्यता की नकल की जा सकती है किंतु एक समाज के द्वारा दूसरी संस्कृति की नकल नहीं की जा सकती, हाँ एक समाज, दूसरे समाज की संस्कृति की कुछ बातों को अपना सकता है। सभ्यता को मापा जा सकता है और उसका मापदण्ड उपयोगिता है जबकि संस्कृति को मापा नहीं जा सकता।

संस्कृति का मनुष्य जाति पर प्रभाव

संस्कृति की शास्त्रीय व्याख्या के अनुसार मनुष्य आज जो कुछ भी है, वह संस्कृति की देन है। यदि मनुष्य से उसकी संस्कृति छीन ली जाए तो मनुष्य श्री-हीन हो जाएगा। विद्वानों का मानना है कि आज ‘मनुष्य’ इसलिए ‘मनुष्य’ है क्योंकि उसके पास ‘संस्कृति’ है। स्वामी ईश्वरानंद गिरि के अनुसार ‘संस्कृति मनुष्य की आत्मोन्नति का मापदण्ड भी है और आत्माभिव्यक्ति का साधन भी।’ संस्कृति को केवल बाह्य रूप या क्रिया ही नहीं मान लेना चाहिए।

उसका आधार ‘जीवन के मूल्यों’ में है और पदार्थों के साथ ‘स्व’ को जोड़ने की सूक्ष्म कला में है। श्यामाचरण दुबे ने लिखा है– ‘संस्कृति के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन की पूर्ण पृष्ठभूमि में अपना स्थान पाता है और संस्कृति के द्वारा उसे जीवन में रचनात्मक संतोष के साधन उपलब्ध होते हैं।’

कहने का अर्थ यह कि मानव जब जन्म लेता है, तब वह मानव की देह में होते हुए भी पूर्ण अर्थों में मानव नहीं होता। संस्कृति उसका परिष्कार करके उसे वास्तविक मानव बनाती है। संस्कृति, मानव को मानव बना देने वाले विशिष्ट तत्त्वों में सबसे महत्त्वपूर्ण है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – सभ्यता एवं संस्कृति

सभ्यता एवं संस्कृति का अर्थ

पर्यावरण सभ्यता एवं संस्कृति का सम्बन्ध

भारतीय संस्कृति का प्रसार

भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ

भारतीय संस्कृति के तत्त्व

भारतीय संस्कृति का इतिहास जानने के साहित्यिक स्रोत

भारतीय संस्कृति का इतिहास जानने के पुरातात्विक स्रोत

पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव

पर्यावरण सभ्यता एवं संस्कृति का सम्बन्ध

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पर्यावरण सभ्यता एवं संस्कृति का सम्बन्ध

इस अध्याय में पर्यावरण सभ्यता एवं संस्कृति का सम्बन्ध स्पष्ट किया गया है। ये तीनों तत्व एक-दूसरे के अनुपूरक एवं अन्योन्याश्रित हैं तथा परिस्थितियों के अनुसार एक दूसरे का निर्माण, विकास एवं विनाश करते हैं।

पर्यावरण, सभ्यता एवं संस्कृति का सम्बन्ध

प्राकृतिक परिवेश को पर्यावरण कहते हैं। चूँकि मनुष्य किसी न किसी विशिष्ट प्रकार के पर्यावरण के भीतर रहता है इसलिए पर्यावरण, सभ्यता एवं संस्कृति अन्योन्याश्रित हैं। अर्थात् ये तीनों तत्त्व एक दूसरे से प्रभावित होते हैं तथा एक दूसरे के आश्रित हो जाते हैं। इनमें से किसी एक के बदलने से दूसरा एवं तीसरा स्वतः बदल जाता है। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि सृष्टि के आरम्भ में पर्यावरण सभ्यता को जन्म देता है। दूसरे चरण में सभ्यता, संस्कृति को जन्म देती है तथा तीसरे चरण में संस्कृति पर्यावरण को संवारती या विनष्ट करती है।

पर्यावरण का सभ्यता एवं संस्कृति पर प्रभाव

किसी क्षेत्र के पर्यावरण का उस क्षेत्र की सभ्यता एवं संस्कृति पर गहरा प्रभाव होता है। उदाहरण के लिए ठण्डे प्रदेश के लोग अपने घरों को इस प्रकार बनायेंगे कि उनके घरों में वायु का सीधा प्रवेश न हो जबकि गर्म प्रदेश के लोग अपने घरों को इस प्रकार बनायेंगे कि उनके घरों में वायु का सीधा और निर्बाध प्रवेश हो।

ठण्डे प्रदेशों में निवास करने वाले लोग अपने खान-पान में मांस एवं मदिरा को अधिक मात्रा में सम्मिलित करना पसंद करेंगे जबकि गर्म प्रदेश के निवासी अपने खान-पान में वनस्पति, दूध-दही एवं छाछ को अधिक सम्मिलित करेंगे। ठण्डे प्रदेश के लोग ऊनी, मोटे और चुस्त कपड़े पहना पसंद करेंगे जबकि गर्म प्रदेश के लोग सूती, पतले तथा ढीले कपड़े पहनेंगे।

ठण्डे प्रदेश के लोग चर्च में जूते पहनकर जाना पसंद करेंगे जबकि गर्म प्रदेश के लोग अपने जूते मंदिरों से बाहर उतारना पसंद करेंगे। बाह्य पर्यावरण के कारण अपनाई गई खान-पान एवं रहन-सहन की आदतों का मनुष्य की कार्य क्षमता एवं उसकी बौद्धिक क्षमता पर गहरा असर होता है।

जिन लोगों के भोजन में मदिरा का समावेश होगा तथा जो चुस्त कपड़े पहनेंगे, वे अधिक समय तक काम करेंगे किंतु वे स्वभाव से उग्र होंगे तथा भौतिक प्रगति पर अधिक ध्यान देंगे। जबकि जिन लोगों के भोजन में दही एवं छाछ का समावेश होगा तथा कपड़े ढीले होंगे, उनका शरीर तुलनात्मक दृष्टि से कम समय तक काम कर सकेगा किंतु उनकी प्रवृत्ति शांत होगी तथा वे आध्यात्मिक प्रगति पर अधिक ध्यान देंगे।

इस बात को दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि मानव और प्रकृति के बीच के सम्बन्धों की प्रतिक्रिया केवल भौतिक नहीं होती, अपितु बौद्धिक भी होती है।

सभ्यता एवं संस्कृति का पर्यावरण पर प्रभाव

जिस प्रकार पर्यावरण का सभ्यता एवं संस्कृति पर प्रभाव होता है, उसी प्रकार सभ्यता एवं संस्कृति का पर्यावरण पर गहरा प्रभाव होता है। किसी भी भू-भाग में रहने वाले मानव समुदाय की आदतें, स्वभाव, प्रवृत्तियाँ, रीति-रिवाज, परम्पराएं, धार्मिक विश्वास, तीज-त्यौहार, पर्व, अनुष्ठान आदि विभिन्न तत्त्व, सभ्यता एवं संस्कृति के ऐसे अंग हैं जो धरती के पर्यावरण को गहराई तक प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए राजस्थान के सामंती परिवेश में शेरों, शूकरों एवं हरिणों का शिकार एक परम्परा के रूप में प्रचलित रहा। इसका परिणाम यह हुआ कि जंगल असुरक्षित हो गए और भारी मात्रा में इंसान द्वारा सहज रूप से काट कर नष्ट कर दिए गए। आजादी के बाद पनपी उपभोक्तावादी संस्कृति, तेजी से बढ़ती जनसंख्या, बेरोजगारी का प्रसार तथा वनों के प्रति आदर के अभाव ने जंगलों को तेजी से गायब किया। आज भारत में 23.28 प्रतिशत जंगल हैं किंतु राजस्थान में केवल 9.54 प्रतिशत भू-भाग पर जंगल बचे हैं।

संस्कृति में बदलाव

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ऊपर हम पढ़ आए हैं कि मानव जाति ने जो कुछ भी भूतकाल से परम्पराओं, आदतों और जीवन शैली के रूप में ग्रहण किया है और जिन परम्पराओं तथा आदतों को मानव जाति वर्तमान समय में व्यवहार में ला रही है, वही हमारी संस्कृति है। कुछ समय बाद मनुष्य इनमें से बहुत सी परम्पराओं को भूल जाएगा और अपनी आदतों को बदल लेगा। इस कारण भविष्य काल में संस्कृति का रूप भी बदल जाएगा। इस दृष्टि से संस्कृति गतिशील तत्त्व है। यह पल-पल बदलती है किंतु इसके बदलाव की आहट प्रायः तुरन्त सुनाई नहीं देती। वैदिक-काल में हमारी संस्कृति कुछ और तरह की थी। बुद्ध के काल में संस्कृति का रूप अलग हो गया। गुप्त काल में भारतीय संस्कृति में बहुत बड़ा बदलाव आया। मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमणों एवं अंग्रेजों के आगमन आदि से हुए राजनीतिक एवं आर्थिक बदलावों ने हमारी संस्कृति को आमूलचूल बदल दिया। प्राकृतिक आपदाओं एवं वैज्ञानिक खोजों सहित विभिन्न कारक, मानव की संस्कृति को प्रभावित करते हैं। अतः हम कह सकते हैं कि जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता है, हमारी संस्कृति में बदलाव आता है फिर भी किसी समाज की संस्कृति अक्षय रहती है।

अक्षय रहने वाली संस्कृति की तुलना उस स्त्री से की जा सकती है जो हजारों साल की हो जाने पर भी कभी बूढ़ी नहीं होती। वह क्षण-क्षण अपना नया शृंगार करके नवीन रूप धारण करती है। वह ना-ना प्रकार के विचारों और व्यवहारों से स्वयं को सजाती एवं संवारती है। नवीन विचार एवं व्यवहार संस्कृति के लिए नवीन आभूषणों का काम करते हैं।

संस्कृति सदैव भूतकाल की आदतें छोड़़ती जाती है तथा जीवन जीने के नवीन तरीकों का विकास करती हुई, कभी भी अपनी आकर्षण शक्ति को नहीं खोती। जब किसी काल खण्ड में संस्कृति में एक साथ बड़े परिवर्तन होते हैं तो उन्हें सांस्कृतिक क्रांति कहा जाता है।

संतुलित सभ्यता एवं संस्कृति

जिन समुदायों में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का चिंतन किया जाता है, उस क्षेत्र की सभ्यता एवं संस्कृति इस प्रकार विकसित होती हैं कि उनसे पर्यावरण को कोई हानि नहीं पहुँचती। अपितु पर्यावरण की सुरक्षा होती है।

भारत में वृक्षों, नदियों, समुद्रों तथा पर्वतों की पूजा करने से लेकर गायों को रोटी देने, कबूतरों एवं चिड़ियों को दाना डालने, गर्मियों में पक्षियों के लिए पानी के परिण्डे बांधने, बच्छ बारस को बछड़ों की पूजा करने, श्राद्ध पक्ष में कौओं को ग्रास देने, नाग पंचमी पर नागों की पूजा करने जैसे धार्मिक विधान बनाए गए जिनसे मानव में प्रकृति के प्रति संवेदना, आदर और कृतज्ञता का भाव उत्पन्न होता है।

भारतीय संस्कृति में सादगी पर सर्वाधिक जोर दिया गया है। सादा जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति कभी भी अपनी आवश्यकताओं को इतना नहीं बढ़ायेगा कि पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े। संत पीपा का यह दोहा इस मानसिकता को बहुत अच्छी तरह व्याख्यायित करता है-

स्वामी होना  सहज  है,  दुरलभ  होणो  दास।

पीपा हरि के नाम बिन, कटे न जम की फांस।।

असंतुलित सभ्यता एवं संस्कृति

जिस सभ्यता अथवा संस्कृति में ऊर्जा की अधिकतम खपत हो, वह संस्कृति धरती के पर्यावरण में गंभीर असंतुलन उत्पन्न करती है। पश्चिमी देशों में विकसित उपभोक्तावादी संस्कृति, ऊर्जा के अधिकतम खपत के सिद्धांत पर खड़ी हुई है। इस संस्कृति ने धरती के पर्यावरण को अत्यधिक क्षति पहुँचाई है।

इस संस्कृति का आधार एक ऐसी मानसिकता है जो मनुष्य को व्यक्तिवादी होने तथा अधिकतम वस्तुओं के उपभोग के माध्यम से स्वयं को सुखी एवं भव्यतर बनाने के लिए प्रेरित करती है। ऐसी संस्कृति में इस बात पर विचार ही नहीं किया जाता कि व्यक्तिवादी होने एवं अधिकतम सुख अथवा भव्यता प्राप्त करने की होड़़ में प्रकृति एवं पर्यावरण का किस बेरहमी से शोषण किया जा रहा है तथा उसके संतुलन को किस तरह से सदैव के लिए नष्ट किया जा रहा है।

पश्चिमी देशों एवं अमरीका में विकसित ‘फास्ट फूड कल्चर’, ‘यूज एण्ड थ्रो कल्चर’ तथा ‘डिस्पोजेबल कल्चर’ पर्यावरण को स्थाई रूप से क्षति पहुँचाते हैं। कहा जा सकता है कि उपभोक्तावादी संस्कृति, धरती के पर्यावरण में भयानक असंतुलन उत्पन्न करती है। इस उपभोक्तावादी संस्कृति के विरोध में ईसा मसीह द्वारा दो हजार साल पहले कही गई यह बात आज भी सुसंगत है- ‘सुईं के छेद में से ऊँट भले ही निकल जाए किंतु एक अमीर आदमी स्वर्ग में प्रवेश नहीं पा सकता।’

असंतुलित एवं संतुलित संस्कृतियों के उदाहरण

प्रकृति के संसाधनों को क्षति पहुँचाए बिना उनका उपयोग करना, पर्यावरणीय संस्कृति का अंग है जबकि यूज एण्ड थ्रो कल्चर, डिस्पोजेबल कल्चर, उपभोक्तावादी मानसिकता एवं बाजारीकरण की प्रवृत्तियां पर्यावरण को क्षति पहुँचाने वाली एवं विनाशकारी संस्कृति है।

कागज की थैलियों, मिट्टी के सकोरों तथा पत्तों के दोनों का उपयोग पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण हैं तो पॉलिथीन कैरी बैग्ज, प्लास्टिक की तश्तरियां तथा थर्मोकोल के गिलास, यूज एण्ड थ्रो कल्चर का उदाहरण हैं।

फाउण्टेन इंक पैन का उपयोग पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण है तो बॉल पॉइण्ट पैन डिस्पोजेबल कल्चर का उदाहरण है। नीम और बबूल की दांतुन पर्यावरणीय संस्कृति का उदाहरण है तो टूथपेस्ट का उपयोग उपभोक्तावादी एवं बाजारीकरण की संस्कृति का उदाहरण है।

मल त्याग के बाद पानी से प्रक्षालन पर्यावरणीय संस्कृति है तो कागज का प्रयोग यूज एण्ड थ्रो कल्चर है। शेविंग के बाद केवल ब्लेड बदलना, पर्यावरण के लिए कम क्षतिकारक है जबकि पूरा रेजर ही फैंक देना, पर्यावरण के लिए अधिक विनाशकारी है।

भारत में किसी इंजन या मशीन के खराब हो जाने पर उसे ठीक करवाया जाता है और ऐसा लगातार तब तक किया जाता है जब तक कि उसे ठीक करवाना असंभव अथवा अधिक खर्चीला न हो जाए किंतु अमरीका का आम आदमी, कम्पयूटर खराब होते ही कूड़े के ढेर में, कार खराब होते ही डम्पिंग यार्ड में, घड़ी, कैलकुलेटर, सिलाई मशीन आदि खराब होते ही घर से बाहर फैंक देता है जिन्हें नगरपालिका जैसी संस्थाओं द्वारा गाड़ियों में ढोकर समुद्र तक पहुंचाया जाता है। इससे समुद्र में इतना प्रदूषण होता है कि बड़ी संख्या में समुद्री जीव मर जाते हैं।

एक आम भारतीय अपनी कार को तब तक ठीक करवाता रहता है जब तक कि उसे बेच देने का कोई बड़ा कारण उत्पन्न नहीं हो जाता किंतु उसे कभी भी कूड़े के ढेर या समुद्र में नहीं फैंका जाता। उसका पुर्जा-पुर्जा अलग करके किसी न किसी रूप में प्रयोग में लाने लायक बना लिया जाता है या फिर उसके सामान को पुनर्चक्रण (रीसाइकिलिंग) में डाल दिया जाता है। भारत में कबाड़ियों द्वारा घर-घर जाकर खरीदी जाने वाली अखबारी रद्दी और खाली बोतलें श्रम आधारित भारतीय संस्कृति के पूँजीवादी अमरीकी कल्चर से अलग होने का सबसे बड़ा प्रमाण हैं।

भारतीय रोटी को प्याज, लहसुन, चटनी, मिर्च, अचार, उबले हुए आलू तथा छाछ जैसी सस्ती चीजों के साथ खाया जा सकता है जबकि ब्रेड के लिए बटर और जैम की आवश्यकता होती है जो पर्यावरणीय संस्कृति की बजाए पूँजीवादी संस्कृति के उपकरण हैं। अब भारत में भी इसी पूँजीवादी संस्कृति का प्रसार हो गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – सभ्यता एवं संस्कृति

सभ्यता एवं संस्कृति का अर्थ

पर्यावरण सभ्यता एवं संस्कृति का सम्बन्ध

भारतीय संस्कृति का प्रसार

भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ

भारतीय संस्कृति के तत्त्व

भारतीय संस्कृति का इतिहास जानने के साहित्यिक स्रोत

भारतीय संस्कृति का इतिहास जानने के पुरातात्विक स्रोत

पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव

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