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अमेजन पर उपलब्ध पुस्तकें

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अमेजन पर उपलब्ध पुस्तकें - www.bharatkaitihas.com
अमेजन पर उपलब्ध पुस्तकें

इस पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित एवं अमेजन पर उपलब्ध पुस्तकें लिंक सहित दी गई हैं। इन पुस्तकों के शीर्षक पर क्लिक करके अमेजन डॉट इन के स्टोर तक पहुंचा जा सकता है।

विश्व इतिहास

  1. हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया Hard Cover
  2. पोप के देश में ग्यारह दिन Hard Cover
  3. कैसे बना था पाकिस्तान Hard Cover
    इतिहास पुरुष/ जीवनियाँ
  4. सरदार वल्लभ भाई पटेल: प्रेरक एवं रोचक प्रसंग Paper back
  5. हल्दीघाटी का युद्ध और महाराणा प्रताप Paper back
  6. अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान Paper back
  7. छत्रपति शिवाजी संघर्ष एवं उपलब्धियाँ Paper back
  8. छत्रपति शिवाजी संघर्ष एवं उपलब्धियाँ Hard Cover
  9. महाराजा सूरजमल का युग एवं प्रवृत्तियाँ Paper back
  10. युग निर्माता राव जोधा Paper back
  11. युग निर्माता राव जोधा Hard Cover
  12. युग निर्माता सवाई जयसिंह Paper back
    सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास
  13. भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास
  14. भारतीय ज्योतिष एवं कालगणना का इतिहास Paper back
  15. भारतीय ज्योतिष एवं कालगणना का इतिहास Hard Cover
  16. भारत की लुप्त सभ्यताएँ Paper back
  17. क्वाण्टम ब्रह्माण्ड और वेदान्त Paper back
    मध्यकालीन भारत का इतिहास
  18. लाल किले की दर्द भरी दास्तान Paper back
  19. लाल किले की दर्दभरी दास्तान Hard Cover
  20. तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर Hard Cover
  21. बाबर के बेटों की दर्दभरी दास्तान Paper back
  22. दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान Hard Cover
  23. भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या और हिन्दू प्रतिरोध का इतिहास Hard back
  24. विजयनगर साम्राज्य का इतिहास Paper back
  25. भारत के मुगलकालीन प्रमुख भवन Paper back
    राजस्थान का इतिहास
  26. ब्रिटिश शासन में राजपूताने की रोचक एवं ऐतिहासिक घटनाएँ Paper back
  27. ब्रिटिश शासन में राजपूताने की रोचक एवं ऐतिहासिक घटनाएँ Hard Cover
  28. राजपूताने के सक्षम राज्यों का भारत संघ में विलय एवं राजस्थान में एकीकरण Hard Cover
  29. राजशाही का अंत Hard Cover
  30. राजस्थान में राजशाही का अंत (राजशाही का अंत का पुनर्मुद्रण) Hard Cover
  31. जालोर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास Hard Cover
  32. जालोर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास Paper back
  33. नागौर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास Hard Cover
  34. किशनगढ़ राज्य का इतिहास Hard Cover
  35. बीकानेर का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास, Paper back
  36. राष्ट्रीय राजनीति में मेवाड़ का प्रभाव, Paper back
  37. अजमेर का वृहत् इतिहास Paper back
  38. Agrarian Discontentment In Bikaner Riyasat Paper back
    राजस्थान की संस्कृति, पर्यटन एवं विविध
  39. राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय Paper back
  40. राजस्थान के प्रमुख अभिलेखागार Paper back
  41. राजस्थान में वन एवं वन्यजीवन Paper back
  42. राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति Paper back
  43. राजस्थान में पर्यटन स्थलों का प्रबंधन तथा लोककलाओं का संरक्षण Hard Cover
  44. राजस्थान के तीज, त्यौहार एवं व्रत Paper back
  45. कर्मयोगी राजस्थानी Hard Cover
  46. राजस्थान लेखक परिचय कोश Hard Cover
  47. Cultural Tourism in Marwar Region of Thar Desert Hard Cover
    हिन्दी साहित्य
  48. चाणक्य की शपथ (हिन्दी नाटक) Paper back
  49. उर्दू बीबी की मौत Paper back
  50. सब काहू से बैर (हिन्दी व्यंग्य संग्रह) Paper back
  51. संघर्ष (ऐतिहासिक उपन्यास) Hard Cover
  52. मोहनजोदरो की नृत्यांगना (संघर्ष उपन्यास का पुनर्मुद्रण) Paper back
  53. डॉ. मोहनलाल गुप्ताजी के उपन्यासों में सौन्दर्य दृष्टि Hard Cover
  54. पासवान गुलाबराय (हिन्दी ऐतिहासिक उपन्यास) Paper back
  55. चित्रकूट का चातक (ऐतिहासिक उपन्यास) Paper back
  56. चित्रकूट का चातक (ऐतिहासिक उपन्यास) Hard Cover
  57. भगवान कल्याणराय के आंसू और महाराजा रूपसिंह राठौड़ (ऐतिहासिक उपन्यास) Hard Cover
  58. सपनों का राजकुमार और अन्य नाटक Paper back
  59. एकलगिढ दाढाळै री वा़त, (डिंगल भाषा के 400 वर्ष पुराने व्यंग्य का हिन्दी सारांश) Paper back
  60. घर चलो माँ (हिन्दी कहानी संग्रह) Paper back
  61. घर चलो माँ (हिन्दी कहानी संग्रह) Hard Cover
    पुराणों की कथाएँ
  62. पुराणोंकी कथाएँ-1: सृष्टि निर्माण की कथाएँ Paper back
  63. पुराणों की कथाएँ-2: इक्ष्वाकु राजाओं की कथाएँ Paper back
  64. पुराणों की कथाएँ-3: चन्द्रवंशी राजाओं की कथाएँ Paper back
  65. हिन्दुओं के त्यौहार एवं व्रत Paperback

अनुक्रमणिका – रोमन साम्राज्य का इतिहास एवं इटली का एकीकरण

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अनुक्रमणिका - रोमन साम्राज्य - www.bharatkaitihas.com
अनुक्रमणिका - रोमन साम्राज्य का इतिहास एवं इटली का एकीकरण

अनुक्रमणिका – रोमन साम्राज्य का इतिहास एवं इटली का एकीकरण पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक ‘पोप के देश में ग्यारह दिन’ के रोमन इतिहास सम्बन्धित अध्यायों के शीर्षक उपलब्ध कराए गए हैं। इन शीर्षकों पर क्लिक करके उन अध्यायों को पढ़ा जा सकता है।

लेखकीय 

1. यूरोप का भारत इटली

2. रिपब्बलिका इटेलियाना

3. रोमन् सभ्यता की स्थापना एवं विस्तार

4. रोम का प्राचीन धर्म

5. इटली में पाइथोगोरियन ब्रदरहुड की स्थापना

6. महान् रोमन गणराज्य

7. रोमन गणराज्य का नैतिक पतन

8. जूलियस सीजर एवं क्लियोपैट्रा

9. महान् रोमन साम्राज्य का उदय

10. ईसा मसीह को सूली

11. महान् रोमन साम्राज्य के शासक

12. दो ऑगस्टस तथा दो सीजर

13. रोमन साम्राज्य में ईसाइयों को प्राणदण्ड

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14. महान् रोमन साम्राज्य का विभाजन

15. पश्चिमी रोमन साम्राज्य

16. पूर्वी रोमन साम्राज्य

17. ईसाई धर्म का अंतर्द्वन्द्व

18. पोप का प्राकट्य एवं उसका शक्ति विस्तार

19. महान् रोमन साम्राज्य का दुःखद अंत

20. महान् रोमन साम्राज्य का द्वितीय संस्करण

21. पवित्र रोमन साम्राज्य का प्रथम संस्करण

22. पवित्र रोमन साम्राज्य का द्वितीय संस्करण

23. गिरजाघरों की गॉथिक शैली का विकास

24. वेनिस शहर की दुविधा

25. हिलाल के खिलाफ क्रॉस का क्रूसेड

26. पोप एवं पवित्र रोमन सम्राट में टकराव का चरम

27. ईसाई संघ द्वारा इनक्विजिशन की स्थापना

28. पोप की प्रतिष्ठा को धक्का

29. पूर्वी रोमन साम्राज्य का अंत

30. इटली में रिनेंसाँ नामक युग का प्रारम्भ

31. धर्म एवं विज्ञान के बीच संघर्ष

32. कैथोलिक धर्म से अलग सम्प्रदायों का उदय

33. यूरोपीय समाज में भेदभाव एवं शोषण

34. यूरोप में लोकतांत्रिक विचारों का उदय

35. यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय

36. पवित्र रोमन साम्राज्य के द्वितीय संस्करण का अन्त

37. इटली का एकीकरण

38. फासिज्म का नायक बैनितो मुसोलिनी

39. फासी-नाजी भाई-भाई

40. इटली में आधुनिक गणराज्य की स्थापना

41. रोमन कैथोलिक चर्च का इतिहास

42. रोमन कैथोलिक चर्च के प्रमुख सिद्धांत एवं शिक्षाएं

43. पोप

पोप के देश में ग्यारह दिन – अनुक्रमणिका

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पोप के देश में ग्यारह दिन – अनुक्रमणिका पृष्ठ पर उन अध्यायों के लिंक दिए गए हैं जिनमें लेखक द्वारा इटली के विभिन्न शहरों में अपने परिवार के साथ किए गए भ्रमण एवं अवलोकन का वर्णन किया गया है।

लेखकीय

1. दुनिया की नाभि की ओर

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पोप के देश में ग्यारह दिन – पुस्तक क्रय करने के लिए कृपया इमेज पर क्लिक करें।

2. रोम में पहला दिन – 17 मई 2019

3. रोम में दूसरा दिन – 18 मई 2019

4. रोम में तीसरा दिन – 19 मई 2019

5. रोम में चौथा दिन – 20 मई 2019

6. रोम में पांचवा दिन – 21 मई 2019

7. फ्लोरेंस में पहला दिन – 22 मई 2019

8. फ्लोरेंस में दूसरा दिन – 23 मई 2019

9. पीसा में एक दिन

10. फ्लोरेंस में तीसरा दिन – 24 मई 2019

11. वेनेजिया में पहला दिन – 25 मई 2019

12. वेनेजिया में दूसरा दिन – 26 मई 2019

13. वेनेजिया में तीसरा दिन – 27 मई 2019

14. इटली की धरती पर अंतिम दिन – 28 मई 2019

पोप के देश में ग्यारह दिन – अनुक्रमणिका में कुल चौदह लिंक दिए गए हैं। लिंक से जुड़े हुए पृष्ठों पर रोम, वेटिकन सिटी, पीसा, फ्लोरेंस एवं वेनिसिया आदि नगरों के भूगोल, इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व आदि का आंखों देखा विवरण लिखा गया है। इस पुस्तक का मुद्रित संस्करण भी उपलब्ध है जिसे इस पृष्ठ पर दिए गए चित्र पर क्लिक करके अमेजन डॉट इन से क्रय किया जा सकता है।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

छत्रपति शिवाजी संघर्ष एवं उपलब्धियाँ अनुक्रमणिका

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छत्रपति शिवाजी - bharatkaitihas.com
छत्रपति शिवाजी

छत्रपति शिवाजी भारत के इतिहास का चमकता हुआ ऐसा सितारा हैं जिनके प्रकाश से भारतीय गौरव सम्पूर्ण विश्व में प्रतिष्ठित है। इस आलेख शृंखला में छत्रपति शिवाजी के जीवन संघर्ष एवं उपलब्धियों के बारे में ऐतिहासिक जानकारियां दी गई हैं। पाठक नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करके सम्बन्धित अध्यायों को पढ़ सकते हैं।

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1.विषय प्रवेश     

2.शिवाजी के पूर्वज

3. शिवाजी का बाल्यकाल 

4. शिवाजी का सक्रिय राजनीति में प्रवेश  

5. अफजल खाँ का वध 

6. शाइस्ता खाँ को शिकस्त

7. सूरत की लूट 

8. मिर्जा राजा जयसिंह का अभियान

9. शिवाजी की आगरा यात्रा 

10. शिवाजी द्वारा औरंगजेब का विरोध

11. साल्हेर-मुल्हेर का युद्ध

12. सेनापति प्रताप राव का बलिदान  

13. शिवाजी का राज्याभिषेक 

14. शिवाजी के राज्य की शासन व्यवस्था 

15. मुगलों पर पुनः आक्रमण

16. शिवाजी का कर्नाटक अभियान 

17. सम्भाजी का दुराचरण 

 18. शिवाजी द्वारा जजिया का विरोध  

19. शिवाजी का निधन

20. शिवाजी के अभ्युदय का भारतीय राजनीति पर प्रभाव   

21. महाकवि भूषण की कविता में शिवाजी

यह सामग्री मुद्रित पुस्तक के रूप में भी उपलब्ध है जिसे अमेजन डॉट इन से क्रय किया जा सकता है। पुस्तक क्रय करने के लिए कृपया इमेज पर क्लिक करें।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

सरदार वल्लभ भाई पटेल : प्रेरक एवं रोचक प्रसंग – अनुक्रमणिका

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सरदार वल्लभ भाई पटेल प्रेरक एवं रोचक प्रसंग - bharatkaitihas.com
सरदार वल्लभ भाई पटेल प्रेरक एवं रोचक प्रसंग

इस पृष्ठ पर सरदार वल्लभ भाई पटेल : प्रेरक एवं रोचक प्रसंग पुस्तक की अनुक्रमणिका लिखी गई है। नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करके पाठक पूरा प्रसंग पढ़ सकते हैं। प्रत्येक प्रसंग के साथ इस पुस्तक का चित्र भी दिया गया है जिस पर क्लिक करके आप यह पुस्तक अमेजन से खरीद सकते हैं।

सरदार वल्लभ भाई पटेल - www.bharatkaitihas.com
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प्राक्कथन – सरदार वल्लभ भाई पटेल

1. भगवान श्रीराम के वंशज थे सरदार वल्लभ भाई पटेल

2. मिठाई के लिये सबसे अंत में याद किये जाते थे वल्लभभाई और विट्ठलभाई

3. जलती हुई सलाख से अपना शरीर दाग लिया वल्लभभाई ने  

4. हँसने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देते थे वल्लभभाई 

5. किसी से भी विरोध हो जाने की चिंता नहीं करते थे वल्लभभाई

6. दो दंगाई पाड़ों ने सबको भगा दिया 

7. वल्लभभाई इंग्लैण्ड जाकर देखना चाहते थे कि उस देश में ऐसी क्या विशेषता है   ?

8. मुख्तारी की परीक्षा उत्तीर्ण करके स्वतंत्र वकील बन गये वल्लभभाई

9. बड़े भाई की सहायता के लिये गोधरा से बोरसद चले आये वल्लभभाई

10. मुकदमेबाजों के हथकण्डों का सूक्ष्मता से अध्ययन किया वल्लभभाई ने

11. निर्दोष रेलवे इंस्पेक्टर को जेल जाने से बचा लिया वल्लभभाई ने

12. नशेड़ी अंग्रेज मजिस्ट्रेट से निर्दोष सुनार के पक्ष में फैसला लिखवाया वल्लभभाई ने

13. वल्लभभाई के आगे सनकी अंग्रेज मजिस्ट्रेट को अपनी जिद्द छोड़नी पड़ी

14. अपनी जगह विट्ठलभाई को बैरिस्ट्री पढ़ने लंदन भेज दिया वल्लभभाई ने

15. अपनी चीज दूसरों को दे-देते थे वल्लभभाई  सरदार वल्लभ भाई पटेल

16. पत्नी की मृत्यु का तार मिलने पर भी कोर्ट में बहस करते रहे वल्लभभाई

17. पत्नी की मृत्यु भी बैरिस्टर बनने का संकल्प नहीं छुड़ा सकी  

18. यात्रा में ही रोमन कानून याद कर लिया वल्लभभाई ने 

19. सारे दिन या तो पैदल चलते या फिर पुस्तकें पढ़ते वल्लभभाई 

20. करमसद गांव के लड़के ने लंदन में धूम मचा दी

21. व्यावसायिक सफलता के समस्त गुर सीख लिये वल्लभभाई ने 

22. हाईकोर्ट में जज बनने की बजाय अहमदाबाद में प्रैक्टिस करने का निर्णय लिया वल्लभभाई ने 

23. फॉक्स के छक्के छुड़ा दिये वल्लभभाई ने  सरदार वल्लभ भाई पटेल

24. कानून की दुनिया में अजेय हो गये वल्लभभाई 

25. वल्लभभाई के दो प्रश्नों पर ही मजिस्ट्रेट ने उनके मुवक्किल को जमानत दे दी

26. श्रीमती वाडिया के कहने पर पटेल ने उसके पति को शर्त से मुक्त कर दिया

27. गांधी दीवान के पुत्र थे किंतु वल्लभभाई किसान की गुदड़ी में पले थे

28. प्लेग रोगियों की सेवा करते-करते स्वयं भी प्लेग की चपेट में आ गये पटेल

29. चम्पारन आंदोलन के बाद गांधी की ओर ध्यान गया पटेल का 

30. गोधरा में पहली बार मिले वल्लभभाई पटेल और मोहनदास गांधी

31. वल्लभभाई के प्रयासों से गुजरात में बेगार बंद हो गई 

32. खेड़ा आंदोलन में अंग्रेजी वेशभूषा त्याग दी वल्लभभाई ने 

33. सरदार पटेल ने सिद्ध कर दिया कि सत्याग्रह का मार्ग प्रभावकारी है

34. वल्लभभाई की बात मानकर भारतीय युवक अंग्रेजी सेना में सम्मिलित हो गए

35. गांधीजी ने बीमार होने के कारण असहयोग आंदोलन की बागडोर सरदार को सौंपी

36. असहयोग आंदोलन को सफल बनाने के लिये सरदार तथा उनके भाई ने वकालात छोड़ दी

37. पटेल के समर्थन के बाद ही देश ने सत्याग्रह आंदोलन बंद करने का निर्णय स्वीकार किया

48. वल्लभभाई के विरोध पर नागपुर कलक्टर ने झण्डा जुलूस पर से पाबंदी हटा ली

39. सरदार पटेल ने बोरसद में सरकारी मनमानी के विरुद्ध अभूतपूर्व आंदोलन चलाया

40. अहमदाबाद में 43 स्कूल खोलकर गोरी सरकार को करारा जवाब दिया वल्लभभाई ने

41. गुजरात की जनता ने पटेल को गरीब नवाज तथा अपना मसीहा कहा

42. सरदार पटेल ने गोरी सरकार से कहा, बारदोली में बाहरी मैं नहीं, आप हैं!

43. गोरी सरकार पागल हाथी है, इम इसके कान में मच्छर बनकर घुसेंगे

44. गोले-गोलियों वाली गोरी सरकार ढोल नगाड़ों की आवाज से डर गई

45. फटे चीथड़ों वाली ग्रामीण महिलाएं पटेल के भाल पर तिलक लगाती थीं 

46. गांधीजी ने जिस मंत्र को अपनाया, उसका प्रथम सफल परीक्षण सरदार पटेल ने किया

47. राजनैतिक मंच से चिल्लाने से क्रांति नहीं होती 

48. सरदार पटेल की वाणी में बाल गंगाधर तिलक की अनुगूंज सुनाई देती थी

49. बिहार के किसानों की दुर्दशा देखकर सरदार पटेल का हृदय रो उठा

50. गांधीजी की इच्छा देखकर पटेल ने कांग्रेस का अध्यक्ष बनने से मना कर दिया  

51. पटेल ने कहा, जब तोपों से गोले बरसते हैं, तभी इतिहास बनता है!

52. गांधीजी की दाण्डी यात्रा को सफल बनाने के लिये पटेल गांव-गांव घूमे

53. अंग्रेज कमिश्नर के स्वागत में खड़े होने से मना कर दिया सरदार पटेल ने

54. सिंह जेल में था और गीदड़ उसका घर खराब कर रहे थे

55. सरदार पटेल की सिंह-गर्जना से गोरी सरकार कांप उठी 

56. गांधी-इरविन पैक्ट से देश में उत्तेजना फैल गई   

57. सरदार को कराची सम्मेलन की अध्यक्षता का कांटों भरा ताज मिला

58. गोरों को पता नहीं था कि सरदार, हाड़-मांस से नहीं, लोहे से बने हैं!

59. निःस्वार्थ सेवा से लोहे का सरदार, सोने का सरदार हो गया

60. पटेल ने चुनावी टिकटों के बंटवारे के लिये मार्गदर्शी सिद्धांतों का निर्माण किया

61. नरीमन ने सरदार पटेल पर साम्प्रदायिक होने का आरोप लगाया

62. संकट की घड़ी में एक बार फिर सरदार पटेल ने गांधीजी का साथ दिया

63. वास्तविकता से आंखें मूंदकर गांधीजी का अंधानुकरण करते थे पटेल

64. भारत छोड़ो आंदोलन में जनता की प्रतिक्रिया पर सरदार पटेल को गर्व था

65. शिमला सम्मेलन में भाग लेने के लिये पटेल को जेल से रिहा किय गया

66. सरदार ने भारतीय सैनिकों और गोरी सरकार के बीच समझौता करवाया

67. प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गये सरदार पटेल  

68. सरदार पटेल का जवाब सुनकर विंस्टन चर्चिल को होश आया 

69. मुस्लिम लीग को गृह-मंत्रालय न देने पर अड़ गये सरदार पटेल

70. सरदार पटेल का मानना था कि वैवेल, भारत को और दस वर्ष तक गुलाम रखेगा

71. सरदार पटेल ने मुस्लिम लीग के मंत्री द्वारा प्रस्तुत बजट का विरोध किया

72. पटेल और नेहरू ने गांधीजी का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया  

73. सरदार मानते थे कि देश का विभाजन नहीं होता तो हमारे हाथ से सब कुछ चला जाता

75. पटेल ने शरणार्थियों के पुनर्वास के लिये दिन-रात एक कर दिये

76. सरदार पटेल पर आजादी की नाव को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी आने वाली थी

77. पटेल ने माउण्टबेटन से कहा, वे सारे रजवाड़े भारत की झोली में डाल दें

78. सरदार के लिये बड़ी चुनौती तैयार हो चुकी थी

79. कांग्रेस जानती थी कि लौह-पुरुष अपनी धोती समेट कर राजाओं के पीछे पड़ जायेगा

80. सरदार पटेल ने कोरफील्ड को इंग्लैण्ड के लिये डिस्पैच करवाया

81. सरदार पटेल ने बड़ौदा के राजा को गद्दी से उतार दिया

83. पटेल के मखमली दस्ताने युक्त हाथ राजाओं की भुजाओं पर कसने लगे

84. सरदार पटेल ने 551 रियासतों को आजादी से पहले ही भारत में मिला लिया

85. सरदार पटेल ने लक्षद्वीप को भारत में सम्मिलित कर लिया  

86. जूनागढ़ के नवाब ने पाकिस्तान में मिलने की घोषणा करके पटेल को चुनौती दी!

87. सरदार पटेल ने माउण्टबेटन का सुझाव मानने से मना कर दिया!

88. सरदार मानते थे कि हैदराबाद राज्य, भारत के पेट में नासूर की तरह था !

89. पटेल ने हैदराबाद रियासत में कांग्रेस को सत्याग्रह आंदोलन चलाने का निर्देश दिया!

90. पटेल ने कहा, माउण्टबेटन योजना तो घर चली गई है! 

91. काश्मीर की समस्या को यू.एन.ओ. में ले जाये जाने पर पटेल, जवाहरलाल से नाराज हो गये !

92. पटेल ने भोपाल नवाब को घुटने टेकने पर विवश कर दिया!

93. सरदार ने आईसीएस अधिकारियों को बनाये रखने का निर्णय लिया !

94. पटेल नहीं चाहते थे कि राजाओं के पास प्रजा को फांसी चढ़ाने का अधिकार हो!

95. पटेल ने देशी राज्यों को गठरी में बांध लिया !

96. सरदार पटेल ने राजाओं के साथ अत्यंत व्यावहारिक रुख अपनाया!

97. पटेल को राजाओं का धन नहीं, उनके राज्य चाहिये थे!

98. सरदार पटेल ने अलवर नरेश तेजसिंह को नजरबंद कर लिया !

99. सरदार पटेल ने भरतपुर महाराजा के भाग्य की रक्षा की!

100. पटेल ने वह कर दिखाया जो जर्मनी में बिस्मार्क ने तथा इटली में काबूर ने किया था!

101. अजमेर दंगों पर सरदार पटेल का जवाहरलाल नेहरू से विवाद हो गया!

102. पटेल ने नेहरू के प्रुमख निजी सचिव को पत्र लिखकर फटकार लगाई!

103. सरदार पटेल ने नेहरू को भी पत्र लिखकर नाराजगी व्यक्त की !

104. नेहरू ने सरदार पटेल को पत्र लिखकर अपना पद छोड़ने की पेशकश की !

105. गांधी की मृत्यु के साथ ही पटेल-नेहरू विवाद काल के गर्त में समा गया!  

106. डॉ. अम्बेडकर की नियुक्ति में पटेल की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी!

107. पटेल ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दिये जाने का विरोध किया!

108. पटेल ने अल्पसंख्यक आयोग स्थापित करने के निर्णय का विरोध किया!

109. पटेल ने नेहरू की व्यक्तिगत इच्छाओं को कांग्रेस पर हावी नहीं होने दिया!

110. सरदार पटेल ने प्राचीन सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया! 

111. पटेल ने शेख अब्दुल्ला की बोलती बंद कर दी!

112. काश्मीर, गोआ, चीन, तिब्बत और नेपाल को लेकर नेहरू से असंतुष्ट थे पटेल!

113. भविष्य के चीनी आक्रमण का पूर्वाभास था सरदार पटेल को!

114. वायुयान दुर्घटना ने देश को चिंता में डाल दिया !

115. आम आदमी की तरह पटेल का अंतिम संस्कार किया गया!

116. विष्णुगुप्त चाणक्य तथा समुद्रगुप्त की तरह राष्ट्र के निर्माता थे सरदार पटेल!

117. सोने का दिल लोहे के हाथ!

इक्ष्वाकु राजाओं की कथाएँ – अनुक्रमणिका

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इक्ष्वाकु राजाओं की कथाएं

इक्ष्वाकु राजाओं की कथाएँ शीर्षक से लिखी गई इस पुस्तक में इक्ष्वाकु राजाओं से सम्बन्धित धर्म एवं अध्यात्म की कथाएं हैं। इक्ष्वाकु राजाओं की कथाएँ – अनुक्रमणिका पर इस पुस्तक में दिए गए आलेखों का क्रम दिया गया है। पाठक प्रत्येक शीर्षक पर क्लिक करके उस कथा को पढ़ सकते हैं।

 1. दधीचि के पौत्र ने तपस्या का फल लेने से मना कर दिया!

2. सुदर्शन चक्र भगवान के भक्त का अपमान सहन नहीं कर सका!

3. महर्षि विश्वामित्र के मंत्र से शुनःशेप बलि चढ़ने से बच गया!

4. शुनःशेप ने ऋषियों से पूछा कि मेरा पिता कौन है, मुझे बेचने वाला या खरीदने वाला!

5. राजा वेन को ऋषियों ने अपनी हुंकार से मार डाला!

6. राजा पृथु ने पिता बनकर पृथ्वी का पालन किया!

7. मरुस्थल में टिक्टोनिक्स प्लेटों के स्थिर होने की घटना से जुड़ी है राजा धुंधुमार द्वारा धुंध राक्षस के वध की कथा!

8. सत्युग समाप्त हो गया और अचानक त्रेता लंगड़ाता हुआ आ गया!

9. लवणासुर ने राजा मांधाता को दिव्य त्रिशूल से नष्ट कर दिया!

10. ऋषि विश्वामित्र ने राजा सत्यव्रत के लिए नया स्वर्ग बना दिया!  

11. ईक्ष्वाकु वंशी राजा हरिश्चंद्र ने अपनी रानी से कहा अपनी आधी साड़ी फाड़कर शमशान का कर चुकाए!

12. राजा सगर ने यवनों के सिर मूंड कर उन्हें धर्म से वंचित कर दिया।

13. राजा सगर के साठ हजार पुत्रों ने धरती और समुद्र को अत्यंत कष्ट दिया!

14. राजा भगीरथ ने गंगाजी को धरती पर लाने के लिए महातप किया!

15. हिमकाल की द्योतक है अगस्त्य द्वारा समुद्र पान की कथा! 

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16. ईक्ष्वाकु वंशी राजा नाभि के समय नवीन सृष्टि आरम्भ हुई!

17. राजा ऋतुपर्ण ने आकाश से ही पेड़ के पांच करोड़ पत्ते गिन लिए !

18. महर्षि वसिष्ठ के श्राप से राजा सौदा कल्मषपाद राक्षस बन गया!

19. राजा खट्वांग अपनी मृत्यु की जानकारी होते ही स्वर्ग छोड़कर अयोध्या आ गए!

20. राजा दिलीप ने सिंह से कहा कि वह गौ के स्थान पर मुझे खा ले!

21. महाराज रघु ने यक्षराज कुबेर से ब्राह्मणकुमार के लिए कर प्राप्त किया!

22. राजा अज ने जंगल में लकड़ियां काटकर गुरु दक्षिणा चुकाई! 

23. रानी कैकेयी ने देवासुर संग्राम में राजा दशरथ के प्राणों की रक्षा की! 

24. प्राणमय, अन्नमय ओर मनोमय कोश की प्रतीक हैं राजा दशरथ की तीनों रानियां! 

25. हिन्दू धर्म ग्रंथ ईक्ष्वाकु वंशी राजा रामचंद्र को पौने दो करोड़ साल पुराना बताते हैं! 

26. हे भरत! तुम मनुष्यों के राजा बनो, मैं जंगली पशुओं का सम्राट बनूंगा!

27. वनवासी राम ने महर्षि जाबालि को कड़ी फटकार लगाई! 

28. महर्षि वाल्मीकि ने श्रीराम को ईक्ष्वाकुओं की परम्परा बताई!

29. श्रीराम ने इन्द्र के पुत्र जयंत की आंख फोड़कर उसे जीवित छोड़ दिया।

30. ऋषि भरद्वाज ने श्रीराम एवं सीता से हजारों साल बूढ़ी अनसूया का परिचय करवाया! 

31. शरभंग ऋषि ने श्रीराम को समस्त योग, यज्ञ, तप एवं व्रत समर्पित कर दिए!

32. सुतीक्ष्ण ऋषि ने भगवान को देखकर आंखें बंद कर लीं!  

33. श्रीराम ने दिव्य शस्त्रों की प्राप्ति के लिए महर्षि अगस्त्य से भेंट की! 

34. अगस्त्य ऋषि ने अपने दिव्य आयुध श्रीराम को समर्पित कर दिए! 

35. श्रीराम ने दूसरे राजाओं के राज्य पर अधिकार नहीं किया! 

36. सशरीर स्वर्ग प्रवेश के लिए तप कर रहे शंबूक का श्रीराम ने वध कर दिया!

37. शत्रुघ्न ने अपने पूर्वज मांधाता को मारने वाले लवणासुर का वध कर दिया! 

सृष्टि निर्माण की कथाएँ – अनुक्रमणिका

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सृष्टि निर्माण की कथाएँ - अनुक्रमणिका -
सृष्टि निर्माण की कथाएँ - अनुक्रमणिका

सृष्टि निर्माण की कथाएँ – अनुक्रमणिका पृष्ठ पर इस पुस्तक में दी गई कथाओं के लिंक उपलब्ध कराए गए हैं। पाठक कथा के शीर्षक पर क्लिक करके इन कथाओं को पढ़ सकते हैं। सृष्टि निर्माण की कथाएँ पुस्तक में भारतीय पुराणों में आई सृष्टि निर्माण सम्बन्धी कथाओं का संकलन किया गया है तथा उनके वैज्ञानिक संदर्भ भी बताए गए हैं।

1. हिन्दू धर्म-साहित्य का अद्भुत कथा-संसार!

2 पृथ्वी की उत्पत्ति से जुड़ी है मधु-कैटभ के वध की कथा!

3 जलप्लावन से जुड़ी हैं भगवान के मत्स्यावतार, कूर्म अवतार एवं वराह अवतार की कथाएं!

4 महा जलप्लावन एवं जीवों के क्रमिक विकास से जुड़ी है भगवान श्री हरि विष्णु के मत्स्यावतार की कथा!

5 मानव-सृष्टि को वैभव प्रदान करने से जुड़ी है कूर्मावतार की कथा!

6 सृष्टि को पुनः वैभव प्रदान करने से जुड़ी है भगवान के मोहिनी अवतार की कथा!

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7 किसी प्राचीन हिमयुग की समाप्ति से जुड़ी है भगवान के नीलवराह अवतार की कथा!

8 धरती के समुद्र में डूब जाने की द्योतक है हिरण्याक्ष द्वारा धरती को समुद्र में छिपाने की कथा!

9 भगवान श्रीहरि विष्णु ने आदि-वराह रूप धरकर धरती का उद्धार किया!

10 भगवान विष्णु के वराह-अवतार की कथाओं से जुड़ी है दक्षिण भारत के वनांचलों में रहने वाली वराह जाति!

11 भक्त-प्रहलाद की रक्षा के लिए भगवान ने नृसिंह-अवतार धारण किया!

12 धरती एवं स्वर्ग को दैत्यों से मुक्त कराने के लिए भगवान ने वामन अवतार लिया!

13 ऋषि कश्यप तथा उनकी पत्नियों दिति एवं अदिति की कथा!

14 दिति ने इन्द्रहंता-पुत्र की प्राप्ति हेतु पति कश्यप को प्रसन्न किया!

15 इन्द्र ने दिति के गर्भ के उनन्चास टुकड़े कर दिए!

16 ऋषि कश्यप की पत्नियों कद्रू एवं विनता के पुत्रों की कथा!

17 ऋषि कश्यप को वसुदेव रूप में पैदा होने का श्राप मिला!

18 धरती पर वर्षा आरम्भ होने से जुड़ी है इन्द्र द्वारा वृत्रासुर के वध की कथा!

19 वृत्रासुर ने इन्द्र को स्वर्ग से निकाल दिया!

20 वृत्रासुर के नाश के लिए दधीचि ऋषि ने अपनी हड्डियां दे दीं!

21 चौदह मनुओं की कथा!

22 स्वायंभू-मनु तथा उनके वंशजों की कथा!

23 वैवस्वत मनु तथा उनके वंशज राजाओं की कथा!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जगद्गुरु शंकराचार्य एवं उनका दर्शन

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जगद्गुरु शंकराचार्य एवं उनका दर्शन

जगद्गुरु शंकराचार्य का दर्शन उपनिषदों के दर्शन पर आधारित है। उन्होंने उपनिषदों की दार्शनिक व्याख्या करके भारतीय अध्यात्म एवं दार्शनिक ज्ञान को नई दिशा प्रदान की।

वेदों की रचना लगभग ई.पू. 1000 तक पूर्ण हो चुकी थी। उनके बाद ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों, उपनिषदों एवं सूत्रों की रचना हुई। इन्हें वेदों का ही भाग माना जाता है। ब्राह्मणों के परिशिष्ट ‘आरण्यक’ कहलाते हैं और उनके अन्तिम भाग ‘उपनिषद’ हैं। उपनिषदों को वेदांत कहा जाता है क्योंकि ये वेदों का अंतिम भाग हैं। उपनिषद् बहुत सारे थे तथा इनमें भिन्न-भिन्न मत प्रस्तुत किए गए थे।

इन्हें स्वतंत्र रूप से समझ पाना कठिन था। ई.पू. 500 से ई.पू. 200 के बीच महर्षि बादरायण ने उपनिषदों के तत्त्व ज्ञान को व्यवस्था करने के उद्देश्य से ‘वेदान्तसूत्र’ की रचना की जिसे ‘ब्रह्मसूत्र’ भी कहते हैं। श्रीमद्भगवत् गीता को बादरायण के ब्रह्मसूत्र का ही विकास मानना चाहिए। ई.700 के लगभग महर्षि गोडपाद ने माण्डूक्य उपनिषद पर कारिकाएं लिखकर बादरायण के मत को आगे बढ़ाया। गोडपाद की कारिकाओं पर बौद्ध विचारों का प्रभाव दिखाई देता है। गौडपाद के शिष्य गोविन्द; और गोविन्द के शिष्य शंकराचार्य हुए। शंकराचार्य ने वेदान्त का परिष्कृत एवं परिपक्व रूप प्रस्तुत किया।

जगद्गुरु शंकराचार्य का जीवन परिचय

शंकराचार्य का जन्म

जगद्गुरु शंकराचार्य के शिष्यों ने शंकर के जन्म के विषय में अनेक बातें प्रसारित कर रखी हैं जिनके कारण उनके जन्म की सही तिथि प्राप्त करना कठिन है। कतिपय हिन्दू शास्त्र आदिशंकर का जन्म ई.पू.507 में तथा निधन ई.पू.475 में होना बताते हैं किंतु यह तिथि इतिहास सम्मत नहीं है।

विभिन्न स्रोतों से प्राप्त समसामयिक तथ्यों के आधार पर यह स्थिर किया गया है किजगद्गुरु शंकराचार्य का जन्म ई.788 में केरल के मलाबार में अलवाए नदी के किनारे स्थित कालाड़ी (इसे कालटी अथवा काषल भी कहते हैं) गांव के नम्बूदिरी ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम आर्याम्बा था। कुछ स्रोत इनकी माता का नाम सुभद्रा बताते हैं। जब शंकर तीन वर्ष के हुए तब उनके पिता का देहांत हो गया। उनका पालन-पोषण उनकी माता ने किया। प्रतिवर्ष वैशाख शुक्ल पंचमी को शंकराचार्य जयंती मनाई जाती है।

शंकराचार्य की शिक्षा

माता आर्यम्बा ने पुत्र शंकर को गोविन्द स्वामी से शिक्षा दिलवाई। शंकर अत्यंत मेधावी तथा अद्भुत प्रतिभाशाली बालक थे। मान्यता है कि केवल छः वर्ष की आयु में ही उन्होंने वेद, पुराण, उपनिषद्, रामायण, महाभारत आदि ग्रंथ कंठस्थ कर लिए। आठ वर्ष की आयु में वे शिक्षा पूरी करके घर लौट आए।

संन्यास

माता उनका विवाह करना चाहती थीं किंतु किसी ज्योतिषि ने बताया कि शंकर अल्पायु होंगे। इसलिए शंकर ने विवाह के स्थान पर संन्यास लेने का निर्णय लिया किंतु माता उन्हें एकमात्र पुत्र होने के कारण संन्यासी बनने की आज्ञा नहीं देती थीं। एक दिन नदी किनारे स्नान करते समय एक मगरमच्छ ने शंकर का पैर पकड़ लिया।

तब शंकर ने माँ से कहा कि मुझे संन्यास लेने की आज्ञा दो अन्यथा मगरमच्छ मुझे खा जाएगा। भयभीत माता ने उन्हें संन्यासी होने की आज्ञा दे दी और मगरमच्छ ने शंकर का पैर छोड़ दिया। माता ने उनसे वचन लिया कि वे माता की मृत्यु के समय अवश्य आएंगे। शंकर ने गोविन्द स्वामी से संन्यास ग्रहण किया। जब कुछ वर्ष पश्चात् माता की मृत्यु का समय हुआ तो शंकर स्वतः ही माता के समक्ष उपस्थित हुए तथा उन्हें मुखाग्नि दी।

शंकर के शास्त्रार्थ

जगद्गुरु शंकराचार्य कुछ समय के लिए काशी में रहे तथा वहाँ अनेक विद्वानों को शास्त्रार्थ में परास्त किया। इसके बाद शंकर ने वेदान्त दर्शन के प्रचार के लिए देश के विभिन्न भागों में घूमना आरम्भ किया। शंकर ने मीमांसकों, चार्वाकों, जैनियों एवं बौद्धों से शास्त्रार्थ किया और उन्हें स्थान-स्थान पर परास्त किया। उनमें से बहुत से विधर्मियों ने शंकर का शिष्य बनना स्वीकार कर लिया।

बिहार के माहिष्मती क्षेत्र के प्रसिद्ध मीमांसक मण्डन मिश्र से हुआ जगद्गुरु शंकराचार्य का शास्त्रार्थ अत्यधिक प्रसिद्ध है। जब शंकराचार्य ने मण्डन मिश्र को परास्त कर दिया तब मंडन मिश्र की पत्नी भारती ने शंकराचार्य को शास्त्रार्थ हेतु चुनौती दी। मान्यता है कि भारती ने शंकर से ‘काम’ पर शास्त्रार्थ करना चाहा।

इस पर शंकर ने परकाया प्रवेश करके इस विषय का ज्ञान प्राप्त किया तथा भारती से शास्त्रार्थ कर उसे परास्त किया। मंडन मिश्र एवं भारती ने शंकराचार्य को अपना गुरु मान लिया तथा वे भी शंकराचार्य की आज्ञा से अद्वैत दर्शन के प्रचार में जुट गए।

शंकराचार्य ने चिदम्बरम से काश्मीर, केदार और बद्रिकाश्रम तक और द्वारिका से काशी और जगन्नाथपुरी तक अनेक पण्डितों और दार्शनिकों को परास्त करके अपने मत में सम्मिलित किया। बौद्ध उन्हें अपना शत्रु समझते हैं, क्योंकि उन्होंने बौद्धों को कई बार शास्त्रार्थ में पराजित करके वैदिक धर्म की पताका फहराई। आनन्दगिरि रचित ‘शंकर विजय’ और माधव द्वारा रचित ‘शंकर दिग्विजय’ में शंकराचार्य की यात्राओं और शास्त्रार्थों का विस्तृत वर्णन हुआ है।

जगद्गुरु शंकराचार्य के ग्रंथ

जगद्गुरु शंकराचार्य देश-व्यापी यात्रा और शास्त्रार्थ करते हुए निरन्तर लेखन भी करते रहे। उन्होंने अनेक भाष्य, प्रकरण तथा स्तोत्र ग्रन्थों की रचना की तथा सौन्दर्य लहरी एवं विवेक चूड़ामणि जैसे श्रेष्ठ ग्रंथ लिखे। उन्होंने ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता और ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक, प्रस्थान त्रयी एवं छान्दोग्य उपनिषदों पर भाष्य लिखे। उन्होंने ब्रह्मसूत्र की विशद और रोचक व्याख्या की।

जगद्गुरु शंकराचार्य ने उपदेश सहस्री, आत्मबोध, आनन्द लहरी, दक्षिणामूर्ति, शिवापराधक्षमापण, हस्तामलक आदि स्तोत्रों और काव्यों की रचना की। शंकराचार्य ने शिव, पार्वती, गणेश, विष्णु आदि देवी-देवताओं के भक्ति-रस से परिपूर्ण स्तोत्र रचे। शंकर के लिखे ‘भजगोविन्दम्’ भजन ने अत्यधिक प्रसिद्धि प्राप्त की। उनकी तार्किक प्रतिभा, दार्शनिक प्रगल्भता और कवित्व-शक्ति ने देश में नई चेतना एवं स्फूर्ति का संचार किया।

उस युग में जगद्गुरु शंकराचार्य के जैसा लेखन-चातुर्य और प्रचार-कौशल किसी अन्य विद्वान ने प्रदर्शित नहीं किया। मान्यता है कि उन्होंने केवल सोलह वर्ष की आयु में ब्रह्मसूत्र पर शांकरभाष्य की रचना करके विद्वत् समाज को चकित कर दिया।

जगद्गुरु शंकराचार्य के सांगठनिक कार्य

जगद्गुरु शंकराचार्य उच्च-कोटि के संगठनकर्ता थे। उन्होंने भारतवर्ष में चार दिशाओं में चार वेदांत मठों की स्थापना की- (1.) उत्तर में बद्रिकाश्रम (ज्योतिमठ), (2.) दक्षिण में शृंगेरी पीठ, (3.) पश्चिम में द्वारिका शारदा पीठ और (4.) पूर्व में पुरी गोवर्धन पीठ।

ये मठ आज भी बहुत पवित्र माने जाते हैं और इनके अध्यक्ष शंकराचार्य कहलाते हैं। ये मठ अपने-अपने क्षेत्र के मठों की व्यवस्था करते हैं। प्रत्येक प्रधान मठ के अध्यक्ष अर्थात् शंकराचार्य के नीचे सन्यासियों की दस श्रेणियां हैं- सरस्वती, भारती, पुरी, गिरि, तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, पर्वत और सागर। इन्हें सम्मिलित रूप से ‘दशनामी’ कहते हैं।

ज्ञान प्राप्ति की दृष्टि से इनके चार वर्ग- ब्रह्मचारी, दण्डी, परिव्राजक और परमहंस हैं। इनमें जाति-पांति का भेद नहीं है। एक बार बनारस में एक चाण्डाल के प्रश्न करने पर शंकराचार्य ने कहा- ‘मैं प्रत्येक व्यक्ति को जो संसार को अद्वैत दृष्टि से देखता है अपना गुरु मानता हूँ, चाहे वह चाण्डाल हो या द्विज।’ इससे स्पष्ट है कि शंकराचार्य ने अपने संगठन में वर्ण, आश्रम और लिंग के भेद को कोई स्थान नहीं दिया। देश की चार दिशाओं में चार आश्रमों की स्थापना के करके शंकर ने देश को एक जैसी धार्मिक संस्कृति देने का प्रयास किया।

वामाचार का निषेध

जगद्गुरु शंकराचार्य ने वेदांत दर्शन का प्रचार किया तथा गर्हित धर्माचार का निषेध किया। उन्होंने अनेक मंदिरों एवं मठों में होने वाली शाक्तों, तात्रिकों, भैरवों, कापालिकों तथा पाशुपतों की मलिन क्रियाएं बन्द करवा दीं। शंकर ने कांची के देवी मन्दिर में नर-बलि का प्रबल विरोध किया और उसे बन्द करवाया।

अद्भुत समन्वय क्षमता

जगद्गुरु शंकराचार्य में दूसरों को प्रभावित करने की अद्भुत प्रतिभा थी। वे दार्शनिक विचारों के समन्वय के पक्षधर थे। उन्होंने मीमांसा का खण्डन किया किंतु वैदिक रीतियों में अगाध श्रद्धा प्रकट की। बौद्धों का विरोध किया किंतु बुद्ध को योगियों का चक्रवर्ती बताया। शंकर ने बौद्ध धर्म के बहुत से विचारों को मान्यता दी जिनके कारण रूढ़िवादी लोग उन्हें ‘प्रच्छन्न बौद्ध’ कहने लगे।

शंकर ने ब्रह्मज्ञान का प्रचार किया किंतु सूर्य, शक्ति, विष्णु, शिव और गणेश की पूजा को भी स्वीकार किया। इस प्रकार शंकराचार्य ने ज्ञान और भक्ति दोनों को मान्यता देकर भारतीय जन-मानस को व्यापक रूप से अपनी ओर आकर्षित किया। वर्तमान समय में भी हिन्दू-धर्म के प्रत्येक पक्ष पर शंकराचार्य की गहरी छाप है। शंकराचार्य के निधन के बाद उनके शिष्य शिवसोम ने काम्बुज देश (वर्तमान कम्बोडिया) में शंकर के अद्वैत मत का प्रचार किया।

जगद्गुरु शंकराचार्य का निधन

जगद्गुरु शंकराचार्य का निधन केवल 32 वर्ष की आयु में हुआ। उन्होंने केदारनाथ धाम में अपनी देह का त्याग किया। स्मार्त संप्रदाय में उन्हें शिव का अवतार माना जाता है। उन्हें आदिशंकराचार्य एवं जगत्गुरु भी कहा जाता है।

जगद्गुरु शंकराचार्य का दर्शन

शंकराचार्य का अद्वैतवाद

जगद्गुरु शंकराचार्य भारत के महान दार्शनिक एवं धर्म-प्रवर्तक थे। शंकराचार्य का दर्शन आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित है। इस दर्शन के अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों स्वरूपों में विद्यमान रहता है। उन्होंने अद्वैत वेदान्त को ठोस दार्शनिक आधार प्रदान किया तथा सनातन धर्म की विविध दार्शनिक धाराओं का एकीकरण किया।

उन्होंने अनुभव किया कि ज्ञान की अद्वैत भूमि पर जो परमात्मा निर्गुण निराकार ब्रह्म है, वही द्वैत की भूमि पर सगुण साकार है। उन्होंने निर्गुण और सगुण दोनों का समर्थन करके निर्गुण तक पहुँचने के लिए सगुण की उपासना को अपरिहार्य सीढ़ी माना। ज्ञान और भक्ति की मिलन भूमि पर यह भी अनुभव किया कि अद्वैत ज्ञान ही सभी साधनाओं की परम उपलब्धि है।

ब्रह्म का स्वरूप

शंकराचार्य का मानना था कि सृष्टि की ‘विविधता’ के मूल में ‘एकता’ विद्यमान है। अलग-अलग दिखाई देने वाली वस्तुएं एक ही सत्ता के विभिन्न रूप हैं। यह सत्ता अनन्त, सत्य और ज्ञान है। इसमें चैतन्य और आनन्द निहित है। यह देश, काल और अवस्था से परे है। इसे नाम, गुण और विशेषणों की सीमा में नहीं बांधा जा सकता। इसे ‘ब्रह्म’ कहते हैं।

‘ब्रह्म’ में निहित शक्ति के कारण इसके अनेक रूप दिखाई देते हैं। इस शक्ति का नाम ‘प्रकृति’ या ‘माया’ है। यह ब्रह्म में इस तरह है जैसे आग में जलाने की क्षमता किंतु इसे ब्रह्म का अंग नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ऐसा करने से ब्रह्म भी सीमित या परिवर्तनशील या नाशवान् मानना पड़ेगा जो कि उसके स्वरूप के विपरीत है। वह तो केवल ब्रह्म की एक शक्ति है जिससे वह एक होते हुए भी अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है। ये ब्रह्म के वास्तविक रूप नहीं है किंतु वास्तविक जैसे आभासित होते हैं। इन्हें ‘विवर्त’ कहा जाता है।

माया का अर्थ

शंकराचार्य ‘माया’ को ‘कारण’ या ‘शक्ति’ मानते हैं जिससे ब्रह्म के बहुत से अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं। अर्थात् इससे बहुगुणी विश्व के बनने, बढ़ने और बिगड़ने की क्रिया चलती है। इसे ‘अव्यक्त प्रकृति’ भी कहा जा सकता है जिससे व्यक्त संसार चलता है। दूसरे शब्दों में यह ‘माया’ प्रकृति का पर्याय है जो समस्त वस्तुओं को प्रकट करती है। माया के कारण यह सृष्टि परिवर्तनशील है। सारांश यह है कि ‘ब्रह्म’ एक होता हुआ भी ‘माया’ के कारण बहुत से रूपों में दिखाई देता है।

जगत् का स्वरूप

शंकराचार्य ने जगत् का स्वरूप बताते हुए लिखा है- ‘नामरूपाभ्यां व्यक्तस्य अनेककर्तृभोक्तृसंयुक्तस्य प्रतिनियत देशकालनिमित्तक्रियाफलाश्रयस्य मनसापि अचिन्त्यरचनारूपस्य जन्मस्थितिभंगंयतः।’

अर्थात्- नाम एवं रूप से व्यक्त, अनेक कर्ता, अनेक भोक्ता से संयुक्त, जिसमें देश, काल, निमित्त और क्रियाफल भी नियत हैं, जिस जगत् की सृष्टि की मन से भी कल्पना नहीं कर सकते, उस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा लय ब्रह्म से होती है।

जगद्गुरु शंकराचार्य ने एक स्थान पर लिखा है- रास्ते में पड़े चिथड़ों से बनी झोली या गुदड़ी से काम चला लिया, पुण्य-अपुण्य से परे विशेष जीवन-मार्ग अपना लिया, न मैं हूं, न तुम हो, न ही यह संसार है यह जान लिया, तब फिर किस बात शोक किया जाये।

ब्रह्म और जगत की अभिन्नता

माया के द्वारा हमें ब्रह्म के अनेक रूप दिखाई देते हैं तथा ये विभिन्न रूप ब्रह्म की एकता को ढक लेते हैं। इसे ‘आवरण’ कहते हैं और इसका नाम ‘विक्षेप’ है। इससे ऐसा लगने लगता है कि वे ही सत्य हैं। ब्रह्म अपने आप में एक, और समस्त रूपों से परे है किंतु ‘माया’ का आश्रय होने से उसे ‘ईश्वर’ कहा जाता है। माया के कारण ब्रह्म सूक्ष्म रूपों में दिखाई देता है। सूक्ष्म रूपों का आधार होने से ब्रह्म ‘हिरण्यगर्भ’ कहलाता है।

माया के कारण ब्रह्म स्थूल रूपों में भी दिखाई देता है। स्थूल रूपों का आधार होने से ब्रह्म ‘वैश्वानर’ कहलाता है। सूक्ष्म रूपों का आर्विभाव इस क्रम में होता है- आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। फिर इन पांचों का पांच तरह से मेल होता है, जिससे स्थूल रूप बनते हैं। जब आधे में आकाश और आधे में बाकी चारों रूप होते हैं तो स्थूल आकाश बनता है। जब आधे में वायु और आधे में बाकी चारों रूप होते हैं तो स्थूल वायु बनता है। इसी प्रकार स्थूल अग्नि, स्थूल जल और स्थूल पृथ्वी बनते हैं। इस क्रिया को ‘पंचीकरण’ कहते हैं।

जीव का स्वरूप

शंकराचार्य के अनुसार जीव ‘अज्ञान व्यष्टि की उपाधि’ से युक्त है। शंकराचार्य की दृष्टि में सम्पूर्ण जगत् के जीवों को ब्रह्म के रूप में स्वीकार करना चाहिए।

ब्रह्म परमार्थ सत्य व जगत व्यावहारिक सत्य

बहुत से दार्शनिक जगत को मिथ्या मानते हैं जिसका कोई अस्तित्त्व नहीं है। शंकराचार्य ऐसा नहीं मानते। वे कहते हैं कि ब्रह्म और जगत अभिन्न हैं, ब्रह्म परमार्थ रूप में सत्य है और जगत व्यावहारिक रूप में सत्य है। यह अवश्य है कि जगत् बिना ब्रह्म के सत्य नहीं है किंतु यह भी सत्य बात है कि जगत ब्रह्म का ही रूप है, और वह सत्य है।

इसलिए ब्रह्मसूत्र स्पष्ट कहता है कि जगत् असत् नहीं है। शंकराचार्य स्वयं लिखते हैं कि तरह-तरह के नामों और रूपों वाली चीजों की सत्ता है, यद्यपि वे अपने आप में पूरी न होने के कारण सत्य नहीं कही जा सकतीं क्योंकि सत्य से उस चीज का बोध होता है जो अपने आप में पूरी हो। जिस प्रकार भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों में ब्रह्म की सत्ता बनी रहती है, वैसे ही तीनों कालों में जगत भी बना रहता है।

अतः स्पष्ट है कि शंकर जगत को व्यावहारिक सत्य मानते हैं, केवल कल्पना नहीं समझते। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि परमार्थ की दृष्टि से विचार किया जाए तो ब्रह्म ही सत्य है, इसके अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं किन्तु यदि व्यावहारिक दृष्टि से विचार किया जाए तो जगत भी सत्य है। शंकर का मत है कि प्रत्येक कार्य, कारण का ही रूप है या उसकी अवस्था है। इसलिए जीव और जगत दोनों में ब्रह्म दिखाई देता है, जबकि दोनों उसके रूप हैं। दोनों में चैतन्य रहता है- जीव में व्यक्त रूप से एवं जगत में अव्यक्त रूप से।

अनन्त और सीमित ब्रह्म

ब्रह्म के विभिन्न रूप देश, काल, गुण और आकार की सीमाओं में बंधे हुए हैं। सामान्य तौर पर इन्हें परछाई की उपमा से समझाया जा सकता है। अर्थात् जल में जैसे चन्द्र की परछाई दिखाई देती है, उसी तरह संसार में जीव भी ब्रह्म की छायाएं हैं किंतु ऐसा मानने में कठिनाई यह है कि जैसे जल के हटने से उनमें दिखाई देने वाला चन्द्र समाप्त हो जाता है, इसी तरह अविद्या के हटने से संसार में दिखाई देने वाले जीव बिल्कुल नष्ट हो जाएंगे।

इससे बचने के लिए अद्वैतवादी एक दूसरी उपमा का सहारा लेते हैं। वे कहते हैं कि सर्वव्यापी आकाश घड़े की सीमाओं में बंधकर अलग-अलग जीवों और विषयों के रूप में प्रतीत होता है किंतु जब घड़ा फूट जाता है तो उसके अन्दर का आकाश बाहर का व्यापक आकाश बन जाता है। इसी तरह सीमाओं के समाप्त होने पर उनमें दिखाई देने वाला ब्रह्म अपने असली रूप में पहुंच जाता है। मुक्ति का यही अर्थ है कि मनुष्य सीमाओं का विचार छोड़़कर ब्रह्म को पहचाने। इस मत को ‘अवच्छेदनवाद’ कहते हैं।

मुक्ति

मुक्ति का अर्थ जगत् के परिवर्तनशील रूपों के पीछे ब्रह्म की एकता को पहचानना है। इसलिए ‘मुक्ति’ ज्ञान की अवस्था है और इसी जीवन में प्राप्त हो सकती है। मुक्ति पाकर भी मनुष्य जीवित रहता हुआ अपने दैनिक कर्म करता रह सकता है।

शंकर लिखते हैं कि व्यास, वसिष्ठ, भृगु, नारद आदि ऋषि मुक्ति के बाद भी अपने-अपने काम करते रहे। इसलिए मुक्ति का अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि जीवन समाप्त हो जाए अपितु इसका आशय यह है कि हम सही ज्ञान से जगत में इनके पीछे जो ब्रह्म मौजूद है उसे पहचानें। ऐसा करने से आसाक्ति, तृष्णा, और दुःख अपने आप नष्ट हो जाते हैं। वेदान्ती इसे ‘जीवन मुक्ति’ कहते हैं।

नैतिक आचरण पर बल

यह ज्ञान प्राप्त करने के लिए अच्छे आचरण की आवश्यकता है। जिन कर्मों से इसकी प्राप्ति में मदद मिलती है, वे पुण्य हैं और जिनसे इसमें बाधा पहुँचती है, वे पाप हैं। सत्य, अहिंसा, दया एवं परोपकार आदि पुण्यकर्म हैं और झूठ, हिंसा, अत्याचार आदि पाप हैं। पाप वही व्यक्ति करता है जो शरीर या इन्द्रिय को नित्य मानकर उसकी संतुष्टि की चेष्टा करता है। जो ऐसा नहीं मानता और इनके पीछे के ब्रह्म को जानता है, वह समस्त संसार को एक-समान समझता है।

उसके अन्दर सर्वात्मभाव होता है और मन में अपने-पराये का भेद नहीं रहता। वह स्वयं को औरों में एवं औरों को स्वयं में अनुभव करता है। इसलिए उसके हर कार्य में सच्चाई, अहिंसा और परोपकार का भाव होता है, उससे पाप हो ही नहीं सकता। इस प्रकार वेदान्त मनुष्य को उच्च नैतिक आचार की ओर ले जाता है, जिसका आधार विद्या और ज्ञान है।

क्या जगद्गुरु शंकराचार्य इस्लाम से प्रभावित थे?

यद्यपि शंकराचार्य के समय तक इस्लाम का जन्म नहीं हुआ था तथापि डॉ. ताराचन्द की पुस्तक ‘इन्फ्लुएन्स ऑफ इस्लाम ऑन इण्डियन कल्चर’ में लिखा है कि शंकराचार्य इस्लामी प्रभाव से आविर्भूत हुए।

प्रोफेसर हुमायँ कबीर ने हिन्दु-मुस्लिम एकता के उद्देश्य से ‘अवर हेरिटेज’ नामक पुस्तक लिखी। उनके अनुसार भी शंकर इस्लाम से प्रभावित थे।

उसके बाद के बहुत से लेखकों ने डॉ. ताराचन्द तथा हुमायँ कबीर को उद्धृत करते हुए इस सिद्धांत को बार-बार दोहराया।

इन लोगों द्वारा ऐसा कहने का आधार यह है कि इस्लाम और शंकर दोनों ही एकेश्वरवाद में विश्वास करते हैं। जबकि वे इस तथ्य को भूल जाते हैं कि इस्लाम के जन्म से हजारों साल पहले लिखे गए वेदों में अनेक देवताओं की पूजा किए जाने पर भी एक ही परम-सत्ता अथवा एक ही ब्रह्म अथवा एक ही विराट पुरुष का अस्तित्व स्वीकार किया गया है। वस्तुतः शंकर का ऐकेश्वरवाद भारतीय अद्वैतवाद का ही विकसित रूप है और उसका इस्लामी एकेश्वरवाद से कोई साम्य नहीं है।

हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षधर विद्वानों का कहना है कि इस्लाम ईश्वर को एक मानता है और विश्वास करता है कि सृष्टि की रचना ईश्वर ने की है, वह सातवें आकाश पर रहता है एवं उसके हृदय में भक्तों के लिए प्रेम और दुष्टों के लिए घृणा है। संसार असत्य है अर्थात् जो कुछ हम देखते हैं वह ‘कुछ नहीं में कुछ होने का आभास है’।

वास्तविकता यह है कि ये बातें इस्लाम में न तो पहले थीं और न अब हैं। यह सिद्धांत ईसा की नौवीं-दसवीं सदी के बाद सूफियों द्वारा प्रतिपादित किया गया। सूफियों को यह ज्ञान कुछ तो प्रत्यक्षतः ब्राह्मणों से और कुछ नव-अफलातूनी मत से मिला था। नव-अफलातूनी मत के प्रवर्त्तक प्लॉटिनस ने एकेश्वरवाद का सिद्धांत ब्राह्मणों और बौद्धों से प्राप्त किया था।

सूफियों के एकेश्वरवाद के सिद्धांत से अलग, शंकर का ब्रह्म, शुद्ध, बुद्ध, चैतन्य, निराकार और निर्विकार है। उसे भक्तों की चिन्ता नहीं है और न ही दुष्टों को दण्ड देने की चिंता है। शंकर के अनुसार, ईश्वर और जगत् दोनों ही सत् हैं किंतु जगत् का कारण भी ईश्वर ही है।

इस प्रकार शंकर का मत शुद्ध अद्वैत मत है किन्तु इस्लाम शुद्ध या विशिष्ट, किसी भी प्रकार के अद्वैतवाद में विश्वास नहीं करता। उसका विश्वास सिर्फ एक अल्लाह में है। सृष्टि के स्वभाव के विषय में भी कुरान का सिद्धांत शंकर के ठीक विपरीत है। अतः निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इस्लाम का एक अल्लाह का सिद्धांत, शंकर के अद्वैतवाद से बिल्कुल भिन्न है तथा शंकर पर इस्लाम का रंच मात्र भी प्रभाव नहीं है।

क्या जगद्गुरु शंकराचार्य प्रच्छन्न बौद्ध थे?

शंकराचार्य की दार्शनिक परम्परा की जड़ें उपनिषदों एवं ऋग्वेद के नासदीय-सूक्त तक पहुँचती हैं जिनमें जीवन और सृष्टि के विषय में मौलिक प्रश्न उठाये गए थे। उन्हीं प्रश्नों का समाधान खोजते-खोजते पहले उपनिषद, फिर बौद्ध दर्शन और अन्त में शंकर का सिद्धान्त प्रकट हुआ। शंकर के निकटतम वैचारिक-पूर्वज बौद्ध दार्शनिक थे जिन्होंने शून्यवाद की स्थापना की थी।

Bhartiya-Sabhatiya aur Sanskriti ka Ithas
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जो बौद्धों का शून्यवाद था, वहीं शंकर का मायावाद हुआ। शंकर ने बौद्धों से आगे बढ़कर एक तटस्थ ब्रह्म को स्थान दिया जो कि उपनिषदों के युग से चला आ रहा था। शून्यवाद को मायावाद के नाम से अपनाने के कारण ही रूढ़िवादी हिन्दू, शंकर को ‘प्रच्छन्न बौद्ध’ कहते थे। शंकर ने ब्रह्म की कल्पना जिस रूप में की थी, वह भक्तों के लिए निराशाजनक थी, क्योंकि भक्तों की प्रार्थना सुनने के लिए इस ब्रह्म के कान की खिड़कियां खुली हुई नहीं थीं। इसीलिए शांकर-मत के विरूद्ध, तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई और बाद के लगभग समस्त आचार्य ईश्वर के सगुण-साकार स्वरूप की ओर मुड़े। जगद्गुरु शंकराचार्य के गुरु गोविन्दाचार्य अथवा गोविंद स्वामी थे और गोविन्दाचार्य के गुरु गौडपादाचार्य थे जिन्होंने माण्डूक्योपनिषद पर कारिका लिखी थी। इस कारिका के चतुर्थ प्रकरण के आरम्भ में उन्होंने बुद्ध की वन्दना की। संभवतः इस कारण भी कुछ रूढ़िवादी हिन्दू शंकर पर प्रच्छन्न बौद्ध होने का आरोप लगाने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते। शून्यवाद और मायावाद भारतीय दर्शन में उपनिषदों के युग से उपस्थित हैं। उनका ज्ञान यूनान तक भी पहुँच चुका था। बौद्ध दर्शन पर उपनिषदों के इन विचारों का प्रभाव था जिसके कारण ही बौद्धौं ने शून्यवाद का प्रतिपादन किया।

जगद्गुरु शंकराचार्य ने इससे सहमति व्यक्त की और इस कारण कहा जाने लगा कि शंकर के विचारों पर पांचवीं शताब्दी ईस्वी के बौद्ध-दार्शनिक वसुबन्धु का प्रभाव है और वे ‘प्रच्छन्न बौद्ध’ हैं।

यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि शंकर ने अनेक बौद्ध शास्त्रार्थियों को परास्त किया तथा प्रत्येक शास्त्रार्थ में बौद्ध दर्शन का खण्डन किया किंतु साथ ही बौद्धों के दर्शन की अच्छी बातें अपने दर्शन में सम्मिलित कीं जिससे बौद्ध धर्म की आवश्यकता ही समाप्त हो गई।

प्रसिद्ध दार्शनिक सुरेन्द्रनाथ दास ने भारतीय दर्शन परिषद के स्मारक ग्रन्थ में लिखा है कि नागार्जुन शून्यवादी थे। नागार्जुन का मानना था कि संसार में किसी भी वस्तु की सत्ता नहीं है। ‘कुछ नहीं में कुछ होने का भ्रम’ होता है। न तो कोई वस्तु उत्पन्न होती है, न नष्ट होती है।

लंकावतार-सूत्र का दर्शन यद्यपि विज्ञानवादी है तब भी वह नागार्जुन का ही दर्शन है। यह दर्शन भी मानता है कि हम जो कुछ देख रहे हैं, वह अपनी मानस-तरंग के कारण है। वस्तुतः बाह्य जगत से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। क्योंकि जगत सत्य है ही नहीं। इसी विचार को मैत्रैय और असंग ने आगे बढ़ाया तथा वसुबन्धु ने उसका विस्तार किया।

जगद्गुरु शंकराचार्य ने उपनिषदों का जो वेदान्ती भाष्य किया, उसकी नींव वसुबन्धु के दर्शन में डाली जा चुकी थी। शंकर ने ब्रह्म को ही एकमात्र सत्य मानते हुए भी जगत् की भी सत्ता स्वीकार की है तथा उसे व्यावहारिक सत्य माना है जो उन्हें बौद्धों के शून्यवाद से अलग करता है।

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में कहा जा सकता है किजगद्गुरु शंकराचार्य का मत अपने आप में पूर्ण स्वतंत्र है, उस दर्शन का आधार वेदांत अर्थात् उपनिषद हैं, न कि इस्लाम या बौद्ध धर्म। शंकर ने भारतीय संस्कृति, धर्म-दर्शन एवं अध्यात्म को जितना प्रभावित किया, उतना बहुत कम दार्शनिक कर पाए हैं। उन्होंने आने वाली सदियों के लिए हिन्दू-धर्म को पूरी तरह से बदल दिया। आने वाले युगों के दार्शनिक जगद्गुरु शंकराचार्य का खण्डन या मण्डन करके ही नए दार्शनिक सिद्धांतों का प्रतिपादन कर सकते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यह भी देखें-

उपनिषदों का चिंतन

अनुक्रमणिका – दिल्ली सल्तनत की दर्द भरी दास्तान

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प्राक्कथन - दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान www.bharatkaitihas.com
Cover Page of दिल्ली सल्तनत की दर्द भरी दास्तान

अनुक्रमणिका – दिल्ली सल्तनत की दर्द भरी दास्तान पृष्ठ पर डॉ. मोहन लाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक दिल्ली सल्तनत की दर्द भरी दास्तान के अध्यायों का क्रम दिया गया है। नीचे दिए गए शीर्षकों को क्लिक करके सम्बन्धित अध्याय तक पहुंचा जा सकता है।

1.            किताबें लिखे जाने से पहले पूरी दुनिया सनातन धर्म को मानती थी!

2.            अरब के रेगिस्तान में भी पूजे जाते थे भारतीय देवी-देवता!

3.            जेहाद ने इस्लाम को धरती के कौने-कौने तक पहुंचा दिया!

4.            मुहम्मद बिना कासिम ने भारत का जेहाद से प्रथम परिचय करवाया!

5.            हिन्दू राजाओं ने खलीफाओं द्वारा भेजी गई सेनाओं को नष्ट कर दिया!

6.            जब अरबी लड़ाके विफल हो गए तो तुर्की गुलाम इस्लाम को भारत ले आए!

7.            यदि खलीफा मुझे सुल्तान मान ले तो मैं हर साल भारत पर हमला करूंगा!

8.            महमूद के हाथों अपमानित होकर राजा जयपाल जीवित ही चिता पर बैठ गया!

9.            महमूद गजनवी नगरकोट में स्थित चांदी का महल तोड़कर गजनी ले गया!

10.         महमूद गजनवी ने सरस्वती नदी के तट पर लगी चक्रस्वामी की प्रतिमा गजनी के चौक पर डाल दी!

11.         गजनी के आक्रांता ने मथुरा से सोने की बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ लूट लीं!

12.         महमूद की शातिराना चालों और भारतीयों की मूर्खताओं ने स्वर्ण-भण्डारों के मुंह खोल दिए!

13.         महमूद ने कन्नौज के प्रतिहारों का सर्वनाश कर दिया!

14.         महमूद गजनवी ने चंदेल राजा विद्याधर को औरतें उपहार में भिजवाईं!

15.         महमूद ने सोमनाथ महालय की देवदासियां और स्वर्ण-भण्डार लूटने का निश्चय किया!

16.         सोने के गहनों से लदी देवदासियां लूटने साँप- बिच्छुओं से भरे रेगिस्तान में घुस गया महमूद!

17.         महमूद ने थार के रेगिस्तान में बने पत्थरों के आश्चर्यों को तोड़ दिया!

18.         महमूद ने सोमनाथ के मंदिर में वही बुत देखे जो इस्लाम के उदय से पहले अरब में पूजे जाते थे!

19.         पचास हजार हिन्दुओं ने आराध्य देव की रक्षा के निमित्त प्राण न्यौछावर कर दिए!

20.         महमूद ने सोमनाथ का हजारों साल पुराना शिवलिंग भंग कर दिया!

21.         भारतीयों ने महमूद को भारत में ही घेरकर मारने की योजना बनाई!

22.         क्या महमूद को सोमनाथ और मनात एक जैसे लगे!

23.         टुबरकुलोसिस और मलेरिया ने महमूद गजनवी की जान ले ली!

24.         भारतीय इतिहासकारों ने महमूद को पवित्र सुल्तान घोषित कर दिया!

25.         सिंध के जाटों ने नियाल्तगीन का सिर काट लिया!

26.         हिन्दू राजाओं के संघ ने गजनी के गवर्नरों से भारतीय दुर्ग खाली करवाए!

27.         लाहौर से लेकर आगरा तक गजनी के सांप लहराने लगे!

28.         राजा सुहेल देव ने सालार मसूद गाजी को मार डाला!

29.         गजनी के गवर्नर डेढ़ सौ साल तक भारत को खोखला करते रहे!

30.         गजनवियों के लिए चौहान रूपी चट्टान को तोड़ना आवश्यक हो गया!

31.         गजनी में सत्ता परिवर्तन ने भारत में तुर्की साम्राज्य की स्थापना का मार्ग खोल दिया!

32.         मुहम्मद गौरी के आक्रमणों के समय बिखरा हुआ था भारत!

33.         मुहम्मद गौरी ने भारत के समस्त मुस्लिम अमीरों के राज्य छीन लिए!

34.         झूठ बोलकर पराजय की पीड़ा छिपाने का प्रयास किया भारतीयों ने!

35.         राजा धीर पुण्ढीर ने मुहम्मद गौरी को युद्ध में जीवित ही पकड़ लिया!

36.         पृथ्वीराज चौहान के मंत्री और सेनापति मुहम्मद गौरी से मिल गए!

37.         मुहम्मद गौरी ने सम्राट पृथ्वीराज का शिविर बूचड़खाने में बदल दिया!

38.         सम्राट पृथ्वीराज चौहान को शत्रुओं ने जीवित ही पकड़ लिया!

39.         पृथ्वीराज चौहान की हत्या के लिए मुहम्मद गौरी और प्रतापसिंह दोनों जिम्मेदार थे!

40.         राजा जयचंद के हाथी ने मुहम्मद गौरी को प्रणाम नहीं किया!

41.         पांच सौ मन हीरों का मालिक अपनी बेटी के मकबरे में दफनाया गया!

42.         एक कुरूप तुर्की गुलाम भारत का भाग्य-विधाता बन गया!

43.         कुतुबुद्दीन ऐबक ने यल्दूज की बेटी से ब्याह कर लिया!

44.         कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत का राजमुकुट युद्ध के मैदानों में मिला था!

45.         राजपूतों ने बीठली में घुसकर दरोगा सैयद हुसैन खनग सवार मीरन को मार डाला!

46.         बख्तियार खिलजी ने नालंदा एवं विक्रमशिला के बौद्ध भिक्षुओं एवं स्नातकों को क्रूरता से मारा!

47.         क्या कुतुबुद्दीन ऐबक के राज्य में भेड़ और भेड़ियाएक ही घाट पर पानी पी रहे थे!

48.         जिस कुतुबुद्दीन ऐबक ने उत्तरी भारत को उजाड़ दिया, उसे महान् निर्माता कहा गया!

49.         बुखारा के बाजार का एक और गुलाम दिल्ली का सुल्तान बन गया!

50.         इल्तुतमिश की जान के दुश्मन बन गए कुबाचा, यल्दूज और अलीमर्दान!

51.         अपने शत्रुओं को चुन-चुन कर मारा इल्तुतमिश ने!

52.         राजस्थान के राजपूतों ने इल्तुतमिश को नाकों चने चबवा दिए! 

53.         हिन्दू राजा लड़ते रहे और अपनी धरती बचाते रहे!

54.         इल्तुतमिश ने ग्वालियर दुर्ग के सामने आठ सौ मनुष्यों का कत्ल किया!

55.         हिन्दू राजाओं को भेड़िया और स्वयं को भेड़ समझते थे इल्तुतमिश के सेनापति!

56.         चालीसा का गठन करके अपनी ही औलादों की कब्र खोद दी इल्तुतमिश ने!

57.         भारत में मुस्लिम सल्तनत का वास्तविक संस्थापक कौन था!

58.         एक खूबसूरत बला शाह तुर्कान ने दिल्ली सल्तनत पर कब्जा कर लिया!

59.         दिल्ली के मनचलों ने खूबसूरत शाह तुर्कान का सिर काट दिया!

60.         रजिया घोड़े पर बैठकर तुर्की अमीरों को फटकारने लगी!

61.         रजिया के इतिहास पर सौंदर्य और प्रेम के किस्से हावी हो गए!

62.         याकूत हब्शी से प्रेम करने लगी रजिया सुल्तान!

63.         रजिया ने रणथंभौर तथा ग्वालियर के दुर्ग हिन्दुओं को सौंप दिए!

64.         रजिया ने मक्कार अल्तूनिया से विवाह कर लिया!

65.         कुछ लुटेरों ने रजिया तथा अल्तूनिया को मार दिया!

66.         एतिगीन ने सुल्तान की बहिन से जबर्दस्ती विवाह कर लिया!

67.         नासिरुद्दीन औरतों के कपड़े पहनकर दिल्ली में घुसा और सुल्तान बन गया!

68.         इल्बरी कबीले का एक और गुलाम दिल्ली पर राज करने आ पहुँचा!

69.         सुल्तान नासिरुद्दीन ने हिन्दू राजाओं का क्रूरता से दमन किया!

70.         एक तुर्की गुलाम दिल्ली आकर जिल्लेइलाही बन गया!

71.         मुस्लिम इतिहासकारों ने बलबन को पैगम्बर मान लिया!

72.         बलबन ने प्रत्येक मेव के सिर के बदले चांदी के दो टंके दिए।

73.         बलबन की क्रूरता के आगे तैमूर और नादिरशाह की तलवारों की चमक फीकी पड़ गई!

74.         चित्तौड़ ने बलबन को पराजय की धूल चटाई!

75.         बलबन ने बंगाल के शासक तुगरिल खाँ को लखनौती के बाजार में फांसी पर चढ़ा दिया!

76.         बलबन ने चांदी के लाखों टंकों में भी व्यापारी को दर्शन नहीं दिए!

77.         कुरूप किंतु भाग्यवान् बलबन ने दिल्ली सल्तनत को मजबूती से जमा दिया!

78.         बलबन का शहजादा सल्तनत छोड़कर भाग गया!

79.         सुल्तान कैकुबाद ने पिता को अपने पैरों में गिराकर सलाम करवाया!

80.         खिलजियों ने सुल्तान को लातों से मारकर यमुनाजी में फैंक दिया!

81.         हिन्दुओं के ढोल नगाड़े सुनकर खून के आंसू रोता था जलालुद्दीन खिलजी!

82.         चीटियों और टिड्डियों की तरह छज्जू के साथ हो गए बागी हिन्दू!

83.         सुल्तान ने बागियों का स्वागत शराब और सुंदरियों से किया!

84.         सीदी मौला ने सुल्तान को मारकर भारत का खलीफा बनना चाहा!

85.         मेरे सैनिकों के सिर का एक बाल रणथंभौर के सौ किलों से अधिक कीमती है!

86.         जलालुद्दीन खिलजी ने मंगोलों को अपनी बेटी देकर दिल्ली में बसा लिया!

87.         देवगिरि के यादवों ने अल्लाउद्दीन को पचास मन सोना, पांच मन मोती, दो मन हीरे और एक हजार मन चाँदी दी!

88.         अल्लाउद्दीन खिलजी ने सुल्तान का सिर भाले पर लटकाकर अवध के शहरों में घुमाया!

89.         सुल्तानों के खून का प्यासा था दिल्ली का शाही तख्त!

90.         अल्लाउद्दीन खिलजी की सास दिल्ली में घुसने से नहीं रोक सकी अल्लाउद्दीन को!

91.         अल्लाउद्दीन खिलजी ने जलाली अमीरों की आँखें फोड़कर जेल में ठूंस दिया!

92.         अल्लाउद्दीन खिलजी ने नबी बनने का फैसला किया!

93.         मंगोलों ने अल्लाउद्दीन खिलजी को दिल्ली की गलियों में ढूंढा!

94.         अल्लाउद्दीन खिलजी ने मंगोलों के सिर कटवाकर मीनारें बनवाईं!

95.         अल्लाउद्दीन खिलजी ने मंगोलों के कटे हुए सिर सीरी दुर्ग की नींव में डलवाए!

96.         उलूग खाँ कर्ण बघेला की रानी को उठा लाया!

97.         जालोर के चौहानों ने खिलजियों से सोमनाथ के खण्ड छीन लिए!

98.         जैसलमेर के राजकुमारों ने अल्लाउद्दीन खिलजी की माँ को लूट लिया!

99.         भूख से व्याकुल तुर्की सैनिक जैसलमेर का दुर्ग छोड़कर भाग गए!

100.       मंगोल अपनी वेश्याओं को लेकर जालोर से भाग गए!

101.       रणथंभौर दुर्ग में छल से घुस गया अल्लाउद्दीन खिलजी!

102.       चित्तौड़ दुर्ग को मिट्टी में मिलाने निकल पड़ा अल्लाउद्दीन खिलजी!

103.       चित्तौड़ की महारानी को छीनना चाहता था अल्लाउद्दीन!

104.       पृथ्वीराज रासो से आई है मलिक मुहम्मद जायसी की पद्मावती!

105.       राणा हमीर ने शत्रुओं को पत्थरों से बांधकर चित्तौड़ दुर्ग की दीवारों से नीचे गिरा दिया!

106.       शहजादी फीरोजा ने जालोर के राजकुमार वीरमदेव से विवाह करने का प्रण लिया!

107.       वीरमदेव के कटे हुए सिर ने शहजादी को देखकर मुंह फेर लिया!

108.       शहजादी फीरोजा की धाय गुलबहिश्त ने जालोर पर आक्रमण किया!

109.       सिवाना के राजा सातलदेव का विशाल शरीर देखकर अल्लाउद्दीन खिलजी हैरान रह गया!

110.       मलिक काफूर कर्ण बघेला की पुत्री देवलदेवी को उठा लाया!

111.       राजा प्रताप रुद्रदेव ने मलिक काफूर को कोहीनूर हीरा दिया!

112.       अल्लाउद्दीन खिलजी ने सिद्ध कर दिया कि अनपढ़ ही शासन कर सकते हैं!

113.       अल्लाउद्दीन खिलजी के राज्य में वेश्याएं सस्ती थीं और घोड़े महंगेे!

114.       हिन्दू रियाया को पेट भर अनाज नहीं दिया अल्लाउद्दीन खिलजी ने!

115.       तुर्की अमीरों की शराब और वेश्याएं छीन लीं अल्लाउद्दीन खिलजी ने!

116.       मामूली अपराध के संदेह में हाथ-पैर कटवा देता था अल्लाउद्दीन खिलजी!

117.       अल्लाउद्दीन खिलजी की क्रूरता ने दिल्ली सल्तनत को उसके चरम पर पहुंचा दिया!

118.       सर्वथा गौरवहीन था अल्लाउद्दीन खिलजी का शासन!

119.       पागलों की तरह दहाड़ें मार कर रोता था अल्लाउद्दीन खिलजी!

120.       एक किन्नर ने अल्लाउद्दीन खिलजी की बेगम से विवाह कर लिया!

121.       सुल्तान मुबारक खाँ नंगा होकर दरबार में दौड़ने लगा!

122.       इस्लाम के नाम पर तुर्की अमीरों ने भारतीय अमीरों को नष्ट कर दिया!

123.       खुरासान से आया गुमनाम व्यक्ति भारत का सुल्तान बन गया!

124.       गाजी तुगलक ने हिन्दू प्रजा पर धन रखने से रोक लगा दी!

125.       शहजादे ने सुल्तान को तम्बू के नीचे दबा कर मार दिया!

126.       निजामुद्दीन औलिया और अब्बासी खलीफा ने मुहम्मद तुगलक को दिल्ली का सुल्तान मान लिया!

127.       मुहम्मद बिन तुगलक ने किसानों को जंगलों से पकड़कर मार डाला!

128.       लोग गालियां लिखे कागज तीरों में बांधकर मुहम्मद बिन तुगलक के महल में फैंकते थे!

129.       तुगलक की सेना ने घरों में घुसकर सोने-चांदी की मुद्राएं छीन लीं!

130.       कराजली औरतों के लिए मुहम्मद तुगलक ने कराजल पर हमला किया!

131.       मुहम्मद बिन तुगलक ने बागी अमीरों की खाल में भूसा भरवा कर देश भर में घुमाया!

132.       मुहम्मद बिन तुगलक के जीते जी हिन्दुओं ने विजयनगर तथा चित्तौड़गढ़ राज्य खड़े कर लिए!

133.       दक्षिण भारत में पांच शिया राज्य खड़े हो गए!

134.       मुल्ला-मौलवियों ने मुहम्मद बिन तुगलक को पागल घोषित कर दिया!

135.       खतरे में थे हिन्दुओं के चोटी, पोथी और मूर्ति!

136.       फीरोज तुगलक ने मुल्ला-मौलवियों पर धन की बरसात कर दी!

137.       उलेमाओं के हाथों की कठपुतली बन गया फीरोज तुगलक!

138.       मुहम्मद बिन को माफी नहीं देने वालों को फीरोज तुगलक के सैनिकों ने जमकर मारा!

139.       मुस्लिम स्त्रियों का करुण क्रंदन नहीं सुन सकता था फीरोज तुगलक!

140.       लूट के माल में से पांचवा हिस्सा लेता था फीरोज तुगलक!

141.       अपराधी को महल के समक्ष जीवित जलवाता था फीरोजशाह तुगलक!

142.       औरतों के कपड़ों में छिपकर सुल्तान से मिला शहजादा!

143.       फीरोजशाह तुगलक ने मूर्तिपूजक ब्राह्मण को लड़की की मुहर के साथ जीवित जला दिया!

144.       वजीर अय्याशी करता रहा और दिल्ली सल्तनत बिखरती रही!

145.       तुर्की अमीर दरबार में वेश्याएं नचाते रहे और दिल्ली सल्तनत बिखरती रही!

146.       प्रत्येक तुगलक ने दिल्ली सल्तनत के कफन में एक कील ठोक दी!

147.       तैमूर लंग ने भटनेर के किले में दस हजार हिन्दुओं को मार डाला!

148.       तैमूर लंग ने दिल्ली के बाहर एक लाख हिन्दू मार डाले!

149.       दिल्ली शहर में तैमूर लंग ने आकाश तक ऊंचे मानव-खोपड़ियों के ढेर लगवा दिए!

150.       लाखों पहाड़ी हिन्दुओं ने स्वातंत्र्य देवी के श्रीचरणों में अपने प्राण न्यौछावर किए!

151.       तैमूर लंग के विध्वंस के बाद लोग एक दूसरे से आँख नहीं मिलाते थे!

152.       समरकंद की तरफ से दिल्ली पर शासन करने लगा खिज्र खाँ!

153.       दिल्ली का तख्त छोड़कर बदायूँ चला गया सुल्तान!

154.       अफगानिस्तान से आए लोदी दिल्ली के सुल्तान बन गए!

155.       सिकंदर लोदी ने अफगानी अमीरों को तमीज से पेश आने का पाठ पढ़ाया!

156.       सिकंदर लोदी ने दिल्ली सल्तनत के प्रत्येक अंग पर शिकंजा कस लिया!

157.       मुस्लिम औरतों को पीरों की मजारों पर जाने से रोक दिया सिकंदर लोदी ने!

158.       हिन्दुओं को तीर्थों में स्नान करने से रोक दिया सिकंदर लोदी ने!

159.       सिकंदर लोदी ने ग्वालियर के तोमरों के विरुद्ध जेहाद घोषित किया!

160.       सिकंदर लोदी को लगता था कि अफगानी अमीर सुल्तान के गुलामों की पालकी भी उठा लेंगे!

161.       इब्राहीम लोदी ने अपने भाई जलाल खाँ की हत्या करवा दी!

162.       इब्राहीम लोदी ने अपने विजयी सेनापति को छल से पकड़ लिया!

163.       इब्राहीम लोदी ने ग्वालियर के राजा को शम्साबाद का जागीरदार बना दिया!

164.       हुमायूँ ने विक्रमादित्य की रानी से कोहिनूर छीन लिया!

165.       महाराणा सांगा ने इब्राहीम लोदी में कसकर मार लगाई!

166.       अपने अमीरों के खून का प्यासा था इब्राहीम लोदी!

167.       इब्राहीम लोदी ने अपने सेनापतियों को आपस में लड़वाकर मरवा दिया!

168.       बाबर ने लोदी सैनिकों के सिरों का चबूतरा बनवाया!

169.       दिल्ली सल्तनत के काल में काश्मीर में मुस्लिम जनसंख्या का प्रसार हो गया!

170.       जौनपुर तथा खानदेश दिल्ली सल्तनत से अलग हो गए!

171.       बंगाल को अपने अधीन नहीं रख पाई दिल्ली!

172.       बंगाली सुल्तानों की छत्रच्छाया में बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या का प्रसार हो गया!

173.       दिल्ली सल्तनत से मुक्त होने पर गुजरात में मुस्लिम जनसंख्या का प्रसार हुआ!

174.       प्रतिदिन जहर खाकर जिंदा रहता था गुजरात का महमूद बेगड़ा!

175.       गोरियों एवं खिलजियों ने मालवा में मुस्लिम जनसंख्या का प्रसार किया!

प्राक्कथन – दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान

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प्राक्कथन - दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान www.bharatkaitihas.com
Cover Page of दिल्ली सल्तनत की दर्द भरी दास्तान

प्राक्कथन – दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक ‘दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान’ के अध्यायों के शीर्षक उपलब्ध कराए गए हैं। इन शीर्षकों पर क्लिक करके उन अध्यायों को पढ़ा जा सकता है।

भारत आदिकाल से हिन्दुओं का देश है। सृष्टिकर्ता ने इस देश को प्राकृतिक सम्पदा, मेधा एवं संस्कृति की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध बनाया है। जिस समय संसार के अधिकांश देश मानव-सभ्यता की आदिम अवस्थाओं में जी रहे थे, भारत भूमि पर भव्य नगरों, गगनचुम्बी प्रासादों, विशाल यज्ञशालाओं एवं राजपथों का निर्माण हो चुका था और वेदों एवं उपनिषदों से लेकर रामायण एवं महाभारत जैसे महाकाव्यों की रचना हो चुकी थी।

उस काल में भारत की सामाजिक रचना संसार भर में श्रेष्ठ थी जिसके कारण प्रजा सम्पन्न एवं सुखी थी। लोगों का जीवन सरल था और वे परिश्रमी एवं आमोद-प्रिय थे।

प्रकृति ने भारत को पूर्व में बंगाल की खाड़ी, दक्षिण में हिन्द महासागर, पश्चिम में अरब की खाड़ी, उत्तर-पश्चिम में हिन्दुकुश पर्वत एवं उत्तर में हिमालय पर्वतमाला खड़ी करके एक अद्भुत सुरक्षा-चक्र का निर्माण किया था किंतु भारत की भौतिक सम्पदा की कहानियाँ दूर-दूर तक व्याप्त हो जाने से दूरस्थ देशों के लोग भारत को लूटने के लिए लालायित रहने लगे। यही कारण था कि ईसा के जन्म से सैंकड़ों साल पहले पश्चिमी आक्रांताओं ने हिन्दुकुश पर्वत को पार करके भारत पर आक्रमण करने आरम्भ कर दिए।

इन आक्रांताओं में यूनानी, शक, कुषाण, हूण, पह्ल्लव, बैक्ट्रियन आदि प्रमुख थे। इन आक्रांता-जातियों ने थलमार्ग से हजारों मील की यात्राएं करके भारत पर आक्रमण किए और विभिन्न कालखण्डों में न केवल भारत की अतुल सम्पदा को लूटने में सफल हुए अपितु भारत के विभिन्न प्रदेशों पर अधिकार जमाने में भी सफल रहे किंतु भारत की उदार सामाजिक व्यवस्था एवं शत्रु के प्रति भी सहिष्णु रहने वाली संस्कृति ने सैंकड़ों साल की अवधि में इन विदेशी आक्रांताओं को भारतीय बनाकर आत्मसात कर लिया। इस कारण भारतीय समाज की शांति बनी रही।

चौथी शताब्दी ईस्वी से लेकर छठी शताब्दी ईस्वी तक के कालखण्ड में जो हूण कबीले भारत पर आक्रमण किया करते थे और जिन्हें गुप्त शासकों ने भारत से मार भगाया था, उन्हीं हूण कबीलों में से एक कबीला छठी शताब्दी ईस्वी के आसपास तुर्क कहलाने लगा तथा कई शाखाओं में बंट गया। जब सातवीं शताब्दी ईस्वी में इस्लाम का उदय हुआ तो ये तुर्क, इस्लाम का विरोध करने लगे किंतु नौंवी शताब्दी के आते-आते तुर्कों ने अरब के मुसलमानों की सेनाओं में भर्ती होना तथा इस्लाम स्वीकार करना आरम्भ कर दिया।

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जब मध्यएशिया में इस्लाम का प्रसार हो गया तो अरब, तुर्क एवं अफगान जातियां नए उद्देश्यों के साथ भारत पर आक्रमण करने को लालायित हुईं- (1) वे भारत की सम्पदा को लूटना चाहते थे। (2) वे भारत के लोगों को पकड़कर गुलामों के रूप में बेचना चाहते थे। (3) वे भारत में इस्लाम का प्रसार करना चाहते थे। (4) वे भारत में अपने राज्य स्थापित करना चाहते थे। ई.712 में भारत पर इस्लाम का पहला आक्रमण अरबी मुसलमानों द्वारा किया गया था। उसके बाद ई.977 से लेकर ई.1192 तक अर्थात् पूरे 215 साल की दीर्घ अवधि तक अनेक तुर्की एवं अफगान कबीले उत्तरी भारत पर आक्रमण करते रहे। वे विशाल सेनाएं लेकर भारत में घुस आते और यहाँ की सम्पदा लूटकर तथा मनुष्यों एवं पशुओं को लेकर भाग जाते। ई.1192 में एक तुर्की कबीला भारत में अपना राज्य स्थापित करने में सफल रहा। ई.1192 से ई.1526 तक अर्थात् पूरे 334 साल तक मध्य-एशिया एवं अफगानिस्तान से के विभिन्न तुर्की कबीलों ने पश्चिम में हिन्दुकुश पर्वत से लेकर पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक तथा उत्तर में हिमालय की तराई से लेकर दक्षिण में हिन्दमहासागर तक छोटे-बड़े कई राज्य स्थापित कर लिए जिनमें सबसे बड़ा एवं सबसे प्रमुख राज्य ‘दिल्ली’ सल्तनत के नाम से विख्यात था।

इस पुस्तक में ई.622 में इस्लाम के उदय से लेकर, भारत में तुर्की आक्रमणों की बाढ़, ई.1192 में दिल्ली सल्तनत की स्थापना एवं ई.1526 में दिल्ली सल्तनत के अवसान तक का इतिहास लिखा गया है। इस पुस्तक का लेखन यूट्यूब चैनल ‘ग्लिम्प्स ऑफ इण्डियन हिस्ट्री बाई डॉ. मोहनलाल गुप्ता’ पर प्रसारित ‘दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान’ नामक लोकप्रिय वी-ब्लॉग धारावाहिक के लिए किया गया था। इस धारावाहिक की कड़ियां यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं।

भारत में तुर्कों के आगमन एवं तुर्की सल्तनत के इतिहास की वे छोटी-छोटी हजारों बातें जो आधुनिक भारत के कतिपय षड़यंत्रकारी इतिहासकारों द्वारा इतिहास की पुस्तकों का हिस्सा बनने से रोक दी गईं किंतु तत्कालीन दस्तावेजों, पुस्तकों एवं विदेशी यात्रियों के वर्णनों में उपलब्ध हैं, इस धारवाहिक के माध्यम से देश-विदेश में रह रहे लाखों हिन्दीभाषी दर्शकों तक पहुंचीं।

बहुत से दर्शकों की मांग थी कि इस धारवाहिक की कड़ियों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाया जाए। उन दर्शकों की भावनाओं का सम्मान करते हुए, मैं इस धारावाहिक की कड़ियों को मुद्रित पुस्तक के रूप में आप सबके हाथों में सौंप रहा हूँ। शुभम्।

-डॉ.मोहनलाल गुप्ता

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