इक्ष्वाकु राजाओं की कथाएँ शीर्षक से लिखी गई इस पुस्तक में इक्ष्वाकु राजाओं से सम्बन्धित धर्म एवं अध्यात्म की कथाएं हैं। इक्ष्वाकु राजाओं की कथाएँ – अनुक्रमणिका पर इस पुस्तक में दिए गए आलेखों का क्रम दिया गया है। पाठक प्रत्येक शीर्षक पर क्लिक करके उस कथा को पढ़ सकते हैं।
सृष्टि निर्माण की कथाएँ – अनुक्रमणिका पृष्ठ पर इस पुस्तक में दी गई कथाओं के लिंक उपलब्ध कराए गए हैं। पाठक कथा के शीर्षक पर क्लिक करके इन कथाओं को पढ़ सकते हैं। सृष्टि निर्माण की कथाएँ पुस्तक में भारतीय पुराणों में आई सृष्टि निर्माण सम्बन्धी कथाओं का संकलन किया गया है तथा उनके वैज्ञानिक संदर्भ भी बताए गए हैं।
जगद्गुरु शंकराचार्य का दर्शन उपनिषदों के दर्शन पर आधारित है। उन्होंने उपनिषदों की दार्शनिक व्याख्या करके भारतीय अध्यात्म एवं दार्शनिक ज्ञान को नई दिशा प्रदान की।
वेदों की रचना लगभग ई.पू. 1000 तक पूर्ण हो चुकी थी। उनके बाद ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों, उपनिषदों एवं सूत्रों की रचना हुई। इन्हें वेदों का ही भाग माना जाता है। ब्राह्मणों के परिशिष्ट ‘आरण्यक’ कहलाते हैं और उनके अन्तिम भाग ‘उपनिषद’ हैं। उपनिषदों को वेदांत कहा जाता है क्योंकि ये वेदों का अंतिम भाग हैं। उपनिषद् बहुत सारे थे तथा इनमें भिन्न-भिन्न मत प्रस्तुत किए गए थे।
इन्हें स्वतंत्र रूप से समझ पाना कठिन था। ई.पू. 500 से ई.पू. 200 के बीच महर्षि बादरायण ने उपनिषदों के तत्त्व ज्ञान को व्यवस्था करने के उद्देश्य से ‘वेदान्तसूत्र’ की रचना की जिसे ‘ब्रह्मसूत्र’ भी कहते हैं। श्रीमद्भगवत् गीता को बादरायण के ब्रह्मसूत्र का ही विकास मानना चाहिए। ई.700 के लगभग महर्षि गोडपाद ने माण्डूक्य उपनिषद पर कारिकाएं लिखकर बादरायण के मत को आगे बढ़ाया। गोडपाद की कारिकाओं पर बौद्ध विचारों का प्रभाव दिखाई देता है। गौडपाद के शिष्य गोविन्द; और गोविन्द के शिष्य शंकराचार्य हुए। शंकराचार्य ने वेदान्त का परिष्कृत एवं परिपक्व रूप प्रस्तुत किया।
जगद्गुरु शंकराचार्य का जीवन परिचय
शंकराचार्य का जन्म
जगद्गुरु शंकराचार्य के शिष्यों ने शंकर के जन्म के विषय में अनेक बातें प्रसारित कर रखी हैं जिनके कारण उनके जन्म की सही तिथि प्राप्त करना कठिन है। कतिपय हिन्दू शास्त्र आदिशंकर का जन्म ई.पू.507 में तथा निधन ई.पू.475 में होना बताते हैं किंतु यह तिथि इतिहास सम्मत नहीं है।
विभिन्न स्रोतों से प्राप्त समसामयिक तथ्यों के आधार पर यह स्थिर किया गया है किजगद्गुरु शंकराचार्य का जन्म ई.788 में केरल के मलाबार में अलवाए नदी के किनारे स्थित कालाड़ी (इसे कालटी अथवा काषल भी कहते हैं) गांव के नम्बूदिरी ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम आर्याम्बा था। कुछ स्रोत इनकी माता का नाम सुभद्रा बताते हैं। जब शंकर तीन वर्ष के हुए तब उनके पिता का देहांत हो गया। उनका पालन-पोषण उनकी माता ने किया। प्रतिवर्ष वैशाख शुक्ल पंचमी को शंकराचार्य जयंती मनाई जाती है।
शंकराचार्य की शिक्षा
माता आर्यम्बा ने पुत्र शंकर को गोविन्द स्वामी से शिक्षा दिलवाई। शंकर अत्यंत मेधावी तथा अद्भुत प्रतिभाशाली बालक थे। मान्यता है कि केवल छः वर्ष की आयु में ही उन्होंने वेद, पुराण, उपनिषद्, रामायण, महाभारत आदि ग्रंथ कंठस्थ कर लिए। आठ वर्ष की आयु में वे शिक्षा पूरी करके घर लौट आए।
संन्यास
माता उनका विवाह करना चाहती थीं किंतु किसी ज्योतिषि ने बताया कि शंकर अल्पायु होंगे। इसलिए शंकर ने विवाह के स्थान पर संन्यास लेने का निर्णय लिया किंतु माता उन्हें एकमात्र पुत्र होने के कारण संन्यासी बनने की आज्ञा नहीं देती थीं। एक दिन नदी किनारे स्नान करते समय एक मगरमच्छ ने शंकर का पैर पकड़ लिया।
तब शंकर ने माँ से कहा कि मुझे संन्यास लेने की आज्ञा दो अन्यथा मगरमच्छ मुझे खा जाएगा। भयभीत माता ने उन्हें संन्यासी होने की आज्ञा दे दी और मगरमच्छ ने शंकर का पैर छोड़ दिया। माता ने उनसे वचन लिया कि वे माता की मृत्यु के समय अवश्य आएंगे। शंकर ने गोविन्द स्वामी से संन्यास ग्रहण किया। जब कुछ वर्ष पश्चात् माता की मृत्यु का समय हुआ तो शंकर स्वतः ही माता के समक्ष उपस्थित हुए तथा उन्हें मुखाग्नि दी।
शंकर के शास्त्रार्थ
जगद्गुरु शंकराचार्य कुछ समय के लिए काशी में रहे तथा वहाँ अनेक विद्वानों को शास्त्रार्थ में परास्त किया। इसके बाद शंकर ने वेदान्त दर्शन के प्रचार के लिए देश के विभिन्न भागों में घूमना आरम्भ किया। शंकर ने मीमांसकों, चार्वाकों, जैनियों एवं बौद्धों से शास्त्रार्थ किया और उन्हें स्थान-स्थान पर परास्त किया। उनमें से बहुत से विधर्मियों ने शंकर का शिष्य बनना स्वीकार कर लिया।
बिहार के माहिष्मती क्षेत्र के प्रसिद्ध मीमांसक मण्डन मिश्र से हुआ जगद्गुरु शंकराचार्य का शास्त्रार्थ अत्यधिक प्रसिद्ध है। जब शंकराचार्य ने मण्डन मिश्र को परास्त कर दिया तब मंडन मिश्र की पत्नी भारती ने शंकराचार्य को शास्त्रार्थ हेतु चुनौती दी। मान्यता है कि भारती ने शंकर से ‘काम’ पर शास्त्रार्थ करना चाहा।
इस पर शंकर ने परकाया प्रवेश करके इस विषय का ज्ञान प्राप्त किया तथा भारती से शास्त्रार्थ कर उसे परास्त किया। मंडन मिश्र एवं भारती ने शंकराचार्य को अपना गुरु मान लिया तथा वे भी शंकराचार्य की आज्ञा से अद्वैत दर्शन के प्रचार में जुट गए।
शंकराचार्य ने चिदम्बरम से काश्मीर, केदार और बद्रिकाश्रम तक और द्वारिका से काशी और जगन्नाथपुरी तक अनेक पण्डितों और दार्शनिकों को परास्त करके अपने मत में सम्मिलित किया। बौद्ध उन्हें अपना शत्रु समझते हैं, क्योंकि उन्होंने बौद्धों को कई बार शास्त्रार्थ में पराजित करके वैदिक धर्म की पताका फहराई। आनन्दगिरि रचित ‘शंकर विजय’ और माधव द्वारा रचित ‘शंकर दिग्विजय’ में शंकराचार्य की यात्राओं और शास्त्रार्थों का विस्तृत वर्णन हुआ है।
जगद्गुरु शंकराचार्य के ग्रंथ
जगद्गुरु शंकराचार्य देश-व्यापी यात्रा और शास्त्रार्थ करते हुए निरन्तर लेखन भी करते रहे। उन्होंने अनेक भाष्य, प्रकरण तथा स्तोत्र ग्रन्थों की रचना की तथा सौन्दर्य लहरी एवं विवेक चूड़ामणि जैसे श्रेष्ठ ग्रंथ लिखे। उन्होंने ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता और ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक, प्रस्थान त्रयी एवं छान्दोग्य उपनिषदों पर भाष्य लिखे। उन्होंने ब्रह्मसूत्र की विशद और रोचक व्याख्या की।
जगद्गुरु शंकराचार्य ने उपदेश सहस्री, आत्मबोध, आनन्द लहरी, दक्षिणामूर्ति, शिवापराधक्षमापण, हस्तामलक आदि स्तोत्रों और काव्यों की रचना की। शंकराचार्य ने शिव, पार्वती, गणेश, विष्णु आदि देवी-देवताओं के भक्ति-रस से परिपूर्ण स्तोत्र रचे। शंकर के लिखे ‘भजगोविन्दम्’ भजन ने अत्यधिक प्रसिद्धि प्राप्त की। उनकी तार्किक प्रतिभा, दार्शनिक प्रगल्भता और कवित्व-शक्ति ने देश में नई चेतना एवं स्फूर्ति का संचार किया।
उस युग में जगद्गुरु शंकराचार्य के जैसा लेखन-चातुर्य और प्रचार-कौशल किसी अन्य विद्वान ने प्रदर्शित नहीं किया। मान्यता है कि उन्होंने केवल सोलह वर्ष की आयु में ब्रह्मसूत्र पर शांकरभाष्य की रचना करके विद्वत् समाज को चकित कर दिया।
जगद्गुरु शंकराचार्य के सांगठनिक कार्य
जगद्गुरु शंकराचार्य उच्च-कोटि के संगठनकर्ता थे। उन्होंने भारतवर्ष में चार दिशाओं में चार वेदांत मठों की स्थापना की- (1.) उत्तर में बद्रिकाश्रम (ज्योतिमठ), (2.) दक्षिण में शृंगेरी पीठ, (3.) पश्चिम में द्वारिका शारदा पीठ और (4.) पूर्व में पुरी गोवर्धन पीठ।
ये मठ आज भी बहुत पवित्र माने जाते हैं और इनके अध्यक्ष शंकराचार्य कहलाते हैं। ये मठ अपने-अपने क्षेत्र के मठों की व्यवस्था करते हैं। प्रत्येक प्रधान मठ के अध्यक्ष अर्थात् शंकराचार्य के नीचे सन्यासियों की दस श्रेणियां हैं- सरस्वती, भारती, पुरी, गिरि, तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, पर्वत और सागर। इन्हें सम्मिलित रूप से ‘दशनामी’ कहते हैं।
ज्ञान प्राप्ति की दृष्टि से इनके चार वर्ग- ब्रह्मचारी, दण्डी, परिव्राजक और परमहंस हैं। इनमें जाति-पांति का भेद नहीं है। एक बार बनारस में एक चाण्डाल के प्रश्न करने पर शंकराचार्य ने कहा- ‘मैं प्रत्येक व्यक्ति को जो संसार को अद्वैत दृष्टि से देखता है अपना गुरु मानता हूँ, चाहे वह चाण्डाल हो या द्विज।’ इससे स्पष्ट है कि शंकराचार्य ने अपने संगठन में वर्ण, आश्रम और लिंग के भेद को कोई स्थान नहीं दिया। देश की चार दिशाओं में चार आश्रमों की स्थापना के करके शंकर ने देश को एक जैसी धार्मिक संस्कृति देने का प्रयास किया।
वामाचार का निषेध
जगद्गुरु शंकराचार्य ने वेदांत दर्शन का प्रचार किया तथा गर्हित धर्माचार का निषेध किया। उन्होंने अनेक मंदिरों एवं मठों में होने वाली शाक्तों, तात्रिकों, भैरवों, कापालिकों तथा पाशुपतों की मलिन क्रियाएं बन्द करवा दीं। शंकर ने कांची के देवी मन्दिर में नर-बलि का प्रबल विरोध किया और उसे बन्द करवाया।
अद्भुत समन्वय क्षमता
जगद्गुरु शंकराचार्य में दूसरों को प्रभावित करने की अद्भुत प्रतिभा थी। वे दार्शनिक विचारों के समन्वय के पक्षधर थे। उन्होंने मीमांसा का खण्डन किया किंतु वैदिक रीतियों में अगाध श्रद्धा प्रकट की। बौद्धों का विरोध किया किंतु बुद्ध को योगियों का चक्रवर्ती बताया। शंकर ने बौद्ध धर्म के बहुत से विचारों को मान्यता दी जिनके कारण रूढ़िवादी लोग उन्हें ‘प्रच्छन्न बौद्ध’ कहने लगे।
शंकर ने ब्रह्मज्ञान का प्रचार किया किंतु सूर्य, शक्ति, विष्णु, शिव और गणेश की पूजा को भी स्वीकार किया। इस प्रकार शंकराचार्य ने ज्ञान और भक्ति दोनों को मान्यता देकर भारतीय जन-मानस को व्यापक रूप से अपनी ओर आकर्षित किया। वर्तमान समय में भी हिन्दू-धर्म के प्रत्येक पक्ष पर शंकराचार्य की गहरी छाप है। शंकराचार्य के निधन के बाद उनके शिष्य शिवसोम ने काम्बुज देश (वर्तमान कम्बोडिया) में शंकर के अद्वैत मत का प्रचार किया।
जगद्गुरु शंकराचार्य का निधन
जगद्गुरु शंकराचार्य का निधन केवल 32 वर्ष की आयु में हुआ। उन्होंने केदारनाथ धाम में अपनी देह का त्याग किया। स्मार्त संप्रदाय में उन्हें शिव का अवतार माना जाता है। उन्हें आदिशंकराचार्य एवं जगत्गुरु भी कहा जाता है।
जगद्गुरु शंकराचार्य का दर्शन
शंकराचार्य का अद्वैतवाद
जगद्गुरु शंकराचार्य भारत के महान दार्शनिक एवं धर्म-प्रवर्तक थे। शंकराचार्य का दर्शन आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित है। इस दर्शन के अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों स्वरूपों में विद्यमान रहता है। उन्होंने अद्वैत वेदान्त को ठोस दार्शनिक आधार प्रदान किया तथा सनातन धर्म की विविध दार्शनिक धाराओं का एकीकरण किया।
उन्होंने अनुभव किया कि ज्ञान की अद्वैत भूमि पर जो परमात्मा निर्गुण निराकार ब्रह्म है, वही द्वैत की भूमि पर सगुण साकार है। उन्होंने निर्गुण और सगुण दोनों का समर्थन करके निर्गुण तक पहुँचने के लिए सगुण की उपासना को अपरिहार्य सीढ़ी माना। ज्ञान और भक्ति की मिलन भूमि पर यह भी अनुभव किया कि अद्वैत ज्ञान ही सभी साधनाओं की परम उपलब्धि है।
ब्रह्म का स्वरूप
शंकराचार्य का मानना था कि सृष्टि की ‘विविधता’ के मूल में ‘एकता’ विद्यमान है। अलग-अलग दिखाई देने वाली वस्तुएं एक ही सत्ता के विभिन्न रूप हैं। यह सत्ता अनन्त, सत्य और ज्ञान है। इसमें चैतन्य और आनन्द निहित है। यह देश, काल और अवस्था से परे है। इसे नाम, गुण और विशेषणों की सीमा में नहीं बांधा जा सकता। इसे ‘ब्रह्म’ कहते हैं।
‘ब्रह्म’ में निहित शक्ति के कारण इसके अनेक रूप दिखाई देते हैं। इस शक्ति का नाम ‘प्रकृति’ या ‘माया’ है। यह ब्रह्म में इस तरह है जैसे आग में जलाने की क्षमता किंतु इसे ब्रह्म का अंग नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ऐसा करने से ब्रह्म भी सीमित या परिवर्तनशील या नाशवान् मानना पड़ेगा जो कि उसके स्वरूप के विपरीत है। वह तो केवल ब्रह्म की एक शक्ति है जिससे वह एक होते हुए भी अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है। ये ब्रह्म के वास्तविक रूप नहीं है किंतु वास्तविक जैसे आभासित होते हैं। इन्हें ‘विवर्त’ कहा जाता है।
माया का अर्थ
शंकराचार्य ‘माया’ को ‘कारण’ या ‘शक्ति’ मानते हैं जिससे ब्रह्म के बहुत से अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं। अर्थात् इससे बहुगुणी विश्व के बनने, बढ़ने और बिगड़ने की क्रिया चलती है। इसे ‘अव्यक्त प्रकृति’ भी कहा जा सकता है जिससे व्यक्त संसार चलता है। दूसरे शब्दों में यह ‘माया’ प्रकृति का पर्याय है जो समस्त वस्तुओं को प्रकट करती है। माया के कारण यह सृष्टि परिवर्तनशील है। सारांश यह है कि ‘ब्रह्म’ एक होता हुआ भी ‘माया’ के कारण बहुत से रूपों में दिखाई देता है।
जगत् का स्वरूप
शंकराचार्य ने जगत् का स्वरूप बताते हुए लिखा है- ‘नामरूपाभ्यां व्यक्तस्य अनेककर्तृभोक्तृसंयुक्तस्य प्रतिनियत देशकालनिमित्तक्रियाफलाश्रयस्य मनसापि अचिन्त्यरचनारूपस्य जन्मस्थितिभंगंयतः।’
अर्थात्- नाम एवं रूप से व्यक्त, अनेक कर्ता, अनेक भोक्ता से संयुक्त, जिसमें देश, काल, निमित्त और क्रियाफल भी नियत हैं, जिस जगत् की सृष्टि की मन से भी कल्पना नहीं कर सकते, उस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा लय ब्रह्म से होती है।
जगद्गुरु शंकराचार्य ने एक स्थान पर लिखा है- रास्ते में पड़े चिथड़ों से बनी झोली या गुदड़ी से काम चला लिया, पुण्य-अपुण्य से परे विशेष जीवन-मार्ग अपना लिया, न मैं हूं, न तुम हो, न ही यह संसार है यह जान लिया, तब फिर किस बात शोक किया जाये।
ब्रह्म और जगत की अभिन्नता
माया के द्वारा हमें ब्रह्म के अनेक रूप दिखाई देते हैं तथा ये विभिन्न रूप ब्रह्म की एकता को ढक लेते हैं। इसे ‘आवरण’ कहते हैं और इसका नाम ‘विक्षेप’ है। इससे ऐसा लगने लगता है कि वे ही सत्य हैं। ब्रह्म अपने आप में एक, और समस्त रूपों से परे है किंतु ‘माया’ का आश्रय होने से उसे ‘ईश्वर’ कहा जाता है। माया के कारण ब्रह्म सूक्ष्म रूपों में दिखाई देता है। सूक्ष्म रूपों का आधार होने से ब्रह्म ‘हिरण्यगर्भ’ कहलाता है।
माया के कारण ब्रह्म स्थूल रूपों में भी दिखाई देता है। स्थूल रूपों का आधार होने से ब्रह्म ‘वैश्वानर’ कहलाता है। सूक्ष्म रूपों का आर्विभाव इस क्रम में होता है- आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। फिर इन पांचों का पांच तरह से मेल होता है, जिससे स्थूल रूप बनते हैं। जब आधे में आकाश और आधे में बाकी चारों रूप होते हैं तो स्थूल आकाश बनता है। जब आधे में वायु और आधे में बाकी चारों रूप होते हैं तो स्थूल वायु बनता है। इसी प्रकार स्थूल अग्नि, स्थूल जल और स्थूल पृथ्वी बनते हैं। इस क्रिया को ‘पंचीकरण’ कहते हैं।
जीव का स्वरूप
शंकराचार्य के अनुसार जीव ‘अज्ञान व्यष्टि की उपाधि’ से युक्त है। शंकराचार्य की दृष्टि में सम्पूर्ण जगत् के जीवों को ब्रह्म के रूप में स्वीकार करना चाहिए।
ब्रह्म परमार्थ सत्य व जगत व्यावहारिक सत्य
बहुत से दार्शनिक जगत को मिथ्या मानते हैं जिसका कोई अस्तित्त्व नहीं है। शंकराचार्य ऐसा नहीं मानते। वे कहते हैं कि ब्रह्म और जगत अभिन्न हैं, ब्रह्म परमार्थ रूप में सत्य है और जगत व्यावहारिक रूप में सत्य है। यह अवश्य है कि जगत् बिना ब्रह्म के सत्य नहीं है किंतु यह भी सत्य बात है कि जगत ब्रह्म का ही रूप है, और वह सत्य है।
इसलिए ब्रह्मसूत्र स्पष्ट कहता है कि जगत् असत् नहीं है। शंकराचार्य स्वयं लिखते हैं कि तरह-तरह के नामों और रूपों वाली चीजों की सत्ता है, यद्यपि वे अपने आप में पूरी न होने के कारण सत्य नहीं कही जा सकतीं क्योंकि सत्य से उस चीज का बोध होता है जो अपने आप में पूरी हो। जिस प्रकार भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों में ब्रह्म की सत्ता बनी रहती है, वैसे ही तीनों कालों में जगत भी बना रहता है।
अतः स्पष्ट है कि शंकर जगत को व्यावहारिक सत्य मानते हैं, केवल कल्पना नहीं समझते। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि परमार्थ की दृष्टि से विचार किया जाए तो ब्रह्म ही सत्य है, इसके अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं किन्तु यदि व्यावहारिक दृष्टि से विचार किया जाए तो जगत भी सत्य है। शंकर का मत है कि प्रत्येक कार्य, कारण का ही रूप है या उसकी अवस्था है। इसलिए जीव और जगत दोनों में ब्रह्म दिखाई देता है, जबकि दोनों उसके रूप हैं। दोनों में चैतन्य रहता है- जीव में व्यक्त रूप से एवं जगत में अव्यक्त रूप से।
अनन्त और सीमित ब्रह्म
ब्रह्म के विभिन्न रूप देश, काल, गुण और आकार की सीमाओं में बंधे हुए हैं। सामान्य तौर पर इन्हें परछाई की उपमा से समझाया जा सकता है। अर्थात् जल में जैसे चन्द्र की परछाई दिखाई देती है, उसी तरह संसार में जीव भी ब्रह्म की छायाएं हैं किंतु ऐसा मानने में कठिनाई यह है कि जैसे जल के हटने से उनमें दिखाई देने वाला चन्द्र समाप्त हो जाता है, इसी तरह अविद्या के हटने से संसार में दिखाई देने वाले जीव बिल्कुल नष्ट हो जाएंगे।
इससे बचने के लिए अद्वैतवादी एक दूसरी उपमा का सहारा लेते हैं। वे कहते हैं कि सर्वव्यापी आकाश घड़े की सीमाओं में बंधकर अलग-अलग जीवों और विषयों के रूप में प्रतीत होता है किंतु जब घड़ा फूट जाता है तो उसके अन्दर का आकाश बाहर का व्यापक आकाश बन जाता है। इसी तरह सीमाओं के समाप्त होने पर उनमें दिखाई देने वाला ब्रह्म अपने असली रूप में पहुंच जाता है। मुक्ति का यही अर्थ है कि मनुष्य सीमाओं का विचार छोड़़कर ब्रह्म को पहचाने। इस मत को ‘अवच्छेदनवाद’ कहते हैं।
मुक्ति
मुक्ति का अर्थ जगत् के परिवर्तनशील रूपों के पीछे ब्रह्म की एकता को पहचानना है। इसलिए ‘मुक्ति’ ज्ञान की अवस्था है और इसी जीवन में प्राप्त हो सकती है। मुक्ति पाकर भी मनुष्य जीवित रहता हुआ अपने दैनिक कर्म करता रह सकता है।
शंकर लिखते हैं कि व्यास, वसिष्ठ, भृगु, नारद आदि ऋषि मुक्ति के बाद भी अपने-अपने काम करते रहे। इसलिए मुक्ति का अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि जीवन समाप्त हो जाए अपितु इसका आशय यह है कि हम सही ज्ञान से जगत में इनके पीछे जो ब्रह्म मौजूद है उसे पहचानें। ऐसा करने से आसाक्ति, तृष्णा, और दुःख अपने आप नष्ट हो जाते हैं। वेदान्ती इसे ‘जीवन मुक्ति’ कहते हैं।
नैतिक आचरण पर बल
यह ज्ञान प्राप्त करने के लिए अच्छे आचरण की आवश्यकता है। जिन कर्मों से इसकी प्राप्ति में मदद मिलती है, वे पुण्य हैं और जिनसे इसमें बाधा पहुँचती है, वे पाप हैं। सत्य, अहिंसा, दया एवं परोपकार आदि पुण्यकर्म हैं और झूठ, हिंसा, अत्याचार आदि पाप हैं। पाप वही व्यक्ति करता है जो शरीर या इन्द्रिय को नित्य मानकर उसकी संतुष्टि की चेष्टा करता है। जो ऐसा नहीं मानता और इनके पीछे के ब्रह्म को जानता है, वह समस्त संसार को एक-समान समझता है।
उसके अन्दर सर्वात्मभाव होता है और मन में अपने-पराये का भेद नहीं रहता। वह स्वयं को औरों में एवं औरों को स्वयं में अनुभव करता है। इसलिए उसके हर कार्य में सच्चाई, अहिंसा और परोपकार का भाव होता है, उससे पाप हो ही नहीं सकता। इस प्रकार वेदान्त मनुष्य को उच्च नैतिक आचार की ओर ले जाता है, जिसका आधार विद्या और ज्ञान है।
क्या जगद्गुरु शंकराचार्य इस्लाम से प्रभावित थे?
यद्यपि शंकराचार्य के समय तक इस्लाम का जन्म नहीं हुआ था तथापि डॉ. ताराचन्द की पुस्तक ‘इन्फ्लुएन्स ऑफ इस्लाम ऑन इण्डियन कल्चर’ में लिखा है कि शंकराचार्य इस्लामी प्रभाव से आविर्भूत हुए।
प्रोफेसर हुमायँ कबीर ने हिन्दु-मुस्लिम एकता के उद्देश्य से ‘अवर हेरिटेज’ नामक पुस्तक लिखी। उनके अनुसार भी शंकर इस्लाम से प्रभावित थे।
उसके बाद के बहुत से लेखकों ने डॉ. ताराचन्द तथा हुमायँ कबीर को उद्धृत करते हुए इस सिद्धांत को बार-बार दोहराया।
इन लोगों द्वारा ऐसा कहने का आधार यह है कि इस्लाम और शंकर दोनों ही एकेश्वरवाद में विश्वास करते हैं। जबकि वे इस तथ्य को भूल जाते हैं कि इस्लाम के जन्म से हजारों साल पहले लिखे गए वेदों में अनेक देवताओं की पूजा किए जाने पर भी एक ही परम-सत्ता अथवा एक ही ब्रह्म अथवा एक ही विराट पुरुष का अस्तित्व स्वीकार किया गया है। वस्तुतः शंकर का ऐकेश्वरवाद भारतीय अद्वैतवाद का ही विकसित रूप है और उसका इस्लामी एकेश्वरवाद से कोई साम्य नहीं है।
हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षधर विद्वानों का कहना है कि इस्लाम ईश्वर को एक मानता है और विश्वास करता है कि सृष्टि की रचना ईश्वर ने की है, वह सातवें आकाश पर रहता है एवं उसके हृदय में भक्तों के लिए प्रेम और दुष्टों के लिए घृणा है। संसार असत्य है अर्थात् जो कुछ हम देखते हैं वह ‘कुछ नहीं में कुछ होने का आभास है’।
वास्तविकता यह है कि ये बातें इस्लाम में न तो पहले थीं और न अब हैं। यह सिद्धांत ईसा की नौवीं-दसवीं सदी के बाद सूफियों द्वारा प्रतिपादित किया गया। सूफियों को यह ज्ञान कुछ तो प्रत्यक्षतः ब्राह्मणों से और कुछ नव-अफलातूनी मत से मिला था। नव-अफलातूनी मत के प्रवर्त्तक प्लॉटिनस ने एकेश्वरवाद का सिद्धांत ब्राह्मणों और बौद्धों से प्राप्त किया था।
सूफियों के एकेश्वरवाद के सिद्धांत से अलग, शंकर का ब्रह्म, शुद्ध, बुद्ध, चैतन्य, निराकार और निर्विकार है। उसे भक्तों की चिन्ता नहीं है और न ही दुष्टों को दण्ड देने की चिंता है। शंकर के अनुसार, ईश्वर और जगत् दोनों ही सत् हैं किंतु जगत् का कारण भी ईश्वर ही है।
इस प्रकार शंकर का मत शुद्ध अद्वैत मत है किन्तु इस्लाम शुद्ध या विशिष्ट, किसी भी प्रकार के अद्वैतवाद में विश्वास नहीं करता। उसका विश्वास सिर्फ एक अल्लाह में है। सृष्टि के स्वभाव के विषय में भी कुरान का सिद्धांत शंकर के ठीक विपरीत है। अतः निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इस्लाम का एक अल्लाह का सिद्धांत, शंकर के अद्वैतवाद से बिल्कुल भिन्न है तथा शंकर पर इस्लाम का रंच मात्र भी प्रभाव नहीं है।
क्या जगद्गुरु शंकराचार्य प्रच्छन्न बौद्ध थे?
शंकराचार्य की दार्शनिक परम्परा की जड़ें उपनिषदों एवं ऋग्वेद के नासदीय-सूक्त तक पहुँचती हैं जिनमें जीवन और सृष्टि के विषय में मौलिक प्रश्न उठाये गए थे। उन्हीं प्रश्नों का समाधान खोजते-खोजते पहले उपनिषद, फिर बौद्ध दर्शन और अन्त में शंकर का सिद्धान्त प्रकट हुआ। शंकर के निकटतम वैचारिक-पूर्वज बौद्ध दार्शनिक थे जिन्होंने शून्यवाद की स्थापना की थी।
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जो बौद्धों का शून्यवाद था, वहीं शंकर का मायावाद हुआ। शंकर ने बौद्धों से आगे बढ़कर एक तटस्थ ब्रह्म को स्थान दिया जो कि उपनिषदों के युग से चला आ रहा था। शून्यवाद को मायावाद के नाम से अपनाने के कारण ही रूढ़िवादी हिन्दू, शंकर को ‘प्रच्छन्न बौद्ध’ कहते थे। शंकर ने ब्रह्म की कल्पना जिस रूप में की थी, वह भक्तों के लिए निराशाजनक थी, क्योंकि भक्तों की प्रार्थना सुनने के लिए इस ब्रह्म के कान की खिड़कियां खुली हुई नहीं थीं। इसीलिए शांकर-मत के विरूद्ध, तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई और बाद के लगभग समस्त आचार्य ईश्वर के सगुण-साकार स्वरूप की ओर मुड़े। जगद्गुरु शंकराचार्य के गुरु गोविन्दाचार्य अथवा गोविंद स्वामी थे और गोविन्दाचार्य के गुरु गौडपादाचार्य थे जिन्होंने माण्डूक्योपनिषद पर कारिका लिखी थी। इस कारिका के चतुर्थ प्रकरण के आरम्भ में उन्होंने बुद्ध की वन्दना की। संभवतः इस कारण भी कुछ रूढ़िवादी हिन्दू शंकर पर प्रच्छन्न बौद्ध होने का आरोप लगाने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते। शून्यवाद और मायावाद भारतीय दर्शन में उपनिषदों के युग से उपस्थित हैं। उनका ज्ञान यूनान तक भी पहुँच चुका था। बौद्ध दर्शन पर उपनिषदों के इन विचारों का प्रभाव था जिसके कारण ही बौद्धौं ने शून्यवाद का प्रतिपादन किया।
जगद्गुरु शंकराचार्य ने इससे सहमति व्यक्त की और इस कारण कहा जाने लगा कि शंकर के विचारों पर पांचवीं शताब्दी ईस्वी के बौद्ध-दार्शनिक वसुबन्धु का प्रभाव है और वे ‘प्रच्छन्न बौद्ध’ हैं।
यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि शंकर ने अनेक बौद्ध शास्त्रार्थियों को परास्त किया तथा प्रत्येक शास्त्रार्थ में बौद्ध दर्शन का खण्डन किया किंतु साथ ही बौद्धों के दर्शन की अच्छी बातें अपने दर्शन में सम्मिलित कीं जिससे बौद्ध धर्म की आवश्यकता ही समाप्त हो गई।
प्रसिद्ध दार्शनिक सुरेन्द्रनाथ दास ने भारतीय दर्शन परिषद के स्मारक ग्रन्थ में लिखा है कि नागार्जुन शून्यवादी थे। नागार्जुन का मानना था कि संसार में किसी भी वस्तु की सत्ता नहीं है। ‘कुछ नहीं में कुछ होने का भ्रम’ होता है। न तो कोई वस्तु उत्पन्न होती है, न नष्ट होती है।
लंकावतार-सूत्र का दर्शन यद्यपि विज्ञानवादी है तब भी वह नागार्जुन का ही दर्शन है। यह दर्शन भी मानता है कि हम जो कुछ देख रहे हैं, वह अपनी मानस-तरंग के कारण है। वस्तुतः बाह्य जगत से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। क्योंकि जगत सत्य है ही नहीं। इसी विचार को मैत्रैय और असंग ने आगे बढ़ाया तथा वसुबन्धु ने उसका विस्तार किया।
जगद्गुरु शंकराचार्य ने उपनिषदों का जो वेदान्ती भाष्य किया, उसकी नींव वसुबन्धु के दर्शन में डाली जा चुकी थी। शंकर ने ब्रह्म को ही एकमात्र सत्य मानते हुए भी जगत् की भी सत्ता स्वीकार की है तथा उसे व्यावहारिक सत्य माना है जो उन्हें बौद्धों के शून्यवाद से अलग करता है।
निष्कर्ष
उपरोक्त तथ्यों के आलोक में कहा जा सकता है किजगद्गुरु शंकराचार्य का मत अपने आप में पूर्ण स्वतंत्र है, उस दर्शन का आधार वेदांत अर्थात् उपनिषद हैं, न कि इस्लाम या बौद्ध धर्म। शंकर ने भारतीय संस्कृति, धर्म-दर्शन एवं अध्यात्म को जितना प्रभावित किया, उतना बहुत कम दार्शनिक कर पाए हैं। उन्होंने आने वाली सदियों के लिए हिन्दू-धर्म को पूरी तरह से बदल दिया। आने वाले युगों के दार्शनिक जगद्गुरु शंकराचार्य का खण्डन या मण्डन करके ही नए दार्शनिक सिद्धांतों का प्रतिपादन कर सकते थे।
अनुक्रमणिका – दिल्ली सल्तनत की दर्द भरी दास्तान पृष्ठ पर डॉ. मोहन लाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक दिल्ली सल्तनत की दर्द भरी दास्तानके अध्यायों का क्रम दिया गया है। नीचे दिए गए शीर्षकों को क्लिक करके सम्बन्धित अध्याय तक पहुंचा जा सकता है।
प्राक्कथन – दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक ‘दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान’ के अध्यायों के शीर्षक उपलब्ध कराए गए हैं। इन शीर्षकों पर क्लिक करके उन अध्यायों को पढ़ा जा सकता है।
भारत आदिकाल से हिन्दुओं का देश है। सृष्टिकर्ता ने इस देश को प्राकृतिक सम्पदा, मेधा एवं संस्कृति की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध बनाया है। जिस समय संसार के अधिकांश देश मानव-सभ्यता की आदिम अवस्थाओं में जी रहे थे, भारत भूमि पर भव्य नगरों, गगनचुम्बी प्रासादों, विशाल यज्ञशालाओं एवं राजपथों का निर्माण हो चुका था और वेदों एवं उपनिषदों से लेकर रामायण एवं महाभारत जैसे महाकाव्यों की रचना हो चुकी थी।
उस काल में भारत की सामाजिक रचना संसार भर में श्रेष्ठ थी जिसके कारण प्रजा सम्पन्न एवं सुखी थी। लोगों का जीवन सरल था और वे परिश्रमी एवं आमोद-प्रिय थे।
प्रकृति ने भारत को पूर्व में बंगाल की खाड़ी, दक्षिण में हिन्द महासागर, पश्चिम में अरब की खाड़ी, उत्तर-पश्चिम में हिन्दुकुश पर्वत एवं उत्तर में हिमालय पर्वतमाला खड़ी करके एक अद्भुत सुरक्षा-चक्र का निर्माण किया था किंतु भारत की भौतिक सम्पदा की कहानियाँ दूर-दूर तक व्याप्त हो जाने से दूरस्थ देशों के लोग भारत को लूटने के लिए लालायित रहने लगे। यही कारण था कि ईसा के जन्म से सैंकड़ों साल पहले पश्चिमी आक्रांताओं ने हिन्दुकुश पर्वत को पार करके भारत पर आक्रमण करने आरम्भ कर दिए।
इन आक्रांताओं में यूनानी, शक, कुषाण, हूण, पह्ल्लव, बैक्ट्रियन आदि प्रमुख थे। इन आक्रांता-जातियों ने थलमार्ग से हजारों मील की यात्राएं करके भारत पर आक्रमण किए और विभिन्न कालखण्डों में न केवल भारत की अतुल सम्पदा को लूटने में सफल हुए अपितु भारत के विभिन्न प्रदेशों पर अधिकार जमाने में भी सफल रहे किंतु भारत की उदार सामाजिक व्यवस्था एवं शत्रु के प्रति भी सहिष्णु रहने वाली संस्कृति ने सैंकड़ों साल की अवधि में इन विदेशी आक्रांताओं को भारतीय बनाकर आत्मसात कर लिया। इस कारण भारतीय समाज की शांति बनी रही।
चौथी शताब्दी ईस्वी से लेकर छठी शताब्दी ईस्वी तक के कालखण्ड में जो हूण कबीले भारत पर आक्रमण किया करते थे और जिन्हें गुप्त शासकों ने भारत से मार भगाया था, उन्हीं हूण कबीलों में से एक कबीला छठी शताब्दी ईस्वी के आसपास तुर्क कहलाने लगा तथा कई शाखाओं में बंट गया। जब सातवीं शताब्दी ईस्वी में इस्लाम का उदय हुआ तो ये तुर्क, इस्लाम का विरोध करने लगे किंतु नौंवी शताब्दी के आते-आते तुर्कों ने अरब के मुसलमानों की सेनाओं में भर्ती होना तथा इस्लाम स्वीकार करना आरम्भ कर दिया।
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जब मध्यएशिया में इस्लाम का प्रसार हो गया तो अरब, तुर्क एवं अफगान जातियां नए उद्देश्यों के साथ भारत पर आक्रमण करने को लालायित हुईं- (1) वे भारत की सम्पदा को लूटना चाहते थे। (2) वे भारत के लोगों को पकड़कर गुलामों के रूप में बेचना चाहते थे। (3) वे भारत में इस्लाम का प्रसार करना चाहते थे। (4) वे भारत में अपने राज्य स्थापित करना चाहते थे। ई.712 में भारत पर इस्लाम का पहला आक्रमण अरबी मुसलमानों द्वारा किया गया था। उसके बाद ई.977 से लेकर ई.1192 तक अर्थात् पूरे 215 साल की दीर्घ अवधि तक अनेक तुर्की एवं अफगान कबीले उत्तरी भारत पर आक्रमण करते रहे। वे विशाल सेनाएं लेकर भारत में घुस आते और यहाँ की सम्पदा लूटकर तथा मनुष्यों एवं पशुओं को लेकर भाग जाते। ई.1192 में एक तुर्की कबीला भारत में अपना राज्य स्थापित करने में सफल रहा। ई.1192 से ई.1526 तक अर्थात् पूरे 334 साल तक मध्य-एशिया एवं अफगानिस्तान से के विभिन्न तुर्की कबीलों ने पश्चिम में हिन्दुकुश पर्वत से लेकर पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक तथा उत्तर में हिमालय की तराई से लेकर दक्षिण में हिन्दमहासागर तक छोटे-बड़े कई राज्य स्थापित कर लिए जिनमें सबसे बड़ा एवं सबसे प्रमुख राज्य ‘दिल्ली’ सल्तनत के नाम से विख्यात था।
इस पुस्तक में ई.622 में इस्लाम के उदय से लेकर, भारत में तुर्की आक्रमणों की बाढ़, ई.1192 में दिल्ली सल्तनत की स्थापना एवं ई.1526 में दिल्ली सल्तनत के अवसान तक का इतिहास लिखा गया है। इस पुस्तक का लेखन यूट्यूब चैनल ‘ग्लिम्प्स ऑफ इण्डियन हिस्ट्री बाई डॉ. मोहनलाल गुप्ता’ पर प्रसारित ‘दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान’ नामक लोकप्रिय वी-ब्लॉग धारावाहिक के लिए किया गया था। इस धारावाहिक की कड़ियां यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं।
भारत में तुर्कों के आगमन एवं तुर्की सल्तनत के इतिहास की वे छोटी-छोटी हजारों बातें जो आधुनिक भारत के कतिपय षड़यंत्रकारी इतिहासकारों द्वारा इतिहास की पुस्तकों का हिस्सा बनने से रोक दी गईं किंतु तत्कालीन दस्तावेजों, पुस्तकों एवं विदेशी यात्रियों के वर्णनों में उपलब्ध हैं, इस धारवाहिक के माध्यम से देश-विदेश में रह रहे लाखों हिन्दीभाषी दर्शकों तक पहुंचीं।
बहुत से दर्शकों की मांग थी कि इस धारवाहिक की कड़ियों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाया जाए। उन दर्शकों की भावनाओं का सम्मान करते हुए, मैं इस धारावाहिक की कड़ियों को मुद्रित पुस्तक के रूप में आप सबके हाथों में सौंप रहा हूँ। शुभम्।
लालकिले की दर्दभरी दास्तान -अनुक्रमणिका पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक ‘लालकिले की दर्दभरी दास्तान -अनुक्रमणिका’ (The Tragic History of the Red Fort) के अध्यायों के शीर्षक उपलब्ध कराए गए हैं। इन शीर्षकों पर क्लिक करके उन अध्यायों को पढ़ा जा सकता है। इसपुस्तक में Shahjahan से लेकर भारत की आजादी तक मुगलों का संक्षिप्त इतिहास (History of Mughals) प्रस्तुत किया गया है।
सनातन धर्म दुनिया का एकमात्र ऐसा धर्म है जो किसी पुस्तक के आधार पर अस्तित्व में नहीं आया। जब बाइबिल एवं कुरान लिखी गईं तो दुनिया में पुस्तकों के आधार पर चलने वो मजहब अस्तित्व में आए। किताबें लिखे जाने से पहले सनातन धर्म को मानती थी पूरी दुनिया!
मध्य एशिया से आए तुर्की कबीलों ने ई.1192 से ई.1526 तक भारत के बहुत बड़े भूभाग पर शासन किया जिसे दिल्ली सल्तनत (Delhi Sultanate) कहा जाता है। दिल्ली सल्तनत के सुल्तान किसी एक वंश या एक कबीले से सम्बन्ध नहीं रखते थे। वे अलग-अलग देशों से आए थे। वे अलग-अलग कबीलों में पैदा हुए थे, उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमियाँ भी अलग-अलग थीं। फिर भी वे सभी तुर्क थे।
उनके राज्य को परवर्ती मुगल सल्तनत (Mughal Sultanate) से अलग करने के लिए दिल्ली सल्तनत (Delhi Sultanate) कहा जाता है। दिल्ली सल्तनत के लगभग सभी सुल्तान परम दुर्भाग्यशाली थे। उन्हें भारत-भूमि पर कभी सुख-शांति की नींद उपलब्ध नहीं हुई। उनके महलों की सीढ़ियों से लेकर उनके सिंहासन तक हर समय खून से भीगे रहते थे।
उन सुल्तानों की सच्चाइयां उस काल में लिखी गई अनेक पुस्तकों में अंकित हुईं जिनमें से अधिकांश पुस्तकें या तो काल के गाल में समा गईं, या अंग्रेजों द्वारा इंग्लैण्ड ले जाई गईं, जो थोड़ी बहुत बचीं, उन्हें भी स्वतंत्र भारत में, राजनीतिक कारणों से स्कूली एवं महाविद्यालय पाठ्यक्रमों से बाहर रखा गया। इस वी-ब्लॉग-सीरीज में हम उन दुर्भाग्यशाली सुल्तानों द्वारा भारत की भूमि पर किए गए अत्याचारों की एक झलक दिखाने का प्रयास करेंगे। दिल्ली सल्तनत (Delhi Sultanate) के इतिहास की कहानी आरम्भ करने से पहले हमें इतिहास की मजहबी पृष्ठभूमि में जाना पड़ेगा।
आज धरती पर लगभग आठ सौ करोड़ लोग रहते हैं। इनमें से 14 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो किसी धर्म, मजहब अथवा सम्प्रदाय को नहीं मानते। संसार के 86 प्रतिशत मनुष्य किसी न किसी प्रकार की धार्मिक आस्था से जुड़े हुए हैं। एक अनुमान के अनुसार दुनिया में लगभग साढ़े चार हजार धर्म, मजहब, सम्प्रदाय एवं धार्मिक मत हैं। फिर भी दुनिया की छियत्तर प्रतिशत जनसंख्या केवल चार धर्मों में सिमट जाती है। संसार की जनसंख्या का 31 प्रतिशत हिस्सा ईसाई, 23 प्रतिशत हिस्सा मुसलमान, 15 प्रतिशत हिस्सा हिन्दू तथा 7 प्रतिशत हिस्सा बौद्ध है।
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एक समय ऐसा भी था जब पूरी दुनिया में केवल सनातन धर्म (Sanatan Dharm) ही विद्यमान था। इस धर्म के नियम किसी ने गढ़े नहीं थे। इसके नियम किसी ने निर्धारित नहीं किए थे। सनातन धर्म के विविध रूप सहज रूप से मानव-सभ्यता में प्रचलित हुए। संसार की प्राचीनतम संस्कृतियां भारत (India), चीन (China), सुमेरिया (Sumeria), माया (Maya), मिस्र (Egypt), यूनान (Greece), बेबीलोनिया (Babylonia) तथा रोम (Rome) आदि में विकसित हुईं। ये सभी संस्कृतियां विभिन्न देवी-देवताओं में आस्था रखती थीं तथा उनकी मूर्तियां बनाकर उन्हें पूजती थीं। प्रत्येक देवी-देवता किसी ने किसी प्राकृतिक शक्ति का स्वामी था। आज अरब के जिस रेगिस्तान में मक्का और मदीना स्थित हैं, वहाँ भी हजारों सालों तक मूर्तिपूजक धर्म को मानने वाले मनुष्यों का निवास था।
संसार भर के लोग उस काल में लगभग एक ही तरह का धर्म मानते थे, एक ऐसा धर्म जिसके नियम कहीं लिखे हुए नहीं थे। सबसे पहले भारत की भूमि पर वेदों ने पुस्तकों के रूप में आकार लिया किंतु वेदों में केवल ईश्वरीय स्तुतियां लिखी गई थीं। ये पुस्तकें हजारों सालों तक मौखिक रूप में रहीं। उन्हें कहीं लिखा नहीं गया था। फिर भी उनके मंत्र निश्चित थे तथा उनमें निहित भावनाएं विशिष्ट थीं। धीरे-धीरे वेदों ने पुस्तकों के रूप में आकार लेना आरम्भ किया और वे ताड़पत्रों पर लिख लिए गए।
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जिन लोगों तक ये वेद पहुंचे, वे इन्हें ईश्वरीय-वाणी (Voice of God) समझकर मानते रहे। ईश्वरीय-वाणी तथा मनुष्य जाति के बीच केवल आस्था का सम्बन्ध था जहाँ मनुष्य स्वयं को प्रत्येक बंधन से मुक्त समझता है। यही कारण था कि वेदों को मानने वालों ने युगों से चले आ रहे सनातन धर्म (Sanatan Dharm) में कोई बदलाव नहीं किए, न उन्होंने वैदिक धर्म के कोई निश्चित नियम बनाए। उनकी जीवनपद्धति, नैतिकता एवं सदाचार ही उनका धर्म था। ईश्वर से उनका केवल आस्था का सम्बन्ध था, उनमें किसी तरह के नियमों का बंधन नहीं था। वेदों की रचना के हजारों साल बाद तथा आज से लगभग तीन हजार तीन सौ साल पहले यूरोप की धरती पर ‘ओल्ड टेस्टामेंट्स’ की रचना हुई तथा आज से लगभग दो हजार साल पहले ‘न्यू टेस्टामेंट्स’ लिखे गए। कुछ समय बाद इन दोनों टेस्टामेंट्स को मिलाकर ‘बाइबिल’ बनाई गई। यह संसार की पहली पुस्तक थी जिसने धर्म के लिए कुछ निश्चित नियम बनाए। बाइबिल में विश्वास रखने वाले ‘ईसाई’ कहलाए। आज से लगभग चौदह सौ साल पहले अरब की धरती पर एक और किताब लिखी गई जिसे ‘कुरान’ कहा जाता है। यह दुनिया की दूसरी ऐसी पुस्तक थी जिसने अपने अनुयाइयों के लिए विशिष्ट प्रकार के धार्मिक नियम निर्धारित किए। इसके अनुयाइयों को ‘मुसलमान’ कहा गया।
भारत के प्राचीन निवासी स्वयं को आर्य कहते थे, वे ‘हिन्दू’ शब्द से परिचित नहीं थे किंतु ईसा के जन्म से सैंकड़ों साल पहले पश्चिम दिशा से भारत आने वाले यूनानी आक्रांताओं ने सिंधु नदी को ‘इण्डस’ कहकर पुकारा। इसी इण्डस (Indus) के आधार पर उन्होंने भारत को ‘इण्डिया’ तथा भारतीयों को ‘इण्डियन’ कहा। ‘सिन्धु’ नदी के किनारे रहने के कारण ही भारत के लोग ‘सिन्धु’ (Sindhu) और ‘हिन्दू’ (Hindu) कहलाए।
भारत संसार की सबसे प्राचीन सभ्यता वाला एवं हजारों साल पुराना देश है जिसका निर्माण प्रकृति या राजनीति की सीमाओं से नहीं अपितु संस्कृति की सीमाओं से हुआ था। सुदूर पूर्व से लेकर पश्चिम में धरती के जिस छोर तक वेदों की ऋचायें (Verses of the Vedas) गूंजती थीं तथा ‘सुरों’ अर्थात् देवताओं की पूजा होती थी, वहाँ तक सांस्कृतिक भारत की सीमायें लगती थीं। भारत की पश्चिमी सीमा के पार रहने वाले लोग ‘असुरों’ की पूजा करते थे और ‘अहुरमज्दा’ (Ahura Mazda) पढ़ते थे। उस प्रदेश के एक छोटे से हिस्से को आज भी असीरिया कहा जाता है जो वस्तुतः ‘असुरों के देश’ (Land of Demons) की ओर संकेत करता है।
कहने का सार यह कि बाइबिल (Bible) और कुरान (Koran) के अस्तित्व में आने से पहले समूचे संसार में मूर्तियों को पूजने वाले लोगों का निवास था और सनातन धर्म (Sanatan Dharm) ही एक मात्र धर्म था। इसे मानने वाले लोग विभिन्न प्रकार के देवताओं की मूर्तियां एवं प्रतीक बनाकर उनकी पूजा करते थे। तब न कोई हिन्दू था, न मुसलमान था, न सिक्ख था, न ईसाई था। सभी लोग बस मानव थे जो किसी अदृश्य ईश्वरीय शक्ति में आस्था रखते थे। इस आस्था के रूप अलग-अलग थे।
उस काल में भारतीय ऋषियों द्वारा वेदों के रूप में खोजा गया विज्ञान मिस्र और यूनान होते हुए रोम (Rome) तक जा पहुंचा था। स्थानीय भाषाओं के कारण भारत से लेकर अरब, ग्रीक तथा रोम में मिलने वाले देवी-देवताओं के नाम भले ही अलग-अलग हो गए थे किंतु विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों के प्रतीक होने के कारण उन देवी-देवताओं के स्वभाव एवं प्रभाव एक जैसे थे। जहाँ कहीं भी देवी-देवताओं की पूजा होती थी, वहाँ-वहाँ उनके मंदिर भी थे।
इस पुस्तक में भारत के अत्यंत प्राचीन एवं चंद्रवंष नाम से विख्यात कुल में उत्पन्न चंद्रवंशी राजाओं की कथाएँ लिखी गई हैं। साथ ही उनके पौराणिक एवं वैज्ञानिक संदर्भों का भी उल्लेख किया गया है।
अरब रेगिस्तान में भी पूजे जाते थे भारतीय देवी-देवता
जिस प्रकार हिमालय से लेकर समुद्र तक वैदिक देवी-देवताओं की पूजा होती थी, उसी प्रकार अरब रेगिस्तान (Arabian Desert) में भी पूजे जाते थे भारतीय देवी-देवता! उस काल में रोम एवं यूनान में भी वैदिक देवी-देवताओं की पूजा होती थी।
एशिया महाद्वीप के निम्न-मध्य-पूर्व भाग में स्थित एक प्रायद्वीप ‘अरब’ कहलाता है। इसके दक्षिण में अदन की खाड़ी, पश्चिम में लालसागर और पूर्व में फारस की खाड़ी स्थित है। इस कारण इस क्षेत्र के निवासी प्राचीन काल से कुशल नाविक रहे हैं और उनकी विदेशों से व्यापार करने में रुचि रही है।
अरब की मुख्य भूमि एक विशाल रेगिस्तान के रूप में स्थित है परन्तु उसके बीच-बीच में उपजाऊ भूमि भी है जहाँ पानी मिल जाता है। इन्हीं उपजाऊ स्थानों में इस देश के लोग निवास करते थे। ये लोग परम्परागत रूप से कबीले बनाकर रहते थे। प्रत्येक कबीले का एक सरदार होता था।
इन लोगों की अपने कबीले के प्रति बड़ी भक्ति होती थी और ये उसके लिए अपना सर्वस्व निछावर करने के लिए तैयार रहते थे। ये लोग तम्बुओं में निवास करते थे और खानाबदोशों का जीवन व्यतीत करते थे। ये लोग एक स्थान से दूसरे स्थान में घूमा करते थे और लूट-खसोट करके पेट भरते थे। ऊँट उनकी मुख्य सवारी थी और खजूर उनका मुख्य भोजन था। ये लोग बड़े लड़ाके होते थे।
अरब रेगिस्तान (Arabian Desert) में इस्लाम का उदय होने से पहले, अरबवासियों के भी धार्मिक विचार प्राचीन काल के हिन्दुओं के समान थे। वे भी हिन्दुओं की भाँति मूर्ति-पूजक थे और उनका अनेक देवी-देवताओं में विश्वास था। जिस प्रकार हिन्दू लोग कुल-देवता, ग्राम-देवता आदि में विश्वास करते थे, उसी प्रकार अरबवासियों के प्रत्येक कबीले का एक देवता होता था, जो उनकी रक्षा करता था।
उस काल में अरब रेगिस्तान (Arabian Desert) में रहने वाले जनजातीय कबीलों में देवी-देवताओं को जनजातियों के संरक्षक के रूप में देखा जाता था। अरबवासियों का मानना था कि देवी-देवताओं की आत्मा पवित्र पेड़ों, पत्थरों, झरनों और कुओं से जुड़ी हुई थी।
ठीक उसी प्रकार आज भी हिन्दू मानते हैं कि वृक्षों, नदियों, पहाड़ों और बावलियों में देवी-देवता निवास करते हैं। अरबवासी आज के हिन्दुओं की तरह भूत-प्रेतों में भी विश्वास करते थे। उनकी धारणा थी कि भूत-प्रेत वृक्षों तथा पत्थरों में निवास करते हैं और मनुष्य को विभिन्न प्रकार के कष्ट देने की शक्ति रखते हैं।
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अरब रेगिस्तान (Arabian Desert) में मक्का (Mecca) नामक एक प्राचीन कस्बा था जहाँ हजारों साल पुराना एक मंदिर हुआ करता था। इसे काबा (Kaaba) का मंदिर कहा जाता था। इस मंदिर में जनजातीय संरक्षक देवी-देवताओं की 360 मूर्तियां थीं। इनमें से तीन देवियां अल्लाह के साथ उनकी बेटियों के रूप में जुड़ी हुई थीं। उन्हें अल्लात (Al-Lat), मनात (Manat) और अल-उज्जा (Al-Uzza) कहा जाता था। अरब के रेगिस्तान में रहने वाले लोग इन 360 मूर्तियों की पूजा करने के लिए साल में कम से कम एक बार अवश्य ही मक्का आया करते थे।
काबा में अत्यंत प्राचीन काल से एक काला पत्थर मौजूद है। अरबवासियों का विश्वास था कि इस पत्थर को अल्लाह ने आसमान से गिरा दिया था। इसलिए वे इस पत्थर को बड़ा पवित्र मानते थे और इसके दर्शन तथा पूजन के लिए काबा जाया करते थे। बहुत से वैज्ञानिकों की धारणा है कि यह पत्थर उल्कापिण्ड के रूप में धरती पर गिरा था। काबा के इस काले पत्थर को आज भी इस्लाम के अनुयाइयों में आदर की दृष्टि से देखा जाता है।
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काबा की रक्षा का भार कुरेश नामक कबीले (Quraysh Tribe) के ऊपर था। इसी कुरेश कबीले में ई.570 में मुहम्मद (Muhammad) नामक एक बालक का जन्म हुआ जिसने आगे चलकर अरब की प्राचीन धार्मिक व्यवस्था के विरुद्ध बहुत बड़ी क्रान्ति की और एक नए मत को जन्म दिया, जो इस्लाम के नाम से जाना गया। जब हजरत मुहम्मद 40 साल के हुए तो उन्होंने एक गुफा में फरिश्ता जिबराइल (Gabriel) से भेंट की तथा उन्हें अल्लाह से पहला इल्हाम प्राप्त हुआ। यह संदेश इस प्रकार से था- ‘अल्लाह का नाम लो, जिसने सब वस्तुओं की रचना की है।’ मान्यता है कि पैगम्बर मुहम्मद को प्रत्यक्ष रूप में अल्लाह के दर्शन हुए और यह संदेश मिला- ‘अल्लाह के अतिरिक्त कोई दूसरा ईश्वर नहीं है और मुहम्मद उसका पैगम्बर है।’ हजरत मुहम्मद (Muhammad) को जिब्राइल के माध्यम से कुरान प्राप्त हुई जो अल्लाह की तरफ से दी गई थी। हजरत मुहम्मद ने अरब के लोगों को उस इल्हाम के रहस्य बताने आरम्भ किए जो उन्हें अल्लाह की तरफ से प्राप्त हुआ था। इस प्रकार संसार में एक नया मजहब स्थापित हुआ जिसे इस्लाम कहते थे। ई.622 में जब मक्का (Mecca) के प्रभावशाली लोगों को लगा कि आम जनता हजरत मुहम्मद की बातों को पसंद करती है तो उन प्रभावशाली लोगों ने हजरत मुहम्मद को मक्का से बाहर निकाल दिया।
इस पर हजरत मुहम्मद अरब रेगिस्तान (Arabian Desert) में स्थित मदीना नामक कस्बे में चले गए। वहाँ उन्होंने एक सेना संगठित करके मक्का पर आक्रमण किया। इसी के साथ इस्लाम को सैन्य स्वरूप भी प्राप्त हो गया।
इस घटना के बाद हजरत मुहम्मद (Muhammad) न केवल इस्लाम के प्रधान स्वीकार कर लिए गए वरन् वे राजनीति के भी प्रधान बन गए और उनके निर्णय सर्वमान्य हो गए। इस प्रकार हजरत मुहम्मद के जीवन काल में इस्लाम तथा राज्य के अध्यक्ष का पद एक ही व्यक्ति में संयुक्त हो गया।
अरब में इस्लाम का प्रचार हो जाने के बाद अरब रेगिस्तान (Arabian Desert) में स्थित सैंकड़ों मंदिरों को तोड़ दिया गया तथा देव-मूर्तियों को कुफ्र मानकर हटा दिया गया। मस्जिदों का निर्माण करके उनमें अजान दी जाने लगी तथा नमाज पढ़ी जाने लगी। बहुत से लोग मानते हैं कि इस्लाम का उदय केवल धार्मिक आंदोलन नहीं था अपितु वह एक सैनिक एवं राजनीतिक आंदोलन भी था। हज़रत मुहम्मद (Muhammad) के जीवनकाल में अरब प्रायद्वीप के अधिकांश भू-भाग पर इस्लाम का वर्चस्व हो गया। 8 जून 632 को हजरत मुहम्मद का देहांत हो गया।
जेहाद और इस्लाम का नाता बहुत गहरा है। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू प्रतीत होते हैं! जेहाद (Jihad) ने इस्लाम (Islam) को धरती के कौने-कौने तक पहुंचा दिया
ईस्वी 632 में हजरत मुहम्मद (Hazrat Muhammad) का निधन होने तक लगभग सम्पूर्ण अरब प्रायद्वीप पर इस्लाम का प्रचार हो गया था। हजरत मुहम्मद की मृत्यु के बाद उनके ससुर अबूबक्र अथवा अबूबकर को हजरत मुहम्मद का उत्तराधिकारी चुना गया। इन उत्तराधिकारियों को खलीफा कहा गया। इस प्रकार अबूबक्र मुसलमानों के पहले खलीफा हुए।
खलीफाओं के समय में भी इस्लाम तथा राजनीति में अटूट सम्बन्ध बना रहा क्योंकि खलीफा भी इस्लाम तथा राज्य दोनों के प्रधान होते थे। उनके राज्य का शासन कुरान के अनुसार होता था। इससे राज्य में मुल्ला-मौलवियों का प्रभाव बढ़ा। ये मुल्ला-मौलवी लोगों को कुरान के सिद्धांतों के बारे में बताते थे किंतु धार्मिक नेता के रूप में भी खलीफा का आदेश उसी तरह सर्वोच्च होता था, जिस तरह उसका आदेश सैनिक एवं राजनीतिक मामलों में सर्वोच्च होता था।
हजरत मुहम्मद (Hazrat Muhammad) के उत्तराधिकारियों को खलीफा (Khalifa) कहा गया। हजरत मुहम्मद के ससुर अबूबक्र (Abu Bakar) को पहला खलीफा बनाया गया जो कुटम्ब में सर्वाधिक बूढ़े थे। अबूबक्र के प्रयासों से मेसोपोटमिया तथा सीरिया में इस्लाम धर्म का प्रचार हुआ। अबूबक्र की मृत्यु होने पर ईस्वी 634 में उमर (Khalifa Umar) को खलीफा चुना गया।
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उमर ने इस्लाम के प्रचार में जितनी सफलता प्राप्त की उतनी सम्भवतः अन्य किसी खलीफा (Khalifa) ने नहीं की। उस्मान इब्न अफ्फान को तीसरा और अली इब्नू अबू तालिब को चौथा खलीफा बनाया गया। पहले चार खलीफा, हजरत मुहम्मद के साथी रहे थे। इसलिए उन्हें खलीफाओं की परम्परा में विशिष्ट माना जाता है। खलीफाओं की परम्परा हजरत मुहम्मद के साथियों के बाद भी चलती रही।
खलीफाओं के नेतृत्व में अरबवासियों ने इस्लाम के प्रसार के साथ-साथ राजनीतिक विजय का अभियान शुरू किया। खलीफाओं ने धार्मिक असहिष्णुता की नीति का अनुसरण किया जिसके फलस्वरूप अन्य धर्म वालों को इस्लामिक राज्य का नागरिक नहीं समझा गया।
खलीफा उमर (Khalifa Umar) ने अपने शासनकाल में इस्लाम के अनुयाइयों को प्रबल सैनिक संगठन में परिवर्तित कर दिया। जहाँ कहीं खलीफा की सेनाएं गईं, वहाँ पर इस्लाम का प्रचार किया गया। यह प्रचार उपदेशकों द्वारा नहीं वरन् सुल्तानों और सैनिकों द्वारा तलवार के बल पर किया गया जिसे ‘जेहाद’ कहा गया। जिहादी सेनाएँ जहाँ कहीं भी गईं, वहाँ की धरा रक्त-रंजित हो गई।
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ईस्वी 680 में हजरत मुहम्मद (Hazrat Muhammad) के अनुयाइयों में परस्पर संघर्ष हुआ जिसे करबला का युद्ध (Battle of Karbala) कहा जाता है। इसके बाद हजरत मुहम्मद के अनुयाई ‘शिया’ और ‘सुन्नी’ नामक दो सम्प्रदायों में बंट गए किंतु जेहाद के माध्यम से इस्लाम के प्रचार का काम बिना किसी बड़ी बाधा के चलता रहा। खलीफा के सेनापति अपने शत्रु पर युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए ‘जेहाद’ (Jihad) का नारा लगाते थे। जेहादियों का मानना है कि इस्लाम (Islam) का एक निर्देश इस्लाम की खातिर जिहाद से सम्बन्ध रखता है जिसका आशय पवित्र युद्ध एवं धर्मयुद्ध से है। इसका व्यावहारिक अर्थ बुत-परस्ती करने वालों एवं इस्लाम को न मानने वालों को इस्लाम का अनुयाई बनाने से है। यद्यपि कुरान ‘किताबवालों’ अर्थात् यहूदियों और ईसाईयों के प्रति थोड़ी उदार है। फिर भी कुरान में उन ‘किताबवालों’ के साथ लड़ने का आदेश है जो अल्लाह को नहीं मानते और इस्लाम के आगे नहीं झुकते। चूंकि बहुत से लोग इस्लाम को स्वीकार करने से मना कर देते थे इसलिए जेहाद (Jihad) प्रायः भयंकर रूप धारण कर लेता था जिससे दानवता ताण्डव करने लगती थी और मजहब के नाम पर घनघोर अमानवीय कार्य किए जाते थे। इस कारण जेहादी सेनाएं जिस भी देश में गईं, उस देश के समक्ष नई चुनौतियां खड़ी हो गईं।
फिर भी जेहाद (Jihad) जीतता रहा और आगे बढ़ता रहा। देखते ही देखते भूमध्यसागरीय देशों- सीरिया, फिलीस्तीन, दमिश्क, साइप्रस, क्रीट, मिस्र (Syria, Palestine, Damascus, Cyprus, Crete, Egypt) आदि देशों पर अधिकार कर लिया गया। इसके बाद फारस को इस्लाम की अधीनता में लाया गया जिसे अब ईरान कहा जाता है।
फारस के बाद उत्तरी अफ्रीका के नव-मुस्लिमों और अरबों ने स्पेन में प्रवेश किया। स्पेन तथा पुर्तगाल जीतने के बाद खलीफा (Khalifa) की सेनाओं ने फ्रांस में प्रवेश किया परन्तु ई.732 में फ्रांसिसियों ने चार्ल्स मार्टेल के नेतृत्व में ‘तुर्स के युद्ध’ में खलीफा की सेना को परास्त कर उसे पुनः स्पेन में धकेल दिया जहाँ ई.1492 तक उनका शासन रहा।
इसके बाद उन्हें स्पेन से भी हटाना पड़ा। अरबों ने पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी कुस्तुन्तुनिया पर भीषण आक्रमण किए। 15वीं सदी में ओटोमन तुर्कों ने कुस्तुन्तुनिया को जीतकर इस कार्य को पूरा किया। उधर फारस को जीतने के बाद अरबों ने बुखारा और समरकन्द पर अधिकार कर लिया। मध्यएशिया पर उन्होंने पूर्ण प्रभुत्व स्थापित किया।
यद्यपि लगभग पूरे संसार में इस्लाम का प्रवेश जेहादी सेनाओं के माध्यम से हुआ तथापि भारत में इस्लाम का पहला प्रवेश जेहादी सेनाओं (Jihadi Army) के माध्यम से नहीं होकर व्यापारियों के माध्यम से हुआ। अरब क्षेत्र में रहने वाले व्यापारी अपने बड़े-बड़े काफिलों के साथ सदियों से भारत में आकर व्यापार किया करते थे।
वे अरब देश में पैदा होने वाले खजूर, ऊंट, जैतून आदि लेकर भारत आते थे और भारत से मसाले, कपास तथा अनाज लेकर जाते थे। जब अरब में इस्लाम का प्रसार हुआ तो इन्हीं अरब व्यापारियों के साथ सातवीं शताब्दी में इस्लाम ने भारत में प्रवेश किया।
अरब के ये व्यापारी प्रायः भारत के दक्षिण-पश्चिमी समुद्र तटीय क्षेत्र में आया करते थे। इन्हीं में से कुछ अरब व्यापारी दक्षिण भारत के मलाबार तथा अन्य स्थानों पर स्थायी रूप से बस गए। इन अरब व्यापारियों ने दक्षिण भारत में व्यापार करने के साथ-साथ बहुत सीमित मात्रा में इस्लाम का प्रचार भी किया। इस कारण दक्षिण भारत के कुछ लोगों ने इस्लाम स्वीकार कर लिया किंतु भारत में इस्लाम (Islam) का यह प्रभाव बहुत ही सीमित था।
ई.750 में खलीफाओं ने बगदाद को अपनी राजधानी बनाया। इस समय तक अरबवासियों का खलीफा राज्य (Khalifa Ki sultanate) स्पेन से उत्तरी अफ्रीका होते हुए भारत में सिन्ध और चीन की सीमा तक स्थापित हो चुका था।
अरब के रेगिस्तान में स्थित समारा में अल-मुतव्वकिल नामक एक मस्जिद स्थित है। यह वर्तमान समय में इस्लामिक संसार की प्राचीनतम मस्जिद मानी जाती है। इसका निर्माण ई.850 में खलीफा अब्बासी की दूसरी राजधानी समारा में किया गया था। मेसोपाटामिया शैली (Mesopotamian Style) में ईंटों से निर्मित यह मस्जिद 50 मीटर ऊंची है। कई शताब्दियों तक यह विश्व की सबसे बड़ी मस्जिद भी थी किंतु अब दुनिया में इससे बड़ी सैंकड़ों मस्जिदें स्थित हैं।
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